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  • 17 सितंबर से MP में बड़ा अभियान, 50 लाख ग्रामीणों को संपत्ति की निश्शुल्क रजिस्ट्री का मिलेगा लाभ

    17 सितंबर से MP में बड़ा अभियान, 50 लाख ग्रामीणों को संपत्ति की निश्शुल्क रजिस्ट्री का मिलेगा लाभ

     भोपाल
    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन 17 सितंबर से मध्य प्रदेश में जनभागीदारी और जनसेवा को केंद्र में रखकर दो बड़े अभियान शुरू होने जा रहे हैं। स्वामित्व अभियान के तहत प्रदेश के 50 लाख से अधिक ग्रामीणों की संपत्तियों की निश्शुल्क रजिस्ट्री कराकर उन्हें अधिकार अभिलेख सौंपे जाएंगे। वहीं, ‘सेवा से संकल्प’ अभियान के तहत 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक जनसेवा से जुड़े 13 अलग-अलग प्रकल्प संचालित किए जाएंगे।

    अभियान की शुरुआत 17 सितंबर की शाम सात बजे प्रदेशभर में एक साथ 58 लाख से अधिक दीप प्रज्ज्वलित कर होगी। इसका सबसे बड़ा आयोजन उज्जैन के श्रीमहाकाल महालोक में प्रस्तावित है, जहां 25 लाख से अधिक दीप जलाने की तैयारी की जा रही है।

    41,568 गांवों में 68.47 लाख भूखंडों का सर्वे पूरा
    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने गुरुवार को मंत्रालय से वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए सभी संभागायुक्तों और कलेक्टरों को दोनों अभियानों को उत्सव के रूप में आयोजित करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि इनमें जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों, युवाओं और आमजन की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित की जाए।

    स्वामित्व अभियान के तहत प्रदेश के 41,568 गांवों में 68 लाख 47 हजार भूखंडों का सर्वे पूरा हो चुका है। अब इनमें से 50 लाख से अधिक हितग्राहियों के नाम संपत्तियों की निश्शुल्क रजिस्ट्री कराई जाएगी। इसके लिए पंचायत उपकर और अतिरिक्त स्टांप ड्यूटी से छूट का प्रावधान पहले ही किया जा चुका है।

    यह अभियान तीन चरणों में 17 सितंबर से 3 अक्टूबर तक चलेगा।

    हर गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार लगेंगे शिविर

    मुख्यमंत्री ने कलेक्टरों को अभियान का नेतृत्व स्वयं करने के निर्देश दिए हैं। जिला, जोन और सेक्टर स्तर पर अधिकारियों की जिम्मेदारियां तय की जाएंगी। सरकार का जोर इस बात पर है कि पात्र हितग्राहियों को बिना किसी भेदभाव के निर्धारित समय में लाभ मिले और पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रहे।

    मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल ने ग्राम पंचायत स्तर पर सरपंच, सचिव, पटवारी और रोजगार सहायक को मिलकर शिविर आयोजित करने के निर्देश दिए हैं। प्रत्येक गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार को लगने वाले इन शिविरों में प्रतिदिन कम से कम 30 से 40 रजिस्ट्रियां कराने का लक्ष्य रखा गया है।

    ‘आशीर्वाद का दीपक’ से शुरू होगा सेवा से संकल्प अभियान
    17 सितंबर से शुरू होने वाले ‘सेवा से संकल्प’ अभियान का पहला प्रमुख कार्यक्रम ‘आशीर्वाद का दीपक’ होगा। शाम सात बजे प्रदेशभर में लाभार्थी परिवारों के घरों के साथ चयनित ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थलों पर एक साथ दीप प्रज्ज्वलित किए जाएंगे।

    उज्जैन के श्रीमहाकाल महालोक में अकेले 25 लाख से अधिक दीप जलाने की तैयारी है। कार्यक्रम में सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं के साथ समाज के सभी वर्गों को जोड़ने की योजना है। इसके बाद 17 अक्टूबर तक जनसेवा से जुड़े 13 अलग-अलग प्रकल्पों के माध्यम से अभियान को आगे बढ़ाया जाएगा।

  • भारत के परमाणु जखीरे में हुआ इजाफा! 190 हथियारों का अनुमान, 160 से ज्यादा लॉन्चरों से जुड़े

    भारत के परमाणु जखीरे में हुआ इजाफा! 190 हथियारों का अनुमान, 160 से ज्यादा लॉन्चरों से जुड़े

     नई दिल्ली

    अमेरिका की फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स यानी FAS ने हाल ही में भारत के परमाणु हथियारों को लेकर अपना ताजा अनुमान जारी किया है. इस रिपोर्ट के अनुसार भारत के पास करीब 190 असेंबल किए गए परमाणु हथियार हैं. इनमें से 160 से ज्यादा हथियार ऐसे डिलीवरी सिस्टम से जुड़े हैं जो अभी एक्टिव हैं। 

    FAS जैसे संगठनों के अनुमान अक्सर वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बनते हैं क्योंकि परमाणु शक्ति वाले देश अपने भंडार की सटीक संख्या सार्वजनिक रूप से नहीं बताते. भारत भी इसी परंपरा का पालन करता है. आधिकारिक तौर पर अपनी संख्या की पुष्टि नहीं करता। 

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत ने जितने लॉन्चर अभी तैयार रखे हैं, उससे ज्यादा हथियार बना लिए हैं. कुल भंडार करीब 190 हथियारों का है जबकि लॉन्चरों से जुड़े हथियार करीब 160 हैं. बाकी अतिरिक्त हथियार उन मिसाइलों के लिए बनाए गए हैं जो अभी उत्पादन या विकास के चरण में हैं। 

    इनमें अग्नि-प्राइम और लंबी दूरी वाली के-4 जैसी मिसाइलें शामिल हैं. विशेषज्ञों के अनुसार यह कोई अव्यवस्था का संकेत नहीं बल्कि परमाणु रणनीति का सामान्य तरीका है. हथियारों का उत्पादन अक्सर डिलीवरी सिस्टम के सेवा में आने से पहले ही आगे चलता रहता है ताकि जब नए सिस्टम तैयार हों तो हथियार तुरंत उपलब्ध रहें। 

    अतिरिक्त हथियारों का रणनीतिक मतलब
    FAS के अनुमान के अनुसार अतिरिक्त हथियार भविष्य की मिसाइलों के लिए रखे गए हैं. जब नए डिलीवरी सिस्टम सर्विस में आते हैं तो उनके लिए पहले से तैयार हथियार उपलब्ध रहने से प्रतिरोधक क्षमता तेजी से मजबूत होती है. यह प्रथा कई परमाणु शक्ति वाले देशों में देखी जाती है। 

    युद्ध के समय या तनाव की स्थिति में लॉन्चर और हथियार का मेल बैठाना आसान हो जाता है. भारत की परमाणु नीति में विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता पर जोर दिया जाता है. अतिरिक्त हथियार इस क्षमता को समय के साथ बनाए रखने और जरूरत पड़ने पर विस्तार करने में मदद करते हैं। 
     
    ये अनुमान बाहरी संगठन के हैं. भारत सरकार आधिकारिक आंकड़े जारी नहीं करती. इसलिए वास्तविक संख्या इससे कम या ज्यादा हो सकती है. फिर भी FAS जैसी संस्थाओं के आकलन अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक चर्चाओं में महत्वपूर्ण माने जाते हैं क्योंकि वे खुले स्रोतों, सैटेलाइट चित्रों और अन्य सार्वजनिक जानकारियों पर आधारित होते हैं। 

    नो-फर्स्ट-यूज नीति और परीक्षण रोक कायम
    रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण बात यह भी उजागर होती है कि भंडार बढ़ने के बावजूद भारत अपनी नो-फर्स्ट-यूज यानी पहले इस्तेमाल न करने की नीति पर कायम है. भारत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वह परमाणु हथियारों का इस्तेमाल तभी करेगा जब उस पर परमाणु हमला हो। 

    यह नीति भारत की परमाणु रणनीति का मूल आधार रही है. इसके अलावा भारत ने स्वयं घोषित परमाणु परीक्षण रोक भी जारी रखी हुई है. 1998 के परीक्षणों के बाद से भारत ने कोई नया परीक्षण नहीं किया है और इस रोक को बनाए रखा है।  

    भंडार के धीरे-धीरे बढ़ने के बावजूद इन दो नीतियों का जारी रहना भारत के संयमित और जिम्मेदार रुख को दर्शाता है. कई देशों में भंडार बढ़ने के साथ आक्रामक नीतियां भी बदलती देखी गई हैं, लेकिन भारत ने अपनी घोषित स्थिति में बदलाव नहीं किया है. यह वैश्विक परमाणु व्यवस्था में भारत की छवि को स्थिर रखने में मदद करता है। 

    परमाणु प्रतिरोधक क्षमता का विकास
    भारत की परमाणु शक्ति का विकास कई दशकों से चल रहा है. शुरूआती चरण में सीमित क्षमता से लेकर अब ज्यादा एडवांस डिलीवरी सिस्टम तक का सफर तय किया गया है. लैंड बेस्ड मिसाइलें, समुद्र आधारित क्षमता और हवाई प्लेटफॉर्म तीनों पर काम चलता रहा है। 

    अतिरिक्त हथियारों का निर्माण इसी व्यापक विकास का हिस्सा माना जा सकता है. जब नए सिस्टम जैसे अग्नि-प्राइम या समुद्र आधारित के-4 जैसी मिसाइलें सेवा में आती हैं तो उनके लिए हथियार पहले से तैयार रखना तार्किक कदम है। 

    यह विकास क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण को भी प्रभावित करता है. दक्षिण एशिया में परमाणु शक्ति का संतुलन लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है. भारत अपनी क्षमता को मजबूत करते हुए भी आधिकारिक तौर पर न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता की बात करता रहा है. यानी जरूरत से ज्यादा हथियार जमा करने की बजाय विश्वसनीय और पर्याप्त क्षमता बनाए रखना. FAS के आंकड़े इसी दिशा में धीमी लेकिन निरंतर प्रगति का संकेत देते हैं। 

    कुछ विश्लेषक अतिरिक्त हथियारों को भविष्य की तैयारियों से जोड़ते हैं. जब उत्पादन लाइन चल रही हो तो हथियारों को पहले तैयार कर लेना व्यावहारिक होता है. लॉन्चर तैयार होने में समय लगता है जबकि हथियार उत्पादन अपेक्षाकृत तेजी से हो सकता है. यह अंतर सामान्य माना जाता है और इसे अव्यवस्थित विस्तार की बजाय योजनाबद्ध तैयारी के रूप में देखा जाता है। 

    आने वाले वर्षों में भारत की परमाणु क्षमता का स्वरूप नए डिलीवरी सिस्टम के सेवा में आने के साथ और स्पष्ट होगा. अग्नि-प्राइम जैसी मिसाइलें मोबाइल और आधुनिक मानी जाती हैं जबकि के-4 समुद्र आधारित क्षमता को मजबूत करने वाली है. अतिरिक्त हथियार इन सिस्टम के लिए उपलब्ध रहने से समग्र प्रतिरोधक ताकत बढ़ेगी। 

  • थाली में रखा चावल और ग्लोबल वार्मिंग का कनेक्शन! IISER भोपाल की स्टडी में सामने आई चौंकाने वाली वजह

    थाली में रखा चावल और ग्लोबल वार्मिंग का कनेक्शन! IISER भोपाल की स्टडी में सामने आई चौंकाने वाली वजह

    भोपाल
     आपकी प्लेट में रखा चावल धान के जिन खेतों से आता है वो न सिर्फ जहरीली मीथेन गैस वातावरण में छोड़ते हैं बल्कि ये ग्लोबल वॉर्मिंग भी बढ़ा रहे हैं। आईसर भोपाल और इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने पर्यावरण को लेकर एक रिसर्च लेटर प्रकाशित किया है। इनके शोध में जो बात सामने आई है वो बहुत चौकाने वाली है।

    देश के पानी से भरे धान के खेत जो दुनिया की एक बड़ी आबादी का पेट भर रहे हैं वो हर साल पर्यावरण में 97 लाख टन मीथेन गैस छोड़ रहे हैं। कार्बनडाई ऑक्साइड की तुलना में मीथेन गैस पर्यावरण में कम समय के लिए रहती है, लेकिन यह अपने अंदर गर्मी को बनाए रखती है। इसकी वजह से ग्लोबल वॉर्मिंग में बढ़ोतरी होती है।

    दोनों संस्थानों के वैज्ञानिकों ने इसके लिए यूरोप कॉपरनिकस प्रोग्राम के सैटेलाइट डाटा का उपयोग किया। इसमें 10 मीटर रिजॉल्यूशन पर धान के खेत का नक्शा बनाया गया। इसमें यह सामने आया कि मीथेन गैस का उत्सर्जन सबसे ज्यादा कहां और कब होता है।

    इस शोध से जुड़े आईसर के वैज्ञानिकों की माने तो अकेले मॉनसून के मौसम में बोई जाने वाली खरीफ फसल से ही देश में चावल से जुड़ी मीथेन का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा निकलता है। देश के ज्यादातर इलाकों में चावल हमारे खाने की थाली का एक मुख्य हिस्सा होता है। लेकिन यही देश के जलवायु पर पड़ने वाले असर का एक बड़ा कारण निकलकर सामने आया है।

    धान के खेतों से मीथेन गैस निकलने की वजह
    धान पानी से भरे खेतों में होती है, इसलिए इसमें ऑक्सीजन की कमी होती है। यहीं पर सूक्ष्मजीव कार्बनिक पदार्थों को सड़ाकर मीथेन गैस को छोड़ते हैं। खेती की यह प्रक्रिया बहुत पुरानी है, लेकिन इससे पर्यावरण पर लगातार प्रभाव पड़ रहा है। देश में करीब चार करोड़ हेक्टेयर जमीन पर चावल की खेती की जाती है। यह जितना लोगों की आजीविका का साधन है उतना ही हवा को नुकसान पहुंचाने वाला भी है।

    मीथेन के उत्सर्जन में हो सकती है 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी
    इस शोध में जो बात सामने है उसमें बताया गया है कि अगर आने वाले समय में तापमान में बढ़ोतरी होती है और बारिश का पैटर्न भी बिगड़ता है तो मीथेन गैस के उत्सर्जन में 25 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। इससे खेती की पैदावार और इससे होने वाजी आजीविका पर भी असर पड़ेगा। इसमें शोधकर्ताओं का कहना है कि मीथेन पर इस शोध को हमें और व्यापक स्तर पर करने की आवश्यकता है।

    वैज्ञानिकों ने बताई बड़ी वजह

    शोधकर्ताओं ने यह महत्वपूर्ण अध्ययन किया है, जिसे विज्ञान जगत की प्रतिष्ठित पत्रिका 'नेचर फूड' जर्नल में जगह मिली है. इस शोध में साफ तौर पर बताया गया है कि साल 2001 से लेकर 2020 के बीच के दो दशकों में पूरे एशिया महाद्वीप में चावल के उत्पादन के कारण ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 

    धान के खेत ग्लोबल वार्मिंग से कैसे जुड़े?
    आखिरकार धान की खेती से पर्यावरण को इतना नुकसान कैसे पहुंच रहा है, इसे समझना बहुत जरूरी है. वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में विस्तार से समझाया है कि धान की फसल को तैयार करने के लिए खेतों को लंबे समय तक पानी से भरकर जलमग्न रखना पड़ता है. जब यह खेत पानी से पूरी तरह भरे रहते हैं, तो वहां की मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है. ऐसी स्थिति में वहां मौजूद बैक्टीरिया बड़ी मात्रा में मीथेन गैस पैदा करने लगते हैं. इसके साथ ही इन खेतों से नाइट्रस ऑक्साइड गैस भी बाहर निकलती है। 

    इसलिए बढ़ रहा है तापमान
    यह दोनों ही गैसें कार्बन डाइऑक्साइड के मुकाबले वातावरण में गर्मी को रोकने में कहीं ज्यादा खतरनाक और असरदार होती हैं. यह गैसें हमारे वायुमंडल में एक मोटी परत बना लेती हैं जो सूरज की गर्मी को वापस अंतरिक्ष में जाने से रोक देती है. इसके कारण धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है और ग्लोबल वार्मिंग का खतरा गहराता जा रहा है। 

    दुनिया में धान की खेती से कितना बढ़ रहा है प्रदूषण?
    इस पूरे मामले को गहराई से समझने के लिए शोध दल के प्रमुख और बोस्टन कॉलेज के प्रोफेसर हानक्विन तियान की देखरेख में एक बड़ा विश्लेषण किया गया. इस शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने 21 हजार से भी ज्यादा क्षेत्रीय आंकड़ों को खंगाला. इसके साथ ही इस काम में आधुनिक मशीन लर्निंग तकनीक और वैश्विक स्तर के विश्लेषण का सहारा लिया गया ताकि नतीजे पूरी तरह सटीक आ सकें। 

    पूर्वी एशिया में मीथेन का उत्सर्जन सबसे ज्यादा
    इस तकनीक से सामने आए नतीजों से पता चला है कि पूर्वी एशिया के देशों में मीथेन का उत्सर्जन सबसे ज्यादा दर्ज किया गया है. वहीं दूसरी तरफ, अफ्रीका महाद्वीप में अब धान की खेती का चलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है, जिसके कारण वह भी अब इस मामले में एक नया हॉटस्पॉट बनकर उभर रहा है. साल 2001 से 2020 के आंकड़ों को देखें तो दुनिया भर में धान के खेतों से होने वाले कुल उत्सर्जन में अकेले एशिया की हिस्सेदारी 90 प्रतिशत से भी ज्यादा रही है. इसमें भी दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों का योगदान सबसे आगे पाया गया है। 

    मीथेन गैस क्यों है इतनी खतरनाक?
    मीथेन जमीनी-स्तर के ओजोन के बनने में मुख्य भूमिका निभाती है. यह एक खतरनाक वायु प्रदूषक और ग्रीनहाउस गैस है, जिसके संपर्क में आने से हर साल 10 लाख लोगों की समय से पहले मौत हो जाती है. मीथेन एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस भी है. 20 साल की अवधि में, यह कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 80 गुना ज्यादा गर्मी पैदा करती है। 

    औद्योगिक काल से पहले 30 प्रतिशत था मीथेन का योगदान 
    औद्योगिक काल से पहले के समय से अब तक ग्लोबल वार्मिंग में मीथेन का योगदान लगभग 30 प्रतिशत रहा है, और 1980 के दशक में रिकॉर्ड रखना शुरू होने के बाद से यह किसी भी अन्य समय की तुलना में तेजी से बढ़ रही है. असल में, यूनाइटेड स्टेट्स नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के आंकड़ों के अनुसार, 2020 में महामारी से जुड़े लॉकडाउन के दौरान जब कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन की गति धीमी हुई, तब भी वायुमंडलीय मीथेन का स्तर तेजी से बढ़ गया। 

    खेती के विस्तार से बढ़ी मुसीबत
    शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का भी अंदेशा जताया है कि आने वाले समय में चावल की खेती का दायरा और ज्यादा फैलने वाला है. आंकड़ों के अनुसार, साल 2015 में दुनिया भर में करीब 39.7 करोड़ एकड़ जमीन पर धान उगाया जा रहा था, जिसके साल 2024 तक बढ़कर 42.6 करोड़ एकड़ तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है। 

    उतसर्जन के पीछे 2 बड़ी वजह
    इस बढ़ते उत्सर्जन के पीछे मुख्य रूप से दो बड़ी वजहें काम कर रही हैं. पहली वजह यह है कि विकासशील देशों में आबादी की भोजन संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए धान की खेती का बहुत तेजी से विस्तार किया जा रहा है. दूसरी बड़ी वजह यह है कि आजकल किसान फसल की कटाई के बाद बचे हुए अवशेषों को पानी से भरे खेतों में ही वापस मिला देते हैं. जब यह अवशेष पानी के अंदर सड़ते हैं, तो इनसे मीथेन गैस बनने की रफ्तार कई गुना ज्यादा बढ़ जाती है। 

    भारत के लिए क्यों बड़ी चुनौती है यह मुद्दा?
    भारत में धान की खेती अब बड़ी चुनौती बनती जा रही है. इसकी सबसे बड़ी वजह पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव है. धान की फसल को बहुत अधिक पानी चाहिए, जिससे खासकर पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में भूजल तेजी से घट रहा है. कई इलाकों में जलस्तर हर साल करीब 0.7 मीटर नीचे जा रहा है। 

    धान की खेती का असर सिर्फ पानी तक सीमित नहीं
    धान आधारित खेती का असर सिर्फ पानी तक सीमित नहीं है. हर साल करीब 9.2 करोड़ टन पराली जलाने से दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों के दौरान प्रदूषण और स्मॉग बढ़ता है. वहीं, जरूरत से ज्यादा यूरिया इस्तेमाल करने से मिट्टी की गुणवत्ता खराब हो रही है और पानी भी दूषित हो रहा है. विशेषज्ञों के अनुसार, धान के खेत देश के कुल मीथेन उत्सर्जन का लगभग 11% हिस्सा पैदा करते हैं. तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी से धान की पैदावार करीब 6% तक घट सकती है. बिहार और पश्चिम बंगाल के कुछ इलाकों में भूजल में आर्सेनिक की मात्रा भी चिंता बढ़ा रही है। 

     

  • भोपाल गैस त्रासदी के 40 साल बाद बड़ा कदम, यूनियन कार्बाइड परिसर की वैज्ञानिक जांच फिर शुरू; सामने आएंगे जहरीले तत्व

    भोपाल गैस त्रासदी के 40 साल बाद बड़ा कदम, यूनियन कार्बाइड परिसर की वैज्ञानिक जांच फिर शुरू; सामने आएंगे जहरीले तत्व

    भोपाल
     दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदियों में शामिल भोपाल गैस त्रासदी के चार दशक बाद यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री परिसर की मिट्टी और पानी की एक बार फिर वैज्ञानिक जांच कराई जाएगी। जांच के जरिए यह पता लगाया जाएगा कि इतने वर्षों बाद भी परिसर में प्रदूषण की स्थिति क्या है और जमीन के नीचे अथवा परिसर में मौजूद तालाबों के पानी में जहरीले रासायनिक तत्व तो मौजूद नहीं हैं।

    जांच रिपोर्ट आने के बाद ही तय होगा कि फैक्ट्री परिसर की जमीन का इस्तेमाल गैस पीड़ितों के स्मारक, अस्पताल या अन्य कार्यों के लिए किया जा सकता है या नहीं। सरकार ने परीक्षण का जिम्मा गुजरात की एक कंपनी को सौंपा है। कंपनी जल्द ही अलग-अलग स्थानों से नमूने लेकर जांच शुरू करेगी। इस पूरी प्रक्रिया पर करीब 2.65 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।

    87 एकड़ जमीन पर प्रस्तावित है स्मारक और अस्पताल
    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने रासायनिक कचरा हटाए जाने के बाद इसी वर्ष जनवरी में यूनियन कार्बाइड परिसर की खाली जमीन पर गैस त्रासदी के पीड़ितों की स्मृति में स्मारक और अस्पताल बनाने की घोषणा की थी। फैक्ट्री परिसर में कुल 87 एकड़ जमीन है।

    अब इस जमीन के भविष्य के उपयोग से पहले एक बार फिर पर्यावरणीय स्थिति का वैज्ञानिक आकलन कराया जा रहा है। जांच में मिट्टी के साथ भूजल और परिसर में बने तालाबों के पानी के नमूनों की भी जांच की जाएगी, ताकि किसी तरह के रासायनिक अवशेष की मौजूदगी का पता लगाया जा सके।

    2010 की जांच में मिले थे पारा और कीटनाशक
    इससे पहले वर्ष 2010 में राष्ट्रीय पर्यावरणीय शोध संस्थान (नीरी), नागपुर ने परिसर की मिट्टी की जांच की थी। इसके अलावा फैक्ट्री परिसर के बाहर भूजल के 30 नमूने लेकर उनका परीक्षण किया गया था।

    तब कुछ नमूनों में पारा (मर्करी) समेत कुछ कीटनाशक निर्धारित मात्रा से अधिक पाए गए थे। ऐसे में चार दशक बाद होने वाली नई जांच से यह स्पष्ट होगा कि मौजूदा समय में परिसर और उसके आसपास प्रदूषण की स्थिति क्या है।

    टेंडर पर भी उठे सवाल
    वहीं, एक संगठन से जुड़ी रचना ढींगरा ने जांच के लिए कंपनी के चयन पर सवाल उठाते हुए कहा है कि अदालत ने इसके लिए ग्लोबल टेंडर किए जाने की आवश्यकता बताई है। सरकार की ओर से गुजरात की कंपनी को जांच का काम सौंपा गया है।

    अब नई जांच की रिपोर्ट पर यह तय होगा कि त्रासदी के चार दशक बाद यूनियन कार्बाइड परिसर की 87 एकड़ जमीन को स्मारक और अस्पताल जैसे सार्वजनिक उपयोग में लाने के लिए पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित माना जा सकता है या नहीं।

  • पिछले ढाई वर्षों में प्रदेश में 11.50 लाख से अधिक प्रधानमंत्री आवास पूर्ण : मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय

    पिछले ढाई वर्षों में प्रदेश में 11.50 लाख से अधिक प्रधानमंत्री आवास पूर्ण : मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

    रायपुर 

    छत्तीसगढ़ में गरीब एवं जरूरतमंद परिवारों के पक्के आवास के सपने को साकार करने की दिशा में आज एक और महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ा। सक्ती में आयोजित प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के राज्यस्तरीय गृह प्रवेश समारोह में 2 लाख नवनिर्मित आवासों का गृह प्रवेश कराया गया। कार्यक्रम में केंद्रीय ग्रामीण विकास एवं कृषि मंत्री  शिवराज सिंह चौहान और मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय की उपस्थिति में हितग्राहियों को प्रतीकात्मक रूप से उनके नए घरों की चाबी सौंपी गई।

    इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री  शिवराज सिंह चौहान ने छत्तीसगढ़ को प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के अंतर्गत 3.65 लाख अतिरिक्त आवासों की बड़ी सौगात दी। उन्होंने नवगठित सक्ती जिले में कृषि विज्ञान केंद्र खोलने तथा बस्तर संभाग में प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के सर्वे की समय-सीमा 31 अक्टूबर 2026 तक बढ़ाने की घोषणा भी की। केंद्रीय मंत्री  चौहान ने अतिरिक्त आवासों की स्वीकृति संबंधी पत्र मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय को सौंपा।

    छत्तीसगढ़ में प्रतिदिन 1600 से अधिक पीएम आवास हो रहे पूर्ण : केंद्रीय मंत्री  चौहान

    केंद्रीय ग्रामीण विकास एवं कृषि मंत्री  शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार गरीबों, किसानों, महिलाओं और ग्रामीण परिवारों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए निरंतर कार्य कर रही है। प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण इसी संकल्प को जमीन पर साकार करने वाली महत्वपूर्ण योजना है।

    उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के अंतर्गत आवास निर्माण का कार्य तेज गति से आगे बढ़ रहा है और प्रतिदिन 1600 से अधिक आवास पूर्ण किए जा रहे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय के नेतृत्व में प्रदेश में केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन तथा विकास कार्यों की सराहना की।

    केंद्रीय मंत्री  चौहान ने कहा कि सरकार जो कहती है, उसे पूरा करके दिखाती है। केंद्र और राज्य सरकार के समन्वित प्रयासों से छत्तीसगढ़ में विकास कार्यों को नई गति मिली है। ग्रामीण क्षेत्रों में पक्के आवास, सड़क, पेयजल, स्वच्छता, स्वास्थ्य और आजीविका से जुड़ी सुविधाओं का लगातार विस्तार किया जा रहा है।

    उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के माध्यम से गरीब परिवारों को केवल पक्की छत ही नहीं मिल रही, बल्कि उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत, निःशुल्क राशन, स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत शौचालय और जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं के माध्यम से उनके जीवन में व्यापक बदलाव लाने का कार्य किया जा रहा है।

    कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए मिलकर कर रहे काम

    केंद्रीय मंत्री  शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि छत्तीसगढ़ कृषि की अपार संभावनाओं वाला प्रदेश है। प्रदेश अब केवल धान के कटोरे के रूप में ही नहीं, बल्कि तेजी से सब्जी उत्पादन के क्षेत्र में भी अपनी नई पहचान बना रहा है। किसानों की आय बढ़ाने, कृषि में आधुनिक तकनीक को प्रोत्साहित करने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार मिलकर कार्य कर रही हैं।

    उन्होंने कहा कि सक्ती में कृषि विज्ञान केंद्र की स्थापना से क्षेत्र के किसानों को आधुनिक कृषि तकनीक, उन्नत खेती, फसल विविधीकरण और कृषि संबंधी वैज्ञानिक मार्गदर्शन स्थानीय स्तर पर उपलब्ध होगा।

    गरीब का पक्का घर हमारी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता : मुख्यमंत्री  साय

    मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय ने केंद्रीय मंत्री  शिवराज सिंह चौहान का छत्तीसगढ़ की तीन करोड़ जनता की ओर से स्वागत एवं अभिनंदन करते हुए कहा कि  चौहान का छत्तीसगढ़ के प्रति विशेष स्नेह रहा है और उनके प्रत्येक प्रवास से प्रदेश को विकास की नई सौगातें मिली हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत आज अपने नए पक्के घर में प्रवेश कर रहे 2 लाख हितग्राही परिवारों को बधाई और शुभकामनाएं दीं।

    मुख्यमंत्री  साय ने कहा कि गरीब परिवारों को पक्का आवास उपलब्ध कराना हमारी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में है। राज्य सरकार ने अपनी पहली कैबिनेट बैठक में ही 18 लाख प्रधानमंत्री आवासों की स्वीकृति देकर अपनी प्राथमिकता स्पष्ट कर दी थी। पिछले ढाई वर्षों में प्रदेश में 11.50 लाख से अधिक आवास पूर्ण किए जा चुके हैं।

    उन्होंने कहा कि आवास सर्वे-2011 और आवास प्लस सर्वे के अंतर्गत आवासों के लक्ष्य की स्वीकृति मिल चुकी है। अब आवास प्लस-प्लस सर्वे में शामिल शेष पात्र परिवारों के लिए भी आवास स्वीकृत करने का अनुरोध केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री से किया गया है। सरकार का प्रयास है कि प्रदेश का कोई भी पात्र गरीब परिवार पक्के आवास से वंचित न रहे।

    13.85 लाख बहनें बनीं लखपति दीदी

    मुख्यमंत्री  साय ने कहा कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में हमारी माताओं-बहनों की महत्वपूर्ण भूमिका है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और बिहान के माध्यम से महिलाओं को आजीविका के नए अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। प्रदेश में अब तक 13 लाख 85 हजार दीदियां लखपति दीदी बन चुकी हैं। यह महिलाओं की मेहनत, आत्मविश्वास और आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में हो रहे बड़े बदलाव का प्रमाण है।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि महतारी वंदन योजना के माध्यम से प्रदेश की लगभग 70 लाख माताओं-बहनों को लाभान्वित किया जा रहा है और अब तक 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि उनके खातों में अंतरित की जा चुकी है। महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण के लिए राज्य सरकार पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रही है।

    मुख्यमंत्री ने नागरिकों से मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 और सेवा सेतु पोर्टल का अधिक से अधिक लाभ लेने की अपील की। उन्होंने बताया कि बिजली बिल समाधान योजना के अंतर्गत अब तक 750 करोड़ रुपये से अधिक के बकाया बिजली बिल माफ किए जा चुके हैं।

    ग्रामीण विकास के कई अभिनव अभियानों का शुभारंभ

    कार्यक्रम में प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के अंतर्गत निर्मित 2 लाख आवासों के गृह प्रवेश के साथ ही विभिन्न ग्रामीण विकास अभियानों और नवाचारों का भी शुभारंभ किया गया। प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के हितग्राहियों को प्रतीकात्मक रूप से गृह प्रवेश की चाबी प्रदान की गई।

    मुख्यमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के अंतर्गत एआई आधारित जियो-टैग सत्यापन का शुभारंभ किया गया। विकसित भारत-जी राम जी के अंतर्गत ‘धार अपार’ और ‘सुघ्घर बाड़ी’ अभियान प्रारंभ किए गए। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत 270 नवीन इंटीग्रेटेड फार्मिंग क्लस्टरों का विमोचन किया गया। साथ ही इन्क्यूबेशन प्रोग्राम ‘अथ उद्यमिता की ओर’ के अंतर्गत चैलेंज फंड इवेंट का शुभारंभ हुआ।

    कार्यक्रम में आजीविका के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाली लखपति दीदियों एवं डीलर दीदियों तथा पंचायत एवं ग्रामीण विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाली पंचायतों के प्रतिनिधियों को सम्मानित किया गया।

    अंत्योदय के संकल्प के साथ अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रहा योजनाओं का लाभ :  तोखन साहू

    केंद्रीय राज्यमंत्री  तोखन साहू ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय का अंत्योदय का चिंतन सरकार के लिए मार्गदर्शक है। प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय के नेतृत्व में इसी भावना के अनुरूप गरीब, किसान, महिला और समाज के अंतिम व्यक्ति के कल्याण के लिए योजनाएं संचालित की जा रही हैं।

    उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से प्रदेश में विकास को नई गति मिली है और गांवों में बुनियादी सुविधाओं के साथ ही रोजगार एवं आजीविका के अवसर भी बढ़ रहे हैं।

    कोई भी पात्र परिवार पक्के आवास से वंचित न रहे : उप मुख्यमंत्री  विजय शर्मा

    उप मुख्यमंत्री  विजय शर्मा ने कहा कि प्रदेश में सरकार बनने के बाद 11.50 लाख से अधिक प्रधानमंत्री आवास पूर्ण किए जा चुके हैं। राज्य सरकार का स्पष्ट संकल्प है कि कोई भी पात्र परिवार पक्के आवास से वंचित न रहे। गरीब परिवारों के साथ नक्सल हिंसा से प्रभावित परिवारों और आत्मसमर्पण कर समाज की मुख्यधारा में लौटे लोगों के आवास की भी चिंता की जा रही है।

    उन्होंने कहा कि ग्रामीण विकास केवल आवास निर्माण तक सीमित नहीं है। गांवों में शिक्षा, स्वच्छता और अन्य बुनियादी सुविधाओं को मजबूत बनाने की दिशा में भी तेजी से कार्य हो रहा है। 26 जनवरी 2027 तक प्रदेश के प्रत्येक विद्यालय में बालिका शौचालय की सुविधा सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखा गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में पक्के मुक्तिधाम शेड और आवश्यक अधोसंरचना का निर्माण भी वीबी-जी राम जी योजना के अंतर्गत कराया जाएगा।

    उप मुख्यमंत्री  शर्मा ने कहा कि विकास कार्यों में पारदर्शिता और जवाबदेही राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में है। पंचायतों में कराए जा रहे विकास कार्यों पर बारकोड लगाया जा रहा है। नागरिक इसे स्कैन कर संबंधित विकास कार्य की जानकारी प्राप्त कर सकेंगे। इससे ग्रामीण विकास में पारदर्शिता बढ़ने के साथ आम नागरिक भी विकास कार्यों की निगरानी में सहभागी बनेंगे।

    कार्यक्रम के अंत में जिले के प्रभारी मंत्री गुरु खुशवंत साहेब ने आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर सांसद मती कमलेश जांगड़े, जिला पंचायत अध्यक्ष मती द्रौपती कीर्तन चंद्रा सहित जनप्रतिनिधि, पंचायत पदाधिकारी, लखपति दीदियां, प्रधानमंत्री आवास योजना के हितग्राही एवं बड़ी संख्या में ग्रामीणजन उपस्थित थे।

  • सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा पर जोर, ग्रामीण अधोसंरचना मजबूत होने से बढ़ेंगी सुविधाएं

    सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा पर जोर, ग्रामीण अधोसंरचना मजबूत होने से बढ़ेंगी सुविधाएं

    रायपुर 

     केंद्रीय ग्रामीण विकास, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री  शिवराज सिंह चौहान और मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय ने आज सक्ती जिले के ग्राम जेठा में आयोजित कार्यक्रम में जिले को लगभग 122 करोड़ रुपए के विभिन्न विकास कार्यों की सौगात दी। दोनों अतिथियों ने 121 करोड़ 70 लाख रुपए से अधिक की लागत के कुल 38 विकास कार्यों का लोकार्पण एवं भूमिपूजन किया।

    इनमें लगभग 79.25 करोड़ रुपए की लागत के 23 विकास कार्यों का भूमिपूजन तथा लगभग 42.46 करोड़ रुपए की लागत के 15 विकास कार्यों का लोकार्पण शामिल है। इन कार्यों से जिले में सड़क संपर्क के विस्तार के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, प्रशासनिक और ग्रामीण अधोसंरचना को मजबूती मिलेगी।

    भूमिपूजन किए गए प्रमुख कार्यों में लगभग 25.82 करोड़ रुपए की लागत से देवरघटा, बरतुंगा, तुलसीडीह, अण्डा, चरौदा होते हुए सपिया नहरपार तक 22 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण तथा लगभग 15.30 करोड़ रुपए की लागत से छुहीपाली से कटेकोनी बड़े-कर्राखई-ठाकुरपाली होते हुए सेमराडीह तक 12 किलोमीटर सड़क का चौड़ीकरण एवं नवीनीकरण शामिल है। इसके साथ ही अण्डी-किरकार-जगमहन से सातबहिनिया तक सड़क, नगझर-नवापारा मार्ग और गुरेराडीह किरारी से केसला मुख्य मार्ग सहित विभिन्न सड़क परियोजनाओं का भूमिपूजन किया गया।

    शिक्षा और युवाओं के लिए शासकीय कन्या महाविद्यालय सक्ती के नवीन भवन, बेदराम शासकीय महाविद्यालय मालखरौदा में अतिरिक्त भवन तथा नवीन लाइवलीहुड संस्थान भवन का भूमिपूजन किया गया। स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के लिए विभिन्न ग्रामों में उप स्वास्थ्य केंद्र भवन तथा महिलाओं के लिए महतारी सदनों के निर्माण कार्यों की भी आधारशिला रखी गई। 

    लोकार्पित प्रमुख कार्यों में लगभग 14.35 करोड़ रुपए की लागत से मालखरौदा क्षेत्र में कलमी नहरपार से चिखली, छोटेकोट, बड़ेकोट, सिंघरा होते हुए बेल्हाडीह तक सड़क तथा लगभग 11.35 करोड़ रुपए की लागत से देवरघटा से कठरापाली, निमोही, सिंघीतराई, बेनीपाली होते हुए ओड़ेकेरा मुख्य मार्ग तक पुल-पुलिया सहित सड़क निर्माण शामिल है। बुंदेली-अड़भार मार्ग का भी लोकार्पण किया गया।

    इसके अलावा जल जीवन मिशन के अंतर्गत स्थापित सोलर ड्यूल पंप, चन्द्रपुर एवं हसौद के नवीन तहसील कार्यालय भवन, डभरा, चन्द्रपुर एवं जैजैपुर के नवीन पुलिस थाना भवन, अड़भार पुलिस चौकी भवन, सुलौनी हाईस्कूल भवन, गोपालपुर प्रशिक्षण भवन तथा गोबरा में महतारी सदन सहित अन्य विकास कार्य जनता को समर्पित किए गए।

    इस अवसर पर उपमुख्यमंत्री  विजय शर्मा, केंद्रीय राज्य मंत्री  तोखन साहू, कौशल विकास मंत्री गुरु खुशवंत साहेब, सांसद मती कमलेश जांगड़े सहित जनप्रतिनिधि एवं बड़ी संख्या में नागरिक उपस्थित थे।

  • केंद्रीय मंत्री  चौहान ने लगाया कदम और मुख्यमंत्री  साय ने बादाम का पौधा

    केंद्रीय मंत्री चौहान ने लगाया कदम और मुख्यमंत्री साय ने बादाम का पौधा

    रायपुर 

     पर्यावरण संरक्षण के प्रति जनभागीदारी को बढ़ावा देने और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी का संदेश देते हुए केंद्रीय ग्रामीण विकास, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री  शिवराज सिंह चौहान और मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय ने आज सक्ती जिले के ग्राम जेठा स्थित कॉलेज ग्राउंड में ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के अंतर्गत पौधरोपण किया।

    केंद्रीय मंत्री  शिवराज सिंह चौहान ने कदम का पौधा और मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय ने बादाम का पौधा रोपित किया। इस अवसर पर उपस्थित जनप्रतिनिधियों एवं अधिकारियों ने भी पर्यावरण संरक्षण और हरियाली के विस्तार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की।

    ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान मातृ सम्मान की भावना को प्रकृति संरक्षण के संकल्प से जोड़ता है। अभियान के माध्यम से लोगों को अपनी माँ के सम्मान में पौधा लगाने के साथ ही उसके संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रेरित किया जा रहा है। पौधरोपण के साथ पौधों की देखभाल और उन्हें वृक्ष के रूप में विकसित करने की जिम्मेदारी का भाव भी इस अभियान का महत्वपूर्ण उद्देश्य है।

    यह अभियान पर्यावरण संरक्षण को केवल शासकीय प्रयास तक सीमित न रखते हुए उसे जनभागीदारी का व्यापक स्वरूप देने की पहल है। अधिक से अधिक नागरिकों की सहभागिता से हरियाली बढ़ाने, पर्यावरण संतुलन बनाए रखने और भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित एवं स्वच्छ पर्यावरण के निर्माण का संदेश अभियान के माध्यम से दिया जा रहा है।

    उल्लेखनीय है कि ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के माध्यम से देशभर में नागरिकों को पौधरोपण से जोड़ते हुए पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन का स्वरूप देने का प्रयास किया जा रहा है। इसी कड़ी में सक्ती जिले में केंद्रीय मंत्री  चौहान और मुख्यमंत्री  साय द्वारा किया गया पौधरोपण प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और सामूहिक जिम्मेदारी का संदेश देता है।

    इस अवसर पर उपमुख्यमंत्री  विजय शर्मा, जिले के प्रभारी मंत्री गुरु खुशवंत साहेब, जांजगीर-चांपा सांसद मती कमलेश जांगड़े, बिलासपुर संभागायुक्त  सुनील जैन, विकसित भारत जीरामजी के आयुक्त  तारण प्रकाश सिन्हा, कलेक्टर मती जय जैन, पुलिस अधीक्षक  प्रफुल्ल ठाकुर, जिला पंचायत सीईओ  वासु जैन सहित जनप्रतिनिधि एवं अधिकारी उपस्थित थे।

  • ईरान की अंडरग्राउंड फैक्ट्रियां फिर एक्टिव, बैलिस्टिक मिसाइलों का उत्पादन शुरू होने का दावा

    ईरान की अंडरग्राउंड फैक्ट्रियां फिर एक्टिव, बैलिस्टिक मिसाइलों का उत्पादन शुरू होने का दावा

    तेहरान 

    अमेरिका और मिडिल ईस्ट के खुफिया अधिकारियों के अनुसार ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइलों का उत्पादन दोबारा शुरू कर दिया है. ये मिसाइलें युद्ध से पहले जमा किए गए यंत्रों को जोड़कर बनाई जा रही हैं. ये सारा काम अंडरग्राउंड फैसिलिटी में हो रहा है। 

    यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका और इजरायल ने हालिया सैन्य अभियान के दौरान ईरान की मिसाइल क्षमताओं को बड़ा नुकसान पहुंचाने का दावा किया था. अब वही क्षमता धीरे-धीरे वापस आती दिख रही है। 

    युद्ध के शुरुआती चरण में ईरान के मिसाइल लॉन्चपैड और औद्योगिक यूनिट्स पर भारी हमले हुए थे. इन हमलों का मकसद ईरान की मिसाइल निर्माण क्षमता को नष्ट करना था. लेकिन खुफिया जानकारी बताती है कि ईरान ने पहले से ही कई जरूरी पार्ट्स जमा कर रखे थे।

    अब इन्हीं स्टॉक किए गए पार्ट्स को भूमिगत जगहों पर ले जाकर मिसाइलें असेंबल की जा रही हैं. अंडरग्राउंड फैसिलिटी का इस्तेमाल इसलिए हो रहा है ताकि हवाई हमलों से बचा जा सके. काम बिना रुकावट चलता रहे। 

    ईरान दो तरह की बैलिस्टिक मिसाइलें बना रहा है. पहली लिक्विड-प्रोपेलेंट मिसाइलें, जिन्हें लॉन्च से ठीक पहले ईंधन भरना पड़ता है. दूसरी सॉलिड-प्रोपेलेंट मिसाइलें, जिन्हें पहले से तैयार करके रखा जा सकता है और जरूरत पड़ने पर तुरंत दागा जा सकता है. सॉलिड-प्रोपेलेंट मिसाइलें ज्यादा खतरनाक मानी जाती हैं क्योंकि इन्हें लंबे समय तक छिपाकर रखना आसान होता है. प्रतिक्रिया का समय बहुत कम हो जाता है। 

    अमेरिका और इजरायल के दावों पर सवाल
    अमेरिका और इजरायल ने युद्ध के दौरान ईरान की मिसाइल क्षमता को कमजोर करने को अपनी बड़ी उपलब्धि बताया था. उन्होंने दावा किया था कि कई उत्पादन स्थल नष्ट हो गए हैं और ईरान की मिसाइल स्टॉक में काफी कमी आई है. लेकिन अब खुफिया रिपोर्ट्स बता रही हैं कि उत्पादन फिर शुरू हो गया है. इससे उन दावों की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। 

    अगर ईरान अंडरग्राउंड फैसिलिटी में आसानी से मिसाइलें बना सकता है तो भविष्य में भी हवाई हमलों से पूरी क्षमता खत्म करना मुश्किल होगा. यह स्थिति क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए नई चुनौती पैदा कर रही है. मिडिल ईस्ट में तनाव पहले से ही ऊंचा है. ईरान की मिसाइल क्षमता बढ़ने से उसके पड़ोसी देशों और इजरायल के लिए खतरा बढ़ सकता है। 

    सॉलिड-प्रोपेलेंट मिसाइलें खासकर चिंता का विषय हैं क्योंकि इन्हें जल्दी तैनात किया जा सकता है. लिक्विड वाली मिसाइलों को ईंधन भरने में समय लगता है, इसलिए उनका पता लगाना और रोकना थोड़ा आसान होता है. लेकिन दोनों तरह की मिसाइलों का उत्पादन जारी रहना अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए परेशानी का सबब है। 

    अंडरग्राउंड प्रोडक्शन की रणनीति  
    ईरान लंबे समय से अपनी संवेदनशील सैन्य सुविधाओं को भूमिगत रखने की रणनीति अपनाता रहा है. पहाड़ी इलाकों और गहरे सुरंगों में फैक्ट्रियां बनाकर वह हवाई हमलों से बचाव करता है. युद्ध के बाद भी यही रणनीति काम आ रही है. स्टॉक किए गए पार्ट्स का इस्तेमाल करके वह नए उत्पादन प्लांट्स पर निर्भरता कम कर रहा है. इससे उत्पादन की रफ्तार तो धीमी हो सकती है, लेकिन रुक नहीं रही। 

    विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम दिखाता है कि आधुनिक युद्ध में किसी देश की सैन्य क्षमता को पूरी तरह नष्ट करना कितना मुश्किल है. एक बार स्टॉक जमा हो जाए और भूमिगत नेटवर्क मजबूत हो तो हमलों के बाद भी रिकवरी संभव हो जाती है। 

    अमेरिका और इजरायल के लिए अब नई चुनौती यह है कि वे कैसे इन भूमिगत स्थलों का पता लगाएं और उन्हें निशाना बनाएं. साथ ही राजनयिक दबाव और प्रतिबंधों के जरिए भी ईरान पर अंकुश लगाने की कोशिश जारी रह सकती है। 

    ईरान की मिसाइल क्षमता लौटने से पूरे मिडिल ईस्ट का सुरक्षा संतुलन प्रभावित हो सकता है. खाड़ी देश, इजरायल और अमेरिका सभी इस घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं. अगर उत्पादन की रफ्तार बढ़ी तो ईरान अपनी स्थिति मजबूत महसूस कर सकता है। 

    वहीं विरोधी पक्ष को अपनी रक्षा व्यवस्था और मजबूत करनी पड़ सकती है. यह मुद्दा सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि राजनयिक स्तर पर भी चर्चा का विषय बनेगा. अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह तय करना होगा कि ईरान की मिसाइल गतिविधियों पर कैसे नजर रखी जाए और आगे की कार्रवाई क्या हो। 

    कुल मिलाकर यह खबर साफ संकेत देती है कि युद्ध के बावजूद ईरान अपनी मिसाइल क्षमता को पूरी तरह खोने को तैयार नहीं है. अंडरग्राउंड फैसिलिटी और पहले से जमा पार्ट्स के सहारे वह धीरे-धीरे उत्पादन फिर शुरू कर चुका है. आने वाले समय में इस पर और खुफिया जानकारी सामने आएगी, लेकिन फिलहाल यह घटनाक्रम अमेरिका-इजरायल गठबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है। 

     

  • गुटखा, तंबाकू और सिगरेट का जानलेवा असर, MP में माउथ कैंसर के मामले 40% बढ़े; सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े

    गुटखा, तंबाकू और सिगरेट का जानलेवा असर, MP में माउथ कैंसर के मामले 40% बढ़े; सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े

    भोपाल 
     मध्यप्रदेश में जुगाड़ का गुटखा मुंह के कैंसर के मामलों में हर साल बढ़ोत्तरी कर रहा है. मुंह के कैंसर के बढ़ते मामलों को देखते हुए मध्यप्रदेश में करीबन 14 साल पहले गुटखा की बिक्री पर रोक लगाई गई थी, लेकिन इसके बाद पाउच का स्थान 'जुगाड़ के गुटखे' ने ले लिया. तंबाकू-चूने और जुगाड़ के गुटखे के चलते देश में सबसे ज्यादा मुंह के कैंसर के मरीज मध्य प्रदेश में सामने आ रहे हैं. मध्यप्रदेश में साल 2025 में 48 हजार 694 कैंसर के मरीज मिले थे, जिनमें से करीबन 40 फीसदी मरीज ओरल कैंसर के थे। 

    भोपाल में सबसे ज्यादा मुंह का कैंसर
    नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम इंवेस्टीगेटर की रिपोर्ट के मुताबिक, मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में मुंह के कैंसर के सबसे ज्यादा मामले सामने आते हैं. राजधानी भोपाल में 1 लाख लोगों की आबादी में 41 लोग मुंह के कैंसर से पीड़ित मिल रहे हैं. इसके अलावा प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में भी मुंह के कैंसर से पीड़ित मरीज बड़ी संख्या में मिल रहे हैं। 

    गुटखे पर पाबंदी तो जुगाड़ वाला गुटखा चला
    कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ. श्याम अग्रवाल के मुताबिक, '' मुंह के कैंसर पर रोक लगाने के लिए ही 1 अप्रेल 2012 को मध्यप्रदेश में तंबाकू पाउच की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, लेकिन इसके बाद जुगाड़ का पाउच आ गया. अब एक पाउच में सादा गुटखा होता है, और दूसरे में तंबाकू, चूना आदि. इस सबको मिलाकर यह वहीं तंबाकू का गुटखा बन जाता है, जिस पर प्रतिबंध लगाया गया था. यही वजह है कि प्रदेश में मुंह के कैंसर के रोगी कम होने के स्थान पर बढ़ गए हैं। 

    अब युवाओं में आ रहे कैंसर के मामले, एमपी में सबसे तेज
    डॉ. श्याम अग्रवाल कहते हैं, '' अब मुंह के कैंसर के मरीजों के मामले में एक अहम बदलाव आया है. कुछ साल पहले तक मुंह के कैंसर के मरीज की औसत उम्र 50 साल और उससे अधिक ही होती थी, लेकिन अब 20-25 साल की नई उम्र के युवा भी कैंसर मरीज बन रहे हैं. कारण सिर्फ तंबाकू का सेवन है. पूरे विश्व में भारत, पाकिस्तान सहित कुछ देशों में ही मुंह के कैंसर के मरीज सामने आते हैं, इसमें भी मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा. मध्यप्रदेश में कैंसर के मरीजों की संख्या में हर साल 10.55 फीसदी की बढ़ोत्तरी हो रही है, जबकि इसमें मुंह के कैंसर के मरीज 40 फीसदी बढ़ रहे हैं। 

    जानकारी देते कैंसर विशेषज्ञ 
    भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय महामारी विज्ञान संस्थान के अनुसार मध्यप्रदेश में साल 2021 से 2025 के दौरान कैंसर के मरीजों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। 

    40 फीसदी मामले माउथ कैंसर के ही
    प्रदेश में मुंह के कैंसर के मामले औसत कैंसर के मामलों से ज्यादा बढ़ रहे हैं. देश में भी मिलने वाले कैंसर के कुल मामलों में 40 फीसदी सिर्फ मुंह के कैंसर के मामले होते हैं. भोपाल स्थिति जवाहरलाल नेहरू कैंसर हॉस्पिटल के आंकड़ों को देखें तो हॉस्पिटल में साल 2012 में मुंह के कैंसर के मरीजों की संख्या 1836 थी, जो साल 2025 में बढ़कर 2614 तक पहुंच गई हैं. यहां इलाज कराने के लिए प्रदेश के कई जिलों से मरीज पहुंचते हैं. मुंह के कैंसर के मरीजों की संख्या में लगातार बढ़त देखी जा रही है, जो खतरनाह है। 

    साल 2020 में हॉस्पिटल में 2118 ओरल कैंसर के मरीज मिले थे, जो साल 2021 में बढ़कर 2519 हो गए. साल 2022 में यहां 2492 मरीज इलाज कराने पहुंचे. वहीं, साल 2023 में 2566 मरीज, 2024 में 2743 और साल 2025 में 2614 ओरल कैंसर के मरीज सामने आए हैं। 

    मुंह में सफेद, लाल दाग तो सर्तक हो जाएं
    जवाहरलाल नेहरू कैंसर हॉस्पिटल भोपाल के मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. विजय भार्गव कहते हैं, '' गुटखा, पाउच, तंबाखू खाने और सिगरेट पीने वाले लोग मुंह में होने वाले शुरुआती लक्षणों को बिलकुल भी नजरअंदाज न करें. यदि धीरे-धीरे मुंह खुलना कम हो जाए या मुंह में किसी तरह के लाल-सफेद धब्बे बन जाएं तो तुरंत तंबाकू, गुटखा खाना बंद कर दें और चैकअप कराएं. शुरुआती स्तर पर ही जांच और दवा के जरिए गंभीर बीमारी को टाला जा सकता है। 

    तंबाकू और गुटखा मुंह के कैंसर का सबसे बड़ा कारण
    डॉक्टर आगे कहते हैं, ''लगातार तंबाकू, गुटखा खाने वालों और सिगरेट पीने वालों के मुंह में सफेद या लाल धब्बे बन जाते हैं, यह एक तरह की चेतावनी होती है, जो शरीर आपको देता है. ऐसी स्थिति में तुरंत तंबाकू-पाउच खाना बंद करना चाहिए. कई बार लोग तर्क देते हैं कि सिर्फ तंबाकू और चूना खाने से कुछ नहीं होता, लेकिन जब तंबाकू को चूना के साथ मिलाया जाता है तो यह निकोटीन को खून में तेजी से घोलता है और इससे तंबाकू की लत को और मजबूत करता है, इसके साथ ही और मुंह में छाले बनाता है, जो आगे चलकर कैंसर का कारण बन जाता है। 

  • UP में 2027 के लिए BJP का मेगा प्लान! 18,900 हारे बूथों पर फोकस, ऐसे होगी ‘रिकवरी’

    UP में 2027 के लिए BJP का मेगा प्लान! 18,900 हारे बूथों पर फोकस, ऐसे होगी ‘रिकवरी’

    लखनऊ 

    उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की सियासी जंग फतह करने के लिए भाजपा अब पूरी तरह से एक्टिव हो गई है. सीएम योगी आदित्यनाथ अलग-अलग इलाकों में जनसभाएं कर भले ही सियासी माहौल बनाने में जुटे हों, लेकिन भाजपा एक रिकवरी प्लान पर भी काम कर रही है. इसके तहत 2024 में जिन विधानसभा सीटों पर हार मिली है, उनके एक-एक बूथ की रिपोर्ट तैयार की जा रही है। 

    भाजपा सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए 'हाइपर-लोकल' मोड में उतर गई है. मकसद बिल्कुल साफ है, हर बूथ, हर नंबर और हर वोट पर ध्यान देना. पार्टी 2024 के लोकसभा चुनावों में मिली हार को सिर्फ़ एक बड़ी राजनीतिक हार के तौर पर नहीं देख रही है. उसने डेटा की गहराई से जांच की है और उन खास पोलिंग बूथों की पहचान की है, जहां 2022 के विधानसभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनावों के बीच उसका सपोर्ट बेस कम हुआ। 

    भाजपा सूत्रों ने बताया कि पार्टी ने 2022 में जिन 18,900 बूथों पर जीत हासिल की थी, 2024 के चुनाव में उन्हीं बूथों पर वोट कम मिले हैं. यह संख्या अब पार्टी की संगठनात्मक रणनीति का अहम हिस्सा बन गई है. इसीलिए भाजपा ने पहले इन बूथों का हिसाब-किताब करने, कमजोर जगहों की पहचान कर उन्हें मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए रिकवरी प्लान बनाया है। 

    भाजपा के सामने ग्रामीण बूथों की चुनौती
    भाजपा की बूथ स्तरीय कवायद से मिली सबसे अहम जानकारी भौगोलिक है. भाजपा ने जिन 18,900 बूथों को चिह्नित किया है, उनमें से लगभग 80 फीसदी बूथ ग्रामीण इलाकों के हैं. खासकर छोटे गांवों और बिखरी हुई बस्तियों वाले बूथ हैं। लखनऊ, वाराणसी, गोरखपुर और कानपुर जैसे शहरी केंद्र अपेक्षाकृत ज़्यादा मज़बूत रहे. इससे साफ है कि भाजपा का आधार ग्रामीण इलाकों में घट रहा है, जिसे दुरुस्त करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए गए हैं। 

    भाजपा के सामने अब सिर्फ़ पूरे राज्य में राजनीतिक संदेश पहुंचाने की चुनौती नहीं है; चुनौती यह पहचानना है कि कौन-से ग्रामीण समुदाय दूर हो गए, वे क्यों दूर हुए और उन्हें वापस कैसे लाया जाए। 

    वॉर रूम से जमीनी लड़ाई तक का प्लान
    यूपी में भाजपा की रणनीति डेटा एनालिसिस से आगे बढ़कर संगठन को जमीनी स्तर पर मज़बूत करने की ओर बढ़ रही है.  भाजपा के यूपी प्रभारी विनोद तावड़े 16 से 22 सितंबर के बीच फिर से यूपी का दौरा करेंगे. उनकी समीक्षा में जिन मुद्दों पर खास तौर पर चर्चा होगी, उनमें वे बूथ शामिल हैं जहां पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था और उन्हें वापस जीतने की रणनीति बनाना शामिल है। 

    भाजपा की यह प्रक्रिया असल में एक पॉलिटिकल फीडबैक लूप है: बूथ की पहचान करना, सामाजिक बदलाव को समझना, स्थानीय मुद्दों की पहचान करना, और उसके बाद संगठन को फिर से खड़ा करके दोबारा से बूथ को वापस जीतना. भाजपा का मानना है कि उत्तर प्रदेश में चुनाव का नतीजा पूरे राज्य के औसत आंकड़ों से तय नहीं होता; यह हज़ारों अलग-अलग बूथों पर जीत-हार से तय होता है, जहां वोटों के अंतर को मापा जा सकता है, वोटरों की पहचान की जा सकती है और संगठन की कमियों को सुधारा जा सकता है। 

    भाजपा का यूपी में रिकवरी प्लान
    भाजपा के यूपी में नए गणित का आधार बूथ प्रबंधन है. यूपी में 18,900 का आंकड़ा सिर्फ़ एक संख्या नहीं है, बल्कि यह 2024 में मिली हार को माइक्रो-लेवल पर चुनावी रिकवरी प्लान में बदलने की भाजपा की रणनीति है. अवध और पूर्वांचल सबसे ज़्यादा जोखिम वाले इलाके हैं. ग्रामीण बूथ मुख्य चुनावी मैदान हैं, तथा गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वोटों को एकजुट करना एक अहम चिंता है। 

    बसपा के कमज़ोर होने से विपक्ष के वोट ट्रांसफर का पैटर्न बदल गया है. इसके अलावा बुंदेलखंड जैसे इलाकों में स्थानीय मुद्दे अभी भी अहम हैं. भाजपा अब इसी गणित को ज़मीनी स्तर पर लागू करने की तैयारी कर रही है ताकि 2027 में दोबारा वापसी कर सके। 

    अवध और पूर्वांचल में भाजपा की चुनौती
    डेटा से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश में हर जगह नुकसान एक जैसा नहीं था. अवध क्षेत्र में भाजपा ने 2022 में इलाके की 154 विधानसभा सीटों में से 101 सीटें जीती थीं, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में वह इनमें से सिर्फ़ 51 सीटों पर आगे थी। 

    यह कुल मिलाकर 50 सीटों का नुकसान है, 2022 के नतीजों के मुकाबले 49.5 फीसदी की गिरावट. अमेठी, फैज़ाबाद, कन्नौज, सुल्तानपुर और सीतापुर जिलों में यह नुकसान साफ़ तौर पर देखा गया, जिससे अवध भाजपा के चुनावी नक्शे में सबसे ज़्यादा दबाव वाले इलाकों में से एक बन गया है।

    अवध की तरह ही पूर्वांचल इलाके में भी भाजपा को झटका लगा था. 2022 में भाजपा ने पूर्वांचल इलाके की 102 विधानसभा सीटों में से 53 सीटें जीती थीं. इसके दो साल बाद, लोकसभा चुनाव के दौरान वह सिर्फ़ 36 सीटों पर आगे थी। यह कुल मिलाकर 17 सीटों या 32.1 फीसदी की गिरावट रही। 

    बूथ-लेवल पर यह गिरावट खास तौर पर जौनपुर, गाज़ीपुर, मछलीशहर, चंदौली और ग्रामीण प्रयागराज में देखी गई। भाजपा जिन राजनीतिक वजहों पर गौर कर रही है, उनमें गैर-यादव ओबीसी वोटरों के एक हिस्से का समाजवादी पार्टी की तरफ़ जाना शामिल है, जहां अखिलेश यादव का 'पीडीए' फार्मूला प्रभावी रहा। 

    पश्चिमी यूपी और बुंदेलखंड में नफा-नुकसान
    पश्चिमी इलाके में भी गिरावट देखी गई, हालांकि अवध और पूर्वांचल के मुकाबले नुकसान कम था. पश्चिमी यूपी में भाजपा ने 2022 में 76 विधानसभा सीटों में से 57 सीटें जीती थीं; 2024 में वह 43 सीटों पर आगे रही. इस तरह कुल 14 सीटों या 24.6 फीसदी का नुकसान हुआ। 

     रुहेलखंड में 2022 के चुनाव में भाजपा ने 52 सीटों में से 30 सीटें जीती थीं. 2024 के लोकसभा चुनाव में उसकी बढ़त घटकर 22 सीटों पर आ गई, यानी कुल आठ सीटों या 26.7 फीसदी की गिरावट हुई। पश्चिमी यूपी और रुहेलखंड को मिलाकर कुल 128 विधानसभा सीटें हैं; भाजपा ने 2022 के चुनाव में इनमें से 87 सीटें जीती थीं और 2024 के लोकसभा चुनाव में 65 सीटों पर बढ़त बनाए रखीच। 

    वहीं, बुंदेलखंड की तस्वीर कुछ अलग हैय 2022 में भाजपा ने 19 में से 14 विधानसभा सीटें जीती थीं, लेकिन 2024 में वह सिर्फ़ नौ सीटों पर आगे रही. यानी कुल मिलाकर पांच सीटों या 35.7 फीसदी की कमी हुई. यहां पार्टी का आकलन राज्य-स्तर की किसी एक राजनीतिक लहर के बजाय स्थानीय मुद्दों और मौजूदा सरकार के प्रति नाराज़गी (एंटी-इनकंबेंसी) की ओर ज़्यादा इशारा करता है. लगता है कि इन वजहों से इस इलाके के कुछ हिस्सों में भाजपा की बढ़त कमज़ोर हुई है। 

    सपा के 'पीडीए' फ़ैक्टर पर भाजपा की नज़र
    भाजपा के अंदरूनी आकलन में भी सामाजिक समीकरण को समस्या की जड़ माना गया हैय ऐसा प्रतीत होता है कि सपा की 'पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक' (PDA) रणनीति ने भाजपा के गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वोट बैंक में सेंध लगाई है. यह ज़रूरी नहीं कि पूरे समुदाय ने ही पाला बदल लिया हो, बल्कि अहम जातियों के समूहों में होने वाले छोटे-मोटे बदलाव भी बूथ स्तर पर नतीजों को पूरी तरह बदल सकते हैं। 

    माना जाता है कि कई इलाकों में कुर्मी, कुशवाहा और दूसरे ओबीसी वोटरों का एक हिस्सा सपा में शिफ्ट हो गया. साथ ही बसपा के कमज़ोर होने से विपक्ष के वोट का गणित भी बदला है. 2022 में बसपा का वोट शेयर लगभग 13 फीसदी था, जो 2024 में घटकर 9 फीसदी हो गया. ऐसे में उसके ग्रामीण वोट बैंक का एक हिस्सा अलग-अलग पार्टियों में बंटने के बजाय 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन की तरफ़ जाता दिखा। 

    2022 का गेम कैसे 2024 में बदल गया
    2024 का चौंकाने वाला नतीजा आज भी परेशान कर रहा है. ये आंकड़े बताते हैं कि भाजपा क्यों 2024 के लोकसभा नतीजों को एक चेतावनी मान रही है, जिस पर बारीकी से ध्यान देने की ज़रूरत है. पार्टी ने 2024 में उत्तर प्रदेश में 33 लोकसभा सीटें जीतीं, जो 2019 में जीती गई 62 सीटों के मुकाबले काफी कम थीं। 

    वहीं, सपा ने 37 सीटें हासिल कीं, जबकि 2019 में उसे सिर्फ़ पांच सीटें मिली थीं, लेकिन संसदीय सीटों के ये आंकड़े भाजपा के लिए नतीजों के विश्लेषण की सिर्फ़ शुरुआत भर हैं. जब 2024 के लोकसभा नतीजों को राज्य की 403 विधानसभा सीटों के हिसाब से देखा जाता है, तो पार्टी की पकड़ कमज़ोर होने का दायरा और भी साफ़ हो जाता है। 

    2022 के विधानसभा चुनावों में भाजपा की 255 सीटों की संख्या असल में घटकर लगभग 161 विधानसभा क्षेत्रों की बढ़त तक सिमट जाती है, जब 2024 के लोकसभा वोटिंग पैटर्न को उन पर लागू करके देखा जाता है. और इस मुख्य आंकड़े के पीछे एक और बारीक आंकड़ा छिपा है: 18,900 बूथ, जहां नतीजे पलट गए।