Author: NewseDay

  • TVS के श्रीनिवासन परिवार में बढ़ी कलह, सुदर्शन और लक्ष्मी के बिजनेस बंटवारे पर माता-पिता आमने-सामने

    TVS के श्रीनिवासन परिवार में बढ़ी कलह, सुदर्शन और लक्ष्मी के बिजनेस बंटवारे पर माता-पिता आमने-सामने

    बेंगलुरु 

    टीवीएस (TVS) समूह के चेयरमैन एमेरिटस वेणु श्रीनिवासन के परिवार में संपत्ति के बंटवारे और उत्तराधिकार को लेकर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं. परिवार की लड़ाई अब सार्वजनिक हो गई है. दरअसल, वेणु श्रीनिवासन और उनकी पत्नी मल्लिका श्रीनिवासन के बीच बच्चों सुदर्शन श्रीनिवासन और लक्ष्मी वेणु के बीच परिवारिक बिजनेस के विभाजन को लेकर गहरा विवाद खड़ा हो गया है। 

    इस पारिवारिक कलह की मुख्य वजह यह तय करना है कि क्या अगली पीढ़ी को दिए गए व्यवसायों का प्रबंधन ही परिवार की कुल संपत्ति में उनके मालिकाना हक को तय करता है या नहीं। 

    फिलहाल बेटा सुदर्शन श्रीनिवासन TVS मोटर कंपनी और TVS होल्डिंग्स की कमान संभाल रहे हैं. जबकि बेटी लक्ष्मी वेणु सुंदरम क्लेटन (SCL) का प्रबंधन देख रही हैं, जो कि कंपोनेंट्स और डाई-कास्टिंग व्यवसाय से जुड़ी है। 

    लड़ाई की असली वजह 
    विवाद का एक बड़ा कारण दोनों कंपनियों के बाजार मूल्यांकन में आया बड़ा अंतर है. TVS मोटर की मार्केट कैप बढ़कर लगभग ₹1.83 लाख करोड़ तक पहुंच गई है. जिसमें पिछले तीन वर्षों के दौरान लगभग चार गुना बढ़ोतरी हुई है. जबकि सुंदरम क्लेटन (SCL) की मार्केट कैप करीब 24,000  करोड़ रुपये ही है। 

    वेणु श्रीनिवासन और उनके बेटे सुदर्शन का रुख एक जैसा है, उनका तर्क है कि 21 मार्च 2024 को परिवार के चारों सदस्यों के बीच हस्ताक्षरित एमओयू (MoU) ने परिसंपत्तियों के औपचारिक विभाजन को तय कर दिया था. इसके तहत लक्ष्मी को SCL और सुदर्शन को TVS मोटर सौंपी गई थी. उनका कहना है कि यह व्यवस्था 2020 में TVS परिवार के चार अलग-अलग समूहों के बीच हुए पुनर्गठन और मूल्यांकन पर आधारित थी। 

    मल्लिका और लक्ष्मी का खेमा
    मल्लिका श्रीनिवासन और उनकी बेटी लक्ष्मी वेणु इस दावे को खारिज करती हैं, उनके अनुसार मार्च 2024 का MoU केवल ब्रांड के उपयोग और नॉन-कंपीट शर्तों तक ही सीमित था, न कि संपत्ति के स्वामित्व के हस्तांतरण के लिए. उनका मानना है कि केवल किसी कंपनी के प्रबंधन का जिम्मा संभालने से स्वामित्व नहीं मिल जाता और दोनों बच्चों का परिवार की संपत्ति पर समान अधिकार है। 

    इकोनॉमिक्स टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक यह विवाद पिछले 18 महीनों से जारी है. इस दौरान परिवार के भीतर और बाहर कई मध्यस्थता प्रयास किए गए, लेकिन वे विफल रहे। 

    अप्रैल 2025 में, जब स्टॉक एक्सचेंजों को सूचित किया गया कि सुदर्शन श्रीनिवासन TVS होल्डिंग्स (जो TVS मोटर में 50.26% हिस्सेदारी रखती है) में 'बेनिफिशियल ओनर' बन गए हैं, तो लक्ष्मी के पक्ष ने इस शेयर ट्रांसफर पर स्पष्टीकरण मांगा था. इसके अलावा सुंदरम क्लेटन में भी उस समय तनाव देखा गया जब वेणु श्रीनिवासन ने चेयरमैन का पदभार संभाला और शासन में बड़ी भूमिका ली, हालांकि लक्ष्मी व्यवसाय का संचालन देखती रहीं। 

    परिवार में सहमति न बन पाने के कारण अब यह मामला कानूनी लड़ाई की ओर बढ़ता दिख रहा है. देश के प्रमुख औद्योगिक घरानों में से एक TVS परिवार का यह उत्तराधिकार विवाद भारतीय कॉर्पोरेट जगत में चर्चा का विषय बना हुआ है। 

  • ‘मां की रसोई’ में महके मध्यप्रदेश के पारंपरिक स्वाद, MP Travel Mart में अंतरराष्ट्रीय अतिथियों का खास अनुभव

    ‘मां की रसोई’ में महके मध्यप्रदेश के पारंपरिक स्वाद, MP Travel Mart में अंतरराष्ट्रीय अतिथियों का खास अनुभव

    मध्यप्रदेश ट्रैवल मार्ट 2026: अंतर्राष्ट्रीय अतिथियों ने चखा मध्यप्रदेश के पारंपरिक स्वाद का जायका

    ‘मां की रसोई’ में स्थानीय व्यंजनों की खुशबू और स्वाद ने जीता मेहमानों का दिल

    भोपाल 

    मध्यप्रदेश ट्रैवल मार्ट 2026 मे अंतर्राष्ट्रीय स्टेकहोल्डर्स, टूर ऑपरेटर्स, हॉस्पिटेलिटी प्रतिनिधियों और डेलीगेट्स को प्रदेश की समृद्ध पर्यटन विरासत के साथ-साथ यहां के पारंपरिक खाने का स्वाद भी चखने का मौका मिला। ट्रैवल मार्ट में परोसे गए अलग-अलग व्यंजनों से मेहमानों को मध्यप्रदेश के विभिन्न अंचलों के स्वाद का अनुभव मिला। पारंपरिक मसालों की खुशबू, देसी खाने और घर के स्वाद ने भोजन के अनुभव को खास बना दिया।

    ‘मां की रसोई’ में सजे मध्यप्रदेश के पारंपरिक स्वाद

    ट्रैवल मार्ट में ‘मां की रसोई’ लाइव फूड काउंटर विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। यहां मेहमानों ने मध्यप्रदेश के अलग-अलग इलाकों के पारंपरिक खाने और खास स्वाद का आनंद लिया। मिलेट ब्रेड, घर की बनी चटनियां, मट्ठे के आलू, चक्की का साग, निघौना, उड़द की दाल जैसे पारंपरिक व्यंजनों ने देश के विभिन्न हिस्सों से आए मेहमानों को प्रदेश के ग्रामीण और घरेलू स्वाद से रूबरू कराया।

    स्थानीय अनाज और देसी स्वाद का संगम

    विशेष रूप से कोदो मेथी भात ने मेहमानों को मध्यप्रदेश के पारंपरिक अनाज और स्थानीय खान-पान की समृद्ध परंपरा का अनुभव कराया। वहीं मट्ठे के आलू और चक्की के साग में देसी मसालों का संतुलित स्वाद और पारंपरिक पकाने की विधि की झलक दिखाई दी। घर में तैयार की जाने वाली चटनियों ने इन व्यंजनों के स्वाद को और अधिक समृद्ध किया। मिलेट से तैयार ब्रेड ने पारंपरिक अनाजों को आधुनिक प्रस्तुति के साथ जोड़ते हुए मेहमानों का ध्यान आकर्षित किया।

    दाल-बाफला में घुला मालवा का पारंपरिक स्वाद

    मध्यप्रदेश के पारंपरिक स्वाद के साथ मेहमानों को दाल बाफला, भटे का भरता और चूरमा के लड्डू का भी स्वाद मिला। मालवा की पहचान से जुड़े इस पारंपरिक भोजन ने खास तौर पर मेहमानों को आकर्षित किया।

    बुरहानपुर की मावा जलेबी ने बढ़ाई मिठास

    बुरहानपुर की मावा जलेबी और रबड़ी, मावा बाटी, दूध का हलवा जैसे पारंपरिक मिष्ठानों ने भोजन को मिठास से भर दिया। विशेष रूप से बुरहानपुर की मावा जलेबी का स्वाद मेहमानों के लिए मध्यप्रदेश की मिठास और स्थानीय खाने की विरासत का यादगार अनुभव रहा।

    मध्यप्रदेश के स्वाद से लेकर वैश्विक जायके तक

    ट्रैवल मार्ट में पारंपरिक व्यंजनों के साथ आधुनिक और अंतरराष्ट्रीय स्वादों का भी समावेश किया गया। लाइव पास्ता काउंटर, विभिन्न प्रकार के सलाद, और अंतरराष्ट्रीय व्यंजनों ने देश-विदेश से आए मेहमानों की अलग-अलग स्वाद पसंद का ध्यान रखा। इस तरह भोजन की पूरी श्रृंखला में मध्यप्रदेश की पारंपरिक रसोई से लेकर आधुनिक वैश्विक खान-पान तक की विविधता देखने को मिली।

     

  • M8 कार्बाइन की दमदार खूबियां चर्चा में, तेज रफ्तार और सटीक निशाने के लिए है खास

    M8 कार्बाइन की दमदार खूबियां चर्चा में, तेज रफ्तार और सटीक निशाने के लिए है खास

    नईदिल्ली 
    ट्रिगर दबते ही बंदूक की नली से निकली गोली जब 3,180 किलोमीटर प्रति घंटे की तूफानी रफ़्तार से हवा को चीरती हुई आगे बढ़ती है, तो 600 मीटर दूर छिपा बैठा दुश्मन भी ढेर हो जाता है. चाहे दुश्मन ने कितना भी मजबूत मॉडर्न बुलेटप्रूफ आर्मर क्यों न पहन रखा हो, इस हथियार की मारक क्षमता के आगे उसका बचना नामुमकिन है. वजन में हल्की, चलाने में बेहद तेज और ‘स्मार्ट कंप्यूटर’ जैसे हाई-टेक स्कोप से लैस M8 कार्बाइन (M8 Carbine) को आज डिफेंस एक्सपर्ट सेना की राइफलों का असली ‘बाप’ कह रहे हैं। 

    3 साल में 50,000 राइफलों का फैसला पलटा
    दुनिया की सबसे आधुनिक और ताकतवर मानी जाने वाली अमेरिकी सेना अपनी बंदूकों को बदलने और अपग्रेड करने के मामले में हमेशा बेहद सख्त रही है. लेकिन इस बार उसने जो बड़ा फैसला लिया है, उसने वैश्विक डिफेंस सेक्टर को हैरान कर दिया है. महज तीन साल पहले जिस M7 राइफल को भविष्य का सबसे विध्वंसक हथियार घोषित कर बेड़े में शामिल किया गया था, अमेरिकी सेना अब उससे दूरी बनाने जा रही है। 

    तकरीबन 50,000 M7 राइफलों की डिलीवरी लेने के बाद भी US आर्मी इसे नए हथियार से रिप्लेस कर रही है. इसकी सबसे बड़ी वजह रही, युद्ध के मैदान और ट्रेनिंग कैंपों में तैनात अमेरिकी सैनिकों का प्रैक्टिकल फीडबैक. वजन ज्यादा होने और लंबाई की वजह से सैनिकों को ऑपरेशन्स के दौरान काफी दिक्कतें आ रही थीं. अब US आर्मी इसकी जगह नई, हल्की और अत्याधुनिक M8 कार्बाइन को अपने बेड़े में शामिल करने जा रही है, जिसकी पहली तैनाती इसी साल दिसंबर में उत्तर कैरोलिना स्थित फोर्ट ब्रैग से शुरू होने जा रही है। 

    M8 कार्बाइन का खौफनाक पावर्स
    सैनिकों की शिकायतों के बाद, हथियार निर्माता कंपनी सिग सॉयर और अमेरिकी सेना ने मिलकर M7 के डिजाइन में तेजी से सुधार किए. इसी का नतीजा है नई M8 कार्बाइन, जिसे पहले XM8 नाम दिया गया था। 

        1 पाउंड हल्की और 3.5 इंच छोटी: M8 का खाली वजन केवल 3.3 किग्रा है और सप्रेसर और हीट शील्ड के साथ ये 4 किग्रा की रहती है. ये M7 से करीब आधा किलो हल्की है. वहीं इसकी बैरल भी M7 से करीब 3.5 इंच छोटी बनाई गई है, जिससे अर्बन वॉरफेयर में मूव करना आसान हो जाता है। 
        घातक 6.8 मिमी कारतूस: साइज छोटा होने के बावजूद M8 के कारतूस में कोई समझौता नहीं किया गया है. ये वही शक्तिशाली 6.8×51mm कारतूस फायर करती है, जो M7 करती थी। 

        एर्गोनॉमिक्स और फ्री-फ्लोटिंग हैंडगार्ड: M8 में M-LOK फ्री-फ्लोटिंग हैंडगार्ड दिया गया है जो बैरल को बिना छुए ग्रिप देता है, जिससे लगातार फायरिंग के दौरान बैरल का तापमान राइफल की सटीकता पर असर नहीं डालता. साथ ही, फिक्स्ड स्टॉक की वजह से रीकॉइल कंट्रोल बहुत बेहतर हो जाता है। 

    3,180 किमी/घंटा स्पीड और ‘स्मार्ट कंप्यूटर’ स्कोप
        तूफानी रफ्तार : इसकी मजल वेलोसिटी करीब 3,180 किलोमीटर प्रति घंटा है. इसका मतलब है कि ट्रिगर दबाते ही गोली 1 सेकेंड से भी कम समय में 500 मीटर से ज्यादा की दूरी तय कर लेती है।     750 राउंड प्रति मिनट की स्पीड: ये सेलेक्ट-फायर मोड पर काम करती है, जिससे सैनिक इसे सिंगल शॉट या फुली-ऑटोमैटिक मोड में 600 से 750 राउंड प्रति मिनट की दर से चला सकते हैं। 

        M157 फायर कंट्रोल सिस्टम: M8 राइफल की सबसे बड़ी ताकत इसका M157 फायर कंट्रोल सिस्टम है. ये सिर्फ एक साधारण दूरबीन या स्कोप नहीं है, बल्कि 1.21 किग्रा का एक ‘स्मार्ट कंप्यूटराइज्ड स्कोप’ है. इसमें 1x से 8x जूम, लेजर रेंजफाइंडर, बैलिस्टिक कैलकुलेटर, हवा और तापमान मापने वाले सेंसर और इन्फ्रारेड ऐमिंग लेजर लगे हैं. ये स्कोप हवा और दूरी का खुद हिसाब लगाकर सिपाही की स्क्रीन पर बिल्कुल सही निशाना दिखाता है, जिससे 600 मीटर दूर बैठे दुश्मन पर भी पहला शॉट अचूक लगता है। 

    2027 के बजट से M7 का पत्ता साफ
    ‘डिफेंस न्यूज’ के मुताबिक, अमेरिकी सेना ने वित्तीय वर्ष 2027 के अपने बजट प्रस्ताव में 14,944 नई M8 कार्बाइन खरीदने की मांग रखी है, जबकि नई M7 राइफलों के लिए एक भी रुपया नहीं मांगा गया है। 

    3 साल में 50,000 M7 राइफलें खरीदने के बाद M8 पर शिफ्ट होना ये साबित करता है कि कागजों पर कोई हथियार कितना भी ताकतवर क्यों न दिखे, अगर युद्ध के मैदान में सिपाही उसे आसानी से इस्तेमाल नहीं कर पा रहा, तो वह बेकार है. M8 कार्बाइन के आने से पैदल सेना को एक ऐसा हथियार मिल गया है जो हल्का भी है, तेज भी और 600 मीटर दूर बैठे दुश्मन को पलक झपकते ही ढेर करने का दम रखता है। 

  • इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर बाजार में बढ़ेगी टक्कर, VinFast भारत के 30 से ज्यादा शहरों में खोलेगी शोरूम

    इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर बाजार में बढ़ेगी टक्कर, VinFast भारत के 30 से ज्यादा शहरों में खोलेगी शोरूम

    मुंबई 
     वियतनामी इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता कंपनी VinFast ने 2025 में अपनी इलेक्ट्रिक कारों के साथ भारत में एंट्री की थी, जिसके बाद कंपनी अब देश के इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर सेगमेंट में भी अपने कारोबार को बढ़ाने की योजना बना रही है। 

    इस इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता कंपनी ने 15 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 50 से ज़्यादा डीलर पार्टनर्स के साथ 'लेटर ऑफ़ इंटेंट' (LOI) पर साइन किए हैं. इन समझौतों से VinFast के रिटेल नेटवर्क का पहला चरण तैयार होने की उम्मीद है, जिसके कंपनी तहत 34 शहरों में 50 से ज़्यादा शोरूम खोलने की योजना बना रही है। 

    आसान शब्दों में कहें तो, VinFast द्वारा साइन किए गए LOI असल में कंपनी और उसके संभावित डीलर पार्टनर्स के बीच इरादे को औपचारिक रूप से ज़ाहिर करने वाला एक दस्तावेज़ है. इसका अर्थ यह है कि डीलर VinFast आउटलेट खोलने की दिशा में काम करने के लिए सहमत हो गए हैं। 

    जानकारी के अनुसार, ये LOI वियतनाम के हाई फोंग में VinFast के मैन्युफैक्चरिंग कॉम्प्लेक्स में भारतीय डीलर पार्टनर्स की यात्रा के दौरान साइन किए गए थे. कंपनी देश भर के बाज़ारों पर नज़र बनाए हुए है, क्योंकि वह भारत के इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर सेक्टर में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की तैयारी कर रही है। 

    VinFast के डीलरशिप का यह नेटवर्क भारत के उत्तरी, मध्य, पश्चिमी, दक्षिणी और पूर्वी हिस्सों में फैलाया जाएगा. उत्तर भारत में, VinFast का डीलर नेटवर्क दिल्ली NCR, राजस्थान और पंजाब को कवर करेगा, जबकि मध्य भारत के लिए इसकी योजनाओं में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश शामिल हैं। 

    इसके अलावा, पश्चिम में महाराष्ट्र और गुजरात शामिल होंगे. दक्षिण में, कंपनी के कर्नाटक, तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश में डीलर पार्टनर होंगे. डीलर नेटवर्क के पूर्वी हिस्से में शामिल राज्यों में पश्चिम बंगाल और ओडिशा हैं। 

    कौन से 2-व्हीलर आएंगे भारत
    कंपनी ने अभी तक इस बात की पुष्टि नहीं की है कि भारतीय बाज़ार में कौन से इलेक्ट्रिक मॉडल लॉन्च किए जाएंगे. हालांकि, VinFast ने इसकी पुष्टि जरूर की है कि शुरुआत में भारत के लिए तीन इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर प्लान किए हैं. इनमें से एक VinFast Viper है, जिसका भारत में पेटेंट भी कराया जा चुका है. वियतनाम में, VinFast Viper में 3 kW की इलेक्ट्रिक मोटर के साथ 4.8 kWh की बैटरी इस्तेमाल की जाती है। 

    VinFast ने भारत में एक कम ऊंचाई वाली इलेक्ट्रिक मोटरसाइकिल का पेटेंट भी कराया है, जो 'Sulad' कॉन्सेप्ट जैसी दिखती है. इस कॉन्सेप्ट को इस साल की शुरुआत में कंपनी की भविष्य की इलेक्ट्रिक मोटरसाइकिल रणनीति के हिस्से के तौर पर दिखाया गया था। 

    हालांकि अभी तक इसके आधिकारिक स्पेसिफिकेशन का खुलासा नहीं हुआ है, लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसके प्रोडक्शन मॉडल में 67 bhp तक की पावर देने वाली इलेक्ट्रिक मोटर लगाई जा सकती है, और इसकी टॉप स्पीड 130 kmph हो सकती है. VinFast Viper और इस मोटरसाइकिल, दोनों का पेटेंट जुलाई 2026 में भारत में कराया गया था। 

  • विधानसभा चुनाव से पहले पंजाब को मिलेगा नया स्थायी DGP, गौरव यादव की नियुक्ति लगभग तय

    विधानसभा चुनाव से पहले पंजाब को मिलेगा नया स्थायी DGP, गौरव यादव की नियुक्ति लगभग तय

    चंडीगढ़
     पंजाब विधानसभा चुनाव से करीब पांच महीने पहले राज्य को स्थायी पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) मिलना लगभग तय हो गया है। 1992 बैच के आइपीएस अधिकारी गौरव यादव को नियमित डीजीपी नियुक्त किया जा रहा है।इसके साथ ही पिछले चार साल से कार्यवाहक डीजीपी के सहारे चल रही पंजाब पुलिस को स्थायी प्रमुख मिलने का रास्ता साफ हो गया है। गौरव यादव जुलाई 2022 से कार्यवाहक डीजीपी की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। हालांकि, उनकी नियुक्ति का औपचारिक आदेश जारी होना अभी बाकी है।

    स्थायी डीजीपी की नियुक्ति के लिए पंजाब सरकार ने संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) को 14 आइपीएस अधिकारियों के नाम भेजे थे। आयोग ने इन नामों पर विचार करने के बाद तीन अधिकारियों का पैनल राज्य सरकार को भेजा था।

    इसमें गौरव यादव के अलावा शरद सत्य चौहान और हरप्रीत सिंह सिद्धू के नाम शामिल हैं। तीनों अधिकारी 1992 बैच के आइपीएस अधिकारी हैं। मुख्यमंत्री की सैद्धांतिक मंजूरी के बाद गौरव यादव के नाम पर अंतिम मुहर लगने की संभावना सबसे अधिक है।

    चार साल से अतिरिक्त प्रभार के तहत संभाल रहे थे जिम्मेदारी
    गौरव यादव जुलाई 2022 से पंजाब पुलिस के प्रमुख की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। उस समय से उन्हें कार्यवाहक डीजीपी के तौर पर तैनात किया गया था। राज्य में स्थायी डीजीपी की नियुक्ति का मामला लंबे समय तक लंबित रहा। इस दौरान पुलिस प्रमुख की जिम्मेदारी अतिरिक्त प्रभार के तहत चलती रही। अब मुख्यमंत्री की मंजूरी के बाद नियमित नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ने की उम्मीद है।

    पैनल में शरद सत्य चौहान और हरप्रीत सिंह सिद्धू भी शामिल
    यूपीएससी की ओर से भेजे गए तीन अधिकारियों के पैनल में शरद सत्य चौहान और हरप्रीत सिंह सिद्धू भी शामिल हैं। शरद सत्य चौहान 1992 बैच के आइपीएस अधिकारी हैं और पंजाब में सतर्कता प्रमुख के तौर पर जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। उनकी सेवानिवृत्ति 31 मार्च 2028 को निर्धारित है।

    वहीं, हरप्रीत सिंह सिद्धू भी 1992 बैच के आइपीएस अधिकारी हैं और विशेष डीजीपी के पद पर तैनात हैं। उनकी सेवानिवृत्ति 31 मई 2027 को होनी है।

    हाई कोर्ट ने 13 अक्टूबर तक मांगी अनुपालन रिपोर्ट
    स्थायी डीजीपी की नियुक्ति में देरी का मामला पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट तक पहुंच चुका है। अधिवक्ता निखिल थमन की ओर से दायर जनहित याचिका में लंबे समय तक अतिरिक्त प्रभार के तहत पुलिस प्रमुख की जिम्मेदारी दिए जाने पर सवाल उठाए गए थे।

    यूपीएससी से पैनल मिलने के बाद भी नियुक्ति का फैसला लंबित रहा। अब हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को 13 अक्टूबर तक अनुपालन रिपोर्ट देने की समयसीमा दी है।

    मुख्यमंत्री भगवंत मान की सैद्धांतिक मंजूरी के बाद इस समयसीमा से पहले नियुक्ति की औपचारिक घोषणा होने की संभावना है। आदेश जारी होने पर गौरव यादव नियमित डीजीपी के तौर पर पंजाब पुलिस की कमान संभालेंगे। इससे चार साल से अधिक समय से चली आ रही कार्यवाहक डीजीपी की व्यवस्था समाप्त हो जाएगी।

     

  • भोपाल में घर-जमीन की रजिस्ट्री पर बढ़ सकता है खर्च, 200 से ज्यादा क्षेत्र मर्ज होने से बढ़ेंगी गाइडलाइन दरें

    भोपाल में घर-जमीन की रजिस्ट्री पर बढ़ सकता है खर्च, 200 से ज्यादा क्षेत्र मर्ज होने से बढ़ेंगी गाइडलाइन दरें

    भोपाल 
    भोपाल में कलेक्टर गाइडलाइन में पिछले दरवाजे से दरवृद्धि की फिर से तैयारी है। इस बार 200 से अधिक क्षेत्र मर्ज करने की तैयारी की जा रही है। मुख्य मार्ग से जोड़ने से अंदरूनी क्षेत्रों में दर 40 फीसदी तक बढ़ जाएगी। यहां रजिस्ट्री महंगी होगी। प्रशासन दो साल से सीधे दरों में बढ़ोतरी के साथ क्षेत्रों की संख्या घटाकर अप्रत्यक्ष रूप से भी रजिस्ट्री महंगी कर रहा है। 2025 में तो 1000 क्षेत्रों को मर्ज कर दिया था। इससे कई क्षेत्रों में 200 फीसदी तक बढ़ोतरी हो गई थी।

    यहां के क्षेत्र मर्ज करेंगे
    अयोध्या बायपास से जुड़े 40 क्षेत्रों को मुख्यमार्ग व अंदरूनी क्षेत्रों की मर्जिंग होगी। इसके साथ संतनगर मुख्यमार्ग के 32 क्षेत्रों को अंदरूनी क्षेत्रों से जोड़ा जा रहा। रातीबढ़ से लेकर नीलबड़, कलखेड़ा, बरखेड़ा नाथू में मुख्यमार्ग से 600 मीटर अंदर तक के क्षेत्र की एक समान दर की जा रही। यहां 18 क्षेत्र मर्ज करेंगे। कोलार रोड के साथ सनखेड़ी मास्टर प्लान रोड से अंदर वाले क्षेत्र मुख्यमार्ग से जोड़े जा रहे। ये भी 35 क्षेत्र है।

    ऐसे होगा असर
    क्षेत्रों को मर्ज करने की इस नीति का सबसे बड़ा नुकसान मध्यमवर्गीय और आम गृह खरीदारों पर पड़ेगा। उदाहरण के लिए, यदि किसी मुख्य मार्ग की गाइडलाइन दर 4,000 प्रति वर्गफीट है और उसके अंदर स्थित कॉलोनी की दर 2,500 प्रति वर्गफुट थी, तो विलय के बाद कॉलोनी के अंदरूनी मकान की दर भी 4,000 प्रति वर्ग फुट मानी जाएगी। जमीन का वास्तविक बाजार मूल्य भले ही कम हो, लेकिन सरकारी दस्तावेजों में दरें मुख्य मार्ग के बराबर होने से स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्री शुल्क का बोझ सीधा खरीदार की जेब पर पड़ेगा।

    विरोध भी बेअसर
    कलेक्टर गाइडलाइन तय करने के लिए आयोजित होने वाली जिला मूल्यांकन समिति की बैठकों में स्थानीय विधायकों और जनप्रतिनिधियों ने लगातार इस नीति का कड़ा विरोध किया है। विधायकों का तर्क रहा है कि मुख्य मार्ग और अंदरूनी क्षेत्रों का व्यावसायिक और आवासीय मूल्य कभी एक समान नहीं हो सकता।

    ये है स्थिति
    2024: 3900 क्षेत्रों के आधार पर 25 से 95 फीसदी दरवृद्धि की थी
    2025 में 2885 क्षेत्रों के आधार पर दरें तय की थी। 18 फीसदी बढ़ोतरी तय की थी।
    2026 में अब 2680 क्षेत्र करने की स्थिति

  • MP में मौसम संबंधी आपदाओं से 537 लोगों की जान गई, अब स्थानीय जोखिम के हिसाब से तैयारी पर जोर

    MP में मौसम संबंधी आपदाओं से 537 लोगों की जान गई, अब स्थानीय जोखिम के हिसाब से तैयारी पर जोर

    भोपाल 

    आप इस बात की कल्पना कीजिए कि लगभग हर सुबह की शुरुआत किसी ना किसी प्राकृतिक आपदा की खबर से हो. कहीं भीषण गर्मी, कहीं तूफान, कहीं बाढ़ तो कहीं भूस्खलन. भारत के लिए साल 2025 में यह कल्पना नहीं, बल्कि सच्चाई बन चुकी थी. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) और पत्रिका डाउन टू अर्थ के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी से नवंबर 2025 के बीच 334 में से 331 दिन ऐसे रहे, जब देश के किसी ना किसी हिस्से में अत्यधिक मौसमीय घटना (Extreme Weather Event) दर्ज की गई. यानी पूरे साल का लगभग 99 प्रतिशत समय. अगर 2024 से तुलना करें तो पिछले साल यह आंकड़ा 295 दिनों का था. इन आपदाओं में 4400 से अधिक लोगों की जान गई और करीब 1.74 करोड़ हेक्टेयर फसल बर्बाद हो गई, जो बदलते जलवायु संकट की भयावह तस्वीर पेश करती है। 

    साल 2025 में मौसम संबंधी घटनाओं की वजह से मध्यप्रदेश में 537 लोगों की मौत हुई। पर्यावरण और विकास के मुद्दों पर काम करने वाले संगठन सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की ओर से यह रिपोर्ट जारी की गई है।कहीं गर्मी, कहीं बारिश, कहीं सूखा तो कई जगहों पर भूजल और बोरवेल का दबाव लोगों के सामने चुनौती बनकर आया है। इसका असर लोगों की आजीविका और कमाई पर भी पड़ा है।अलग-अलग इलाकों की अपनी समस्याएं हैं। ऐसे में वहां की जरूरत के हिसाब से तैयारी भी जरूरी है।इसी को समझने के लिए वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (WRI) ने मध्यप्रदेश में जलवायु जोखिमों का अध्ययन किया और उनसे निपटने के उपायों पर रिपोर्ट तैयार की है।

    कंक्रीट और बदलता मौसम पैटर्न WRI की रिसर्च में सबसे अहम बात यह सामने आई है। दावा किया गया है कि मध्यप्रदेश में जलवायु जोखिम एक जैसा नहीं है। शहरों में बढ़ती गर्मी और कंक्रीट का विस्तार चुनौती बन रहा है।

    वहीं ग्रामीण इलाकों में बारिश का बदलता पैटर्न, सूखा, पानी की उपलब्धता और खेती की बदलती परिस्थितियां बड़ा जोखिम हैं। जंगल वाले क्षेत्रों में आग, पानी और वन आधारित आजीविका पर असर पड़ रहा है।

    इसी वजह से WRI की रिसर्च में जगह के हिसाब से जोखिम की पहचान और उसी के अनुसार समाधान तैयार करने पर जोर दिया गया है।

    5 बड़े शहरों के हाल जानें

    1. भोपाल : शहर एक, अंदर 4 से 6 डिग्री तक का अंतर WRI की नई हीट रिसर्च में भोपाल का उदाहरण बताता है कि गर्मी का असर शहर के हर हिस्से में एक जैसा नहीं है।

    झीलों और हरित क्षेत्रों के कारण कई हिस्सों को प्राकृतिक ठंडक मिलती है, लेकिन घनी बसाहट और कम छायादार इलाकों में हालात बदल जाते हैं।

    यहां तापमान आसपास के रिहायशी क्षेत्रों की तुलना में 4 से 6 डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा पाया गया।

    यानी शहर में रहने की जगह और आसपास की हरियाली यह तय करने लगी है कि एक ही गर्मी में किस व्यक्ति को कितनी गर्मी झेलनी पड़ेगी।

    2. इंदौर : कंक्रीट और कामकाजी आबादी पर दबाव इंदौर में तेजी से बढ़ता शहरी क्षेत्र, बढ़ती निर्माण गतिविधियां और घनी होती बसाहट गर्मी के जोखिम को बढ़ा रही हैं।

    WRI ने खास तौर पर औद्योगिक और कामकाजी क्षेत्रों में बाहर काम करने वाले लोगों के लंबे समय तक गर्मी के संपर्क में रहने को जोखिम से जोड़ा है।

    यानी गर्मी का असर सिर्फ तापमान के आंकड़े तक सीमित नहीं है। इसका असर काम के घंटों, उत्पादकता और परिवार की आय तक पहुंच सकता है।

    3. ग्वालियर : शहर का घना हिस्सा ज्यादा गर्म ग्वालियर में WRI ने शहर के घने निर्मित हिस्से को गर्मी रोकने वाले क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया है। घनी इमारतें, सड़कें और कम खुले स्थान गर्मी को लंबे समय तक बनाए रखते हैं।

    इससे शहर के मध्य हिस्से में गर्मी का संपर्क ज्यादा देर तक बना रह सकता है। यहां भी जोखिम पूरे शहर में बराबर नहीं है।

    4. जबलपुर : आधी आबादी को हरियाली का लाभ नहीं जबलपुर की स्थिति कुछ अलग है। यहां जंगल, खुले क्षेत्र और जलस्रोत शहर को गर्मी से प्राकृतिक राहत देते हैं। इसके बावजूद WRI के मुताबिक करीब 49 प्रतिशत आबादी के आसपास गर्मी से राहत देने वाली पर्याप्त हरियाली उपलब्ध नहीं है।

    इसका मतलब यह है कि प्राकृतिक संसाधन मौजूद होने के बावजूद शहर के हर हिस्से तक उनका फायदा नहीं पहुंच रहा है।

    5. उज्जैन : बाहर रहने वालों का जोखिम ज्यादा उज्जैन में धार्मिक पर्यटन के कारण बड़ी संख्या में लोग खुले स्थानों में समय बिताते हैं। WRI ने शिप्रा के रामघाट जैसे पर्यटन क्षेत्रों का उदाहरण दिया है, जहां छाया सीमित है।

    ऐसे स्थानों पर बढ़ती गर्मी का सीधा असर स्थानीय लोगों के साथ बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों पर पड़ता है।

    गांवों में बारिश बदली तो खेती और पानी दोनों प्रभावित WRI की ग्रामीण रिसर्च के मुताबिक किसान पानी की कमी से ही नहीं, गर्मी और अनियमित बारिश से भी परेशान हैं।

    बेमौसम बारिश से फसल में फूल आने की प्रक्रिया प्रभावित होती है, दाना कमजोर बन सकता है और कीटों का प्रकोप बढ़ सकता है।

    वहीं मानसून में देरी से भूजल रिचार्ज कम होता है, जिससे गर्मियों में ग्रामीण इलाकों में पानी की समस्या बढ़ सकती है।

        बड़वानी : जमीन-पानी बचाने से जुड़ी ग्रामीण आय – WRI ने बड़वानी में जलवायु जोखिम को सिर्फ खेती के नुकसान तक सीमित नहीं माना है। अध्ययन में बताया गया है कि जमीन और पानी की स्थिति सीधे ग्रामीण परिवारों की आय पर असर डालती है। इसलिए स्थानीय लोगों की भागीदारी से जमीन और प्राकृतिक संसाधनों को बहाल करने पर जोर दिया गया है।

        सीधी : जमीन की खराब होती स्थिति भी जलवायु जोखिम – सीधी में WRI ने जमीन, पानी और खेती को ग्रामीण आजीविका से जोड़कर देखा है। जमीन की गुणवत्ता या पानी की उपलब्धता प्रभावित होने पर खेती और परिवार की कमाई पर भी असर पड़ता है। इसलिए जलवायु से निपटने की योजना में मौसम के साथ जमीन और प्राकृतिक संसाधनों को बचाना भी जरूरी बताया गया है।

    एक ही जिले में अलग-अलग जोखिम बैतूल WRI की रिसर्च में इस बदलाव को समझने का एक जमीनी मॉडल है। अध्ययन में जिले के दो ब्लॉकों में अलग-अलग जलवायु जोखिम सामने आए।

    कहीं पानी की कमी और गिरता भूजल चिंता है, तो कहीं तेज बारिश, फ्लैश फ्लड और भूस्खलन का खतरा है।

    अध्ययन में मक्का और धान जैसी ज्यादा पानी वाली फसलों और मल्टीपल क्रॉपिंग का भी उल्लेख है। इससे जलस्रोतों पर दबाव बढ़ सकता है।

    WRI ने भूजल की स्थिति के अनुसार खेती की योजना बनाने, पानी का रिचार्ज बढ़ाने और आय के दूसरे साधन विकसित करने पर जोर दिया है।

    लगातार आपदाओं का रहा साल
    2025 में भारत का कोई भी कोना सुरक्षित नहीं रहा. 36 के 36 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश किसी ना किसी समय चरम मौसम की चपेट में आए. फरवरी से ही हीट वेव्स ने दस्तक दे दी तो नवंबर तक कई इलाकों में बाढ़ और भारी बारिश जारी रही. उत्तर-पश्चिम भारत सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र रहा, जहां 311 दिन अत्यधिक मौसमीय घटनाएं दर्ज की गईं. वहीं हिमाचल प्रदेश में इसकी सबसे अधिक आवृत्ति रही, जहां करीब 80 प्रतिशत दिनों में कोई ना कोई आपदा आती रही। 

    आकाशीय बिजली और आंधी-तूफान से 1500 मौत
    मॉनसून बाढ़ से 2707 लोगों की जान गई. आंध्र प्रदेश में सबसे अधिक 608 मौतें, जबकि मध्य प्रदेश में 537 लोगों की जान गई. प्री-मॉनसून महीनों में ही 990 मौतें हुईं, जो 2022 की तुलना में लगभग 3 गुना थीं. अगस्त में आई बाढ़ के बाद पंजाब के कई जिलों में खेत पूरी तरह तबाह हो गए। 

    इन आंकड़ों के पीछे मानवीय त्रासदी और आर्थिक नुकसान दर्दनाक मानवीय कहानियां छिपी हैं. झारखंड में भूस्खलन से कई सारे परिवारों का सब कुछ खत्म हो गया. गुजरात में करीब 44 लाख हेक्टेयर फसल पानी में डूब गई. महाराष्ट्र को सबसे बड़ा झटका लगा, जहां 84 लाख हेक्टेयर फसल नष्ट हुई, जो 2022 की तुलना में लगभग 9 गुना अधिक नुकसान है। 

    इन नुकसानों का मतलब है- खाली पड़ी थालियां, उजड़े रोजगार और वे समुदाय जिन्हें फिर से शून्य से शुरुआत करनी पड़ी. ग्रामीण गरीबों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ा, क्योंकि उनके पास ना तो बचत है और ना ही आपदा के बाद उबरने के पर्याप्त संसाधन ही बचे हैं। 

    इस तबाही के पीछे जलवायु कारण
    विशेषज्ञों के अनुसार, इस संकट की जड़ में मानव-जनित जलवायु परिवर्तन (Anthropogenic Climate Change) है. 1990 के दशक की शुरुआत से भारत का औसत तापमान 0.89 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है. भारत की 70% कृषि व्यवस्था के लिए जरूरी दक्षिण-पश्चिम मानसून कई इलाकों में 0.5 से 1.5 मिमी प्रति दशक प्रति दिन की दर से कमजोर पड़ा है. खासतौर पर गंगा-सिंधु-ब्रह्मपुत्र के मैदानी इलाकों में। 

    इसके बावजूद बारिश की अत्यधिक घटनाएं बढ़ रही हैं. उदाहरण के लिए तटीय गुजरात में कम समय में बहुत तेज बारिश देखने को मिल रही है. महासागरों का तापमान 0.12 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक बढ़ा है. इसके कारण अरब सागर में चक्रवात 1980 के दशक की तुलना में 40% अधिक शक्तिशाली हो गए हैं। 

    समुद्र स्तर हर साल 3.3 मिमी की दर से बढ़ रहा है. सूखे और लंबे होते जा रहे हैं. मौसम की पारंपरिक लय टूट चुकी है. सर्दियों में गर्मी के थपेड़े और सूखे मौसम में बाढ़ की घटनाएं अब आम हो रही हैं। 

    आगे क्या और क्या करना होगा?
    यदि उत्सर्जन में तेजी से कटौती नहीं हुई, तो स्थिति और भयावह हो सकती है. जलवायु के मौजूदा मॉडल बताते हैं कि सदी के मध्य तक वैश्विक तापमान 1.2 से 1.3 डिग्री सेल्सियस और बढ़ सकता है. मॉनसून की कुल बारिश 6–8% बढ़ेगी, लेकिन उतार-चढ़ाव बेहद अस्थिर होगा. हीटवेव 1–2 महीने तक लंबी हो सकती हैं। 

    समुद्री हीटवेव साल में 200 दिन तक पहुंच सकती है. तटीय इलाकों में अत्यधिक समुद्र स्तर हर साल की घटना बन सकता है. सन् 2100 तक हिमालयी ग्लेशियर 30% से 50% तक सिकुड़ सकते हैं, जिससे करोड़ों लोगों का जल-स्रोत खतरे में पड़ जाएगा। 

    समाधान अभी भी संभव है
    विशेषज्ञों का कहना है कि अभी भी समय है, लेकिन बेहद कम. इसके उपायों में जलवायु-सहनीय खेती (Resilient Farming) को बढ़ावा देना. मजबूत अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करना. संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन (COP) जैसे वैश्विक समझौतों को ईमानदारी से लागू करना. बड़े स्तर पर उत्सर्जन में कटौती और न्यायपूर्ण अनुकूलन (Equitable Adaptation) शामिल है। 

    भारत के पास ज्यादा समय नहीं 
    भारत के पास इंतजार का वक्त नहीं बचा है. जलवायु संकट की घड़ी लगातार टिक-टिक कर रही है. 2025 की घटनाओं ने भी यह साफ कर दिया है कि बेहतरी की दिशा में कदम उठाया जाना बहुत जरूरी है. अब कार्रवाई को टालने की कोई गुंजाइश नहीं बची है। 

     

  • MP हाई कोर्ट ने NSA के इस्तेमाल पर उठाए सवाल, कहा- मनमानी से कानून की गंभीरता हो रही प्रभावित

    MP हाई कोर्ट ने NSA के इस्तेमाल पर उठाए सवाल, कहा- मनमानी से कानून की गंभीरता हो रही प्रभावित

    भोपाल
    मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के मनमाने और लापरवाह तरीके से इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताई है। अदालत ने दो भाइयों की निवारक हिरासत को रद करते हुए उन्हें तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है और चेतावनी दी है कि संविधान के इस बेहद कड़े कानून का इस्तेमाल अब सामान्य प्रक्रिया की तरह लापरवाही से किया जा रहा है।

    मामले में सुनवाई के दौरान जस्टिस विवेक अग्रवाल की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच ने राजेंद्र ठाकुर और राजेश ठाकुर नाम के दो सगे भाइयों की नजरबंदी को खारिज करते हुए उन्हें छोड़ने का आदेश दिया है।

    जानिए दोनों भाईयों पर क्यों लगाया गया था NSA?
    बता दें कि जबलपुर के जिला कलेक्टर ने सार्वजनिक शांति के लिए खतरा बताते हुए 6 जनवरी को इन दोनों भाइयों को तीन महीने के लिए हिरासत में लेने का आदेश दिया था, जिसे बाद में बढ़ा दिया गया था। हाई कोर्ट ने यह फैसला 11 सितंबर को सुनाया था, जिसे 5 अक्टूबर को सार्वजनिक किया गया।

    हाई कोर्ट ने क्या कहा?
    पहले तो अदालत ने पाया कि दोनों भाइयों पर कुल 14 मामले दर्ज थे, जिनमें से 11 मामलों में वे पहले ही बरी हो चुके थे। बाकी बचे 3 मामलों में मारपीट, अछूत हरकत और मामूली बमबाजी जैसे आरोप थे। ऐसे में अदालत ने कहा कि अधिकारियों ने बिना दिमाग लगाए और बिना सही तथ्य जाने ही उन पर NSA लगा दिया।

    एक ही दिन में कागजी कार्रवाई पूरी होने पर सवाल
    दूसरी ओर बेंच ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि सिटी एसपी के प्रस्ताव से लेकर कलेक्टर के नजरबंदी आदेश तक की पूरी फाइल चार अधिकारियों से गुजरी और महज़ एक ही दिन में सारी प्रक्रिया पूरी कर ली गई। अदालत ने कहा कि इतनी जल्दबाजी यह साबित करती है कि अधिकारियों ने स्वतंत्र रूप से सोच-समझकर फैसला नहीं लिया।

    संविधान के नियमों का दिया हवाला
    साथ ही सुनवाई के दौरान अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 ,जो नागरिकों को मौलिक अधिकार देते हैं, के तहत मिले सुरक्षा उपायों का पालन किया जाना चाहिए, ताकि किसी भी नागरिक को मनमाने ढंग से हिरासत में न रखा जाए।

     

  • MP में कम बारिश से खेती पर मार, मक्का-सोयाबीन प्रभावित; किसानों को रबी फसल बदलने की चिंता

    MP में कम बारिश से खेती पर मार, मक्का-सोयाबीन प्रभावित; किसानों को रबी फसल बदलने की चिंता

    भोपाल 

    मध्य प्रदेश में मानसून के दौरान बारिश की कमी ने किसानों के सामने रबी की फसल का संकट खड़ा कर दिया है। प्रदेश में पूरे सीजन में सामान्य से 4% कम बारिश हुई, लेकिन पश्चिमी मध्य प्रदेश में यह कमी 12% तक रही। प्रदेश के 12 जिलों में सामान्य से 20 से 59% तक कम बारिश दर्ज की गई है। अब सरकार कम बारिश वाले क्षेत्रों में फसलों की स्थिति का आकलन करने के लिए सर्वे कराने की तैयारी कर रही है। इस बीच किसानों ने खरीफ फसलों में नुकसान, गिरते भूजल स्तर और सिंचाई के पानी की कमी का मुद्दा उठाते हुए राहत, वैकल्पिक फसलों के बीज और सिंचाई व्यवस्था की मांग की है। नर्मदापुरम जिले के सोहागपुर के किसान लखन गौर के मुताबिक, क्षेत्र में कम बारिश के कारण इस बार मक्का की फसल प्रभावित हुई है।

    लागत बढ़ी और उत्पादन में आई कमी
    किसान लखन गौर के मुताबिक फसल आड़ी होने से लागत बढ़ गई और उत्पादन भी कम हुआ। अब नलकूपों का जलस्तर गिरने से आगामी रबी सीजन में गेहूं की बोनी और सिंचाई को लेकर चिंता है। उन्होंने कहा कि जिन किसानों के पास पर्याप्त पानी नहीं है, उन्हें गेहूं के बजाय कम पानी में तैयार होने वाली फसलें लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। गौर ने पंचायत स्तर पर उन्नत बीज उपलब्ध कराने की मांग की है। उनका कहना है कि कम सिंचाई वाले क्षेत्रों के किसानों को चने की जेजी 52, जेजी 18 और जेजी 24 जैसी किस्मों के बीज प्राथमिकता से दिए जाएं, ताकि पानी की कमी के बीच भी किसान रबी की फसल ले सकें।

    नेताप्रतिपक्ष ने सीएम को लिखा पत्र
    विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर जिले को सूखा प्रभावित घोषित करने की प्रक्रिया शुरू करने, खरीफ फसलों का सर्वे कराने और प्रभावित किसानों को राहत पैकेज देने की मांग की है। सिंघार के अनुसार, धार में पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 42% कम बारिश हुई है। इससे खेतों में पर्याप्त नमी नहीं बची और रबी की बोनी के लिए सिंचाई का संकट गहराने की आशंका है। सिंघार ने बाग विकासखंड में पाइपलाइन के जरिए नर्मदा नदी का पानी जलाशयों तक पहुंचाने की मांग भी की है। उमंग सिंघार ने धार के अलावा प्रदेश के दूसरे प्रभावित जिलों में भी सर्वे कराकर जरूरत के अनुसार राहत देने की मांग की है। अब चुनौती सिर्फ खरीफ फसलों में हुए नुकसान का पता लगाने की नहीं, बल्कि रबी सीजन में पानी की कमी से जूझ रहे किसानों के लिए समय पर बीज और सिंचाई के विकल्प उपलब्ध कराने की भी है। 

    प्रदेश का औसत सुधरा, लेकिन कई जिलों में कमी बरकरार
    मौसम वैज्ञानिक अरुण शर्मा के अनुसार, पूरे मानसून सीजन में प्रदेश की बारिश सामान्य के करीब पहुंच गई, लेकिन कई जिलों में कमी बनी रही। अगस्त की शुरुआत में प्रदेश सामान्य से 19% पीछे था। बाद में हुई बारिश से औसत में सुधार आया, लेकिन पश्चिमी मध्य प्रदेश के कई इलाकों में पर्याप्त पानी नहीं बरसा। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, अलीराजपुर में सामान्य से करीब 50%, धार में 39%, रतलाम में 34% और इंदौर व उज्जैन में 26-26% कम बारिश दर्ज की गई। नर्मदापुरम संभाग के कुछ जिलों में भी कमी रही, जबकि सागर, रीवा, जबलपुर और ग्वालियर-चंबल संभाग के कई जिलों में सामान्य या उससे अधिक बारिश हुई। बारिश की कमी का असर सोयाबीन, मूंग, मक्का और दूसरी खरीफ फसलों पर कितना पड़ा, यह खेतों की वास्तविक स्थिति देखने के बाद ही स्पष्ट होगा। सोयाबीन में नमी की कमी से फलियों के विकास और दाने भरने पर असर पड़ सकता है, जबकि मक्का की पैदावार भी प्रभावित हो सकती है। हालांकि, केवल बारिश के आंकड़ों के आधार पर पूरे जिले या प्रदेश में फसल नुकसान का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

    सर्वे के बाद तय होगी नुकसान की स्थिति
    कम बारिश वाले 12 जिलों में सर्वे के जरिए फसलों की स्थिति और संभावित नुकसान का आकलन किया जाएगा। इसके आधार पर प्रभावित क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति सामने आ सकेगी। किसानों की मांग है कि सर्वे में देरी न हो और नुकसान के आकलन के साथ राहत, बीज तथा सिंचाई के इंतजाम भी किए जाएं। मानसून की विदाई के बाद पूर्वी मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में अगले तीन दिन गरज-चमक के साथ बारिश और 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवा चलने की संभावना है। वहीं, पश्चिमी मध्य प्रदेश में अगले पांच दिन मौसम मुख्य रूप से शुष्क रहने का अनुमान है। ऐसे में कम बारिश वाले पश्चिमी जिलों में रबी की बोनी से पहले मिट्टी की नमी और सिंचाई के उपलब्ध साधनों का आकलन किसानों के लिए अहम होगा। 

  • हज 2027 में भोपाल के यात्रियों को मिलेगी खास सुविधा, मक्का की ऐतिहासिक भोपाल रुबात में मुफ्त आवास

    हज 2027 में भोपाल के यात्रियों को मिलेगी खास सुविधा, मक्का की ऐतिहासिक भोपाल रुबात में मुफ्त आवास

    भोपाल
     भोपाल के आजमीन-ए-हज के लिए राहत की खबर है। करीब चार साल बाद मक्का मुकर्रमा स्थित ऐतिहासिक भोपाल रुबात में हज यात्रियों के ठहरने की सुविधा फिर बहाल हो गई है। हज 2027 के लिए रुबात में ठहरने वाले हाजियों का कुर्रा शनिवार, 17 अक्टूबर को सुबह 10 बजे मोती मस्जिद में निकाला जाएगा।

    औकाफ-ए-शाही, भोपाल की कार्यकारी-सह-सलाहकार कमेटी की बैठक में हज 2027 की तैयारियों की समीक्षा के बाद यह निर्णय लिया गया। कमेटी के अनुसार सऊदी सरकार के नए दिशा-निर्देशों और निर्धारित प्रक्रिया के तहत रुबात में हाजियों के ठहरने से संबंधित आवश्यक औपचारिकताएं और व्यवस्थाएं पूरी की जा रही हैं।

    रुबात की सुविधा बहाल होने की जानकारी अधिकारिक रूप से सिकंदर हाफिज ने वीडियो जारी कर भी दी।

    अफवाहों से दूर रहने की सलाह
    हाफिज ने बताया कि आजमीन-ए-हज को मुबारकबाद देते हुए कहा कि शहर में रुबात को लेकर कुछ लोगों द्वारा गलत अफवाहें फैलाई जा रही थीं, जबकि ऐसी कोई बात नहीं है। उन्होंने कहा कि मदीना मुनव्वरा की रुबात का मामला वहां की अदालत में है और जल्द ही इसके भी सुलझने की उम्मीद है।

    उन्होंने यह भी कहा कि जल्द ही वे भोपाल, सीहोर और रायसेन के लोगों को वहां निशुल्क ठहरने की व्यवस्था की जानकारी देंगे। वर्षभर मिले सुविधा हाजी इमरान रुबात खुलने के फैसले का स्वागत करते हुए कौमी खिदमतगार भोपाल के हाजी मोहम्मद इमरान हारून ने मांग की है कि वक्फ रुबात की सुविधा केवल हज के दिनों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

    सराहनीय पहल
    उन्होंने कहा कि उमरा सहित पूरे वर्ष मक्का-मदीना जाने वाले भोपाल के यात्रियों को भी पूर्व की तरह रुबात में ठहरने की सुविधा मिलनी चाहिए।

    हाजी इमरान हारून ने कहा कि भोपाल के हज यात्रियों और अन्य यात्रियों के लिए रुबात में लंबे समय से ठहरने की सुविधा पहले उपलब्ध रही है। करीब चार वर्ष बाद हज यात्रियों के लिए इसे दोबारा खोला जाना सराहनीय पहल है।

    औकाफ-ए-शाही ने जनता और हाजियों से अपील की है कि वे किसी भी तरह की अफवाहों पर ध्यान न दें। कमेटी ने कहा कि हाजियों की सुविधा और कल्याण के लिए हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं और सभी व्यवस्थाएं निर्धारित नियमों एवं प्रक्रिया के अनुसार पूरी की जा रही हैं।