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  • भारत पर भारी टैरिफ का हथियार तैयार, अमेरिका के कदम से बढ़ी चिंता

    भारत पर भारी टैरिफ का हथियार तैयार, अमेरिका के कदम से बढ़ी चिंता

     नई दिल्ली

    अमेरिका अब भारत पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने की तैयारी कर रहा है। खबर है कि रूसी प्रतिबंधों से जुड़े इस बिल पर मतदान होना है। दरअसल, इस विधेयक में एक संशोधन का भी प्रस्ताव दिया गया है, जिसमें भारत समेत कई देशों का नाम जोड़ने की बात कही गई थी। कहा जा रहा है कि बुधवार को इस पर मतदान होना है, जहां संभावनाएं जताई जा रही हैं कि यह बिल पास हो सकता है।

    इसका नाम लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट है। अमेरिकी सीनेट में इसे 86-11 वोट से पास कर दिया गया था। अब अगर यह बिल प्रतिनिधि सभा यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में पास हो जाता है, तो अमेरिका के राष्ट्रपति को रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने का अधिकार मिल जाएगा। खास बात है कि 3 नवंबर को मिड टर्म चुनाव होने हैं और सदन के महज 4 दिन ही बचे हैं।

    बिल में क्या
    इस विधेयक के जरिए अमेरिकी सरकार रूस के नेतृत्व और एनर्जी सेक्टर पर प्रतिबंध लगाना चाहती है। साथ ही उन जहाजों पर भी बैन लगाना चाहता है, जिनकी मदद से रूस तेल सप्लाई पर लगी पाबंदियों को दरकिनार कर आसानी से तेल आगे बढ़ाता है। इसे शैडो फ्लीट या गुप्त बेड़ा भी कहा जाता है। अमेरिका दावा करता रहा है कि रूस कच्चे तेल की मदद से ही यूक्रेन के खिलाफ युद्ध के लिए पैसा जुटा रहा है।

    इन देशों का नाम
    डेमोक्रेट सांसद स्टेनी होयर ने संशोधन पेश किया गया था, जिसमें देशों के नाम जोड़ने का प्रस्ताव था। इनमें चीन, भारत, तुर्किए, अजरबैजान, हंगरी, स्लोवाक गणराज्य, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, कजाकिस्तान और किर्गिज रिपब्लिक को शामिल करने की मांग गई थी। इन देशों पर 100 फीसदी शुल्क लगाया जा सकता है। इसे प्रतिनिधि सभा में पारित किया जाना बेहद जरूरी है।

    इससे पहले जब इसे सीनेट में पास किया गया था, तब इसमें उन देशों के नाम शामिल नहीं किए गए थे। हालांकि, ऐसे 5 बड़े इम्पोर्टर्स के नामों को जोड़ा गया था, जो सबसे ज्यादा तेल और गैस खरीदते हैं।

    पहले भी बनाया भारत को निशाना
    खास बात है कि बीते साल भी अमेरिका ने भारत को रूसी तेल का हवाला कर निशाना बनाया था। तब भारत पर 25 और 25 फीसदी यानी कुल 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया गया था। हालांकि, बाद में इसे कम किया गया। इतना ही नहीं अमेरिकी सरकार के कई नेताओं ने भारत की आपत्तिजनक शब्दों में आलोचना भी की थी। फिलहाल, दोनों देशों के बीच ट्रेड डील पर बातचीत चल रही है।

    कई नेता विरोध में भी
    खबरें हैं कि हकीम जेफ्रीज समेत कई डेमोक्रेटिक नेता इस बिल के विरोध में भी हैं। कुछ सांसदों की तरफ से बयान जारी किया गया था, 'प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटिक सदस्य यूक्रेन के समर्थन में पूरी मजबूती से खड़े हैं लेकिन लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट से फायदा होने के बजाय नुकसान अधिक होगा।'

    उन्होंने कहा, 'यह विधेयक शुल्क लगाने के राष्ट्रपति के अधिकारों का बहुत अधिक विस्तार करेगा लेकिन रूस पर प्रतिबंध लगाना अनिवार्य नहीं बनाएगा। ये दोनों ही बातें अस्वीकार्य हैं। इन खामियों के कारण अमेरिकियों के लिए वस्तुएं महंगी होंगी और दीर्घकाल के लिहाज से यूक्रेन के लिए समर्थन कमजोर होगा।'

  • सरकारी नौकरी के लिए ट्रंप से वफादारी क्यों? अमेरिकी कोर्ट ने आवेदकों से ऐसे सवाल पूछने पर लगाई रोक

    सरकारी नौकरी के लिए ट्रंप से वफादारी क्यों? अमेरिकी कोर्ट ने आवेदकों से ऐसे सवाल पूछने पर लगाई रोक

    वाशिंगटन

    अमेरिका में सरकारी नौकरी के लिए राजनीतिक वफादारी साबित नहीं करनी होगी. बोस्टन की अदालत ने डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन के उस नियम पर रोक लगा दी है, जिसमें आवेदकों से उनकी सोच पूछी जा रही थी. कोर्ट ने साफ कहा कि किसी उम्मीदवार से उसकी राजनीतिक राय जानने का सरकार को कोई हक नहीं है। 

    यह मामला उन सरकारी नौकरियों से जुड़ा है, जिन्हें राजनीतिक पद नहीं माना जाता. इसके बावजूद आवेदकों से पूछा जा रहा था कि वे ट्रंप की नीतियों और उनके कार्यकारी आदेशों को आगे बढ़ाने में किस तरह मदद करेंगे. कर्मचारी संगठनों ने इसे राजनीतिक सोच जानने वाला सवाल बताया था. उनका कहना था कि सरकारी नौकरी पाने के लिए किसी उम्मीदवार से राजनीतिक निष्ठा साबित करने को नहीं कहा जा सकता। 

    न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, बोस्टन की संघीय अदालत के जज जॉर्ज ओ'टूल ने तीन कर्मचारी यूनियनों का पक्ष माना. इन संगठनों ने पिछले साल ट्रंप प्रशासन के खिलाफ मुकदमा दायर किया था. कोर्ट के इस फैसले के बाद प्रशासन ऐसे सवाल को सरकारी नौकरी के आवेदन में जारी नहीं रख सकेगा। 

    ट्रंप के आदेश के बाद शुरू हुआ था सवाल
    मामला दरअसल ट्रंप प्रशासन के एक कार्यकारी आदेश से जुड़ा है. इसी आदेश को लागू करने के लिए सरकारी नौकरी के आवेदन में 'लॉयल्टी' से जुड़ा सवाल शामिल किया गया था. आवेदकों से एक तरह का जवाब मांगा जा रहा था कि वे ट्रंप की नीतियों को आगे बढ़ाने में किस तरह मदद करेंगे. सरकार के स्तर पर यह प्रक्रिया सरकारी कर्मचारियों की भूमिका से जुड़ी बताई गई थी. मगर कर्मचारी संगठनों ने इसका विरोध किया. उनका तर्क था कि जिन नौकरियों का काम राजनीतिक दल या किसी नेता के प्रति वफादारी से तय नहीं होता, वहां उम्मीदवार की राजनीतिक सोच जानना सही नहीं है। 

    जज बोले- राजनीतिक सोच पूछने की जरूरत नहीं
    रिपोर्ट्स के मुताबिक, जज जॉर्ज ओ'टूल ने अपने फैसले में कहा कि सरकार के पास आवेदकों की राजनीतिक मान्यताओं के बारे में इस तरह की जानकारी मांगने का कोई वैध हित नहीं है. यानी सिर्फ सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करने वाले व्यक्ति से यह जानना जरूरी नहीं है कि वह किसी राष्ट्रपति की राजनीतिक नीतियों के बारे में क्या सोचता है। 

    इस फैसले से ट्रंप प्रशासन की भर्ती प्रक्रिया को बड़ा झटका लगा है. कर्मचारी संगठनों के मुताबिक, देशभर में 70 हजार से ज्यादा संघीय सरकारी नौकरियों के विज्ञापनों में यह सवाल शामिल किया गया था। 

    तीन कर्मचारी संगठनों ने किया था मुकदमा
    तीन सरकारी कर्मचारी यूनियनों ने पिछले साल इस व्यवस्था को कोर्ट में चुनौती दी थी. उनका कहना था कि सरकारी नौकरी के उम्मीदवारों को अपनी योग्यता के आधार पर चुना जाना चाहिए, न कि उनकी राजनीतिक सोच के आधार पर। 

    अब अदालत के आदेश के बाद ट्रंप प्रशासन के लिए सरकारी नौकरियों के आवेदकों से इस तरह की 'लॉयल्टी' जानकारी मांगना रोक दिया गया है. मामला सिर्फ एक सवाल का नहीं है. इसके जरिए यह बहस भी सामने आई है कि सरकारी नौकरी में उम्मीदवार की योग्यता देखी जाए या उसकी राजनीतिक सोच। 

  • ईरान युद्ध से जुड़ी लीक पर ट्रंप का सख्त एक्शन, करीब 50 सैन्य अफसरों से पूछे गए सवाल

    ईरान युद्ध से जुड़ी लीक पर ट्रंप का सख्त एक्शन, करीब 50 सैन्य अफसरों से पूछे गए सवाल

    वाशिंगटन
    ईरान युद्ध से जुड़ी अहम जानकारी मीडिया तक पहुंचने के मामले में अमेरिका ने जांच तेज कर दी है. पेंटागन (संयुक्त राज्य अमेरिका के रक्षा विभाग ) ने करीब 50 ज्वाइंट स्टाफ सदस्यों का ट्रंप सरकार ने पॉलीग्राफ टेस्ट कराया है. जांच का मकसद यह पता लगाना है कि ईरान युद्ध से जुड़ी गोपनीय जानकारी पत्रकारों तक किसने पहुंचाई। 

    पहले जानते हैं पॉलीग्राफ टेस्ट क्या है. पॉलीग्राफ टेस्ट (Polygraph Test) को आम भाषा में लाई डिटेक्टर टेस्ट (Lie Detector Test) या झूठ पकड़ने वाली जांच कहा जाता है. इसमें सवालों के जवाब देते समय व्यक्ति की सांस, दिल की धड़कन और शरीर में होने वाले बदलावों को रिकॉर्ड किया जाता है. इन बदलावों से जांचकर्ता यह समझने की कोशिश करते हैं कि जवाब देते समय व्यक्ति के शरीर में किस तरह की प्रतिक्रिया हुई। 

    हालांकि, किसी व्यक्ति के तनाव में होने का मतलब यह अपने आप साबित नहीं करता कि वह झूठ बोल रहा है. इसलिए पॉलीग्राफ टेस्ट को जांच का एक हिस्सा माना जाता है, अंतिम सबूत नहीं. खैर, अब लौटते हैं अपनी खबर पर। 

    यह जानकारी अमेरिकी न्यूज एजेंसी द न्यूयॉर्क टाइम्स के हवाले से सामने आई है. रिपोर्ट के मुताबिक, जांच के दायरे में अमेरिकी सेना के ज्वाइंट स्टाफ से जुड़े करीब 50 लोग आए हैं. इनमें सैन्य अधिकारी के साथ कुछ नागरिक कर्मचारी भी शामिल हैं. पिछले महीने उनसे सवाल किए गए कि क्या उन्होंने अमेरिका के कम होते हथियारों के भंडार से जुड़ी जानकारी किसी पत्रकार को दी थी। 

    ईरान युद्ध में हथियारों की कमी की जानकारी लीक होने का शक
    मामला सिर्फ सामान्य सैन्य जानकारी के लीक होने का नहीं है. जांच उन खबरों को लेकर हो रही है, जिनमें ईरान के साथ युद्ध के दौरान अमेरिका के कुछ जरूरी हथियारों की कमी की बात सामने आई थी. ऐसे हथियार युद्ध में बेहद अहम होते हैं, इसलिए इनसे जुड़ी जानकारी को संवेदनशील माना जाता है. अब अमेरिकी जांचकर्ता यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि सैन्य व्यवस्था के भीतर से यह जानकारी बाहर कैसे पहुंची. इसी वजह से ज्वाइंट स्टाफ से जुड़े लोगों से पूछताछ की गई. पॉलीग्राफ टेस्ट भी इसी जांच का हिस्सा है। 

    पेंटागन ने क्या कहा?
    इस मामले पर पेंटागन ने जांच से जुड़ी खास जानकारी देने से इनकार किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, पेंटागन के प्रवक्ता सीन पार्नेल ने कहा कि विभाग आंतरिक कर्मचारियों या जांच से जुड़े मामलों पर टिप्पणी नहीं करता. उनका कहना था कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी गोपनीय जानकारी लीक होने के सभी मामलों को बेहद गंभीरता से लिया जाता है और उनकी जांच की जाती है। 

    पेंटागन अमेरिका के रक्षा विभाग का मुख्यालय है. यह वर्जीनिया के आर्लिंगटन में स्थित है. फिलहाल जांच का सबसे बड़ा सवाल यही है कि ईरान युद्ध के दौरान अमेरिका के हथियारों की स्थिति से जुड़ी संवेदनशील जानकारी पत्रकारों तक आखिर कैसे पहुंची। 

     

  • जन्म से अमेरिकी नागरिकता खत्म करने की ट्रंप की कोशिश पर ब्रेक, कोर्ट ने दिया बड़ा झटका

    जन्म से अमेरिकी नागरिकता खत्म करने की ट्रंप की कोशिश पर ब्रेक, कोर्ट ने दिया बड़ा झटका

    वाशिंगटन

    अमेरिका में इमिग्रेशन पॉलिसी सख्त करने की कोशिश में लगे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक और झटका लगा है. अमेरिका में एक फेडरल जज ने बुधवार, 2 सितंबर को ट्रंप सरकार को झटका दिया. जज ने ट्रंप सरकार को जन्म के आधार पर मिलने वाली अमेरिकी नागरिकता के नियमों को सीमित करने वाले नए आदेश को लागू करने से रोक दिया है. इस फैसले से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अमेरिका के अंदर जन्म के आधार पर मिलने वाली नागरिकता को सीमित करने की नई कोशिश फिलहाल रुक गई है. इससे पहले भी ट्रंप ने ऐसा ही कदम उठाया था, लेकिन अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने उनकी पिछली कोशिश को खारिज कर दिया था। 

    अब कोर्ट में क्या हुआ?
    मैरीलैंड की अमेरिकी जिला जज डेबोरा बोर्डमैन ने यह शुरुआती रोक लगाई है. एएफपी की रिपोर्ट के अनुसार मानवाधिकार संगठनों ने ट्रंप के 6 अगस्त के कार्यकारी आदेश को चुनौती दी थी. इस आदेश का निशाना उन लोगों पर था, जिन्हें ट्रंप ने “बर्थ टूरिज्म” यानी बच्चे को जन्म देने के लिए अमेरिका आने वाला बताया था। 

    बोर्डमैन ने अपने 35 पन्नों के फैसले में लिखा कि “सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुना चुका है. इस मामले में शामिल बच्चों को जन्म के समय ही अमेरिकी नागरिक माना जाता है.” उन्होंने आगे कहा कि ट्रंप का 6 अगस्त वाला आदेश लगभग निश्चित रूप से असंवैधानिक है, यानी अमेरिकी संविधान के खिलाफ है. प्रवासियों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने इस फैसले का स्वागत किया। 

    रिपोर्ट के अनुसार मैरीलैंड की संस्था वी आर कासा की लीगल डायरेक्टर शाना खदर ने कहा, “जन्म के आधार पर मिलने वाली नागरिकता पर हमला करने के मामले में ट्रंप सरकार इस अदालत में हार चुकी है, सुप्रीम कोर्ट में भी हार चुकी है और आज फिर हार गई। 

    ट्रंप के आदेश और अदालत के फैसले
    ट्रंप का नया कार्यकारी आदेश उन लोगों को निशाना बनाता है, जिनके बारे में उनका आरोप है कि वे पर्यटन के बहाने अमेरिका आते हैं, लेकिन असल में उनका इरादा बच्चे को जन्म देने का होता है. इस मुद्दे पर ट्रंप के पहले कार्यकारी आदेश में कहा गया था कि अमेरिका में अवैध रूप से रह रहे माता-पिता या अस्थायी वीजा पर अमेरिका आए माता-पिता के यहां पैदा होने वाले बच्चों को अपने आप अमेरिकी नागरिकता नहीं मिलेगी। 

    निचली अदालतों ने ट्रंप के इस कदम को रोक दिया था. अदालतों ने कहा था कि अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन के नागरिकता संबंधी नियम के तहत, अमेरिका की जमीन पर पैदा होने वाले लगभग हर व्यक्ति को अमेरिकी नागरिक माना जाता है. सुप्रीम कोर्ट भी इस बात से सहमत हुआ। 

    जन्म के आधार पर मिलने वाली नागरिकता को सीमित करने की ट्रंप की कोशिश उनकी अमेरिका में प्रवासियों की संख्या कम करने की बड़ी मुहिम का हिस्सा है. इस मुहिम में बिना कानूनी डॉक्यूमेंट वाले लाखों प्रवासियों को अमेरिका से निकालना और एक दर्जन से ज्यादा देशों के नागरिको को देश से निकाले जाने से मिली कानूनी सुरक्षा हटाना भी शामिल है। 

  • 65 बिलियन बैरल तेल की मेगा डील! ट्रंप बोले- हमने दुनिया की सबसे बड़ी ऑयल डील कर डाली

    65 बिलियन बैरल तेल की मेगा डील! ट्रंप बोले- हमने दुनिया की सबसे बड़ी ऑयल डील कर डाली

    वाशिंगटन

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को दावा किया कि अमेरिका ने वेनेजुएला के साथ एक समझौता किया है. इस समझौते के तहत अमेरिकी वेनेजुएला के लगभग 65 अरब बैरल तेल भंडार पर नियंत्रण करेगा. ट्रंप ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए इस डील की जानकारी दी है। 

    ट्रंप के मुताबिक, यह समझौता अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, रक्षा मंत्री हेगसेथ और वेनेजुएला की अंतिम राष्ट्रीपति डेल्सी रोड्रिग्ज के बीच बातचीत के बाद हुआ था. ट्रंप ने इसे दुनिया की सबसे बड़ी तेल डील करार दिया है। 

    ट्रंप ने लिखा, "संयुक्त राज्य अमेरिका ने अभी-अभी वेनेजुएला देश के साथ एक समझौता किया है – जो दुनिया के इतिहास की सबसे बड़ी तेल डील है!

    बता दें, यह ऐलान ऐसे समय में हुआ है जब ट्रंप के आदेश पर अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार कर अमेरिका लाने का ऑपरेशन चलाया था. ऐसा इसलिए किया गया था ताकि उन पर नार्को-टेररिज्म और ड्रग तस्करी के संघीय आरोप लगाए जा सकें। 

    अमेरिका में गैस की बढ़ती कीमतों के कारण राष्ट्रपति ट्रंप पर दबाव बढ़ते जा रहा है. लगभग छह महीने से ईरान में युद्ध हो रहा है. और फिलहाल इसके खत्म होने के कोई संकेत भी नहीं हैं. ऐसे में, अमेरिका ने अपनी रणनीतिक पेट्रोलियम भंडाल का इस्तेमाल किया है जिससे अगस्त की शुरुआत तक इसमें 30 करोड़ बैरल से भी कम तेल बचा था। 

    वेनेज़ुएला के तेल पर अमेरिका की इतनी नजर क्यों?
    वेनेज़ुएला के पास दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों में से एक है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक वहां जमीन के नीचे करीब 303 अरब बैरल कच्चा तेल मौजूद है. यह दुनिया के कुल तेल भंडार का करीब 17 फीसदी बताया जाता है. सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि इतना विशाल भंडार होने के बावजूद वेनेज़ुएला का तेल उत्पादन वैश्विक उत्पादन का करीब 1 फीसदी ही है. इसकी बड़ी वजह देश का खराब और जर्जर तेल इंफ्रास्ट्रक्चर माना जाता है. यानी तेल जमीन के नीचे मौजूद है, उसकी लोकेशन भी बड़े पैमाने पर पता है, लेकिन उसे निकालने और रिफाइन करने की क्षमता लंबे समय से कमजोर रही है. अमेरिका इसी क्षमता को दोबारा खड़ा करने में कारोबारी अवसर देख रहा है। 

    मादुरो के बाद बदला तेल का समीकरण
    वेनेज़ुएला में निकोलस मादुरो को सत्ता से हटाए जाने के बाद अमेरिका और देश की नई सरकार के बीच तेल को लेकर बातचीत तेज हुई. ट्रंप पहले ही अमेरिकी तेल कंपनियों से वेनेज़ुएला लौटकर वहां काम शुरू करने की अपील कर चुके थे. डेल्सी रोड्रिगेज भी इस कहानी में अहम किरदार हैं. वह पहले मादुरो सरकार में पेट्रोलियम और हाइड्रोकार्बन मंत्री रह चुकी हैं और अब अंतरिम राष्ट्रपति के तौर पर अमेरिका के साथ इस नई व्यवस्था का हिस्सा हैं. ट्रंप का दावा है कि वेनेज़ुएला ने दशकों पहले ह्यूगो चावेज़ के दौर में अमेरिकी कंपनियों की संपत्तियों का राष्ट्रीयकरण करके अमेरिकी तेल हितों को नुकसान पहुंचाया था. अब नई व्यवस्था को वह अमेरिका के लिए आर्थिक वापसी के तौर पर पेश कर रहे हैं। 

    जनवरी में मादुरो को सत्ता से हटाने के बाद ट्रंप ने अमेरिकी तेल कंपनियों को वेनेजुएला में वापस भेजने और वहां के तेल भंडारण के इस्तेमाल की बात कही थी. ट्रंप का कहना था कि वेनेजुएला ने अमेरिका का तेल चुराया था, जब वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज ने दशकों पहले सैकड़ों विदेश संपत्तियों का राष्ट्रीयकरण किया था. इनमें अमेरिकी तेल कंपनियों की संपत्तियां भी शामिल थी। 

    वेनेजुएला के पास दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों में से एक है, जहां जमीन के नीचे करीब 303 अरब बैरल कच्चा तेल है. अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के मुताबिक, यह दुनिया की कुल आर्पूति का लगभग 17% है. विशेषज्ञों की मानें तो दुनिया के अन्य हिस्सों के बिल्कुल विपरीत जहां भूवैज्ञानिकों को बिना इस्तेमाल किए गए तेल की खोज करनी पड़ती है. वहीं वेनेजुएला की जमीन के नीचे मौजूद भंडार का बहुत हद तक पता लगाया जा चुका है और उनकी जानकारी है. लेकिन खराब बुनियादी ढांचे के कारण यह देश दुनिया के तेल का सिर्फ 1% ही उत्पादन करता है। 

    'इससे देश के खजाने में भारी राजस्व आएगा'
    उन्होंने कहा कि यह समझौता अमेरिका की एनर्जी सप्लाई के लिए बहुत फायदेमंद है और दावा किया कि इससे अमेरिकी तेल भंडार दोगुने से भी ज़्यादा हो जाएंगे और गैस की कीमतें कम करने में मदद मिलेगी. वेनेज़ुएला की अंतरिम राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज ने इस समझौते का स्वागत करते हुए कहा कि इससे देश के खजाने में भारी राजस्व आएगा। 

    रोड्रिगेज ने कहा कि देश अपने विशाल तेल भंडार का इस्तेमाल करके एक बड़ा एनर्जी प्रोड्यूसर बनना चाहता है. साथ ही नौकरियां पैदा करना, वर्करों की इनकम बढ़ाना और जीवन स्तर में सुधार करना चाहता है. उन्होंने कहा, "इस तरह वेनेजुएला अपने लोगों के लिए रिकवरी, ग्रोथ, प्रोडक्शन, सुरक्षा और खुशहाली के एक नए दौर की शुरुआत कर रहा है। 

    अमेरिकी अधिकारी ने क्या बताया
    व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने कहा कि इस डील से अमेरिका को एक नए प्राइवेट जॉइंट वेंचर से पैदा होने वाले तेल का 55% हिस्सा मिलेगा. उम्मीद है कि यह वेंचर रिजर्व के मामले में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी प्राइवेट तेल कंपनी बन जाएगी. अधिकारी ने बताया कि अमेरिका के समर्थन से रोड्रिगेज ने उस प्राइवेट कंपनी को तेल क्षेत्रों को चलाने के लिए 100 साल का अधिकार दिया. इस वेंचर को अमेरिकी सरकार और वेनेजुएला की एक प्राइवेट कंपनी मिलकर चलाएगी। 

    CNN के मुताबिक अमेरिकी सरकार ने इस नई तेल कंपनी की आधी से ज्यादा वैल्यू हासिल कर ली है, जिसे इक्विटी ओनरशिप और गारंटीड 'एट-कॉस्ट ऑफ-टेक' (लागत मूल्य पर खरीद की गारंटी) के बीच बांटा गया है." अधिकारी के मुताबिक इससे जो तेल मिलेगा, उससे अमेरिकी स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व को फिर से भरने और अमेरिकी सेना की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी। 

  • 2020 चुनाव पर फिर बोले ट्रंप, गैर-नागरिकों के मतदान का किया दावा

    2020 चुनाव पर फिर बोले ट्रंप, गैर-नागरिकों के मतदान का किया दावा

    वॉशिंगटन
    भारत की चुनाव प्रक्रिया की प्रशंसा करने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि 2020 के अमेरिकी चुनाव में 24 हजार से अधिक गैर-नागरिकों ने अवैध रूप से मतदान किया था। उन्होंने अमेरिकी जनगणना ब्यूरो के हवाले से यह दावा किया है।

    ब्यूरो इस समय 2020 के मतदाता रिकार्ड की समीक्षा कर रहा है। ट्रंप ने मंगलवार को ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में कहा कि जनगणना ब्यूरो मतदाता रिकार्ड को उनके नागरिकता रिकार्ड से मिलाकर जांच कर रहा है।

    ट्रंप के दावे में क्या-क्या?
    ट्रंप ने आगे कहा कि पहले 12.8 करोड़ मतदाताओं की जांच में जनगणना ब्यूरो ने साबित किया है कि 24 हजार से ज्यादा गैर-नागरिकों ने अवैध रूप से मतदान किया किया था। उन्होंने कहा कि जनगणना ब्यूरो अब अगले 3.2 करोड़ मतदाताओं का विश्लेषण करने जा रहा है और यह संख्या बहुत ज्यादा बढ़ेगी।

    ट्रंप ने 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव को लेकर अपने दावे को दोहराते हुए कहा, 'मैंने चुनाव जीता था।' इसके साथ ही 'सेव अमेरिका एक्ट' को पारित की अपील करते हुए ट्रंप ने कहा, 'हमें सेव अमेरिका एक्ट को पारित करना चाहिए। इस मामले पर ध्यान देने के लिए धन्यवाद।

    ट्रंप के इस टिप्पणी के मायने क्या?
    बता दें कि ट्रंप की यह टिप्पणी 'सेफगार्ड अमेरिकी वोटर एलिजिबिलिटी (सेव) अमेरिका एक्ट के संदर्भ में आई है। उन्होंने अमेरिका में मतदान प्रक्रिया में बड़े बदलाव से जुड़े इस विधेयक का समर्थन किया है, जिसे 29 जनवरी को अमेरिकी संसद में पेश किया गया था।

    भारत की चुनाव प्रक्रिया की तारीफ की थी
    अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक दिन पहले ही न सिर्फ भारतीय चुनाव प्रक्रिया की तारीफ की थी, बल्कि भारत जैसी चुनाव प्रक्रिया को अमेरिका में भी अपनाए जाने की वकालत की थी। भारत के मतदाता पहचान पत्र का हवाला देते हुए ट्रंप ने कहा कि अब ‘सेव अमेरिका एक्ट’ को पारित करने का समय आ गया है।

     

  • किम जोंग उन को लेकर ट्रंप का बड़ा बयान, तस्वीर शेयर कर बोले- हमारे रिश्ते अच्छे हैं

    किम जोंग उन को लेकर ट्रंप का बड़ा बयान, तस्वीर शेयर कर बोले- हमारे रिश्ते अच्छे हैं

     वाशिंगटन, डी.सी
    उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन आए दिन अमेरिका को धमकी देते रहते हैं और दावा करते रहते हैं कि अमेरिका भी उनके खतरनाक हथियारों की जद में है। हालांकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उन्होंने कभी सीधा टारगेट नहीं किया। अब डोनाल्ड ट्रंप ने किम जोंग उन की तस्वीर साझा करते हुए ट्रुथ सोशल पर कहा कि उनके बीच अच्छे संबंध हैं। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस तस्वीर को देखकर नहीं लगता है कि उनके बीच दोस्ती होगी।

    ट्रंप ने किया है तंज
    डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, 'इस तस्वीर में भले ही हम लोग दोस्ती वाले मूड में नहीं दिख रहे हैं लेकिन कई ऐसी तस्वीरें भी हैं जिनमें हम मुस्कुरा रहे हैं। मेरी और कम जोंग उन की अच्छी बनती है।'बता दें कि ट्रंप ने यह तस्वीर ऐसे समय में शेयर की है जब दक्षिण कोरिया के साथ अमेरिका मिलिट्री ड्रिल करने वाला है। यह सैन्य अभ्यास 17 से 27 अगस्त तक चलेगा। उत्तर कोरिया ने इस सैन्य अभ्यास पर आपत्ति दर्ज करवाई है। ऐसे में माना जा रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप ने किम जोंग उनकी के साथ ऐसी तस्वीर शेयर करके उनपर तंज किया है।

    उत्तर कोरिया में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि जिस तरह से अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया करीब आ रहे हैं, वे एक न्यूक्लियर अलायंस बनाने की तैयारी में हैं। उन्होंने कहा कि उत्तर कोरिया भी चुप नहीं बैठेगा और इसका जवाब देगा।

    उत्तर कोरिया ने इन प्रक्षेपणों पर कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन विशेषज्ञों का आकलन है कि इनका संभावित उद्देश्य अमेरिका-दक्षिण कोरिया सैन्य अभ्यास का विरोध करना या हथियार प्रणालियों को उन्नत करना था। उत्तर कोरिया के विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को सरकारी मीडिया में जारी एक बयान में अमेरिका-दक्षिण कोरिया के सैन्य अभ्यास को ''आक्रामक युद्ध का ऐसा पूर्वाभ्यास'' बताया जिससे ''क्षेत्र में अलग स्तर की अस्थिरता पैदा हो रही है।''

    बयान में कहा गया, ''किसी नए स्तर के खतरे का जवाब नए स्तर की प्रतिरोधक क्षमता से देकर सुरक्षा सुनिश्चित करना हमारा सतत सिद्धांत है।' उत्तर कोरिया ने कहा कि वह ''किसी भी खतरे और चुनौती से निपटने के लिए वैध आत्मरक्षा के अधिकार का जिम्मेदारी और दृढ़ता से इस्तेमाल करके दुश्मनों के प्रति अपना रुख और स्पष्ट रूप से जाहिर करेगा।' उत्तर कोरिया ने यह भी कहा कि यह अभ्यास ''पिछले साल की तुलना में कहीं अधिक उकसावे वाला और खतरनाक'' होगा। हालांकि, दक्षिण कोरिया एवं अमेरिका ने ऐसा कुछ नहीं कहा है।

  • ईरान का खौफ या सुरक्षा वजह? ट्रंप ने माना- तुर्की से अमेरिका लौटते समय बदला गया विमान

    ईरान का खौफ या सुरक्षा वजह? ट्रंप ने माना- तुर्की से अमेरिका लौटते समय बदला गया विमान

    वाशिंगटन

    तुर्की में अमेरिकी राष्ट्रपति की जान को खतरा था और इसके लिए उन्होंने ट्रक में छिपकर अपना प्लेन बदल लिया. दुनिया को लगा कि ट्रंप अपने एयर फोर्स वन प्लेन में बैठकर जा रहे हैं लेकिन ट्रंप चकमा देते हुए किसी और प्लेन से अमेरिका पहुंचे. मीडिया में इस खबर के सामने आने के बाद आखिरकर ट्रंप ने भी इसे स्वीकार कर लिया है. डोनाल्ड ट्रंप ने माना है कि पिछले महीने तुर्की में हुए नाटो सम्मेलन से लौटते समय उन्होंने चुपचाप अपना प्लेन बदल लिया था. यह फैसला सीक्रेट सर्विस और अमेरिकी सेना की सलाह पर लिया गया था, क्योंकि उन्हें लेकर एक खतरा था. ट्रंप ने यह बात वॉशिंगटन पोस्ट की इस घटना पर रिपोर्ट आने के कुछ ही समय बाद मान ली है। 

    मीडिया से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि उन्होंने सीक्रेट सर्विस और सेना की बात मानी और दूसरे प्लेन में बैठ गए। 
    ट्रंप ने कहा, “यह पूरी तरह सीक्रेट सर्विस पर निर्भर है. मैं वही करता हूं जो वे चाहते हैं. मैं सीक्रेट सर्विस और सेना की बात मानता हूं. वे चाहते थे कि मैं दूसरी फ्लाइट और दूसरे प्लेन से जाऊं. उसकी सुरक्षा भी उतनी ही थी, लेकिन वे चाहते थे कि मैं ऐसा करूं, इसलिए मैंने किया. मैं वही करता हूं जो वे कहते हैं. मुझे लगता है कि वहां कोई खतरा था. मुझे बहुत सारी धमकियां मिलती हैं। 

    रिपोर्ट में क्या पता चला?
    राष्ट्रपति ट्रंप का यह बयान वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के बाद आया है. अखबार ने बताया था कि 8 जुलाई को तुर्की में नाटो सम्मेलन में शामिल होने के कुछ समय बाद ट्रंप ने ईरान की तरफ से हत्या की कोशिश के खतरे के बीच चुपचाप देश से बाहर निकलने के लिए एक सीक्रेट फ्लाइट ली थी। 

    खास बात है कि ट्रंप को बचाने के लिए ऐसी कार्रवाई की गई, इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को थी. इसे पत्रकारों और व्हाइट हाउस के कुछ कर्मचारियों से भी छिपाकर किया गया था. उन्हें तो लगा था कि वे उसी प्लेन में हैं, जिसमें राष्ट्रपति ट्रंप भी सफर कर रहे हैं. जब मीडिया ने ट्रंप से पूछा कि क्या एयर फोर्स वन में उड़ान भरना खतरनाक था, तो उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि जिस प्लेन से मैंने उड़ान भरी, वह असल में ज्यादा खतरे में था. क्योंकि मुझे लगता है कि हमलावरों के उस प्लेन को निशाना बनाने की ज्यादा संभावना थी। 

    ट्रंप ने ट्रक में बैठकर प्लेन बदला
    वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप कैमरों के सामने तो पुराने एयर फोर्स वन विमान में सवार हुए थे. लेकिन कुछ मिनट बाद उन्हें चुपचाप एक छोटे विमान एयर फोर्स सी-32ए में ले जाया गया. दूसरे प्लेन में चुपचाप जाने के लिए एयरपोर्ट के एक कैटरिंग ट्रक का इस्तेमाल किया गया. ऐसे ट्रक आमतौर पर उड़ान से पहले प्लेन में खाना और दूसरी जरूरी चीजें पहुंचाने के लिए इस्तेमाल होते हैं। 

    ट्रंप और उनके कई सहयोगी इसी कैटरिंग ट्रक में सवार हुए. ट्रक को हाइड्रोलिक सिस्टम की मदद से ऊपर उठाकर प्लेन के पास ले जाया गया. इसे एयर फोर्स वन के मुख्य दरवाजे के दूसरी तरफ मौजूद एक दरवाजे के सामने खड़ा किया गया, ताकि ट्रंप को किसी की नजर में आए बिना प्लेन से बाहर निकाला जा सके. इस तरह एयर फोर्स वन को एक “दिखावटी प्लेन” यानी डिकॉय बनाया गया था. उसमें मीडिया के लोग और व्हाइट हाउस के कुछ कर्मचारी मौजूद थे, जबकि ट्रंप पहले ही दूसरे प्लेन में चले गए थे. दुनिया को लग रहा था कि ट्रंप भी उसी प्लेन पर थे, जबकि ऐसा नहीं था। 

    अब सवाल उठ रहा है कि क्या मीडिया के लोगों और व्हाइट हाउस के कुछ कर्मचारियों की जान को खतरे में डाला गया. अगर ट्रंप की जान को खतरा था तो इन लोगों की जान को भी तो खतरा था. अगर सचमुच इस प्लेन पर अटैक हो जाता तो। 

  • Iran War: अमेरिका के 20 सैन्य ठिकानों पर तबाही, 42 विमान हुए नष्ट-क्षतिग्रस्त; अरबों डॉलर का नुकसान

    Iran War: अमेरिका के 20 सैन्य ठिकानों पर तबाही, 42 विमान हुए नष्ट-क्षतिग्रस्त; अरबों डॉलर का नुकसान

    वाशिंगटन
    फरवरी 2026 के अंत में अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ ऑपरेशन एपिक फ्यूरी शुरू किया. इसका मकसद ईरान की मिसाइल, ड्रोन और सैन्य क्षमता को कमजोर करना था. जवाब में ईरान ने मध्य पूर्व में फैले अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बड़े पैमाने पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए. रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान ने 2000 से अधिक मिसाइल और ड्रोन दागे। 

    इनमें बैलिस्टिक मिसाइल, क्रूज मिसाइल और एकतरफा हमलावर ड्रोन शामिल थे. अमेरिका और सहयोगियों ने ज्यादातर को रोक लिया, लेकिन कई हमले लक्ष्य तक पहुंच गए. इससे क्षेत्र में तनाव चरम पर पहुंच गया और अमेरिकी सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा। 

    ईरानी हमलों से अमेरिका को करीब 13 अरब डॉलर (123,818 करोड़ रुपए) का नुकसान होने का अनुमान लगाया गया है. इसमें इमारतों, रडार सिस्टम, ईंधन डिपो, हैंगर और अन्य बुनियादी ढांचे की मरम्मत का खर्च शामिल है. कुल सैन्य अभियान की लागत पेंटागन के अनुसार 29 अरब डॉलर तक पहुंच गई, जिसमें उपकरण मरम्मत भी शामिल है।  

    सैटेलाइट इमेज और कांग्रेसनल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि नुकसान आधिकारिक बयानों से कहीं ज्यादा था. हैंगर, बैरक, संचार केंद्र और एयर डिफेंस सिस्टम बुरी तरह प्रभावित हुए. कई ठिकानों को खाली करना पड़ा या संचालन सीमित करना पड़ा। 

    प्रभावित सुविधाएं और विमानों का नुकसान
    ईरान ने आठ देशों में 20 अमेरिकी या अमेरिका से जुड़े सैन्य सुविधाओं को निशाना बनाया. इनमें सऊदी अरब, यूएई, कतर, कुवैत, जॉर्डन, बहरीन, इराक और अन्य जगहों के एयर बेस शामिल हैं. प्रिंस सुल्तान एयर बेस (सऊदी अरब), अल उद्देद (कतर), अली अल सलेम (कुवैत) और अल धफरा (यूएई) जैसे प्रमुख ठिकानों को बार-बार निशाना बनाया गया। 

    रिसर्च सर्विस की रिपोर्ट के अनुसार कम से कम 42 अमेरिकी विमान क्षतिग्रस्त या नष्ट हुए. इनमें F-15E, F-35A, KC-135 टैंकर, E-3 सेंट्र्री एवाक्स, MQ-9 रीपर ड्रोन और अन्य शामिल हैं. कई विमान जमीन पर पार्क किए हुए थे जब उन पर हमला हुआ। 

    ये हमले दिखाते हैं कि आधुनिक युद्ध में सस्ते ड्रोन और मिसाइल महंगे रक्षा सिस्टम को चुनौती दे सकते हैं. अमेरिकी एयर डिफेंस सिस्टम जैसे पैट्रियट और थैड ने कई हमलों को रोका, लेकिन कुछ घुस गए. इससे क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों की सुरक्षा पर सवाल उठे. सैनिकों की मौत और घायलों की संख्या भी बढ़ी। 

    कई ठिकानों पर नुकसान इतना था कि संचालन प्रभावित हुआ. विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान ने अमेरिकी ठिकानों की कमजोरियों का अध्ययन कर सटीक निशाना साधा. इससे अमेरिका को मिसाइल डिफेंस और बेस सुरक्षा को और मजबूत करने की जरूरत महसूस हुई। 

    इस संघर्ष से दोनों पक्षों को भारी कीमत चुकानी पड़ी. अमेरिका ने ईरान की कई सैन्य क्षमताएं नष्ट कीं, लेकिन खुद को भी बड़ा नुकसान हुआ. मरम्मत और नए उपकरणों की लागत लंबे समय तक बजट पर असर डालेगी. क्षेत्र में स्थिरता अब भी नाजुक है. यह घटना याद दिलाती है कि बड़े पैमाने के संघर्ष में नुकसान सिर्फ एक तरफ नहीं होता. भविष्य में ऐसी स्थितियों से बचने के लिए कूटनीति और मजबूत रक्षा दोनों जरूरी हैं। 

    अमेरिकी हमलों में ईरान में भयानक तबाही
    ईरानी अधिकारियों के अनुसार, हाल के अमेरिकी हमलों में दर्जनों लोगों की मौत हुई है और सैकड़ों लोग घायल हुए हैं। दूसरी ओर, अमेरिकी सेना ने भी अपने कई और सैनिकों के घायल होने की पुष्टि की है। ईरान ने युद्ध शुरू होने के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही प्रभावी रूप से बाधित कर दी, जिससे वैश्विक तेल बाजार प्रभावित हुआ।

    कच्चे तेल की कीमतों में तेजी
     कच्चे तेल की कीमत 86 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई, जबकि इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों की संख्या तीन सप्ताह के न्यूनतम स्तर पर आ गई। युद्ध शुरू होने से पहले अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर बातचीत चल रही थी। अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर युद्ध समाप्त करने और लंबे समय तक चलने वाले पश्चिम एशिया संघर्ष से दूरी बनाने का घरेलू राजनीतिक दबाव बढ़ रहा है।

    ईरान में पीने के पानी का संकट
    ईरान के सरकारी टेलीविजन के अनुसार, अमेरिका के हवाई हमलों में ईरान के दक्षिणी होरमोज़गान प्रांत में स्थित एक बिजली संयंत्र और समुद्री जल को मीठा बनाने के संयंत्र को निशाना बनाया गया। ये हमले बोंजी नामक गांव में किए गए, जो होर्मुज जलडमरूमध्य के तट पर स्थित है। ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी के अनुसार, रातभर हुए हवाई हमलों में दो सुरंगें और एक पुल क्षतिग्रस्त हो गए, जिससे बंदर अब्बास जाने वाले प्रमुख राजमार्गों में से एक पर यातायात बाधित हो गया। बंदर अब्बास शहर होर्मुज जलडमरूमध्य के सबसे संकरे हिस्से के निकट स्थित है। ईरान ने यह भी बताया कि जलडमरूमध्य के भीतर स्थित सामरिक महत्व के केशम द्वीप पर भी हवाई हमले किए गए।

     

  • ट्रंप का पाकिस्तान को बड़ा संदेश! अमेरिका-ईरान बातचीत से बाहर हुए मुनीर और शहबाज, बढ़ी हलचल

    ट्रंप का पाकिस्तान को बड़ा संदेश! अमेरिका-ईरान बातचीत से बाहर हुए मुनीर और शहबाज, बढ़ी हलचल

    वाशिंगटन

    अमेरिका और ईरान के बीच फिर बातचीत की कोशिश शुरू होने के बीच पाकिस्तान की कथित मध्यस्थता को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को कहा कि ईरान के साथ बातचीत की पहल उसके कहने पर हो रही है और इसमें सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर की अहम भूमिका है. खास बात यह रही कि ट्रंप ने इस बार पाकिस्तान का नाम नहीं लिया। 

    ट्रंप ने कहा कि सऊदी अरब, UAE और कतर ने अमेरिका को ईरान पर बड़े सैन्य हमले से पीछे हटने और बातचीत का रास्ता अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया. उनके मुताबिक, अब बातचीत में होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दों का समाधान तलाशना अहम है. हालांकि, ईरान ने ट्रंप के सीधे बातचीत शुरू होने के दावे को खारिज किया है और कहा है कि फिलहाल उसकी बातचीत ओमान के साथ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही को लेकर हो रही है। 

    तो क्या पाकिस्तान मध्यस्थता से बाहर हो गया?
    जून 2026 में अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते के बाद पाकिस्तान और कतर को औपचारिक तौर पर मध्यस्थ पक्ष बताया गया था. कतर के विदेश मंत्रालय ने भी जून में कहा था कि वह पाकिस्तान की अगुवाई वाली मध्यस्थता का समर्थन कर रहा है. 22 जून को स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में हुई हाई-लेवल बैठक में अमेरिका और ईरान के साथ कतर और पाकिस्तान दोनों मध्यस्थ पक्ष के तौर पर शामिल हुए थे. उस समय परमाणु मुद्दे, प्रतिबंधों और आगे की बातचीत के लिए मंच बनाने पर चर्चा हुई थी। 

    राष्ट्रपति ट्रंप के बयान से ऐसा संकेत जरूर मिलता है कि मौजूदा चरण में खाड़ी देश ज्यादा प्रमुख भूमिका में दिखाई दे रहे हैं, लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगी कि पाकिस्तान पूरी तरह मध्यस्थता से बाहर हो गया है। 

    पाकिस्तान को लेकर क्यों उठे सवाल?
    पाकिस्तान की समस्या यह है कि वह एक तरफ ईरान के साथ अपने भौगोलिक और धार्मिक-सामाजिक संबंधों का फायदा उठा सकता है, तो दूसरी तरफ अमेरिका और सऊदी अरब के साथ उसके रणनीतिक रिश्ते भी हैं. यही संतुलन उसकी मध्यस्थता को मुश्किल बनाता है. हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि जून में खुद ट्रंप ने पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता को बातचीत आगे बढ़ाने में मददगार बताया था। 

    खाड़ी देशों की भूमिका क्यों बढ़ी?
    सऊदी अरब, UAE और कतर सीधे इस संकट से प्रभावित हैं. होर्मुज स्ट्रेट में तनाव का सीधा असर खाड़ी की अर्थव्यवस्था, तेल निर्यात और क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ता है. इसी वजह से इन देशों की कोशिश है कि अमेरिका और ईरान के बीच फिर से बड़ी जंग न छिड़े. मई में भी इन तीनों देशों ने ट्रंप से सैन्य कार्रवाई के बजाय बातचीत को मौका देने की अपील की थी। 

    ऐसे में ट्रंप का ताजा बयान पाकिस्तान के लिए जरूर एक कूटनीतिक झटका दिख सकता है, लेकिन तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं है. दोहा और मस्कट इस समय बातचीत के अहम केंद्र बनते दिख रहे हैं, जबकि पाकिस्तान की भूमिका पर्दे के पीछे या अगले दौर की बातचीत में फिर सामने आ सकती है। 

    सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार इस्लामाबाद सिर्फ एक सहायक मध्यस्थ रहेगा या फिर अमेरिका-ईरान के बीच अगले बड़े समझौते में दोबारा केंद्रीय भूमिका हासिल कर पाएगा. अगर ऐसा नहीं होता है तो यह पाकिस्तान के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं होगा, जिसके नेता अभी हाल के दिनों तक ही ट्रंप की आंखों का तारा बने हुए थे।