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  • TMC Name-Symbol Row: 4 हफ्ते में दोनों गुट देंगे जवाब, फिर 3 महीने में ECI का फैसला

    TMC Name-Symbol Row: 4 हफ्ते में दोनों गुट देंगे जवाब, फिर 3 महीने में ECI का फैसला

     नई दिल्ली

    तृणमूल कांग्रेस के नाम और उसके पारंपरिक चुनाव चिह्न ‘जोड़ा घास फूल’ को लेकर पार्टी के दो गुटों के बीच चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को साफ समय सीमा तय कर दी है। शीर्ष अदालत ने दोनों पक्षों को चार हफ्ते के अंदर चुनाव आयोग के सामने अपनी दलीलें और दस्तावेज पूरे करने का निर्देश दिया है। इसके बाद आयोग को तीन महीने के अंदर अंतिम फैसला देना होगा।

    मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने यह आदेश पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें तृणमूल कांग्रेस के मूल नाम और आरक्षित चुनाव चिह्न को फिलहाल इस्तेमाल करने से रोक दिया गया है।

    बता दें कि मामला पार्टी के दो प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच है। एक गुट ममता बनर्जी के नेतृत्व में है और दूसरा गुट ऋतब्रत बनर्जी का है। दोनों गुट पार्टी के मूल नाम और ‘जोड़ा घास फूल’ चिह्न पर अपना दावा कर रहे हैं। चुनाव आयोग ने इस विवाद के चलते अंतरिम व्यवस्था के तहत मूल नाम और चिह्न फ्रीज कर दिए थे। फिलहाल दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चिह्न दिए गए हैं।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि दोनों पक्षों को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका मिलना चाहिए, लेकिन मामला लंबे समय तक नहीं खिंचना चाहिए। इसीलिए अदालत ने दो चरणों में समय तय किया। पहले चरण में दोनों गुट चार सप्ताह में आयोग के समक्ष अपनी सारी दलीलें, सबूत और कागजात दाखिल करेंगे। दूसरे चरण में आयोग इन दस्तावेजों के आधार पर तीन महीने के भीतर फैसला करेगा।

    साफ है कि सुप्रीम कोर्ट ने आयोग के अंतरिम फैसले को फिलहाल रद्द नहीं किया है। अदालत ने सिर्फ यह सुनिश्चित किया है कि अंतिम फैसला तय समय में आए। अब दोनों गुटों को चार हफ्ते के अंदर अपनी तैयारी पूरी करनी होगी। उसके बाद चुनाव आयोग के पास तीन महीने का समय होगा, जिसमें वह तय करेगा कि तृणमूल कांग्रेस का मूल नाम और ‘जोड़ा घास फूल’ चिह्न किस गुट को मिलेगा।

  • ‘वंदे मातरम्’ न गाने पर कार्रवाई के खिलाफ याचिका, SC ने केंद्र को नोटिस

    ‘वंदे मातरम्’ न गाने पर कार्रवाई के खिलाफ याचिका, SC ने केंद्र को नोटिस

    नई दिल्ली

    राष्ट्रीय गीत वंदेमातरम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई व्यक्ति धार्मिक कारणों से वंदे मातरम नहीं गाता है या फिर सारे आंतरे नहीं गाता है तो उसपर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। वहीं सुप्रीम कोर्ट नेइस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए जवाब भी मांगा है। गायक टीएम कृष्णा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीद जताई की वंदे मातरम् से जुड़े कानून की व्याख्या करते वक्त 1986 के 'बिजो एमैनुअल' के तय सिद्धातों को लागू किया जाएगा।

    आपको बता दें कि जुलाई में संसद के मॉनसून सत्र में एक संशोधन विधेयक लाकर वंदे मातरम को इसके अंतरगत लाया गया था। 29 जुलाई को राज्यसभा में और फिर 30 जुलाई को लेकसभा में विधेयक को पास करके कानून बनाया दिया गया और वंदेमातरम गाना अनिवार्य किया गया था। इसे राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम के दायरे में ले आया गया। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय गीत को दो अंतरे तक ही सीमित रखने पर विचार करने से इनकार कर दिया है। हालांकि इस बात पर विचार करने को तैयार है कि इसे ना गाने को दंडनीय अपराध ना बनाया जाए।

    राष्ट्रगान ना गाने पर नहीं हो सकती सजा
    सीजेआई सूर्यकांत जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने बिजो इमैनुएल मामले में सुप्रीम कोर्ट के ही फैसले का हवाला देते हुए कहा कि तय किया गया था कि राष्ट्रगान ना गाने पर किसी को सजा नहीं दी जाएगी और यह अब भी लागू होता है।

    बिजो इमैनुअल केस: 3 छात्रों ने राष्ट्रगान गाने से मना कर दिया

    कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि वंदे मातरम से जुड़े कानून की व्याख्या करते समय 1986 के ‘बिजो इमैनुअल’ फैसले में तय सिद्धांतों को लागू किया जाएगा।

    दरअसल, 1986 के बिजो इमैनुअल बनाम केरल सरकार मामले में तीन छात्रों ने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था। हालांकि वे राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहते थे।

    सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ कार्रवाई को रद्द करते हुए कहा था कि केवल राष्ट्रगान न गाने के आधार पर उन्हें दंडित नहीं किया जा सकता।

    ‘नक्सली’ शब्द पर सॉलिसिटर जनरल और मुरलीधर में बहस
    सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और कृष्णा के वकील सीनियर एडवोकेट डॉ एस मुरलीधर के बीच तीखी बहस भी हुई। संविधान के तहत निर्णय लेने की प्रक्रिया पर मुरलीधर की दलील के जवाब में मेहता ने ‘नक्सली’ शब्द का इस्तेमाल किया।

        मुरलीधर: अभी आपने जिस शब्द का इस्तेमाल किया है, उसे वापस लें। यह कार्यवाही लाइव चल रही है। मैं इसका कड़ा विरोध करता हूं।

        मेहता: मैंने कहा कि यही संवैधानिक तरीका है, न कि वह तरीका जो नक्सली चाहता है। और मुझे इसका कोई अफसोस नहीं है।

        मुरलीधर: “किसी बात पर विचार करना नक्सली होना नहीं है।

    इसके बाद जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति पर आतंकवादी होने का आरोप हो, तब भी संविधान के तहत उसके अधिकार बने रहते हैं।

    2026 वंदे मातरम के अपमान पर कानून बना
    24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने 'वंदे मातरम' को राष्ट्रीय गीत घोषित किया था। लंबे समय तक इसके अपमान पर कोई अलग कानून नहीं था, लेकिन 2026 के मानसून सत्र में केंद्र सरकार ने 'राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम' बनाया।

    इस कानून के तहत 'वंदे मातरम' के गायन को जानबूझकर रोकने, इसमें बाधा डालने या इसका सार्वजनिक अपमान करने को दंडनीय अपराध माना गया है। ऐसा करने पर 3 साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा का प्रावधान है।

    इस बार 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान पहली बार लाल किले की प्राचीर से 'वंदे मातरम' के पूरे 6 छंद गाए गए।

    केंद्र से मांगा जवाब
    सुप्रीम कोर्ट ने इस पीआईएल पर सरकार से जवाब दाखिल करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत दिए गए मौलिक अधिकारियों के संबंध में कानून में दंड के प्रावधानों की समीक्षा होनी चाहिए।

    आपको बता दें कि कर्नाटक संगीत के प्रसिद्ध गायक टी एम कृष्णा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका फाइल की थी और कहा था कि वंदे मातरम के सभी 6 छंद गाना अनिवार्य नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा था कि आखिरी के चार अंतरे में स्पष्ट रूप से हिंदू देवी देवताओं की आर्चना का भाव है और एक धर्मनिरपेक्ष देश में इसे अनिवार्य कर देना संविधान का उल्लंघन है। केंद्र सरकार की ओर से पेश एसजी तुषार मेहता ने इस याचिका का विरोध करते हुए कहा कि कुछ लोग संविधान और कानून के राज में विश्वास नहीं करते और उनकी सोच नक्सलवादी है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रीय गीत की अहम भूमिका थी और इसे भुलाना नहीं चाहिए।

    तुषार मेहता ने क्या दलील दी?
    सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से नोटिस नहीं जारी करने की मांग की. इस पर उन्होंने दलील दी कि यह सनसेशन को बढ़ावा देने वाला होगा. इसके बाद सुनवाई के दौरान ही जस्टिस बागची ने कहा कि  इसमें कोई संदेह नहीं कि यह हमारा राष्ट्रीय गीत है। 

    याचिकाकर्ता की बात से सहमत दिखा सुप्रीम कोर्ट
    इस पर एसजी तुषार मेहता ने कहा कि दो पद गाए जाएं या छह पद गाए जाएं… यह सरकार से इतर कौन तय करेगा, कोई और तो नहीं कर सकता. इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने दखल दी. उन्होंने कहा कि लोगों की राय ली जानी चाहिए थी. इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि यह सही बात है। 

    2 सप्ताह में देना है जवाब
    इसके बाद वंदे मातरम के छह पद गाने की अनिवार्यता के खिलाफ दायर याचिका पर केंद्र सरकार से सुप्रीम कोर्ट ने जवाब तलब किया. सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि दो सप्ताह के अंदर केंद्र को इस मामले में देना होगा जवाब. याचिकाकर्ता के वकील ने एसजी की ओर से दलील में नक्सलाइट शब्द का उपयोग करने पर भी गंभीर आपत्ति जताई। 

  • कांस्टेबल भर्ती पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, छत्तीसगढ़ सरकार की SLP खारिज

    कांस्टेबल भर्ती पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, छत्तीसगढ़ सरकार की SLP खारिज

    बिलासपुर
     छत्तीसगढ़ में कांस्टेबल भर्ती के सैकड़ों प्रतीक्षारत अभ्यर्थियों के लिए बड़ी राहत की खबर है। सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में 2259 कांस्टेबल पदों की भर्ती से जुड़े मामले में छत्तीसगढ़ सरकार की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) खारिज कर दी है। इससे 400 से ज्यादा प्रतीक्षारत कांस्टेबल अभ्यर्थियों की नियुक्ति का रास्ता साफ होने की उम्मीद बढ़ गई है। मामला प्रतीक्षा सूची से रिक्त पदों को भरे जाने के अधिकार को लेकर लंबे समय से न्यायिक प्रक्रिया में था।

    हाई कोर्ट ने सुनाया था अभ्यर्थियों के पक्ष में फैसला
        मामला पारस राम ध्रुव एवं अन्य की ओर से दायर याचिका से जुड़ा है। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक फरवरी 2024 को अभ्यर्थियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा था कि पुलिस कांस्टेबल सेवा नियम, 2007 के नियम 13(2) के तहत वैध प्रतीक्षा सूची से रिक्त पदों को भरा जा सकता है।

    हाई कोर्ट के फैसले के अनुसार भर्ती प्रक्रिया के दौरान प्रोन्नति, सेवानिवृत्ति, कैडर परिवर्तन अथवा अन्य कारणों से रिक्त हुए पदों को केवल इस आधार पर प्रतीक्षा सूची से बाहर नहीं किया जा सकता कि वे प्रारंभिक रूप से चयनित अभ्यर्थियों के पद नहीं थे।

    सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की राज्य सरकार की एसएलपी
        हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ छत्तीसगढ़ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 17 नवंबर 2025 को 47 सफल अभ्यर्थियों के पद सुरक्षित रखने का निर्देश भी दिया था।

    सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की एसएलपी खारिज कर दी। इसके साथ ही हाई कोर्ट के फैसले के आधार पर प्रतीक्षा सूची के अभ्यर्थियों को नियुक्ति मिलने की संभावना मजबूत हो गई है। सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नौशीना अली उपस्थित रहीं। हस्तक्षेपकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता रुचि नागर और एओआर देवाशीष तिवारी ने पैरवी की। छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से अतिरिक्त सालिसिटर जनरल के. नटराज उपस्थित हुए।

    वर्षों से नियुक्ति का इंतजार
        2017 की कांस्टेबल भर्ती प्रक्रिया में चयन और प्रतीक्षा सूची को लेकर विवाद के कारण बड़ी संख्या में अभ्यर्थी वर्षों से नियुक्ति की उम्मीद लगाए बैठे थे। हाई कोर्ट के पक्ष में फैसले के बाद राज्य सरकार की एसएलपी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची।

        अब एसएलपी खारिज होने से 400 से ज्यादा प्रतीक्षारत अभ्यर्थियों के लिए नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ने की उम्मीद है। हालांकि, वास्तविक नियुक्ति प्रक्रिया और रिक्त पदों की संख्या के संबंध में संबंधित विभाग द्वारा आगे की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।

     

  • रहवासी क्षेत्रों में कारोबार को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई स्थगित, 62,500 प्रतिष्ठानों पर फैसला टला

    रहवासी क्षेत्रों में कारोबार को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई स्थगित, 62,500 प्रतिष्ठानों पर फैसला टला

    भोपाल 

    भोपाल के रहवासी इलाकों में कारोबार के मामले में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में तय सुनवाई टल गई है। जस्टिस के अवकाश पर होने के कारण अब सुनवाई बाद में होगी। हालांकि अभी तारीख तय नहीं है।

    भोपाल के रहवासी इलाकों में 62 हजार 500 प्रतिष्ठान हैं, जिनको लेकर आज फैसला आने की उम्मीद थी। नगर निगम भी अब तक की एक्शन टेकन रिपोर्ट पेश कर चुका है। वहीं, रहवासी सीलिंग की कार्रवाई को झूठी बताते हुए रिकॉर्ड पेश करेंगे।

    बता दें कि 5 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नगर निगम ने पूरे शहर में ऐसे प्रतिष्ठानों को नोटिस दिए थे, जो आवासीय क्षेत्र में चल रहे थे।

    करीब 15 दिन तक नोटिस देने का दौर चला। इस दौरान लिस्टेड 62 हजार 500 में से 8084 प्रतिष्ठानों को नोटिस दिए गए थे। फिर 3 दिन तक 190 प्रतिष्ठान बंद किए थे।

    विरोध के बाद रुकी कार्रवाई, नया शपथ-पत्र पेश
        हालांकि, शहर में व्यापारियों ने निगम की कार्रवाई के विरोध में लगातार बड़े स्तर पर प्रदर्शन किए थे, जिसके निगम ने कार्रवाई को रोक दिया। 15 सितंबर को होने वाली सुनवाई में पेश करने के लिए जो शपथ-पत्र तैयार किया था, उसमें शहरभर में 7,951 प्रतिष्ठानों को आवासीय क्षेत्रों में कारोबार करते हुए चिह्नित करने और उन्हें नोटिस जारी करने की बात सामने आई थी।

        आंकड़ों के इस अंतर ने कार्रवाई की रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए थे। सूत्रों के अनुसार, नवदुनिया ने इस विसंगति को सामने लाने के बाद निगम ने अपने रिकार्ड का दोबारा मिलान किया और शपथ-पत्र में कार्रवाई की जानकारी को लेकर बदलाव कर नया शपथ-पत्र न्यायालय के सामने पेश किया है।

    प्रदेश सरकार की समिति पर भी होगी सुनवाई
        बता दें कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर निगम प्रशासन ने अरेरा कालोनी, रोहित नगर, बावड़िया कलां में नोटिस देने की कार्रवाई शुरू की थी, जिसके बाद एक अगस्त को इन क्षेत्रों में दो प्रतिष्ठानों को सील और 99 के स्वेच्छा बंद करने के पंचनामे बनाए थे। दो अगस्त को प्रदेश सरकार ने इस मामले में एक समिति गठित कर दी थी, जिसके बाद निगम ने अपनी कार्रवाई रोक दी और बंद किए गए प्रतिष्ठान भी खुल गए।

        सुप्रीम कोर्ट ने सरकार द्वारा बनाई गई इस समिति को प्रथम दृष्टया अवमानना मानते हुए समिति गठित करने के मूल दस्तावेज पेश करने को कहा था। अब 15 सितंबर को होने वाली सुनवाई में निगम की कार्रवाई के साथ ही प्रदेश सरकार की इस समिति को लेकर भी स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

    व्यापारी सड़क पर उतरे तो कार्रवाई रोकी
    निगम की सीलिंग और नोटिस देने के विरोध में जब व्यापारी सड़क पर उतरे तो कार्रवाई रोक दी गई थी। पिछले 15 दिन से कार्रवाई नहीं हुई।

    दूसरी ओर, रहवासी निगम के जिम्मेदारों पर पक्षपात का आरोप लगा रहे हैं। याचिकाकर्ता विवेक त्रिपाठी ने कहा कि निगम की एक्शन टेकन रिपोर्ट पर आपत्ति की है।

    हमने सुप्रीम कोर्ट में अपने दस्तावेज पेश किए हैं। जिसमें बताया गया कि निगम ने झूठी कार्रवाई की। जिन प्रतिष्ठानों को सील किया गया, वे फिर से खुल गए।

    यह है मामला- सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश
    भोपाल में आवासीय भवनों के व्यावसायिक उपयोग और अवैध निर्माण के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त के पहले सप्ताह में सुनवाई की थी। सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को बड़ा झटका देते हुए राज्य सरकार द्वारा गठित 10 सदस्यीय जांच समिति की कार्रवाई पर रोक लगा दी थी।

    साथ ही इस मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से दुकान संचालकों को मिले सभी राहत आदेश (स्टे ऑर्डर) निरस्त कर दिए थे। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि उसके निर्देश पर चल रही जांच में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को होगी।

    इस दौरान नगर निगम को कार्रवाई की रिपोर्ट पेश करना है। इसके चलते ही नोटिस और सीलिंग की कार्रवाई की गई। अब तक हुई कार्रवाई की रिपोर्ट भी कोर्ट में पेश की जा चुकी है।

    रहवासियों की यह मांग
        रहवासी इलाकों में कमर्शियल गतिविधियां गलत है। इन्हें बंद किया जाए।
        कमर्शियल गतिविधि होने से आवासीय क्षेत्र में व्यवधान जैसे- शोर, भीड़ और सार्वजनिक शांति भंग जैसी स्थितियां बन रही हैं।

        असामाजिक तत्वों की गतिविधियां भी बढ़ रही हैं। इस वजह से सुरक्षा पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

        स्कूली बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता हो रही है। बढ़ते ट्रैफिक की वजह से हादसों का खतरा बना रहता है।

  • श्री महावीर जी मंदिर के प्रबंधन पर फैसला सुरक्षित, दोनों पक्षों को 8 दिन में लिखित बहस के निर्देश

    श्री महावीर जी मंदिर के प्रबंधन पर फैसला सुरक्षित, दोनों पक्षों को 8 दिन में लिखित बहस के निर्देश

    जयपुर
     सुप्रीम कोर्ट ने प्रसिद्ध 'श्री महावीर जी जैन मंदिर' के प्रबंधन और संचालन को लेकर जैन धर्म के श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदायों के बीच चल रहे विवाद पर बुधवार को सुनवाई पूरी कर ली। फैसला बाद में सुनाया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों को धार्मिक भावनाओं से जुड़े इस मामले में संयम बरतने की सलाह देते हुए कहा, जिस भगवान के नाम पर दोनों पक्ष लड़ रहे हैं, क्या वह इस तरह कानूनी लड़ाई से खुश होंगे?

    न्यायाधीश जेबी पारदीवाला और न्यायाधीश के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस मामले पर बुधवार को सुनवाई की। दोनों पक्षों को आठ दिन के भीतर लिखित बहस पेश करने के निर्देश दिए हैं। लोक न्यास अधिनियम, 1959 के तहत कार्यवाही से विवाद शुरू हुआ था। मंदिर प्रबंधन से दिगंबर समिति अध्यक्ष और सचिव को हटाने तथा श्वेतांबर संप्रदाय की नई प्रबंध समिति बनाने की मांग की गई।

    विवाद करें समाप्त
    सुनवाई के दौरान न्यायाधीश पारदीवाला ने दोनों पक्षों से कहा, यह बहुत ही संवेदनशील मामला है और किसी भी पक्ष की भावनाओं को ठेस पहुंचाए बिना विवाद को समाप्त करने की जरूरत है। उन्होंने दोनों पक्षों से पूछा कि क्या ऐसा संभव है कि सुबह श्वेतांबर संप्रदाय अपनी परंपरा के अनुसार भगवान की पूजा करे और शाम को दिगंबर संप्रदाय भगवान के वस्त्र बदलकर अपनी पद्धति से पूजा करे। आप अनावश्यक मुकदमेबाजी कर भगवान को क्यों परेशान कर रहे हैं? क्या आपको लगता है भगवान इस सबसे खुश होंगे?

    बताते चलें कि साल 1970 में एसडीएम ने दिगंबर समिति के खिलाफ प्रार्थना पत्र मंजूर किया। दिगंबर समिति की ओर से पूजा स्थल अधिनियम, 1991 के तहत पेश प्रार्थना पत्र के आधार पर अक्टूबर 1994 में ट्रायल कोर्ट ने रोक लगा दी। हाईकोर्ट में अपील दायर की गई, जिसका दिगंबर समिति ने विरोध किया कि 1991 के अधिनियम के तहत कार्यवाही समाप्त हो चुकी थी।

    क्या है दोनों पक्षों की दलीलें?
    वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान का तर्कः इस मामले में पूजास्थल परिवर्तन की कोई मांग नहीं की गई है, इसलिए पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 इस मामले में लागू नहीं होता है। उन्होंने कहा कि यह मामला केवल संपूर्ण जैन समुदाय के हित में मंदिर के प्रबंधन से जुड़ा है।

    दिगंबर समिति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर्यमा सुंदरम का तर्क
    हाईकोर्ट को अपील पर सुनवाई नहीं करनी चाहिए थी, क्योंकि 1991 के कानून के तहत कार्यवाही समाप्त कर दी गई और उसमें अपील का प्रावधान नहीं है। ऐसे में हाईकोर्ट में याचिका दायर होनी चाहिए थी। तथ्य यह है कि मूर्ति (देवता), मंदिर और उससे जुड़ी संपत्तियों का नियंत्रण, कब्जा और प्रबंधन दिगंबर जैन संप्रदाय के पास ही रहा है।

  • सत्य निकेतन हादसे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, बोले- ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति गंभीर चिंता का विषय

    सत्य निकेतन हादसे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, बोले- ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति गंभीर चिंता का विषय

    नई दिल्ली

    दिल्ली के सत्य निकेतन हादसे का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. इस मामले पर एमकिस क्यूरी अजित सिन्हा ने सुप्रीम कोर्ट में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल कर अदालत को हादसे की जानकारी दी. उन्होंने सत्य निकेतन में अप्रैल 2022 में भी बिल्डिंग गिरने का हवाला देते हुए राजधानी के सभी PG हॉस्टलों, निजी हॉस्टलों की सुरक्षा जांच और ऑडिट- निरीक्षण करने की सिफारिश की। 

    एमिक्स क्यूरी की रिपोर्ट में कहा गया है?
    सत्‍य निकेतन में बार-बार होने वाली ऐसी घटनाएं चिंता का विषय हैं.
    सत्य नितेकन दिल्ली यूनिविर्सिटी साउथ कैंपस के पास स्थित है, यह छात्रों के रहने के लिए एक बड़ा केंद्र बन चुका है। 
    यहां बड़ी संख्या में पीजी, प्राइवेट होस्टल, मेस खाने-पीने की दुकानें और दूसरे व्यवसायिक संस्थान चल रहे हैं। 
    अप्रैल 2022 में यहां एक बिल्डिंग गिरने से 2 लोगों की मौत हो गई थी और 4 लोग घायल हुए थे। 

     अब दोबारा ऐसी घटना होने से यह गंभीर सवाल उठता है कि इमारतों की नियमित जांच, खतरनाक इमारतों की पहचान और भवन नियमों को लागू करने की व्यवस्था सही तरीके से काम कर रही है या नहीं। 
    रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली में कॉलेज और यूनिवर्सिटी के आसपास मौजूद सभी PG, निजी हॉस्टल और छात्रों के रहने की ऐसी जगहों की समय सीमा के अंदर सुरक्षा जांच की जानी चाहिए। 

    – बिल्डिंग का नक्शा, निर्माण, बेसमेंट, जमीन का उपयोग, मजबूती, आग से सुरक्षा और आने-जाने के रास्ते जैसे सुरक्षा मानकों की जांच होनी चाहिए। 

    रिपोर्ट में दिल्ली के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के आसपास चल रहे सभी PG और निजी हॉस्टलों का समयबद्ध सुरक्षा ऑडिट और निरीक्षण कराने की जरूरत बताई गई है। 

    रिपोर्ट के मुताबिक, 6 सितंबर को दोपहर करीब 1:30 बजे सत्य निकेतन के P-14 में बहुमंजिला इमारत ढह गई थी.  करीब 55 वर्ग गज क्षेत्र में बनी इस इमारत में बेसमेंट के अलावा चार मंजिलें थीं. इसे छात्रों के लिए ‘Hostel Daze' नाम से बॉयज PG के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा था. हादसे में अब तक 7 लोगों की मौत और कम से कम 12 लोगों के बचाए जाने की जानकारी दी गई है। 

    रिपोर्ट में कहा गया है कि हादसे की सटीक वजह की जांच जारी है. प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, बेसमेंट में निर्माण संबंधी काम चल रहा था और हादसे से ठीक पहले वहां पानी भरने की भी सूचना थी.  दिल्ली पुलिस ने साउथ कैंपस थाने में मालिक और अन्य लोगों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 105, 290 और 125 के तहत FIR दर्ज की है. रिपोर्ट के मुताबिक, संपत्ति के मालिक हरि ओम बंसल को 7 सितंबर को राजस्थान में गिरफ्तार कर लिया गया। 

    हादसे के सिलसिले में MCD ने साउथ जोन के पांच अधिकारियों को निलंबित किया है. इनमें डिप्टी कमिश्नर राकेश कुमार, सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर रणवीर सिंह, एग्जीक्यूटिव इंजीनियर (बिल्डिंग) ललित कुमार गोयल, असिस्टेंट इंजीनियर सुनील चौहान और जूनियर इंजीनियर आशीष कुमार शामिल हैं। 

    अमीकस क्यूरी ने बताया है कि सत्य निकेतन से सटी एक अन्य इमारत P-213 को भी खतरनाक पाया गया है और MCD ने उसके ध्वस्तीकरण के निर्देश दिए हैं। 

    दिल्ली के सभी PG हॉस्टलों की जांच की सिफारिश
    रिपोर्ट में कहा गया है कि सत्य निकेतन जैसे इलाकों में बड़ी संख्या में PG, निजी हॉस्टल और अन्य छात्र आवास चल रहे हैं. कई बार रिहायशी संपत्तियों में अतिरिक्त निर्माण, बदलाव या उपयोग में परिवर्तन कर इन्हें संचालित किया जाता है.
    इसलिए इनकी जांच में स्वीकृत बिल्डिंग प्लान, वास्तविक निर्माण और मंजिलों की संख्या, बेसमेंट में किए गए बदलाव, भूमि उपयोग, स्ट्रक्चरल सेफ्टी, फायर सेफ्टी और आपातकालीन प्रवेश-निकास की जांच होनी चाहिए। 

    रिपोर्ट में बताया गया है कि सत्य निकेतन हादसे के बाद दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल जनहित याचिका पर 7 सितंबर को सुनवाई हुई.  हाईकोर्ट ने MCD को दिल्ली में उसके अधिकार क्षेत्र में आने वाले सभी PG हॉस्टलों का एक सप्ताह के भीतर निरीक्षण कर रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है. रिपोर्ट में यह बताना होगा कि PG हॉस्टल वाली इमारतें जरूरी अनुमति के तहत बनी हैं या नहीं और कहीं बिल्डिंग बायलॉज का उल्लंघन तो नहीं हुआ। 

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसी घटनाओं की जिम्मेदारी केवल PG मालिक की नहीं है, बल्कि विश्वविद्यालय प्रशासन और MCD की भी जिम्मेदारी बनती है, क्योंकि निर्माण और मरम्मत का काम बिल्डिंग बायलॉज के अनुरूप कराना संबंधित प्राधिकरण का दायित्व है। 

    कोर्ट ने MCD को यह भी जांचने को कहा है कि ढही इमारतें वैध अनुमति के तहत बनी थीं या नहीं. अगर निर्माण बिना अनुमति या बिल्डिंग बायलॉज के खिलाफ पाया जाता है तो जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और उनके खिलाफ कार्रवाई की जानकारी देने को कहा गया है.  मामले की अगली सुनवाई 25 सितंबर 2026 को होगी। 

    दरअसल सुप्रीम कोर्ट दिल्ली समेत देश के अन्य हिस्सों में हुए अवैध निर्माण को लेकर सुनवाई कर रहा है. इससे पहले अदालत दिल्ली, जयपुर और पटना समेत कई इलाकों में अवैध निर्माणों को लेकर कड़े आदेश जारी कर चुका है। 

  • आतंकी मामलों पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, NIA केसों के लिए राज्यों में जल्द बनेंगी स्पेशल कोर्ट

    आतंकी मामलों पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, NIA केसों के लिए राज्यों में जल्द बनेंगी स्पेशल कोर्ट

     नई दिल्ली
    विशेष एनआईए अ
    दालतों की स्थापना को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई हुई. CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने राज्यों से जल्द विशेष अदालतें शुरू करने को कहा, ताकि NIA के मामलों में सुनवाई में देरी न हो। 

    एएसजी ऐश्वर्या भाटी ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ को बताया कि कई राज्यों ने इस संबंध में अब तक रिपोर्ट दाखिल नहीं की है. मतलब इन राज्यों ने अब तक बताया ही नहीं है कि उनके यहां विशेष NIA अदालतें स्थापित की गई हैं या नहीं।  

    सुनवाई के दौरान कर्नाटक के वकील ने बताया कि बेंगलुरु में तीन विशेष अदालतें हैं. और चिकमंगलूर में भी जल्द अदालत शुरू होने वाली है. केरल सरकार के वकील ने बताया कि उन्होंने विशेष अदालतों के लिए जगहों की पहचान कर ली है. राज्य में दो अदालतें स्थापित होनी है. उन्होंने अदालत से दो-तीन महीने का समय मांगा लेकिन CJI ने एक महीने में ही अदालतें शुरू करने को कहा. तमिलनाडु सरकार के वकील ने बताया कि राज्य में 2 विशेष अदालतें स्थापित की जा रही हैं. उन्होंने बताया कि एक तो कार्यरत भी हैं। 

    तेलंगाना सरकार के वकील ने बताया कि राज्य में सिर्फ एक विशेष NIA अदालत की जरूरत है. तेलंगाना में NIA के 13 मामले हैं. CJI ने तेलंगाना सरकार को तीन हफ्ते में अदालतें शुरू करने का निर्देश दिया. असम में NIA के 26 मामले हैं. राज्य में एक विशेष अदालत काम कर रही है और दो और अदालतें स्थापित करने की प्रक्रिया जारी है। 

    CJI ने असम से इस संबंध में चार हफ्ते में आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए. जम्मू कश्मीर में NIA के 46 मामले हैं और यहां सिर्फ एक विशेष अदालत है. सुरक्षा कारणों से अदालतें जम्मू में बनाने की बात कही गई. सुनवाई के दौरान जम्मू-कश्मीर में तीन और अदालतों की जरूरत बताई गई। 

    मामले की सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने साफ कहा कि विशेष NIA अदालतों में दूसरे मामलों की सुनवाई नहीं होनी चाहिए. ताकि NIA के मामलों का जल्द से जल्द निपटारा हो सके। 

  • Homebuyers के हक में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा रुख, ब्रोशर के वादे सिर्फ मार्केटिंग नहीं; डेवलपर को देना होगा पूरा प्रोजेक्ट

    Homebuyers के हक में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा रुख, ब्रोशर के वादे सिर्फ मार्केटिंग नहीं; डेवलपर को देना होगा पूरा प्रोजेक्ट

    नई दिल्ली

    अक्सर ऐसा देखा जाता है कि बिल्डर कोई भी रियल एस्टेट प्रोजेक्ट शुरू करते वक्त ब्रोशर, पंपलेट या वेबसाइट में बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन बाद में इसे मार्केटिंग बताकर पल्ला झाड़ लेते हैं. ऐसे ही एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली एनसीआर के एक नामी बिल्डर को कड़ी फटकार लगाई है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ब्रोशर में किए वादे सिर्फ मार्केटिंग नहीं हैं, उसी के मुताबिक प्रोजेक्ट देना होगा. सुप्रीम कोर्ट ने रियल एस्टेट कंपनियों को स्पष्ट संदेश दिया है कि प्रोजेक्ट के ब्रोशर में संभावित होमबायर्स से किए गए वादों को महज मार्केटिंग मैटेरियल बताकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 

    रियल एस्टेट डेवलपर की जिम्मेदारी है कि वह आवासीय परियोजना का निर्माण और डिलीवरी वैसे ही करे, जिनका वादा खरीदारों से किया गया था. गुरुग्राम के DLF होम डेवलपर्स ‘द प्राइमस' के प्रोजेक्ट पर सुनवाई के दौरान अदालत ने ये टिप्पणी की. सुप्रीम कोर्ट ने मूल योजना में प्रस्तावित 24 मीटर चौड़ी रोड में लगातार बदलावों पर कड़ी नाराजगी जताई. अदालत ने दो टूक कहा कि किसी आवासीय परियोजना के ब्रोशर में सुविधा, लेआउट या अन्य वादे केवल ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए नहीं माने जा सकते. डेवलपर को परियोजना को उसी तौर पर विकसित करना होगा जैसा खरीदारों के सामने पेश किया गया था। 

    सड़क में बदलाव को मामूली नहीं माना जा सकता
    जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा कि सड़क से संबंधित बदलाव मामूली नहीं कहे जा सकते. ये काफी मायने रखता है. सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर अगली सुनवाई तक प्रोजेक्ट को ब्रोशर के वादे तहत कदम नहीं उठाता तो वह उचित आदेश पारित करेगा. दस्तावेजों के मुताबिक, प्रोजेक्ट में 24 मीटर चौड़ी रोड के लिए 147 मीटर लंबे हिस्से में से करीब 52 मीटर को ग्रीन एरिया बना दिया गया है. वहीं सड़क का एक बड़ा हिस्सा सोसायटी के लोगों और मेहमानों की पार्किंग के तौर पर इस्तेमाल हो रहा है.अदालत ने कहा कि लगभग 100 मीटर की सड़क के करीब 66 फीसदी हिस्से का इस्तेमाल तो ग्रीन एरिया या पार्किंग के तौर पर इस्तेमाल हो रहा था। 

    24 मीटर चौड़ी सड़क का अधूरा वादा
    पीठ ने नाराजगी जताई कि कई मौके दिए जाने के बाद भी बिल्डर ने खामी को सुधारा. जजों ने कहा कि ये समझ से परे है कि प्रोजेक्ट को ब्रोशर में किए वादों के तहत पूरा करने के लिए कई मौके दिए गए, लेकिन अभी तक हालात नहीं बदले. सुप्रीम कोर्ट का ये ऑर्डर सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट के बाद आया. कोर्ट ने 24 मीटर चौड़ी सड़क और प्रोजेक्ट का अन्य मामलों में अनुपालन न होने कथित अनियमितताओं से जुड़ी अन्य शिकायतों पर प्रारंभिक तथ्य-जांच करने का निर्देश CBI को दिया था। 

    सीबीआई ने दाखिल की थी स्टेटस रिपोर्ट
    CBI ने स्टेटस रिपोर्ट के पहले प्रोजेक्ट के नक्शों, तस्वीरों और अन्य दस्तावेजों की पड़ताल की. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निस्संदेह मूल परियोजना और ब्रोशर में जैसी सड़क दिखाई गई थी, वैसी रोड प्रोजेक्ट में मौजूद नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने रोड के लिए जरूरी जमीन न देने और लापरवाही को लेकर हरियाणा सरकार और उसके अफसरों पर भी नाराजगी जताई. कोर्ट ने सोसायटी के निवासियों की RWA वेलफेयर एसोसिएशन के चुनाव की दिक्कतों पर एक्शन न लेने पर भी सरकारी अफसरों के प्रति असंतोष दिखाया। 

  • OBC-EWS छात्रों की फीस पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख, 100% प्रतिपूर्ति को लेकर MP सरकार से मांगा जवाब

    OBC-EWS छात्रों की फीस पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख, 100% प्रतिपूर्ति को लेकर MP सरकार से मांगा जवाब

    जबलपुर
     मध्य प्रदेश में पो
    स्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति के तहत ओबीसी और ईडब्ल्यूएस वर्ग के विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा की पूरी फीस प्रतिपूर्ति नहीं मिलने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने केंद्र सरकार, मध्य प्रदेश शासन और भोपाल स्थित पिछड़ा वर्ग कल्याण आयुक्त को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

    मामला खरगोन निवासी डॉ. दिनेश चंद्र पाटीदार से जुड़ा है। उन्होंने बीडीएस की पढ़ाई के बाद वर्ष 2014 में हरियाणा के अंबाला स्थित एक डेंटल कॉलेज में तीन वर्षीय एमडीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया था। संबंधित योजना के तहत दूसरे राज्य में पढ़ाई करने वाले पात्र विद्यार्थियों की फीस की प्रतिपूर्ति उनके गृह राज्य द्वारा किए जाने और बाद में केंद्र सरकार से उसका पुनर्भुगतान होने का प्रावधान बताया गया है।

    21 लाख रुपये फीस जमा की, छात्रवृत्ति में मिले सिर्फ 84,380 रुपये
    डॉ. पाटीदार के अनुसार, एमडीएस की पढ़ाई के दौरान उन्होंने कॉलेज को सात लाख रुपये प्रतिवर्ष, यानी तीन वर्षों में कुल 21 लाख रुपये फीस के रूप में जमा किए। हालांकि, मध्य प्रदेश के पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग की ओर से उन्हें पूरी फीस के बजाय केवल 84,380 रुपये छात्रवृत्ति के रूप में दिए गए।

    फीस प्रतिपूर्ति की राशि को लेकर उन्होंने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का रुख किया था। हालांकि, वहां से राहत नहीं मिलने के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।

    याचिका में यह दिया तर्क
    याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दलील दी गई कि केंद्र प्रायोजित पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना के तहत पात्र विद्यार्थियों की पूरी फीस प्रतिपूर्ति का प्रावधान है। ऐसे में राज्य सरकार केवल धन की कमी का हवाला देकर पात्र विद्यार्थी की प्रतिपूर्ति रोक नहीं सकती।

    मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद प्रदेश के ऐसे मेडिकल और डेंटल विद्यार्थियों को भी उम्मीद जगी है, जिन्हें पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति के तहत पूरी फीस प्रतिपूर्ति नहीं मिल पाई है। हालांकि, मामले में अंतिम राहत सुप्रीम कोर्ट के आगे के आदेश और सरकार के जवाब पर निर्भर करेगी।

  • एक झटके में FIR खत्म! आखिर क्या है संविधान का आर्टिकल 142 और सुप्रीम कोर्ट कब करता है इसका इस्तेमाल?

    एक झटके में FIR खत्म! आखिर क्या है संविधान का आर्टिकल 142 और सुप्रीम कोर्ट कब करता है इसका इस्तेमाल?

    नई दिल्ली
     नीट पेपर लीक को लेकर दिल्ली समेत देशभर में हुए छात्र प्रदर्शन को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश आया है। शीर्ष अदालत ने अनुच्छेद 142 की शक्तियों का इस्तेमाल करके प्रदर्शनकारी छात्रों के दर्ज FIR रद्द करने का आदेश दिया है। इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई की अध्यक्षता वाली बेंच ने सुनवाई की।

    सभी एफआईआर रद्द होंगे
    सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली, असम, पश्चिम बंगाल और बिहार में छात्रों के खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने का आदेश दिया। दिल्ली पुलिस सिर्फ उन 2873 लोगों के खिलाफ FIR जारी रखेगी जिनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज है। साथ ही चीफ जस्टिस ने कहा कि अगर किसी राज्य में कोई एफआईआर है जिसकी जानकारी अभी हमें नहीं दी गई है तो उसे रद्द करने की मांग का राज्य विरोध नहीं करेंगे।

    20 से 26 जुलाई की घटनाओं पर नई FIR भी नहीं

    शीर्ष अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि 20 से 26 जुलाई के बीच हुई घटनाओं को लेकर कोई नई FIR दर्ज नहीं की जाए। हालांकि, कोर्ट ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को 2,873 लोगों के खिलाफ नई FIR दर्ज करने की छूट दी है, जिनका उल्लेख अदालत के समक्ष दाखिल आवेदन में किया गया है. अगर जांच में इन लोगों के दो अपराधों में शामिल होने की बात सामने आती है तो उनके खिलाफ नई FIR दर्ज की जा सकेगी। 

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन 2,873 लोगों के खिलाफ दर्ज होने वाली किसी भी नई FIR से उनके कानूनी उपाय अपनाने के अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ेगा. वे कानून के तहत उपलब्ध राहत के लिए अदालत का रुख कर सकेंगे। 

    देशभर के लिए बनेगा मुआवजे का मैकेनिज्म
    सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन से जुड़े मामलों के साथ ही देशव्यापी मुआवजा व्यवस्था तैयार करने का भी निर्देश दिया है. केंद्र सरकार को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ विचार-विमर्श कर मुआवजे के लिए एक फ्रेमवर्क तैयार करना होगा। 

    कोर्ट ने कहा कि राज्य और केंद्र शासित प्रदेश इस फ्रेमवर्क को मुआवजा देने की नियमित व्यवस्था के रूप में अपनाएंगे. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को NEET 2026 से जुड़ी आत्महत्या के मामलों में तीन महीने के भीतर मुआवजा देने का निर्देश दिया है। 

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर CJP के प्रवक्ता ने अदालत का आभार जताया. उन्होंने फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने आज जो किया है, वह बेहद महत्वपूर्ण है। 

    छात्रों के खिलाफ अब कोई नई FIR दर्ज नहीं होगी
    अदालत ने कहा कि हम अनुच्छेद 142 के तहत इन आवेदनों को स्वीकार करते हुए यह आदेश दे रहे हैं कि अगर किसी भी राज्य में इन्हीं मामलों को लेकर और एफआईआर हैं, तो उन पर जांच बंद कर दी जाए। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि पेपर लीक के खिलाफ धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन करने वाले छात्रों के खिलाफ अब कोई नई FIR दर्ज नहीं होगी।

    मुआवजे को लेकर तीन महीने में बने नीति
    सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जहां तक NEET परीक्षा, 2026 के चलते आत्महत्या करने वाले छात्रों के मुआवजे का सवाल है, हमें बताया गया है कि इसके बारे में नीति 3 महीने में बना ली जाएगी। इस नीति को 3 महीने में पूरा कर मुआवजा दिया जाए।

    सीजेआई ने कहा कि 20 से 25 जुलाई के बीच जंतर-मंतर और आसपास के क्षेत्र में हज़ारों छात्रों ने आंदोलन में हिस्सा लिया। पुलिस ने कुल 13 एफआईआर दर्ज की थी। दिल्ली, महाराष्ट्र, असम, बिहार और पश्चिम बंगाल के आवेदन हैं। इनमें एफआईआर का विवरण है। हमें बताया गया है कि दिल्ली पुलिस पुराने आपराधिक रिकॉर्ड वाले 2,873 लोगों पर नई एफआईआर करेगी। और कोई नई एफआईआर दर्ज नहीं होगी।

    क्या है आर्टिकल 142?
    भारतीय संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को किसी भी लंबित मामले में "पूर्ण न्याय" (Complete Justice) सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक आदेश या डिक्री जारी करने का विशेष अधिकार देता है. इसका मतलब है कि अगर अदालत को लगता है कि सामान्य कानूनी प्रक्रिया (Standard legal procedure) से न्याय पूरा नहीं हो पाएगा, तो फिर सर्वोच्च अदालत इसका इस्तेमाल कर सकती है। 

    संविधान में साफ कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ऐसा कोई भी आदेश पारित कर सकता है, जो किसी मामले में पूर्ण न्याय करने के लिए जरूरी हो. अदालत के ऐसे आदेश पूरे भारत में लागू होते हैं। 

    सीजेपी ने 5 सितंबर का प्रोटेस्ट वापस लिया, सौरव दास ने क्या कहा?
    सौरव दास ने सुनवाई के दौरान पार्टी का स्टेटमेंट पढते हुए कहा कि CJP के को-कन्वीनर के तौर पर, मैं यह कहना चाहता हूं कि भारत सरकार के सकरात्मक भरोसे और आज ज्यूडिशियल सैंक्टिसिटी को देखते हुए, और इस कोर्ट के पास किए गए ऑर्डर को देखते हुए, CJP 5 सितंबर को मार्च का कॉल वापस लेना सही समझता है और आज के ऑर्डर का पालन करने की उम्मीद करता है। मैं इस फ़ैसले के लिए कोर्ट को और दोनों तरफ़ के वकील, सॉलिसिटर जनरल को उनकी कोशिशों के लिए भी धन्यवाद देता हूं।

    सुनवाई के दौरान एक ऐसा भी मौका आया जब सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि अगर दोनों पक्ष आपस में विश्वास दिखाएं, तो सभी मुद्दे एक-एक करके हल हो सकते हैं। दुनिया में ऐसा कुछ भी नहीं है जो इतना मुश्किल हो कि उस पर खुले दिमाग से चर्चा न की जा सके।