Tag: Supreme Court

  • बांके बिहारी मंदिर में चढ़ावे को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- दान का हर पैसा पहुंचे मंदिर के खाते में

    बांके बिहारी मंदिर में चढ़ावे को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- दान का हर पैसा पहुंचे मंदिर के खाते में

    वृंदावन 
       वृंदावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर प्रबंधन के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि मंदिर में दान किया गया एक-एक पैसा दान पात्र यानी गुल्लक (Donation Boxes) में जमा चढ़ावा या ऑनलाइन माध्यम से भेजी गई रकम सीधे मंदिर के आधिकारिक खजाने और खाते में ही जानी चाहिए। 

    अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि सेवायत या कोई अन्य व्यक्ति इस प्रक्रिया में कोई बाधा खड़ी करता है तो इस कृत्य को बहुत गंभीरता से लिया जाएगा. इसके साथ ही मंदिर की प्रबंध समिति को किसी भी तरह की गड़बड़ी रोकने के लिए एक पारदर्शी व्यवस्था लागू करने का आदेश कोर्ट ने दिया है। 

    कोर्ट ने यह भी कहा कि मंदिर के धन का उपयोग करके कोई भी संपत्ति या जमीन खरीदने के किसी भी प्रस्ताव पर अमल करने से पहले उसे अदालत के समक्ष लाना अनिवार्य होगा. याचिकाकर्ता की वकील तन्वी दुबे ने कहा कि हाई पावर कमेटी ने साल भर में 40 करोड़ रुपये खर्च कर दिए, लेकिन हालात जस के तस हैं. उल्टे श्रद्धालुओं की दिक्कत और बढ़ गई है. मंदिर के धन का उपयोग करके जमीन खरीदी गई है। 

    अधिकारियों की मनमानी पर रोक लगाई थी
    वृंदावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर के प्रबंधन और परंपराओं को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने हाई पावर कमेटी में प्रतिनिधियों के चयन को लेकर अधिकारियों की मनमानी पर रोक लगाई थी. कोर्ट ने कहा था कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुने गए प्रतिनिधि ही समिति में गोस्वामी समाज का प्रतिनिधित्व करेंगे। 

    चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने अपने आदेश में कहा था कि हाई पावर कमेटी में बांके बिहारी के राजभोग और शयन भोग सेवाधिकारियों में से दो-दो चुने हुए प्रतिनिधि शामिल किए जाएंगे. शयन भोग से गोपेश और हिमांशु गोस्वामी, जबकि राजभोग सेवाधिकारी के रूप में रजत और शैलेंद्र गोस्वामी को समिति में शामिल किया जाना था। 

    दरअसल, पिछले साल अगस्त में इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर जज जस्टिस अशोक कुमार की अगुआई में एक हाई पावर कमेटी बनाई गई थी. इस समिति में मथुरा के डीएम समेत अन्य अधिकारी और गोस्वामी समाज के चार प्रतिनिधियों को शामिल किया गया था. समिति का मकसद मंदिर में दर्शन व्यवस्था और भीड़ प्रबंधन को बेहतर बनाना था। 

     

  • 14वीं JPSC परीक्षा की CBI जांच की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने JPSC-JSSC से मांगा जवाब

    14वीं JPSC परीक्षा की CBI जांच की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने JPSC-JSSC से मांगा जवाब

     रांची
    14वीं झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) की प्रारंभिक परीक्षा में कथित अनियमितताओं की सीबीआई जांच की मांग को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के बाद सर्वोच्च अदालत ने मामले में जेपीएससी और जेएसएससी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

    यह जनहित याचिका प्रार्थी हरिशरण देवगन की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई है। याचिका में 14वीं जेपीएससी प्रारंभिक परीक्षा से जुड़े मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से कराने की मांग की गई है।
     
    जेपीएससी-जेएसएससी से मांगा जवाब
    सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान झारखंड लोक सेवा आयोग और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग को नोटिस जारी किया है। अदालत के इस कदम के बाद अब दोनों आयोगों को याचिका में लगाए गए आरोपों और उठाए गए सवालों पर अपना पक्ष रखना होगा

    हाईकोर्ट के बाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
    JPSC भर्ती परीक्षाओं को लेकर चल रहे विवाद के बीच अब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। इससे पहले पिछले सप्ताह झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के 11वीं और 13वीं JPSC परीक्षा एवं उनसे हुई नियुक्तियों को रद्द करने के फैसले पर रोक लगा दी थी। हाईकोर्ट के इस आदेश से उन अभ्यर्थियों को राहत मिली थी, जिनकी नियुक्तियां रद्द होने की आशंका थी।

    अब 2025 की JPSC प्रारंभिक परीक्षा में कथित अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई है। हाईकोर्ट के आदेश और सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के बाद JPSC भर्ती परीक्षाओं को लेकर कानूनी लड़ाई और महत्वपूर्ण हो गई है।

    सीबीआई जांच की मांग
    बता दें कि, याचिका में 14वीं जेपीएससी प्रारंभिक परीक्षा में कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई गई है। प्रार्थी की ओर से मामले की जांच सीबीआई से कराने का अनुरोध किया गया है। अब सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद मामले में आगे की सुनवाई और आयोगों के जवाब पर नजर रहेगी।

     

  • तमिलनाडु गौहत्या विवाद में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप, राज्य सरकार की मांग को मिली राहत, HC का आदेश बदला

    तमिलनाडु गौहत्या विवाद में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप, राज्य सरकार की मांग को मिली राहत, HC का आदेश बदला

    चेन्नई/ नई दिल्ली

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें बकरीद या किसी दूसरे दिन तमिलनाडु राज्य में कहीं भी गाय या बछड़े के वध पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया गया था।जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली तमिलनाडु राज्य की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका पर नोटिस जारी किया। साथ ही अदालत ने अंतरिम आदेश पारित किया, जिसमें राज्य में गायों और बछड़ों के वध पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया गया था।

    सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
    बेंच ने टिप्पणी की कि हाई कोर्ट के आदेश, जिसमें राज्यभर में प्रतिबंध लगाने की बात कही गई थी, उसके आखिरी पैराग्राफ में शुरुआती आधार में "सुधार" की जरूरत है। बेंच ने टिप्पणी की कि वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंहवी राज्य की ओर से पेश हुए।

    राज्य सरकार ने क्या तर्क दिया?
    राज्य ने तर्क दिया कि हाई कोर्ट का आदेश तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958 के उलट है, जो सक्षम प्राधिकारी की ओर से जारी प्रमाण पत्र के आधार पर 10 साल से ज्यादा उम्र की उन गायों के वध की अनुमति देता है, जो काम करने और प्रजनन के लिए अनुपयुक्त हैं। इस कानून के अलावा, दूसरे लागू कानून जैसे पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960, पशु क्रूरता निवारण (वधगृह) नियम, 2001, तमिलनाडु शहरी स्थानीय निकाय अधिनियम, 1998 और तमिलनाडु शहरी स्थानीय निकाय नियम, 2023 उन शर्तों को रेगुलेट करते हैं जिनके तहत पशुओं का वध किया जा सकता है, लेकिन पूरी तरह प्रतिबंध नहीं लगाते हैं। राज्य के अनुसार, पूर्ण प्रतिबंध का निर्देश देकर, हाई कोर्ट ने वैधानिक कानून के स्थान पर न्यायिक विधान लागू कर दिया है।

    गाय-बछड़े को काटने की मिल गई इजाजत

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार 13 जुलाई 2026 को तमिलनाडु में बकरीद समेत किसी भी दिन राज्यभर में गाय और बछड़ों को काटने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने संबंधी मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी. शीर्ष अदालत ने माना कि हाईकोर्ट के आदेश के अंतिम हिस्से में संशोधन की जरूरत है और तमिलनाडु सरकार की विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर नोटिस जारी कर दिया. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह अंतरिम आदेश दिया है. तमिलनाडु सरकार की ओर से सीनियर वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने पक्ष रखा. सरकार ने दलील दी कि हाईकोर्ट का आदेश राज्य में लागू तमिलनाडु एनिमल प्रिजर्वेशन एक्ट, 1958 के प्रावधानों के विपरीत है. इस कानून के तहत 10 वर्ष से अधिक उम्र तथा काम और प्रजनन (बच्‍चे पैदा करने की क्षमता) के लिए उपयोगी नहीं रह गईं गायों को काटने की अनुमति दी गई है. हालांकि, सक्षम अधिकारी से इसकी अनुमति लेनी होगी। 

    तमिलनाडु सरकार की दलील
    राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि पशु वध (Animal Slaughter) से संबंधित अन्य कानून (जैसे प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स एक्ट, 1960, स्लॉटर हाउस नियम, 2001, तमिलनाडु अर्बन लोकल बॉडीज एक्ट, 1998 और तमिलनाडु अर्बन लोकल बॉडीज रूल्स, 2023) पशुओं को काटने की प्रक्रिया और शर्तों को नियंत्रित करते हैं. तमिलनाडु सरकार ने दलील दी कि लेकिन इनमें कहीं भी पूर्ण प्रतिबंध का प्रावधान नहीं है. सरकार का कहना था कि हाईकोर्ट ने ऐसा आदेश देकर न्यायिक आदेश के माध्यम से कानून बनाने का प्रयास किया, जो वैधानिक प्रावधानों के विपरीत है। 

    मद्रास हाईकोर्ट का वो आदेश
    मद्रास हाईकोर्ट ने 27 मई 2026 को (बकरीद से ठीक पहले) को गाय और बछड़ों को काटने पर प्रतिबंध लगा दिया था. जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस वी लक्ष्मीनारायण की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया था. यह याचिका हिंदू मक्कल काची के महासचिव के. सूर्य प्रशांत ने दायर की थी. याचिका में केवल यह मांग की गई थी कि बकरीद के दौरान वध केवल अधिकृत और निर्धारित स्थानों पर ही हो, लेकिन हाईकोर्ट ने इससे आगे बढ़ते हुए राज्यव्यापी प्रतिबंध लागू कर दिया. तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा कि हाईकोर्ट ने उस राहत से कहीं अधिक व्यापक आदेश पारित किया, जिसकी याचिका में मांग ही नहीं की गई थी. सरकार का यह भी कहना है कि जब कानून अधिकृत बूचड़खानों में कुछ श्रेणी की गायों के वध की अनुमति देता है, तब अदालत का पूर्ण प्रतिबंध लगाने का निर्देश वैधानिक व्यवस्था से टकराता है और इसे बरकरार नहीं रखा जा सकता। 

    क्या था हाई कोर्ट का वो फैसला?
    हाई कोर्ट के जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस वी. लक्ष्मीनारायण की बेंच ने बकरीद की पूर्व संध्या पर 27 मई को हिंदू मक्कल कच्ची के महासचिव के. सूर्य प्रशांत की तरफ से दायर जनहित याचिका पर यह आदेश पारित किया। भले ही याचिकाकर्ता की मांग ये थी कि वध या बलि केवल तय जगहों पर ही हो, लेकिन हाई कोर्ट ने एक बड़ा आदेश जारी कर किसी भी दिन कहीं भी गायों और बछड़ों की बलि पर प्रतिबंध लगा दिया।

    आदेश पारित करते समय, हाई कोर्ट ने एक सरकारी आदेश का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि दूध उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए गायों की हत्या पर रोक जरूरी है। हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उन पुराने आदेशों का भी जिक्र किया, जिनमें कहा गया था कि बकरीद के लिए गायों की हत्या अनिवार्य प्रथा नहीं है।

    हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए, राज्य ने तर्क दिया कि जब कानून कुछ विशेष जगहों पर गायों की एक विशेष श्रेणी की हत्या की अनुमति देता है, तो वैधानिक प्रावधान के उलट न्यायिक निर्देश मान्य नहीं हो सकता।राज्य का तर्क है कि कार्यकारी निर्देश तमिलनाडु में पशु वध को नियंत्रित करने वाले वैधानिक अधिनियमों को रद्द या निरस्त नहीं कर सकता।

  • बेटियां अब अनुकंपा नियुक्ति से नहीं होंगी वंचित, सुप्रीम Court ने साफ किया अधिकारों का दायरा

    बेटियां अब अनुकंपा नियुक्ति से नहीं होंगी वंचित, सुप्रीम Court ने साफ किया अधिकारों का दायरा

     नई दिल्ली

    सुप्रीम कोर्ट ने विवाह के बाद बेटियों के अधिकार को लेकर बड़ा फैसला दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि विवाह के बाद भी बेटी परिवार का ही अंग है. किसी बेटी को अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के लिए सिर्फ इसलिए अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता है, क्योंकि वह विवाहित है. सुप्रीम कोर्ट के इस बड़े फैसले ने विवाहित बेटियों के अधिकार को लेकर छाई भ्रम की धुंध हटा दी है। 

    सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने इस दलील को खारिज कर दिया कि निवास एक अलग पात्रता शर्त है, जिसका मूल्यांकन प्रत्येक मामले के तथ्यों पर किया जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सभी विवाहित बेटियों के अधिकार खारिज किए जाने को इस धारणा के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता कि हर विवाहित बेटी जरूरी रूप से कहीं और रहती है। 

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक निर्णय उन अनुमानों पर आधारित नहीं किया जा सकता, जो व्यापक हैं और जीवंत वास्तविकताओं से कटे हुए हैं. सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता निशा ने तर्क दिया कि विवाहित बेटियों को एक लाभकारी योजना से बाहर करने का कोई तर्कसंगत आधार नहीं है और यह समानता की संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन करता है. सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि विवाहित बेटियाँ आम तौर पर अपने वैवाहिक घरों में चली जाती हैं। 

    सरकार की ओर से दलील यह भी दी गई कि विवाह के बाद बेटियां स्थानीय निवास की आवश्यकता को पूरा नहीं कर सकती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा का उद्देश्य उत्तराधिकार का अधिकार बनाना नहीं, एक मृतक के परिवार को तत्काल वित्तीय राहत देना और सार्वजनिक वितरण प्रणाली में निरंतरता सुनिश्चित करना है. एक बार जब निर्भरता को मानक रूप में स्वीकार कर लिया जाता है, तो एक विवाहित बेटी को केवल इसलिए बहिष्कृत करना तर्कहीन हो जाता है। 

    सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर फैसला सुनाया कि क्या विवाहित बेटियों को संवैधानिक रूप से 'परिवार' की परिभाषा से बाहर रखा गया है? क्या अनुकंपा के आधार पर उन्हें उचित मूल्य की दुकान का लाइसेंस दिया जा सकता है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2025 में दिए अपने निर्णय में कहा था कि केवल अविवाहित बेटी को ही अनुकंपा के आधार पर माता या पिता के नाम से लाइसेंस वाली उचित मूल्य की राशन दुकान का आवंटन अनुकंपा के आधार पर ट्रांसफर हो सकता है। 

    याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. अपनी याचिका में विवाहित बेटी ने यह तर्क दिया था कि वह अपने पिता की मृत्यु के बाद मां और एक विकलांग बहन की देखभाल कर रही है। 

  • जाति मुक्त समाज की बात, लेकिन अब बांटने लगे; सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी सख्त टिप्पणी

    जाति मुक्त समाज की बात, लेकिन अब बांटने लगे; सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी सख्त टिप्पणी

    नई दिल्ली

    सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को जमकर लताड़ा। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि देश में हमें एक जाति मुक्त समाज बनाना था, लेकिन हम लगातार बंटते जा रहे हैं। इसके साथ ही देश की सर्वोच्च अदालत ने 2027 की जनगणना में 'विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों' की अलग से गणना करने की मांग वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह एक नीतिगत निर्णय है और यह न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र का विषय नहीं है। हालांकि कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को संबंधित अधिकारियों के समक्ष अपनी बात रखने की छूट दी है।

    मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, "भारत एक बहुत ही अनूठा देश है। एक जातिविहीन समाज विकसित करने के बजाय, हम अधिक से अधिक वर्गीकरण बनाना चाहते हैं।"

    जब याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि सरकार भी इसके पक्ष में है तो सीजेआई ने संदेह जताते हुए कहा, "ये बहुत ही नपे-तुले कदम हैं। ये कोई साधारण दावे नहीं हैं जो अचानक हमारे सामने आ गए हैं। यह समाज को विभाजित करने की एक बहुत ही गहरी साजिश है। ये एजेंसियां भारत के भीतर की नहीं हैं। यदि हम जांच करेंगे, तो पता चल जाएगा कि इन्हें कहां से रूट किया जा रहा है।"

    DNT समुदाय के नेता दक्षकुमार बजरंगे और अन्य की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने दलील दी कि इन समुदायों ने ऐतिहासिक अन्याय सहा है। अंग्रेजों ने इन्हें आपराधिक जनजाति (Criminal Tribes) करार दिया था। वर्तमान जनगणना फॉर्म में केवल एससी, एसटी और 'अन्य' की श्रेणियां हैं। याचिकाकर्ताओं की मांग थी कि एक अलग विकल्प दिया जाए ताकि इन समुदायों की सटीक जनसंख्या का पता चल सके।

    अंतिम गणना 1913 में
    दवे ने कोर्ट को बताया कि आखिरी बार इन समुदायों की गणना 1913 में हुई थी। इदाते आयोग (2017) और रेनके आयोग (2008) जैसी कई समितियों ने भी इनकी अलग से गिनती की सिफारिश की है।

    याचिका में कहा गया है कि भारत में लगभग 10 से 12 करोड़ की आबादी वाले इन समुदायों को आजादी के बाद कभी अलग से नहीं गिना गया। आंकड़ों के अभाव के कारण ये समुदाय कल्याणकारी योजनाओं और आरक्षण का लाभ उठाने में असमर्थ हैं। 1871 के 'क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट' के कारण इन पर जो कलंक लगा था, वह कानून रद्द होने के बावजूद आज भी सामाजिक और आर्थिक रूप से इनका पीछा कर रहा है।

    कोर्ट का अंतिम फैसला
    पीठ ने मामले का निपटारा करते हुए कहा कि जनगणना की प्रक्रिया में वर्गीकरण या उप-वर्गीकरण करना पूरी तरह से केंद्र सरकार और विशेषज्ञों के कार्यक्षेत्र में आता है। कोर्ट ने कहा, "हमारी सुविचारित राय में याचिकाकर्ताओं द्वारा मांगी गई मांग नीतिगत दायरे में आती है, जिस पर निर्णय भारत सरकार के सक्षम प्राधिकारी को लेना है। यह न्यायसंगत मुद्दा नहीं है।" अदालत के इस फैसले के बाद अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है कि वह आगामी 2027 की जनगणना में इन समुदायों की पहचान के लिए क्या कदम उठाती है।

  • फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ का विवाद समाप्त, मेकर्स ने टाइटल बदला, SC ने रखा समुदाय सम्मान का ख्याल

    फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ का विवाद समाप्त, मेकर्स ने टाइटल बदला, SC ने रखा समुदाय सम्मान का ख्याल

    मुंबई 
    नीरज पांडे की अपकमिंग फिल्म 'घूसखोर पंडत' को लेकर कानूनी विवाद खत्म हो गया है. ब्राह्मण समाज और बाकी संगठनों से मिली आलोचनाओं के बाद फिल्ममेकर ने घूसखोर पंडत टाइटल वापस ले लिया है. उनकी इस पहल को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म के खिलाफ दाखिला की गई याचिकाओं को बंद कर दिया है.

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फिल्ममेकर के पॉजिटिव रिस्पॉन्स को देखने के बाद इस विवाद को पूरी तरह खत्म कर देना चाहिए. कोर्ट ने कहा- हम आपके स्टैंड और फिल्म के टाइटल वापस लेने के फैसले की सराहना करते हैं. फिल्ममेकर की तरफ से कोर्ट में कहा गया कि उनका कभी भी किसी समुदाय को अपमानित और उसे बदनाम करने का इरादा नहीं था. 

    कोर्ट में हुआ क्या दलीलें?
    फिल्ममेकर की तरफ से सीनियर वकील एन के कौल ने कोर्ट में दलील देते हुए कहा कि हमने टाइटल पूरी तरह वापस ले लिया है. किसी समुदाय को अपमानित करने का कोई इरादा कभी नहीं था. 'पंडत' शब्द फिल्म के मेन कैरेक्टर के निकनेम से आया था. जिसमें दिखाया गया कैसे एक बुरा पुलिसवाला अच्छा पुलिस अफसर बनता है. ये क्राइम ड्रामा है.

    जस्टिस नागरत्ना ने कहा– हम 'पंडित्य' और 'पंडित' शब्द समझते हैं. इसे 'घूसखोर' से जोड़ने पर गलत मैसेज जाता.

    एन के कौल– हमने टाइटल वापस ले लिया है.

    याचिकाकर्ता- टाइटल बदलना चाहिए. उन्होंने नया टाइटल तय नहीं किया है.

    सुप्रीम कोर्ट- उन्होंने कहा है कि टाइटल बदल रहे हैं.

    याचिकाकर्ता- मूवी के अंदर पंडित समुदाय को बदनाम करने वाला कोई कंटेंट नहीं होना चाहिए.

    एन के कौल– क्या आपने फिल्म देखी है? मूवी किसी को ठेस नहीं पहुंचाती, ना अपमानित करती है.

    याचिकाकर्ता- उन्हें ऐसा ऐलान करना चाहिए कि इस फिल्म में कुछ भी अपमानित करने वाला नहीं होगा.

    एन के कौल– हमने कहा है कि टाइटल बदल दिया है.

    जस्टिस नागरत्ना- फिल्म अभी एडिटिंग स्टेज पर है. उन्होंने पॉजिटिवि जवाब दिया है. अब क्या बचा है आगे??

    एन के कौल– मैं क्लियर करना चाहता हूं कि टाइटल पूरी तरह वापस ले लिया गया. नया टाइटल अभी फाइनल नहीं हुआ, लेकिन मेरा वादा है कि नया टाइटल पुराने जैसा नहीं होगा.

    याचिकाकर्ता- कंटेंट का क्या होगा? ट्रेलर में तो इस शब्द का इस्तेमाल होता हुआ दिख रहा है.

    सुप्रीम कोर्ट- वो टाइटल वापस ले रहे हैं. क्या आपने बिना नाम वाली कोई तस्वीर देखी है?

    एन के कौल– हमने मूवी का नाम बदल दिया है. फिल्म के खिलाफ कोई याचिका दायर कर रहा है. कहीं FIR हो रही है. इस उत्पीड़न पर रोक लगनी चाहिए.

    जस्टिस नागरत्ना- डायरेक्टर-प्रोड्यूसर ने हलफनामा दाखिल कर दिया है. वरिष्ठ वकील ने बताया कि टाइटल पूरी तरह वापस लेने के बाद ये मामला खत्म हो गया. हलफनामे को रिकॉर्ड पर लिया जाए. काउंसिल ने बताया कि याचिकाकर्ता की शिकायतों का समाधान हो गया है. मूवी का नया टाइटल पुराने विवादित नाम जैसा बिल्कुल नहीं होगा.

    बात करें मूवी की तो, इसमें मनोज बाजपेयी, अजय दीक्षित का रोल प्ले रहे हैं. वो एक ऐसा पुलिस अफसर है जो करप्ट है. फिल्म को रितेश शाह ने डायरेक्ट किया है और नीरज पांडे ने लिखा है. मूवी में नुशरत भरुचा, साकिब सलीम, कीकू शारदा अहम रोल में दिखेंगे. 

  • सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: सौतेली बेटी की हत्या के मामले में आरोपी बरी, वकील की दलील हुई सराही

    सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: सौतेली बेटी की हत्या के मामले में आरोपी बरी, वकील की दलील हुई सराही

    नई दिल्ली

    सुप्रीम कोर्ट ने छह वर्षीय सौतेली बेटी की हत्या के आरोपी व्यक्ति की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को  रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने 'जांच में गड़बड़ी' और अभियोजन पक्ष द्वारा परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी सीरीज स्थापित करने में विफलता का हवाला देते हुए यह आदेश सुनाया। न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने अभियोजन पक्ष का प्रतिनिधित्व करने वाली वकील अंकिता शर्मा की तारीफ की। कोर्ट ने 'सटीक तैयारी' और जांच में आई बड़ी बाधाओं के बावजूद "कुशलतापूर्वक और उत्साह के साथ" मामले की पैरवी करने के लिए प्रशंसा की।
    वकील की तारीफ

    पीठ ने कहा, 'हम सरकारी वकील की सराहना करना चाहेंगे, जिन्होंने हमारे अवलोकन के लिए संपूर्ण अभिलेखों-मूल भाषा और उनके अनुवाद सहित का संकलन तैयार करने का प्रयास किया।'
    पुलिस पर उठाए सवाल

    हालांकि, शीर्ष अदालत ने छत्तीसगढ़ पुलिस की 'गड़बड़ जांच' की कड़ी आलोचना की। जिसके कारण छह साल की बच्ची की हत्या के मामले में कई सवालों के जवाब नहीं मिल पाए, जहां असली अपराधी बिना सजा के बच गए और उसके सौतेले पिता को 'महज अनुमानों' के आधार पर जेल में डाल दिया गया।

    फैसला लिखने वाले न्यायमूर्ति चंद्रन ने कहा, 'हम इस बात से चकित हैं कि यदि जांच वकील की तैयारी के आधे स्तर की भी होती, तो उस बेचारी बच्ची के लापता होने और मृत्यु को लेकर रहस्य सुलझ सकता था। हम अपीलकर्ता के वरिष्ठ वकील द्वारा जांच के लचर रुख को प्रभावी ढंग से उजागर करने के प्रयासों की भी सराहना करते हैं।'
    अपील को किया स्वीकार

    फैसले में रोहित जांगड़े की अपील को स्वीकार कर लिया गया, जिन्हें छत्तीसगढ़ की एक निचली अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद जेल में डाल दिया गया था। निचली अदालत के फैसले को उच्च न्यायालय ने भी बरकरार रखा था। यह मामला छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में अक्टूबर 2018 का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, पांच अक्टूबर 2018 को रोहित जांगड़े और उनकी दूसरी पत्नी के बीच झगड़ा हुआ था। इसके बाद पत्नी अपने माता-पिता के घर चली गई।
    क्या था मामला

    आरोप था कि जांगडे अपनी सौतेली बेटी को मोटरसाइकिल पर बिठाकर ले गया। बच्ची लापता हो गई, लेकिन औपचारिक शिकायत 11 अक्टूबर को दर्ज कराई गई। उच्चतम न्यायालय ने मामले की पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई की कड़ी आलोचना की। अभियोजन पक्ष के अनुसार आरोपी को 13 अक्टूबर, 2018 को गिरफ्तार किया गया था।

  • SC का आदेश: ‘घूसखोर पंडत’ रिलीज से पहले नाम बदलना अनिवार्य

    SC का आदेश: ‘घूसखोर पंडत’ रिलीज से पहले नाम बदलना अनिवार्य

    नई दिल्ली
     नेटफ्लिक्स की अगली फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ का प्रोमो आने के बाद फिल्म विवादों में घिर गई. मनोज बाजपेयी स्टारर फिल्म के टाइटल पर इतना हंगामा मचा कि मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा गया. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने फिल्ममेकर नीरज पांडे की फिल्म के टाइटल को लेकर कड़ी नाराजगी जताई है और इस टाइटल से फिल्म के रिलीज पर रोक लगा दी. कोर्ट ने दो टूक कहा कि किसी समाज के एक वर्ग को इस तरह के नाम से क्यों बदनाम किया जा रहा है? इस टाइटल से फिल्म रिलीज नहीं होगी. हाईकोर्ट से भी मेकर्स को झटका लग चुका है.

    मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने फिल्म निर्माता नीरज पांडे को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने कहा कि हलफनामे में स्पष्ट रूप से यह बताया जाए कि फिल्म किसी भी समाज या समुदाय के किसी वर्ग का अपमान या अवमानना नहीं करती है.

    CBFC की भूमिका पर जताई नाराजगी
    सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि फिल्म की सामग्री को लेकर जो आपत्तियां सामने आई हैं, उन पर निर्माता पक्ष को अपनी स्थिति पारदर्शी ढंग से रखनी होगी. सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) की भूमिका पर भी नाराजगी जताई. जजों ने सवाल किया कि जब फिल्म को प्रमाणपत्र दिया गया, तब क्या संभावित विवादित पहलुओं पर पर्याप्त विचार किया गया था. कोर्ट की टिप्पणी से यह संकेत मिला कि वह प्रमाणन प्रक्रिया की गंभीरता और जवाबदेही को लेकर संतुष्ट नहीं है.

    समुदाय विशेष का किया टारगेट
    याचिकाकर्ताओं का कहना है कि फिल्म का शीर्षक और कुछ हिस्से विशेष समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचा सकते हैं. वहीं निर्माता पक्ष का तर्क है कि फिल्म का उद्देश्य किसी का अपमान करना नहीं, बल्कि एक सामाजिक व्यंग्य प्रस्तुत करना है.

    19 फरवरी को होगी अगली सुनवाई
    अब सभी की नजरें अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जो 19 फरवरी को निर्धारित की गई है. माना जा रहा है कि तब तक निर्माता द्वारा दाखिल किया जाने वाला हलफनामा इस पूरे विवाद की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा.

  • सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला, आम आदमी पार्टी के लिए बड़ा झटका, बिक्रम मजीठिया को दी जमानत

    सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला, आम आदमी पार्टी के लिए बड़ा झटका, बिक्रम मजीठिया को दी जमानत

    चंडीगढ़ 

     इस समय सबसे बड़ी खबर सामने आई है।  सुप्रीम कोर्ट ने आज बिक्रम मजीठिया को जमानत दे दी है। मजीठिया को 25 जून 2025 को गिरफ्तार किया गया था और तब से वह नाभा जेल में बंद थे। बता दें कि बिक्रम मजीठिया की आमदन से ज्यादा संपत्ति मामले में  गिरफ्तारी हुई थी  जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने राहत दी है।  

    सूत्रों के अनुसार, जमानत मिलने के बाद थोड़ी देर पहले डेरा ब्यास प्रमुख गुरिंदर सिंह ढिल्लों ने नाभा जेल जाकर बिक्रम मजीठिया से मुलाकात की। इस दौरान डेरा प्रमुख ने बड़ा बयान देते हुए कहा कि मजीठिया पर लगे सभी आरोप झूठे हैं। बिक्रम मजीठिया को जमानत मिलने के बाद अब उनके पक्ष में राजनीतिक और सामाजिक हलचल भी तेज हो गई है। इसी बीच ये भी चर्चाएं तेज हो गई हैं आम आदमी पार्टी को बड़ा झटका लगा है। 

    सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को जवाबी हलफनामा दाखिल करने का समय देते हुए मामले को स्थगित करते हुए कहा था कि मजीठिया की अंतरिम जमानत पर अगली सुनवाई पर विचार किया जाएगा। गौरतलब है कि पंजाब विजिलेंस ब्यूरो ने मजीठिया पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी। इसी प्राथमिकी से राहत के लिए श्री मजीठिया ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में जमानत के लिए याचिका दायर की थी, लेकिन अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। फिर मजीठिया ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया था।

    प्राथमिकी सात जून, 2025 को मजीठिया के खिलाफ पिछले एनडीपीएस मामले की जांच कर रही विशेष जांच टीम (एसआईटी) की रिपोर्ट के आधार पर दर्ज की गई थी। एसआईटी ने आरोप लगाया कि मजीठिया और उनकी पत्नी ने घरेलू और विदेशी संस्थाओं के नेटवर्क के माध्यम से अपनी आय के ज्ञात स्रोतों से 540 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति जमा की थी। ये आरोप 2007 और 2017 के बीच की अवधि से संबंधित हैं, जब मजीठिया पंजाब में विधानसभा सदस्य और बाद में कैबिनेट मंत्री के रूप में कार्यरत थे।

    आरोप लगाया है कि मजीठिया दंपति ने सराया इंडस्ट्रीज लिमिटेड और उसकी सहायक कंपनियों सहित कई कंपनियों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रण रखा। उन्होंने इन कंपनियों का उपयोग बेनामी संपत्ति हासिल करने के लिए किया। इसके साथ ही, उन्होंने साइप्रस और सिंगापुर स्थित संस्थाओं के माध्यम से विदेशी निवेश और विभिन्न कंपनियों के बीच लेनदेन का उपयोग किया गया। यह भी आरोप लगाया गया कि श्री मजीठिया ने अपने परिवार के सदस्यों और नकली संस्थाओं के माध्यम से शराब, परिवहन और विमानन क्षेत्रों में व्यावसायिक फायदे के लिए अपने आधिकारिक पद का दुरुपयोग किया।

    मजीठिया ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया था कि भ्रष्टाचार का मामला उसी एनडीपीएस मामले का परिणाम है जिसमें उन्हें अगस्त 2022 में जमानत दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2025 में उस जमानत को रद्द करने की राज्य सरकार की याचिका खारिज कर दी थी।