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  • UNGA में भारत-भूटान दोस्ती की गूंज, भूटान PM ने मोदी सरकार का जताया आभार

    UNGA में भारत-भूटान दोस्ती की गूंज, भूटान PM ने मोदी सरकार का जताया आभार

    नई दिल्ली

    भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग टोबगे ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से भारत के साथ अपने रिश्तों को लेकर खुलकर बात की. उन्होंने भारत को भूटान का भरोसेमंद दोस्त और साझेदार बताया. टोबगे ने कहा कि भूटान की महत्वाकांक्षी गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी यानी GMC परियोजना सीधे भारत की सीमा से लगी हुई है और इस विजन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारत सरकार और असम सरकार का समर्थन हासिल है। 

    टोबगे ने कहा कि GMC की लोकेशन इसकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक है. यह शहर भूटान के सबसे करीबी दोस्त और पड़ोसी भारत की सीमा पर स्थित है. उन्होंने कहा कि सीमा के दूसरी तरफ दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश और दुनिया की सबसे बड़ी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक मौजूद है. उनके मुताबिक, भारत के साथ यह कनेक्टिविटी GMC को दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के बाजारों तक पहुंच का एक अहम रास्ता बनाती है। 

    GMC के लिए भारत की दोस्ती को बताया बड़ी ताकत
    भूटान PM ने कहा कि GMC को शुरुआत से ही वह चीज मिल रही है, जिसे कई नए शहर हासिल करने में दशकों लगा देते हैं. इसमें बड़े और तेजी से बढ़ते बाजारों तक पहुंच, कनेक्टिविटी और भारत जैसा भरोसेमंद दोस्त शामिल है। 

    उन्होंने कहा कि GMC की सोच को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ भारत सरकार और सीमा से लगे असम के पड़ोसियों का भी समर्थन मिला है. टोबगे ने इस समर्थन को परियोजना के लिए अहम बताया। 

    बोले- भरोसा खरीदा नहीं जा सकता
    शेरिंग टोबगे ने कहा कि भूटान के पास एक और ऐसी ताकत है जिसे खरीदा नहीं जा सकता और वह है भरोसा. उन्होंने कहा कि यह भरोसा शांति, राजनीतिक स्थिरता, कानून के राज और अपनी प्रतिबद्धताओं को निभाने के रिकॉर्ड से बना है। 

    भूटान PM के मुताबिक, लंबे समय के निवेशकों के लिए भरोसा बेहद अहम है, क्योंकि इससे भविष्य को लेकर एक तरह की स्थिरता और भरोसा पैदा होता है. उन्होंने कहा कि GMC दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के बाजारों के लिए एक गेटवे के तौर पर काम कर सकता है। 

    टोबगे के बयान में भारत और भूटान के रिश्तों के साथ-साथ GMC प्रोजेक्ट के लिए भारत की भूमिका पर भी खास जोर रहा. उन्होंने भारत के साथ सीमा से जुड़ी अपनी भौगोलिक स्थिति, बाजारों तक पहुंच और दोनों देशों के बीच भरोसे को GMC की बड़ी ताकत के तौर पर पेश किया। 

  • चुनाव आयोग में SIR को लेकर घमासान? 14 आपत्तियों की रिपोर्ट पर EC ने बताया सच

    चुनाव आयोग में SIR को लेकर घमासान? 14 आपत्तियों की रिपोर्ट पर EC ने बताया सच

     नई दिल्ली
    मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग के अंदर कथित मतभेद की रिपोर्ट सामने आने के बाद अब आयोग के सूत्रों ने सफाई दी है. ECI सूत्रों के मुताबिक, चुनाव आयुक्त किसी मुद्दे पर विचार के दौरान सवाल उठा सकते हैं, स्पष्टीकरण मांग सकते हैं या अपनी टिप्पणी दे सकते हैं. लेकिन ऐसी टिप्पणी को औपचारिक असहमति यानी डिसेंट नहीं माना जा सकता। 

    सूत्रों ने कहा कि SIR से जुड़े मुद्दों पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने टिप्पणियां की थीं. इन पर फैसले से पहले विचार भी किया गया. लेकिन किसी भी चुनाव आयुक्त ने अंतिम फैसले के खिलाफ औपचारिक डिसेंट दर्ज नहीं कराया. आयोग के मुताबिक, जिन आदेशों को लेकर सवाल उठ रहे हैं, उन पर तीनों सदस्यों के हस्ताक्षर हैं। 

    क्या है ऑब्जर्वेशन और डिसेंट में फर्क?
    चुनाव आयोग के मुताबिक, किसी मामले पर चर्चा के दौरान आयुक्त का सवाल उठाना या अपनी राय रखना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है. तीन सदस्यीय आयोग में सभी चुनाव आयुक्तों की बराबर भूमिका होती है. अगर किसी मुद्दे पर मतभेद हो तो बहुमत की राय के आधार पर फैसला होता है। 

    हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में SIR से जुड़े फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्ति जताई. रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों ने कुछ कदमों को बिना उनकी जानकारी के उठाए जाने पर सवाल भी उठाए थे। 

    पहले भी चुनाव आयोग में दर्ज हो चुका है डिसेंट
    चुनाव आयोग के इतिहास में ऐसा पहली बार नहीं है जब किसी आयुक्त ने बहुमत की राय से अलग रुख अपनाया हो. 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों समेत आचार संहिता से जुड़ी कुछ शिकायतों पर अपने सहयोगियों से अलग राय रखी थी। 

    2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने सोनिया गांधी की कथित अयोग्यता से जुड़े मामले में चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी और नवीन चावला से अलग राय रखी थी. इन मामलों में आयोग के भीतर अलग राय दर्ज करने की व्यवस्था का इस्तेमाल हुआ था। 

    पहले सिर्फ एक ही चुनाव आयुक्त होता था
    आज तीन सदस्यीय चुनाव आयोग है, लेकिन शुरुआत में ऐसा नहीं था. 1950 में चुनाव आयोग के गठन के समय यह सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त वाला एक सदस्यीय निकाय था. 1950 से 1989 तक आयोग इसी व्यवस्था के तहत काम करता रहा। 

    1989 में पहली बार दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्त नियुक्त किए गए, लेकिन उनकी नियुक्ति थोड़े समय के लिए रही. 1990 में आयोग फिर एक सदस्यीय हो गया. इसके बाद 1993 में दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के साथ तीन सदस्यीय व्यवस्था स्थायी हो गई। 

    इसलिए मौजूदा विवाद में अहम सवाल यही है कि चुनाव आयुक्तों की आंतरिक टिप्पणियों को किस तरह समझा जाए. ECI सूत्र इन्हें सामान्य डेलिबरेशन का हिस्सा बता रहे हैं, जबकि प्रकाशित रिपोर्ट में इन्हें रिकॉर्ड पर दर्ज आपत्तियों के रूप में पेश किया गया है। 

    आयोग के सूत्रों ने सिस्टम में किसी तरह के केंद्रीय हस्तक्षेप के आरोपों से इनकार किया है. उनका कहना है कि पूरे देश के लिए एक ही सिस्टम है और सभी ईआरओ उसी सिस्टम में डेटा फीड करते हैं. अब तक किसी ने इसको लेकर शिकायत नहीं की है. आयोग के सूत्रों का यह भी कहना है कि अधिकारी भी अलग-अलग विचारधाराओं से प्रभावित हो सकते हैं। 

    आयोग के सूत्रों के मुताबिक, मतभेद लोकतंत्र का आधार हैं और यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. उनका कहना है कि पिछले 14 महीनों में ऐसे सैकड़ों मौके आए, जब शुरुआत में मतभेद होने के बावजूद आखिर में सर्वसम्मति से राय बनी. इस दौरान सुधार के लिए सैकड़ों कदम भी उठाए गए। 

    चुनाव आयुक्तों पर दावों को लेकर विपक्ष की प्रतिक्रिया
    चुनाव आयुक्तों को लेकर सामने आई रिपोर्ट पर विपक्षी नेताओं ने भी सवाल उठाए हैं. टीएमसी सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने कहा कि अगर दो चुनाव आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर कई बार आपत्ति जताई है तो राज्यसभा में पहले से लंबित प्रस्ताव को अब सामने लाना चाहिए. उन्होंने ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग भी की। 
    वहीं, सपा प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल समेत विपक्ष के कई नेताओं ने चुनाव आयोग के कामकाज और एसआईआर को लेकर सवाल उठाए हैं. सिब्बल ने आरोप लगाया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने फॉर्म-6 में बदलाव और वोटर लिस्ट से जुड़े फैसलों पर आपत्ति जताई थी। 

    उन्होंने एसआईआर को रोकने और चुनाव आयोग के कामकाज की जांच की मांग की. विपक्ष के अन्य नेताओं, जिनमें कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी और जयराम रमेश, आप नेता सौरभ भारद्वाज और शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत शामिल हैं, ने भी रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। 

    पूर्व चुनाव आयुक्त दावों पर क्या बोले?
    पूर्व चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने कहा, "मतभेद कहीं भी हो सकते हैं, लेकिन इलेक्शन कमिशन की मीटिंग के दौरान इन मतभेदों को एक-दूसरे को समझकर और समझाकर दूर किया जाता है. इसी तरह सर्वसम्मति से फैसले लिए जाते रहे हैं. लेकिन यह पहली बार हुआ है कि पिछले दस महीनों में 14 बार दो इलेक्शन कमिशनरों ने विरोध किया, फिर भी फैसले होते गए. कानूनन देखा जाए तो किसी भी एक इलेक्शन कमिशनर के पास अपने स्तर पर कोई पावर नहीं है. इलेक्शन कमिशन में तीनों लोग बैठते हैं, मीटिंग करते हैं और मिलकर फैसले लेते हैं. यही व्यवस्था शक्तिशाली है. किसी एक व्यक्ति को एडमिनिस्ट्रेटिव पावर के नाम पर कोई अतिरिक्त अधिकार नहीं दिया गया है। 

  • ड्रग टेस्ट में बड़ा खुलासा, 29 दवाएं फेल और दिल्ली में मिली नकली दवा

    ड्रग टेस्ट में बड़ा खुलासा, 29 दवाएं फेल और दिल्ली में मिली नकली दवा

       नई दिल्ली
    दवाओं से जुड़ी एक चिंताजनक खबर सामने आई है. विभिन्न कंपनियों द्वारा बनाई गई 29 दवाओं के सैंपल को 'मानक गुणवत्ता के नहीं' (NSQ) पाया गया. स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों ने मंगलवार इसकी जानकारी दी. बताया गया कि सेंट्रल ड्रग्स लेबोरेटरीज ने अगस्त के अपने मासिक ड्रग अलर्ट में ऐसा पाया था। 

    फिर राज्य की ड्रग-टेस्टिंग लेबोरेटरीज ने भी 191 दवाओं के सैंपल को NSQ पाया है। 
     
    रूटीन रेगुलेटरी सर्विलांस के तहत, NSQ और नकली दवाओं की लिस्ट हर महीने सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (CDSCO) के पोर्टल पर दिखाई जाती है। 

    स्वास्थ्य मंत्रालय के एक बयान में कहा गया, 'अगस्त 2026 के महीने के लिए, सेंट्रल ड्रग्स लेबोरेटरीज ने 29 दवाओं के सैंपल को मानक गुणवत्ता के नहीं (NSQ) के तौर पर पहचाना है और राज्य की ड्रग्स टेस्टिंग लेबोरेटरीज ने 191 दवाओं के सैंपल को NSQ पाया है। 

    बयान में कहा गया है कि दवाओं के सैंपल को NSQ के तौर पर तब पहचाना जाता है जब वे तय क्वालिटी पैरामीटर्स (गुणवत्ता के मानकों) में से किसी एक या अधिक में फेल हो जाते हैं. यह कमी सरकारी लैब द्वारा टेस्ट किए गए बैच के ड्रग प्रोडक्ट्स तक ही सीमित होती है और इससे बाजार में उपलब्ध अन्य ड्रग प्रोडक्ट्स को लेकर कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है। 

    इसके अलावा, दिल्ली के नेशनल कैपिटल टेरिटरी (NCT) से एक दवा के सैंपल को नकली पाया गया है. यह दवा अनधिकृत निर्माताओं द्वारा किसी दूसरी कंपनी के ब्रांड नाम का इस्तेमाल करके बनाई गई थी. मामले की जांच चल रही है और कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। 

    बयान में कहा गया है कि NSQ और नकली दवाओं की पहचान करने की यह कार्रवाई राज्य के रेगुलेटर्स के साथ मिलकर नियमित रूप से की जाती है ताकि यह पक्का किया जा सके कि ऐसी दवाओं की पहचान हो और उन्हें बाजार से हटाया जा सके। 

  • Basic Salary ₹50 हजार तक है तो PF कितना कटेगा? EPFO नियम और पूरा हिसाब समझें

    Basic Salary ₹50 हजार तक है तो PF कितना कटेगा? EPFO नियम और पूरा हिसाब समझें

     नई दिल्ली

    जब से सरकार ने पीएफ की अनिवार्य वेतन सीमा को 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये महीने किया है. तब से इस बात की चर्चा हो रही है कि जिनकी बेसिक सैलरी 25 हजार रुपये से ज्यादा है, उनके लिए क्या नियम है।  

    सरकार का कहना है कि इससे पहले 2014 में बदलाव हुआ था. अब नए बदलाव से लगभग 51 लाख नए कर्मचारी सीधे तौर पर PF, पेंशन और मुफ्त जीवन बीमा के दायरे में आ गए हैं. इस फैसले का मुख्य उद्देश्य देश के संगठित और असंगठित क्षेत्र के करोड़ों कर्मचारियों को व्यापक सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाना है. हालांकि, पीएफ कटौती बढ़ने के कारण टेक-होम सैलरी थोड़ी कम हो जाएगी। 

    पहले अगर कोई कर्मचारी 15,000 रुपये महीने से अधिक के बेसिक सैलरी पर पहली बार नौकरी में जुड़ता था, तो उसके लिए अनिवार्य रूप से पीएफ खाता खोलना जरूरी नहीं था। 

    महंगाई और न्यूनतम वेतन में तालमेल 
    दरअसल, साल 2014 से अब तक देश में औसत वेतन और न्यूनतम वेतन में काफी बढ़ोतरी हुई है. कई राज्यों में न्यूनतम वेतन ही 15,000 रुपये के आसपास पहुंच गया है. ऐसे में पुरानी सीमा प्रासंगिक नहीं रह गई थी. अनिवार्य अंशदान की सीमा बढ़ने से कर्मचारियों की मासिक बचत में इजाफा होगा, जिससे लंबी अवधि में उनका रिटायरमेंट फंड काफी बड़ा बनेगा। 

    अनिवार्य न्यूनतम योगदान
    पुरानी सीमा (15,000 रुपये पर कर्मचारी का 12% योगदान)= 1,800 रुपये/माह
    नई सीमा (25,000 रुपये पर कर्मचारी का 12% योगदान) = 3,000 रुपये/माह

    इसमें कंपनी और कर्मचारी दोनों की तरफ से 12-12% का योगदान दिया जाता है. ऐसे में 25,000 रुपये की सीलिंग पर कर्मचारी की सैलरी 1200 रुपये कम मिल सकती है, क्योंकि योगदान राशि 1800 रुपये से बढ़कर 3000 रुपये हो गई। 

    अब तमाम कर्मचारियों के मन में यह सवाल उठता है कि अगर उनकी बेसिक सैलरी 40,000 या 50,000 रुपये है, तो उन पर क्या नियम लागू होगा?

    नियम कहता है कि कंपनी कानूनी तौर पर केवल 25,000 रुपये की सीमा पर ही अपना हिस्सा 3,000 रुपये देने के लिए बाध्य है. आइए इसे एक उदाहरण से समझते हैं. राकेश एक प्राइवेट कंपनी में काम करते हैं और उनकी बेसिक सैलरी 50 हजार रुपये है. राकेश की कंपनी CTC स्ट्रक्चर पर काम करती है, ऐसे में वो अपनी पूरी बेसिक (50,000 रुपये का 12%= 6,000 रुपये) पीएफ में कटवा सकते हैं. कंपनी भी 6000 रुपये ही जमा करेगी. लेकिन वह पैसा राकेश की ही CTC पैकेज से एडजस्ट होगा, जिससे राकेश की Take-Home सैलरी कम हो जाएगी. क्योंकि कंपनी केवल 25,000 रुपये की सीमा तक का ही दायित्व 3000 रुपये उठाएगी। 

    अगर किसी कर्मचारी की बेसिक सैलरी 40 हजार रुपये मंथली है, तो क्या विकल्प है? 
    पहला विकल्प: अधिकतर निजी कंपनियां अनिवार्य वैधानिक सीमा पर ही पीएफ काटती हैं. इस हिसाब से कर्मचारी का योगदान 25,000 रुपये का 12%= 3,000 रुपये प्रति माह बनता है.  

    नियोक्ता का योगदान (12%): कुल 3000 रुपये, जो दो हिस्सों में बंटेगा-
    EPS (पेंशन फंड- 8.33%): 25 हजार रुपये का 8.33%= 2,083 रुपये/माह
    EPF (भविष्य निधि- 3.67%): ₹917/माह

    ऐसे में बेसिक 40 हजार रुपये होने के बावजूद कर्मचारी के वेतन से केवल 3,000 प्रति माह कटेंगे. 

    दूसरा विकल्प: पूरी बेसिक सैलरी यानी 40 हजार रुपये पर PF काटना. 
    अगर आपकी कंपनी और आप सहमत हैं, तो आप अपनी पूरी बेसिक सैलरी पर 12% पीएफ का योगदान दे सकते हैं. 
    कर्मचारी का योगदान: ₹40,000 का 12% = ₹4,800 प्रति महीने
    नियोक्ता का योगदान: कुल ₹4,800 प्रति माह
    EPS (पेंशन फंड): अधिकतम 25,000 की सीमा पर ही रहेगा, जो कि 2,083 रुपये महीने (अगर उच्च पेंशन का विकल्प नहीं चुना गया है.)
    EPF (भविष्य निधि): बचा हुआ पूरा हिस्सा यानी 2,717 रुपये/माह.

    ऐसे में कर्मचारी के वेतन से 4,800 रुपये प्रति माह कटेंगे और इतना ही योगदान कंपनी की तरफ से कुल पीएफ/पेंशन में जाएगा. लेकिन ऐसी स्थिति में इन हैंड सैलरी कम हो जाएगी। 

  • OPS बहाली की मांग के बीच 8वें वेतन आयोग पर सबकी नजर, NPS रहेगा जारी?

    OPS बहाली की मांग के बीच 8वें वेतन आयोग पर सबकी नजर, NPS रहेगा जारी?

    नई दिल्ली

    केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए 8वां वेतन आयोग इस समय वेतन, पेंशन और भत्तों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार कर रहा है। 3 नवंबर 2025 को गठन के बाद आयोग को अपनी अंतिम रिपोर्ट सरकार को सौंपने के लिए 18 महीने का समय दिया गया है और करीब 10 महीने बीत भी चुके हैं।

    आयोग की अध्यक्षता न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई कर रही हैं। आयोग कर्मचारी संगठनों, पेंशनर संगठनों और अन्य एसोसिएशनों से उनकी मांगों और सुझावों पर चर्चा कर रहा है। पिछले कुछ महीनों में देश के अलग-अलग शहरों में आयोग की बैठकें हो चुकी हैं। सितंबर में आयोग ने 9 सितंबर को पुडुचेरी और 16 से 18 सितंबर के बीच चंडीगढ़ में बैठकें कीं। अक्टूबर में बेंगलुरु में 7 और 8 अक्टूबर को बैठक प्रस्तावित है।

    फिटमेंट फैक्टर से लेकर पेंशन तक पर चर्चा
    आयोग के सामने कर्मचारी संगठनों की ओर से फिटमेंट फैक्टर बढ़ाने, वेतन संशोधन, पेंशन में सुधार और विभिन्न भत्तों में बदलाव समेत कई मांगें रखी गई हैं। हालांकि, इनमें पुरानी पेंशन योजना (OPS) और राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) का मुद्दा खास तौर पर महत्वपूर्ण बना हुआ है। 2004 के बाद भर्ती हुए केंद्रीय कर्मचारियों के लिए रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली आर्थिक सुरक्षा को लेकर कई कर्मचारी संगठनों ने आयोग के सामने अपनी चिंताएं रखी हैं।

    OPS की बहाली की मांग
    कई कर्मचारी संगठनों का कहना है कि मौजूदा अंशदायी पेंशन व्यवस्था से सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली आर्थिक सुरक्षा उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं है। उनके मुताबिक कर्मचारियों और उनके परिवारों के लिए निश्चित पेंशन व्यवस्था जरूरी है।

    सर्वे ऑफ इंडिया की MSA ने OPS बहाल करने की मांग की है। संगठन ने अंतिम वेतन के 50 फीसदी के बराबर गारंटीड पेंशन की मांग भी रखी है।

    वहीं फेडरेशन ऑफ नेशनल पोस्टल आर्गेनाइजेशन ने NPS और UPS के तहत आने वाले कर्मचारियों को भी परिभाषित लाभ वाली पेंशन व्यवस्था में लाने की मांग की है। रेलवे सीनियर सिटिजनंस सोसाइटी ने भी न्यूनतम गारंटीड पेंशन और सेवानिवृत्ति के बाद अधिक वित्तीय सुरक्षा की मांग उठाई है।

    8वें वेतन आयोग में आगे क्या होगा?
    इन संगठनों की मांगें उनके संबंधित ज्ञापनों के माध्यम से 8वें वेतन आयोग के सामने रखी गई हैं। दूसरे कर्मचारी और पेंशनर संगठनों ने भी फिटमेंट फैक्टर, पेंशन समानता और न्यूनतम पेंशन बढ़ाने समेत कई सुझाव दिए हैं।

    अब आयोग इन मांगों और विभिन्न पक्षों से मिले सुझावों का अध्ययन करेगा। इसके बाद आयोग अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपेगा। उपलब्ध समयसीमा के अनुसार अंतिम रिपोर्ट मई-जून 2027 के आसपास आने की संभावना बताई जा रही है।

  • रूसी तेल विवाद में भारत के पक्ष में उठी आवाज, जेमी डिमॉन ने US को तेल बाजार के असर पर चेताया

    रूसी तेल विवाद में भारत के पक्ष में उठी आवाज, जेमी डिमॉन ने US को तेल बाजार के असर पर चेताया

    नई दिल्ली

    जेपी मॉर्गन चेज के सीईओ जेमी डिमॉन ने रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत पर कार्रवाई को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका को कोई सख्त कार्रवाई करने से पहले उसके असर को समझना चाहिए। यूएस को भारत और पूरी दुनिया के तेल बाजार पर पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान में रखना होगा। डिमॉन ने यह बात मुंबई में जेपी मॉर्गन इंडिया इन्वेस्टर कॉन्फ्रेंस के दौरान सीएनबीसी-टीवी18 से बातचीत में कही। उन्होंने कहा, 'वॉशिंगटन को पहले समझना चाहिए कि भारतीय रिफाइनर रूस से मिलने वाले तेल का किस तरह इस्तेमाल करते हैं।'

    जेमी डिमॉन ने कहा, 'उम्मीद है कि अमेरिका इन सभी मुद्दों को समझेगा और ऐसा नहीं करेगा कि रूस के खिलाफ जरूरी कदम उठाते हुए भारत और दुनिया के तेल बाजार को नुकसान पहुंचा दे।' उन्होंने भारतीय रिफाइनरियों में इस्तेमाल होने वाले रूसी तेल को लेकर भी बात रखी। डिमॉन के मुताबिक, रूस से आने वाले तेल का कुछ हिस्सा भारत में रिफाइन होकर इस्तेमाल होता है और कुछ तेल रिफाइनरियों की खास जरूरत के मुताबिक खरीदा जाता है। उन्होंने कहा कि अगर भारत यह तेल रूस से नहीं खरीदेगा तो उसे किसी दूसरे देश से लेना होगा और हो सकता है कि वहां से मिलने वाला तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए सही न हो।

    रूस से तेल खरीदने पर 100% तक टैरिफ
    डिमॉन का यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी कांग्रेस ने रूस पर नए प्रतिबंधों से जुड़ा विधेयक पास किया है। इस कानून के तहत राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है। डिमॉन ने कहा कि अमेरिका को रूस पर दबाव बनाने के उपायों के साथ-साथ यह भी देखना चाहिए कि ऐसे कदमों का तेल बाजार पर कितना व्यापक असर पड़ सकता है। अमेरिका को यूक्रेन के समर्थन के लिए और कदम उठाने चाहिए।

    भारत पर अमेरिका और यूरोपीय संघ का दबाव
    रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत पर अमेरिका और यूरोपीय संघ की ओर से दबाव बढ़ा हुआ है। भारत लगातार रूसी तेल खरीद को लेकर हो रही आलोचना को खारिज करता रहा है। नई दिल्ली ने अपनी ऊर्जा खरीद को निशाना बनाने को अनुचित और गैरवाजिब बताया है। रूस पर प्रतिबंध वाले अमेरिकी कानून पर भी भारत ने कहा कि इससे दोनों देशों के संबंध प्रभावित हो सकते हैं। विदेश मंत्रालय ने कहा था कि भारत अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है और रूसी तेल के बड़े खरीदारों में शामिल है।

  • ‘वंदे मातरम्’ न गाने पर कार्रवाई के खिलाफ याचिका, SC ने केंद्र को नोटिस

    ‘वंदे मातरम्’ न गाने पर कार्रवाई के खिलाफ याचिका, SC ने केंद्र को नोटिस

    नई दिल्ली

    राष्ट्रीय गीत वंदेमातरम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई व्यक्ति धार्मिक कारणों से वंदे मातरम नहीं गाता है या फिर सारे आंतरे नहीं गाता है तो उसपर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। वहीं सुप्रीम कोर्ट नेइस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए जवाब भी मांगा है। गायक टीएम कृष्णा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीद जताई की वंदे मातरम् से जुड़े कानून की व्याख्या करते वक्त 1986 के 'बिजो एमैनुअल' के तय सिद्धातों को लागू किया जाएगा।

    आपको बता दें कि जुलाई में संसद के मॉनसून सत्र में एक संशोधन विधेयक लाकर वंदे मातरम को इसके अंतरगत लाया गया था। 29 जुलाई को राज्यसभा में और फिर 30 जुलाई को लेकसभा में विधेयक को पास करके कानून बनाया दिया गया और वंदेमातरम गाना अनिवार्य किया गया था। इसे राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम के दायरे में ले आया गया। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय गीत को दो अंतरे तक ही सीमित रखने पर विचार करने से इनकार कर दिया है। हालांकि इस बात पर विचार करने को तैयार है कि इसे ना गाने को दंडनीय अपराध ना बनाया जाए।

    राष्ट्रगान ना गाने पर नहीं हो सकती सजा
    सीजेआई सूर्यकांत जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने बिजो इमैनुएल मामले में सुप्रीम कोर्ट के ही फैसले का हवाला देते हुए कहा कि तय किया गया था कि राष्ट्रगान ना गाने पर किसी को सजा नहीं दी जाएगी और यह अब भी लागू होता है।

    बिजो इमैनुअल केस: 3 छात्रों ने राष्ट्रगान गाने से मना कर दिया

    कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि वंदे मातरम से जुड़े कानून की व्याख्या करते समय 1986 के ‘बिजो इमैनुअल’ फैसले में तय सिद्धांतों को लागू किया जाएगा।

    दरअसल, 1986 के बिजो इमैनुअल बनाम केरल सरकार मामले में तीन छात्रों ने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था। हालांकि वे राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहते थे।

    सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ कार्रवाई को रद्द करते हुए कहा था कि केवल राष्ट्रगान न गाने के आधार पर उन्हें दंडित नहीं किया जा सकता।

    ‘नक्सली’ शब्द पर सॉलिसिटर जनरल और मुरलीधर में बहस
    सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और कृष्णा के वकील सीनियर एडवोकेट डॉ एस मुरलीधर के बीच तीखी बहस भी हुई। संविधान के तहत निर्णय लेने की प्रक्रिया पर मुरलीधर की दलील के जवाब में मेहता ने ‘नक्सली’ शब्द का इस्तेमाल किया।

        मुरलीधर: अभी आपने जिस शब्द का इस्तेमाल किया है, उसे वापस लें। यह कार्यवाही लाइव चल रही है। मैं इसका कड़ा विरोध करता हूं।

        मेहता: मैंने कहा कि यही संवैधानिक तरीका है, न कि वह तरीका जो नक्सली चाहता है। और मुझे इसका कोई अफसोस नहीं है।

        मुरलीधर: “किसी बात पर विचार करना नक्सली होना नहीं है।

    इसके बाद जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति पर आतंकवादी होने का आरोप हो, तब भी संविधान के तहत उसके अधिकार बने रहते हैं।

    2026 वंदे मातरम के अपमान पर कानून बना
    24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने 'वंदे मातरम' को राष्ट्रीय गीत घोषित किया था। लंबे समय तक इसके अपमान पर कोई अलग कानून नहीं था, लेकिन 2026 के मानसून सत्र में केंद्र सरकार ने 'राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम' बनाया।

    इस कानून के तहत 'वंदे मातरम' के गायन को जानबूझकर रोकने, इसमें बाधा डालने या इसका सार्वजनिक अपमान करने को दंडनीय अपराध माना गया है। ऐसा करने पर 3 साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा का प्रावधान है।

    इस बार 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान पहली बार लाल किले की प्राचीर से 'वंदे मातरम' के पूरे 6 छंद गाए गए।

    केंद्र से मांगा जवाब
    सुप्रीम कोर्ट ने इस पीआईएल पर सरकार से जवाब दाखिल करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत दिए गए मौलिक अधिकारियों के संबंध में कानून में दंड के प्रावधानों की समीक्षा होनी चाहिए।

    आपको बता दें कि कर्नाटक संगीत के प्रसिद्ध गायक टी एम कृष्णा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका फाइल की थी और कहा था कि वंदे मातरम के सभी 6 छंद गाना अनिवार्य नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा था कि आखिरी के चार अंतरे में स्पष्ट रूप से हिंदू देवी देवताओं की आर्चना का भाव है और एक धर्मनिरपेक्ष देश में इसे अनिवार्य कर देना संविधान का उल्लंघन है। केंद्र सरकार की ओर से पेश एसजी तुषार मेहता ने इस याचिका का विरोध करते हुए कहा कि कुछ लोग संविधान और कानून के राज में विश्वास नहीं करते और उनकी सोच नक्सलवादी है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रीय गीत की अहम भूमिका थी और इसे भुलाना नहीं चाहिए।

    तुषार मेहता ने क्या दलील दी?
    सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से नोटिस नहीं जारी करने की मांग की. इस पर उन्होंने दलील दी कि यह सनसेशन को बढ़ावा देने वाला होगा. इसके बाद सुनवाई के दौरान ही जस्टिस बागची ने कहा कि  इसमें कोई संदेह नहीं कि यह हमारा राष्ट्रीय गीत है। 

    याचिकाकर्ता की बात से सहमत दिखा सुप्रीम कोर्ट
    इस पर एसजी तुषार मेहता ने कहा कि दो पद गाए जाएं या छह पद गाए जाएं… यह सरकार से इतर कौन तय करेगा, कोई और तो नहीं कर सकता. इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने दखल दी. उन्होंने कहा कि लोगों की राय ली जानी चाहिए थी. इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि यह सही बात है। 

    2 सप्ताह में देना है जवाब
    इसके बाद वंदे मातरम के छह पद गाने की अनिवार्यता के खिलाफ दायर याचिका पर केंद्र सरकार से सुप्रीम कोर्ट ने जवाब तलब किया. सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि दो सप्ताह के अंदर केंद्र को इस मामले में देना होगा जवाब. याचिकाकर्ता के वकील ने एसजी की ओर से दलील में नक्सलाइट शब्द का उपयोग करने पर भी गंभीर आपत्ति जताई। 

  • LCA Tejas Mk1A की टेस्टिंग जारी, एक-दो महीने में बाकी अड़चनें दूर होने की संभावना

    LCA Tejas Mk1A की टेस्टिंग जारी, एक-दो महीने में बाकी अड़चनें दूर होने की संभावना

    नई दिल्ली
    भारतीय वायु सेना के वाइस चीफ एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित ने स्वदेशी लड़ाकू जेट LCA तेजस मार्क 1ए की मौजूदा स्थिति पर महत्वपूर्ण जानकारी दी है. उन्होंने बताया कि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी HAL ने इसकी पुष्टि कर दी है कि शुरुआत में देरी का मुख्य कारण अमेरिका से आने वाला इंजन था। 

    इंजनों की कमी के कारण कार्यक्रम में देरी हुई. अब इंजन मिल चुके हैं. जेटों पर लगा दिए गए हैं. जेट को वायु सेना में शामिल करने से पहले उचित और गहन परीक्षण किए जा रहे हैं. एयर मार्शल दीक्षित के अनुसार अभी दो या तीन बिंदु बाकी हैं जिन्हें पूरा करना बाकी है। 

    उनका मानना है कि एक या दो महीने के अंदर इन मुद्दों को दूर कर लिया जाएगा. उसके बाद जेट को शामिल करने का रास्ता साफ हो जाएगा. भारत LCA तेजस मार्क 1ए के शामिल होने का बेसब्री से इंतजार कर रहा है. यह बयान वायु सेना की तैयारियों और स्वदेशी कार्यक्रमों की प्रगति को रेखांकित करता है। 

    इंजन की कमी और वर्तमान प्रगति
    LCA तेजस मार्क 1ए भारतीय वायु सेना के लिए महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म है. यह तेजस परिवार का एडवांस वर्जन है जिसमें कई सुधार किए गए हैं. पहले चरण में इंजनों की आपूर्ति में देरी हुई थी जिससे उत्पादन और परीक्षण प्रभावित हुए. अब यह समस्या हल हो चुकी है. इंजन लगने के बाद जेटों पर परीक्षण चल रहे हैं। 

    इन परीक्षणों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जेट सभी परिचालन जरूरतों को पूरा करे. सुरक्षा और विश्वसनीयता को प्राथमिकता दी जा रही है. वायु सेना उप प्रमुख का बयान बताता है कि तकनीकी चुनौतियां अब अंतिम चरण में हैं. बाकी बचे मुद्दों को जल्द सुलझा लिया जाएगा। 

    एक बार ये बिंदु पूरे हो जाएं तो जेट को स्क्वॉड्रन में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है. यह विकास स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता को मजबूत करने की दिशा में सकारात्मक संकेत है. LCA तेजस मार्क 1ए के शामिल होने से भारतीय वायु सेना की लड़ाकू क्षमता में इजाफा होगा। 

    यह जेट आधुनिक एवियोनिक्स, बेहतर रडार और हथियार प्रणालियों से लैस है. स्वदेशी जेट होने के कारण रखरखाव और अपग्रेड आसान होगा. विदेशी निर्भरता कम होने से लंबी अवधि में लागत भी नियंत्रित रहेगी. वायु सेना लंबे समय से इस जेट का इंतजार कर रही है क्योंकि पुराने जेटों को बदलने की जरूरत है। 

    परीक्षण प्रक्रिया को सावधानीपूर्वक पूरा करना जरूरी है. किसी भी कमी को नजरअंदाज नहीं किया जा रहा. एचएएल और वायु सेना दोनों मिलकर काम कर रहे हैं ताकि जेट पूरी तरह तैयार अवस्था में शामिल हो. एक-दो महीने का समय बाकी मुद्दों को दूर करने के लिए पर्याप्त माना जा रहा है. उसके बाद उत्पादन और डिलीवरी की गति बढ़ सकती है। 

    यह कार्यक्रम आत्मनिर्भर भारत अभियान का हिस्सा है. स्वदेशी लड़ाकू जेट का सफल शामिल होना रक्षा क्षेत्र में आत्मविश्वास बढ़ाएगा. वायु सेना उप प्रमुख के बयान से साफ है कि देरी के कारणों को समझा गया है और अब समाधान की दिशा में काम हो रहा है. परीक्षण पूरा होने के बाद जेट को जल्द सेवा में लेने की उम्मीद है. भारतीय वायु सेना की लड़ाकू क्षमता को मजबूत बनाने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा. सभी संबंधित एजेंसियां मिलकर लक्ष्य हासिल करने की कोशिश में जुटी हैं। 

  • 100% Ethanol Car: जल्द सड़कों पर दौड़ेगी इथेनॉल कार, गडकरी ने दिया बड़ा अपडेट

    100% Ethanol Car: जल्द सड़कों पर दौड़ेगी इथेनॉल कार, गडकरी ने दिया बड़ा अपडेट

     नई दिल्ली
    बीते दिनों इथेनॉल ब्लेंडेड E20 पेट्रोल को लेकर काफी हो हल्ला मचा था. सड़क से लेकर संसद तक इस फ्यूल की चर्चा हो रही थी. सोशल मीडिया पर तो जैसे E20 पेट्रोल से इफेक्टेड वाहनों के वीडियो की बाढ़ सी आ गई थी. फिलहाल मामला शांत है. और इस बीच केंद्रीय सड़क परिवहन राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने एक बार फिर से इथेनॉल की वकालत की है। 

    दिल्ली में आयोजिक एक कार्यक्रम के दौरान नितिन गडकरी ने कहा कि, "दुनिया के 19 देशों में इथेनाल इस्तेमाल किया जा रहा है और भारत के किसी गाड़ी में आज शिकायत नहीं आ रही है. अक्टूबर में टोयोटा कंपनी की इनोवा 100% फ्लेक्स फ्यूल कार पर चलने वाली कार लांच करने का न्यौता मिला है. ये गाड़ी 100% इथेनाल से चलेगी और चलते चलते 60% बिजली पैदा करती है. अगर पेट्रोल के भाव से तुलना करें तो इसके इस्तेमाल में पेट्रोल पच्चीस रुपए प्रति लीटर होगा और प्रदूषण भी नहीं करेगी। 

    उन्होंने कहा कि, "मक्के से इथेनाल बनाने के फ़ैसले से यूपी बिहार के किसानों को 45 हज़ार करोड़ मिला है. सरकार के पास नीतियाँ हैं. आप को उन नीतियों को सपोर्ट करना होगा. 22 लाख करोड़ का धंधा जिनका है वो जाएगा तो नितिन गडकरी को गालियाँ देंगे. मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ेगा लेकिन हमें किसान का भला करना है।

    बाइक टैक्सी को प्रमोट करें
    देश भर में बाइक टैक्सी सर्विस तेजी से बढ़ रहा
    है. छोटी दूरी की यात्राओं के लिए ये सर्विस बहुत ही किफायती है और लोग तेजी से इसका उपयोग कर रहे हैं. नितिन गडकरी ने कहा कि, "मैं सभी राज्यों के परिवहन मंत्रियों को कह रहा हूँ की गाँव के ग़रीब लड़कों को और उनके दो पहिया से चलने वाले लोगों को आप प्लेटफार्म दीजिए। 

    गडकरी ने कहा कि, "यह प्लेटफार्म कमाई का बढ़िया जरिया है. ये प्लेटफॉर्म पच्चीस रुपए महीने लेते हैं और जब भी किसी को टैक्सी की सुविधा हो तो लोगों को रोज़गार और कमाई होती है. इसी तरह बिना किसी निवेश के हिंदुस्तान में 10 करोड़ लोगों को रोज़गार मिल सकता है. गडकरी ने कहा कि, मैंने फ़ाइल पर लिखा है कि, किसी के बाद अपना दोपहिया चारपहिया हो तो वो अभी टैक्सी चला सकते हैं. मेरे एक हस्ताक्षर के बाद बैंगलोर की रैपिडो कंपनी ने 3.5 करोड़ लोगों को रोजगार दिया। 

     

  • TRAI का बड़ा नियम: बिना डेटा वाले Voice-SMS प्लान होंगे उपलब्ध, 30 दिन की वैलिडिटी का विकल्प

    TRAI का बड़ा नियम: बिना डेटा वाले Voice-SMS प्लान होंगे उपलब्ध, 30 दिन की वैलिडिटी का विकल्प

    नई दिल्ली

    प्रीपेड मोबाइल रिचार्ज कराने वाले करोड़ों लोगों के हित में टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (TRAI) ने बड़ा फैसला लिया है। ट्राई ने ‘टेलीकॉम कंज्यूमर प्रोटेक्शन (तेरहवां संशोधन) रेगुलेशन, 2026’ के नियमों को जारी कर दिया है। इसके बाद अब Jio-Airtel-Vi-BSNL को ग्राहकों के लिए सिर्फ कॉल और एसएमएस वाले नए व सस्ते मोबाइल रिचार्ज लेकर आने होंगे। इससे लोगों को मजबूरन डेटा वाले प्लान नहीं लेने होंगे और उन्हें सस्ते रिचार्ज मिल पाएंगे। ट्राई ने इस संबंध में एक नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया है।

    क्या हैं ट्राई के नए नियम
    आसान भाषा में समझाएं तो ट्राई ने टेलीकॉम कंपनियों को स्पष्ट बता दिया है कि उन्हें ग्राहकों के लिए सस्ते मोबाइल रिचार्ज लेकर आने होंगे। ऐसे लोग जिन्हें मोबाइल रिचार्ज कराते समय डेटा की जरूरत नहीं होती, उन्हें ज्यादा और सस्ते विकल्प मिल पाएंगे। नए नियमों के तहत

        टेलीकॉम कंपनियों को Voice & SMS Only STV देने होंगे।
        30 दिन और उससे कम वैलिडिटी के लिए ऐसे प्लान जरूरी कर दिए गए हैं।
        हर महीने एक ही तारीख को रिन्यू होने वाला विकल्प भी ग्राहकों को देना होगा।
        30 दिन से अधिक वैलिडिटी वाला कम-से-कम 1 Voice-SMS प्लान भी जरूरी हो गया है। (REF.)

    ट्राई के फैसले से लोगों को क्या फायदा?

        पैसे की बचत: डेटा इस्तेमाल नहीं करने वाले ग्राहकों को बेवजह डेटा के पैसे नहीं देने पड़ेंगे।

        ज्यादा विकल्प: ग्राहक अपनी जरूरत और खर्च के हिसाब से छोटे-बड़े रिचार्ज चुन सकेंगे।

    टेलीकॉम कंपनियां नहीं दे रही थीं ऑप्शन
    ट्राई ने कहा है कि टेलीकॉम कंपनियां 'वॉइस और SMS' ओनली वाले STV (स्पेशल टैरिफ वाउचर) बहुत कम और सिर्फ लंबी वैलिडिटी पर ही दे रही थीं। इससे कम आय वाले उपभोक्ताओं को सस्ते और कम वैलिडिटी के रिचार्ज नहीं मिल पा रहे थे। ट्राई ने कुछ महीने पहले इस मामले पर सुझाव मांगे थे। ट्राई को 1132 प्रतिक्रियाएं/सुझाव मिले थे।

    लॉन्च करना होगा सस्ता टैरिफ वाउचर
    TRAI ने TCPR 2026 के 13वें संसोधन को मंजूरी दे दी है, जिसमें टेलीकॉम ऑपरेटर्स को बिना डेटा वाले वॉइस और SMS ओनली वाले स्पेशल टैरिफ वाउचर (STV) लाने का निर्देश दिया गया है। इस नए नियम का ड्राफ्ट दूरसंचार नियामक ने 7 अप्रैल 2026 को अपनी वेबसाइट पर पब्लिश की थी। इस प्लान को खास तौर पर उन यूजर्स के लिए लाया जाएगा, जिनकी आय बहुत कम है। टेलीकॉम सर्विस लोगों के लिए एक जरूरी माध्यम बन गया है, जिसकी वजह से दूरसंचार नियामक ने टेलीकॉम ऑपरेटर्स को सस्ते मंथली प्लान लाने का आदेश दिया है।

    क्या है नया नियम?
    दूरसंचार नियामक ने अपने नए नियम में टेलीकॉम ऑपरेटर्स को आदेश दिया है कि हर टेलीकॉम ऑपरेटर्स को 30 दिन या इससे कम वैलिडिटी के स्पेशल टैरिफ वाउचर लॉन्च करने होंगे, जिनमें केवल वॉइस और SMS ऑफर किया जाएगा। 

    इसके अलावा दूरसंचार कंपनियों को यह भी आदेश दिया है कि उन्हें रिचार्ज कराने वाले ग्राहकों के सामने एक ऐसा विकल्प भी रखना होगा, जिसमें ग्राहक हर महीने एक तय तारीख पर अपना रिचार्ज रिन्यू कर सके। इससे ग्राहकों को अलग-अलग तारीखों पर रिचार्ज कराने की झंझट नहीं रहेगी।

    साथ ही, 30 दिन से ज्यादा वैलिडिटी वाला कम से कम एक वॉइस और SMS ओनली प्लान भी ग्राहकों को देना होगा। इसका मतलब साफ है कि अब ग्राहकों के पास लंबी वैलिडिटी वाला भी वॉइस और SMS ओनली प्लान से रिचार्ज कराने का विकल्प रहेगा। दूरसंचार नियामक ने यह भी कहा है कि इन प्लान की कीमतों में उचित कटौती की जाए ताकि ये प्लान डेटा वाले प्लान के मुकाबले सस्ते हो।

    इसके अलावा TRAI ने फर्जी कमर्शियल कॉल्स के नियमों को और सख्त कर दिया है। नए नियम के तहत संदिग्ध स्पैम की पहचान के लिए एआई बेस्ड तरीकों को शामिल किया गया है। साथ ही, ऑटोमैटेड कॉल्स के लिए नए नियम लागू किए गए हैं। संशोधित नियमों के मुताबिक, टेलीकॉम ऑपरेटर्स को संदिग्ध स्पैम एक्टिविटी से जुड़े नंबरों की जानकारी शेयर करनी होगी। यही नहीं, एक्टिविटी से जुड़े कई नंबरों पर संदेह होने पर आगे की जांच की अनुमति दी गई है।

    कब तक आ जाएंगे नए रिचार्ज?
    ट्राई ने अपने नोटिफिकेशन में किसी तारीख का जिक्र नहीं किया है। ऐसे में माना जाना चाहिए कि अब टेलीकॉम कंपनियों को कदम उठाना है। उम्मीद है कि अगले कुछ दिनों में ऐसे नए प्रीपेड प्लान्स आ सकते हैं जो कम वैलिडिटी के साथ सिर्फ कॉल और एसएमएस की सुविधा पेश करेंगे। यानी आने वाले दिनों में अगर किसी को 30 दिन की वैलिडिटी वाला रिचार्ज चाहिए और डेटा की जरूरत नहीं है तो उसे ओनली वॉयस और एसएमएस वाला रिचार्ज जरूर मिलेगा।