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  • ईरान के दबाव में ट्रंप, दो हफ़्ते के सीजफायर पर हुआ समझौता

    ईरान के दबाव में ट्रंप, दो हफ़्ते के सीजफायर पर हुआ समझौता

    वाशिगटन / तेहरान 

    मिडिल-ईस्ट में पिछले एक महीने से ज्यादा वक्त से चल रही जंग अब थम सकती है.  अमेरिका और इजरायल के ईरान पर संयुक्त हमलों से शुरू हुई महाजंग में अब सीजफायर का ऐलान हो गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को जो डेडलाइन दी थी, उसके खत्म होने से ठीक पहले ही ट्रंप ने दो हफ्तों के लिए जंग रोकने की घोषणा कर दी। 

    धमकियों से अचानक पीछे हटते हुए, डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वह ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई रोक देंगे, जो कूटनीति के लिए एक संभावित मौके का संकेत है. सोशल मीडिया पोस्ट में ट्रंप ने कहा, "मैं दो हफ़्तों की के लिए ईरान पर बमबारी और हमले को रोकने पर सहमत हूं." उन्होंने कहा कि यह फ़ैसला पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर के साथ बातचीत के बाद लिया गया, जिन्होंने उनसे नियोजित हमलों को टालने का आग्रह किया था। 

    ईरान ने पाकिस्तान के दो हफ़्तों के युद्धविराम प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है. इस युद्धविराम को देश के नए सुप्रीम लीडर ने मंज़ूरी दे दी है. ईरान ने कहा कि अमेरिका के साथ बातचीत को जंग के खत्म होने का संकेत नहीं माना जाना चाहिए. 10-सूत्रीय प्रस्ताव में सभी प्राथमिक और माध्यमिक प्रतिबंधों को हटाने, पूरी तरह मुआवज़ा देने और ईरान की सभी ज़ब्त संपत्तियों को जारी करने की मांग की गई है। 

    वहीं, ईरान ने जंग रोकने के लिए 10-Points का प्रस्ताव भेजा है. ईरानी मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, तेहरान ने कहा कि वह युद्ध की समाप्ति को तभी स्वीकार करेगा. ईरान की मांगों को अंतिम रूप देने के लिए अमेरिका के साथ शुक्रवार, 10 अप्रैल को इस्लामाबाद में बातचीत होगी। 

    सीजफायर के बावजूद जारी तनाव
    हालांकि कागजों पर सीजफायर हो गया है, लेकिन जमीन पर हालात अब भी पूरी तरह शांत नहीं हैं। खाड़ी देशों और इजरायल में मिसाइल हमलों के अलर्ट जारी रहे। संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कुवैत और बहरीन जैसे देशों में एयर डिफेंस सिस्टम सक्रिय रहे। इससे साफ है कि क्षेत्र में खतरा अभी टला नहीं है और स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है।

    इजरायल और ईरान के बीच भी हमले पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। दोनों तरफ से जवाबी कार्रवाई जारी रहने की खबरें सामने आई हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि सीजफायर को पूरी तरह लागू होने में समय लग सकता है।

    स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बना सबसे बड़ा मुद्दा
    इस पूरे संघर्ष का सबसे बड़ा केंद्र स्ट्रेट ऑफ होर्मुज रहा है। दुनिया के बड़े हिस्से में तेल और गैस की सप्लाई इसी रास्ते से होती है। ईरान ने इस जलमार्ग पर नियंत्रण कड़ा कर दिया था, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा।

    इसी दबाव के चलते अमेरिका और उसके सहयोगियों ने सीजफायर की दिशा में कदम बढ़ाया। सीजफायर के तहत दो हफ्तों के लिए इस स्ट्रेट को खोलने पर सहमति बनी है। हालांकि यह पूरी तरह खुला रहेगा या सीमित नियंत्रण में, इस पर अभी स्पष्टता नहीं है।

    आर्थिक असर और अंतरराष्ट्रीय दबाव
    सीजफायर की घोषणा के बाद वैश्विक बाजारों में सकारात्मक असर देखा गया। अमेरिका के तेल की कीमतों में 17 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आई, जबकि जापान और दक्षिण कोरिया के शेयर बाजारों में तेजी रही।

     

    आइए जानते हैं अब तक के बड़े अपडेट क्या हैं-  

    1- ट्रंप ने ईरान की ओर से पेश किए गए 10 सूत्रीय शांति प्रस्ताव को व्यावहारिक बताया. उन्होंने कहा कि अमेरिका ईरान के पावर प्लांट, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचों को निशाना बनाने से परहेज करेगा. मिडिल ईस्ट में शांति स्थापित करने के लिए वाशिंगटन और तेहरान के बीच 10 अप्रैल को इस्लामाबाद में मीटिंग होगी। 

    2- कूटनीतिक प्रयासों में तेजी आने के बावजूद जमीनी स्तर पर अनिश्चितता और हिंसा जारी रही. ईरान ने सीजफायर समझौते को स्वीकार कर लिया है, लेकिन खाड़ी क्षेत्र में हमलों की आशंका बनी रही. व्हाइट हाउस की ओर से सीजफायर पर सहमति जताए जाने के बावजूद, इज़रायली सेना ने ईरान पर हमले जारी रखे। 

    3- ट्रंप ने ऐलान करते हुए कहा, 'मैं आज रात ईरान पर भेजे जा रहे विनाशकारी बल को रोक रहा हूं और अगर इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह, तुरंत और सुरक्षित रूप से खोलने पर सहमत होता है तो मैं दो सप्ताह की अवधि के लिए ईरान पर बमबारी और हमले को निलंबित करने पर सहमत हूं। 

    4- ईरान ने कहा, 'अगर उस पर हमले रोक दिए जाते हैं तो हमारी शक्तिशाली सशस्त्र सेनाएं अपने रक्षात्मक अभियान बंद कर देंगी.' ईरान ने यह भी कहा कि वह अमेरिका के 15 सूत्रीय प्रस्ताव पर आधारित वार्ता के अनुरोध पर विचार कर रहा है. साथ ही वाशिंगटन द्वारा ईरान की 10 सूत्रीय योजना को वार्ता के ढांचे के रूप में स्वीकार करने पर भी विचार कर रहा है। 

    5- तेहरान ने आगे कहा कि दो सप्ताह की अवधि के लिए, ईरान के सशस्त्र बलों के समन्वय और तकनीकी सीमाओं को ध्यान में रखते हुए होर्मुज स्ट्रेट से सुरक्षित आवागमन संभव होगा। 

    6- ईरान ने इसे तेहरान की जीत बताया और उसकी सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने कहा कि ट्रंप ने शत्रुता समाप्त करने के लिए ईरान की शर्तें मान ली हैं. हालांकि, व्हाइट हाउस ने जवाब दिया कि वास्तविकता यह है कि राष्ट्रपति ट्रंप और अमेरिकी सेना ने ईरान को होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने के लिए मजबूर किया था। 

    7- व्हाइट हाउस के अधिकारियों ने पुष्टि की है कि इज़राइल ईरान के खिलाफ बमबारी अभियान को रोकने पर सहमत हो गया है. हालांकि, इजरायली सैन्य अधिकारियों ने कहा कि देश अभी भी हमले कर रहा है. तेल अवीव की ओर से औपचारिक बयान का इंतजार है। 

    8- ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर का ऐलान हो चुका है, इसके बावजूद सऊदी अरब, बहरीन और कुवैत सहित खाड़ी क्षेत्र में मिसाइल अलर्ट जारी किए गए। 

    9- खबरों के मुताबिक, ईरान की दीर्घकालिक शांति योजना में ओमान के साथ समन्वय में होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों पर टैक्स लगाना शामिल है. तेहरान का कहना है कि इस राजस्व का उपयोग पुनर्निर्माण के लिए किया जाएगा. इसके अलावा युद्ध समाप्त करने के लिए ईरान की शर्तों में क्षेत्र से अमेरिकी लड़ाकू बलों की वापसी, प्रतिबंधों को हटाना और उसकी जब्त संपत्तियों को जारी करना शामिल है। 

    10- पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा कि युद्धविराम में इजरायल और हिजबुल्लाह से लेबनान में लड़ाई रोकने की भी मांग की गई है. उन्होंने ईरान और अमेरिका के डेलीगेशन को शुक्रवार को इस्लामाबाद में मिलने का निमंत्रण दिया है और स्थायी शांति और आने वाले दिनों में और अच्छी खबरें मिलने की कामना की है। 

     

  • 24 घंटे की बुरी घटना: ईरान जंग में US के 2 फाइटर जेट और 2 चॉपर क्रैश, पायलट लापता

    24 घंटे की बुरी घटना: ईरान जंग में US के 2 फाइटर जेट और 2 चॉपर क्रैश, पायलट लापता

    वाशिंगटन

    पिछले पांच हफ्तों से जारी ईरान-अमेरिका युद्ध अब अपने सबसे खतरनाक और अनिश्चित दौर में पहुंच गया है. पिछले 24 घंटों के भीतर ईरान ने दो अमेरिकी लड़ाकू विमानों को मार गिराया है, जबकि बचाव अभियान में लगे दो ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर भी ईरानी हमले की चपेट में आ गए हैं। 

    ईरानी मीडिया की तरफ से कुछ तस्वीरें जारी की गई हैं और दावा किया गया है कि कुवैत स्थित 'कैंप बुहरिंग' पर हुए ईरानी हमलों में अमेरिकी सेना का एक 'बोइंग CH-47 चिनूक' भारी-भरकम हेलीकॉप्टर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया है। 

    28 फरवरी से शुरू हुई जंग के बाद  यह पहली बार है जब अमेरिकी विमानों को इस तरह नुकसान पहुंचा है. जिसने वाशिंगटन के ‘एयर सुपीरियरिटी’ के दावों को कड़ी चुनौती दी है.  जानकारी के मुताबिक, एक अमेरिकी F-15E लड़ाकू विमान ईरान के भीतर सैन्य अभियान के दौरान क्रैश हो गया. इस विमान में दो क्रू मेंबर सवार थे, जिनमें से एक को बचा लिया गया, जबकि दूसरा अब भी लापता है और उसके ईरान में कहीं छिपे होने की आशंका है। 

    कुवैत में भी प्लेन क्रैश
    एक अन्य घटना में, कुवैत के ऊपर उड़ान भर रहे अमेरिकी A-10 वारथॉग अटैक एयरक्राफ्ट को निशाना बनाया गया, जो दुर्घटनाग्रस्त हो गया. हालांकि, इसका पायलट सुरक्षित रूप से बाहर निकलने में सफल रहा। 

    लापता पायलट को खोजने के लिए भेजे गए दो ब्लैक हॉक (Black Hawk) हेलीकॉप्टरों पर भी ईरान ने भारी गोलीबारी की जिसके बाद वे किसी तरह सुरक्षित बाहर निकलने में सफल रहे. लगातार दो विमानों के नुकसान को इस युद्ध में अमेरिकी सेना के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। 

    अमेरिकी सेना के लिए मुश्किल भरे रहे पिछले 24 घंटे 
        F-15E स्ट्राइक ईगल:
    ईरान की सीमा के भीतर एक F-15E स्ट्राइक ईगल को मार गिराया गया है. विमान में सवार दो क्रू मेंबर्स में से एक को सुरक्षित बचा लिया गया है, लेकिन दूसरा अभी भी लापता है. लापता क्रू मेंबर की तलाश में हाई-स्टेक रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है। 

        A-10 वारथॉग: दो A-10 वारथॉग विमानों को निशाना बनाया गया. इनमें से एक फारस की खाड़ी में क्रैश हो गया (पायलट सुरक्षित), जबकि दूसरे ने एक इंजन खराब होने के बावजूद इमरजेंसी लैंडिंग की। 

        रेस्क्यू  हेलीकॉप्टरों पर अटैक: लापता पायलट को खोजने निकले दो HH-60W जॉली ग्रीन II रेस्क्यू हेलीकॉप्टर भी ईरानी गोलाबारी की चपेट में आ गए. हालांकि क्रू सुरक्षित है, लेकिन कुछ जवान घायल हुए हैं। 

        इमरजेंसी लैंडिंग: एक F-16 फाइटर जेट और दो KC-135 टैंकर विमानों को भी तकनीकी खराबी या हमले के बाद इमरजेंसी घोषित कर सुरक्षित लैंडिंग करनी पड़ी। 

    ईरान का 'पायलट हंट' 
    ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने दक्षिण-पश्चिम इलाके में लापता अमेरिकी पायलट की तलाश के लिए बड़ा सर्च ऑपरेशन शुरू किया है. ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बागेर गलिबाफ ने इसे जंग का टर्निंग पॉइंट बताते हुए कहा कि अब लड़ाई 'सत्ता परिवर्तन' से हटकर 'अमेरिकी पायलटों की तलाश' पर केंद्रित हो गई है। 

    ईरानी अधिकारियों ने अपने नागरिकों से पायलट की सूचना देने या उसे पकड़ने का आग्रह किया है और एक क्षेत्रीय अधिकारी ने 'शत्रु की सेनाओं' को पकड़ने या मारने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए बड़ा इनाम देने की भी घोषणा की है। 

    ट्रंप बोले- यह जंग है, होता रहता है
    राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन घटनाओं को बहुत अधिक महत्व न देते हुए कहा, 'यह जंग है और ऐसा होता रहता है.' उन्होंने संकेत दिया कि इन नुकसानों से ईरान के साथ चल रही बातचीत पर कोई असर नहीं पड़ेगा. हालांकि, सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटनाक्रम ट्रंप के उन दावों के विपरीत है जिनमें उन्होंने कहा था कि अमेरिका ने ईरान के हवाई क्षेत्र पर पूरी तरह नियंत्रण कर लिया है। 

    सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर एयर डिफेंस सिस्टम भी मोबाइल मिसाइल और ग्राउंड फायर के जरिए खतरा पैदा कर सकते हैं. हाल ही में ट्रंप ने दावा किया था कि अमेरिकी विमान तेहरान के ऊपर उड़ान भर रहे हैं और ईरान कुछ नहीं कर पा रहा, लेकिन दो विमानों के गिरने की घटना ने इन दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। 

    फिलहाल जंग थमने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं और इसका असर पूरे मध्य-पूर्व पर पड़ रहा है. ईरान ने इस्लामाबाद में अमेरिकी अधिकारियों के साथ बातचीत फिर से शुरू करने के प्रयासों को खारिज कर दिया है, जिससे पाकिस्तान के नेतृत्व में चल रहे सीजफायर की कोशिशों को झटका लगा है. वहीं कुवैत के ऊर्जा ठिकानों पर हमले और तेल की कीमतों में उछाल ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की चिंता बढ़ा दी है। 

  • फार्मा सेक्टर को ट्रंप की 100% टैरिफ धमकी, जंग के बावजूद भारत पर असर संभव

    फार्मा सेक्टर को ट्रंप की 100% टैरिफ धमकी, जंग के बावजूद भारत पर असर संभव

    नई दिल्ली

    ईरान-अमेरिका जंग के बीच ट्रंप सरकार कुछ दवा कंपनियों पर टैरिफ लगाने के बारे में सोच रही है. अगर ये कंपन‍िया ट्रंप सरकार की शर्त नहीं मानती हैं, तो उन्‍हें 100 फीसदी तक टैरिफ का सामना करना पड़ सकता है. खासकर उन कंपनियों पर, जो अमेरिका में अपनी दवाएं इम्‍पोर्ट करती हैं. इसका मतलब है कि भारत से भी अमेरिका भेजे जाने वाले दवाओं पर इसका असर पड़ सकता है। 

    ब्‍लूमबर्ग के मुताबिक, अगर दवा निर्माता कंपनियां अमेरिका में कम कीमतों की गारंटी देने वाले समझौतों पर नहीं पहुंच पाती हैं, तो ट्रंप प्रशासन गुरुवार को ही उन पर टैरिफ लगाने का ऐलान कर सकता है. ब्लूमबर्ग ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि आयातित ब्रांडेड और पेटेंट दवाओं पर ये शुल्क 100 प्रतिशत तक लागू हो सकता है. यह पहल व्यापार विस्तार अधिनियम की धारा 232 के तहत की गई जांच के बाद की गई है। 

    अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के एक बयान ने भारतीय शेयर बाजार के फार्मा सेक्टर में हलचल मचा दी. ट्रंप ने संकेत दिया है कि अमेरिका में आने वाली ब्रांडेड और पेटेंट वाली दवाओं पर 100% तक टैरिफ लगाया जा सकता है. इस खबर के सामने आते ही निवेशकों में घबराहट दिखी और कई दवा कंपनियों के शेयरों में तेज गिरावट दर्ज की गई. सबसे ज्यादा असर Sun Pharmaceutical Industries पर देखा गया, जिसके शेयर करीब 4-5% तक टूटकर 52 हफ्तों के निचले स्तर के करीब पहुंच गए. वहीं, Divi’s Laboratories, Biocon, Lupin, Dr. Reddy’s Laboratories, Cipla और Zydus Lifesciences जैसे बड़े नामों में भी 2 से 4% तक की गिरावट देखने को मिली. निफ्टी फार्मा इंडेक्स भी करीब 2.5% नीचे फिसल गया। 

    Bloomberg की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप का कहना है कि अगर विदेशी दवा कंपनियां अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग नहीं करतीं, तो उनकी दवाओं पर भारी टैक्स लगाया जाएगा. उनका फोकस “मेड इन अमेरिका” को बढ़ावा देना और घरेलू रोजगार बढ़ाना है. यही वजह है कि इस तरह के टैरिफ को ट्रंप लगाने की तैयारी कर रहे है. हालांकि, एक्सपर्ट्स मानते हैं कि फिलहाल बाजार में जो गिरावट दिखी है, वह ज्यादा सेंटिमेंट आधारित है. भारत से अमेरिका को जो दवाएं भेजी जाती हैं, उनमें ज्यादातर हिस्सा जेनरिक दवाओं का होती है. ये सस्ती दवाएं होती हैं और अभी तक टैरिफ का फोकस ब्रांडेड और पेटेंट दवाओं पर ही है. इसलिए सीधे तौर पर सभी कंपनियों पर बड़ा असर पड़ने की संभावना कम मानी जा रही है। 

    किन फार्मा कंपनियों पर सबसे ज्यादा असर?
    फिर भी कुछ कंपनियां ज्यादा प्रभावित दिखीं. जैसे सन फार्मा अमेरिका में कुछ स्पेशलिटी और ब्रांडेड दवाएं भी बेचती है. इसी वजह से उसके शेयरों पर दबाव ज्यादा रहा. वहीं Divi’s Laboratories और Laurus Labs जैसी कंपनियां API (एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट्स) बनाती हैं, जिनका निर्यात अमेरिका और यूरोप में होता है, इसलिए उनमें भी हल्की कमजोरी दिखी। 

    जेनरिक दवाओं का हिस्सा 90% से ज्यादा
    हालांकि, एक पॉजिटिव पहलू यह भी है कि कई भारतीय कंपनियां पहले से ही अमेरिका में निवेश कर रही हैं. Biocon ने हाल ही में न्यू जर्सी में अपनी यूनिट शुरू की है. ऐसे में जिन कंपनियों का लोकल प्रेजेंस है, उन पर टैरिफ का असर सीमित रह सकता है. भारत हर साल अमेरिका को करीब 10.5 अरब डॉलर की दवाएं निर्यात करता है, जिसमें 90% से ज्यादा हिस्सा जेनरिक दवाओं का होता है. बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि अभी निवेशकों को घबराने की जरूरत नहीं है. यह गिरावट कम समय के लिए भी हो सकती है. अगर कंपनियां अमेरिका में अपनी मौजूदगी बढ़ाती हैं और स्ट्रैटजी में बदलाव करती हैं, तो भविष्य में इसका फायदा भी मिल सकता है। 

    ट्रंप का यह बयान बाजार के लिए एक झटका जरूर है, लेकिन भारतीय फार्मा सेक्टर की बुनियादी मजबूती अभी भी बरकरार है. आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि टैरिफ नीति किस हद तक लागू होती है और कंपनियां इसके अनुसार खुद को कैसे ढालती हैं। 

  • ईरान वॉर को जल्दी खत्म करो, ट्रंप ने अपने सहयोगियों को दिया फाइनल ऑर्डर

    ईरान वॉर को जल्दी खत्म करो, ट्रंप ने अपने सहयोगियों को दिया फाइनल ऑर्डर

    वाशिंगटन

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सहयोगियों से कहा है कि वह ईरान के साथ जारी युद्ध को लंबा नहीं खींचना चाहते और आने वाले कुछ हफ्तों में इसे खत्म करने की कोशिश में हैं. ट्रंप आने वाले कुछ हफ्तों में इस संघर्ष पर पूर्णविराम लगाना चाहते हैं ताकि वे अपने अन्य घरेलू और राजनीतिक एजेंडों पर ध्यान केंद्रित कर सकें। 

    Wall Street Journal की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप का मानना है कि युद्ध अपने अंतिम चरण में है और उन्होंने अपने सहयोगियों को सार्वजनिक रूप से बताए गए 4-6 हफ्तों के टाइमलाइन पर टिके रहने के निर्देश दिए हैं. व्हाइट हाउस के अधिकारियों ने मई के मध्य में चीनी नेता शी जिनपिंग के साथ बीजिंग में एक शिखर सम्मेलन की योजना बनाई है. उम्मीद की जा रही है कि इस बैठक के शुरू होने से पहले ईरान युद्ध समाप्त हो जाएगा। 

    समस्या यह है कि ट्रंप के पास युद्ध समाप्त करने के आसान विकल्प नहीं हैं और शांति वार्ता अभी शुरुआती चरण में है. बाहरी राजनीतिक सहयोगियों के साथ बातचीत के दौरान उनका ध्यान कई बार अन्य मुद्दों पर भी गया, जिनमें आने वाले मध्यावधि चुनाव, हवाई अड्डों पर इमिग्रेशन एजेंट भेजने का उनका फैसला और मतदाता पात्रता नियमों को कड़ा करने वाले कानून को कांग्रेस से पारित कराने की रणनीतियां शामिल हैं। 

    एक ओर तो ट्रंप युद्ध खत्म करने के लिए कूटनीतिक रास्ते तलाश रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अमेरिका ने मध्यपूर्व में अतिरिक्त सैनिक तैनात कर दबाव भी बढ़ाया है. मध्यस्थ देशों के जरिए शुरुआती बातचीत शुरू हुई है, लेकिन अभी शांति वार्ता शुरुआती दौर में ही है और कोई ठोस समझौता नहीं हुआ है।  

    तेल और रणनीति
    रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने अपने सलाहकारों के सामने ये बात रखी कि युद्ध खत्म करने के किसी समझौते के तहत अमेरिका को ईरान के तेल तक पहुंच मिल सकती है. हालांकि, इस पर अभी कोई ठोस योजना नहीं बनी है। 

    ट्रंप जमीनी स्तर पर अमेरिकी सैनिक भेजने के विकल्प को पूरी तरह खारिज नहीं कर रहे हैं, लेकिन इससे युद्ध लंबा खिंच सकता है, जिसे वह टालना चाहते हैं. अब तक लगभग 300 अमेरिकी सैनिक घायल और 13 की मौत हो चुकी है, जो उनकी चिंता का एक बड़ा कारण है.ट्रंप के करीबी सहयोगियों में इस बात को लेकर मतभेद है कि आगे क्या रणनीति होनी चाहिए. कुछ लोग कूटनीतिक समाधान चाहते हैं, जबकि कुछ सख्त सैन्य कार्रवाई और यहां तक कि ईरान में शासन परिवर्तन की बात कर रहे हैं। 

    अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, ट्रंप ईरान की जमीन पर अमेरिकी सैनिक भेजने का आदेश देने को तैयार हैं, लेकिन ऐसा करने से हिचक रहे हैं क्योंकि इससे युद्ध जल्दी खत्म करने का उनका लक्ष्य प्रभावित हो सकता है. उन्हें चिंता है कि यदि युद्ध जारी रहा तो अमेरिकी सैनिकों के मारे जाने या घायल होने की संख्या बढ़ सकती है. अब तक लगभग 300 अमेरिकी सैनिक घायल हुए हैं और 13 की मौत हो चुकी है। 

    वैश्विक असर और जोखिम
    यदि जल्द समझौता नहीं होता, तो होर्मुज में रुकावट जारी रह सकती है, जिससे वैश्विक तेल बाजार प्रभावित होगा. वहीं इजरायल और खाड़ी देशों की भूमिका भी इस संघर्ष को और जटिल बना सकती है। 

    इस युद्ध का असर अमेरिकी राजनीति पर भी दिख रहा है. आगामी चुनावों और बढ़ती महंगाई के बीच ट्रंप पर दबाव है. अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी के लिए राजनीतिक स्थिति चुनौतीपूर्ण होती जा रही है. हाल ही में फ्लोरिडा की एक महत्वपूर्ण सीट डेमोक्रेट्स के खाते में जाने से हड़कंप मचा है. विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध के कारण बढ़ी महंगाई और जीवनयापन की लागत आगामी चुनावों में ट्रंप की पार्टी के लिए बड़ी मुसीबत बन सकती है। 

    रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप खुद भी मानते हैं कि युद्ध उनके अन्य एजेंडे से ध्यान भटका रहा है. व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने चेतावनी दी है कि अगर तेहरान समझौते के लिए आगे नहीं बढ़ता, तो अमेरिका पहले से भी ज्यादा कड़ा हमला कर सकता है। 

  • ट्रंप की 15 शर्तें: ईरान से जंग खत्म करने के लिए एक महीने का सीजफायर, नो न्यूक्लियर और होर्मुज

    ट्रंप की 15 शर्तें: ईरान से जंग खत्म करने के लिए एक महीने का सीजफायर, नो न्यूक्लियर और होर्मुज

    वाशिंगटन

    इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला करने के करीब 25 दिन बाद अमेरिका अब सीजफायर की उम्मीद कर रहा है। बीते दिनों ईरान युद्ध में जीत का दावा करने वाले ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि ईरान के साथ उनकी बातचीत जारी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप सरकार ने समझौते के लिए ईरान को एक 15-सूत्रीय युद्धविराम योजना की पेशकश की है, जिसमें युद्ध में एक महीने का सीजफायर का जिक्र है। इस घटनाक्रम से अवगत एक अधिकारी ने यह जानकारी दी है।

    अधिकारी ने अपनी पहचान गोपनीय रखे जाने की शर्त पर बताया कि युद्धविराम योजना पाकिस्तान के मध्यस्थों के जरिए ईरान को सौंपी गई। बता दें कि इससे पहले पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में मध्यस्थता की पेशकश की थी। इसके बाद ट्रंप ने भी इसे हरी झंडी दे दी है और कहा है कि ईरानी नेतृत्व के ‘अच्छे लोगों’ के साथ उनकी बातचीत जारी है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने मंगलवार को अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि 15-सूत्रीय योजना ईरानी अधिकारियों को सौंप दी गई है।

    ट्रंप की योजना में क्या?
    हालांकि पूरा दस्तावेज अभी आधिकारिक तौर पर जारी नहीं किया गया है, लेकिन कई रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई है कि इस 15-सूत्रीय योजना का ढांचा तीन बड़ी मांगों पर आधारित है। इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने की मांग की गई है। ट्रंप कई मौकों पर यह कह चुके हैं कि ईरान को अपनी परमाणु क्षमताओं को खत्म करना होगा। इसमें यूरेनियम संवर्धन को पूरी तरह रोकना, नतान्ज, फ़ोर्डो और इस्फहान जैसी अहम सुविधाओं को बंद करना और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण की अनुमति देना शामिल है।

    प्रॉक्सी मॉडल को छोड़ने की बात भी
    इसके अलावा अमेरिका चाहता है कि ईरान अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों की मारक क्षमता और संख्या को सीमित करे। यह मांग ईरान की प्रतिरोधक क्षमता को निशाना बनाती है, ना कि सिर्फ उसकी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को। एक और बड़ी मांग यह है कि ईरान हिजबुल्लाह और हूती जैसे क्षेत्रीय गुटों को पैसे देना और हथियार मुहैया कराना बंद करे और पूरे मिडिल ईस्ट में अपने प्रॉक्सी मॉडल को छोड़ दे। इसके अलावा प्लान में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खुला रखने, और सीजफायर की समय-सीमा तय करने की बात भी है। वहीं इन सब के बदले अमेरिका ईरान को प्रतिबंधों में पूरी तरह राहत दे सकता है।

    USA के कदम से इजरायल हैरान
    उधर, अमेरिका के इस अचानक सीजफायर प्रस्ताव ने इजरायली अधिकारियों को हैरान कर दिया है जो युद्ध जारी रखने के पक्ष में थे. दूसरी ओर, कूटनीतिक कोशिशों के बावजूद पेंटागन क्षेत्र में 3,000 अतिरिक्त सैनिक तैनात कर रहा है. वर्तमान में मिडिल ईस्ट में लगभग 50,000 अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं. ईरान ने पहले ही चेतावनी दी है कि यदि सैन्य गतिविधियां बढ़ीं, तो वह खाड़ी में समुद्री बारूद (नेवल माइंस) बिछा सकता है। 
    नया नहीं है पीस प्लान
    विशेषज्ञों का कहना है कि ये 15-सूत्रीय ढांचा पूरी तरह नया नहीं है, बल्कि मई 2025 के उस प्रस्ताव पर आधारित है जो इजरायली हमलों के बाद विफल हो गया था. पहले की योजना में कथित तौर पर व्यापक शर्तें लगाई गई थीं, जिनमें ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों पर सख्त सीमाएं लगाना, यूरेनियम भंडार को बाहर भेजना, संवर्धन सुविधाओं को निष्क्रिय करना और प्रतिबंध राहत निधि के इस्तेमाल को प्रतिबंधित करना शामिल था, जबकि केवल आंशिक प्रतिबंधों में ढील और संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में एक नागरिक परमाणु कार्यक्रम की पेशकश की गई थी। 

    इस बात को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है कि क्या ये प्रस्ताव औपचारिक रूप से ईरान को प्रस्तुत किया गया है. कुछ राजनयिकों को शक है कि कोई ठोस नया प्रस्ताव मौजूद भी है या नहीं और यदि है भी, तो संभवत इसे अभी तक तेहरान के साथ साझा नहीं किया गया है। 

    वहीं, ट्रंप ने दावा किया कि पिछले दो दिनों में हुई बहुत अच्छी और सार्थक बातचीत से ईरान के साथ प्रगति हुई है. हालांकि, तेहरान ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि बातचीत को फिर से शुरू करने के बारे में सीमित अप्रत्यक्ष संपर्कों के अलावा कोई गुप्त वार्ता नहीं हुई है। 

    विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप इस युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता (ऑफ-रैंप) तलाश रहे हैं. हालांकि, दोनों देशों के बीच गहरे अविश्वास और ईरान के अंदर वार्ता के अधिकार को लेकर अनिश्चितता इस शांति प्रक्रिया में बड़ी बाधा है। 

    मानेगा ईरान?
    ईरान ने अब तक अमेरिका के साथ बातचीत की संभावना को खारिज ही किया है। ऐसे में इसकी बेहद कम संभावना है कि ईरान ट्रंप की इन मांगों को समर्थन देगा। इसकी वजह यह है कि यह प्रस्ताव किसी नई शांति पहल से ज्यादा, पहले नाकाम हो चुकी परमाणु वार्ताओं का ही एक नया रूप लगता है। ईरान का तर्क है कि पिछली बार बातचीत के बीच ही अमेरिका ने हमला कर दिया, जिससे नई गारंटियों पर विश्वास करना मुश्किल हो जाता है।

  • जंग खत्म करेंगे, लेकिन… – ईरान का अमेरिका को दो शर्तों के साथ सीधा जवाब, 9 अप्रैल तक खत्म हो सकता है युद्ध!

    जंग खत्म करेंगे, लेकिन… – ईरान का अमेरिका को दो शर्तों के साथ सीधा जवाब, 9 अप्रैल तक खत्म हो सकता है युद्ध!

    वाशिंगटन/ तेहरान 

    अमेरिका अब ईरान जंग खत्म करने को रेडी है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने का दावा है कि कि ईरान अब युद्ध नहीं लड़ना चाहता. वह समझौता करना चाहता है. उनकी मानें तो अमेरिका सीजफायर को लेकर ईरानी नेता के साथ बातचीत कर रहा है. डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि ईरान के साथ प्रोडक्टिव बातचीत हो रही है. वहीं ईरान ने ट्रंप के दावों को फेक ही बता दिया है. ईरान का कहना है कि मार्केट को मेनुपुलेट करने के लिए ट्रंप ईरान जंग पर ऐसा दावा कर रहे हैं. अब सवाल है कि क्या सच में ईरान जंग खत्म करने को तैयार नहीं हैं? वह भी तब जब उसके सारे टॉप लीडर्स मारे जा चुके हैं. अब ईरान ने भी अपनी मंशा जाहिर कर दी है. ईरान ने ट्रंप को सीधा जवाब दिया है कि वह भी युद्ध खत्म करने को तैयार है, मगर उसकी कुछ शर्तें हैं। 

    जी हां, ईरान भी अमेरिका और इजरायल संग युद्ध खत्म करना चाहता है. मगर वह ऐसे ही जंग खत्म नहीं करना चाहता. उसकी कुछ शर्तें हैं. ईरान का कहना है कि युद्ध तब तक जारी रहेगा जब तक सभी प्रतिबंध हटा नहीं दिए जाते और अमेरिका द्वारा युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई नहीं कर दी जाती. जी हां, ईरान अब अमेरिका से युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई चाहता है. साथ ही वह अपने ऊपर लगे सारे सैंक्शन्स हटवाना चाहता है. ये दोनों चीजें अमेरिका मान लेता है तो फिर ईरान इस युद्ध को आगे नहीं बढ़ाएगा और डोनाल्ड ट्रंप की बात मान लेगा। 

    क्या मानेंगे डोनाल्ड ट्रंप?
    मगर सवाल है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप ईरान की इन शर्तों को मानेंगे? दरअसल, ईरान के एक सीनियर अधिकारी का कहना है कि युद्ध का अंत ईरान के हाथ में है. ईरान इसे तभी समाप्त मानेगा जब अमेरिका से पूर्ण मुआवजा मिले और भविष्य में हस्तक्षेप न करने की गारंटी हो. यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने युद्ध को ‘समाप्त करने की दिशा में’ विचार करने की बात कही थी. ट्रंप प्रशासन ने तेल की कीमतों में भारी उछाल को नियंत्रित करने के लिए ईरानी तेल पर कुछ प्रतिबंध अस्थायी रूप से हटाए हैं, जिससे लगभग 140 मिलियन बैरल तेल बाजार में आ सकता है. लेकिन ईरान इसे अपनी जीत के रूप में देख रहा है और अपनी शर्तों पर अड़ा हुआ है। 

    ईरानी विदेश मंत्री ने क्या कहा?
    ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी दोहराया कि युद्ध अमेरिका द्वारा शुरू किया गया था और इसके सभी परिणामों के लिए वाशिंगटन जिम्मेदार है. उन्होंने मुआवजे, क्षेत्र से अमेरिकी सैन्य अड्डों की वापसी और भविष्य में हमलों की गारंटी की मांग की है. ईरान का कहना है कि बिना इन शर्तों के कोई युद्धविराम स्वीकार नहीं किया जाएगा। 

    ट्रंप का क्या दावा?
    वहीं, डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को उस ईरानी नेता का नाम बताने से इनकार कर दिया, जिसके साथ अमेरिका तीन सप्ताह से जारी युद्ध को समाप्त करने के लिए बातचीत कर रहा है. ट्रंप ने कहा कि वार्ताकार एक ‘शीर्ष व्यक्ति’ है, जो उस देश में ‘सबसे सम्मानित’ है. खबरों के मुताबिक, ईरान ने अमेरिका के साथ बातचीत होने से इनकार किया है, लेकिन यह स्वीकार किया है कि क्षेत्र के कुछ देश तनाव कम करने के प्रयास कर रहे हैं। 

    व्हाइट हाउस का जवाब
    इधर, समाचार एजेंसी ANI ने व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट से संपर्क किया और पूछा कि क्या अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस शांति मिशन के लिए अमेरिका के विशेष राष्ट्रपति दूत स्टीव विटकॉफ, और व्यवसायी व अमेरिका के राष्ट्रपति के पूर्व वरिष्ठ सलाहकार जेरेड कुशनर इस सप्ताह इस्लामाबाद में ईरानी अधिकारियों से मुलाकात करेंगे? इस पर व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने जवाब दिया, ‘ये संवेदनशील कूटनीतिक चर्चाएं हैं और अमेरिका प्रेस के माध्यम से बातचीत नहीं करेगा. यह एक बदलती हुई स्थिति है और मुलाकातों के बारे में की जा रही अटकलों को तब तक अंतिम नहीं माना जाना चाहिए जब तक कि व्हाइट हाउस द्वारा उनकी औपचारिक घोषणा न कर दी जाए। 

    9 अप्रैल तक खत्म हो जाएगा युद्ध?

     मध्य पूर्व में जारी युद्ध को लेकर एक नई और दिलचस्प जानकारी सामने आ रही है. इजराइली मीडिया आउटलेट वाईनेट ने एक अधिकारी के हवाले से दावा किया है कि अमेरिका ईरान के साथ चल रहे युद्ध को अप्रैल महीने की 9 तारीख तक खत्म करने की योजना बना रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने 9 अप्रैल को युद्ध समाप्त करने की संभावित तारीख तय की है. अगर सब कुछ प्लान के मुताबिक ही चलता है तो इसका मतलब है कि लड़ाई और बातचीत में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है। 

    रिपोर्ट ये भी कहती है कि ईरान और अमेरिका के बीच वार्ता इसी हफ्ते के अंत में पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हो सकती है. इसे लेकर न्यूज एजेंसी रॉयटर्स ने भी जानकारी दी है कि दोनों पक्षों में बात के लिए इस्लामाबाद को चुना जा सकता है. हालांकि इजरायली रिपोर्ट में ये भी कहा है कि डोनाल्ड ट्रंप को इजरायल डे के मौके पर नेतन्याहू सम्मानित करने का वादा कर चुके हैं. अगर तब तक ये युद्ध रुका नहीं, तो ये सम्मान समारोह भी टल जाएगा और ट्रंप ऐसा बिल्कुल नहीं चाहते। 

    क्यों 9 अप्रैल तक खत्म होगा युद्ध?
    दरअसल दिसंबर, 2025 के अंत में इजराइल
    के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार न मिलने के बाद एक विशेष सम्मान देने का वादा किया था. यदि 9 अप्रैल तक युद्ध खत्म होता है, तो यह ट्रंप के लिए इजराइल के स्वतंत्रता दिवस यानि 21-22 अप्रैल के दौरान वहां यात्रा करने और इजराइल प्राइज लेने का मौका देगा. ये देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इसके बाद भी आने वाले तीन हफ्तों के लिए आगे की योजनाएं बनाई जा रही हैं। 

    इजरायल-अमेरिका के बीच बात भी नहीं?
    इजराइल डिफेंस फोर्स के प्रवक्ता एफी डेफ्रिन ने कहा कि उनकी सेना ईरान के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई यहूदी त्योहार पासओवर तक जारी रखेगी, जो इस साल 1 से 8 अप्रैल के बीच पड़ रहा है. उन्होंने यह भी बताया कि अमेरिका ने ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बघेरी के साथ अपने संपर्कों की जानकारी इजराइल को नहीं दी थी. एक इंटरव्यू में यह भी कहा गया कि गालिबाफ अमेरिका के साथ बातचीत की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। 

    अब तक युद्ध में क्या-क्या हुआ?
        यह युद्ध 28 फरवरी को शुरू हुआ था. शुरुआत में डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि यह संघर्ष लगभग एक महीने तक चल सकता है, लेकिन 11 मार्च को उन्होंने कहा कि यह किसी भी समय खत्म हो सकता है। 

        23 मार्च को ट्रंप ने घोषणा की थी कि अमेरिका पांच दिनों तक ईरान के ऊर्जा क्षेत्र पर हमला नहीं करेगा और तेहरान के साथ बातचीत की बात कही थी. हालांकि, ईरान ने इस तरह की किसी भी बातचीत से इनकार किया है। 

        इससे पहले अमेरिका ने ईरान को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलने का अल्टीमेटम दिया था और चेतावनी दी थी कि ऐसा न करने पर उसके पावर प्लांट्स पर हमला किया जाएगा. इसके जवाब में ईरान ने कहा था कि अगर ऐसा हुआ तो वह पूरे मध्य पूर्व में ऊर्जा, आईटी और पानी शुद्धिकरण से जुड़े ढांचों को निशाना बनाएगा। 

        दुनिया की लगभग 20% ऑयल एंड एलएनजी सप्लाई होर्मुज से होकर गुजरती है. इस संघर्ष का असर यूक्रेन समेत अन्य देशों पर भी पड़ा है. रिपोर्ट के अनुसार इससे ईंधन की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है और आगे गैस की कीमतों तथा सप्लाई पर भी असर पड़ सकता है। 

     

  • 48 घंटे का अल्टीमेटम खत्म, दुनिया की नजर—क्या ईरान पर बड़ा हमला करेगा अमेरिका?

    48 घंटे का अल्टीमेटम खत्म, दुनिया की नजर—क्या ईरान पर बड़ा हमला करेगा अमेरिका?

    ईरान
    ईरान-इजरायल युद्ध के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के मेसेज से पूरी दुनिया सकते में है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को युद्ध रोकने और होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह खोलने के लिए 48 घंटे का वक्त दिया था। और इसकी समय सीमा आज खत्म हो रही है। ये डेडलाइन खत्म होने से पहले ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया ट्रुथ सोशल पर एक लाइन लिखा है जिससे इस बात का अंदेशा बढ़ गया है कि अमेरिका ईरान के खिलाफ कड़े कदम उठा सकता है।

    ट्रंप के सोशल मीडिया 'ट्रुथ' पर लिखा है PEACE THROUGH STRENGTH, TO PUT IT MILDLY!!! इन शब्दों के मायने हैं कि ‘अगर आसान शब्दों में कहें तो शक्ति से शांति आती है।’ट्रंप ने ये फ्रेज रोनाल्ड रीगन के निरोध सिद्धांत (Doctrine of deterrence) से लिया है। रीगन का मानना था कि अगर आपके पास सैन्य और आर्थिक शक्ति पर्याप्त है तो दुश्मनों को संघर्ष करने से रोका जा सकता है। कोल्ड वॉर के दौरान इसे ही अहम रणनीति माना गया था।

    ईरान ने भी दे डाली जवाबी हमले की धमकी
    डोनाल्ड ट्रंप के अल्टिमेटम के जवाब में ईरान ने कहा है कि अगर अमेरिका अपने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बिजली संयंत्रों पर हमले की धमकी पर अमल करता है, तो तेल और अन्य निर्यात के लिए महत्वपूर्ण जलमार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य को तत्काल ''पूरी तरह से बंद'' कर दिया जाएगा। ईरान ने इजराइल के एक गुप्त परमाणु अनुसंधान स्थल पर मिसाइल हमला किया और इस हमले में आस पास के स्थानों पर रहने वाले लोग बड़ी संख्या में घायल हुए, जिसके बाद इजराइल के नेताओं ने वहां जा कर लोगों से मुलाकात की और उनका हाल चाल जाना।

    इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि हमले में किसी की जान नहीं गई और यह एक "चमत्कार" है। नेतन्याहू ने दावा किया कि इजराइल और अमेरिका अपने युद्ध लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। इन लक्ष्यों में ईरान के परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल कार्यक्रम और सशस्त्र समर्थन को कमजोर करना तथा ईरान की जनता को धार्मिक शासन व्यवस्था को उखाड़ फेंकने में सक्षम बनाना शामिल है।

    ईरान में 2000 से ज्यादा की मौत
    इजराइल की मंशा के विपरीत ईरान में न तो किसी विद्रोह का कोई संकेत मिला है और न ही उस लड़ाई के अंत का जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है, तेल की कीमतों में भारी उछाल ला दिया है और दुनिया के कुछ सबसे व्यस्त हवाई मार्गों को खतरे में डाल दिया है। अमेरिका और इजराइल द्वारा 28 फरवरी को शुरू किए गए इस युद्ध में 2,000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं।

    इस बीच, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात ने सोमवार तड़के कहा कि उनकी हवाई रक्षा प्रणाली मिसाइल और ड्रोन हमलों से निपट रही है, वहीं बहरीन में हवाई हमले के संकेत देने वाले सायरन बज रहे हैं। ईरान ने फारस की खाड़ी को शेष विश्व से जोड़ने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य को प्रभावी रूप से बंद कर दिया है और कहा है कि शत्रु देशों को छोड़कर अन्य देशों के जहाजों को वहां से गुजरने की अनुमति है, लेकिन जहाजों पर हमलों ने लगभग सभी टैंकर यातायात को रोक दिया है। वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है।

    ट्रंप ने कहा है कि अगर ईरान जलडमरूमध्य नहीं खोलता है तो अमेरिका उसके ''ऊर्जा संयंत्रों को नष्ट कर देगा, शुरुआत सबसे बड़े संयंत्र से होगी।'' अमेरिका का तर्क है कि ईरान का रिवोल्यूशनरी गार्ड देश के अधिकांश बुनियादी ढांचे को नियंत्रित करता है और इसका उपयोग युद्ध अभियानों को शक्ति प्रदान करने के लिए करता है। वहीं ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर कलीबाफ ने 'एक्स' पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यदि ईरान के बिजली संयंत्रों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया जाता है, तो पूरे क्षेत्र के अहम बुनियादी ढांचे को वैध लक्ष्य माना जाएगा और उन्हें नष्ट कर दिया जाएगा, जिसमें खाड़ी देशों में पीने के पानी के लिए महत्वपूर्ण ऊर्जा और जल शोधन प्रतिष्ठान शामिल हैं।

     

  • ट्रंप का बड़ा बयान, मिशन ईरान खत्म होने के बाद जंग पर लग सकता है ब्रेक

    ट्रंप का बड़ा बयान, मिशन ईरान खत्म होने के बाद जंग पर लग सकता है ब्रेक

    वाशिंगटन

    अमेरिका-ईरान युद्ध के 21वें दिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक चौंकाने वाला 'एग्जिट प्लान' साझा किया है.  'ट्रुथ सोशल' पर जारी एक विस्तृत पोस्ट में ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका अपने सैन्य उद्देश्यों को पूरा करने के 'बेहद करीब' है और अब वह मध्य पूर्व में जारी अपने बड़े सैन्य अभियानों को धीरे-धीरे कम करने (Winding Down) पर विचार कर रहा है। 

    ट्रंप ने अपनी पोस्ट में उन उपलब्धियों को गिनाया जिन्हें वे जीत का आधार मान रहे हैं' उन्होंने कहा, 'हमने ईरान की मिसाइल क्षमता, रक्षा औद्योगिक आधार, नौसेना और वायुसेना को पूरी तरह से नष्ट कर दिया है' ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका यह सुनिश्चित करेगा कि ईरान कभी भी परमाणु हथियारों के करीब न पहुंच सके। 

    इस दौरान ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका ने अपने क्षेत्रीय सहयोगियों-इजरायल, सऊदी अरब, कतर, यूएई, बहरीन और कुवैत की सुरक्षा सुनिश्चित की है और आगे भी उनकी रक्षा के लिए प्रतिबद्ध रहेगा। 

    ट्रंप के इस बयान का सबसे अहम हिस्सा 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' की सुरक्षा को लेकर था. उन्होंने साफ लहजे में कहा कि जो देश इस समुद्री रास्ते का इस्तेमाल अपने तेल और व्यापार के लिए करते हैं, अब सुरक्षा और पुलिसिंग की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि अमेरिका जरूरत पड़ने पर मदद कर सकता है, लेकिन यह जिम्मेदारी अन्य देशों को निभानी चाहिए। 

    ट्रंप ने तर्क दिया, 'अमेरिका इस रास्ते का उपयोग नहीं करता है, इसलिए अन्य देशों को आगे आना चाहिए'' उन्होंने इसे उन देशों के लिए एक 'आसान सैन्य अभियान' बताया और कहा कि ईरान का खतरा खत्म होने के बाद अमेरिका की मुख्य भूमिका की आवश्यकता नहीं रह जाएगी। 

    आपको बता दें कि 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम मार्ग है, जहां से बड़ी मात्रा में तेल और गैस की सप्लाई होती है. हाल के हफ्तों में यहां हमलों और तनाव के कारण वैश्विक बाजारों पर भी असर पड़ा है. ट्रंप के इस बयान को ऐसे समय में देखा जा रहा है जब युद्ध को लगभग तीन हफ्ते हो चुके हैं और क्षेत्र में अस्थिरता बनी हुई है। 

  • होर्मुज पर ट्रंप की योजना को झटका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने किया इंकार, साउथ कोरिया ने कहा- हम सोचेंगे

    होर्मुज पर ट्रंप की योजना को झटका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने किया इंकार, साउथ कोरिया ने कहा- हम सोचेंगे

    वाशिंगटन

    अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध (US-Iran War) में ईरानी घमकियों के मद्देनजर डोनाल्ड ट्रंप ने सहयोगी देशों से Hormuz Strait की सुरक्षा के लिए युद्धपोत भेजने की अपील की थी. दुनिया के 20% तेल की आवाजाही के लिए जरूरी इस समुद्री रूट को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति आर-पार के मूड में हैं और बड़ा बयान देते हुए कहा कि ये देखना दिलचस्प होगा कि कौन से देश हमारे अनुरोध को ठुकराते हैं और हमारी मदद के लिए युद्धपोत नहीं भेजता है. इस बीच बता दें कि जापान से लेकर ऑस्ट्रेलिया और तुर्की तक ने होर्मुज में अपने युद्धपोत भेजने से लगभग इनकार कर दिया है।

    ट्रंप बोले- हम 7 देशों से कर रहे बात 
    होर्मुज को लेकर ईरान की धमकियों (Iran Warnings On Hormuz) के बीच ट्रंप ने कई देशों से युद्धपोत भेजने का आह्वान बीते दिनों किया था. इस बीच एयर फोर्स वन में बोलते हुए Donald Trump ने कहा कि वह होर्मुज की निगरानी के लिए अन्य देशों से सहयोग के लिए बातचीत कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि उनका प्रशासन Hormuz Strait की सुरक्षा को लेकर 7 देशों से बातचीत कर रहा है. ट्रंप ने ईरान युद्ध के तीसरे हफ्ते में प्रवेश करने के साथ क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर इसके प्रभाव पर जोर दिया।

    'मदद करे तो अच्छा, न करे तो बहुता अच्छा'
    Donald Trump होर्मुज स्ट्रेट को लेकर पूरी तर अब आर-पार के मूड में नजर आ रहे हैं और सहयोगी देशों से मदद की अपील में भी उनकी सख्ती साफ झलक रही है. उन्होंने कहा है कि अगर ये देश हमारी मदद करते हैं तो बहुत अच्छा है और अगर नहीं करते हैं, तो भी बहुत अच्छा है. ट्रंप ने आगे कहा कि यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन सा देश Hormuz Strait को खुला रखने जैसे छोटे से प्रयास में हमारी मदद नहीं करेगा।

    इन देशों से सहयोग की आस
    राष्ट्रपति ने कहा कि खाड़ी देशों के तेल पर निर्भर देशों को होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेनी ही चाहिए. मैं मांग करता हूं कि ये देश आगे आएं और अपने क्षेत्र की रक्षा करें, क्योंकि यह उनका क्षेत्र है, यह वह स्रोत है जहां से उन्हें ऊर्जा मिलती है. हालांकि ट्रंप ने सभी 7 देशों का नाम नहीं लिया, लेकिन उन्होंने उम्मीद जताते हुए कहा कि कई देश होर्मुज के जरिए होने वाले तेल यातायात को सुचारू रखने के लिए युद्धपोत भेजेंगे. उन्होंने चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया और ब्रिटेन का नाम उन देशों में लिया, जिनसे उन्हें सहयोग की उम्मीद है. हालांकि, किसी भी देश ने अभी तक ट्रंप की इस अपील पर आगे आकर अपनी प्रतिक्रिया नहीं दी है और न ही युद्धपोत भेजे हैं।

    जापान-ऑस्ट्रेलिया से तुर्की तक का इनकार
    ट्रंप के युद्धपोत भेजने की अपील पर जापान का कहना है कि अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दूसरे देशों से होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा में मदद के लिए वॉरशिप भेजने को कहा था, लेकिन वह समुद्री सुरक्षा ऑपरेशन पर विचार नहीं कर रहा है. जापानी प्रधानमंत्री (Japan PM) का कहना है कि जापान को अभी तक US से होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों को एस्कॉर्ट करने के लिए अपनी नेवी भेजने का रिक्वेस्ट नहीं मिला है, इसलिए जवाब देना मुश्किल है।

    वहीं दूसरी ओर एएफपी की रिपोर्ट की मानें, तो ऑस्ट्रेलिया का कहना है कि ट्रंप के रिक्वेस्ट के बाद वह होर्मुज स्ट्रेट में नेवी शिप नहीं भेजेगा. नाटो में अमेरिका के पार्टनर तुर्की ने इस जंग से पहले ही पल्ला झाड़ लिया है. वहीं साउथ कोरिया इस बात पर ध्यान से विचार करने की बात कह रहा है कि होर्मुज स्ट्रेट में अपना वॉरशिप तैनात किया जाए या नहीं।

    फ्रांस ने भी झाड़ लिया पल्ला 
    न सिर्फ जापान, कोरिया, तुर्की और ऑस्ट्रेलिया, बल्कि अब फ्रांस की रक्षा मंत्री कैथरीन वॉट्रिन ने भी ट्रंप के अनुरोध पर दो टूक जबाव दिया है. उन्होंने कहा है कि जब तक युद्ध बढ़ता रहेगा, फ्रांस Hormuz Strait में अपने जंगी जहाज नहीं भेजेगा. वहीं जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वेडेफुल ने ऑपरेशन के बढ़ने की संभावना पर शक जताया और जर्मन ब्रॉडकास्टर ARD को बताया कि EU मिशन असरदार नहीं था, इसीलिए मुझे बहुत शक है कि एस्पाइड्स को होर्मुज तक बढ़ाने से ज्यादा सुरक्षा मिलेगी।

    ईरान की झमता लगभग खत्म!
    अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपनी बात को दोहराते हुए कहा कि ईरान की उत्पादन क्षमता लगभग खत्म हो चुकी है, यही कारण है कि वह कम मिसाइलें दाग रहा है. ऐसे में होर्मुज की सुरक्षा और निगरानी का यह एक छोटा प्रयास है, हमने पहले ही ईरान की उत्पादन क्षमता को पूरी तरह नष्ट कर दिया है. उसकी ओर से मिसाइलें ही नहीं, बल्कि दागे जा रहे ड्रोनों की संख्या भी बहुत कम हो गई है और ये पहले की तुलना में करीब 20% रह गए हैं।

    इन देशों से सहयोग की उम्मीद
    हालांकि ट्रंप ने सभी सात सरकारों का नाम नहीं लिया, लेकिन उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि कई देश होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरने वाले समुद्री यातायात को सुचारू रखने के लिए युद्धपोत भेजेंगे, जहां से दुनिया के 20 प्रतिशत तेल का परिवहन होता है। उन्होंने चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया और ब्रिटेन का नाम उन देशों में लिया जिनसे उन्हें सहयोग की उम्मीद है। 

    इतना खास क्यों है Hormuz?
    स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से वो देश सबसे ज्यादा प्रभावित हैं जो सीधे तौर पर इस चोक पॉइंट से जुड़े हैं और तेल आयात पर निर्भर हैं. भारत और चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भी सीधे तौर पर इस रास्ते पर निर्भर हैं. ऐसे में यहां रुकावट इनकी आर्थिक हालात बिगड़ने में अहम रोल निभा सकती हैं. बता दें कि होर्मुज स्ट्रेट दुनिया का सबसे अहम चोक पॉइंट है, जहां से रोजाना लगभग 20 मिलियन बैरल तेल, यानी दुनिया की कुल खपत का करीब 20 प्रतिशत, गुजरता है. इसके साथ ही दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) भी इसी रास्ते से भेजी जाती है।

  • रूसी तेल से और बैन हटा सकता है US, अचानक ढीले पड़े ट्रंप के तेवर?

    रूसी तेल से और बैन हटा सकता है US, अचानक ढीले पड़े ट्रंप के तेवर?

    नई दिल्ली.

    वैश्विक कूटनीति और ऊर्जा बाजार में पिछले कुछ दिनों में एक बड़ा और हैरान करने वाला बदलाव देखने को मिला है। हमेशा आक्रामक रुख अपनाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने अचानक रूसी तेल पर लगे प्रतिबंधों में ढील दे दी। इसके साथ ही, बिना किसी शोर-शराबे के भारत ने अपने लिए एक बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक जीत हासिल कर ली है।

    अमेरिकी ट्रेजरी (वित्त) मंत्री स्कॉट बेसेंट ने शुक्रवार को कहा कि अमेरिकी सरकार और अधिक रूसी तेल से प्रतिबंध हटाने पर विचार कर रही है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में भारी उछाल देखा जा रहा है। इससे ठीक एक दिन पहले, अमेरिका ने भारत को मॉस्को से तेल खरीदने की अस्थायी मंजूरी दी थी।

    बाजार में आपूर्ति बढ़ाने की रणनीति
    फॉक्स बिजनेस से बात करते हुए ट्रंप के मंत्री स्कॉट बेसेंट ने शुक्रवार को कहा, 'हम अन्य रूसी तेलों से भी प्रतिबंध हटा सकते हैं।' उन्होंने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि समुद्र में करोड़ों बैरल प्रतिबंधित कच्चा तेल जहाजों पर मौजूद है। अनिवार्य रूप से, उन पर से प्रतिबंध हटाकर ट्रेजरी बाजार में एक नई सप्लाई पैदा कर सकता है। अमेरिका ने इस बात पर जोर दिया है कि इन नए कदमों का उद्देश्य मॉस्को को राहत देना बिल्कुल नहीं है। रूस पर ये प्रतिबंध यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने की बातचीत में उसके आचरण के कारण लगाए गए थे। अमेरिका का कहना है कि यह नई छूट केवल उस सप्लाई को प्रभावित करेगी जो पहले से ही ट्रांजिट में है या जहाजों पर लदी है। बेसेंट ने यह भी कहा कि इस संघर्ष के दौरान बाजार को राहत पहुंचाने के लिए अमेरिका लगातार नए कदमों की घोषणा करता रहेगा, क्योंकि तेल की ऊंची कीमतें अमेरिकी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों के लिए परेशानी का सबब बन गई हैं।

    भारत को मिली विशेष छूट
    इससे पहले गुरुवार को, अमेरिकी सरकार ने आर्थिक प्रतिबंधों में अस्थायी रूप से ढील दी थी ताकि समुद्र में फंसे रूसी तेल को भारत को बेचा जा सके। अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि विभिन्न प्रतिबंध व्यवस्थाओं द्वारा रोके गए जहाजों से होने वाले लेनदेन सहित इस तरह की खरीद-फरोख्त को 3 अप्रैल, 2026 के अंत तक के लिए अधिकृत किया गया है।

    अचानक क्यों ढीले पड़े ट्रंप के तेवर? (अमेरिका की मजबूरी)
    अमेरिका द्वारा रूसी तेल पर से प्रतिबंध हटाने या ढील देने के पीछे रूस से कोई प्रेम नहीं है, बल्कि यह एक भयंकर आर्थिक और भू-राजनीतिक मजबूरी है। अमेरिका और इजरायल का ईरान के साथ जो सीधा युद्ध छिड़ गया है, उसने खाड़ी क्षेत्र में आग लगा दी है। ईरान के जवाबी हमलों के कारण 'होर्मुज जलडमरूमध्य' से होने वाला व्यापार लगभग ठप हो गया है। दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल इसी संकरे समुद्री रास्ते से गुजरता है। इस चोकपॉइंट के बंद होने से महज एक हफ्ते में कच्चे तेल की कीमतों में 30% का भारी उछाल आया है। शुक्रवार को कच्चे तेल की कीमतों में 8.5 प्रतिशत का भारी उछाल दर्ज किया गया। यह उछाल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान के बाद आया जिसमें उन्होंने कहा था कि मध्य पूर्व का यह युद्ध केवल ईरान के बिना शर्त आत्मसमर्पण पर ही समाप्त होगा। अमेरिका में बढ़ती महंगाई और पेट्रोल की ऊंची कीमतें राष्ट्रपति ट्रंप के लिए घरेलू स्तर पर राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकती हैं। ट्रंप ने भले ही ईरान के बिना शर्त आत्मसमर्पण तक युद्ध जारी रखने की बात कही हो, लेकिन वे जानते हैं कि लंबे समय तक तेल की इतनी ऊंची कीमतें अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मंदी में धकेल सकती हैं। बाजार को शांत करने के लिए अमेरिका को तुरंत किसी भी कीमत पर बाजार में तेल की जरूरत है।

    रूसी तेल से और बैन हटा सकता है अमेरिका: इसका मतलब क्या है?
    अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट का बयान बहुत नपा-तुला लेकिन स्पष्ट है। अमेरिका रूस पर लगे मूल प्रतिबंधों को खत्म नहीं कर रहा है, बल्कि एक तकनीकी ढील निकाल रहा है। बेसेंट के अनुसार, प्रतिबंधों के कारण करोड़ों बैरल रूसी कच्चा तेल वर्तमान में जहाजों पर समुद्र में फंसा हुआ है। अमेरिका इन विशेष जहाजों पर से प्रतिबंध हटाकर इस तेल को बाजार में उतारना चाहता है। इससे वैश्विक आपूर्ति बढ़ेगी और तेल की कीमतों में कुछ नरमी आएगी। वाशिंगटन इसे रूस को राहत के तौर पर पेश नहीं कर रहा है। उनका तर्क है कि यह केवल ट्रांजिट में फंसे तेल के लिए है, न कि रूस के भविष्य के तेल उत्पादन के लिए। यह अमेरिका की मजबूरी में उठाया गया कदम है ताकि वैश्विक तेल संकट को टाला जा सके।

    खामोश रहकर भी भारत की जीत कैसे?
    इस पूरे वैश्विक उथल-पुथल में भारत सबसे बड़े विजेता के रूप में उभरा है, और वह भी बिना अमेरिका से कोई सीधा टकराव मोल लिए। भारत अपनी तेल जरूरतों का 85% से अधिक आयात करता है। महंगे तेल का सीधा असर भारत की महंगाई और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। अमेरिका ने भारत को 3 अप्रैल 2026 तक समुद्र में फंसे इस रूसी तेल को खरीदने की विशेष और अस्थायी छूट दे दी है। चूंकि यह तेल प्रतिबंधित और फंसा हुआ था, इसलिए भारत इसे रूस से भारी डिस्काउंट पर खरीद सकेगा। इससे भारत का आयात बिल काफी कम होगा।

    भारत ने इस पूरे संकट में 'स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी' बनाए रखी। भारत ने ना तो अमेरिका का विरोध किया और ना ही रूस से अपने संबंध तोड़े। खामोश रहकर भारत ने बस सही समय का इंतजार किया। अमेरिका को वैश्विक तेल बाजार को क्रैश होने से बचाने के लिए भारत जैसे बड़े खरीदार की जरूरत थी, जो इस तेल को खपा सके। पहले जो तेल खरीदने पर भारत पर अमेरिकी प्रतिबंधों का खतरा मंडराता था, अब वही तेल भारत अमेरिकी सरकार की 'आधिकारिक मंजूरी' से खरीदेगा।