Category: देश

  • भारत-पाक समुद्री तनाव फिर बढ़ा, नौसैनिक जहाजों की टक्कर के बाद 1991 समझौते का मुद्दा उठा

    भारत-पाक समुद्री तनाव फिर बढ़ा, नौसैनिक जहाजों की टक्कर के बाद 1991 समझौते का मुद्दा उठा

     नई दिल्ली
    उत्तरी अरब सागर में भारतीय नौसेना के विध्वंसक पोत INS कोलकाता और पाकिस्तानी नौसेना के गश्ती जहाज PNS हुनैन के बीच हुई टक्कर ने दोनों पड़ोसी देशों के बीच समुद्री सीमा और कूटनीतिक तनाव को एक बार फिर बढ़ा दिया है। भारत के अनुसार, 15 सितंबर को यह हादसा उस समय हुआ जब पाकिस्तानी जहाज ने तेज रफ्तार में आकर बेहद गैर पेशेवर तरीके से खतरनाक ओवरटेकिंग की कोशिश की। भारत ने इस घटना पर कड़ा रुख अपनाते हुए नई दिल्ली में पाकिस्तान के कार्यवाहक राजदूत को तलब किया और 1991 के द्विपक्षीय समझौते के उल्लंघन पर विरोध दर्ज कराया।

    भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार, PNS हुनैन का यह कदम 1991 के भारत-पाकिस्तान समझौते के धारा 10 का स्पष्ट उल्लंघन था। इस समझौते के तहत दोनों देशों के युद्धपोतों को एक-दूसरे से कम से कम 3 नॉटिकल मील (लगभग 5.5 किमी) की दूरी बनाए रखना अनिवार्य है। टक्कर के बावजूद भारतीय नौसेना के 7400 टन वजनी गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर INS कोलकाता को कोई बड़ा नुकसान नहीं पहुंचा और वह समुद्र में अपनी तैनाती पर बना हुआ है। वहीं, लगभग 2,600 टन वजनी पाकिस्तानी गश्ती पोत PNS हुनैन बुरी तरह क्षतिग्रस्त होकर अपने बंदरगाह लौटने पर मजबूर हो गया।

    पाकिस्तान ने इस घटना पर भारत पर उसके नौसैनिक अभ्यास में बाधा डालने का आरोप लगाया। भारत ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए टालमटोल वाला रवैया बताया।

    क्या है भारत-पाकिस्तान समुद्री विवाद का मूल कारण?
    समुद्र में दोनों देशों के बीच अक्सर पैदा होने वाले तनाव के पीछे मुख्य रूप से चार बड़े कारण हैं। गुजरात और पाकिस्तान के सिंध प्रांत के बीच 96 किमी लंबी सर क्रीक दलदली सीमा रेखा को लेकर दशकों पुराना विवाद है। सीमा का सही सीमांकन न होने के कारण दोनों देशों के बीच अरब सागर में एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन (EEZ) का दायरा तय नहीं हो पाया है, जहां तेल, प्राकृतिक गैस और विशाल मत्स्य संसाधन मौजूद हैं।

    स्पष्ट समुद्री सीमा न होने के कारण दोनों देशों के मछुआरे अक्सर एक-दूसरे के जलक्षेत्र में प्रवेश कर जाते हैं। इसके चलते तटरक्षक बल नियमित रूप से मछुआरों को गिरफ्तार करते हैं और उनकी नौकाएं जब्त कर लेते हैं। 2008 के मुंबई आतंकी हमले के बाद भारत ने अपनी समुद्री सीमाओं पर निगरानी बेहद सख्त कर दी है।

    समुद्री हादसों और सैन्य झड़पों को रोकने के लिए 1991 में बनाए गए सुरक्षा नियमों का उल्लंघन ऐसी घटनाओं का कारण बनता है। 3 नॉटिकल मील की दूरी का नियम न मानने से कई बार गंभीर दुर्घटनाएं होने की आशंका बनी रहती है। भारतीय नौसेना अपने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मार्गों और समुद्री सुरक्षा को बनाए रखने के लिए उत्तर-पश्चिमी अरब सागर में निरंतर गश्त करती है। दूसरी ओर पाकिस्तान अपनी तटरेखा और ग्वादर बंदरगाह जैसे रणनीतिक ठिकानों की सुरक्षा के नाम पर ऐसी आक्रामक पैंतरेबाजी करता रहता है।

  • विकसित भारत के लिए प्राइवेट इन्वेस्टमेंट जरूरी, राज्यों को जमीन-बिजली-लॉजिस्टिक्स सुधारने की सलाह

    विकसित भारत के लिए प्राइवेट इन्वेस्टमेंट जरूरी, राज्यों को जमीन-बिजली-लॉजिस्टिक्स सुधारने की सलाह

     नई दिल्ली
    केंद्र सरकार ने विकसित भारत के लिए ज्यादा प्राइवेट इन्वेस्टमेंट की जरूरत पर जोर दिया है और कहा है कि सिर्फ सरकारी खर्च से विकसित भारत का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता।

    वित्त मंत्रालय के एक बयान के अनुसार, मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने शनिवार को राज्यों और केंद्र के अधिकारियों और वित्त मंत्रियों से कहा, "हालांकि भारत का बचत आधार काफी बड़ा है और इसे और बढ़ाने की जरूरत है लेकिन विकसित भारत के लिए जरूरी निवेश जुटाने के लिए निजी पूंजी की बड़ी भागीदारी बहुत जरूरी होगी।"

    'सिर्फ सरकारी खर्चे पर हासिल नहीं होगा लक्ष्य'
    शुक्रवार को आर्थिक मामलों की सचिव अनुराधा ठाकुर ने भी ऐसी ही बातें कही थीं। बयान में कहा गया, "डीईए सचिव ने जोर दिया कि विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए जरूरी बड़े बदलाव को सिर्फ सरकारी बजट से पूरा नहीं किया जा सकता। निजी क्षेत्र से फंडिंग, नए तरह के फंडिंग के तरीके और सरकार के अलग-अलग स्तरों के बीच सहयोग अहम भूमिका निभाएंगे।"

    केंद्र ने राज्यों को निवेश बढ़ाने के लिए कहा
    अपनी तरह की इस पहली बैठक में नागेश्वरन ने कहा, "विकसित भारत, विकसित राज्यों पर निर्भर करता है।" केंद्र ने राज्यों से निवेश आकर्षित करने के प्रयास तेज करने को कहा। नागेश्वरन ने सुझाव दिया कि राज्यों द्वारा अपनाए गए तौर-तरीकों, नियमों को आसान बनाने की चल रही कोशिशों और विशेषज्ञों की सिफारिशों को आगे बढ़ाया जाए और उन्हें स्पष्ट जिम्मेदारियों और समय-सीमा के साथ साझेदारियों में बदला जाए।

    उन्होंने कहा कि अगले पांच वर्षों में जब वैश्विक स्तर पर फाइनेंसिंग के अवसर उपलब्ध हों भारत को संसाधनों को जुटाने की गति बढ़ाते हुए अपनी दीर्घकालिक विकास यात्रा को जारी रखना चाहिए।

    राज्यों के लिए बताईं प्राथमिकताएं
    सरकार के मुख्य अर्थशास्त्री ने राज्यों के लिए तीन प्राथमिकताएं बताईं-
        जमीन, बिजली और लॉजिस्टिक्स की उपलब्धता और असरदार सिंगल-विंडो क्लीयरेंस के जरिए प्राइवेट इन्वेस्टमेंट के लिए अनुकूल माहौल बनाना।
        मजबूत प्रोजेक्ट-तैयारी पाइपलाइन और भरोसेमंद प्रोजेक्ट रिपोर्ट के जरिए इन्वेस्टमेंट की क्वालिटी बेहतर करना ताकि घरेलू और मल्टीलेटरल फंडिंग मिल सके।
        साथ ही विकास की संभावना वाले उन जिलों में क्रेडिट पहुंचाना जहां अभी तक पर्याप्त क्रेडिट नहीं पहुंचा है। वित्तीय बाधाओं के बावजूद राज्यों के अपने कैपिटल खर्च को बढ़ाना।

    उन्होंने यह भी कहा कि राज्यों को 2031-32 तक कैपिटल खर्च को GSDP के लगभग 2.4% से बढ़ाकर 3% करना चाहिए।

     

  • कल्याण-लातूर एक्सप्रेसवे से बदलेगा सफर का अंदाज, 8 KM टनल से 5 घंटे में पूरा होगा रूट

    कल्याण-लातूर एक्सप्रेसवे से बदलेगा सफर का अंदाज, 8 KM टनल से 5 घंटे में पूरा होगा रूट

    लातूर
     देश के बड़े शहरों को एक-दूसरे से जोड़ने के साथ ही सरकार अन्य छोटे शहरों तक कनेक्टिविटी बढ़ाने पर जोर दे रही है. इस कड़ी में अगला नाम है कल्याण से लातूर तक जाने वाले एक्सप्रेसवे (Kalyan-Latur Expressway)का. महाराष्ट्र सरकार की कैबिनेट ने इस ई-वे को मंजूरी दे दी है. यह ई-वे करीब 450 किलोमीटर लंबा होगा और इसके तैयार होने के बाद दोनों शहरों के बीच सफर में लगने वाला समय 11 घंटे से घटकर महज 5 घंटे का रह जाएगा। 

    यह एक्सप्रेसवे दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर बन रही बदलापुर टनल के उत्तर से ही शुरू होगा और महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा के पास लातूर में निकलेगा. इसकी कुल लंबाई 450 किलोमीटर के आसपास है, जिससे महज 4.5 से 5 घंटे के सफर में पूरा किया जा सकेगा. अभी इस दूरी को तय करने में करीब 11 घंटे का समय लग जाता है. आगे चलकर यह एक्सप्रेसवे मुंबई मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र से भी सीधे तौर पर जुड़ जाएगा, जो नागपुर-गोवा शक्तिपीठ एक्सप्रेसवे के पास रहेगा। 

    8 किलोमीटर की टनल भी बनेगी
    इस एक्सप्रेसवे के रास्ते में 8 किलोमीटर लंबी एक टनल भी बनाई जाएगी, जो मलशेज घाट के पास होगी. यह टनल बिलकुल वैसी ही होगी जैसी इगतपुरी के पास बन रही ट्विन टनल है. यह ट्विन टनल समृद्धि एक्सप्रेसवे पर बनाई गई है. इस ई-वे पर कुल मिलाकर 17 इंटरचेंज बनाए जाएंगे. इस ई-वे को तैयार करने पर 22 से 25 हजार करोड़ का खर्चा आएगा. इस ई-वे की सबसे खास बात इसकी लंबाई नहीं, बल्कि इसका दुर्गम रास्ता है। 

    क्यों जरूरी है 8 किलोमीटर की सड़क
    मलशेज घाट पर बनने वाली 8 किलोमीटर लंबी टनल काफी मायने रखती है. इस टनल से गुजरने के लिए फ्लैट हाईवे जैसा रास्ता नहीं होगा, बल्कि इसमें तीखे मोड़ और स्लोप हैं जिस पर ट्रैफिक को काफी धीमे-धीमे गुजरना होगा. यही वजह है कि ई-वे पर सबसे जरूरी सेक्शन यह टनल ही है. यह ई-वे दो और एक्सप्रेसवे के साथ कनेक्टिविटी मजबूत करेगा, जिसकी वजह से इसकी अहमियत काफी बढ़ जाती है. इसके अलावा प्रोजेक्ट को विरार-अलीबाग मल्टीमॉडल कॉरिडोर के साथ भी जोड़ा जाएगा. इससे बाद में नवी मुंबई एयरपोर्ट और अटल सेतु तक जाना भी आसान हो जाएगा. यह रास्ता मराठवाड़ा में बन रहे सूरत-चेन्नई इकनॉमिक कॉरिडोर को भी जोड़ेगा। 

     

  • आर्टिकल 370 हटने के बाद कश्मीर में लोकल आतंकी भर्ती में कमी, आंकड़ों से सामने आया बदलाव

    आर्टिकल 370 हटने के बाद कश्मीर में लोकल आतंकी भर्ती में कमी, आंकड़ों से सामने आया बदलाव

    श्रीनगर 

    जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान की नापाक हरकतों पर काफी लगाम लगी है। आंकड़े भी इसके गवाही दे रहे हैं। भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, 2021 से लेकर अब तक घाटी में आतंकवादी नेटवर्क में स्थानीय लोगों की भर्ती काफी कम हुई है। यह संख्या 2021 में जहां 146 थी, वही अब घटकर 2025 में सिर्फ एक रह गई। मंत्रालय ने यह भी बताया कि 2025 में घुसपैठ की सिर्फ छह कोशिशें हुईं, जो पिछले पांच सालों में सबसे कम हैं।

    रिपोर्ट के अनुसार, 2021 में 146 स्थानीय युवा आतंकवादी संगठनों में शामिल हुए। इसके बाद 2022 में 121, 2023 में 19, 2024 में चार और 2025 में सिर्फ एक युवा शामिल हुआ। रिपोर्ट में कहा गया है कि स्थानीय युवाओं ने हिंसा का रास्ता छोड़ दिया है और वे सरकार की विभिन्न योजनाओं और नीतियों का लाभ उठा रहे हैं।

    अनुच्छेद 370 हटने से पस्त हुआ पाकिस्तान
    आपको बता दें कि अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा हालात में काफी सुधार हुआ है। इस इलाके में आतंकवाद से जुड़ी हिंसा और आतंकवादियों की भर्ती में भारी कमी आई है। मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा (LoC) पर हालात काफी शांत हुए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2025 में घुसपैठ की छह कोशिशों को नाकाम किया गया, जिनमें 12 आतंकवादी मारे गए।

    रिपोर्ट में कहा गया है, "2021 में घुसपैठ की 8 कोशिशें नाकाम की गईं और 12 आतंकवादी मारे गए। वहीं, 2022 में घुसपैठ की 12 कोशिशें नाकाम और 18 आतंकवादी मारे गए, 2023 में घुसपैठ की 18 कोशिशें नाकाम और 36 आतंकवादी मारे गए, 2024 में घुसपैठ की 10 कोशिशें नाकाम और 19 आतंकवादी मारे गए।"

    अब जम्मू से घुसपैठ की फिराक में आतंकी
    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भले ही नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ की कोशिशें कम हुई हैं, लेकिन आतंकवादियों की घुसपैठ की कोशिशें अब जम्मू इलाके में अंतरराष्ट्रीय सीमा की ओर ज्यादा हो रही हैं। नशीले पदार्थों की तस्करी की कोशिशें भी की जा रही हैं।

    मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है कि घुसपैठ की कोशिशों में कमी के बावजूद 2025 में सीजफायर उल्लंघन में तेजी से बढ़ोतरी देखी गई। रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में LoC पर सीजफायर उल्लंघन की दो घटनाएं हुईं। वहीं, 2025 में कम से कम 163 बार सीजफायर का उल्लंघन हुआ। उनमें से 124 घटनाएं ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हुईं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 2025 में केंद्र शासित प्रदेश में पत्थरबाजी की कोई घटना नहीं हुई।

  • H-1B वीजा पर नया अपडेट, भारतीय प्रोफेशनल्स पर फीस बढ़ने का असर; जानें पूरा मामला

    H-1B वीजा पर नया अपडेट, भारतीय प्रोफेशनल्स पर फीस बढ़ने का असर; जानें पूरा मामला

    नई दिल्ली

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ऐसे फैसले ले रहे हैं जिससे पूरी दुनिया प्रभावित हो रही है। वहीं भारत पर भी उनके फैसलों का सीधा असर पड़ रहा है। 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने वाले कानून को मंजूरी देने के अलावा ट्रंप प्रशासन ने एच-1बी वीजा पर लगने वाले शुल्क को एक साल के लिए बढ़ाने का फैसला किया है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने एच-1बी वीजा के लिए 1 लाख डॉलर का शुल्क लगाया है। अमेरिका की कोर्ट में उनके इस फैसले के खिलाफ केस भी चल रहा है।

    ट्रंप प्रशासन का पहले का आदेश सितंबर 2026 तक ही लागू था। बता दें कि एच-1बी वीजा के जरिए अमेरिकी कंपनियां दुनियाभर के कुशल लोगों को हायकर करती हैं। आईटी सेक्टर में भी बड़ी संख्या में लोगों को अमेरिका में नौकरियां मिलती हैं। इनमें भारतीयों की संख्या काफी ज्यादा है। वाइट हाउस का कहना है कि ये कंपनियां विदेश से लोगों को सस्ते में हायर करती हैं और अमेरिकियों के लिए रोजगार का संकट पैदा हो जाता है। ऐसे में दोनों तरफ से कंपनियां ही शोषण कर रही हैं।

    जानकारी के मुताबिक 21 सितंबर 2025 को यह फैसला लागू होने के बाद से 700 से ज्यादा लोगों ने फीस चुकाई है। वहीं अब डिपार्टमेंट ऑफ होम सिक्योरिटी ने एच-1बी के लिए चयन प्रक्रिया में भी परिवर्तन करने का ऐालान कर दिया है। बताया गया है कि अमेरिकी कंपनियों ने एच-1बी रजिस्ट्रेशन को 24946 से घटाकर 2055 कर दिया है। इसमें 92 फीसदी की कमी देखी गई है।

    भारतीयों के लिए क्यों टेंशन की बात
    भारत के बड़ी संख्या में प्रेफेशनल एच-1बी वीजा के जरिए अमेरिका में काम करने जाते हैं। यूएससीआईएस के डेटा के मुताबिक 2024 ममें अमेरिका में 71 फीसदी एच-1बी वीजा वाले लोग भारतीय थे। वहीं चीन के 12 फीसदी लोग ही थे। भारतीय लोगों के लिए अमेरिका में काम करने का मौका एच-1बी वीजा के जरिए ही मिलता है। हालांकि अब 1 लाख डॉलर चुकाना आसान नहीं है।

    2025 में एक लाख अमेरिकी डॉलर का शुल्क लगाने के फैसले को अदालत में चुनौती दी गई है और यह मामला दो अलग-अलग संघीय अदालतों में विचाराधीन है। शुल्क बढ़ाने संबंधी 2025 के इस आदेश की अवधि इस महीने समाप्त होने वाली थी। यह आदेश उन विदेशी नागरिकों को दिए गए वीजा पर लागू नहीं है जो पहले से छात्र वीजा पर अमेरिका में रह रहे हैं और नए एच-1बी वीजा पाने वालों में जिनकी बड़ी हिस्सेदारी है। यह मौजूदा वीजा के नवीनीकरण पर भी लागू नहीं था।

    राष्ट्रपति ने एक अलग घोषणा भी जारी की है, जिसमें विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय के जरिये एच-1बी वीजा आवेदनों की जांच और कड़ी करने का प्रावधान है। आदेश में विदेश मंत्री, श्रम मंत्री और गृह सुरक्षा मंत्री को निर्देश दिया गया है कि एच-1बी वीजा आवेदनों पर विचार करते समय वे यह भी देखें कि क्या आवेदनकर्ता नियोक्ता ने समान पदों पर कार्यरत अमेरिकी कर्मचारियों की हाल में छंटनी की है या वह ऐसा करने की योजना बना रहा है।

    ट्रंप ने कार्यकारी आदेश में कहा कि एच-1बी गैर प्रवासी वीजा कार्यक्रम की शुरुआत अत्यधिक विशिष्ट कौशल वाले विदेशी अस्थायी कर्मचारियों की पहचान करने और अमेरिकी अर्थव्यवस्था की जरूरतों को रणनीतिक रूप से पूरा करने के लिए की गई थी। ट्रंप ने कहा, ''इसके बजाय कुछ नियोक्ताओं, तीसरे पक्ष के जरिये कर्मचारियों की नियुक्ति करने वाले समूहों और आउटसोर्सिंग कंपनियों ने अमेरिकी कुशल श्रमिकों को कम वेतन देने और उन्हें नौकरियों से निकालने के लिए इस कार्यक्रम का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया है।''

  • सरकारी स्कूलों के मिड-डे मील में बड़ा बदलाव, बच्चों को परोसी जाएगी चिकन बिरयानी

    सरकारी स्कूलों के मिड-डे मील में बड़ा बदलाव, बच्चों को परोसी जाएगी चिकन बिरयानी

    चेन्नई 
    तमिलनाडु सरकार ने सरकारी स्कूलों के बच्चों को हफ्ते में एक दिन चिकन बिरयानी देने की योजना बनाई है। स्कूल शिक्षा मंत्री राज मोहन ने कहा कि यह मुख्यमंत्री जोसेफ विजय की इच्छा है। हालांकि, इसे तुरंत लागू नहीं किया जाएगा। सरकार पहले इसके लिए पायलट प्रोजेक्ट चलाएगी। इसमें यह देखा जाएगा कि बड़ी संख्या में बच्चों के लिए खाना साफ-सफाई और खाद्य सुरक्षा के तय मानकों के मुताबिक कैसे तैयार किया जाएगा। इसके बाद ही योजना को बड़े स्तर पर लागू करने पर फैसला होगा।

    मंत्री राज मोहन ने कहा कि सरकार चाहती है कि सरकारी स्कूलों के सभी स्टूडेंट्स को चिकन बिरयानी का विकल्प मिले। उन्होंने साफ किया कि इसके लिए पहले जरूरी इंतजाम करने होंगे। उन्होंने कहा, 'पुझल जेल में कैदियों को भी चिकन बिरयानी मिलती है। क्या हमारे छात्रों को यह नहीं मिल सकती?' मंत्री ने कहा कि योजना को लागू करने से पहले पायलट प्रोजेक्ट के जरिए व्यवस्था की जांच की जाएगी। इसके बाद भोजन की तैयारी, साफ-सफाई और उसे स्कूलों तक पहुंचाने से जुड़ी व्यवस्थाओं को देखा जाएगा।

    भोजन में मांसाहारी विकल्प शामिल करने पर विचार
    यह प्रस्ताव पहली बार जुलाई में सामने आया था। उस समय तमिलनाडु सरकार सरकारी स्कूलों के बच्चों को लंच की योजना के तहत हफ्ते में एक बार चिकन बिरयानी देने पर विचार कर रही थी। राज मोहन ने तब बताया था कि उन्होंने खुद मुख्यमंत्री थलपति विजय के सामने यह सुझाव रखा था और अंतिम फैसला उन्हीं को करना है। यह प्रस्ताव स्कूलों में दिए जाने वाले भोजन में मांसाहारी विकल्प शामिल करने को लेकर चल रही चर्चा के बीच आया था। मंत्री ने कहा था कि बढ़ते बच्चों के लिए पर्याप्त प्रोटीन जरूरी है और चिकन बिरयानी देने के प्रस्ताव को राजनीतिक मुद्दे के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

    पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर होगी शुरुआत
    राज मोहन ने कहा कि तमिलनाडु में शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव के साथ पोषण पर भी लगातार ध्यान दिया गया है। प्रस्ताव लागू होने की स्थिति में शाकाहारी भोजन पसंद करने वाले बच्चों को पहले की तरह शाकाहारी खाना मिलता रहेगा, जबकि मांसाहारी भोजन खाने वाले छात्र चिकन बिरयानी का विकल्प चुन सकेंगे। फिलहाल सरकार का जोर योजना को सुरक्षित तरीके से लागू करने की तैयारी पर है। मालूम हो कि तमिलनाडु में लंच के साथ सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए नाश्ते की योजना भी चल रही है।

  • केंद्रीय कर्मचारियों को लेकर बड़ा अपडेट, सरकार ने स्कीम के नियमों में किया बदलाव

    केंद्रीय कर्मचारियों को लेकर बड़ा अपडेट, सरकार ने स्कीम के नियमों में किया बदलाव

    नई दिल्ली

    अगर केंद्रीय कर्मचारी हैं तो ये खबर आपके काम की हो सकती है। दरअसल, केंद्र सरकार ने केंद्रीय कर्मचारियों के लिए सेंट्रल गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम (CGHS) से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव किया है। आइए डिटेल में जानतें है कि क्या कुछ बदल गया है।

    क्या बदला है नियम?
    सरकार ने उस भौगोलिक शर्त को हटाने का फैसला किया है जो पहले केंद्र सरकार के मौजूदा कर्मचारियों के लिए उनके रहने या पोस्टिंग की जगह के आधार पर CGHS की पात्रता को सीमित करती थी। जानकार बताते हैं कि पहले की भौगोलिक पाबंदियों ने CGHS कवरेज के दायरे से बाहर रहने या पोस्टेड कर्मचारियों के लिए मुश्किलें और परेशानियां पैदा कर दी थीं। बदले हुए नियम ऐसे हालात में योग्य कर्मचारियों को CGHS चुनने की इजाजत देते हैं, बशर्ते वे दूसरी शर्तों को पूरा करें और तय योगदान का भुगतान करें। एक बार यह विकल्प चुनने के बाद इसे बदला नहीं जा सकता। CGHS चुनने वाले योग्य कर्मचारियों को यह अंडरटेकिंग भी देनी होगी कि वे या उनके योग्य परिवार के सदस्य CGHS और सेंट्रल सर्विसेज (मेडिकल अटेंडेंस) रूल्स, 1944, दोनों के तहत मेडिकल फायदों का दावा नहीं करेंगे।

    जो कर्मचारी पहले से CGHS के कवरेज वाले इलाके में रह रहे हैं या वहां तैनात हैं, उनके लिए CGHS कवरेज अनिवार्य रहेगा। ऐसे कर्मचारी इसके बदले CS(MA) नियमों के तहत मिलने वाली सुविधाओं का विकल्प नहीं चुन सकेंगे।

    गलत जानकारी पर होगी कार्रवाई
    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगर कोई कर्मचारी गलत या भ्रामक जानकारी देकर मेडिकल लाभ लेता है, तो उसके खिलाफ गंभीर कार्रवाई हो सकती है। ऐसी स्थिति में अनुशासनात्मक कार्रवाई के साथ-साथ गलत तरीके से लिए गए लाभ की वसूली भी की जा सकती है।

    CGHS क्या है?
    CGHS की बात करें तो केंद्र सरकार के मौजूदा और रिटायर्ड कर्मचारियों और उनके योग्य परिवार के सदस्यों के लिए एक सरकारी हेल्थकेयर प्रोग्राम है। इसे 1 जुलाई 1954 को दिल्ली में शुरू किया गया था, जिसका मुख्य मकसद मेडिकल देखभाल देना और आउटपेशेंट दवाओं के लिए रीइंबर्समेंट का दावा करने में कर्मचारियों को होने वाली दिक्कतों को दूर करना था।

    पिछले कुछ दशकों में, CGHS का विस्तार दिल्ली से आगे कई शहरों तक हुआ है और अब यह वेलनेस सेंटर, पॉलीक्लिनिक, लेबोरेटरी और एम्पैनल्ड अस्पतालों के जरिए सेवाएं देता है। इसके अलावा, इसके दायरे में योग्य पेंशनभोगी और लाभार्थियों की कुछ अन्य श्रेणियां भी शामिल हो गई हैं। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की 2024-25 की सालाना रिपोर्ट के अनुसार, CGHS 81 शहरों तक फैल गया था और लगभग 46.87 लाख लाभार्थियों को सेवाएं दे रहा था।

  • 100% टैरिफ का फैसला अभी नहीं, लेकिन भारत के लिए बढ़ी चिंता; रूस से तेल खरीद पर क्या है नया कानून?

    100% टैरिफ का फैसला अभी नहीं, लेकिन भारत के लिए बढ़ी चिंता; रूस से तेल खरीद पर क्या है नया कानून?

    वाशिंगटन 

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने  ऐतिहासिक 'लिंडसे ओ ग्राहम सेंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट 2026' पर हस्ताक्षर कर इसे कानूनी रूप दे दिया है। इस कानून के सामने आते ही वैश्विक शेयर और कमोडिटी बाजारों में हलचल मच गई है।

    मीडिया में यह सुर्खियां तैर रही हैं कि वॉशिंगटन अब रूस से कच्चा तेल और नेचुरल गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक का भारी-भरकम दंडात्मक टैरिफ लगाने जा रहा है। हालांकि, अगर इस नए कानून की बारीकियों और कानूनी प्रावधानों को समझें, तो तस्वीर कुछ अलग ही नजर आती है।

    'अधिकार मिलना' और 'लागू करना'- दो अलग बातें
    अमेरिकी संसद ने व्हाइट हाउस को रूसी ऊर्जा खरीदारों पर लगाम कसने के लिए नया कानूनी अधिकार दे दिया है। लेकिन कानून में इसका प्रावधान ऐसा रखा गया है जो राष्ट्रपति को तुरंत फैसला लेने के बजाय कूटनीतिक सौदेबाजी की पूरी छूट देता है।

    0 से 100% की फ्लेक्सिबल रेट: कानून में यह अनिवार्य नहीं है कि ट्रंप तुरंत 100% ही टैरिफ थोप दें। यह दर शून्य से लेकर 100 प्रतिशत के बीच कुछ भी रखी जा सकती है।

    30 दिनों की मोहलत: कानून लागू होने के बाद व्हाइट हाउस के पास 30 दिनों का समय होगा, जिसके बाद ही यह समीक्षा की जाएगी कि किन देशों ने रूसी ऊर्जा की नई खरीद की है।

    'टॉप-5' खरीदारों की समीक्षा: अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) हर 180 दिनों में दुनिया के उन 5 सबसे बड़े देशों की लिस्ट की समीक्षा करेगा जो रूस से सबसे ज्यादा तेल और गैस आयात करते हैं।

    राष्ट्रपति के पास 'राष्ट्रीय हित' में छूट देने का वीटो अधिकार
    इस कानून की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें राष्ट्रपति को असीमित विवेकाधिकार दिए गए हैं।

    अगर ट्रंप प्रशासन को लगता है कि किसी देश पर टैरिफ लगाने से अमेरिकी अर्थव्यवस्था या उसके रणनीतिक गठबंधनों को नुकसान पहुंचेगा, तो राष्ट्रपति इस टैरिफ को टाल या पूरी तरह माफ भी कर सकते हैं।

    अगर कोई देश धीरे-धीरे रूसी तेल पर अपनी निर्भरता कम कर रहा है, तो उस पर टैरिफ की दरों को घटाया भी जा सकता है।

    अमेरिका की तरफ से भारतीय सामानों पर तुरंत भारी-भरकम टैरिफ न लगाने के पीछे तीन प्रमुख आर्थिक और रणनीतिक कारण हैं:

    अमेरिका में महंगाई बढ़ने का डर: भारत से अमेरिका जाने वाले उपभोक्ता सामानों पर 100% ड्यूटी लगाने से खुद अमेरिकी जनता के लिए दैनिक चीजें बेहद महंगी हो जाएंगी, जिससे अमेरिका में महंगाई बेकाबू हो सकती है।

    द्विपक्षीय व्यापार समझौता: नई दिल्ली और वॉशिंगटन के बीच इस समय एक व्यापक व्यापार समझौते पर संवेदनशील बातचीत चल रही है। यह नया कानून अमेरिकी मेज पर बातचीत का पलड़ा भारी करने का एक औजार है, न कि तुरंत चलाया जाने वाला हथौड़ा।

    वैश्विक तेल बाजार में हड़कंप: अगर भारतीय रिफाइनरियों की क्षमता को अचानक विश्व बाजार से काट दिया जाता है, तो पूरे यूरोप और एशिया में पेट्रोल-डीजल की भारी किल्लत हो जाएगी, जिससे क्रूड की कीमतें आसमान छूने लगेंगी।

    क्या है भारत का रुख?
    विदेश मंत्रालय ने इस कानून के बनने के बाद दोहराया है कि भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता 1.4 अरब नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

    मंत्रालय का कहना है कि भारत बाजार की स्थितियों के हिसाब से अलग-अलग देशों से तेल खरीदता रहेगा और देश के आर्थिक और व्यापारिक हितों को सुरक्षित रखने के लिए हर जरूरी कानूनी और कूटनीतिक कदम उठाए जाएंगे।

  • 500 करोड़ के नोटिस को लेकर बढ़ा विवाद, दिशा सालियान के पिता मातोश्री जाकर देंगे नोटिस

    500 करोड़ के नोटिस को लेकर बढ़ा विवाद, दिशा सालियान के पिता मातोश्री जाकर देंगे नोटिस

     मुंबई

    दिवंगत नेता सुशांत सिंह राजपूत की मैनेजर रही चुकीं दिशा सालियन की मौत केस में हाल के दिनों में कई महत्वपूर्ण प्रगति देखने को मिली है। दिशा के पिता सतीश सालियन ने उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे को आरोपी बताते हुए 500 करोड़ के हर्जाने की मांग की है। यह नोटिस थमाने वह खुद शनिवार की शीम चार बजे के करीब मातोश्री जाने वाले हैं। आपको बता दें कि उद्धव ठाकरे अपने बेटे के साथ इसी निजी आवास में रहते हैं। सतीश सालियान ने इसके लिए पुलिस से सुरक्षा भी मांगी है।

    सुरक्षा की यह मांग मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए की गई है। सालियान ने इस दौरान किसी भी संभावित बाधा, अप्रिय घटना या टकराव की आशंका जताई है। पत्र में कहा गया है कि सालियान और उनकी लीगल टीम को अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा का खतरा महसूस हो रहा है, इसलिए उन्होंने पुलिस प्रशासन से पर्याप्त सुरक्षा प्रबंध करने का अनुरोध किया है ताकि बिना किसी रुकावट या अप्रिय घटना के नोटिस दिया जा सके। मुंबई पुलिस से मौके पर आवश्यक पुलिस कर्मियों को तैनात करने और सालियान एवं उनके कानूनी प्रतिनिधियों को मातोश्री प्रवास के दौरान सुरक्षा प्रदान करने का आग्रह किया है।

    इससे पहले CBI को लिखे एक पत्र में उन्होंने मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह, बर्खास्त पुलिस अधिकारी सचिन वाजे, आदित्य ठाकरे और अन्य लोगों की तुरंत गिरफ्तारी की मांग की है।

    उन्होंने FIR में IPC की धारा 409 जोड़ने और बलात्कार, हत्या, सबूत मिटाने और मामले को दबाने के संबंध में चश्मदीदों और अन्य अहम गवाहों के बयान दर्ज करने की भी मांग की है। BJP के प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण ने पार्टी नेताओं और पदाधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे दिशा सालियन की मौत के मामले पर तब तक कुछ न बोलें जब तक उनके पास सबूत न हों।

    रवींद्र चव्हाण ने क्या कहा?
    BJP ने फिलहाल दिशा सालियन मामले को लेकर सावधानी भरा रुख अपनाया है। प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण ने इस संबंध में अपनी पार्टी के सहयोगियों को अहम निर्देश दिए हैं। उन्होंने जोर दिया कि पार्टी के हर कार्यकर्ता और पदाधिकारी को अपनी बात का ध्यान रखना चाहिए और बिना सबूत के कभी कुछ नहीं बोलना चाहिए। रवींद्र चव्हाण ने कहा कि जब तक किसी को पूरी जानकारी न हो या ठोस सबूत न हों तब तक ऐसे मामलों पर बात नहीं करनी चाहिए।

    दिशा सालियन का मामला क्या है?
    दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मैनेजर रहीं दिशा सालियान की आठ जून 2020 को एक इमारत की 12वीं मंजिल से गिरने से मौत हो गयी थी। इसके छह दिन बाद ही 14 जून 2020 को सुशांत सिंह राजपूत का भी निधन हो गया था। बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई ने प्राथमिकी दर्ज की थी, जिसमें आदित्य ठाकरे सहित कई व्यक्तियों के नाम शामिल हैं। एफआईआर में आदित्य ठाकरे के अलावा डिनो मोरिया, रोहन रॉय, सूरज पंचोली, रिया चक्रवर्ती, शोविक चक्रवर्ती, सचिन वाजे और परमबीर सिंह समेत कई लोगों के नाम का जिक्र है।

  • दवा दुकानों पर CCTV अनिवार्य करने की तैयारी, जानें सरकार के प्रस्ताव पर क्यों हो रहा विरोध

    दवा दुकानों पर CCTV अनिवार्य करने की तैयारी, जानें सरकार के प्रस्ताव पर क्यों हो रहा विरोध

    नई दिल्ली

    अगर आप अपने घर के पास किसी मेडिकल स्टोर से एंटीबायोटिक या कफ सिरप खरीदने जाते हैं, तो बहुत जल्द आपको एक CCTV कैमरे की नजर में खरीदारी करनी पड़ सकती है। भारत की शीर्ष दवा सलाहकार संस्था ने देश भर की हर केमिस्ट दुकान पर सीसीटीवी कैमरे लगाना अनिवार्य करने की सिफारिश की है। सरकार का कहना है कि इसका मकसद नशीली दवाओं की अवैध बिक्री पर लगाम कसना है, लेकिन इस फैसले ने देश के छोटे दवा दुकानदारों की नींद उड़ा दी है।

    औषध तकनीकी सलाहकार बोर्ड (DTAB) ने 27 अगस्त को हुई अपनी बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दी। बोर्ड ने बिक्री केंद्र पर सीसीटीवी लगाने और सप्लाई चेन में नारकोटिक व साइकोट्रॉपिक (NDPS) दवाओं के पाई-पाई का हिसाब रखने की सिफारिश की है। अब यह प्रस्ताव अंतिम मुहर और क्रियान्वयन के लिए भारत के ड्रग कंट्रोलर जनरल (DCGI) डॉ. राजीव सिंह रघुवंशी के पास है।

    क्यों पड़ी सीसीटीवी की जरूरत?
    केमिस्ट दुकानों पर कैमरों की निगरानी का विचार नया नहीं है। लंबे समय से दवा नियंत्रक अधिकारी इस बात से चिंतित हैं कि नशीली दर्द निवारक गोलियां और आदत डालने वाले कफ सिरप वैध सप्लाई चेन से चोरी-छिपे निकलकर अवैध बाजार तक पहुंच रहे हैं।

    बच्चों में नशीली दवाओं की लत रोकने के लिए राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने भी सख्त निगरानी की मांग की थी। सरकार का मानना है कि सीसीटीवी की फुटेज से एक ऐसा डिजिटल रिकॉर्ड बनेगा, जिससे यह पता लगाना आसान हो जाएगा कि कौन सा दुकानदार बिना डॉक्टर के पर्चे के नशीली दवाएं बेच रहा है।

    '50 हजार से 1 लाख का खर्च, कैसे चलाएं दुकान?'
    सरकार के इस प्रस्ताव के सामने आते ही देश भर के केमिस्टों का गुस्सा फूट पड़ा है। 15 लाख से ज्यादा सदस्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले देश के सबसे बड़े दवा संगठन 'ऑल इंडिया ऑर्गेनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स' (AIOCD) ने 17 सितंबर को स्वास्थ्य सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव को एक आपातकालीन पत्र लिखा है।

    दवा दुकानदारों का कहना है कि 6 से 8 कैमरे, DVR/NVR सिस्टम, हार्ड डिस्क स्टोरेज, वायरिंग, इंटरनेट और मेंटेनेंस मिलाकर प्रति दुकान 50,000 रुपए से 1,00,000 रुपए तक का भारी-भरकम खर्च आएगा। मामूली मार्जिन पर काम करने वाले छोटे दुकानदारों के लिए यह रकम जुटाना बेहद मुश्किल है।

    उनका कहना है कि ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में लगातार बिजली कटौती होती है और इंटरनेट नेटवर्क की स्थिति खराब है। ऐसे में 24 घंटे लगातार रिकॉर्डिंग करना तकनीकी रूप से नामुमकिन है।

    बड़े कॉर्पोरेट फार्मेसी ब्रांड्स तो यह खर्च उठा लेंगे, लेकिन गांवों और छोटे कस्बों में 'हेल्थ फॉर ऑल' के दौर से सेवा दे रहे छोटे केमिस्ट भुखमरी की कगार पर पहुंच जाएंगे।

    'कैमरे दवा की जांच नहीं कर सकते, फैक्ट्री से ही हो ट्रैकिंग'
    तमिलनाडु केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स एसोसिएशन (TNCDA) के पूर्व अध्यक्ष रामचंद्रन मन्नारगुडी और अन्य खुदरा दवा विक्रेताओं का तर्क है कि कैमरे यह जांच नहीं कर सकते कि पर्चा असली है या नकली, जिसकी जानकारी पहले से ही बिलिंग रजिस्टर में दर्ज होती है।

    दुकानदारों ने सरकार से मांग की है कि इस नियम को तुरंत वापस लिया जाए या फिर ग्रामीण दुकानदारों को सरकार खुद पूरी सब्सिडी दे। उनका सुझाव है कि रिटेल दुकानदारों पर नियम थोपने के बजाय सरकार को दवा बनाने वाली फैक्ट्रियों से ही 'ट्रैक एंड ट्रेस' सिस्टम लागू करना चाहिए ताकि नशे के कारोबार पर असल नकेल कसी जा सके।