Category: देश

  • युवा मतदाताओं पर चुनाव आयोग का फोकस, जेन-जी और जेन अल्फा को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ेगा

    युवा मतदाताओं पर चुनाव आयोग का फोकस, जेन-जी और जेन अल्फा को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ेगा

    नई दिल्ली
    चुनाव आयोग ने 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले जेन अल्फा और जेन-जी (Gen-Z) तक पहुंचने की कोशिशें फिर शुरू की हैं। आयोग का मकसद उन्हें जागरूक वोटर बनाना है, जो चुनावी प्रक्रिया से अच्छी तरह परिचित हों और भविष्य में लोगों को जागरूक करने वाले अभियानों की अगुआई कर सकें।

    आयोग के नए अभियान में देश की 4,123 विधानसभा सीटों के स्कूलों, कॉलेजों और यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स को जोड़ा जाएगा। इसमें कक्षा 9 से 12 तक के स्कूली बच्चों के साथ कॉलेज और यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स शामिल होंगे।

    हर सीट पर 10 साक्षरता क्लब बनाए जाएंगे
    आयोग 50 हजार चुनावी साक्षरता क्लब (ईएलसी) बनाने की योजना पर काम कर रहा है। हर विधानसभा सीट में ऐसे 10 क्लब बनाए जाएंगे।

    इसके लिए आयोग 15 लाख स्कूलों में कक्षा 9 से 12 तक के छात्रों से संपर्क करेगा। इसके अलावा 70 हजार कॉलेजों और 1,400 यूनिवर्सिटी तक भी पहुंच बनाई जाएगी।

    2018 में शुरू हुए थे ईएलसी
    चुनावी साक्षरता क्लब 2018 में सिस्टमेटिक वोटर्स एजुकेशन एंड इलेक्टोरल पार्टिसिपेशन (एसवीईईपी) कार्यक्रम के तहत शुरू किए गए थे। इनका मकसद छात्रों को लोकतांत्रिक मूल्यों, चुनावी प्रक्रिया और चुनाव आयोग की भूमिका व कामकाज से परिचित कराना था।

    डिजिटल तरीके से लगातार जुड़ने पर जोर
    आयोग के मुताबिक, कम्युनिकेशन का तरीका तेजी से बदल रहा है और लोग डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ज्यादा निर्भर हो रहे हैं। युवा मतदाताओं और जमीनी स्तर से जुड़े लोगों के साथ लगातार, व्यवस्थित और सीधे संपर्क की जरूरत को देखते हुए ईएलसी 2.0 की योजना बनाई गई है।

    ईएलसी 2.0 में इन क्लबों को डिजिटल सुविधाओं से लैस, व्यवस्थित और लगातार जुड़े रहने वाले ढांचे के तौर पर फिर से तैयार किया जाएगा।

    2029 तक कितनी बड़ी होगी 'जेन जी'?
    जनसांख्यिकी अनुमानों के मुताबिक भारत में 2029 तक 'जेन जी' की आबादी करीब 38 करोड़ होगी. इनमें 'जेन जी' पुरुषों की संख्या करीब 19.9 करोड़, तो महिलाएं लगभग 18.1 करोड़ होंगी। 

    उस समय अगर अनुमानित मिलेनियल्स की संख्या से तुलना करें, तो देश में तब मिलेनियल्स की संख्या लगभग 35.7 करोड़ रहने का अनुमान है। 

    यानी ये वो पहला मौका होगा जब पहली बार भारत की सबसे बड़ी वयस्क पीढ़ी 'जेन जी' होगी। 

    इसका चुनावी महत्व क्या है?
    'जेन जी' केवल संख्या में बड़ी नहीं होगी बल्कि यह समाज के सबसे सक्रिय वर्ग का प्रतिनिधित्व करेगी।

    उस दौरान करोड़ों की संख्या में वो 'जेन जी' पहली बार वोट डालने वाले युवा होंगे. इसमें कॉलेज, यूनिवर्सिटी और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र शामिल होंगे. तो नौकरी की तलाश में बेरोजगार युवा भी होंगे. वहीं ऐसे युवा भी होंगे जो अपना स्टार्टअप शुरू कर रहे होंगे. साथ ही इनमें अपना करियर स्टार्ट कर चुके और परिवार बसा रहे युवा भी शामिल होंगे। 

    किन मुद्दों पर केंद्रित होगी राजनीति?
    एक्सपर्ट्स मानते हैं कि 2029 तक चुनावी बहस का बड़ा हिस्सा कई विषयों पर आधारित हो सकता है. इनमें शिक्षा, रोजगार, महंगाई, घर, स्टार्टअप्स, क्लाइमेट चेंज और शासन-प्रशासन शामिल होगा। 

    रोजगारः भारत हर साल लाखों युवाओं को रोजगार बाजार में प्रवेश करते देख रहा है. क्वालिटी जॉब्स, निजी निवेश और स्किल डेवलपमेंट सबसे बड़े चुनावी मुद्दों में शामिल हो सकते हैं। 

    शिक्षाः पेपर लीक, परीक्षा के आयोजनों में सुधार, डिजिटल शिक्षा, विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता और रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर युवाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विषय बन चुके हैं। 

    महंगाईः शुरुआती करियर वाले युवाओं के लिए घर खरीदना, किराया, स्वास्थ्य, परिवहन और जीवन-यापन की लागत बड़ा मुद्दा बन सकती है। 

    घरः बड़े शहरों में प्रॉपर्टी की बढ़ती कीमतें और किराया युवा मतदाताओं को सीधे प्रभावित करेंगे। 

    स्टार्टअप और AI: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमेशन और फ्यूचर जॉब्स भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन सकती हैं। 

    क्लाइमेट चेंजः 'जेन जी' पर्यावरण और क्लीन एनर्जी जैसे मुद्दों पर पहले की पीढ़ियों की तुलना में अधिक ऊर्जा और सतत विकास जैसे मुद्दों पर पहले की पीढ़ियों की तुलना में अधिक प्रतिक्रिया देने वाली पीढ़ी मानी जाती है। 

  • मोदी कैबिनेट में जल्द शामिल होंगे 2 नए मंत्री, फेरबदल से पहले हुए ये अहम बदलाव

    मोदी कैबिनेट में जल्द शामिल होंगे 2 नए मंत्री, फेरबदल से पहले हुए ये अहम बदलाव

     नई दिल्ली

    केंद्रीय कैबिनेट में फेरबदल को लेकर अब तक आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा गया है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी के नए अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम के ऐलान के बाद चर्चाएं जोरों पर हैं कि NDA यानी नेशनल डेमोक्रेटक अलायंस इससे जुड़ा ऐलान कर सकता है। खास बात है कि इस संभावित फेरबदल में 2 मंत्रियों की एंट्री पक्की नजर आ रही है।

    नए मंत्रिमंडल में किन नेताओं को शामिल किया जाएगा, इसे लेकर अभी सिर्फ अटकलों का ही दौर चल रहा है। पहले कहा जा रहा है कि जुलाई में इसे लेकर बड़ा फैसला लिया जा सकता है, लेकिन अब तक सत्तारूढ़ गठबंधन के किसी भी दल ने कुछ नहीं कहा है।

    दो मंत्रियों की एंट्री पक्की
    हाल ही में मंत्री पदों में कुछ बदलाव भी देखने को मिले हैं। इनमें ताजा मामला शिक्षा मंत्री का है। दिल्ली में हुए आंदोलन के बाद धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। उनके बाद इस मंत्रालय की जिम्मेदारी प्रल्हाद जोशी को दी गई थी। इनके अलावा अल्पसंख्यक मामलों के राज्य मंत्री जॉर्ज कुरियन और रेल राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू इस्तीफा दे चुके हैं।

    हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव में दोनों ही नेताओं को उम्मीदवार नहीं बनाया गया था। संभावनाएं जताई जा रहीं हैं कि आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी बिट्टू को राज्य में चुनाव संबंधी अहम जिम्मेदारी दे सकती है। हालांकि, इसे लेकर पार्टी ने औपचारिक रूप से कुछ नहीं कहा है।

    दो और मंत्रियों का कार्यकाल होने वाला है पूरा
    दो केंद्रीय मंत्रियों हरदीप पुरी और बी एल वर्मा का राज्यसभा में कार्यकाल नवंबर में समाप्त होगा। अब यह देखना होगा कि उच्च सदन के लिए उन्हें फिर से उम्मीदवार बनाए जाने के संबंध में शीर्ष नेतृत्व क्या फैसला करता है। इनके अलावा केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल को पार्टी का राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बनाया गया है। इससे पहले भी वह मई 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के गठन से पहले इस पद पर रह चुके हैं।

    किसकी हो सकती है एंट्री
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली टीम में किस नेता की एंट्री होगी, यह अब तक साफ नहीं है। पीटीआई भाषा ने सूत्रों के हवाले से जून में बताया था कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं इसलिए इन तीन राज्यों के और प्रतिनिधियों को मोदी मंत्रिपरिषद में जगह मिलने की संभावना है। एजेंसी के मुताबिक, सरकार से हटाए जाने वाले कुछ मंत्रियों को राज्यपाल पद की जिम्मेदारी दिए जाने की भी संभावना है।

  • अब अंडे ने भी रुलाया! कीमतों में उछाल का इथेनॉल से क्या है कनेक्शन?

    अब अंडे ने भी रुलाया! कीमतों में उछाल का इथेनॉल से क्या है कनेक्शन?

    नई दिल्ली
    इथेनॉल बनाने में मक्का का इस्तेमाल बढ़ने से पोल्ट्री फीड महंगा हुआ है. पिछले एक साल में अंडों की कीमत करीब 35-40 फीसदी बढ़ी है और सर्दियों में डिमांड बढ़ने के साथ कीमतों पर और दबाव की आशंका है। 

    रोजमर्रा के खाने-पीने के सामानों पर महंगाई का असर साफ दिखाई दे रहा है. चीनी और दूसरी खाद्य वस्तुओं के बाद अंडों की कीमत में भी तेज बढ़ोतरी हुई है. पिछले एक साल में अंडों के दाम करीब 35-40 फीसदी तक बढ़े हैं. नेशनल एग को-ऑर्डिनेशन कमेटी (NECC) के मुताबिक पोल्ट्री फार्म से निकलने वाले एक अंडे की कीमत करीब 7 रुपये तक पहुंच गई है, जबकि कई खुदरा बाजारों में ये 8.50 से 9 रुपये तक बिक रहा है. इस तेजी की एक बड़ी वजह पोल्ट्री फीड की बढ़ती लागत है. मुर्गियों के चारे में मक्का प्रमुख कच्चे माल में शामिल है और इसी मक्के की मांग एथेनॉल बनाने के लिए भी तेजी से बढ़ रही है. इससे फीड की लागत पर दबाव बढ़ा है, जिसका असर अंडों की कीमत पर दिखाई दे रहा है। 

    इथेनॉल के लिए बढ़ रही मक्के की मांग!
    भारत में पेट्रोल में इथेनॉल की ब्लेंडिंग बढ़ाने की नीति के तहत एथेनॉल उत्पादन में अनाज का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है. इसमें मक्का अहम फीडस्टॉक बनकर उभरा है. सरकार ने भी एथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के की उपलब्धता बढ़ाने और इथेनॉल प्लांट के आसपास मक्का उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कदम उठाए हैं. ESY 2025-26 में इथेनॉल उत्पादन के लिए करीब 125.78 लाख टन मक्का इस्तेमाल होने का अनुमान है. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इथेनॉल सेक्टर में मक्के की मांग किस तेजी से बढ़ी है. हाल के आंकड़ों में मक्का इथेनॉल उत्पादन का सबसे बड़ा फीडस्टॉक भी बनकर सामने आया है। 

    आर्थिक सर्वे 2025-26 ने भी इस बदलाव को रेखांकित किया है. रिपोर्ट के मुताबिक इथेनॉल के लिए मक्के की मांग बढ़ने के साथ इसकी कीमतों और खेती के फैसलों पर असर पड़ा है. FY22 से FY25 के बीच मक्का आधारित इथेनॉल की प्रशासित कीमत में सालाना औसतन 11.7 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, जिससे किसानों के लिए मक्के की खेती का आकर्षण बढ़ा। 

    मक्का महंगा तो पोल्ट्री फीड पर सीधा असर
    पोल्ट्री इंडस्ट्री के लिए फीड सबसे बड़ी लागत में शामिल है और मक्का इसका अहम हिस्सा है. मक्का और सोयाबीन जैसे कच्चे माल की कीमतों में बदलाव का सीधा असर मुर्गियों के चारे की लागत पर पड़ता है. ऐसे में जब मक्के की मांग एथेनॉल और पोल्ट्री दोनों सेक्टर से बढ़ती है, तो कीमतों पर दबाव बनना स्वाभाविक है. पिछले कुछ समय में मक्के की कीमतों में तेजी के पीछे सिर्फ एथेनॉल की मांग ही नहीं है. पोल्ट्री फीड की मांग, मौसम और उत्पादन में बदलाव और दूसरे फीड इनपुट की कीमतें भी इसकी कीमत तय करती हैं. इसलिए अंडों की मौजूदा तेजी को केवल एथेनॉल की वजह से जोड़ना सही नहीं होगा। 

    भारत को मक्का आयात भी करना पड़ा
    मक्के की घरेलू मांग बढ़ने का असर भारत के आयात पर भी दिखाई दिया है. 2024 में भारत ने करीब 8.9 लाख टन मक्का आयात किया था. म्यांमार और यूक्रेन से बड़ी मात्रा में मक्का भारत आया. 2024-25 के दौरान भी आयात में तेजी देखने को मिली थी. ये बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत पहले मक्के का निर्यात भी करता रहा है. अब घरेलू स्तर पर फीड, इथेनॉल और दूसरे औद्योगिक इस्तेमाल से मांग बढ़ने की वजह से घरेलू सप्लाई पर दबाव बना है. हालांकि, देश में मक्के का उत्पादन भी बढ़ रहा है. सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 2024-25 में भारत का मक्का उत्पादन करीब 4.34 करोड़ टन रहा. सरकार ने इथेनॉल और फीड सेक्टर की बढ़ती मांग को देखते हुए मक्का उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने पर भी जोर दिया है। 

    सर्दियों में अंडे की कीमत पर क्यों बढ़ सकता है दबाव?
    अंडे की मांग सालभर रहती है, लेकिन सर्दियों में इसकी खपत आम तौर पर बढ़ जाती है. ऐसे में अगर मक्के और पोल्ट्री फीड की लागत ऊंची बनी रहती है, तो बढ़ी हुई मांग के बीच अंडों की कीमत पर और दबाव आ सकता है. हालांकि, कीमत कितनी बढ़ेगी ये केवल मक्के की कीमत पर निर्भर नहीं करेगा. मुर्गियों की उत्पादकता, मौसम, फीड की दूसरी लागत और बाजार में अंडों की सप्लाई भी इसमें बड़ी भूमिका निभाएगी. फिलहाल तस्वीर ये है कि इथेनॉल के लिए मक्के की बढ़ती मांग ने पोल्ट्री इंडस्ट्री के लिए एक नई लागत चुनौती जरूर खड़ी की है. पेट्रोल में एथेनॉल की बढ़ती हिस्सेदारी से जहां तेल आयात पर निर्भरता कम करने का फायदा है, वहीं दूसरी तरफ मक्का जैसे कृषि उत्पादों की बढ़ती मांग का असर फीड और अंडों की कीमत पर भी दिखाई दे रहा है। 

  • भारत की सबसे बड़ी वयस्क पीढ़ी बनेगी Gen Z, 2029 चुनाव से पहले बदल सकता है सियासी एजेंडा

    भारत की सबसे बड़ी वयस्क पीढ़ी बनेगी Gen Z, 2029 चुनाव से पहले बदल सकता है सियासी एजेंडा

    नई दिल्ली

    आज तक भारतीय चुनावों में जाति, धर्म, क्षेत्र, ग्रामीण-शहरी विभाजन और आर्थिक स्थिति जैसे समीकरण सबसे ज्यादा चर्चा में रहते रहे हैं. लेकिन आने वाले चुनावों में इन पारंपरिक समीकरणों के साथ एक नया और बेहद प्रभावशाली फैक्टर जुड़ने वाला है. वह है भारत का डिजिटल, शिक्षित और मुखर युवा वर्ग. इस युवा वर्ग के एक रूप की एक झलक 'जेन जी' के जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन में पूरी दुनिया ने देखी।  

    दरअसल, भारत की राजनीति अगले कुछ वर्षों में एक ऐसे बदलाव की ओर बढ़ रही है, जो शायद पिछले कई दशकों में सबसे बड़ा जनसांख्यिकीय परिवर्तन होगा. 2029 के लोकसभा चुनाव तक देश में पहली बार 'जेन जी' यानी 18 से 32 वर्ष आयु वर्ग की आबादी सबसे बड़ी वयस्क पीढ़ी बन जाएगी। 

    बीते दिनों, नीट परीक्षा से जुड़ी अनियमितताओं और पेपर लीक के आरोपों को लेकर देशभर में छात्रों का गुस्सा देखने को मिला. देखते ही देखते यह गुस्सा शिक्षा व्यवस्था, पारदर्शिता, भर्ती प्रणाली, जवाबदेही और युवाओं के भविष्य जैसे व्यापक मुद्दों तक पहुंच गया. इसे सोशल मीडिया ने गति दी. लाखों छात्रों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपनी आवाजें उठाईं और देखते ही देखते यह राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का विषय बन गया और इसने आंदोलन का स्वरूप ले लिया और अंततः देश के शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। 

    इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया कि देश के युवा शिक्षा समेत सरकारी नीतियों, रोजगार, आर्थिक अवसरों और शासन व्यवस्था पर भी अपनी मजबूत राय रखते हैं. यह 'जेन जी' पीढ़ी 2029 लोकसभा चुनावों तक देश में सबसे बड़ा वोटबैंक बनने की ओर तेजी से बढ़ रही है। 

    2029 तक कितनी बड़ी होगी 'जेन जी'?
    जनसांख्यिकी अनुमानों के मुताबिक भारत में 2029 तक 'जेन जी' की आबादी करीब 38 करोड़ होगी. इनमें 'जेन जी' पुरुषों की संख्या करीब 19.9 करोड़, तो महिलाएं लगभग 18.1 करोड़ होंगी। 

    उस समय अगर अनुमानित मिलेनियल्स की संख्या से तुलना करें, तो देश में तब मिलेनियल्स की संख्या लगभग 35.7 करोड़ रहने का अनुमान है। 

    यानी ये वो पहला मौका होगा जब पहली बार भारत की सबसे बड़ी वयस्क पीढ़ी 'जेन जी' होगी। 

    इसका चुनावी महत्व क्या है?
    'जेन जी' केवल संख्या में बड़ी नहीं होगी बल्कि यह समाज के सबसे सक्रिय वर्ग का प्रतिनिधित्व करेगी। 

    उस दौरान करोड़ों की संख्या में वो 'जेन जी' पहली बार वोट डालने वाले युवा होंगे. इसमें कॉलेज, यूनिवर्सिटी और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र शामिल होंगे. तो नौकरी की तलाश में बेरोजगार युवा भी होंगे. वहीं ऐसे युवा भी होंगे जो अपना स्टार्टअप शुरू कर रहे होंगे. साथ ही इनमें अपना करियर स्टार्ट कर चुके और परिवार बसा रहे युवा भी शामिल होंगे। 

    किन मुद्दों पर केंद्रित होगी राजनीति?
    एक्सपर्ट्स मानते हैं कि 2029 तक चुनावी बहस का बड़ा हिस्सा कई विषयों पर आधारित हो सकता है. इनमें शिक्षा, रोजगार, महंगाई, घर, स्टार्टअप्स, क्लाइमेट चेंज और शासन-प्रशासन शामिल होगा। 

    रोजगारः भारत हर साल लाखों युवाओं को रोजगार बाजार में प्रवेश करते देख रहा है. क्वालिटी जॉब्स, निजी निवेश और स्किल डेवलपमेंट सबसे बड़े चुनावी मुद्दों में शामिल हो सकते हैं। 

    शिक्षाः पेपर लीक, परीक्षा के आयोजनों में सुधार, डिजिटल शिक्षा, विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता और रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर युवाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विषय बन चुके हैं। 

    महंगाईः शुरुआती करियर वाले युवाओं के लिए घर खरीदना, किराया, स्वास्थ्य, परिवहन और जीवन-यापन की लागत बड़ा मुद्दा बन सकती है। 

    घरः बड़े शहरों में प्रॉपर्टी की बढ़ती कीमतें और किराया युवा मतदाताओं को सीधे प्रभावित करेंगे। 

    स्टार्टअप और AI: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमेशन और फ्यूचर जॉब्स भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन सकती हैं। 

    क्लाइमेट चेंजः 'जेन जी' पर्यावरण और क्लीन एनर्जी जैसे मुद्दों पर पहले की पीढ़ियों की तुलना में अधिक ऊर्जा और सतत विकास जैसे मुद्दों पर पहले की पीढ़ियों की तुलना में अधिक प्रतिक्रिया देने वाली पीढ़ी मानी जाती है। 

    क्या युवा वोटरों की संख्या भी बढ़ रही है?
    दिलचस्प बात यह है कि संख्या बढ़ने के बावजूद कुल मतदाताओं में युवाओं का प्रतिशत लगातार घट रहा है। 

    18-29 वर्ष आयु वर्ग की हिस्सेदारी:

    1988: 38.3%
    2024: 30.1%
    2029 (अनुमानित): 27.8%

    यानी 2029 तक लगभग हर चार मतदाताओं में एक ही युवा होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि भारत की आबादी धीरे-धीरे बुजुर्ग होती जा रही है। 

    फिर 'जेन जी' इतनी प्रभावशाली क्यों?
    राजनीतिक प्रभाव केवल संख्या से तय नहीं की जाती. 'जेन जी' की सबसे बड़ी ताकत उसकी डिजिटल पहुंच है। 

    यह वर्ग मोबाइल इंटरनेट से जुड़ा है. सोशल मीडिया पर सक्रिय है. जानकारी तेजी से साझा करता है. ऑनलाइन अभियान चलाने में पहले की पीढ़ियों से कहीं अधिक सक्षम है. हाल के आंदोलन ने साबित किया कि यह पीढ़ी सरकार से जवाब मांग सकती है. इसमें ये ताकत है कि कुछ ही घंटों में किसी स्थानीय मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना दे। 

    यही कारण है कि राजनीतिक दल अब इंस्टाग्राम, यूट्यूब, एक्स और पिन्स्टर जैसे कई डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पहले से कहीं अधिक सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। 

    राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती
    2029 तक राजनीतिक दलों को अपने चुनावी घोषणापत्र में केवल वादों को एलान करना ही समुचित नहीं होगा. उन्हें यह भी बताना होगा कि जो वादे वो कर रहे हैं, उसे कैसे और कब तक पूरा करेंगे। 

    राजनीतिक दलों को बताना होगा कि रोजगार कैसे बढ़ेगा? परीक्षाएं पारदर्शी कैसे होंगी? AI से रोजगार पर पड़ने वाले प्रभाव का समाधान क्या होगा? युवाओं को सस्ते घर कैसे मिलेंगे? स्टार्टअप को कैसे बढ़ावा मिलेगा? हायर एजुकेशन की क्वालिटी में सुधार कैसे आएगा?

    यानी 'जेन जी' के युवा मतदाता 2029 में चुनाव जीतने का सबसे महत्वपूर्ण हथियार बन सकते हैं। 

    'जेन अल्फा' पीढ़ी भी दे रही दस्तक
    'जेन अल्फा' पीढ़ी, 2029 तक बहुत कम संख्या में वोट डालने की योग्यता हासिल करेगी. लेकिन एक अनुमान के मुताबिक तब तक उनकी आबादी 41.7 करोड़ से अधिक हो जाएगी. यानी अगले दशक में भारत में युवा आबादी का प्रभाव और बढ़ेगा. हाल ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने जेन जी और जेन अल्फा से बात करने की बात कही है. 6 अगस्त को वो इन दोनों पीढ़ियों के लोगों से संवाद करेंगे. यह वो पहल है जिसे आज के राजनीतिक दल शुरू कर रहे हैं. जो दल आज 'जेन जी' को समझेंगे, वे भविष्य में जेन अल्फा के मतदाताओं तक भी आसानी से पहुंच बना सकते हैं। 

    हालांकि भारत की आबादी में और एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. यहां 18 वर्ष से कम आयुवर्ग के लोगों का अनुपात लगातार घट रहा है. वहीं 45 से 61 आयु वर्ग के लोगों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है. 62 वर्ष से अधिक आयु वाले लोगों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। 

    इसका मतलब यह भी है कि भविष्य की सरकारों को एक साथ दो अलग-अलग पीढ़ियों की जरूरतों को संतुलित करना होगा. जहां एक तरफ युवाओं के लिए रोजगार और अवसरों को उपलब्ध कराना चुनौती भरा होगा वहीं बुजुर्गों के लिए हेल्थ, पेंशन और सोशल सिक्योरिटी का इंतजाम भी करना चुनौतिपूर्ण होगा। 

    चुनावी रणनीति पर क्या असर पड़ सकता है?
    वैसे तो चुनावों में सोशल मीडिया का प्रवेश 2014 के चुनाव से ही हो गया है पर आगामी चुनावों में पार्टियां डिजिटल कैंपेन पर और अधिक फोकस कर सकती हैं. उनका फोकस युवा मतदाता यानी 'जेन जी' पर सबसे अधिक हो सकता है. यह भी संभव है कि केवल चुनावी वादे न किए जाएं, उन वादों को कैसे पूरा करेंगे इस पर भी बात हो. यानी अब चुनाव केवल क्षेत्रीय और जातीय समीकरणों पर आधारित न हो कर भविष्य की अर्थव्यवस्था और युवाओं की आकांक्षाओं के मुद्दे पर भी लड़ा जा सकता है। 

    भारत अपने जनसांख्यिकीय इतिहास के एक ऐसे पड़ाव पर खड़ा है जहां आगामी लोकसभा चुनाव 2029 तक 'जेन जी' न केवल देश की सबसे बड़ी वयस्क आबादी होगी, बल्कि सबसे अधिक डिजिटल रूप से जुड़ी, शिक्षित, जागरूक और संगठित पीढ़ी भी होगी. लिहाजा 2029 का लोकसभा चुनाव भारत की नई युवा राजनीति के 
    उदय का चुनाव भी साबित हो सकता है। 

  • पाकिस्तान से भारत पहुंचीं 150 लड़कियां, शादी के पीछे क्या है ‘दलदल से निकलने’ की कहानी?

    पाकिस्तान से भारत पहुंचीं 150 लड़कियां, शादी के पीछे क्या है ‘दलदल से निकलने’ की कहानी?

    नई दिल्ली
    सोशल मीडिया पर इन दिनों पाकिस्तान से भारत आने वाले दुल्हनों की काफी चर्चा हो रही है. बताया जा रहा है कि 300 हिंदू लड़कियां शादी करने के लिए भारत आ रही हैं. दरअसल, वीजा की वजह से वो पाकिस्तान से भारत नहीं आ पा रही थीं. तो समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर ये लड़कियां अभी क्यों आ रही हैं और इनकी शादियां भारत में किस वजह से हो रही है और किस तरह से ये भारत आ रही हैं… तो समझते हैं पाकिस्तान से भारत आ रही इन लड़कियों की कहानी…

    कौन हैं ये पाकिस्तानी लड़कियां?
    दरअसल, ये लड़कियां पाकिस्तान के सिंध प्रांत में रहने वाले सिंधी परिवारों से हैं और शादी के लिए यहां आ रही हैं. इन लड़कियों की भारत में पहले ही सगाई हो चुकी थी, लेकिन शादी के लिए वो वीजा की वजह से भारत नहीं आ पा रही थीं. इनमें किसी की शादी नागपुर में होनी थी, किसी की रायपुर, जोधपुर या पुणे में. ये ऐसे रिश्ते हैं जो अचानक नहीं बने, बल्कि पहले से तय थे और शादी की तैयारी चल रही थी. बस यहां ना पाने की वजह से शादी नहीं हो पा रही थी। 

    इस बारे में समुदाय के विवेक कुकरेजा से बात की, जो लंबे समय से पाकिस्तानी अल्पसंख्यकों के लिए काम कर रहे हैं. साथ ही वो लंबे समय से इन लड़कियों को वीजा दिलवाने की कोशिश कर रहे हैं और उन्होंने गृह मंत्रालय से इन्हें वीजा दिलवाने की पेशकश की थी और अब उन्हें वीजा मिल गया है। 

    विवेक कुकरेजा ने बताया कि सिंधी हिंदू परिवारों के बीच भारत और पाकिस्तान में रिश्तेदारी पुरानी है. कई परिवारों के रिश्तेदार दोनों तरफ रहते हैं. इसी वजह से पाकिस्तान के सिंध से भारत में शादी के लिए परिवारों का आना-जाना पहले भी होता रहा है. साथ ही उन्होंने बताया कि ये 150 लड़कियां हैं और उनके साथ एक 1 व्यक्ति और आया है. ऐसे में कुल 300 लोग हैं, जिसमें 150 लड़कियां हैं। 

    फिर शादी क्यों नहीं हो पा रही?
    मुश्किल तब शुरू हुई जब भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ा और ऑपरेशन सिंदूर के बाद आवाजाही और वीजा पर पाबंदियां लग गईं. वाघा-अटारी के रास्ते से पाकिस्तान से भारत आने वाले लोगों की आवाजाही भी बंद हो गई. इसका सीधा असर उन परिवारों पर पड़ा, जिनकी बेटियों की भारत में शादी तय थी. सगाई हो चुकी थी, रिश्ता तय था, परिवार शादी की तैयारी कर रहे थे, लेकिन दुल्हन भारत नहीं आ पा रही थी. सामुदायिक नेता राजेश झाम्बिया के मुताबिक, उस वक्त करीब 150 ऐसी लड़कियां थीं, जिनकी शादी भारत में होनी थी और उनकी प्रक्रिया बीच में अटक गई थी। 

    अब कैसे आ रही हैं?
    जब मामला लगातार अटका रहा तो सिंधी समुदाय ने रायपुर स्थित संत युधिष्ठिरलाल शादानी से संपर्क किया. वे पाकिस्तान के सिंध प्रांत के घोटकी स्थित शादानी दरबार के आध्यात्मिक प्रमुख हैं. समुदाय ने उन लड़कियों की सूची तैयार की, जिनकी भारत में सगाई हो चुकी थी और शादी होनी थी. इसके बाद यह सूची गृह मंत्रालय तक पहुंचाई गई और सरकार से अनुरोध किया गया कि इन लड़कियों को शादी के लिए भारत आने की अनुमति दी जाए। 

    आखिरकार सरकार की ओर से इन दुल्हनों और उनके परिवार के एक सदस्य को भारत आने की अनुमति मिली. लेकिन एक शर्त थी कि उन्हें हवाई रास्ते से भारत आना होगा. अभी जो वीजा मिल रहे हैं, उनमें जमीन के रास्ते भारत जाने की परमिशन नहीं मिलती. अभी दुबई, श्रीलंका के रास्ते भारत आते हैं. ऐसे में ये लड़कियां भी इन रूट के जरिए यहां आई हैं। 

    भारत में ही क्यों कर रही शादियां?
    इस सवाल का जवाब सिर्फ 'शादी' नहीं है. विवेक कुकरेजा ने बताया, 'भारत और पाकिस्तान के सिंधी हिंदू परिवारों के बीच दशकों पुराने रिश्ते हैं. कई परिवारों के रिश्तेदार भारत में आकर बस चुके हैं, लेकिन उनके परिवार के कुछ सदस्य अब भी पाकिस्तान में रहते हैं. इसलिए भारत में रिश्ता मिलना कोई असामान्य बात नहीं है. इसके अलावा, पाकिस्तान में रहने वाले कई हिंदू परिवार वहां के मौजूदा हालात से परेशान हैं. अल्पसंख्यक होने की वजह से उन्हें सामाजिक और धार्मिक स्तर पर कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है. ऐसे में भारत में शादी सिर्फ एक पारिवारिक रिश्ता नहीं, बल्कि कई लोगों के लिए बेहतर और सुरक्षित भविष्य की उम्मीद भी बन जाती है। 

    पहले कैसे आते थे? 

    इन परिवारों के लिए भारत आना पहले इतना मुश्किल नहीं था. सिंध से आने वाले परिवार वाघा-अटारी बॉर्डर के रास्ते भारत आते थे. शादी होती थी और फिर लोग वापस भी चले जाते थे. लेकिन पहलगाम अटैक के बाद सीमा मार्ग बंद होने के बाद सीधे भारत आने का रास्ता बंद हो गया। 

  • एनएमडीसी ने सतर्कता जागरूकता सप्ताह 2026 आयोजन के अधीन आरंभ किया त्रैमासिक अभियान

    एनएमडीसी ने सतर्कता जागरूकता सप्ताह 2026 आयोजन के अधीन आरंभ किया त्रैमासिक अभियान

    हैदराबाद

    केंद्रीय सतर्कता आयोग के दिशानिर्देशों के अनुसार, एनएमडीसीलिमिटेड ने सतर्कता जागरूकता सप्ताह 2026 के पूर्वाभ्यास के रूप में त्रैमासिक अभियानआरंभ किया । इस अभियान का उद्देश्य पूरे संगठन में सत्यनिष्ठा, पारदर्शिता, ईमानदारी और सुशासन के मूल्यों को बढ़ावा देना और जागरूकता को मजबूत करना है।

    एनएमडीसी के सतर्कता विभाग ने इस अभियान के भाग के रूप में एनएमडीसी मुख्यालय, हैदराबाद में दो दिवसीय क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित किया। यह कार्यक्रम केंद्रीय सतर्कता आयोग द्वारा पहचाने गए प्रमुख क्षेत्रों में कर्मचारियों में जागरूकता बढ़ाने और क्षमता निर्माण के लिए आयोजित किया गया ।

    इस सत्र में  अनुराग कपिल, निदेशक (वित्त), एनएमडीसी और  सी. नीलकंठ रेड्डी ,मुख्य सतर्कता अधिकारी, एनएमडीसी विशेष रूप से उपस्थित रहे। निदेशक (वित्त) ने अपने संबोधन में, सतर्कता और वित्त कार्यों में गहरे तालमेल पर बल दिया। उन्होंने पारदर्शिता, जवाबदेही और सही निर्णय लेने को सुनिश्चित करने के लिए आधिकारिक फाइलों पर स्पष्ट, विशिष्ट और तर्कसंगत स्पष्टीकरण व औचित्य दर्ज करने के महत्व पर भी बल दिया।

     सी. नीलकंठ रेड्डी, मुख्य सतर्कता अधिकारी ने समापन सत्र के दौरान, प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए सतर्कता जागरूकता सप्ताह 2026 के विषय "समृद्धि के लिए ईमानदारी" (Probity for Prosperity) पर प्रकाश डाला। उन्होंने सभी संगठनात्मक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, नैतिकता औरजवाब देही के मूल मूल्यों को विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने सतर्कता जागरूकता सप्ताह 2026 के लिए एनएमडीसी की तैयारियों को सशक्त और केंद्रीय सतर्कता आयोग के दिशानिर्देशों के अनुरूप अपनी सक्रीय भागीदारी और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का आग्रह किया।
    एनएमडीसी के मुख्य सतर्कता अधिकारी  सी. नीलकंठ रेड्डी ने अभियान के महत्व और
    पूरे संगठन में सतर्कता कार्यप्रणाली को मजबूत करने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। इस कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों के प्रख्यात वक्ताओं और विषय विशेषज्ञों ने भाग लिया, जिन्होंने आईटी और साइबर सुरक्षा व साइबर स्वच्छता, जीएफआर-2017 के तहत जीईएम- न्यू फीचर्स एण्ड फंक्शनेलिटी तथा कंडक्ट रुल्स एण्ड कन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरस्ट जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर अपना अगाध ज्ञान और व्यावहारिक दृष्टिकोण साझा किया।

    पहले दिन के सत्र में मती के इंद्र्वेणी , वैज्ञानिक-एफ एवं संबद्ध निदेशक, सी-डैक ने साइबर सुरक्षा और साइबर स्वच्छता तथा  डी. ब्रह्मा रेड्डी ,दिल्ली विश्वविद्यालय के संबद्ध प्रोफेसर तथा आईएसटीएम ,नई दिल्ली के पूर्व संकाय ने पब्लिक प्रक्यूरमेंट ऑफ गूडस सर्विस अंडर जीएफआर-2017 पर सत्र आयोजित किए। दूसरे दिन   कार्तिकेय दत्ता ,उप मुख्य सामग्री प्रबंधक (सामान्य) आईआरएसएस ने प्रक्यूरमेंट फ्रेमवर्क ,बेस्ट पैक्टिस एण्ड रीसेंट डेवलपमेंट इन जीईम, तथा कर्नूल क्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल और बीडीएल ,मिधानि एवं एचएसएल के पूर्व मुख्य सतर्कता अधिकारी डॉ. उपेंदर वेन्नम ने मॉडल सीडीए रुलस एण्ड कनफ्लिक्ट ऑफ इंटर्स्ट विषय पर सत्र संचालित किए।
    इन सत्रों ने प्रतिभागियों को अपने आधिकारिक दायित्वों के निर्वहन में सतर्कताजागरूकता,पारदर्शिता,अनुपालन और नैतिक निर्णय लेने को मजबूत करने पर मूल्यवान दृष्टिकोण प्रदान किए।यह अभियान सतर्कता जागरूकता सप्ताह 2026 तथा सम्पूर्ण अभियान की अवधि के दौरान विभिन्न जागरूकता और क्षमता निर्माण पहलों के साथ जारी रहेगा।
    एनएमडीसी ने सतर्कता जागरूकता सप्ताह 2026 के तहत "समृद्धि के लिए ईमानदारी" विषय पर त्रैमासिक अभियान के रूप में, क्षमता निर्माण कार्यक्रम का आयोजन किया। यह कार्यक्रम संगठन में सतर्कता, पारदर्शिता, अनुपालन, नैतिक आचरण और सुशासन को मजबूत करने के लिए मूल्यवान अंतर्दृष्टि और व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रदान करेगा ।

  • ड्रोन-बम की बारिश के बीच भारतीय नौसेना का कमाल, दो भारतीय जहाजों को सुरक्षित पहुंचाया

    ड्रोन-बम की बारिश के बीच भारतीय नौसेना का कमाल, दो भारतीय जहाजों को सुरक्षित पहुंचाया

    मुंबई 

    भारतीय नौसेना ने रणनीतिक रूप से अहम बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट से दो मर्चेंट जहाजों को पार कराया है. इनमें एमवी यूनियन मरीनर और एमवी दाघेर की मिशन पर तैनात नौसेना की यूनिट ने दोनों जहाजों के ट्रांजिट की निगरानी की. नौसेना ने कहा कि वह भारत आने-जाने वाले जरूरी कार्गो की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए लगातार तैनात है। 

    बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट लाल सागर को अदन की खाड़ी और हिंद महासागर से जोड़ने वाला बेहद अहम समुद्री मार्ग है. दुनिया के बिजी शिपिंग रूट्स में शामिल इस कॉरिडोर से बड़ी मात्रा में व्यापारिक सामान और ऊर्जा संसाधनों की आवाजाही होती है. ऐसे में यहां किसी भी तरह का खतरा अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार को प्रभावित कर सकता है। 

    भारतीय नौसेना ने कहा कि उसकी तैनाती का मकसद भारत के समुद्री हितों की सुरक्षा करना और भारतीय व्यापारिक जहाजों के लिए सुरक्षित माहौल सुनिश्चित करना है. नौसेना के युद्धपोत अदन की खाड़ी में एंटी-पायरेसी ऑपरेशन के तहत भी लगातार निगरानी कर रहे हैं। 

    खाड़ी क्षेत्र में भी तैनात हैं युद्धपोत
    अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष के बीच होर्मुज स्ट्रेट में संकट के बीच भारतीय नौसेना के युद्धपोत मिडिल ईस्ट क्षेत्र में मिशन पर तैनात हैं. भारतीय नौसेना के कुछ युद्धपोत ऑपरेशन संकल्प के तहत ओमान की खाड़ी में भी मौजूद हैं. वहीं, अदन की खाड़ी में तैनात युद्धपोत समुद्री डकैती के खतरे से निपटने के साथ भारतीय मर्चेंट जहाजों की सुरक्षित आवाजाही में मदद कर रहे हैं। 

    रक्षा प्रतिष्ठान से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, भारतीय नौसेना के युद्धपोत जरूरत पड़ने पर क्षेत्र में फंसे भारतीय नागरिकों की मदद के लिए भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं. हालांकि, फिलहाल इस संबंध में कोई आधिकारिक कम्युनिकेशन नहीं हुआ है। 

    बाब-अल-मंदेब में भारतीय नौसेना की सक्रिय मौजूदगी ऐसे समय में अहम है, जब पश्चिम एशिया में तनाव के कारण समुद्री व्यापार और शिपिंग रूट्स पर सुरक्षा का खतरा बढ़ा हुआ है. नौसेना की यह तैनाती भारत के व्यापारिक हितों और समुद्री सप्लाई चेन को सुरक्षित रखने की रणनीति का हिस्सा है। 

  • नेपाल बाढ़ का भयावह मंजर: कैलाश मानसरोवर जा रहे 400 टूरिस्ट लापता, 105 भारतीय भी शामिल

    नेपाल बाढ़ का भयावह मंजर: कैलाश मानसरोवर जा रहे 400 टूरिस्ट लापता, 105 भारतीय भी शामिल

    काठमांडू 

    नेपाल-चीन सीमा पर रसुवा जिले में बुधवार को आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई है। इस आपदा के कारण सड़कों को गंभीर नुकसान पहुंचा है, जिससे कैलाश मानसरोवर यात्रा पर निकले करीब 400 तीर्थयात्री रसुवागढ़ी इलाके में फंस गए हैं और उनका संपर्क पूरी तरह टूट गया है। काठमांडू स्थित टच कैलाश ट्रेवल्स एंड टूर्स के एमडी बासु कुमार अधिकारी ने बताया कि बुधवार को 93 नेपाली नागरिकों सहित कुल 390 श्रद्धालुओं को चीन की सीमा पार करनी थी। हालांकि दोपहर 3 बजे तक इनमें से कुछ ही लोगों से संपर्क हो पाया है, जबकि अधिकांश यात्रियों के बारे में कोई सटीक जानकारी नहीं मिल सकी है।

    ये तीर्थयात्री विभिन्न ट्रेवल एजेंसियों के माध्यम से यात्रा पर निकले थे, जिनमें सम्राट टूर्स एंड ट्रेवल्स के 71 यात्री, ट्रेकर्स सोसाइटी के 92, हिमालयन ग्लेशियर के 62, लीफ हॉलीडेज के 55, कैलाश जर्नी के 31, फिशटेल टूर एंड ट्रेवल्स के 27, काठमांडू हॉलीडेज के 17, अल्पाइन इको ट्रेक के 16, रिचा टूर्स के 12 और एक्सप्लोर वेकेशन के सात यात्री शामिल हैं।

    ट्रेकिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ नेपाल के अध्यक्ष सागर पांडे ने बताया कि प्रभावित क्षेत्र में फंसे तीर्थयात्रियों से संपर्क स्थापित करने और उनकी स्थिति का सही आकलन करने के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं।

    तिब्बत सीमा से करीब 125 किलोमीटर दूर आई बाढ़
    नेपाल की सेना ने एक बयान में बताया कि पानी के अचानक बढ़ने से रसुवा जिले के तिमुरे और समीपवर्ती स्याफ्रुबेसी इलाके में भारी नुकसान हुआ तथा वाहन, सामान और अन्य संपत्ति बह गई। रसुवा जिला काठमांडू के उत्तर-पूर्व में स्थित है और तिब्बत सीमा से करीब 125 किलोमीटर दूर है। नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीआरआरएमए) ने रसुवा, नुवाकोट, धादिंग, चितवन और गोरखा के नदी किनारे रहने वाले लोगों से अगले आदेश तक अत्यधिक सर्तक रहने और सुरक्षा उपाय करने की अपील की है।

    कितने तीर्थयात्री संपर्क से बाहर हैं?
    काठमांडो पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक वहां स्थित टच कैलाश ट्रैवल्स एंड टूर्स के प्रबंध निदेशक बाशु कुमार अधिकारी के अनुसार, 390 तीर्थयात्रियों को बुधवार को सीमा पार करनी थी। दोपहर तीन बजे तक कुछ यात्रियों को छोड़कर बाकी से संपर्क स्थापित नहीं हो सका था। अलग-अलग यात्रा एजेंसियों के ये यात्री रसुवागढ़ी इलाके में मौजूद थे। ट्रेकिंग एजेंसियों एसोसिएशन ऑफ नेपाल के अध्यक्ष सागर पांडे ने कहा कि यात्रियों से संपर्क करने और उनकी स्थिति का पता लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

    देश/राष्ट्रीयता लापता यात्रियों की संख्या
    भारत 105
    नेपाल 93
    मलेशिया 17
    ब्रिटेन 12
    दक्षिण अफ्रीका 4
    अमेरिका 3
    ऑस्ट्रेलिया 1
    नीदरलैंड 1
    एनआरआई 37
    राष्ट्रीयता की पुष्टि बाकी 111
    कुल 384

    कौन-कौन सी एजेंसियों के यात्री शामिल हैं?
    इन तीर्थयात्रियों में अलग-अलग ट्रैवल एजेंसियों के ग्राहक शामिल हैं। इनमें सम्राट टूर्स एंड ट्रैवल्स के 71, लीफ हॉलीडेज के 55, काठमांडू हॉलीडेज के 17, कैलाश जर्नी के 31, एक्सप्लोर वेकेशन के सात, ट्रेकर्स सोसाइटी के 92, रिचा टूर्स के 12, फिशटेल टूर्स एंड ट्रैवल्स के 27, हिमालयन ग्लेशियर के 62 और एल्पाइन इको ट्रेक के 16 यात्री शामिल हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इन सभी यात्रियों की स्थिति जानने के लिए संपर्क की कोशिश जारी है।

    लापता लोगों पर नेपाल पर्यटन ने क्या बताया?
    नेपाल पर्यटन बोर्ड की 26 अगस्त 2026 की प्रारंभिक सूची के अनुसार, भोटे कोशी नदी में अचानक आई बाढ़ के बाद कुल 384 पर्यटकों और यात्रियों के लापता होने की सूचना है। इनमें 291 विदेशी नागरिक और 93 नेपाली नागरिक शामिल हैं। जानकारी के आधार पर 59 और 46 भारतीय नागरिकों के साथ 37 एनआरआई भी सूची में हैं। इसके अलावा कुछ यात्रियों की राष्ट्रीयता अभी स्पष्ट नहीं हुई है। इन आंकड़ों में कैलाश मानसरोवर वाले तीर्थ यात्रियों का आंकड़ा नहीं शामिल है। 

    असमान्य रूप से अधिक था बाढ़ का स्तर
    रसुवा के सहायक मुख्य जिला अधिकारी ध्रुव प्रसाद अधिकारी ने कहा कि बाढ़ का स्तर असामान्य रूप से अधिक था और दोनों बस्तियों को काफी नुकसान हुआ है। रसुवा के मुख्य सीमा शुल्क अधिकारी राजेंद्र ढुंगाना ने बताया कि सीमा शुल्क परिसर में रखे कई वाहन और सामान पानी में बह गए। हाल में बनाया गया एक पुल भी बह गया।

    प्रधानमंत्री कार्यालय ने बताया कि भीषण बाढ़ को देखते हुए बचाव और राहत अभियान तेज करने के लिए रसुवा और आसपास के इलाकों में नेपाल सेना, सशस्त्र पुलिस बल और नेपाल पुलिस के जवानों को तैनात किया गया है। प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, बाढ़ के बाद की स्थिति पर चर्चा करने और उससे निपटने के लिए जरूरी कदम उठाने को लेकर एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई जा रही है।

    नेपाल सेना ने त्रिशूली नदी के आसपास के इलाकों में खोज एवं बचाव अभियान चलाने के लिए दो हेलीकॉप्टर भेजे हैं। सेना ने एक बयान में बताया कि आपातकालीन चिकित्सा बचाव दल से लैस एक एमआई-17 हेलीकॉप्टर को त्रिशूली स्थित जिला अस्पताल की ओर रवाना किया गया है। हालांकि, नेपाल सेना ने कहा कि भीषण बाढ़ से हुए नुकसान का पूरा ब्योरा अभी उपलब्ध नहीं हुआ है और नुकसान से संबंधित आंकड़े जुटाने का काम जारी है।

    सबसे ज्यादा कौन सा क्षेत्र प्रभावित हुआ? 
    अधिकारियों का कहना है कि बाढ़ का पानी तिब्बत की ओर से आया प्रतीत होता है। सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में तिमुरे और स्याब्रुबेसी की सीमावर्ती बस्तियां शामिल हैं। अधिकारियों ने अभी तक विनाश की पूरी सीमा का पता नहीं लगाया है और न ही हताहतों की पुष्टि की है।  क्योंकि आकलन दल अभी भी प्रभावित क्षेत्रों से जानकारी एकत्र कर रहे हैं। रसुवा जिले के प्रशासन नरेंद्र परियार ने रॉयटर्स को बताया कि हमें गांवों और बुनियादी ढांचा परियोजना स्थलों के बह जाने की खबरें मिली हैं। उन्होंने आगे कहा कि भारी जानमाल का नुकसान हो सकता है। लेकिन मैं अभी निश्चित रूप से कुछ नहीं कह सकता। हालांकि नेपाल के साथ-साथ चीन में हालात ठीक नहीं है।

    शी जिनपिंग का 'ऑल-आउट' रेस्क्यू ऑपरेशन 
    चीन में अचानक बाढ़ आने के बाद राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने लापता लोगों की तलाश के लिए हरसंभव प्रयास करने के निर्देश दिए। उन्होंने 'ऑल-आउट' रेस्क्यू ऑपरेशन के जरिए खतरे में पड़े लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने और घायलों का तुरंत इलाज कराने को कहा। साथ ही निगरानी और चेतावनी व्यवस्था मजबूत करने तथा दूसरे हादसों को रोकने पर जोर दिया। चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग ने भी प्रभावित और लापता लोगों की संख्या का जल्द पता लगाने और राहत कार्य तेज करने के निर्देश दिए। 

     

  • 2.0 फिटमेंट फैक्टर, 7% सालाना इंक्रीमेंट… 8वें वेतन आयोग में कर्मचारियों की सैलरी पर कितना असर?

    2.0 फिटमेंट फैक्टर, 7% सालाना इंक्रीमेंट… 8वें वेतन आयोग में कर्मचारियों की सैलरी पर कितना असर?

    नई दिल्ली

    8वें वेतन आयोग की बैठकें जारी हैं और कर्मचारी अपनी मांग आयोग के सामने रख रहे हैं. इसी में से ऑल इंडिया न्यू पेंशन स्कीम एम्प्लॉइज फेडरेशन (AINPSEF) जैसे कुछ कर्मचारी समूह 8th Pay Commission के तहत 7 फीसदी सालाना वेतन बढ़ोतरी की मांग कर रहे है. इसके साथ ही फिटमेंट फैक्‍टर भी लागू करने की मांग रख रहे हैं।  

    इन कर्मचारी संगठनों की मांग
    वहीं, नेशनल काउंसिल ऑफ द जॉइंट कंसल्टेटिव मशीनरी (NC-JCM), ऑल इंडिया डिफेंस एम्प्लॉइज फेडरेशन (AIDEF) और फेडरेशन ऑफ नेशनल पोस्टल ऑर्गेनाइजेशन्स (FNPO) जैसे अन्य समूहों ने 6% वार्षिक वेतनवृद्धि की सिफारिश की है। 

    1 से लेकर 3 साल तक कितनी बढ़ेगी सैलरी?
    ऐसे में एक कैलकुलेशन के माध्‍यम से समझते हैं कि अगर सरकारी कर्मचारियों और पेंशनर्स की सैलरी हर साल 7 फीसदी बढ़ती है और फिटमेंट फैक्‍टर को 2.0 फीसदी रखा जाता है तो 1 से लेकर 3 साल तक आपकी सैलरी कितनी हो जाएगी। 

    बेसिक सैलरी में बढ़ोतरी
    सबसे पहले बेसिक पे में 2.0 फ‍िटमेंट फैक्टर को लागू करने के बाद आपकी बेसिक सैलरी दोगुना हो जाएगी. मतलब- अगर आपकी बेसिक ₹18,000 है तो यह ₹36,000 हो जाएगी। 

        ₹21700  से बढ़कर ₹43400
        ₹25,500 से बढ़कर ₹51,000
        ₹35,400 से बढ़कर ₹70,800
        ₹44,900 से बढ़कर ₹89,800
        ₹56,100 से बढ़कर ₹1,12,200

    डबल नहीं होगी सैलरी
    बेसिक पे डबल होने का ये मतलब नहीं है कि आपकी कुल सैलरी भी डबल हो जाएगी, क्योंकि 8th CPC में DA, HRA और दूसरे अलाउंस का कैलकुलेशन नए तरीके से होगी. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कर्मचारियों की कुल सैलरी 31 फीसदी तक बढ़ सकती है. अब इसमें 7 फीसदी का इंक्रीमेंट जोड़ दें तो आइए जानते हैं कुल कितनी सैलरी हो जाएगी? 

    7% इंक्रीमेंट पर कितनी सैलरी बढ़ जाएगी? 
    मान लीजिए अगर किसी का बेसिक पे 18,000 रुपये है और इसपर 2.0 फिटमेंट फैक्‍टर लागू होकर 8वें वेतन आयोग के तहत इसका कुल बेसिक 36000 रुपये हो गया है तो अब इसमें डीए, एचएआर शामिल होगा. अब मान लीजिए DA और HRA और अन्‍य अलाउंस जोड़ने के बाद कुल सैलरी 50,000 रुपये हो जाती है तो 

    •     पहले साल 7% इंक्रीमेंट के बाद कुल सैलरी 53,500 रुपये होगी 
    •          दूसरे साल 7% इंक्रीमेंट के बाद कुल सैलरी 57,245 रुपये होगी
    •     तीसरे साल 7 फीसदी इंक्रीमेंट पर कुल सैलरी 61,252.17 रुपये होगी.

    आयोग का फॉर्मूला तय करेगा कितनी बढ़ सकती है सैलरी
    गौरतलब है कि यह सिर्फ एक अनुमानित कैलकुलेशन है. Pay Commission में 7% एनुअल इंक्रीमेंट और 2.0 फिटमेंट फैक्‍टर को अगर मंजूरी दी जाती है तो यह पे कमीशन के फॉर्मूले पर भी निर्भर करेगा कि कर्मचारियों की कितनी सैलरी बढ़ेगी. यह कैलकुलेशन मौजूदा चर्चा के आधार पर किया गया है। 

  • अभिजीत दीपके ने दिया चौंकाने वाला बयान, बोले- अब सौरव का नंबर आएगा

    अभिजीत दीपके ने दिया चौंकाने वाला बयान, बोले- अब सौरव का नंबर आएगा

    नई दिल्ली

    जेन-जी से जुड़े एक कान्क्लेव में कॉकरोच जनता पार्टी तीनों मुख्य चेहरे-अभिजीत दीपक, आशुतोष रांका और सौरव दास शामिल हुए। इस दौरान दीपके से जब पूछा गया कि क्या आप बवाल मचाने दिल्ली आते हैं। आते ही फिर से आपने मार्च का ऐलान कर दिया। इस पर दीपके ने कहा कि मजबूरी में करना पड़ता है। हम थोड़ी ना करना चाहते है। लेकिन एक महीना होने को आ रहा है। हम बार-बार बोल रहे हैं कि जिन बच्चों ने सुसाइड किया है, उनके परिजनों को कंपनसेशन दे दीजिए आप।

    दीपके ने कहा कि एक करोड़ रुपए की बात है। एक करोड़ कोई बड़ा अमाउंट नहीं है सरकार के लिए। 50 से 100 करोड़ आप सांसदों और विधायकों को खरीदने में लगा देते हो तो इन परिवारों को एक करोड़ क्यों नहीं दे रहे हो आप? यह कोई बड़ा अमाउंट नहीं है, लेकिन उसमें भी आप इतनी कंजूसी दिखा रहे हो। एक तो ये डिमांड हो गई। और दूसरा कि आपने जो एफआईआर किया है स्टूडेंट्स के ऊपर, वो वापस ली जाए। ये जो स्टूडेंट्स आए थे वो किसलिए आए थे? वे शिक्षा से जुड़े अपने अधिकार मांगने आए थे। कोई वोट तो नहीं मांग रहा था।

    5 सितंबर को इंडिया गेट 1.0
    न्यूज 24 चैनल के इस कार्यक्रम में जब दीपके से यह पूछा गया कि अब क्या करेंगे? क्या प्लान है? क्या अनाउंस क्या किया है आपने? क्या जंतर मंतर 2.0 करने जा रहे हैं। इस पर दीपके ने कहा कि यह इंडिया गेट 1.0 है। हम पांच सितंबर को इंडिया गेट से पुलिस हेडक्वार्टर तक मार्च करेंगे। हम मांग करेंगे कि स्टूडेंट्स पर लगे हुए झूठे केस वापस लिए जाएं और दूसरा प्लीज पीड़ित परिवारों को एक करोड़ रुपए दे दीजिए। दीपके ने कहा कि ये परिवार लोअर मिडिल क्लास से आते हैं।

    दीपके ने कहा कि मैं आकांक्षा चतुर्वेदी के फैमिली से मिला था। उसके पापा को पैरालिसिस का अटैक आकर गया। हार्ट अटैक आकर गया। उनका छोटा कैटरिंग का बिजनेस था। उन्होंने 15 लाख का लोन लिया था बेटी को डॉक्टर बनाने के लिए। उनको लग रहा था बेटी डॉक्टर बन जाएगी तो घर वही चलाएगी। अभी वो कह रहे हैं कि बेटी तो चली गई। छोटा बच्चा है। उसको मैं अब कैसे संभालूंगा? मैं तो कमा नहीं सकता। दीपके ने कहा कि यह जो एक करोड़ रुपए हैं, उनसे उन पीड़ित परिवारों को काफी मदद मिलेगी जो लोन के दबाव में है। हम सभी जानते हैं कि कोचिंग करने में पैसा लेना पड़ता है।

    जयपुर हमले का जिक्र
    जयपुर में हुए हमले को याद दिलाते हुए जब आशुतोष रांका से पूछा गया कि क्या अब जब आप मार्च करेंगे तो जयपुर जैसा कुछ हो गया तो… या फिर जंतरमंतर और कनॉट प्लेस में जो हुआ वैसा हो गया तो… आपको इस बात की कोई आशंका या चिंता नहीं है? इस पर रांका ने कहा कि नहीं नहीं, बिल्कुल चिंता नहीं है। हम तो जयपुर की घटना के बाद कल जोधपुर भी चले गए। उसके बाद आज यहां आना था, नहीं तो आगे बाड़मेर और बीकानेर के दौरे की तैयारी थी। देखिए, हम लोग इन लोगों से वोट मांगने तो जा नहीं रहे हैं।

    स्कूलों को ठीक करने की बात कर रहे
    अभी राजस्थान में सरपंच के चुनाव होने वाले हैं। हम लोग यह तो नहीं बोल रहे हैं कि भाई कॉकरोच जनता पार्टी के सरपंच बना दो। हम तो वहां पर स्कूलों को ठीक करने की बात कर रहे हैं। स्कूल ठीक कर दीजिए। भैंसों के तबेले में तो कम से कम स्कूल नहीं चलना चाहिए। 80 साल हो गए हैं इस देश को आजाद हुए हुए। क्षेत्रफल के हिसाब से राजस्थान सबसे बड़ा राज्य है देश का। उसकी राजधानी में अगर एक ऐसा स्कूल है जो भैंसों के तबेले में चल रहा है तो यह पूरे देश के लिए शर्म की बात है।

    हम पिटने वाले लोग हैं, पिट लेंगे
    जब रांका से हिंसा को लेकर फिर से पूछा गया तो अभिजीत दीपके ने कहा कि सर, हम पिट कर आने वाले लोग हैं। मैं पिट लिया, ये (रांका) पिट लिया। अब सौरव बचा है। उसका भी नंबर आएगा। हम पिटने वाले लोग हैं। हम पिट लेंगे।

    मंत्रियों ने वादा किया था
    चर्चा के दौरान सुप्रीम कोर्ट के आर्डर पर सौरव दास ने कहा कि देखिए इफ देयर इज अ विल देयर इज अ वे। अगर केंद्र के दो मंत्री हमारे साथ बैठकर प्रेस कॉन्फ्रेंस में कुछ कमिट कर रहे हैं तो कुछ सोच समझ कर ही कर रहे होंगे। दूसरी बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने तो उनको एक बहुत क्लियर ऑप्शन दे दिया है। हमारे संविधान में आर्टिकल 142 एक प्रोविजन है, जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट अपना एक्स्ट्राऑर्डिनरी पावर यूज करके कंप्लीट जस्टिस करने के लिए कुछ भी कर सकता है। उसने वो पावर यूज करने का ऑप्शन दिया है। इसलिए 18 अगस्त को जो सुनवाई हुई थी, वह बहुत महत्वपूर्ण थी।

    दो वादे पूरे नहीं हुए हैं
    सुप्रीम कोर्ट ने तीन बार केंद्र सरकार के वकील को बोला कि आप हमें पूरे देश भर से एफआईआर की लिस्ट दे दीजिए। उसको एक झटके में हम लोग खत्म कर देंगे। लेकिन, केंद्र सरकार के जो लॉयर थे, उन्होंने इसके लिए कमिट नहीं किया। ऐसे में हमें लगा कि यहां पर एक साजिश चल रही है। युवाओं के साथ विश्वासघात होने वाला है। इसलिए हमको यह स्टेप लेना पड़ा। 5 सितंबर को इसलिए हम लोग शांति मार्च निकालेंगे, क्योंकि दो वादे पूरे नहीं हुए हैं। एक तो सभी एफआईआर दर्ज करने की और दूसरा पीड़ित परिवारों को एक-एक करोड़ मुआवजा देने की।