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  • दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, वकीलों को हिरासत में रखने और पुलिस कार्रवाई पर उठे सवाल

    दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, वकीलों को हिरासत में रखने और पुलिस कार्रवाई पर उठे सवाल

    नई दिल्ली
    मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार (Gyanesh Kumar) के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के दौरान लोगों को हिरासत में लिए जाने से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट रविवार को भी खुला। इसपर कोर्ट ने कहा कि वह हमेशा देश की सेवा में है। आपको बता दें कि शनिवार को राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली और आसपास के इलाकों में विरोध प्रदर्शनों के दौरान मेट्रो स्टेशन बंद करने और ट्रेनें रद्द करने को चुनौती देने वाली अवमानना ​​याचिका पर सुनवाई की जा रही है। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा है। इसमें नेताओं को हिरासत में लिए जाने को चुनौती दी गई है।

    दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन के दौरान लोगों को हिरासत में लेने और पाबंदियां लगाने के मामले में सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिकारियों, वकीलों और आम नागरिकों की जान और आजादी की सुरक्षा को लेकर उसकी चिंता एक जैसी है। जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा, "अदालत के लिए व्यक्ति की पहचान मायने नहीं रखती, चाहे वह पुलिस अधिकारी हो, वकील हो या आम नागरिक। जान और आजादी की सुरक्षा को लेकर अदालत का रुख और चिंता एक जैसी संवेदनशील होती है। ठीक है? इसलिए चिंता न करें।"

    लॉ एंड ऑर्डर पर पुलिस के पास स्वतंत्र अधिकार नहीं
    जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत कार्रवाई के पैमाने को लेकर जताई जा रही चिंताओं को समझती है और प्रतिवादियों का पक्ष सुनना चाहती है। हालांकि, जज ने वकील से यह भी कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के मामले में पुलिस अधिकारियों को सरकार के रुख से अलग कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं है और उन्होंने वकील से सॉलिसिटर जनरल की मदद करने को कहा।

    जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेच में सामने याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े पेश हुए। उन्होंने कहा कि न्याय तक पहुंच का मतलब वकीलों तक पहुंच भी है। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि शनिवार के विरोध प्रदर्शनों के दौरान वकीलों को पुलिस स्टेशनों में अपने मुवक्किलों से मिलने से रोका गया।

    हेगड़े ने कहा, "यह कोर्ट अपने एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड के माध्यम से काम करता है। न्याय तक पहुंच का मतलब वकीलों तक पहुंच भी है। अगर वकीलों को अपना काम करने से रोका जाता है तो इससे सीधे तौर पर इस कोर्ट की गरिमा प्रभावित होती है।"

    वकीलों को घंटों तक हिरासत में रखा
    संजय हेगड़े ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि जो वकील शनिवार को मैदान गढ़ी के संजय कॉलोनी पुलिस स्टेशन गए थे, उन्हें घंटों तक हिरासत में रखा गया और कथित तौर पर उनकी पिटाई की गई। हेगड़े ने कहा, "उनमें से कुछ ने मेरे साथ काम किया है। पुलिसकर्मियों ने वकीलों को FIR की धमकी दी।" एक अन्य वकील ने कोर्ट को बताया कि शनिवार को पूरे दिन इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध नहीं थी।

  • अरावली पर 30 नवंबर तक रिपोर्ट देगी कमेटी, राजस्थान के आदिवासी क्षेत्रों में जुटाए जाएंगे जमीनी तथ्य

    अरावली पर 30 नवंबर तक रिपोर्ट देगी कमेटी, राजस्थान के आदिवासी क्षेत्रों में जुटाए जाएंगे जमीनी तथ्य

     जयपुर
    अरावली हिल्स और रेंज की परिभाषा, पारिस्थितिक स्थिति और संरक्षण से जुड़े मामलों की पड़ताल के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित हाई-पावर्ड कमेटी (एचपीसी) एक बार फिर राजस्थान के दौरे पर आ रही है। गुजरात के अरावली क्षेत्र का दौरा करने के बाद कमेटी 11 से 13 अक्टूबर तक डूंगरपुर और बांसवाड़ा में रहेगी। इस बार फोकस वागड़ के उन इलाकों पर है, जहां पहाड़ियों, जंगल, खनन और स्थानीय लोगों, खासकर आदिवासी समुदायों की आजीविका के बीच सीधा संबंध है।

    क्यों बनी कमेटी
    सुप्रीम कोर्ट ने 25 मई, 2026 के आदेश में आइसीएफआरई के महानिदेशक की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय एचपीसी गठित की थी। इसका मकसद पहले तैयार की गई अरावली की परिभाषा और उसके आधार पर होने वाले सीमांकन का स्वतंत्र और विशेषज्ञ मूल्यांकन करना है।

    दोनों जिलों में सरकार ने लगाया पूरा प्रशासन
    कमेटी के दौरे को लेकर राज्य सरकार ने भी संबंधित अधिकारियों को लगाया है। वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी को फील्ड कोऑर्डिनेटर के रूप में नियुक्त किया जाएगा, जबकि डूंगरपुर और बांसवाड़ा के उप वन संरक्षक और फील्ड स्टाफ कमेटी के साथ रहेंगे।

    रिपोर्ट पेश करेगी कमेटी
    कमेटी पहले भी राजस्थान के पांच दिवसीय दौरे पर आ चुकी है। उस दौरान विभिन्न स्थानों पर फील्ड विजिट और हितधारकों से संवाद किया गया था, लेकिन सभी संबंधित पक्षों, विशेषकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के लोगों की पर्याप्त भागीदारी नहीं होने की बात सामने आई थी। इसके बाद राजस्थान के दक्षिणी हिस्से में दोबारा जमीनी पड़ताल और स्थानीय लोगों से सीधे संवाद की मांग उठी। सुप्रीम कोर्ट ने भी 7 सितंबर के आदेश में स्पष्ट किया कि कमेटी को राजस्थान और गुजरात के आदिवासी समुदायों समेत सभी संबंधित हितधारकों को अपनी बात रखने का उचित अवसर देना होगा। कोर्ट ने कमेटी को 30 नवंबर, 2026 तक व्यापक रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं।

    जमीनी तथ्य जुटाकर तैयार होगी रिपोर्ट
    राजस्थान के इस दौरे में कमेटी चयनित स्थलों पर खनन, क्वारी, स्टोन क्रशर, भूमि उपयोग, वन क्षेत्र, जलस्रोत और आसपास के पर्यावरणीय परिदृश्य का आकलन करेगी। जिलों में शाम को होने वाली बैठकों में पर्यावरणविदों, विशेषज्ञों, खनन पट्टाधारकों, ग्रामीणों, किसानों, श्रमिकों और आदिवासी समुदायों समेत अन्य हितधारकों से सुझाव लिए जाएंगे।

    11 को डूंगरपुर और 12 को बांसवाड़ा
    हाई-पावर्ड कमेटी (एचपीसी) 8 से 10 अक्टूबर तक गुजरात के अरावली क्षेत्रों का दौरा करेगी। 11 अक्टूबर को दक्षिणी राजस्थान में प्रवेश के बाद डूंगरपुर जिले के पालदेवल-सरकन क्षेत्र में फील्ड विजिट होगी। इसके बाद 12 अक्टूबर को बांसवाड़ा जिले के केवड़िया-कोठारा क्षेत्र में पड़ताल की जाएगी। शाम को संबंधित हितधारकों से संवाद होगा। दोनों दिन शाम को करीब तीन घंटे तक स्थानीय लोगों और अन्य हितधारकों के साथ व्यापक चर्चा होगी।

  • पंजाब में CBI रेड पर कानूनी घमासान, आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई; मान सरकार की याचिका पर नजरें

    पंजाब में CBI रेड पर कानूनी घमासान, आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई; मान सरकार की याचिका पर नजरें

    चंडीगढ़ 

    पंजाब के मुख्यमंत्री ऑफिस से जुड़े कथित भ्रष्टाचार मामले में सुप्रीम कोर्ट आज पंजाब सरकार की याचिका पर सुनवाई करेगा। सरकार ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें CBI को केस दर्ज कर आरोपों की जांच करने के निर्देश दिए गए थे। 

    सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की मांग की है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई फाइल देर से पहुंचने के कारण टल गई थी, अब आज इस पर सुनवाई होगी।

    इस बीच गुरुवार को CM के OSD राजबीर घुम्मन CBI जांच के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंचे। घुम्मन ने कहा कि CBI को कार्रवाई से पहले सरकार से परमिशन लेनी चाहिए। घुम्मन ने CBI की कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग की है। इस मामले में भी आज सुनवाई होगी।

    अब तक क्या-क्या हुआ….

    ED के पत्र से सामने आए थे आरोप यह मामला ED की ओर से पंजाब के DGP को भेजे गए पत्र से सामने आया। ED ने आरोप लगाया था कि CM ऑफिस से जुड़े लोगों के जरिए ट्रांसफर-पोस्टिंग, टेंडर और प्रशासनिक फैसलों को प्रभावित किया जा रहा था। आरोपों में ‘कैश फॉर ट्रांसफर’ जैसी गतिविधियों का भी जिक्र था।

    हाईकोर्ट ने CBI जांच के आदेश दिए 5 अक्टूबर को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने CM ऑफिस से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच के लिए CBI को मामला दर्ज करने और जांच आगे बढ़ाने का निर्देश दिया। हाईकोर्ट ने CBI से दो महीने में रिपोर्ट देने को भी कहा।

    OSD राजबीर घुम्मन समेत 6 पर FIR हाईकोर्ट के आदेश के बाद CBI ने CM भगवंत मान के OSD राजबीर सिंह घुम्मन समेत 6 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया। FIR में कथित तौर पर सरकारी अधिकारियों की पोस्टिंग, प्रशासनिक फैसलों और अन्य मामलों को प्रभावित करने के आरोप शामिल हैं।

    CBI की 8 ठिकानों पर रेड 6 अक्टूबर को CBI ने पंजाब और चंडीगढ़ में 8 जगहों पर छापेमारी की। इनमें चंडीगढ़ स्थित पंजाब CM का कैंप ऑफिस, OSD राजबीर घुम्मन का घर भी शामिल था। तलाशी के दौरान दस्तावेज, लैपटॉप और मोबाइल फोन समेत अन्य सामग्री जब्त की गई।

    पंजाब सरकार पहुंची सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) दाखिल की। सरकार ने CBI जांच पर रोक लगाने की मांग करते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने राज्य की प्रारंभिक जांच पूरी होने का इंतजार किए बिना CBI को जांच सौंप दी।

    सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई टली गुरुवार को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच के सामने मामला आया। जस्टिस दत्ता ने कहा कि संबंधित फाइल जस्टिस नागू तक देर से पहुंची है, इसलिए मामले को शुक्रवार को सुना जाएगा। पंजाब सरकार की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने CBI की कार्रवाई पर अंतरिम रोक की मांग की थी।

  • सुप्रीम कोर्ट में तीन नए न्यायाधीशों की एंट्री, 37 जजों में महिला जजों की संख्या महज 3

    सुप्रीम कोर्ट में तीन नए न्यायाधीशों की एंट्री, 37 जजों में महिला जजों की संख्या महज 3

    नई दिल्ली

    सुप्रीम कोर्ट में तीन नए जजों ने पद की शपथ ली। इनमें जस्टिस सुनीता अग्रवाल, जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह शामिल हैं। इन तीनों की नियुक्ति के बाद सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़कर 37 हो गई है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में जजों की स्वीकृत संख्या 38 है, यानी अब सिर्फ एक पद खाली है।

    मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने तीनों नए जजों को शपथ दिलाई। जस्टिस सुनीता अग्रवाल इससे पहले गुजरात हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस थीं, जबकि जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय दिल्ली हाई कोर्ट और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह तेलंगाना हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रह चुके हैं।

    शपथ ग्रहण समारोह में सुप्रीम कोर्ट के अन्य जजों के साथ अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और कई वरिष्ठ वकील भी मौजूद रहे।

    सुप्रीम कोर्ट में अब तीन महिला जज
    जस्टिस सुनीता अग्रवाल के सुप्रीम कोर्ट में जज बनने के साथ ही वह इस अदालत की 13वीं महिला जज बन गई हैं। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट में फिलहाल महिला जजों की संख्या बढ़कर तीन हो गई है। उनके अलावा जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस वी. मोहना सुप्रीम कोर्ट में महिला जज हैं।

    जानकारी के मुताबिक, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना अगले साल 24 सितंबर को देश की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश (CJI) बनने वाली हैं।

    CJI रमना के कार्यकाल में SC में थीं चार महिला जज
    बता दें कि पूर्व CJI एन.वी. रमना के कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट में एक समय चार महिला जज एक साथ मौजूद थीं। इनमें जस्टिस इंदिरा बनर्जी, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी शामिल थीं। इनमें से आखिरी तीन जजों ने 31 अगस्त 2021 को सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर शपथ ली थी।

    जस्टिस एन.वी. रमना की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम ने सुप्रीम कोर्ट में तीन महिला जजों की नियुक्ति की सिफारिश की थी। वहीं, मौजूदा CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम अब तक दो महिला जजों की नियुक्ति कर चुकी है।

  • ट्रांसफर-पोस्टिंग और टेंडर में कथित लेनदेन पर घमासान, CBI जांच रोकने सुप्रीम कोर्ट पहुंची पंजाब सरकार

    ट्रांसफर-पोस्टिंग और टेंडर में कथित लेनदेन पर घमासान, CBI जांच रोकने सुप्रीम कोर्ट पहुंची पंजाब सरकार

    चंडीगढ़
     पंजाब में अधिकारियों के तबादलों, अनुकूल नीतियां बनवाने, टेंडर और अन्य कथित अवैध गतिविधियों के लिए लेन-देन के आरोपों की जांच का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है।

    पंजाब सरकार ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपने के निर्देश दिए गए थे। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी है। अब इस मामले में शीर्ष अदालत में सुनवाई होगी।

    जानें क्या है मामला
    यह मामला एनफोर्समेंट डायरेकरेट (ईडी) की ओर से पंजाब के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को लिखी गई चिट्ठी से जुड़ा है। ईडी ने चिट्ठी के माध्यम से पंजाब में अधिकारियों के तबादलों, नीतियों को प्रभावित करने, टेंडर और अन्य कथित गतिविधियों में लेन-देन के आरोपों की जानकारी दी थी। इसी मामले की जांच को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी।

    पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद पंजाब सरकार ने अब सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। सरकार की ओर से दायर याचिका में हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत से राहत की मांग की गई है।

    कल ही चीमा ने दिए थे संकेत
    सरकार के सुप्रीम कोर्ट जाने के संकेत सोमवार को ही वित्त मंत्री हरपाल चीमा ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में दे दिए थे। उन्होंने हाईकोर्ट के सीबीआई जांच के आदेश पर सरकार का पक्ष रखते हुए कहा था कि सरकार इस आदेश को चुनौती देने के लिए कानूनी विकल्प अपनाएगी। इसके अगले ही दिन पंजाब सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी गई।

    पंजाब की राजनीति में बढ़ी सियासत
    इस मामले को लेकर पंजाब की राजनीति में भी सियासत तेज है। विपक्षी दल हाईकोर्ट के आदेश और ईडी की चिट्ठी को आधार बनाकर सरकार पर सवाल उठा रहे हैं। वहीं, पंजाब सरकार का कहना है कि हाईकोर्ट के आदेश को शीर्ष अदालत के समक्ष चुनौती दी जाएगी।

    अब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद जांच की दिशा और हाईकोर्ट के आदेश पर आगे की कार्रवाई को लेकर शीर्ष अदालत के रुख पर नजर रहेगी।

    सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई से यह स्पष्ट होगा कि हाईकोर्ट के सीबीआई जांच के आदेश पर क्या स्थिति रहती है और मामले की जांच आगे किस एजेंसी के माध्यम से होगी।

  • ‘अपराधियों के मन में डर पैदा करना होगा’, दिल्ली-NCR में रेप मामलों पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख

    ‘अपराधियों के मन में डर पैदा करना होगा’, दिल्ली-NCR में रेप मामलों पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख

    नई दिल्ली

    दिल्ली-एनसीआर में पिछले कुछ दिनों में हुई रेप की वारदातों पर स्वत: संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मामले की सुनवाई की। इस दौरान कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से कहा है कि अपराधियों के मन में डर पैदा करना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक पुलिस अपराधियों के मन में यह डर पैदा नहीं करती कि रेप किया तो मारे जाएंगे, तब तक स्थिति नहीं बदलेगी। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा, हम भारत जैसे देश में हैं। सिर्फ कागज पर बातें लिखना काफी नहीं है। आपको असल में कदम उठाने होंगे।

    कोर्ट ने पुलिस को बिना हिचके सख्त कदम उठाने के लिए कहा है। कोर्ट ने कहा, अगर आपको थोड़ा और सख्त या कठोर होना पड़े, तो हिचकिचाएं नहीं। कुछ लोग आर्टिकल 21 (जीवन का अधिकार) को लेकर हंगामा करेंगे, लेकिन आपको अपना फर्ज निभाना होगा। हाल ही के दिनों में दिल्ली एनसीआर में रेप की कई वारदाते सामने आई थीं। इसमें स्लीपर बस में नाबालिग से गैंगरेप की वारदात भी शामिल थी जिसने निर्भया कांड की यादें ताजा कर दी थी। इसके अलावा कालकाजी इलाके में आस्था कुंज पार्क में लड़की के साथ गैंगरेप हुआ था। वारदात को अंजाम देने वाले फर्जी पुलिस बनकर आए थे। इन घटनाओं ने महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए।

    क्या वॉर रूम बनाने का कोई प्रावधान है?
    सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से पूछा कि अपराध रोखने के लिए आप क्या कर रहे हैं। साथ ही पूछा कि क्या दिल्ली में अपराधों की निगरानी के लिए वॉर रूम बनाने का कोई प्रावधान है? कोर्ट ने बताया कि अलग-अलग हाई कोर्ट में ऐसे वॉर रूम बनाए गए हैं। कोर्ट ने National Database on Sexual Offenders के जरिए संदिग्ध और यौन अपराधों में शामिल लोगों की निगरानी पर भी ध्यान देने को कहा। 

    सभी एजेंसियां मिलकर इस मुद्दे पर काम करें- सुप्रीम कोर्ट
    कोर्ट ने कहा कि अगर सभी एजेंसियां मिलकर इस मुद्दे पर काम करें और खास तौर पर ध्यान दें, तो स्थिति में बदलाव लाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से कहा कि वह इस मामले के हर पहलू पर गंभीरता से ध्यान दे। कोर्ट ने कहा कि ऐसा नहीं होना चाहिए कि अगले चार हफ्तों में फिर इस तरह की घटनाएं सामने आएं। सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजों के आसपास की स्थिति पर भी ध्यान देने को कहा। सुनवाई के दौरान कहा गया कि कुछ ऐसे लोग हैं, जो छात्राओं को परेशान करते हैं और उन्हें लगातार तंग करते हैं।

    जज ने 2012 के निर्भया कांड का किा जिक्र
    कोर्ट को बताया गया कि दिल्ली में हजारों बिना अनुमति वाले खाने-पीने के ठिकाने हैं, जहां असामाजिक तत्व जमा होते हैं। इनमें कुछ जगहों पर शराब भी उपलब्ध कराए जाने की बात सामने आई। इस पर जस्टिस जे.बी. पारदीवाला ने 2012 के निर्भया कांड का जिक्र करते हुए कहा कि रिकॉर्ड के मुताबिक आरोपी कहीं खाना खाने गए थे और वहां शराब भी पी थी, जिसके बाद अपराध किया गया। जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि इन सभी पहलुओं पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

    अपराध रोकने के लिए जमीनी स्तर पर काम होगा
    सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से कहा कि अपराध रोकने के लिए जमीनी स्तर पर काम करना होगा। केवल कागजों पर योजना बनाने से काम नहीं चलेगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर अपराध रोकने के लिए और सख्त कदम उठाने की जरूरत है तो पीछे नहीं हटना चाहिए। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से कहा कि लोग आर्टिकल 21 का हवाला देकर सवाल उठा सकते हैं, लेकिन पुलिस की जो जिम्मेदारी है, उसे हर हाल में निभाना होगा। कोर्ट ने कहा कि हमारा मकसद यह होना चाहिए कि रेप और ऐसे दूसरे अपराध पूरी तरह खत्म हों।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर पुलिस के पास पर्याप्त बल नहीं है तो नई भर्ती की प्रक्रिया शुरू की जाए। पुलिसकर्मियों को उचित ट्रेनिंग देने पर भी जोर दिया जाए। कोर्ट ने कहा कि इन कदमों को पूरी तरह लागू होने में समय लगेगा, लेकिन तब तक किसी घटना को रोकने के लिए भी जरूरी कदम उठाने होंगे।

    दिल्ली पुलिस को सुप्रीम कोर्ट की हिदायत
    सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को सख्त हिदायत दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिवाली जैसे त्योहारों के दौरान असामाजिक तत्व सक्रिय हो सकते हैं। पुलिस को ऐसे समय में खास तौर पर सतर्क रहना होगा। कोर्ट ने कहा कि अपराध होने के बाद आरोपी को पकड़ना और गिरफ्तार करना ही काफी नहीं है। पुलिस का असली काम अपराध को होने से रोकना है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस को ऐसा माहौल बनाना होगा कि अपराध करने वाले के मन में डर पैदा हो। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई अपराध करता है तो उसे पकड़ लिया जाएगा, गिरफ्तार कर लिया जाएगा—लेकिन यह समस्या का पूरा समाधान नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि दिल्ली पुलिस को अपराध होने से पहले उसे रोकने पर ज्यादा ध्यान देना होगा।

    दिन-रात दिल्ली में कड़ी निगरानी
    सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-NCR में दिन और रात दोनों समय कड़ी निगरानी रखने को कहा। कोर्ट ने साफ कहा कि जवाबदेही सबसे अहम है और अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करनी होगी।

    2012 निर्भया केस का भी जिक्र
    सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 2012 के निर्भया केस का भी जिक्र किया। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से कहा कि उन जगहों पर भी ध्यान दिया जाए जहां बिना अनुमति चल रहे खाने-पीने के ठिकानों पर शराब भी परोसी जाती है। कोर्ट ने कहा कि 2012 की घटना के रिकॉर्ड से पता चलता है कि आरोपियों ने कहीं खाना और शराब ली थी और उसके बाद अपराध किया था। 

    पार्क और सार्वजनिक जगहों पर रोशनी
    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली में सभी सार्वजनिक जगहों और पार्कों में पर्याप्त रोशनी होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि वह SG तुषार मेहता से यह सुनिश्चित करने के लिए कहेंगे कि सार्वजनिक जगहों और पार्कों में उचित लाइटिंग की व्यवस्था हो। मालूम हो कि दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में हाल ही रेप के कई मामले सामने आए हैं। इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया है।

    अपराधियों के मन में पैदा कीजिए डर- सुप्रीम कोर्ट
    कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से कहा कि आप सख्ती कीजिए। अपराधियों के मन में डर पैदा कीजिए। मानवाधिकार कार्यकर्ता आप पर आर्टिकल 21 के हनन के आरोप लगाएंगे, लेकिन आपको सख्त होना होगा। कोर्ट ने कहा कि समाज की हर महिला हमारी माता है, बहन है। हमें उन्हें सुरक्षित महसूस करवाना होगा। कोर्ट ने कहा कि जिस तरह से घर पर महिलाओं की सुरक्षा का ध्यान रखते हैं, वैसा ही समाज में भी करना होगा। बस में एक महिला अकेले सफर कर रही है तो उसकी जानकारी आपको होनी चाहिए। आपको उसकी सुरक्षा के लिए सक्रिय होना होगा। 16 नवंबर को अगली सुनवाई।

    हर जगह निगरानी बढ़ाने के आदेश
    कोर्ट ने पुलिस को स्कूल- कॉलेजों से लेकर बस स्टॉप तक, हर जगह निगरानी बढ़ाने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने पुलिस से यह भी कहा कि वे पूरे शहर में निगरानी बढ़ाएं और बस स्टॉप, मेट्रो, रेलवे स्टेशन, स्कूल, कॉलेज जैसी जगहों पर ज्यादा ध्यान दें, जहां महिलाओं के साथ अपराधों का खतरा ज्यादा होता है।

    सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि ये दिल्ली पुलिस के लिए बहुत बड़ा काम है और बहुत बड़ी चुनौती होने वाली है लेकिन इसी में पुलिस की सबसे बड़ी जीत है। कोर्ट ने कहा, यह आप सबके सामने एक बहुत बड़ा काम है। यह एक चुनौती है और जिस दिन आप इस चुनौती से पार पा लेंगे, वह डिपार्टमेंट के लिए एक बड़ी जीत होगी।

    'लोग आपसे डरे नहीं'
    सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस को नसीहत दी है कि उनका रवैया ऐसा होना चाहिए कि जनता उनसे बात करने में डरे नहीं। वह खुद आगे आकर आपसे मिलें और बात करें। कोर्ट ने कहा, आपका रवैया ऐसा होना चाहिए जिससे आम आदमी को आपसे बात करने का भरोसा मिले।

  • दो कमरों में 8.5 लाख किताबें कैसे आएंगी? 135 साल पुरानी लाइब्रेरी पर सुप्रीम कोर्ट की नजर

    दो कमरों में 8.5 लाख किताबें कैसे आएंगी? 135 साल पुरानी लाइब्रेरी पर सुप्रीम कोर्ट की नजर

    नई दिल्ली
    सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की 135 साल पुरानी सेंट्रल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी को दूसरी जगह ले जाने की प्रस्तावित योजना पर स्वत: संज्ञान लिया है। इस लाइब्रेरी में 8.5 लाख से ज्यादा किताबें हैं। मामले की सुनवाई 5 अक्टूबर को जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ करेगी। सुप्रीम कोर्ट में दर्ज मामले का शीर्षक ‘इन री: 135-ईयर-ओल्ड लाइब्रेरी, 8.5 लाख बुक्स-एंड नो रूम इन द सेंट्रल विस्टा प्लान’ है। यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब लाइब्रेरी को लेकर यह सवाल उठ रहा था कि सेंट्रल विस्टा योजना में उसके लिए पर्याप्त जगह तय की गई है या नहीं

    सुप्रीम कोर्ट के कार्यालय की रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला 3 अक्टूबर को दर्ज किया गया। रिपोर्ट में कहा गया कि अथॉरिटी ने एक नए स्वत: संज्ञान रिट याचिका मामले के पंजीकरण का निर्देश दिया था। इसके बाद स्वत: संज्ञान रिट याचिका दर्ज की गई। लाइब्रेरी फिलहाल 1969 से दिल्ली के शास्त्री भवन में चार मंजिलों पर चल रही है। हाल की मीडिया रिपोर्टों में बताया गया कि उसके भविष्य और नई जगह को लेकर स्थिति साफ नहीं थी। इन रिपोर्टों के मुताबिक, आवास और शहरी कार्य मंत्रालय ने कर्तव्य भवन-2 परिसर में लाइब्रेरी के लिए सिर्फ दो कमरे आवंटित किए थे।

    खबरों पर मंत्रालय ने क्या दिया जवाब
    मामला सामने आने के बाद केंद्रीय आवास और शहरी कार्य मंत्रालय ने लाइब्रेरी को लेकर स्थिति स्पष्ट की। मंत्रालय ने कहा कि सेंट्रल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी के लिए जगह सेंट्रल विस्टा के पुनर्विकास योजना में पहले से तय की गई है। मंत्रालय ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि कुछ रिपोर्टों के विपरीत लाइब्रेरी के लिए जगह उपलब्ध कराई गई है। मंत्रालय के मुताबिक, लाइब्रेरी के निर्माण से जुड़ी जरूरी प्रक्रिया भी चल रही है। मंत्रालय की यह सफाई उस समय आई, जब लाइब्रेरी को नई जगह देने और उसके लिए पर्याप्त स्थान नहीं होने को लेकर सवाल उठ रहे थे।

    लाइब्रेरी में 8.5 लाख से अधिक किताबें मौजूद
    अब सुप्रीम कोर्ट इस पूरे मामले की सुनवाई करेगा। अदालत के सामने मुख्य मुद्दा लाइब्रेरी के प्रस्तावित स्थानांतरण और उसके लिए तय की गई जगह से जुड़ा है। 135 साल पुरानी इस लाइब्रेरी में 8.5 लाख से अधिक किताबें मौजूद हैं और यह लंबे समय से सरकारी कामकाज से जुड़े कर्मचारियों और अन्य पाठकों के लिए अहम पुस्तक संग्रह के रूप में जानी जाती है। इसे अनमोल धरोहर के तौर पर भी देखा जाता रहा है।

  • सुप्रीम कोर्ट की कड़ी नाराजगी: निचली अदालत के जज से जवाब तलब, जानें क्या है पूरा मामला

    सुप्रीम कोर्ट की कड़ी नाराजगी: निचली अदालत के जज से जवाब तलब, जानें क्या है पूरा मामला

    नई दिल्ली
    सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के एक जज के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है. दरअसल, जज ने सुप्रीम कोर्ट को जमानत कानून को लेकर बिन मांगी सलाह दे दी थी. कोर्ट ने इस मामले में रजिस्ट्री को संबंधित जज से स्पष्टीकरण मांगने का निर्देश दिया है.

    मामला पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले का है. यहां बारासात के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एक आपराधिक मामले की सुनवाई कर रहे थे. सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में इस मामले की सुनवाई तीन महीने में पूरी करने का निर्देश दिया था.

    तीन महीने की तय अवधि में ट्रायल पूरा नहीं हो सका. इसके बाद जज ने 11 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट के असिस्टेंट रजिस्ट्रार को एक पत्र लिखा. इसमें ट्रायल पूरा करने के लिए और समय मांगा गया.

    जज ने पत्र में बताया कि मामले की सुनवाई पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय की जरूरत है. लेकिन लेटर के आखिरी दो पैराग्राफ में उन्होंने जमानत को लेकर SC को सलाह दे दी. उन्होंने लिखा कि यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि उच्च अदालत को किन मामलों में जमानत देनी चाहिए और किन मामलों में जमानत नहीं देनी चाहिए.

    सुप्रीम कोर्ट ने जताई कड़ी नाराजगी
    जज के इस पत्र पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ काफी असहज हुई. जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस पर कड़ी टिप्पणी की.

    पीठ ने कहा कि ट्रायल जज ने जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखकर अतिरिक्त समय मांगा, उससे वह काफी परेशान है. कोर्ट ने साफ कहा कि किसी पीठासीन अधिकारी का काम सुप्रीम कोर्ट को यह सलाह देना नहीं है कि उसे कब जमानत देनी चाहिए और कब नहीं.

    सुप्रीम कोर्ट ने पत्र की भाषा और उसमें दी गई सलाह पर गंभीर आपत्ति जताई. कोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि संबंधित जज से जल्द से जल्द स्पष्टीकरण मांगा जाए. कोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि आखिर जज ने इस तरह की टिप्पणी क्यों की. अब जज के जवाब के बाद ही इस मामले में आगे की कार्रवाई पर फैसला होगा.

    इसी तरह के एक दूसरे मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के जजों को अहम सलाह दी है. जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने जमानत याचिकाओं की सुनवाई को लेकर टिप्पणी की.

    पीठ ने कहा कि जजों को अपने निजी नैतिक विचार या व्यक्तिगत मूल्य फैसलों पर नहीं थोपने चाहिए. जमानत याचिका पर फैसला कानून और मामले के तथ्यों के आधार पर होना चाहिए. कोर्ट की इस टिप्पणी का मतलब साफ है कि जमानत जैसे मामलों में न्यायिक फैसले व्यक्तिगत सोच से नहीं, बल्कि कानून और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर होने चाहिए.
     

  • MRP और रिटेल प्राइस में 9 गुना अंतर! ₹3 हजार की दवा ₹27 हजार में बिकने पर SC की फटकार

    MRP और रिटेल प्राइस में 9 गुना अंतर! ₹3 हजार की दवा ₹27 हजार में बिकने पर SC की फटकार

    नई दिल्ली

    दवाओं की बढ़ती और मनमानी कीमतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने दवाओं की मैक्सिमम रिटेल प्राइस (MRP) और रिटेलर को मिलने वाली कीमत (PTR) के बीच भारी अंतर पर गंभीर सवाल उठाए हैं. सुनवाई के दौरान एक इंजेक्शन का उदाहरण दिया गया, जिसकी रिटेलर कीमत करीब 3,520 रुपये है, लेकिन उसकी MRP 22,437 रुपये तय है. इसी तरह करीब 3 हजार रुपये की कैंसर दवा की MRP 27 हजार रुपये बताई गई। 

    बेंच ने हैरानी जताते हुए पूछा कि आखिर इस भारी अंतर का पैसा किसकी जेब में जा रहा है? इसके साथ ही, कोर्ट ने प्राइवेट अस्पतालों में इन-हाउस केमिस्ट से ही दवा खरीदने की व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए और ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO) के तहत मार्जिन की 16 फीसदी सीमा तय करने का सुझाव दिया। 

    पीठ के सामने उदाहरण रखा गया कि 22,437 रुपये MRP वाली एक इंजेक्शन की कीमत रिटेलर के लिए करीब 3,520 रुपये है। इसी तरह करीब 27,000 रुपये MRP वाली कैंसर की दवा का प्राइस-टू-रिटेलर लगभग 3,000 रुपये बताया गया। इस पर जस्टिस संदीप मेहता ने सवाल किया कि कीमतों के बीच इतना बड़ा अंतर आखिर किसकी जेब में जा रहा है।

    अस्पताल की फार्मेसी पर भी सवाल
    कोर्ट ने अस्पतालों की इन-हाउस फार्मेसी को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए। पीठ ने कहा कि मरीजों को अक्सर अस्पताल की अपनी केमिस्ट से ही दवाएं खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है। यदि कोई मरीज बाहर से वही दवा कम कीमत पर खरीदकर लाता है तो उसकी गुणवत्ता पर सवाल उठाए जाने या अस्पताल की ओर से इलाज को लेकर दबाव बनाए जाने की स्थिति पैदा हो सकती है। जस्टिस मेहता ने कहा कि ऐसी स्थिति में मरीज आखिर क्या करे। सुनवाई के दौरान उन्होंने अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर भी तीखी टिप्पणी की।

    सबके लिए एक जैसे नियम क्यों नहीं
    जस्टिस मेहता ने आगे कहा कि सरकार को इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि कई कॉर्पोरेट अस्पताल यह जरूरी कर देते हैं कि दवाइयां उन्हीं के केमिस्ट या किसी खास फ़ार्मेसी से खरीदी जाएं, और अगर मरीज़ उन्हें बाहर से खरीदता है, तो वे इलाज की गारंटी नहीं देते। 

    "अगर कोई मरीज सरकारी स्कीम के तहत इलाज करवा रहा है, तो उसका खर्च कौन उठाता है? टैक्स देने वाला. तो फिर सबके लिए एक जैसे नियम क्यों नहीं?"

    16 परसेंट मार्जिन क्यों नहीं
    उन्होंने कहा, "DPCO के मुताबिक मार्जिन 16 परसेंट होना चाहिए. हर दवा 'ज़रूरी चीज़ों के कानून' (Essential Commodities Act) के दायरे में आती है. हमें समझ नहीं आता कि उनसे कीमतें इस तरह तय करने के लिए क्यों कहा जाता है। 

    जस्टिस मेहता ने सॉलिसिटर जनरल से यह भी कहा कि अगर कोई ऐसा फ़ार्मासिस्ट मिल जाए जो बहुत दयालु हो और जरूरतमंद को 2,700 रुपये में दवा देने को तैयार हो, तो मरीज़ सोचने लगेगा कि दवा असली है या नकली। 

    पैसा कहां जाता है
    "सवाल यह है कि कीमत में 10 गुना बढ़ोतरी क्यों? इतना सारा पैसा कहां जाता है? इससे किसे फ़ायदा हो रहा है?"

    "आखिरकार नुकसान ईमानदार टैक्सपेयर का ही होता है. हम इस मामले की अच्छी तरह से जांच करेंगे. इसका असर समाज के एक बड़े हिस्से पर पड़ता है," बेंच ने कहा. उन्होंने आगे कहा कि पहले तो दवाओं की कीमत का मामला है और फिर मेडिकल प्रैक्टिशनर्स के नैतिक तौर-तरीकों का। 

    मेहता ने आगे कहा कि फार्मा कंपनियों को इससे कोई फायदा नहीं हो रहा है और ऐसा लगता है कि फायदा प्राइवेट अस्पतालों को हो रहा है। 

    जस्टिस मेहता ने कहा कि बिना किसी कॉम्बिनेशन वाली साधारण स्टेटिन की कीमत 40 रुपये है और एस्पिरिन के साथ कॉम्बिनेशन होने पर इसकी कीमत 70 रुपये हो जाती है। 

    "ऐसा कैसे हो रहा है? कॉर्पोरेट अस्पताल तो इंडस्ट्री हैं. यह कोई सेवा नहीं है. आम आदमी को यह सब क्यों भुगतना पड़े?" बेंच ने सॉलिसिटर जनरल से कहा। 

    सॉलिसिटर जनरल ने कहा, "मैं यह नहीं कह रहा कि याचिकाकर्ता गलत हैं, लेकिन कोई ऐसा तरीका निकालना होगा जिससे सभी पक्षों के हितों में संतुलन बना रहे. जैसा कि मैं समझता हूं, फार्मा कंपनियों को इससे कोई फायदा नहीं हो रहा है। 

    2 याचिकाओं पर सुनवाई
    बेंच ने मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर के लिए तय की और कहा कि वह इस मुद्दे पर केंद्र का जवाब सुनेगी। 

    सुप्रीम कोर्ट दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था. जिसमें एक याचिका किशनचंद जैन की थी. ये याचिका इस बात पर ज़ोर देती हैं कि जहां 'शेड्यूल्ड' दवाओं की कीमतें तय (सीलिंग) होती हैं, वहीं 'नॉन-शेड्यूल्ड' दवाओं (जो बाज़ार में संख्या और मूल्य के हिसाब से लगभग 80% या उससे ज़्यादा हैं) के मामले में निर्माताओं को MRP तय करने की ज़्यादा आज़ादी होती है, बस उन्हें सालाना 10% तक की बढ़ोतरी की सीमा का पालन करना होता है। 

    22 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर की ज़रूरी दवाओं की ज़्यादा कीमतों पर हैरानी जताई और इसे मरीज़ों के साथ "दिन-दहाड़े डकैती" करार दिया था.  कोर्ट ने गौर किया कि एक दवा की MRP 27,000 रुपये थी, जबकि वह खुदरा विक्रेताओं को 2,700 रुपये में सप्लाई की जा रही थी। 

    कोर्ट ने सवाल किया कि मरीजों को इस तरह कैसे ठगा जा सकता है और कहा, "यह बहुत हैरानी की बात है कि जिन अधिकारियों को इस पर कार्रवाई करनी चाहिए, वे चुप हैं। 

    एक याचिका में अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की गई थी कि वे फार्मा कंपनियों और खुदरा विक्रेताओं द्वारा ज़रूरी दवाओं की कथित अनैतिक रूप से ज़्यादा कीमतें वसूलने पर रोक लगाकर दवाओं को सस्ता बनाएं। 

    दूसरी याचिका में उन डॉक्टरों के ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की गई है जो मरीज़ों को जेनेरिक दवाएं नहीं लिखते हैं।  

    हर दवा पर 16% मार्जिन का सुझाव
    पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि आवश्यक और गैर-आवश्यक दवाओं के बीच अंतर क्यों रखा जाए और कई दवाओं को Drugs (Prices Control) Order (DPCO) के दायरे से बाहर क्यों रखा गया है। कोर्ट ने सुझाव दिया कि सभी दवाओं पर MRP के स्तर पर 16 प्रतिशत मार्जिन तय करने की व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती।

    सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार संतुलित समाधान पर विचार करेगी और 16 प्रतिशत की समान सीमा का सुझाव उन्हें तार्किक प्रतीत होता है। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने मौजूदा नियामक व्यवस्था अदालत के सामने रखी।

    कोर्ट ने कहा कि सरकारी योजनाओं के जरिए भुगतान हो या मरीज खुद खर्च करे, अंततः बोझ आम जनता और करदाताओं पर पड़ता है। मामले की अगली सुनवाई अक्टूबर के दूसरे सप्ताह में होगी। इससे पहले भी इसी मामले में कोर्ट दवाओं की कीमतों को लेकर स्थिति को “broad daylight dacoity” और मरीजों के खिलाफ “absolute rampage” जैसी कड़ी टिप्पणियों से संबोधित कर चुका है।

  • 38 वोटरों ने डाले वोट, अब सुप्रीम कोर्ट तय करेगा RCA चुनाव का नतीजा

    38 वोटरों ने डाले वोट, अब सुप्रीम कोर्ट तय करेगा RCA चुनाव का नतीजा

    जयपुर
    राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (RCA) के बहुचर्चित चुनावों के दौरान एक बेहद नाटकीय और सनसनीखेज मोड़ सामने आया है। जयपुर स्थित आरसीए एकेडमी में जब एक तरफ मंगलवार को कड़े मुकाबले और सरगर्मी के बीच मतदान की प्रक्रिया चल रही थी, ठीक उसी समय देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट से एक बड़ा आदेश जारी हो गया। सुप्रीम कोर्ट ने आरसीए चुनाव के परिणामों की घोषणा पर रोक लगा दी है। अदालत के इस नए निर्देश के बाद अब चुनाव प्रक्रिया के तहत डाले गए वोट और नतीजे सीधे तौर पर सीलबंद लिफाफे में बंद कर दिए जाएंगे, और कोर्ट के आगामी आदेश के बाद ही परिणामों से पर्दा उठेगा।

    वोटिंग के ऐन वक्त पर आया सुप्रीम कोर्ट का निर्देश
    मंगलवार सुबह निर्धारित समय के अनुसार 11:30 बजे से आरसीए के 6 प्रमुख पदों और 11 प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला करने के लिए 38 मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग कर रहे थे। एक तरफ जहां बृजकिशोर उपाध्याय पैनल और धनंजय सिंह गुट के बीच कड़ा मुकाबला चल रहा था, वहीं दूसरी तरफ अदालती हलकों से आए इस निर्देश ने पूरी चुनावी तस्वीर को अचानक बदलकर रख दिया है। मतदान तो तय कार्यक्रम के अनुसार जारी है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के सख्त रुख के चलते अब परिणामों के ऐलान पर ब्रेक लग गया है।

    लिफाफे में बंद होंगे नतीजे, अदालत करेगी तय
    सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा आदेश के बाद चुनाव संपन्न होने के बाद भी विजयी उम्मीदवारों के नामों की आधिकारिक घोषणा नहीं की जाएगी। मतपेटियों में बंद हुए वोटों के नतीजे अब सीलबंद लिफाफे में सुरक्षित रख दिए जाएंगे। अदालत के अगले निर्देश और कानूनी स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही यह तय हो पाएगा कि आरसीए की नई कार्यकारिणी की कमान आधिकारिक रूप से किसके हाथों में सौंपी जाएगी। इस हाई-प्रोफाइल मामले में अचानक आए इस कानूनी मोड़ ने खेल और राजनीतिक गलियारों में हलचल को और अधिक तेज कर दिया है।

    जानिए क्या है विवाद की वजह ?
    इस पूरे विवाद के केंद्र में मुख्य रूप से तीन नए जिलों—बालोतरा, खैरथल-तिजारा और डीडवाना-कुचामन—को मतदाता सूची में शामिल करने और उन्हें वोटिंग राइट्स दिए जाने का गंभीर मुद्दा है, जिसके खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी जा रही है।

    तीन नए जिलों की वोटर लिस्ट और वोटिंग राइट्स का पेंच
    इस पूरे विवाद की मुख्य वजह आरसीए की अंतिम मतदाता सूची में कुछ नए जिलों का नाम जुड़ना और उन्हें मतदान का अधिकार दिया जाना है। सवाई माधोपुर जिला क्रिकेट संघ के अध्यक्ष और आरसीए एडहॉक कमेटी के पूर्व कन्वीनर डीडी कुमावत (D.D. Kumawat) की तरफ से इस मामले में याचिका दायर की गई थी। याचिका में आपत्ति जताई गई थी कि जिन जिलों को लेकर प्रक्रिया विवादित है, उन्हें मताधिकार देना नियमों के विपरीत है।

    आरसीए की आधिकारिक वेबसाइट पर 22 सितंबर को अंतिम वोटर लिस्ट जारी किए जाने की जानकारी सामने आई थी, जिसके बाद से ही अंदरूनी विरोध के सुर उठने लगे थे। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने सुनवाई के दौरान राजस्थान सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) को भी इस मामले में हस्तक्षेप करने और पक्ष रखने के निर्देश दिए हैं।

    पहले से लंबित हैं लोकपाल और प्रशासक के मामले
    आरसीए से जुड़े मामलों में यह पहली बार नहीं है जब कानूनी दांवपेंच सामने आए हों। इससे पहले भी आरसीए में लोकपाल की नियुक्ति, प्रशासक के अधिकार क्षेत्र और अन्य संगठनात्मक बदलावों से जुड़े कई मामले विभिन्न अदालतों में लंबित चल रहे हैं। खेल संस्था के भीतर चल रही इन प्रशासनिक और कानूनी खींचतान के बीच नए जिलों के वोटिंग राइट्स का मुद्दा सबसे बड़ा अड़चन बनकर उभरा।

    कौन बनेगा नया अध्यक्ष, सस्पेंस बढ़ा
    राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (आरसीए) की सियासी पिच पर सुलह-समझौते की तमाम कोशिशें सोमवार को नाकाम हो गईं। सत्ता-संगठन के करीब माने जा रहे बृजकिशोर उपाध्याय पैनल के सामने मंत्री, सांसद और विधायक पुत्रों ने मोर्चा खोल दिया है। चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर के पुत्र धनंजय खींवसर और उनके पैनल में शामिल राज्यसभा सांसद घनश्याम तिवाड़ी के पुत्र आशीष तिवाड़ी और भाजपा विधायक जसवंत यादव के पुत्र मोहित यादव ने चुनाव मैदान में डटे रहकर सत्ता-संगठन को सीधी चुनौती दी है। इससे राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है और इसके कई मायने निकाले जा रहे हैं

    वहीं, दूसरी ओर भाजपा के वरिष्ठ नेता राजेंद्र राठौड़ के पुत्र पराक्रम सिंह और उनके पैनल के नाम वापस लेकर सत्ता समर्थित पैनल को समर्थन दिए जाने को लेकर राठौड़ की छवि को पार्टी में और मजबूती मिली है। वहीं शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के पुत्र पवन दिलावर ने भी नामांकन वापिस ले लिया। हालांकि, पराक्रम गुट से कार्यकारी सदस्य पद के लिए नामांकन करने वाले धर्मवीर सिंह शेखावत मैदान में बने हुए है और अब उनके धनंजय गुट के साथ जाने की चर्चा है।

    6 पद… 11 प्रत्याशी… 38 मतदाता

    बृजकिशोर पैनल-

    अध्यक्ष: बृजकिशोर उपाध्याय

    कोषाध्यक्ष: विष्णू अग्रवाल

    संयुक्त सचिव: राजेश सारस्वत

    कार्यकारी सदस्य: अरिष्ट सिंघव
    धनंजय पैनल-

    अध्यक्ष: धनंजय सिंह

    सचिव व उपाध्यक्ष: मोहित यादव

    कोषाध्यक्ष: आशीष तिवाड़ी

    संयुक्त सचिव: विनोद सहारन

    कार्यकारी सदस्य: धर्मवीर सिंह शेखावत