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  • रूस से डीजल खरीदेगा अमेरिका, ट्रंप के फैसले से जेलेंस्की नाराज; यूक्रेन युद्ध पर बढ़ा तनाव

    रूस से डीजल खरीदेगा अमेरिका, ट्रंप के फैसले से जेलेंस्की नाराज; यूक्रेन युद्ध पर बढ़ा तनाव

    वाशिंगटन
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर से यूक्रेनी समकक्ष जेलेंस्की पर निशाना साधा है। यूक्रेन की तरफ से रूस के कच्चा तेल रिफाइनरियों पर किए जा रहे हमलों को देखते हुए ट्रंप ने अपना गु्स्सा जाहिर किया है। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि यूक्रेन को उसका नया राष्ट्रपति मिले। बता दें, कुछ घंटे पहले ही अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह ऐलान किया था कि उन्होंने रूस के साथ समझौता किया है। इसके तहत अमेरिका रूस से बड़ी मात्रा में डीजल खरीदेगा। इसके अलावा रूस के वैश्विक बाजार में तेल बेचने पर भी अमेरिका आपत्ति नहीं जताएगा।

    शनिवार को वाइट हाउस के बाहर मीडिया से बात करते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर से यूक्रेन को रूसी रिफाइनरियों पर हमला करने को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा, "उन्हें (यूक्रेन को) यह (रूसी रिफाइनरियों को निशाना बनाना) जरूर बंद कर देना चाहिए।" यूक्रेन की लीडरशिप पर सवाल उठाते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि कीव को अब अपना नया नेता चुन लेना चाहिए, जो कि बेहतर तरीके से समझौता कर सकता हो। एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप लगातार यूक्रेनी राष्ट्रपति से रूस के तेल रिफाइनरियों को निशाना न बनाने के लिए कह रहे हैं। लेकिन पिछले एक हफ्ते से यूक्रेन लगातार इन्हीं रिफाइनरियों को निशाना बना रहा है।

    बता दें, यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने ट्रंप के इस फैसले का विरोध किया था, जिसमें उन्होंने रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिका की आलोचना की थी। जेलेंस्की ने कहा था कि अगर अमेरिका रूस से तेल खरीदता है, तो इससे मॉस्को के युद्ध जारी रखने के लिए अलग फंड मिलता रहेगा। इस फैसले से युद्ध को खत्म करने में आसानी नहीं होगी।

    रूस से डीजल क्यों चाहता है अमेरिका?
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने सबसे बड़ा सवाल वैश्विक तेल बाजार में बढ़ती कीमतों का है। ट्रंप को मिडटर्म इलेक्शन का सामना करना है। ऐसे में बढ़ी हुई तेल कीमतें उनके लिए खतरा बन सकती है। चूंकि अमेरिका में ज्यादातर मालढुलाई का काम ट्रकों के जरिए ही होता है। ऐसे में डीजल यहां जरूरी है। होर्मुज के बंद होने के बाद ट्रंप के पास दूसरा कोई बड़ा ऑप्शन है नहीं। वेनेजुएला के तेल पर भले ही ट्रंप का कब्जा हो। लेकिन उसे रिफाइन करने की क्षमता अमेरिका के पास नहीं है। ऐसे में ट्रंप के सामने रूस के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था।

    दूसरी तरफ जेलेंस्की हैं, जिन्हें इस बात का अंदाजा था कि ट्रंप इस फैसले पर ऐक्शन ले सकते हैं। इसलिए वह शुरुआत से ही रूस की रिफाइनरियों पर हमला करके उसकी क्षमता को खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं। जब ट्रंप ने जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ के जरिए उन्हें रूस पर हमले रोकने के लिए कहा, तो जेलेंस्की ने शर्त रखी थी कि रूस को भी वादा करना होगा कि वह यूक्रेन के बिजली इन्फ्रास्ट्रक्चर को निशाना नहीं बनाएगा। हालांकि, ट्रंप ने जोर दिया था कि रूस भले ही कोई वादा करे या न करे, लेकिन कीव को यह हमले रोकने होंगे। इस पर जेलेंस्की ने डील करने से इनकार कर दिया।

  • ‘मुझे 8 नोबेल शांति पुरस्कार मिलने चाहिए थे’, नवी पिल्ले को सम्मान मिलने पर ट्रंप का बयान चर्चा में

    ‘मुझे 8 नोबेल शांति पुरस्कार मिलने चाहिए थे’, नवी पिल्ले को सम्मान मिलने पर ट्रंप का बयान चर्चा में

     वाशिंगटन (डीसी)

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का मुंह फूला हुआ है. उन्होंने भारतीय मूल की दक्षिण अफ़्रीकी न्यायविद नवी पिल्ले को नोबेल शांति पुरस्कार दिए जाने पर नाराजगी जताई है. अपने पोस्ट में उन्होंने कहा कि उन्हें 8 नोबेल शांति पुरस्कार मिलने चाहिए थे, सिर्फ एक नहीं. मैंने आठ युद्धों के अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों को सुलझाया है. उन्होंने यह भी कहा कि ये महिला कौन हैं? न इनके बारे में जानता हूं, न ही जनता को उनके बारे में किसी को कोई जानकारी है. फिर भी उनको नोबेल दे  दिया गया। 

    पिल्ले के बारे में ये बोले ट्रंप
    ट्रंप ने अपने पोस्ट में लिखा है कि पि
    ल्ले के बारे में किसी ने कुछ नहीं सुना है. जहां तक मेरी जानकारी है, वह स्पष्ट रूप से इजराइल की विरोधी हैं. यह भी नहीं पता कि उन्होंने वास्तव में क्या कार्य किए हैं. उन्होंने यह भी कहा कि मैंने तो 8 युद्धों को सुलझाया है. मैंने जिन देशों की मदद की है उन सभी मुल्कों के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्रियों ने नॉर्वेजियन नोबेल समिति को पत्र भेजे थे. मैं ईरान और रूस/यूक्रेन के साथ दो और युद्धों को सुलझाने या जीतने वाला हूं. हालांकि असली मुद्दे वे आठ युद्ध हैं जिन्हें मैंने सुलझाया है. इनमें भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध बेहद खास है. यह युद्ध रुकवाना वास्तव में नोबेल पुरस्कार देने के लिए पर्याप्त है। 

    इन आठ युद्धों को भी साझा किया
    उन्होंने पोस्ट में सभी आठ युद्धों की चर्चा भी की. इनमें कंबोडिया और थाईलैंड, कोसोवा और सर्बिया, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और रवांडा, पाकिस्तान और भारत, इजराइल और ईरान, मिस्र और इथियोपिया , आर्मेनिया और अजरबैजान के अलावा इजराइल और हमास।  

    मैंने इतिहास में सबसे ज्यादा जानें बचाई हैं
    टंप ने कहा कि मैंने ही ईरान को न्यूक्लियरर वेपन बनाने से रोका, पूरे मिडिल ईस्ट को ही उजड़ने से रोका है. यह भी कहा कि इतिहास में  उन्होंने सबसे अधिक जानें बचाई हैं. पिछले साल मुझे नोबेल प्राइज देते हुए मारिया कोरिना मचाडो  ने मीडिया से कहा था कि डोनाल्ड ट्रंप ने कई लड़ाइयां सुलझाईं, वे नोबेल शांति पुरस्कार के हकदार है. नोबेल पाने वालों के लिए आज तक कभी किसी ने ऐसा नहीं किया। 

    इजराइल में सभी बंधकों को वापस लाया था…
    ट्रंप ने कह, 'मैंने इजराइल में सभी बंधकों को छुड़वाया जिसमें आखिरी 28 जिंदा लोगों के साथ कुछ मृतक भी थे। हमास के साथ मिलकर ये कठिन कार्य पूरा किया. मेरे ही प्रयास से दुनिया के तानाशाह निकोलस मादुरो को वेनेजुएला से हटाया जा सका. मैं वेनेजुएला को एक अमीर डेमोक्रेसी में तब्दील करने के प्रयास में हूं. ईरान के अलावा मैंने इज़राइल, मिडिल ईस्ट और यूरोप को बर्बाद करने से रोका है. मेरे निरंतर प्रयास से ही साउथ कोरिया और नॉर्थ कोरिया, जापान व नॉर्थ कोरिया के बीच जंग थमी हुई है। 

    मैंने बंधकों को उनके घर तक पहुंचाया
    मैं NATO देशों के GDP के 2% से 5% तक ख
    र्च बढ़ाने, मज़बूत अलायंस और डिफेंस बनाने में भी सफल रहा हूं.यह भी कहा कि मैंने पूर्वी यूरोप के कई देशों के 900 से अधिक राजनीतिक कैदियों की रिहाई के लिए बातचीत कर उनकी वापसी पक्की कराई. दुनिया भर से 196 बंधकों को दूसरे देशों की कैद से छुड़ा कर उनको घर तक पहुंचाने वाला मैं ही हूं। 

    जिसे कोई नहीं जानता उसे नोबेल दे दिया
    मैंने इतने महत्वपूर्ण मुद्दों को सुलझाने के साथ अहम जिम्मेदारियां निभाईं इसके बाद भी नोबेल प्राइज़ एक ऐसे लिबरल इंसान को दिया गया जो यूनाइटेड नेशंस में काम करता है और जिसके बारे में कोई भी नहीं जानता. मैंने जितने भी युद्ध सुलझाए हैं उसके लिए कभी यूनाइटेड नेशंस से बात नहीं की, न वहां से कोई मदद मिली। यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका जिसे मैं आपके प्रेसिडेंट के तौर पर रिप्रेजेंट करता हूं, को नोबेल शांति पुरस्कार मिलना चाहिए था।  यह नॉर्वे पर लगा ऐसा दाग है जिसे कभी नहीं मिटाया जा सकेगा।

  • फ्रांस में छात्र आंदोलन को ट्रंप ने बताया ‘इस्लामी टेकओवर’, बयान पर मचा सियासी घमासान

    फ्रांस में छात्र आंदोलन को ट्रंप ने बताया ‘इस्लामी टेकओवर’, बयान पर मचा सियासी घमासान

    पेरिस /वाशिंगटन

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने  फ्रांस में बड़े पैमाने पर हुए छात्र विरोध प्रदर्शनों के लिए "सामूहिक प्रवासन" और इस्लाम को जिम्मेदार ठहराया, और घर पर होने वाले कठिन मध्यावधि चुनावों से पहले अपने वैश्विक दक्षिणपंथी दृष्टिकोण को आगे बढ़ाया।

    "फ्रांस में जो हो रहा है वह अनियंत्रित सामूहिक प्रवासन से कम नहीं है। यह स्कूलों के बारे में नहीं है, यह इस्लाम द्वारा एक समय के महान देश पर कब्जा करने की चाहत के बारे में है!" ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में कहा।

    फ्रांस के छात्रों ने बेहतर परिस्थितियों की मांग को लेकर सितंबर के अंत से ही देश भर के सैकड़ों हाई स्कूलों के प्रवेश द्वारों को अवरुद्ध कर दिया है, और ये विरोध प्रदर्शन सुरक्षा बलों के साथ छिटपुट झड़पों में तब्दील हो गए हैं।

    फ्रांस में इन दिनों स्कूल और यूनिवर्सिटी के छात्र सड़कों पर हैं. शुरुआत स्कूलों में शिक्षकों, नर्स और स्टाफ की कमी से हुई, लेकिन अब इस आंदोलन पर अमेरिका की राजनीति का असर भी दिख रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस में हो रहे प्रदर्शनों को सिर्फ स्कूलों की समस्या मानने से इनकार किया है. उन्होंने कहा कि यह बेकाबू सामूहिक प्रवासन और इस्लाम के फ्रांस पर कब्जे की कोशिश से जुड़ा है। 

    ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा कि फ्रांस में जो हो रहा है, वह सिर्फ स्कूलों का मामला नहीं है. उनके मुताबिक, इसके पीछे बड़ी संख्या में हो रहा प्रवासन है और इस्लाम फ्रांस पर कब्जा करना चाहता है. ट्रंप के इस बयान के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि फ्रांस में जमीन पर हो क्या रहा है? क्या वाकई यह आंदोलन धर्म और प्रवासन को लेकर है या कहानी कुछ और है?

     फ्रांस भर में ढाई लाख प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए।
    लेकिन ट्रंप और उनके प्रशासन ने लंबे समय से यूरोपीय सामाजिक समस्याओं के लिए प्रवासन को दोषी ठहराया है, यूरोप से अपनी सीमाओं को बंद करने का आह्वान किया है और धुर दक्षिणपंथी दलों की तरह ही तथाकथित सभ्यतागत पतन की चेतावनी दी है।

    ट्रंप के मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (एमएजीए) आंदोलन के प्रमुख नेता अगले महीने होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों से पहले आव्रजन के मुद्दे पर अपनी बात रखने के लिए फ्रांस में हो रहे विरोध प्रदर्शनों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

    MAGA के टिप्पणीकारों ने बार-बार फ्रांसीसी अशांति के वीडियो पोस्ट किए हैं, जिसमें ट्रंप के सहयोगी ग्लेन बेक ने सोमवार को कहा कि "फ्रांस में दंगे बाकी पश्चिमी देशों के लिए एक स्पष्ट चेतावनी हैं।"

    ट्रंप की अलोकप्रियता और ईरान के साथ उनके युद्ध को लेकर आशंकाओं के बीच रिपब्लिकन पार्टी प्रवासन और ट्रांसजेंडर विरोधी बयानबाजी पर और भी जोर दे रही है, क्योंकि उन्हें डर है कि इससे उन्हें कांग्रेस पर अपना नियंत्रण खोने का खतरा है।

    फ्रांस में आखिर हो क्या रहा है?
    मौजूदा आंदोलन की शुरुआत पेरिस के पास स्थित शहर के एक हाई स्कूल से हुई. यहां छात्रों की शिकायत है कि क्लास में 32-35 बच्चे हैं, लेकिन स्कूल में न नर्स है, न शिक्षक. दिव्यांग बच्चों की मदद करने वाला स्टाफ यानी AESH भी कम है। 

    21 सितंबर को छात्र प्रदर्शन कर रहे थे. शुरुआत में आंदोलन एक स्कूल तक सीमित दिख रहा था, लेकिन इसके बाद दूसरे स्कूलों के छात्र भी जुड़ने लगे. अब फ्रांस के अलग-अलग इलाके के कई स्कूलों के बाहर ब्लॉकेड लगे हैं और छात्र अपनी समस्याओं को लेकर आवाज उठा रहे हैं। 

    आंदोलन ऐसे समय में बढ़ रहा है, जब फ्रांस में बजट को लेकर भी दबाव है. फ्रेंच प्रधानमंत्री सेबास्तियन लेकोर्नू 2027 के बजट में 54 अरब यूरो की बचत की योजना बता रहे हैं. सरकारी कर्मचारियों के वेतन फ्रीज करने की बात भी हो रही है. हालांकि, यह 54 अरब यूरो पूरे बजट में बचत का आंकड़ा है, सिर्फ स्कूलों के लिए नहीं है. इमैनुएल मैक्रों शासन का भी कहना है कि इसको लेकर लोगों के बीच अफवाह फैली है। 

    क्या आंदोलन में हिंसा भी हो रही है?
    आंदोलन के दौरान कुछ हिस्सों में हिंसा भी हो रही है. 6 अक्टूबर को तीसरा राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन हो रहा है. स्कूल और यूनिवर्सिटी के छात्र सड़कों पर उतर रहे हैं और कई ट्रेड यूनियन भी उनके साथ आ रही हैं. फ्रेंच गृह मंत्रालय 2,66,000 लोगों के शामिल होने की बात कर रहा है, जबकि छात्र संगठन USL 4,50,000 लोगों के शामिल होने का दावा कर रहा है। 

    प्रधानमंत्री के मुताबिक, 215 छात्र और 85 स्कूल कर्मचारी घायल हुए हैं. न्याय मंत्रालय ने 6,000 से ज्यादा गिरफ्तारियों की जानकारी दी है. 100 से ज्यादा स्कूलों को नुकसान पहुंचा है. मार्सेई में आग बुझाने पहुंचे दमकल के ट्रक को भी जला दिया गया. लेकिन यहां एक फर्क समझना जरूरी है। 

    कुछ जगह हिंसा हो रही है, इसका मतलब यह नहीं है कि पूरा छात्र आंदोलन हिंसक है. सरकार कुछ सख्त वामपंथी कार्यकर्ताओं और बाहरी उपद्रवियों की भूमिका की तरफ भी इशारा कर रही है, जबकि हजारों छात्र स्कूलों की सुविधाओं और स्टाफ को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। 

    तो फिर ट्रंप इसे इस्लामी आंदोलन क्यों बता रहे हैं?
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप फ्रांस के छात्र आंदोलन को धार्मिक रंग देने की कोशिश कर रहे हैं. छात्रों की शुरुआती मांगों में शिक्षक, नर्स, स्टाफ और स्कूल के संसाधन शामिल हैं. आप्रवासन या इस्लाम को लेकर आंदोलन शुरू नहीं हुआ था. इसके बावजूद ट्रंप पूरे विवाद को प्रवासन और इस्लाम से जोड़ रहे हैं. वह इसे एक बड़े सामाजिक और सांस्कृतिक संकट के रूप में देख रहे हैं। 

    ट्रंप के बयान से ऐसा संदेश जा रहा है कि फ्रांस में स्कूलों से जुड़ी शिकायत के पीछे असल समस्या आबादी में हो रहा बदलाव और इस्लाम का कथिर रूप से बढ़ता प्रभाव है. लेकिन जानकारी इस दावे से मेल नहीं खा रही है. फ्रांसीसी अधिकारियों की तरफ से सामने आ रही जानकारी भी यह नहीं दिखा रही कि छात्र किसी संगठित इस्लामी एजेंडे के तहत प्रदर्शन कर रहे हैं। 

    ट्रंप का यह नजरिया कहां से आ रहा है?
    अमेरिकी राष्ट्रपति के बयान को अमेरिकी और यूरोपीय दक्षिणपंथ की राजनीति के संदर्भ में समझा जा सकता है. इस राजनीति में यूरोप के कई विरोध प्रदर्शनों को प्रवासन, इस्लाम और सुरक्षा के मुद्दों से जोड़कर देखा जाता है. ट्रंप लंबे समय से अमेरिका में सख्त बॉर्डर पॉलिसी और अवैध प्रवासन के खिलाफ सख्त रुख रखते हैं। 

    ऐसे में फ्रांस की अशांति को वह अमेरिकी बहस के लिए एक उदाहरण की तरह पेश कर रहे हैं. यानी फ्रांस में जो समस्या स्कूल से जुड़कर शुरू हुई, उसे ट्रंप एक बड़े सांस्कृतिक संघर्ष के तौर पर देख रहे हैं. फॉक्स की होस्ट टॉमी लाहरेन भी इन प्रदर्शनों को अमेरिकियों के लिए एक "चेतावनी भरी कहानी" बता रही हैं. इससे पता चलता है कि फ्रांस का यह प्रदर्शन अब सिर्फ फ्रांस तक सीमित बहस नहीं रह गया है। 

    अमेरिका के राष्ट्रपति ब्रिटेन के प्रदर्शनों को भी इस्लाम के टेकओवर से जोड़कर देखते हैं. बीते दिनों जब ब्रिटेन में राइट विंग के नेताओं ने सड़क पर प्रदर्शन किए, तो उसे ट्रंप से लेकर एलॉन मस्क और बाकी बड़े अमेरिकी नेताओं ने भी समर्थन दिया था. इन प्रदर्शनों को ट्रंप के करीबियों ने भी संबोधित किया था। 

    सोशल मीडिया इस कहानी को और कैसे बदल रहा है?
    सोशल मीडिया पर ही सबसे ज्यादा भ्रम पैदा हो रहा है. फ्रांस 24 के "ट्रुथ और फेक" के मुताबिक, एलेक्स जोन्स और टॉमी रॉबिन्सन जैसे दक्षिणपंथी चेहरे पुराने और दूसरी घटनाओं के वीडियो शेयर कर रहे हैं. उन्हें मौजूदा प्रदर्शनों से जोड़ रहे हैं. कुछ वीडियो के साथ यह दावा किया जा रहा है कि फ्रांस में एंटी-व्हाइट या इस्लामी विद्रोह हो रहा है। 

    एक वायरल वीडियो की जांच की गई तो पता चला कि वह दिसंबर 2022 का है. उसमें पेरिस में कुर्द समुदाय पर हुई गोलीबारी के बाद के प्रदर्शन दिख रहे हैं. यानी वीडियो असली है, लेकिन उसे जिस घटना से जोड़कर दिखाया जा रहा है, वह गलत है। 

    प्रदर्शनों में कुछ जगहों पर फिलिस्तीन के झंडे के साथ लोगों को प्रदर्शन करते देखा गया है. हालांकि, यह भी समझना जरूरी है कि यूरोपीय देशों में फिलिस्तीन के मुद्दे पर ईसाई समुदाय के लोगों का रुख भी काफी अलग रहा है. वे फिलिस्तीन को एक राज्य के तौर पर देखते हैं. गाजा में जंग के बीच इजरायल की आलोचना भी देखी गई है। 

    फ्रांस में आंदोलन अब बड़ा हो रहा है और अब यूनियन भी इसमें शामिल हो रही हैं. स्कूल और यूनिवर्सिटी के छात्र सड़क पर आ रहे हैं और ट्रेड यूनियनें भी उनका समर्थन कर रही हैं. पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. कुछ छात्र कह रहे हैं कि प्रदर्शन पर जरूरत से ज्यादा सख्ती हो रही है. मसलन आंदोलन को धार्मिक रंग देने की ट्रंप की कोशिशों खुद फ्रेंच अधिकारियों ने ही खारिज कर दिया है, और स्पष्ट किया है कि वे छात्र ही हैं। 

  • US Diesel Export Ban: अमेरिका ने निर्यात घटाया तो बढ़ सकती हैं वैश्विक ईंधन कीमतें, ऑस्ट्रेलिया समेत कई देश प्रभावित

    US Diesel Export Ban: अमेरिका ने निर्यात घटाया तो बढ़ सकती हैं वैश्विक ईंधन कीमतें, ऑस्ट्रेलिया समेत कई देश प्रभावित

     वाशिंगटन

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने डीजल के निर्यात पर रोक लगाने की बात कही है. दरअसल, अमेरिका में ईंधन की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. इससे घरेलू स्तर पर लोगों की परेशानी बढ़ी है. ट्रंप प्रशासन अब कीमतों को कम करने के रास्ते तलाश रहा है। 

    इसी बीच डीजल निर्यात पर रोक का प्रस्ताव सामने आया है. अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने भी कहा है कि प्रशासन निर्यात पर कुछ प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहा है. दरअसल, अमेरिका दुनिया में डीजल के सबसे बड़े निर्यातकों में शामिल है. वह वैश्विक डीजल सप्लाई का करीब 20 फीसदी हिस्सा उपलब्ध कराता है. ऐसे में अमेरिका से डीजल का निर्यात कम होने पर दुनिया के दूसरे देशों में इसकी कीमत बढ़ सकती है। 

    इस समय वैश्विक ईंधन बाजार पहले से दबाव में है. मिडिल ईस्ट में तनाव के कारण तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होने वाली तेल सप्लाई भी प्रभावित हुई है. वहीं, रूस के डीजल निर्यात पर रोक और यूक्रेन के रूसी तेल ठिकानों पर हमलों ने भी स्थिति को मुश्किल बनाया है। 

    ऑस्ट्रेलिया पर क्यों पड़ेगा ज्यादा असर?
    ऑस्ट्रेलिया विकसित देशों में प्रति व्यक्ति डीजल की सबसे ज्यादा खपत करने वाले देशों में है. हालांकि, ऑस्ट्रेलिया आम तौर पर अमेरिका से डीजल आयात नहीं करता. मार्च में एक इमरजेंसी खेप जरूर अमेरिका से वहां पहुंची थी। 

    इसके बावजूद ऑस्ट्रेलिया पर असर पड़ सकता है. इसकी वजह वैश्विक बाजार है. अगर अमेरिका डीजल का निर्यात रोकता है तो दुनिया भर में इसकी कीमत तेजी से बढ़ सकती है. इससे ऑस्ट्रेलिया में भी ईंधन महंगा होगा. हालात ज्यादा बिगड़े तो वहां ईंधन की राशनिंग तक की नौबत आ सकती है। 

    अमेरिका में भी बढ़ सकती है परेशानी
    डीजल निर्यात पर पूरी तरह रोक लगाने से अमेरिका को भी नुकसान हो सकता है. देश में डीजल की सप्लाई जरूरत से ज्यादा हो सकती है. इससे घरेलू कीमतें घट सकती हैं. लेकिन ज्यादा सप्लाई होने पर अमेरिकी रिफाइनरियों को उत्पादन कम करना पड़ सकता है. इसी वजह से व्हाइट हाउस ने फिलहाल पूरी तरह निर्यात रोकने के बजाय दूसरे विकल्पों पर विचार किया है। 

    ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने कहा है कि अमेरिकी कंपनियों को घरेलू बाजार की ओर ज्यादा ईंधन भेजने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है. इसके लिए टैक्स में छूट जैसे वित्तीय उपाय किए जा सकते हैं. इसके अलावा अमेरिका डीजल निर्यात के लिए कोटा भी तय कर सकता है. यानी देश से बाहर जाने वाले डीजल की मात्रा सीमित की जा सकती है. इस फैसले का इस्तेमाल व्यापार वार्ता में भी किया जा सकता है। 

  • ट्रंप प्रशासन के मीडिया बैन को कोर्ट ने हटाया, वाइट हाउस कवरेज का रास्ता साफ

    ट्रंप प्रशासन के मीडिया बैन को कोर्ट ने हटाया, वाइट हाउस कवरेज का रास्ता साफ

    वाशिंगटन 

    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीएनएन, एमएस नाउ और पॉलिटिको जैसे मीडिया घरानों के पत्रकारों का राष्ट्रपति के आधिकारिक आवास वाइट हाउस में प्रवेश से वर्जित कर दिया था। उन्होंने इन मीडिया हाउस पर झूठी खबरें प्रकाशित करने का आरोप लगाया था। ट्रंप प्रशासन के इस फैसले के खिलाफ इन मीडिया संस्थानों ने कोर्ट का रुख किया था। कोर्ट ने राष्ट्रपति ट्रंप के आदेश पर रोक लगाते हुए यह बैन हटा दिया है।

    आपको बता दें कि डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले के खिलाफ सीएनएन, एमएस नाउ और पोलिटिको ने बीते सोमवार को मुकदमा दायर किया था। इन मीडाय संस्थानों ने आरोप लगाया कि चुनिंदा तरीके से यह प्रतिबंध लगाया जाना कानून का स्पष्ट उल्लंघन है।

    इन समाचार संस्थानों ने अपनी याचिका में कहा कि संविधान राष्ट्रपति या किसी अन्य सरकारी अधिकारी को यह अधिकार नहीं देता कि वह केवल खबरें पसंद नहीं आने पर बिना बैन कर दे। उन्होंने कहा कि किसी सूचना या प्रक्रिया का पालन किए बिना प्रेस के प्रथम संशोधन से जुड़े अधिकारों, स्वतंत्रता और संपत्ति संबंधी हितों से वंचित करना गलत है।

    अमेरिकी डिस्ट्रिक्ट जज टिम केली ने वाइट हाउस में इन मीडिया संस्थानों पर लगे बैन को गलत बताते हुए इसे हटा दिया। आपको बता दें कि अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट के वकीलों ने राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर इस प्रतिबंध को सही ठहराने की कोशिश की थी।

    CNN की पत्रकार को देख UN में भड़के ट्रंप
    संयुक्त राष्ट्र महासभा में डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को सीएनएन की प्रतिष्ठित पत्रकार कैटलिन कॉलिन्स पर निशाना साधा और उनसे कहा, ''आपको यहां नहीं होना चाहिए।'' ट्रंप मंगलवार को महासभा में अपने संबोधन से पहले संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय पहुंचे और कॉलिन्स से कहा, ''मुझे हैरानी है कि सीएनएन यहां मेरी कवरेज कर रहा है। आपको यहां मेरी कवरेज के लिए नहीं होना चाहिए। आपने कहा था कि आप मेरी कवरेज नहीं करेंगे।'' हालांकि, कॉलिन्स ने बाद में प्रसारण में कहा कि सीएनएन ने ऐसा कभी नहीं कहा।

  • अमेरिका में ट्रंप से मिलेंगे शी जिनपिंग, व्यापार समेत इन मुद्दों पर नजर

    अमेरिका में ट्रंप से मिलेंगे शी जिनपिंग, व्यापार समेत इन मुद्दों पर नजर

    बीजिंग 

    चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 23 से 25 सितंबर तक अमेरिका की सरकारी यात्रा पर जाएंगे। यह यात्रा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निमंत्रण पर हो रही है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने सोमवार को यह जानकारी दी। प्रवक्ता ने बताया कि शी 23 सितंबर को वाशिंगटन पहुंचेंगे। वहां उनकी ट्रंप से बड़ी बैठक होगी। साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के अनुसार, शी ज्वाइंट बेस एंड्रयूज के हवाई अड्डे पर उतरेंगे। ट्रंप खुद वहां जाकर उनका स्वागत करेंगे। यह बहुत कम होता है। आमतौर पर ट्रंप विदेशी मेहमानों से वाइट हाउस में ही मिलते हैं।

    बता दें कि दोनों नेता इससे पहले मई में मिले थे। तब ट्रंप बीजिंग गए थे। दोनों देशों ने अपने रिश्ते सुधारने की बात की थी। ये दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। इस बड़ी बैठक से पहले दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारी अंतिम तैयारी को लेकर बातचीत कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि इसमें टैरिफ का मुद्दा भी शामिल है। बताया जा रहा है कि दोनों पक्ष आर्थिक और व्यापारिक मुद्दों पर बात करेंगे।

    दोनों नेताओं की मुलाकात बहुत ही अहम मानी जा रही है। बताया जा रहा है कि यह बातचीत इसलिए भी जरूरी हो गई है क्योंकि ट्रंप ने शुक्रवार को एक नए कानून पर हस्ताक्षर किए। इस कानून से रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाया जा सकता है। इसमें चीन और भारत भी शामिल हैं। कानून का नाम लिंडसे ओ. ग्राहम रूस और ईरान प्रतिबंध अधिनियम 2026 है। दूसरी ओर चीन ने कहा है कि वह रूसी तेल-गैस खरीद पर अमेरिकी टैरिफ का विरोध करता है। चीन का कहना है कि दो देशों के सामान्य व्यापार में तीसरे देश को दखल नहीं देना चाहिए।

    चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने कहा है कि चीन बराबरी और आपसी फायदे के आधार पर दूसरे देशों के साथ सामान्य व्यापार करता है। यह व्यापार किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं है। इसमें बाहरी दबाव नहीं होना चाहिए। चीन एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध करता है। इनका अंतरराष्ट्रीय कानून में कोई आधार नहीं है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी भी नहीं है।

  • जिनपिंग के स्वागत को तैयार ट्रंप, चीन पर सख्ती के बाद अब रिश्तों में क्यों आई नरमी?

    जिनपिंग के स्वागत को तैयार ट्रंप, चीन पर सख्ती के बाद अब रिश्तों में क्यों आई नरमी?

    वाशिंगटन
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कभी चीन को अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बताते थे। उनका कहना था कि बीजिंग ने अमेरिकी कारखानों को कमजोर किया और मध्यम वर्ग को नुकसान पहुंचाया। इसी सख्त रुख के साथ वह करीब एक दशक पहले व्हाइट हाउस पहुंचे थे। लेकिन अब ट्रंप का चीन और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के प्रति रवैया काफी नरम नजर आ रहा है। जिनपिंग 24 सितंबर को अमेरिका की यात्रा पर पहुंचेंगे और ट्रंप उनके सम्मान में राजकीय डिनर देंगे। ट्रंप ने हाल में जिनपिंग को ‘बड़ा सज्जन’ बताया और कहा कि दोनों के रिश्ते बहुत अच्छे हैं।

    रिपोर्ट के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप ने चीन से जुड़े कई मुद्दों पर पहले जैसा कड़ा रुख नहीं अपनाया है। ईरान को चीन की ओर से कथित तौर पर सैटेलाइट तस्वीरें दिए जाने की खबरों पर भी उन्होंने कहा कि शी जिनपिंग ने सही बर्ताव किया है। 2020 में ट्रंप ने चीन पर अमेरिकी मतदाता रिकॉर्ड तक पहुंच बनाने का आरोप लगाया था, लेकिन अब उन्होंने जवाबी कार्रवाई को लेकर भी सावधानी दिखाई है। इस बीच चीन विनिर्माण के साथ AI और इलेक्ट्रिक गाड़ियों जैसी नई तकनीकों में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। इससे अमेरिका समेत कई औद्योगिक देशों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ी है।

    चीन पर भारी टैरिफ का क्या निकला नतीजा
    डोनाल्ड ट्रंप ने चीन का रुख बदलने के लिए भारी टैरिफ और तकनीकी पाबंदियों का सहारा लिया था, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार इससे बेहतर नतीजे नहीं मिले। चीन ने इलेक्ट्रॉनिक सामान में इस्तेमाल होने वाले दुर्लभ खनिजों पर अपनी मजबूत पकड़ का इस्तेमाल करते हुए दबाव बनाया और दूसरे बाजारों में भी सामान की बिक्री बढ़ाई। इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के सीनियर सलाहकार माइकल कोवरिग के मुताबिक, ट्रंप का शुरुआती तरीका सफल नहीं हुआ और दबाव की लड़ाई में जिनपिंग को बढ़त मिली। ट्रंप के कदमों से अमेरिका के पुराने सहयोगियों के साथ रिश्तों पर असर पड़ा है।

    AI पावर और सैन्य क्षमता बढ़ा रहा बीजिंग
    इसके बावजूद, दोनों देशों के बीच आर्थिक और तकनीकी लड़ाई खत्म नहीं हुई है। चीन AI और सैन्य क्षमता बढ़ाने पर काम कर रहा है, जबकि ट्रंप प्रशासन दुर्लभ खनिजों के लिए साझेदारी और अमेरिका में एआई के विकास पर जोर दे रहा है। चीन पर अमेरिकी AI मॉडलों से अपनी कंपनियों को ट्रेनिंग देने के आरोप भी हैं। अमेरिकी अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लांश ने कहा कि चीन को केवल एआई के मामले में खराब कहना सही नहीं है। इसे बड़े पैमाने पर देखने की जरूरत है।

    अमेरिका-चीन के रिश्ते में तनाव
    राष्ट्रपति ट्रंप के पहले कार्यकाल (2017-21) में भी अमेरिका-चीन रिश्तों में बड़ा तनाव देखने को मिला था। 2018 में ट्रंप प्रशासन ने चीनी सामान पर भारी टैरिफ लगाकर व्यापार युद्ध शुरू किया, जिसके जवाब में चीन ने भी अमेरिकी सामानों पर टैरिफ बढ़ाया। कोरोना महामारी, तकनीकी प्रतिस्पर्धा, हांगकांग और शिनजियांग जैसे मुद्दों पर भी दोनों देशों के बीच मतभेद बढ़े। जो बाइडेन के कार्यकाल (2021-25) में रिश्तों में सुधार की सीमित कोशिशों के बावजूद रणनीतिक प्रतिस्पर्धा जारी रही। बाइडेन ने ट्रंप के ज्यादातर टैरिफ बरकरार रखे और सेमीकंडक्टर समेत कई तकनीकों पर चीन के लिए निर्यात प्रतिबंध बढ़ाए। यानी दोनों कार्यकालों में चीन को लेकर अमेरिकी नीति सख्त रही।

  • सऊदी अरब पर मिसाइल हमले के बीच ट्रंप अचानक वॉशिंगटन लौटे, अमेरिका ने जारी की यात्रा चेतावनी

    सऊदी अरब पर मिसाइल हमले के बीच ट्रंप अचानक वॉशिंगटन लौटे, अमेरिका ने जारी की यात्रा चेतावनी

     वॉशिंगटन
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अपना वीकेंड ट्रिप एक दिन पहले ही बीच में ही रद कर दिया और शनिवार शाम को अचानक वॉशिंगटन डीसी लौट आए।

    व्हाइट हाउस की ओर से जारी एक वीडियो में उन्हें मरीन वन से उतरते हुए देखा गया। हालांकि, उनके अचानक लौटने की कोई आधिकारिक वजह नहीं बताई गई है, क्योंकि उनका कैंप डेविड में रविवार तक रुकने का कार्यक्रम था।

    समझिए क्यों मचा है हड़कंप?
    बता दें कि राष्ट्रपति ट्रंप की यह वापसी ऐसे समय में हुई है, जब अमेरिकी विदेश विभाग ने शनिवार को पश्चिम एशिया को लेकर एक नया सुरक्षा अलर्ट जारी किया है। विभाग ने वहां मौजूद अमेरिकी नागरिकों को अतिरिक्त सावधानी बरतने और संभावित यात्रा बाधाओं के लिए तैयार रहने की सलाह दी है।

    सऊदी अरब पर मिसाइल हमला
    दूसरी तरफ शनिवार को ही सऊदी अरब ने इस बात की पुष्टि की कि यमन के हूती विद्रोही गुट ने उसकी राजधानी रियाद को बैलिस्टिक मिसाइल से निशाना बनाने की कोशिश की थी।

    हूती सैन्य प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल याह्या सारी ने दावा किया कि उन्होंने सऊदी राजधानी रियाद और यानबू में स्थित तेल कंपनी अरामको की सुविधाओं को निशाना बनाने के लिए कई मिसाइलों और ड्रोन्स का इस्तेमाल किया। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के साथ चल रहे संघर्ष के बीच रियाद को निशाना बनाने की यह हालिया घटना है।

    यात्रियों के लिए जारी की चेतावनी
    इसके अलावा विदेश विभाग की चेतावनी में कहा गया है कि यह सैन्य संघर्ष तेजी से बढ़ सकता है, इसलिए अमेरिकी नागरिकों को पश्चिम एशिया की यात्रा पर जाने से बचना चाहिए। साथ ही, जो लोग पहले से वहां हैं, उन्हें एयरपोर्ट और उड़ानों से जुड़ी ताजा जानकारी पर नजर रखने की सलाह दी गई है।

     

  • ईरान ने ट्रंप के सामने रखीं 7 शर्तें, अमेरिका की नाकाबंदी हटाने और फंड रिलीज की मांग

    ईरान ने ट्रंप के सामने रखीं 7 शर्तें, अमेरिका की नाकाबंदी हटाने और फंड रिलीज की मांग

    वाशिंगटन
    पश्चिम एशिया में गहराते सैन्य संकट और तेजी से बदलते घटनाक्रमों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपना वीकेंड दौरा बीच में ही छोड़कर शनिवार को अचानक व्हाइट हाउस लौट आए हैं। ट्रंप का मैरीलैंड स्थित राष्ट्रपति आवास 'कैंप डेविड' से तय समय से एक दिन पहले वॉशिंगटन लौटना इस बात का साफ संकेत है कि क्षेत्र में तनाव बेहद नाजुक मोड़ पर पहुंच चुका है।

    व्हाइट हाउस प्रशासन की ओर से ट्रंप के अचानक लौटने की कोई आधिकारिक वजह नहीं बताई गई है, लेकिन यह कदम अमेरिकी विदेश मंत्रालय की ओर से जारी उस आपातकालीन सुरक्षा एडवाइजरी के तुरंत बाद आया है, जिसमें अमेरिकी नागरिकों को पश्चिम एशिया की यात्रा टालने और स्थिति के "अनियंत्रित रूप से बिगड़ने" की सख्त चेतावनी दी गई है।

    रियाद पर हूती मिसाइल हमला और US का 'ट्रैवल रेड अलर्ट'
    तनाव में इस ताजा उछाल की मुख्य वजह यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों की सऊदी अरब की राजधानी रियाद को निशाना बनाकर दागी गई बैलिस्टिक मिसाइल है।

    सऊदी अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने मिसाइल को बीच हवा में ही नष्ट कर दिया, जबकि हूतियों का दावा है कि उन्होंने रियाद के संवेदनशील ठिकानों को सफलतापूर्वक निशाना बनाया।

    इस हमले के तुरंत बाद अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने अपने दूतावासों के जरिए चेतावनी जारी करते हुए कहा, "यह सैन्य संघर्ष बेहद तेजी से उग्र रूप ले सकता है। क्षेत्र के भीतर या वहां से होकर यात्रा करने वाले सभी अमेरिकी नागरिक अपनी योजनाओं पर तुरंत पुनर्विचार करें।"

    ईरान की ट्रंप को 7 शर्तें: "पैसा छोड़ो, नौसेना नाकाबंदी हटाओ"
    इस भीषण तनाव के बीच ईरान ने युद्ध विराम और बातचीत की मेज पर लौटने के लिए वॉशिंगटन के सामने सात शर्तें रख दी हैं।

    ईरान के शीर्ष सुरक्षा प्रमुख मोहसेन रजाई ने अल जजीरा से बातचीत में खुलासा किया कि कतर के माध्यम से ये शर्तें अमेरिका को सौंप दी गई हैं और तेहरान अब राष्ट्रपति ट्रंप के जवाब का इंतजार कर रहा है।

    रजाई ने सार्वजनिक रूप से तीन मुख्य शर्तों का खुलासा किया:
    सभी मोर्चों पर युद्ध की तुरंत समाप्ति: क्षेत्र में जारी तमाम सैन्य कार्रवाइयों पर पूर्ण विराम।

    फ्रीज फंड की रिहाई: अलग-अलग इंटरनेश बैंकों में जब्त किए गए ईरान के अरबों डॉलर के फंड को तुरंत बहाल करना।

    अमेरिकी नौसेना नाकाबंदी का अंत: लाल सागर और फारस की खाड़ी में ईरान व उसके सहयोगियों के खिलाफ जारी अमेरिकी नेवल ब्लॉकैड को खत्म करना।

    निर्णायक जंग के लिए तैयार: तेहरान की दोटूक चेतावनी
    ईरानी सुरक्षा प्रमुख ने अमेरिकी प्रशासन को सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए कहा कि अगर वॉशिंगटन ने इन शर्तों को खारिज कर दिया, तो ईरान 'निर्णायक युद्ध' के लिए पूरी तरह तैयार है।

    उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप की धमकियों से ईरान डरने वाला नहीं है। कतर की मध्यस्थता में चल रही इस कूटनीतिक कोशिश के बीच अब पूरी दुनिया की नजरें व्हाइट हाउस पर टिकी हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप ईरान की शर्तों पर क्या रुख अपनाते हैं।

  • 100% टैरिफ का फैसला अभी नहीं, लेकिन भारत के लिए बढ़ी चिंता; रूस से तेल खरीद पर क्या है नया कानून?

    100% टैरिफ का फैसला अभी नहीं, लेकिन भारत के लिए बढ़ी चिंता; रूस से तेल खरीद पर क्या है नया कानून?

    वाशिंगटन 

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने  ऐतिहासिक 'लिंडसे ओ ग्राहम सेंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट 2026' पर हस्ताक्षर कर इसे कानूनी रूप दे दिया है। इस कानून के सामने आते ही वैश्विक शेयर और कमोडिटी बाजारों में हलचल मच गई है।

    मीडिया में यह सुर्खियां तैर रही हैं कि वॉशिंगटन अब रूस से कच्चा तेल और नेचुरल गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक का भारी-भरकम दंडात्मक टैरिफ लगाने जा रहा है। हालांकि, अगर इस नए कानून की बारीकियों और कानूनी प्रावधानों को समझें, तो तस्वीर कुछ अलग ही नजर आती है।

    'अधिकार मिलना' और 'लागू करना'- दो अलग बातें
    अमेरिकी संसद ने व्हाइट हाउस को रूसी ऊर्जा खरीदारों पर लगाम कसने के लिए नया कानूनी अधिकार दे दिया है। लेकिन कानून में इसका प्रावधान ऐसा रखा गया है जो राष्ट्रपति को तुरंत फैसला लेने के बजाय कूटनीतिक सौदेबाजी की पूरी छूट देता है।

    0 से 100% की फ्लेक्सिबल रेट: कानून में यह अनिवार्य नहीं है कि ट्रंप तुरंत 100% ही टैरिफ थोप दें। यह दर शून्य से लेकर 100 प्रतिशत के बीच कुछ भी रखी जा सकती है।

    30 दिनों की मोहलत: कानून लागू होने के बाद व्हाइट हाउस के पास 30 दिनों का समय होगा, जिसके बाद ही यह समीक्षा की जाएगी कि किन देशों ने रूसी ऊर्जा की नई खरीद की है।

    'टॉप-5' खरीदारों की समीक्षा: अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) हर 180 दिनों में दुनिया के उन 5 सबसे बड़े देशों की लिस्ट की समीक्षा करेगा जो रूस से सबसे ज्यादा तेल और गैस आयात करते हैं।

    राष्ट्रपति के पास 'राष्ट्रीय हित' में छूट देने का वीटो अधिकार
    इस कानून की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें राष्ट्रपति को असीमित विवेकाधिकार दिए गए हैं।

    अगर ट्रंप प्रशासन को लगता है कि किसी देश पर टैरिफ लगाने से अमेरिकी अर्थव्यवस्था या उसके रणनीतिक गठबंधनों को नुकसान पहुंचेगा, तो राष्ट्रपति इस टैरिफ को टाल या पूरी तरह माफ भी कर सकते हैं।

    अगर कोई देश धीरे-धीरे रूसी तेल पर अपनी निर्भरता कम कर रहा है, तो उस पर टैरिफ की दरों को घटाया भी जा सकता है।

    अमेरिका की तरफ से भारतीय सामानों पर तुरंत भारी-भरकम टैरिफ न लगाने के पीछे तीन प्रमुख आर्थिक और रणनीतिक कारण हैं:

    अमेरिका में महंगाई बढ़ने का डर: भारत से अमेरिका जाने वाले उपभोक्ता सामानों पर 100% ड्यूटी लगाने से खुद अमेरिकी जनता के लिए दैनिक चीजें बेहद महंगी हो जाएंगी, जिससे अमेरिका में महंगाई बेकाबू हो सकती है।

    द्विपक्षीय व्यापार समझौता: नई दिल्ली और वॉशिंगटन के बीच इस समय एक व्यापक व्यापार समझौते पर संवेदनशील बातचीत चल रही है। यह नया कानून अमेरिकी मेज पर बातचीत का पलड़ा भारी करने का एक औजार है, न कि तुरंत चलाया जाने वाला हथौड़ा।

    वैश्विक तेल बाजार में हड़कंप: अगर भारतीय रिफाइनरियों की क्षमता को अचानक विश्व बाजार से काट दिया जाता है, तो पूरे यूरोप और एशिया में पेट्रोल-डीजल की भारी किल्लत हो जाएगी, जिससे क्रूड की कीमतें आसमान छूने लगेंगी।

    क्या है भारत का रुख?
    विदेश मंत्रालय ने इस कानून के बनने के बाद दोहराया है कि भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता 1.4 अरब नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

    मंत्रालय का कहना है कि भारत बाजार की स्थितियों के हिसाब से अलग-अलग देशों से तेल खरीदता रहेगा और देश के आर्थिक और व्यापारिक हितों को सुरक्षित रखने के लिए हर जरूरी कानूनी और कूटनीतिक कदम उठाए जाएंगे।