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  • भोपाल-डबरा फर्जी पासपोर्ट मामले में STF की कार्रवाई तेज, 15 अफसर-पुलिसकर्मियों पर टिकी नजर

    भोपाल-डबरा फर्जी पासपोर्ट मामले में STF की कार्रवाई तेज, 15 अफसर-पुलिसकर्मियों पर टिकी नजर

    ग्वालियर/भोपाल.

    मध्य प्रदेश में जाली दस्तावेज से बांग्लादेशियों के पासपोर्ट बनाने वाले नेटवर्क की कारगुजारियों ने सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े कर दिए हैं। इस मामले की जांच कर रही राज्य एसटीएफ ने अब तक जिन चार लोगों को गिरफ्तार किया है, उनमें से नागपुर से पकड़े गए एक आरोपित का पासपोर्ट गुजरात में कच्छ जिले के मथल गांव के पते पर बना पाया गया। कच्छ के पास पाकिस्तान बार्डर लगता है, इसलिए एसटीएफ ने इस आरोपित जाय चौधरी बरूआ से गहन पूछताछ कर रही है।

    बौद्ध विहार के पते पर बना प्रियान राय का पासपोर्ट
    वहीं महाराष्ट्र के उल्लासनगर से पकड़े गए प्रियान राय का पासपोर्ट ग्वालियर के डबरा स्थित बौद्ध विहार के पते पर बना है। अब एसटीएफ के राडार पर सरकारी विभागों का वह सिस्टम है, जो सत्यापन से लेकर दस्तावेज बनाने वाली प्रक्रिया में शामिल है। यह वही दस्तावेज हैं, जिनके जरिये पासपोर्ट बने हैं। अब तक पुलिस और दूसरे विभागों के कर्मचारियों को मिलाकर 15 लोगों के नाम सूची में हैं। इसमें ग्वालियर के डबरा थाने के तत्कालीन थाना प्रभारी विनायक शुक्ला, एचसीएम भूपेंद्र गुर्जर सहित अन्य पुलिसकर्मी व पासपोर्ट सेवा केंद्र के कर्मचारी भी हैं।

    एसटीएफ ने की डबरा के पते पर बने पासपोर्टों की पड़ताल
    बता दें कि अभी तक मध्य प्रदेश के दतिया के डबरा स्थित बौद्ध मठ के पते पर 17, भोपाल के अन्ना नगर स्थित बौद्ध मठ के पते पर 40, बैतूल से 11, छिंदवाड़ा एवं पांढुर्णा जिले से एक-एक फर्जी पासपोर्ट बनाए जाने का मामला सामने आया है। एसटीएफ ने अभी डबरा के पते पर बने पासपोर्टों की पड़ताल की है। इसमें सामने आया था कि सभी के फर्जी तरीके से आधार कार्ड आरोपित रियाल चौधरी ने बनवाए थे। वह असम के कामरूप जिले का रहने वाला है। अन्य जिलों से बने पासपोर्ट में भी उसकी भूमिका हो सकती है। मामले में अभी तक चार आरोपितों की गिरफ्तारी की गई है। एसटीएफ की जांच के दायरे में प्रदेश के पांच जिले ग्वालियर, भोपाल, पांणूर्ना, छिंदवाड़ा, बैतूल के अलावा दूसरे जिले भी हैं। यहां बौद्ध विहार व आंबेडकर पार्क के पते पर कितने ऐसे लोगों के पासपोर्ट बने जो कुछ समय पहले ही यहां आए थे। इन सभी के दस्तावेज, पासपोर्ट जांच के दायरे में हैं।

    200 तक पहुंच सकती है, पासपोर्ट की संख्या
    जांच अधिकारियों को आशंका है कि जाली दस्तावेजों के आधार पर बने पासपोर्टों की संख्या 200 तक पहुंच सकती है। अभी अन्य पासपोर्ट की जांच जारी है, जो इन्हीं पते पर बने हैं। स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) की जांच में अब तक ऐसे 70 फर्जी पासपोर्ट की पुष्टि हो चुकी है, जबकि अभी 100 से ज्यादा पासपोर्ट और हैं, जिनकी जांच चल रही है। यह भी संदिग्ध हैं।

    सत्यापन कर्मचारियों की सूची तैयार –
    नागपुर से पकड़े गए बांग्लादेशी का पासपोर्ट गुजरात के कच्छ के पते पर बना था। वहां भी एक टीम भेजी जाएगी। सत्यापन प्रक्रिया में शामिल पुलिस अधिकारी, पुलिसकर्मी एवं दूसरे विभागों के सरकारी कर्मचारियों की सूची तैयार की है।
    – राजेश सिंह भदौरिया, एसपी, एसटीएफ।

  • BRICS Summit 2026: मोदी ने दिया ‘सबको साथ’ का मंत्र, बोले- कोई भी संकट अब एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता

    BRICS Summit 2026: मोदी ने दिया ‘सबको साथ’ का मंत्र, बोले- कोई भी संकट अब एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता

    नई दिल्ली
    विविधता और सहयोग को सेलिब्रेट करते हुए ब्रिक्स समिट पूरी हुई। इस बार ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत ने की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि BRICS में ग्लोबल साउथ के देशों का विश्वास बढ़ा है, क्योंकि BRICS में उनकी आवाज सुनी जाती है, उनके अनुभव का सम्मान होता है और समाधान उनके लिए नहीं, उनके साथ मिलकर बनाए जाते हैं।

    टेक्नॉलजी और क्रिटिकल मिनरल्स को लेकर ये बोले पीएम मोदी
    पीएम मोदी ने कहा कि BRICS की शक्ति हमारी विविधता और सहयोग में है। ब्रिक्स के पार्टनर देश और आउटरीच के लिए आमंत्रित विशेष प्रतिनिधियों के साथ एक सत्र को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि टेक्नॉलजी और क्रिटिकल मिनरल्स का वेपनाइजेशन हमारी साझा प्रगति में बाधा बन सकता है।

    'कोई भी संकट एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता'
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि आज की इंटरकनेक्टेड दुनिया में कोई भी संकट एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। चुनौतियों को समय रहते पहचानना, उनके लिए तैयार रहना और तुरंत कार्रवाई करना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने कहा कि आज विश्व में तनावों की संख्या लगातार बढ़ रही है और लोगों के जीवन पर इसका बहुत नकारात्मक असर प्रभाव भी हो रहा है और व्यापक प्रभाव भी हो रहा है।

    पीएम मोदी का सबको साथ लेकर चलने पर जोर
    पीएम ने कहा कि महामारियों, क्लाइमेट डिजास्टर और सप्लाई चेन में गतिरोध ने दिखाया है कि आज की इंटरकनेक्टेड दुनिया में कोई भी संकट एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। इसलिए हमने ब्रिक्स समूह में कई कदम उठाए हैं। मोदी ने कहा कि टेक्नॉलजी और क्रिटिकल मिनरल्स का वेपनाइजेशन हमारी साझा प्रगति में बाधा बन सकता है। इसलिए हमने टेक्नॉलजी को अपनाने में सबको साथ लेकर चलने पर जोर दिया है।

    मित्रता, सहभागिता और सहयोग… ब्रिक्स समिट का ऐसे हुआ समापन
    उन्होंने कहा कि भारत ने ब्रिक्स के मंच से मित्रता, सहभागिता और सहयोग को आगे बढ़ाया है। हमारी कोशिश है कि ब्रिक्स सहयोग सिर्फ सरकारों तक सीमित ना रहे। हमारे उद्यमी, किसान, रिसर्चर, महिलाएं, युवा इसके सक्रिय भागीदार बनें। पीएम मोदी ने कहा कि हमारा मानना है कि BRICS में विकसित सल्यूशन का लाभ सिर्फ ब्रिक्स तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इन्हें ग्लोबल साउथ की जरूरतों के अनुरूप अपनाने की जरूरत है।

  • ‘बिना नियमों की दुनिया अराजकता जैसी’, BRICS में शी जिनपिंग ने ग्लोबल साउथ की बराबरी की पैरवी की

    ‘बिना नियमों की दुनिया अराजकता जैसी’, BRICS में शी जिनपिंग ने ग्लोबल साउथ की बराबरी की पैरवी की

    नई दिल्ली
    चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 18वें ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान दुनिया में बराबरी की जोरदार वकालत की। उन्होंने कहा कि बिना नियमों वाली दुनिया उस चौराहे जैसी है, जहां यातायात संकेत नहीं हों। ऐसी जगह अराजकता होना तय है। जिनपिंग ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय नियम सभी देशों को मिलकर बनाने चाहिए। ताकतवर देश जो चाहे, वही सही है, यह सोच अब नहीं चल सकती। ग्लोबल साउथ के देशों को मिलकर अंतरराष्ट्रीय कानून का बचाव करना चाहिए। सभी देशों की बराबरी, दूसरे देशों के अंदरूनी मामलों में दखल न देना और विवादों को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने जैसे नियमों का पालन जरूरी है। साथ ही कानून और अंतरराष्ट्रीय नियम सभी पर एक जैसे लागू होने चाहिए। इसमें दोहरे मापदंड की कोई जगह नहीं होनी चाहिए।

    शी जिनपिंग ने कहा कि बड़े काम करने के लिए लोगों को सबसे पहले रखना जरूरी है। ग्लोबल साउथ के देशों को आम लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकास करना चाहिए और साल 2030 तक तय विकास लक्ष्यों को पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। उन्होंने बताया कि चीन ने 5 साल पहले ग्लोबल डेवलपमेंट इनिशिएटिव शुरू किया था। इसके तहत दूसरे देशों के साथ मिलकर 2 हजार से ज्यादा परियोजनाएं पूरी की गई हैं। 2 लाख से अधिक लोगों को ट्रेनिंग भी दी गई है। इसका फायदा 120 से ज्यादा देशों के लोगों को मिला है। चीन दुनिया के लिए अपने दरवाजे और ज्यादा खोल रहा है। राजनयिक संबंध रखने वाले अफ्रीका के सभी 53 देशों को चीन ने बिना टैरिफ वाली सुविधा दी है।

    ब्रिक्स के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाने पर जोर देते हुए चीनी राष्ट्रपति ने कहा कि उभरते बाजारों और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ रिश्ते मजबूत करने होंगे। उन्होंने उद्योग और सामान पहुंचाने की चेन को मजबूत रखने और आपसी फायदे वाले खुले सहयोग की बात कही। शी जिनपिंग ने कहा कि नई तकनीक, पारंपरिक उद्योगों के सुधार और नए क्षेत्रों में मिलकर काम करने की जरूरत है।

    चीन ने 5 नई पहल का रखा प्रस्ताव
    चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 5 नई पहल का प्रस्ताव रखा। पहली पहल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के खुले और सभी के लिए उपलब्ध ढांचे की है। चीन ब्रिक्स देशों के लिए एक साझा समूह बनाने, बड़े भाषा मॉडल पर सहयोग बढ़ाने, ट्रेनिंग और एक्सपर्ट बैठकों का आयोजन करने को तैयार है।

    व्यापार को आसान बनाना
    दूसरी पहल व्यापार और निवेश को आसान बनाने की है। चीन ने ब्रिक्स विशेष आर्थिक क्षेत्र साझेदारी बनाने का प्रस्ताव दिया है। इसके तहत देश आपस में नीतियों का तालमेल बढ़ा सकेंगे। चीन अगले साल सेवाओं के व्यापार पर ब्रिक्स मंच भी आयोजित करेगा। तीसरी पहल डिजिटल उद्योगों में सहयोग की है, जिसके लिए एक साझा क्लाउड मंच बनाने का प्रस्ताव है।

    आधुनिक कारखाने बनाना
    चौथी पहल समझदार मशीनों और कारखानों से जुड़ी है। चीन ब्रिक्स देशों को आधुनिक कारखाने बनाने और साझा मानक तैयार करने में मदद देगा। पांचवीं पहल विज्ञान और तकनीक से जुड़े हुनरमंद लोगों को तैयार करने की है। इसके लिए ब्रिक्स इंजीनियरों का साझा समूह बनाने और युवाओं के लिए विज्ञान-तकनीक नवाचार कार्यक्रम शुरू करने का प्रस्ताव रखा गया है।

  • मास्टर प्लान से बदलेगी 62 गांवों की तस्वीर? कृषि, ग्रीन बेल्ट और आवासीय जमीन पर टिकी निगाहें

    मास्टर प्लान से बदलेगी 62 गांवों की तस्वीर? कृषि, ग्रीन बेल्ट और आवासीय जमीन पर टिकी निगाहें

    जबलपुर.

    जबलपुर के प्रस्तावित मास्टर प्लान 2041 को लेकर एक बार फिर जमीन के उपयोग को लेकर हलचल तेज हो गई है। वर्ष 2022 में नियोजन क्षेत्र का दायरा बढ़ाकर 62 गांवों को शामिल किए जाने के बाद अब इन क्षेत्रों के संभावित लैंड यूज को लेकर चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं।

    पाटन, जबलपुर और पनागर तहसील के कुछ गांवों में बड़े हिस्से को अंतिम योजना में कृषि या ग्रीन बेल्ट के रूप में रखे जाने की संभावना चर्चा में है। इससे जमीन मालिकों और रियल एस्टेट कारोबार से जुड़े लोगों की निगाहें अंतिम लैंड यूज मैप पर टिक गई हैं। हालांकि, अभी इसे अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता। संबंधित गांवों का वास्तविक भू-उपयोग मास्टर प्लान की प्रक्रिया पूरी होने और सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति के बाद जारी होने वाली अंतिम अधिसूचना से ही स्पष्ट होगा।

    इन गांवों की जमीन पर सबसे ज्यादा नजर
    पाटन तहसील के नुहारी, बिनेकी और टिमरी, जबलपुर तहसील के खमरिया, पिपरिया कला, नौमखेड़ा और कोसमघाट तथा पनागर तहसील के पिपरिया, मगेला, पटना और बरौदा सहित कुछ गांवों को लेकर भू-उपयोग की चर्चाएं अधिक हैं। यदि इन क्षेत्रों का बड़ा हिस्सा कृषि या ग्रीन बेल्ट में निर्धारित होता है तो वहां आवासीय कॉलोनी, टाउनशिप अथवा अन्य गैर-कृषि विकास भू-उपयोग नियमों और सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के अधीन होगा। इसके विपरीत आवासीय या मिश्रित उपयोग वाले क्षेत्रों में नियोजित विकास की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

    2022 में बढ़ा था नियोजन क्षेत्र
    शहर के अनियोजित विस्तार को नियंत्रित करने और भविष्य के विकास को व्यवस्थित करने के उद्देश्य से वर्ष 2022 में जबलपुर के नियोजन क्षेत्र का विस्तार किया गया था। इसमें 62 गांवों को शामिल किया गया। इसके साथ इन क्षेत्रों में आवासीय, वाणिज्यिक, औद्योगिक, परिवहन और हरित क्षेत्र के नियोजन की प्रक्रिया नगर तथा ग्राम निवेश व्यवस्था के दायरे में आ गई। अब जमीन मालिकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि अंतिम योजना में उनकी भूमि किस श्रेणी में आती है। यही स्थिति भविष्य में जमीन के विकास और उपयोग की दिशा तय करेगी।

    धारा 16 के तहत विकास योजना अहम
    मध्यप्रदेश नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम, 1973 के तहत विकास योजना के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों के नियोजित भू-उपयोग का निर्धारण किया जाता है। ऐसे में 62 गांवों के लिए तैयार किए जा रहे अंतिम लैंड यूज मैप को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जमीन मालिकों और डेवलपर्स की चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि प्रस्तावित उपयोग के आधार पर भूमि पर भविष्य की विकास गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं। खासकर जिन क्षेत्रों को शहरी विस्तार की संभावनाओं के आधार पर निवेश योग्य माना जा रहा है, वहां अंतिम भू-उपयोग का निर्धारण महत्वपूर्ण होगा।

    डेवलपर्स को भी अंतिम नक्शे का इंतजार
    62 गांवों के नियोजन क्षेत्र में आने के बाद रियल एस्टेट क्षेत्र की गतिविधियां भी इस बात पर निर्भर करेंगी कि किन इलाकों को आवासीय, मिश्रित, कृषि या हरित क्षेत्र में रखा जाता है। क्रेडाई सहित रियल উভয় एस्टेट क्षेत्र से जुड़े संगठन भी मास्टर प्लान को स्पष्ट रूप से लागू करने और भू-उपयोग की स्थिति जल्द सामने लाने की मांग करते रहे हैं।

    देरी ने बढ़ाया असमंजस
    मास्टर प्लान 2041 की प्रक्रिया लंबे समय से चर्चा में है। सितंबर 2025 में प्रकाशित रिपोर्ट में भी 62 गांवों को नियोजन क्षेत्र में शामिल किए जाने, योजना के मसौदा स्तर पर होने तथा आपत्तियों और सुझावों की प्रक्रिया का उल्लेख किया गया था। अंतिम स्वरूप सामने नहीं आने से जमीन मालिकों के लिए यह तय करना मुश्किल बना हुआ है कि भविष्य में उनकी भूमि का नियोजित उपयोग क्या होगा।जबलपुर के विस्तार की दृष्टि से 62 गांवों का नियोजन क्षेत्र में शामिल होना महत्वपूर्ण है।

  • ग्वालियर-झांसी बायपास पर दूर होंगे ब्लैक स्पॉट, 109 करोड़ से 3 अंडरपास-फ्लाईओवर का निर्माण

    ग्वालियर-झांसी बायपास पर दूर होंगे ब्लैक स्पॉट, 109 करोड़ से 3 अंडरपास-फ्लाईओवर का निर्माण

    ग्वालियर.

    एनएच-44 के ग्वालियर-झांसी बायपास रूट पर सिकरौदा के बाद अब तीन पॉइंट पर और फ्लाई ओवर एवं अंडरपास बनेंगे। नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) के इस प्लान को स्वीकृति मिल गई है और अब कंस्ट्रक्शन कंपनियों के साथ फाइनल एग्रीमेंट हो गए हैं।

    बताया जा रहा है कि बारिश के बाद बिलौआ, कल्याणी और अर्रू तिराहे पर फ्लाई ओवर व अंडरपास का निर्माण कार्य शुरू हो जाएगा। इन तीनों स्थानों पर होने वाले कामों पर करीब 109 करोड़ 43 लाख रुपये खर्च होंगे। सिकरौदा, बिलौआ, कल्याणी व अर्रू तिराहे पर लगातार होने वाले एक्सीडेंट को देखते हुए यह निर्णय जिला सड़क सुरक्षा समिति की बैठक में लिया गया था। जिसमें समिति अध्यक्ष व सांसद भारत सिंह कुशवाह ने एनएचएआई से डीपीआर तैयार कराई थी और फिर केंद्र सरकार से राशि स्वीकृत कराई। अधिकारियों का कहना है कि निर्माण कार्य पूरा होने के बाद तिराहे पर होने वाले हादसों में कमी आएगी। यह निर्माण कार्य अगले महीने अक्तूबर में शुरू हो जाएगा। इसके तहत अलग-अलग पॉइंट्स की समस्या का समाधान हो सकेगा।

    हादसे के बड़े कारण…
    सिकरौदा और अर्रू तिराहा
    ग्रामीणों और स्थानीय वाहनों के आवागमन के लिए अवैध कट बने हुए हैं, जहां से अचानक वाहन मुख्य हाइवे पर आ जाते हैं।
    क्रेशर व हैवी माइनिंग ट्रैफिक
    बिलौआ क्रेशर मंडी क्षेत्र से यहां मिट्टी व पत्थरों से लदे डंपर, ट्रक व ओवरलोडेड वाहन अनियंत्रित गति में हाइवे पर आते हैं।
    ओवरटेकिंग
    एनएच-44 पर वाहन 100-120 किमी घंटा से अधिक की रफ्तार में चलते हैं। तिराहे या मोड़ पर अचानक ब्रेक लगाने का समय नहीं मिलता।
    स्ट्रीट लाइट और संकेतक
    कल्याणी व अर्रू तिराहे के पास रात में पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था और सर्विस रोड/साइन बोर्ड न होने से दूर से आ रहे वाहनों को मोड़ का अंदाजा नहीं लगता।
    रॉन्ग-साइड ड्राइविंग
    स्थानीय ग्रामीण और क्रेशर क्षेत्र के वाहन चालक समय और दूरी बचाने के चक्कर में हाइवे की गलत दिशा में वाहन चलाते हैं, जो कई बार आमने-सामने की भिड़ंत का कारण बनता है।

    लोगों को मिलेगी राहत
    इस बायपास पर सबसे बड़ा ब्लैक स्पॉट सिकरौदा तिराहे पर है। जहां आए दिन बड़े हादसे होते हैं और अब तक सैकड़ों लोगों की मौत इन हादसों में हो चुकी है। अब यहां एक फ्लाई ओवर बनने से सड़क हादसों में कमी आएगी।

  • हाफिज सईद पर NIA की बड़ी कार्रवाई, स्पेशल कोर्ट ने जारी किया दूसरा वारंट

    हाफिज सईद पर NIA की बड़ी कार्रवाई, स्पेशल कोर्ट ने जारी किया दूसरा वारंट

    नईदिल्ली 

    राष्ट्रीय जांच एजेंसी (ANI) ने लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादी हाफिज सईद के खिलाफ एक और कामयाबी मिली है। स्पेशल कोर्ट ने हाफिज के खिलाफ एक गैर जमानती वारंट जारी किया है। जांच एजेंसी ने कोर्ट को बताया कि भारत का सबसे वॉन्टेड आतंकी और लश्कर का संस्थापक पाकिस्तान में है। आपको बता दें कि जम्मू-कश्मीर में सक्रिय आतंकवादी समूहों को हथियार, फंडिंग और निर्देश देने से जुड़े एक मामले में लश्कर चीफ के खिलाफ दो महीने में दूसरा गैर जमानती वारंट हासिल किया गया है।

    स्पेशल कोर्ट एनआईए की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 75 के तहत लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक और घोषित आतंकवादी के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी करने की मांग की गई थी। याचिका में पाकिस्तान के पंजाब के सरगोधा के रहने वाले हाफिज सईद को फरार आरोपी बताया गया।

    नकीब भट की गिरफ्तारी से हुआ था खुलासा
    आपको बता दें कि श्रीनगर में चेकिंग के दौरान मोहम्मद नकीब भट की गिरफ्तारी हुई थी। उसके पास से चीन में बना ग्रेनेड और 15 जिंदा कारतूस बरामद किए गए थे। जकूरा पुलिस स्टेशन में UAPA, आर्म्स एक्ट और एक्सप्लोसिव सब्सटेंस एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था। इसके बाद हुई जांच में एक आतंकी नेटवर्क का खुलासा हुआ। इसके बाद सुरक्षा एजेंसियों की छापेमारी में लश्कर और उसके सहयोगी संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) से जुड़े कई और आतंकवादियों और दो पाकिस्तानी नागरिकों की गिरफ्तारी हुई।

    NIA ने कहा कि जांच के दौरान हाफिज सईद की भूमिका सामने आई। गिरफ्तार किए गए पाकिस्तानी आतंकवादी उससे जुड़े पाए गए। NIA ने कोर्ट को बताया, "सईद पाकिस्तान से काम कर रहा है और कश्मीर घाटी में सक्रिय आतंकवादियों को हथियार, पैसे और निर्देश दे रहा है। जानकारी मिली है कि आतंकवादी अभी पाकिस्तान में है और कानून की पकड़ से बचने के लिए जान-बूझकर अपनी गिरफ्तारी से बच रहा है।"

    जज ने सुनाया फैसला
    एनआईए की दलील सुनने के बाद NIA एक्ट के तहत स्पेशल जज प्रेम सागर ने 8 सितंबर को कहा कि जांच के दौरान हाफिज सईद की भूमिका सामने आई है और वह आतंकवादी गतिविधियों में शामिल है। वह फरार है और जांच एजेंसी उसे सामान्य तरीके से पेश करने में कामयाब नहीं हो पाई है, इसलिए हाफिज सईद के खिलाफ एक सामान्य गैर जमानती वारंट जारी किया गया।

  • फिर मचेगा दुनिया में कोहराम? Bab-el-Mandeb पर हूतियों का दबदबा बढ़ा तो भारत समेत वैश्विक तेल कारोबार पर संकट

    फिर मचेगा दुनिया में कोहराम? Bab-el-Mandeb पर हूतियों का दबदबा बढ़ा तो भारत समेत वैश्विक तेल कारोबार पर संकट

     नई दिल्‍ली

    दुनिया भर में एनर्जी का संकट बढ़ता ही जा रहा है, क्‍योंकि होर्मुज पहले से ही प्रभावित है और अब सऊदी अरब ने इराकी क्षेत्र से किए गए कई ड्रोन हमलों के बाद अपनी कच्चे तेल की पाइपलाइन को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है. इसके साथ यमन के लाल सागर तट पर 18 घंटे तक चले भीषण हमले में हूती विद्रोही बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य पर कंट्रोल करने के कगार पर पहुंच चुके हैं। 

    ये तीनों रास्‍ते दुनिया की तेल सप्‍लाई के लिए काफी महत्‍वपूर्ण माने जाते हैं. स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया का 20 फीसदी तेल आयात करता था, जबकि सऊदी अरब के पाइपलाइन से हर दिन 40 से 50 लाख बैरल तेल सप्‍लाई होती थी. वहीं बाब अल-मंडेब से भी दुनिया के कुल समुद्री तेल और गैस व्यापार का लगभग 5% से 12% हिस्सा यानी 4 से 5 मिलियन बैरल हर दिन तेल सप्‍लाई होता है। 

    इसका मतलब है कि इन तीनों रास्‍ते से करीब 30 फीसदी सप्‍लाई प्रभावित होगी, क्‍योंकि होर्मुज और बाब अल मंडेब के बाद ईरान तेल सप्‍लाई को अपने तरीके से चला सकता है और वह मिडिल ईस्‍ट से आने वाले तेल-गैस को रोक सकता है। 

    भारत के ऑयल ट्रेड पर बढ़ेगा खतरा

    भारत से  3,000 किलोमीटर दूर मौजूद बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट पर अगर हूतियों का पूरी तरह कंट्रोल हो जाता है, तो इसका सीधा असर भारत के तेल आयात, यूरोप को होने वाले एक्सपोर्ट और सामान की ढुलाई पर पड़ सकता है। 

    बाब-अल-मंदेब लाल सागर और गल्फ ऑफ एडन को जोड़ने वाला करीब 29 किलोमीटर चौड़ा समुद्री रास्ता है. यह रास्ता सुएज नहर के जरिए यूरोप को हिंद महासागर और एशिया से जोड़ता है. भारत के लिए यह रास्ता इसलिए अहम है क्योंकि कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के साथ-साथ दवाइयां, मशीनरी, टेक्सटाइल और दूसरे सामान भी इसी रूट से यूरोप पहुंचते हैं। 

    कैसे बढ़ा हूतियों का कंट्रोल?
    हूती संगठन अंसार अल्लाह ने 2014 में यमन की राजधानी सना पर कब्जा करने के बाद देश के उत्तरी और पश्चिमी हिस्सों में अपना कंट्रोल मजबूत किया. लाल सागर का बड़ा हिस्सा भी उनके प्रभाव में आया. 2015 में सऊदी अरब की अगुवाई में हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई हुई, लेकिन उन्हें पूरी तरह पीछे नहीं हटाया जा सका। 

    अब हूतियों के पास बैलिस्टिक मिसाइल, ड्रोन और दूसरे आधुनिक हथियार हैं. ताजा घटनाक्रम में स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने करीब 18 घंटे में यमन के लाल सागर तट पर तेजी से बढ़त बनाई। 

    रॉयटर्स के मुताबिक हूतियों ने रणनीतिक बंदरगाह शहर मोचा पर कब्जा किया और हनिश द्वीपों की ओर बढ़े. एपी ने मायून यानी पेरिम द्वीप पर हूतियों के कब्जे की खबर दी. फाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक हूती जूकर और हनिश द्वीपों तक भी पहुंचे हैं. हूती नेता मोहम्मद अल-बुखैती ने कहा कि उन्होंने बाब-अल-मंदेब पर कंट्रोल कर लिया है. हालांकि ईरान ने हूतियों को ताजा मदद देने और ईरानी अधिकारियों को यमन भेजने की खबरों का खंडन किया है। 

    रास्ता बंद हुआ तो भारत पर क्या असर?
    अगर बाब-अल-मंदेब से जहाजों का आना-जाना मुश्किल होता है तो शिपिंग और इंश्योरेंस का खर्च तेजी से बढ़ सकता है. 2023 के आखिर में हूती हमलों के बाद करीब 2,000 जहाजों ने सुएज नहर से बचते हुए अफ्रीका के दक्षिणी छोर यानी केप ऑफ गुड होप का रास्ता अपनाया था. इससे भारत आने वाले सामान की सप्लाई में देरी हुई। 

    भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता तेल की कीमतों को लेकर है. बाब-अल-मंदेब से गुजरने वाले कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की मात्रा 2023 में करीब 9.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन थी, जो 2025 की पहली छमाही में घटकर करीब 4.2 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गई. हूतियों की ताजा बढ़त की खबर के बाद ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चला गया और बाद में करीब 99 डॉलर के आसपास रहा. भारत रूस जैसे दूसरे स्रोतों से तेल खरीद सकता है, लेकिन वैश्विक बाजार में तेल महंगा होने का असर भारत पर भी पड़ेगा। 

    एक्सपोर्ट पर भी पड़ेगा असर
    भारत के लिए दूसरी बड़ी चिंता यूरोप को होने वाला एक्सपोर्ट है. अगर जहाजों को अफ्रीका के चारों तरफ जाना पड़ा तो मुंबई से रॉटरडैम की दूरी करीब 15,700 किलोमीटर से बढ़कर लगभग 23,000 किलोमीटर हो सकती है. इससे ईंधन, बीमा और माल ढुलाई का खर्च बढ़ेगा और भारतीय सामान यूरोप में महंगा हो सकता है। 

    ऐसे में 3,000 किलोमीटर दूर यमन में बाब-अल-मंदेब पर बढ़ता हूती कंट्रोल भारत के लिए सिर्फ पश्चिम एशिया का संकट नहीं है. इसका असर तेल की कीमत, शिपिंग खर्च और यूरोप के साथ भारत के कारोबार पर पड़ सकता है. होर्मुज स्ट्रेट पर पहले से दबाव के बीच बाब-अल-मंदेब का संकट भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और एक्सपोर्ट, दोनों मोर्चों पर बड़ी चुनौती बन सकता है। 

    ये तीनों रास्‍ते पूरी तरह बंद हुए तो कितना बड़ा संकट? 
    अब अगर इन तीनों रास्‍तों को पूरी तरह बंद कर दिया जाता है तो दुनिया की लगभग 30 फीसदी सप्‍लाई पूरी तरह ठप हो जाएगी. इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि यूरोप, भारत और चीन जैसे देशों को जाने वाली एनर्जी सप्‍लाई ज्‍यादा प्रभावित हो जाएंगी और अगर ये लंबे समय तक बंद रहता है तो दुनिया भर को एक भारी संकट का सामना करना पड़ सकता है। 

    जैसे पेट्रोल-डीजल और एलपीजी के दाम तेजी से बढ़ेंगे. सप्‍लाई चेन प्रभावित होने से अंतरराष्‍ट्रीय बाजारों से आने वाली चीजें काफी महंगी हो जाएंगी, भारत से इन देशों को निर्यात भी प्रभावित होगा. कच्‍चा माल महंगा होने से प्रोडक्‍ट्स की कीमतें बढ़ जाएंगी, जिससे बाजार में खरीदारी कम होगी और महंगाई के कारण इकोनॉमी प्रभावित होगी। 

    शेयर बाजार भी इससे अछूता नहीं रहेगा. जियो-पॉलिटिकल तनाव बढ़ने से महंगाई बढ़ेगी. कंपनियों की कमाई भी तेजी से घट सकती है, जिससे इनके शेयरों पर असर होगा. ऐसे में भारत से लेकर ग्‍लोबल लेवल पर बाजारों में मंदी की स्थिति आ सकती है. आइए समझते हैं कौन सा रास्‍ता कितना अहमियत रखता है… 

    सऊदी पाइपलाइन का रास्‍ता
    सबसे पहले सऊदी अरब का तेल, उसके पूर्वी क्षेत्र से होते हुए Arabian Peninsula के अंदर से पश्चिम की ओर Yanbu Port की ओर जाता है, फिर यहां से लाल सागर में जाकर मिलता है और वहां से टैंकरों के जरिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सप्‍लाई होता है. यह रास्‍ता दुनिया के कुल तेल का 4 से 5 फीसदी ही सप्‍लाई करता है, लेकिन इसकी खास बात ये है कि इससे कई देशों की आपूर्ति पूरी होती है. अब इस रास्‍ते के बंद होने से यूरोप के कई देश प्रभावित हो सकते हैं। 

    भारत के लिए कितना महत्‍वपूर्ण है ये रास्‍ता? 
    भारत पर इसका असर उतना गंभीर नहीं होगा, क्‍योंकि भारत पहले ही अपने तेल जरूरतों का ज्‍यादातर हिस्‍सा दूसरे देशों या रास्‍तों से आयात कर रहा है. हालांकि, एक असर ये होगा कि गल्‍फ से आने वाले तेल की सप्‍लाई कम हो जाएगी, क्‍योंकि पहले से ही होर्मुज का रास्‍ता प्रभावित है और अब होर्मुज को सरपास करने वाला ये रूट भी बंद कर दिया गया है। 

    बाब अल-मंडेब का रास्‍ता भी प्रभावित 
    ईरान सर्पोटिव यमन, अब लाल सागर तट (बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य) पर 18 घंटे तक चले भीषण हमले के बाद कंट्रोल होने के करीब है. यह जलडमरूमध्य लाल सागर को अदन की खाड़ी और उससे आगे अरब सागर से जोड़ता है। 

    हूतियों के नियंत्रण से 29 किलोमीटर चौड़े इस जलमार्ग को तेहरान अपने नियंत्रण में ले सकता है और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसी रणनीति अपनाकर हिंद महासागर में खाड़ी देशों से होने वाले ऊर्जा निर्यात को प्रभावी ढंग से रोक सकता है.  भारत के लिए यह मामला विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. भारत कच्चे तेल और अन्य पेट्रोकेमिकल्स के आयात के साथ-साथ यूरोप तक पहुंचने के लिए भी बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य पर निर्भर है. ईंधन, दवाइयां, मशीनरी और अन्य वस्तुओं का परिवहन करने वाले जहाज नियमित रूप से नीदरलैंड के रॉटरडैम और फ्रांस के मार्सिले जैसे बड़े यूरोपीय बंदरगाहों तक पहुंचने के लिए इस जलडमरूमध्य का उपयोग करते हैं। 

    ऐसे में, बाब अल-मंडेब पर कब्जा भारत को तेल की महत्वपूर्ण आपूर्ति को बाधित कर सकता है, जिसे अमेरिका- ईरान युद्ध की शुरुआत के बाद से खाड़ी देशों से पेट्रोलियम शिपमेंट में पहले ही काफी व्यवधान का सामना करना पड़ा है। 

    कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की जो आपूर्ति भारत से होकर गुजरती है, वह 2023 में प्रतिदिन 93 लाख बैरल से घटकर 2025 की पहली छमाही में लगभग 42 लाख बैरल प्रतिदिन रह जाएगी. अभी तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल है, लेकिन अगर ये आगे भी बंद रहता है तो ये अंदाजा लगाना मुश्किल है कि ये कितनी महंगी हो सकती हैं। 

  • 8वें वेतन आयोग में पुरानी पेंशन की वापसी मुश्किल! एक्सपर्ट्स ने बताया कहां फंस रहा सबसे बड़ा पेंच

    8वें वेतन आयोग में पुरानी पेंशन की वापसी मुश्किल! एक्सपर्ट्स ने बताया कहां फंस रहा सबसे बड़ा पेंच

    नईदिल्ली 
      
    8वें वेतन आयोग (8th Pay Commission) में सैलरी-पेंशन को लेकर केंद्रीय कर्मचारियों की उम्मीदें लगातार बढ़ती जा रही हैं. हालांकि, इसके साथ ही पुरानी पेंशन योजना (OPS) को बहाल करने की मांग भी तेजी से जोर पकड़ रही है. 8वें वेतन आयोग के गठन के बाद से ही केंद्रीय कर्मचारियों और यूनियनों ने पुरानी पेंशन योजना को बहाल करने पर बड़ा जोर दिया है. कर्मचारी संगठन नई पेंशन योजना (NPS) और यूनिफाइड पेंशन स्कीम (UPS) को खारिज करते हुए सिर्फ OPS की वापसी चाहते हैं। 

    ओल्ड पेंशन स्कीम की वापसी की मांग
    कर्मचारी संगठन और रेलवे यूनियनों का कहना है कि न्यू पेंशन स्कीम(NPS) और यूनिफाइड पेंशन स्कीम  (UPS) कर्मचारियों की सोशल सोक्योरिटी की गारंटी पूरी तरह नहीं देती हैं. इसलिए यूनियनों की ये बड़ी मांग है कि 8वें वेतन आयोग के तहत सभी कर्मचारियों के लिए ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) को फिर से लागू किया जाए। 

    एक तरह कर्मचारी संगठन 8वें वेतन आयोग के तहत ओपीएस लागू करने पर अड़े हुए हैं, जबकि दूसरी तरफ इकनॉमिक एक्सपर्ट और कानूनी जानकार इस मांग पर पूरी तरह सहमत नजर नहीं आ रहे हैं .यूनियनों की इस मांग पर उन्होंने अपनी चिंताएं जताई हैं. उनका मानना है कि पुरानी पेंशन योजना को दोबारा लागू करना व्यावहारिक नहीं है। 

    कर्मचारियों को NPS और UPS से क्यों है ऐतराज?
    कर्मचारी यूनियनों की सबसे बड़ी चिंता आर्थिक सुरक्षा को लेकर है. उनका तर्क है कि ओपीएस में निश्चित पेंशन मिलती थी,  जबकि  NPS का रिटर्न पूरी तरह बाजार के उतार-चढ़ाव पर निर्भर करता है, जिससे रिटायरमेंट के बाद पेंशन पर असर पड़ता है। 

    लीगल और इकोनॉमिक एक्सपर्ट्स ने क्यों जताई चिंता?
    एक्सपर्ट के अनुसार, ओपीएस लागू करने से सरकारी खजाने पर बेहद भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा, जिससे देश के विकास कार्यों का बजट प्रभावित हो सकता है.कानूनी रूप से भी सरकार पहले ही NPS को बेहतर करने के लिए यूनिफाइड पेंशन स्कीम (UPS) का ऑप्शन ला चुकी है. ऐसे में  पुरानी व्यवस्था पर पूरी तरह लौटना नीतिगत और कानूनी रूप से  उलझाऊ और बेहद मुश्किल है। 

    ओल्ड पेंशन से लेकर मिनिमम सैलरी तक: कर्मचारियों की 5 बड़ी मांगें

    8वें वेतन आयोग (8th Pay Commission) की बैठकों का दौर जारी है. हाल ही में चेन्नई में हुई बड़ी बैठक में केंद्रीय कर्मचारियों- पेंशनभोगियों  के लिए पेंशनर्स फोरम ने 5 बड़ी मांगें आयोग के सामने रखा है। 

        सबसे पहली और बड़ी मांग यह है कि नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) को हटाकर पुरानी पेंशन योजना (OPS) को तुरंत बहाल किया जाए. सालों से जारी इस मांग को चेन्नई बैठक में  सबसे ज्यादा जोर दिया गया। 

        इसके अलावा, रिटायर हो चुके कर्मचारियों और उनके आश्रितों को आर्थिक सुरक्षा देने के लिए बेसिक पेंशन और फैमिली पेंशन दोनों में सम्मानजनक बढ़ोतरी की अपील की गई है. उनकी मांग है कि न्यूनतम बेसिक सैलरी बढ़ाकर ₹68,000 किया जाए और 10 साल के लंबे इंतजार के बजाय स्थाई 'वेज-रिविजन' सिस्टम बने। 

        पेंशन कम्यूटेशन या कम्यूटेड पेंशन की रिकवरी के नियमों को लेकर लंबे समय से अस्पष्टता बनी हुई है, जिस पर राहत और आसान नियम बनाने की मांग की है। 

        वहीं, प्रमोशन और सैलरी इंक्रीमेंट से जुड़े मॉडिफाइड एश्योर्ड करियर प्रोग्रेशन (MACP) के तहत मिलने वाले फायदों को रिवाइज करने की मांग उठाई गई है, ताकि डाक कर्मचारियों के करियर ग्रोथ और पे-स्केल में सुधार हो सके। 
        इसके साथ ही, कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए बेहतर भत्ते, लीव रूल्स और एक मजबूत सोशल सिक्योरिटी कवर देने की बात भी आयोग के समक्ष रखी गई है। 

    OROP पर क्या कहती हैं लीगल एक्सपर्ट?
    सशस्त्र बलों की तर्ज पर सिविलियन कर्मचारियों के लिए 'वन रैंक, वन पेंशन' (OROP) लागू करने की मांग पर लीगल फर्म CMS INDUSLAW की पार्टनर अमृता टोंक का कहना है कि सिविल सेवाओं का ढांचा सेना से अलग होता है. हर विभाग, काडर और भर्ती के साल का हिसाब अलग होने के कारण एक समान OROP फॉर्मूला लागू करने से नई असमानताएं पैदा हो सकती हैं। 

    प्री-2026 पेंशनर्स के अधिकारों पर उनका मानना है कि पेंशन और ग्रेच्युटी कर्मचारियों द्वारा अर्जित किए गए अधिकार हैं. आयोग पुराने पेंशनर्स के लाभों को फ्रीज नहीं कर सकता. कानूनी रूप से सही रास्ता यही है कि नए बदलावों को केवल भविष्य में जुड़ने वाले नए कर्मचारियों पर ही लागू किया जाए। 

    आगे  क्या रास्ता निकाल सकती है सरकार?

    जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाला यह आयोग मई-जून 2027 के आसपास अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंप सकता है. 16 से 18 सितंबर को चंडीगढ़ में अगली बैठक होनी है। 

    एक्सपर्ट्स के अनुसार, OPS की पूरी तरह बहाली की गुंजाइश भले ही कम हो, लेकिन सरकार कर्मचारियों के हितों का ध्यान रखते हुए यूपीएस में कुछ और सुधार कर सकती है.हालांकि ओपीएस की पूरी तरह बहाली की संभावना बहुत कम है। 

  • AI Retro Photos का बढ़ा नशा! 80s ट्रेंड के पीछे पर्यावरण और प्राइवेसी से जुड़े कितने खतरे?

    AI Retro Photos का बढ़ा नशा! 80s ट्रेंड के पीछे पर्यावरण और प्राइवेसी से जुड़े कितने खतरे?

    नई दिल्ली

    इंस्टाग्राम, फेसबुक और X (ट्विटर) पर इन दिनों ChatGPT का 80s AI Photo Trend तेजी से वायरल हो रहा है। लोग अपनी सेल्फी को 1980 के दशक की बॉलीवुड या विंटेज स्टाइल फोटो में बदलकर सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे हैं। बड़े हेयरस्टाइल, रेट्रो कपड़े, फिल्म ग्रेन और गर्म रंगों वाली ये तस्वीरें लोगों को खूब पसंद आ रही हैं। भारत में इस ट्रेंड की वजह से ChatGPT से जुड़े सर्च और डाउनलोड में भी बड़ी बढ़ोतरी देखी गई है। लेकिन इस मजेदार ट्रेंड के पीछे एक ऐसा सच भी है जिस पर कम लोग ध्यान दे रहे हैं—हर AI फोटो बनाने में बिजली, डेटा सेंटर और पानी की खपत होती है।

    आखिर क्या है ChatGPT का 80s AI Photo Trend?

    इस ट्रेंड में यूज़र अपनी फोटो ChatGPT या किसी AI इमेज जनरेटर पर अपलोड करते हैं और एक प्रॉम्प्ट देकर उसे 1980 के दशक की तस्वीर जैसा बना देते हैं। AI चेहरे को पहचानकर बैकग्राउंड, कपड़े, हेयरस्टाइल, लाइटिंग और फोटो की पूरी स्टाइल बदल देता है। यह ट्रेंड पहले वायरल हुए Ghibli AI Portraits और Barbie AI Photos की तरह ही तेजी से लोकप्रिय हुआ है। 

    इस ट्रेंड की खास बातें

    • Vintage Bollywood Look

    • Film Camera Grain Effect

    • 80s Fashion और Hairstyles

    • Warm Lighting और Retro Background

    • सोशल मीडिया पर Reels और DP के लिए इस्तेमाल

    AI फोटो बनाने से पर्यावरण पर क्या असर पड़ता है?

    AI फोटो बनाने के लिए बड़े-बड़े डेटा सेंटर लगातार काम करते हैं। इन सर्वरों को चलाने और ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में बिजली और पानी की जरूरत होती है। यही वजह है कि एक साधारण AI फोटो भी पर्यावरणीय संसाधनों का उपयोग करती है।

     एक AI फोटो की अनुमानित खपत

    संसाधन अनुमानित उपयोग
    पानी

    लगभग 5–50 मिलीलीटर प्रति AI फोटो

    बिजली

    लगभग 0.01–0.29 kWh प्रति AI इमेज

    डेटा सेंटर GPU आधारित हाई-परफॉर्मेंस सर्वर लगातार सक्रिय रहते हैं।

    जब करोड़ों लोग AI फोटो बनाते हैं, तब क्या होता है? 

    अगर दुनिया भर में एक दिन में 1 करोड़ AI फोटो बनाई जाएं, तो अनुमान के अनुसार 50,000 से 5 लाख लीटर तक पानी अप्रत्यक्ष रूप से इस्तेमाल हो सकता है। यह पानी मुख्य रूप से डेटा सेंटर की कूलिंग सिस्टम में उपयोग होता है।

    अनुमानित प्रभाव (Illustrative)

    ChatGPT 80s AI Photo Trend का नशा! सोशल मीडिया पर वायरल 80s फोटो, लेकिन क्या इसकी कीमत पर्यावरण चुका रहा है?

    यह चार्ट प्रकाशित शोध और रिपोर्टों में दिए गए अनुमानित दायरे पर आधारित है। वास्तविक खपत AI मॉडल और डेटा सेंटर के अनुसार अलग हो सकती है. 

    सिर्फ बिजली नहीं, कार्बन उत्सर्जन भी बढ़ता है

    AI मॉडल जितनी ज्यादा तस्वीरें बनाते हैं, उतनी ज्यादा कंप्यूटिंग शक्ति की जरूरत होती है। इसका मतलब है:

    • अधिक बिजली की खपत।

    • डेटा सेंटर से अधिक कार्बन उत्सर्जन।

    • सर्वर कूलिंग के लिए अधिक पानी।

    संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के अनुसार AI सिस्टम की रोजमर्रा की गतिविधियां उसकी कुल ऊर्जा मांग का बड़ा हिस्सा होती हैं। 

    क्या आपकी फोटो और डेटा भी सुरक्षित हैं?

    विशेषज्ञों का कहना है कि AI प्लेटफॉर्म पर फोटो अपलोड करते समय यूज़र्स को यह समझना चाहिए कि उनकी तस्वीरें और उनसे जुड़ा डेटा प्लेटफॉर्म की नीतियों के अनुसार प्रोसेस और स्टोर किया जा सकता है। इसलिए किसी भी AI टूल पर निजी या संवेदनशील तस्वीरें साझा करने से पहले उसकी Privacy Policy जरूर पढ़ें। 

    जिम्मेदारी से AI इस्तेमाल करें

    AI तकनीक रचनात्मकता और मनोरंजन के लिए शानदार है, लेकिन इसका जिम्मेदार उपयोग भी जरूरी है।

    क्या करें?

    • केवल जरूरत होने पर AI फोटो बनाएं।

    • एक ही फोटो के कई अनावश्यक वर्ज़न जनरेट करने से बचें।

    • निजी और संवेदनशील तस्वीरें अपलोड करने से पहले सावधानी बरतें।

    • भरोसेमंद AI प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करें।

  • Metro TDR Policy: भोपाल में मेट्रो के 500 मीटर दायरे को बनाया जाएगा रीसिविंग एरिया, जमीन-मकान पर असर की चिंता

    Metro TDR Policy: भोपाल में मेट्रो के 500 मीटर दायरे को बनाया जाएगा रीसिविंग एरिया, जमीन-मकान पर असर की चिंता

    भोपाल 

    भोपाल में मेट्रो रेल परियोजना के आसपास विकास व्यवस्था को लेकर एक अहम बदलाव की तैयारी चल रही है। भोपाल विकास योजना 2005 के तहत मेट्रो कॉरिडोर के दोनों ओर 500-500 मीटर के क्षेत्र को ‘रीसिविंग एरिया’ के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव सामने आया है। इस व्यवस्था का सीधा संबंध हस्तांतरणीय विकास अधिकार यानी TDR से है। प्रस्ताव को लेकर आपत्तियां और चिंताएं सामने आई हैं, क्योंकि इसके लागू होने से मेट्रो कॉरिडोर के आसपास निर्माण क्षमता, व्यावसायिक गतिविधियों और जमीन-मकान के मूल्य पर असर पड़ सकता है।

    मेट्रो के आसपास होगा रीसिविंग एरिया विकसित
    प्रस्ताव के अनुसार मेट्रो लाइन के दोनों तरफ 500 मीटर तक के क्षेत्र को रीसिविंग एरिया के रूप में विकसित किया जा सकता है। इसके तहत संबंधित क्षेत्रों में अतिरिक्त विकास अधिकार का उपयोग करके भवन निर्माण की क्षमता बढ़ाई जा सकेगी। मौजूदा विकास व्यवस्था की तुलना में अतिरिक्त एफएआर उपलब्ध होने से मेट्रो के आसपास अधिक घनत्व वाला आवासीय और व्यावसायिक विकास संभव होगा। भोपाल की विकास योजना में भी मेट्रो के दोनों ओर 500 मीटर क्षेत्र को ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट से जोड़ने की अवधारणा पहले से मौजूद है। इस व्यवस्था का उद्देश्य मेट्रो के आसपास ऐसी शहरी संरचना तैयार करना है, जहां आवास, कारोबार और अन्य सुविधाएं सार्वजनिक परिवहन के करीब विकसित हों। इससे मेट्रो का उपयोग बढ़ाने और निजी वाहनों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है। केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत भोपाल मेट्रो परियोजना में भी TDR और ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट को परियोजना से जुड़े मूल्य संवर्धन और शहरी विकास के साधन के रूप में शामिल किया गया था।

    रहवासियों के लिए चिंता का कारण
    हालांकि, प्रस्तावित बदलाव को लेकर रहवासियों की चिंताएं भी सामने आ रही हैं। मेट्रो कॉरिडोर के आसपास निर्माण की अनुमति और एफएआर बढ़ने से जमीन तथा संपत्तियों की कीमतों में तेजी आ सकती है। इसका असर उन मध्यम और निम्न-मध्यम आय वर्ग के परिवारों पर पड़ने की आशंका है, जो इन क्षेत्रों में पहले से रह रहे हैं। अधिक निर्माण क्षमता के कारण क्षेत्र में आबादी और व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ने पर यातायात, पार्किंग और बुनियादी सुविधाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ने का मुद्दा भी महत्वपूर्ण रहेगा। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत अतिरिक्त विकास अधिकार खरीदने के बाद निर्माण क्षमता में कई गुना वृद्धि संभव होने की बात सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार मौजूदा एफएआर की तुलना में यह क्षमता तीन से पांच गुना तक पहुंच सकती है। ऐसे में मेट्रो स्टेशनों के आसपास ऊंची इमारतों, अधिक आवासीय इकाइयों और व्यावसायिक परियोजनाओं के विकास का रास्ता खुल सकता है।

    TDR व्यवस्था नई नहीं
    भोपाल में TDR की अवधारणा नई नहीं है। मध्यप्रदेश में हस्तांतरणीय विकास अधिकारों के लिए 2018 में नियम बनाए गए थे और भोपाल मेट्रो परियोजना के लिए उत्पादन क्षेत्र तथा TDR व्यवस्था से संबंधित अधिसूचनाएं पहले भी जारी की जा चुकी हैं। राज्य के नगर तथा ग्राम निवेश विभाग के रिकॉर्ड में भोपाल मेट्रो के लिए TDR नियमों के तहत उत्पादन क्षेत्र अधिसूचित किए जाने की प्रक्रिया का उल्लेख मौजूद है। मेट्रो परियोजना से जुड़े भूमि और पुनर्वासन के मामलों पर भी प्रशासन की प्रक्रिया जारी है। जिला भोपाल की आधिकारिक वेबसाइट पर अगस्त 2026 में ऑरेंज लाइन के स्वीकृत मेट्रो मार्ग से जुड़े भूमि अधिग्रहण संबंधी नोटिस प्रकाशित किए गए हैं। इससे स्पष्ट है कि परियोजना के विभिन्न हिस्सों में भूमि और विकास से जुड़ी प्रशासनिक प्रक्रियाएं अभी भी आगे बढ़ रही हैं।

    आपत्तियों और सुझावों पर हो सकती है सुनवाई
    अब प्रस्तावित रीसिविंग एरिया को लेकर नगर तथा ग्राम निवेश विभाग में आपत्तियों और सुझावों पर सुनवाई की प्रक्रिया महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार सुनवाई के बाद प्राप्त आपत्तियों का निराकरण किया जाएगा और उसके आधार पर मास्टर प्लान में संशोधन का अधिसूचना प्रस्ताव आगे बढ़ सकता है। यदि संशोधन लागू होता है तो भोपाल मेट्रो कॉरिडोर के आसपास भविष्य के निर्माण और भूमि उपयोग की तस्वीर में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।