Category: मध्य प्रदेश

  • पुलिस से बचने रेत माफियाओं ने मचाई अफरा-तफरी, संकरी गलियों में ट्रैक्टर से कार घसीटी

    पुलिस से बचने रेत माफियाओं ने मचाई अफरा-तफरी, संकरी गलियों में ट्रैक्टर से कार घसीटी

    मुरैना.

    सुप्रीम कोर्ट की सख्ती कम होते ही मुरैना में रेत माफिया का आतंक फिर बढ़ने लगा है। बीते 12 घंटे में ऐसी तीन घटनाएं हुईं, जिनमें रेत माफिया का दुस्साहस और पुलिस प्रशासन मजबूर नजर आया। एसपी बंगला से बंद कदम दूर रेत माफिया के ट्रैक्टर-ट्राली, सड़क पर रेत की ट्राली खाली करके भाग गए।

    संकरी गलियों से भागे, कार को टक्कर मारकर घसीटा
    उधर राठौर कॉलोनी-ट्रंच रोड क्षेत्र में दर्जनों ट्रैक्टर-ट्रालियों की कतार, बस्ती की संकरी गलियों से भागे, इस दौरान जो सामने पड़ा उसे टक्कर मारते गए। इसमें एक कार को टक्कर मारने के बाद घसीटते ले गए, जिसमें कार सवार युवक बाल-बाल बच गया। स्थानीय लोगों के अनुसार रेत के वाहनों के पीछे पुलिस के वाहन थे, इसलिए यह भगदड़ मची।

    सीसीटीवी में कैद हुई 15-20 ट्रैक्टर-ट्रालियों की रफ्तार
    घटना कोतवाली थाना क्षेत्र की राठौर कालोनी, ट्रंच रोड पर रविवार सुबह पांच बजे की है। दरअसल रविवार को पुलिस टीमों ने चंबल नदी के अवैध रेत से भरे ट्रैक्टर-ट्रालियों की धरपकड़ शुरू की। एक टीम धौलपुर रोड से अंबाह बायपास की तरफ 20 से 25 ट्रैक्टर-ट्राली भागे, जिनमें चंबल नदी का रेत था। इन ट्रैक्टर-ट्रालियों के पीछे पुलिस के वाहन लगे तो रेत माफिया ने ट्रैक्टर-ट्राली ट्रंच रोड होते हुए राठौर कालोनी की संकरी गलियों में घुसा दिए।

    मकानों के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरों के दिख रहा है, कि 15 से 20 ट्रैक्टर ट्रालियां कतार से, रफ्तार में भाग रही हैं। गली में एक किराना दुकान के सामने काउंटर रखा था उसे तोड़ दिया, पानी के नल के पाइप तोड़ दिए। इसी गली में नरेश राठौर की कार को टक्कर मार दी, उस समय नरेश राठौर कार में ही थे। उन्होंने बताया कि वह धौलपुर से लौटकर आए। सामने से तेज रफ्तार में रेत से भरे ट्रैक्टर-ट्रालियों की लाइन आ रही थी, उन्होंने कार को हटाने सा साइड करने तक का समय नहीं दिया और सीधे टक्कर मार दी और उसके बाद कुछ दूर तक कार को घसीटते ले गए। कार किनारे हुई तो रेत माफिया वहां से रफ्तार में भाग निकले।

    एसपी बंगला पास रेत फैलाकर भागे माफिया
    पुलिस की एक टीम रविवार तड़के एमएस रोड और बड़ोखर क्षेत्र में भी कार्रवाई को पहुंची। पुलिस टीम को देख बड़ोखर में आने वाले रेत के ट्रैक्टर-ट्रालियाें में भगदड़ मची। तीन से चार ट्रैक्टर-ट्राली रेलवे ओवरब्रिज से होकर बैरियर चौराहा की तरफ भागे। यह रेत के वाहन कलेक्टर बंगला, स्टेशन रोड थाने, कोतवाली थाने और फिर एसपी बंगला के सामने से भागे। इनके पीछे पुलिस की गाड़ियां लगी। पकड़े जाने के डर से सबसे पीछे चल रहे ट्रैक्टर-ट्राली ने, रफ्तार में ही हाइड्रोलिक उठाकर रेत को एमएस रोड पर खाली कर दिया। एसपी बंगला से चंद कदम दूरी, पुरानी चुंगीनामा पर यह रेत फैलाया, जिसे बाद में पुलिस ने बैकहो लोडर मशीन (जेसीबी) से समेटकर साफ करवाया। ऐसी ही तीसरी घटना सिविल लाइन थाना क्षेत्र में हुई, जहां पुलिस टीम से बचने के लिए रेत माफिया ने सड़क पर ही रेत फैला दिया। हालांकि पुलिस ने घेराबंदी करके खाली ट्रैक्टर-ट्राली को पकड़ लिया।

  • सीएम डॉ. मोहन यादव की बड़ी सौगात, ‘भोपाल मास्टर प्लान-2047’ का ड्राफ्ट तैयार, जानें कैसी होगी आपकी प्रपोज्ड लेक सिटी?

    सीएम डॉ. मोहन यादव की बड़ी सौगात, ‘भोपाल मास्टर प्लान-2047’ का ड्राफ्ट तैयार, जानें कैसी होगी आपकी प्रपोज्ड लेक सिटी?

    भोपाल
    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने ऐतिहासिक सौगात की तैयारी कर ली है। प्रशासन ने भोपाल के नए मास्टर प्लान का ड्राफ्ट तैयार कर लिया है। यह मास्टर प्लान ड्राफ्ट चार प्रमुख स्तंभों पर बनाया गया है। इन चार स्तंभों में प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण, आधुनिक दृष्टिकोण एवं नागरिक हितैषी नियोजन, सुधारोन्मुख एवं परिवर्तनकारी नियोजन और आत्मनिर्भर एवं आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने वाला विकास शामिल हैं। अब इस ड्राफ्ट पर सरकार दावे-आपत्तियां आमंत्रित करेगी।

    इस ड्राफ्ट को लेकर सीएम डॉ. मोहन यादव ने सोशल मीडिया पर लिखा, 'गणेश अनंत चतुर्दशी के पावन अवसर पर लंबे अंतराल के बाद भोपाल विकास योजना-2047 के प्रारूप का प्रकाशन किया गया है। यह योजना भोपाल की प्राकृतिक धरोहर-भोजताल, वन क्षेत्रों एवं बाघ भ्रमण क्षेत्र- के संरक्षण के साथ नागरिकों को बेहतर सुविधाएं, सुगम मोबिलिटी और आर्थिक विकास के अवसर उपलब्ध कराने की दृष्टि से तैयार की गई है। योजना में हरित TDR का प्रावधान किया गया है, जिससे हरित क्षेत्र में आने वाली भूमि के स्वामियों की क्षतिपूर्ति के साथ विकासकर्ताओं को TDR के माध्यम से अतिरिक्त विकास की सुविधा मिल सकेगी। समृद्ध, सुगम और विकसित भोपाल के संकल्प की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण पहल है। प्रकाशित प्रारूप पर नागरिक अपने आपत्ति एवं सुझाव प्रस्तुत कर सकते हैं।'

    भोपाल मास्टर प्लान के ड्राफ्ट की कई विशेषताएं
    गौरतलब है कि भोपाल मास्टर प्लान के ड्राफ्ट की कई विशेषताएं हैं। इसमें प्राकृतिक संवेदनशीलता सम्मत नियोजन किया है। इसके तहत भोज ताल और इसके जलग्रहण क्षेत्र को संरक्षित रखने की अवधारणा को आधारभूत रखते हुए योजना तैयार की गई है। इसके अतिरिक्त पहाड़ियों, वन क्षेत्रों, तालाबो एवं जलाशयों, बाघ भ्रमण क्षेत्रों के संरक्षण के भी समुचित प्रावधान ड्राफ्ट में किए गए हैं। मास्टर प्लान ड्राफ्ट में आर्थिक विकास एवं रोजगार सृजन सम्बन्धी प्रस्ताव हैं। इसे विकास योजना इस दृष्टिकोण के साथ तैयार किया गया है कि पर्यावरणीय संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक विकास किया जा सके। वर्तमान परिदृश्य के साथ साथ अगली पीढ़ी को शहर में पर्याप्त अवसर प्राप्त हो सकें। इसके लिए लगभग 3000 हेक्टर भूमि ग्रोथ कॉरीडोर के अंतर्गत प्रस्तावित की गई है। मास्टर प्लान ड्राफ्ट में महानगरीय अवधारणा भोपाल विकास योजना-2047 के प्रस्ताव इस प्रकार रखे गए हैं कि भोपाल मेट्रोपोलिटन क्षेत्र के साथ इसका सामंजस्य सहज रूप से हो सके और शहर में होने वाले विकास तथा मेट्रोपोलिटन क्षेत्र के संसाधनों से परस्पर लाभान्वित हो सके।

    ड्राफ्ट में ग्रोथ कॉरीडोर पर फोकस
    भोपाल मास्टर प्लान ड्राफ्ट में ग्रोथ कॉरीडोर पर फोकस किया गया है। इसमें निवेश सम्मत वातावरण तैयार करने के दृष्टिकोण से 51 किलोमीटर लम्बे ग्रोथ कॉरीडोर की परिकल्पना की गई है। यह ग्रोथ कॉरीडोर एजुकेशन नॉलेज आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (EKAI) सिटी, एयरपोर्ट, प्रस्तावित सीएमयू, लॉजिस्टिक भंडारण एवं थोक परिक्षेत्र के साथ-साथ विभिन्न उपनगरों को भी जोड़ता है। इस कॉरीडोर पर मिश्रित उपयोग के साथ उच्च घनत्व का विकास परिकल्पित है। इस कॉरीडोर में लोक परिवहन के लिए बीआरटीएस कॉरीडोर प्रस्तावित है, जिसका भविष्य में एमआरटीएस में उन्नयन किया जा सकेगा। इस क्षेत्र में होटल एवं हास्पिटेलिटी, स्वास्थ्य सेवा, अन्य व्यापार, आईटी सेक्टर, एआई एवं डाटा सेन्टर, लॉजिस्टिक, थोक व्यापार, हाईपर मार्केट, मॉल मल्टीप्लेक्स, कार्पोरेट ऑफिस, विभिन्न संस्थान, ऐजुकेशन हब, हाउसिंग इत्यादि जैसे रोजगार उन्मुखी गतिविधियां, मिश्रित उपयोग के रूप में विकसित किए जा सकेंगे। इस क्षेत्र में असीमित एफएआर के प्रावधान रखे गए हैं। ग्रोथ कॉरीडोर को विभिन्न रेडियल मार्गों से नगर से जोड़ते हुए टांसिट उन्नमुख जोन (TOD) के रूप में विकसित किया जाएगा। नगर के बाहर विभिन्न दिशाओं से आने वाले क्षेत्रीय मार्ग जैसे विदिशा मार्ग, रायसेन मार्ग, नर्मदापुरम मार्ग एवं इन्दौर मार्ग को ग्रोथ कॉरीडोर के माध्यम से नगर से जोड़ा जाएगा, जिससे मेट्रेपोलिटन क्षेत्र के विभिन्न भागो से बेहतर संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया गया है। ग्रोथ कॉरीडोर एवं इसके रेडियल मार्गों का विकास नगर विकास स्कीम के माध्यम से भोपाल विकास प्राधिकरण द्वारा किया जाएगा। निवेश क्षेत्र की बाहरी सीमा पर स्थित नवीन प्रस्तावित बायपास मार्ग को ग्रीन फील्ड कॉरीडोर के रूप में विकसित किया जाना प्रस्तावित है। ये मार्ग के दोनों ओर 50-50 मीटर भूमि हरित क्षेत्र के रूप में प्रस्तावित की गई है।

    बेहतर सामंजस्य पर जोर
    भोपाल मास्टर प्लान ड्राफ्ट में मिश्रित भूमि उपयोग के प्रस्ताव राज्य की टीओडी नीति के अनुरूप आवासीय उपयोग के तहत मार्ग की चौड़ाई के आधार पर मिक्स लेण्ड यूज प्रस्तावित किए गए हैं, ताकि कार्यस्थल एवं आवास (Work & Home) में बेहतर सामंजस्य स्थापित हो सके एवं नगर की मोबिलिटी भी लोक परिवहन आधारित हो सके। असीमित एफएआर एवं भवन ऊचाई नगरीय क्षेत्र की भूमि का अनुकूलतम उपयोग सुनिश्चित करने तथा निवेश मित्र वातावरण तैयार करने के उ‌द्देश्य से मार्ग की चौड़ाई के आधार पर एफएआर का निर्धारण किया गया है। अधिक चौड़े मार्गो पर स्थित भूमियों को एफएआर एवं भवन की ऊंचाई की सीमा से मुक्त रखा गया है। मास्टर पलान ड्राफ्ट में विकास मापदण्डों का सरलीकरण एवं युक्तियुक्तकरण विकास मापदण्डों में भूतल कवरेज को हटाया गया है, जिससे नागरिकों एवं विकासकर्ताओ को लाभ होगा एवं डिजाइन विकल्प उपलब्ध होंगे। भवनों के आसपास छोड़े जाने वाले एमओएस का भी पुर्ननिर्धारण इस प्रकार से किया गया है कि भूमि का अनुकूलतम उपयोग हो सके। विकास मापदण्डो का सरलीकरण किया गया है, जिससे आम नागरिक को समझने में कठिनाई न हो।

    शहर की हरियाली पर खासा ध्यान
    भोपाल मास्टर प्लान 2005 में हरित क्षेत्र लगभग 16 प्रतिशत निर्दिष्ट था, जिसको बढ़ाकर भोपाल विकास योजना-2047 में लगभग 27 प्रतिशत किया गया है, जो कि यूआरडीपीएफआई गाइडलाइन के मानकों से कहीं अधिक है। भानपुर खंती के पुर्नविकास के लिए इस पर गोल्फ कोर्स प्रस्तावित किया गया है। इसके अतिरिक्त कॉलोनी स्तर पर भी खुला क्षेत्र 10 प्रतिशत से बढाकर 12 प्रतिशत किया गया है। इससे हरित क्षेत्र में अतिरिक्त वृद्धि होगी। इसके अलावा सर्विस एरिया हेतु भी 2 प्रतिशत का क्षेत्रफल रखा जाना आवश्यक होगा। विकास योजना के कियान्वयन हेतु पूँजी संग्रहण विकास योजना में प्रीमियम ऑन एफएआर, प्रशमन इत्यादि के माध्यम से स्थानीय निकाय की आय में उल्लेखनीय वृद्धि होगी, जिसका उपयोग विकास योजना के क्रियान्वयन में किया जाना संभव हो सकेगा। इससे विकास योजना के यथासमय क्रियान्वयन में सहयोग प्राप्त हो सकेगा। भोपाल मास्टर प्लान ड्राफ्ट में क्रिएटिव रीडेवलपमेंट के माध्यम से पुर्नविकास नगर के विकसित क्षेत्रों में भूमि का अनुकूलतम उपयोग संभव हो सके इस दृष्टिकोण से भूखण्डों का संविलियन, बेस एफएआर में छूट इत्यादि जैसे पुर्नविकास को प्रोत्साहन देने वाले प्रावधान रखे गए हैं। इसके अतिरिक्त 70 प्रतिशत रहवासियों की सहमति होने पर आरडब्ल्यूए आवासीय अपार्टमेंट का पुर्नविकास कर सकेगी। शहर में अधिकाधिक अर्कोडेवल हाउसिंग निर्मित हो सकें इसके लिए ऐसी परियोजनाओं को एफएआर कय करने की बाध्यता से मुक्त रखा गया है। इसके अतिरिक्त नगर में प्रवासी नागरिकों के लिए रेंटल हाउसिंग विकसित हो सके इसके लिए भी प्रोत्साहन रखे गए हैं। हरित टीडीआर के प्रावधान विकास योजना में प्रस्तावित आमोद-प्रमोद के क्षेत्र में आने वाले भूमि स्वामियों की क्षतिपूर्ति हो इसी प्रकार हेरिटेज टीडीआर के प्रावधान भी रखे गए हैं।

    सुरक्षा व्यवस्था होगी चाक-चौबंध
    विकास योजना के कियान्वयन का प्रभावी पर्यवेक्षण रियल टाईम पर्यवेक्षण संभव हो सके और अप्राधिकृत निर्माण तथा नगर की मोबिलिटी एवं क्रियान्वयन की समस्याओं का यथासमय निराकरण हो सके, इसके लिए डिजीटल ट्विन सिटी की व्यवस्था रखे जाने के प्रस्ताव भोपाल मास्टर प्लान ड्राफ्ट में दिए गए हैं। मास्टर प्लान ड्राफ्ट में शहर की सुरक्षा व्यवस्था सुदृढ़ हो सके, इसके लिए भी प्रावधान रखे गए हैं। इसमें सार्वजनिक स्थानों पर लगाए गए निजी सीसीटीवी कैमरो की नेटवर्किंग, सार्वजनिक भवनों की बाउण्ड्री वॉल को पारदर्शी रखने, सुरक्षित यातायात व्यवस्था के प्रावधान सम्मिलित हैं। भोपाल मास्टर प्लान ड्राफ्ट में मल्टीलेवल पार्किंग, मेकेनाईज्ड पार्किंग, सामुदायिक खुले क्षेत्रों के नीचे पार्किंग की व्यवस्था, आरओबी-फ्लाईओवर के नीचे पार्किंग व्यवस्था, सार्वजनिक मार्गो पर आरडब्ल्यूए द्वारा पार्किंग शुल्क लेने के लिए प्रावधान, बेसमेंट पार्किंग के लिए भूखण्डों का संयुक्तिकरण मान्य किए जाने जैसे प्रावधान रखे गए हैं।

    पढ़ाई और चैरिटी का भी रखा ध्यान
    भोपाल मास्टर प्लान ड्राफ्ट में यह प्रावधान भी किया गया है कि निजी विकासकर्ताओ द्वारा भी विकास योजना के मार्गों का निर्माण किया जा सके। इसके लिए शासकीय भूमि अथवा टीडीआर के माध्यम से भूमि अर्जन कर विकासकर्ता को उपलब्ध कराई जा सकेगी। भौंरी क्षेत्र में एजुकेशन हब के विकास के लिए एजुकेशन नॉलेज आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (EKAI) सिटी की परिकल्पना की गई है। चैरिटेबल गतिविधि जैसे अनाथ आश्रम, मूक बधिर विद्यालय एवं छात्रावास, दिव्यान्ग विशेष विद्यालय, वृद्धाश्रम, रैन बसेरा इत्यादि को एफएआर कय करने की बाध्यता से मुक्त रखा गया है। यह गतिविधियां आवासीय, सार्वजनिक, अर्धसार्वजनिक, मिश्रित, सीएमयू, टीओडी एवं कृषि उपयोग में स्वीकार्य रखी गई है।

    देश का प्रमुख महानगर है भोपाल
    भोपाल विकास योजना 1991 वर्ष 1975 में प्रकाशित की गई थी। भोपाल विकास योजना 2005 को 9 जून 1995 को प्रकाशित किया गया था, जिसका निवेश क्षेत्र 601.06 वर्ग किलोमीटर था और इसमें 146 ग्राम शामिल थे। भोपाल विकास योजना 2047 प्रारूप को 1016.90 वर्ग किलोमीटर के निवेश क्षेत्र हेतु तैयार किया गया है, जिसमें 254 ग्राम सम्मलित है तथा यह 45 लाख की आंकलित जनसंख्या हेतु तैयार की गई है। योजना में विकास योग्य प्रस्तावित क्षेत्रफल 61017.02 हेक्टेयर निर्धारित किया गया है। भोपाल प्रदेश की राजधानी होने के साथ साथ देश का एक प्रमुख महानगर भी है। यह नैसर्गिक सुन्दरता एवं प्राकृतिक धरोहर लिये हुये झीलो एवं पहाड़ो की नगरी, पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील नगर है। नगर में रामसर साइट के रूप में चिन्हित भोजताल (बडी झील), राष्ट्रीय उद्यान के साथ-साथ बाघ भ्रमण क्षेत्र भी स्थित हैं।

  • उज्जैन में सिंहस्थ 2028 का मेगा प्लान शुरू, CM मोहन यादव ने खुद चलाई गेती

    उज्जैन में सिंहस्थ 2028 का मेगा प्लान शुरू, CM मोहन यादव ने खुद चलाई गेती

    उज्जैन.

    सिंहस्थ महापर्व 2028 की तैयारियों के तहत शहर में सड़क चौड़ीकरण का काम तेज हो गया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने रविवार को अपने पैतृक मकान पर स्वयं गेती चलाकर सड़क चौड़ीकरण के लिए भवन हटाने की शुरुआत की।

    इसके साथ ही खजूर वाली मस्जिद से अब्दालपुरा, जीवाजीगंज थाना होते हुए गणेश चौक तक मार्ग के चौड़ीकरण की कार्यवाही प्रारंभ हो गई।

    730 मीटर लंबे मार्ग का होगा चौड़ीकरण
    करीब 730 मीटर लंबे मार्ग को 15 मीटर चौड़ा किया जाएगा। मार्ग चौड़ीकरण एवं विकास कार्य के लिए राज्य शासन द्वारा करीब 9.80 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की गई है।

    सिंहस्थ में सुगम यातायात के लिए महत्वपूर्ण कदम
    यह मार्ग शहर के महत्वपूर्ण और व्यस्त संपर्क मार्गों में शामिल है। सिंहस्थ महापर्व के दौरान उज्जैन में श्रद्धालुओं और वाहनों की संख्या बढ़ने की संभावना को देखते हुए मार्ग का चौड़ीकरण यातायात व्यवस्था को सुगम और व्यवस्थित बनाने में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • एक तरफ केन-बेतवा से पानी की आस, दूसरी तरफ 70 साल पुराना तनाव; MP-UP में जल की दो तस्वीरें

    एक तरफ केन-बेतवा से पानी की आस, दूसरी तरफ 70 साल पुराना तनाव; MP-UP में जल की दो तस्वीरें

    छतरपुर 
     मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों में पेयजल व सिंचाई के लिए पानी की पर्याप्त व्यवस्था करने के लिए देश की पहली नदी जोड़ो परियोजना केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट पर काम तीव्र गति से चल रहा है. ये परियोजना 2030 तक पूरा करने का लक्ष्य. वहीं, एक ऐसी परियोजना भी है, जिस पर मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश के दो जिलों के किसानों के बीच 7 दशक से तनाव व्याप्त है। 

    बांध हमारा तो पानी तुम्हारा क्यों?
    सिंचाई के मौसम में रनगुवां डैम का पानी लेने के लिए छतरपुर व बांदा जिले के किसान आमने-सामने आ जाते हैं. दोनों जिलों के किसानों के बीच ये विवाद करीब 7 दशक से चल रहा है. अब फिर रबी फसल की सिंचाई का मौसम सामने है, ऐसे में दोनों जिलों के किसान फिर आमने-सामने हैं और प्रशासन इनके सामने असहाय की मुद्रा में. ये डैम बना तो छतरपुर जिले में है लेकिन अधिकांश पानी पर हक बांदा जिले का है। 

    डैम पर पूरा नियंत्रण उत्तर प्रदेश के पास
    बीते दो साल छोड़ दिए जाएं तो मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड इलाका सूखे के लिए बदनाम रहा है. इसलिए यहां पानी को लेकर हमेशा युद्ध जैसी स्थिति रहती है. छतरपुर में आधा दर्जन से अधिक बांध होने के बावजूद सिंचाई साधनों की कमी है. रनगुवां बांध छतरपुर जिले में होने के बावजूद इसका पानी उत्तर प्रदेश के खेतों के लिए अमृत बना हुआ है. छतरपुर जिले के किसान हर साल सिंचाई के पानी के लिए तरसते हैं। 

    छतरपुर जिला मुख्यालय से 45 किलोमीटर दूर राजनगर इलाके से निकली केन की सहायक पर रनगुवां डैम बना है. इस डैम का निर्माण 1957 में एमपी और यूपी के संयुक्त उपक्रम के रूप में किया गया. ये बांध भले ही मध्य प्रदेश के छतरपुर सीमा में है लेकिन इसका प्रशासनिक नियंत्रण और रखरखाव उत्तर प्रदेश का बांदा जिले का सिंचाई विभाग करता है। 

    किसानों में फिर रोष, आंदोलन की चेतावनी
    छतरपुर के रनगुवां के किसान कमलेश रैकवार कहते हैं "बांध उनके क्षेत्र में होने के बावजूद उनके हक का पानी उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती गांवों में जाता है. यूपी के बांदा जिले को पानी ज्यादा दिया जाता है, जिससे यहां के किसानों की फसलें सूखने लगती हैं. हमारे हिस्से का पानी भी यूपी के किसान निकालते हैं. हम लोगों की खेती समय से नहीं हो पाती। 

    कम बारिश होने की स्थिति में बांध में पानी का स्तर कम होता है, तब यह विवाद उग्र होने लगता है. छतरपुर जिले के किसान संघ के अध्यक्ष अयोध्या प्रसाद पटेल कहते हैं "यह विवाद पीढ़ियों से चला आ रहा है. कई बार यह मुद्दा किसानों ने उठाया है. छतरपुर जिले की सीमा में बांध बना है लेकिन यहां किसानों को पानी नहीं मिल रहा. अब किसानों के पास आंदोलन के अलावा कोई चारा नहीं है. किसानों को उनके हक का पानी मिलेगा। 

    52 साल पहले हुआ था दोनों राज्यों के बीच एग्रीमेंट
    रनगुवां डैम के पानी के बंटवारे को लेकर एग्रीमेंट 1 अगस्त 1972 को हुआ था. उस समय मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रकाश चंद सेठी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलपति त्रिपाठी ने इस अनुबंध पर हस्ताक्षर किए थे. अनुबंध के अनुसार रनगुवां डैम का 30 प्रतिशत पानी मध्य प्रदेश के छतरपुर और 70 प्रतिशत पानी यूपी के बांदा को मिल रहा है। 

    रनगुवां के किसान मुन्ना अहिरवार कहते हैं "जब सिंचाई का सीजन शुरू होता है तो यूपी वाले पानी रोक देते हैं. हम लोगों की फसल चौपट हो जाती है. कई बार आवाज उठाई लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ." छतरपुर के जल संसाधन विभाग के कार्यपालन यंत्री राकेश वर्मा कहते हैं राजनगर इलाके में बने रनगुवां बांध से राजनगर इलाके के 35 गांवों मे सिंचाई होती है. यूपी के बांदा जिले के लगभग 95 गांवों की खेती को रनगुवा बांध पानी देता है. रनगुवा बांध की लंबाई 2 हजार 72 मीटर और ऊंचाई 27.400 मीटर है. इसकी जलभराव क्षमता 155 MCM है। 

    केन-बेतवा लिंक परियोजना पूरी होने पर खत्म होगा विवाद
    रनगुवां डैम के पानी वितरण को लेकर मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश के किसानों के बीच दशकों से चला आ रहा तनाव केन-बेतवा लिंक परियोजना का काम पूरा होने के बाद खत्म होने की संभावना है. इस परियोजना पर काम तेज गति से चल रहा है. छतरपुर के ADM विनय द्विवेदी कहते हैं " केन-बेतवा लिंक परियोजना से सूखे बुन्देलखंड में पानी के संकट से लोगों को छुटकारा मिलेगा. किसानों के खेतों में हरियाली लहराएगी. परियोजना वर्ष 2030 तक पूरा करने का लक्ष्य है. परियोजना की कुल लागत ₹44,605 करोड़ रुपये है. परियोजना के तहत केन नदी पर 96.7 मीटर ऊंचा और 2 से 2.5 किमी चौड़ा डैम बनेगा। 

    सिंचाई के अलावा पेयजल संकट सुलझेगा
    केन-बेतवा लिंक परियोजना से मध्य प्रदेश के 10 जिलों में 8.11 लाख हेक्टेयर और उत्तरप्रदेश के 4 जिलों में 2.51 लाख हेक्टेयर मिलाकर कुल 10.62 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होगी. दोनों राज्यों के करीब 65 लाख लोगों को पेयजल की सुविधा मिलेगी. MP के छतरपुर, पन्ना, टीकमगढ़, सागर, दमोह, दतिया, विदिशा, शिवपुरी, रायसेन और UP जिले बांदा, महोबा, झांसी और ललितपुर जिलों के लिए केन-बेतवा लिंक परियोजना वरदान साबित होगी। 

  • MP Seekho Kamao Yojana: ट्रेनिंग के साथ कमाई का अवसर, 15 अक्टूबर तक कराएं ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन

    MP Seekho Kamao Yojana: ट्रेनिंग के साथ कमाई का अवसर, 15 अक्टूबर तक कराएं ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन

    भोपाल
     मध्य प्रदेश में अब 'सीखो-कमाओ योजना' के जरिए मोहन सरकार की युवाओं को रोजगार देने की तैयारी है. डिग्री डिप्लोमा के बाद नौकरी तलाश रहे नौजवान इस योजना के जरिए एक साल की ट्रेनिंग ले सकेंगे. खास बात ये है कि ट्रेनिंग के दौरान भी इन्हें कमाने का अवसर मिलेगा. इस योजना के लिए आयु सीमा 18 से 29 वर्ष है. 15 अक्टूबर तक ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करवाया जा सकता है। 

    ऑन द जॉब ट्रेनिंग, एक साल की ट्रेनिंग में इतना स्टाइपेंड
    पॉवर प्रोडक्शन के क्षेत्र में व्यावहारिक प्रशिक्षण का ये मौका है. मध्य प्रदेश पावर जनरेटिंग कंपनी लिमिटेड ने मुख्यमंत्री सीखो-कमाओ योजना में ये मौका दिया है. इसमें 559 ऑन-द-जॉब ट्रेनिंग पद उपलब्ध कराए हैं. डिग्री, डिप्लोमा के अलावा अन्य निर्धारित शैक्षणिक योग्यता के बाद नौकरी की तलाश कर रहे नौजवान इस योजना के जरिए कंपनी के विभिन्न कार्यालयों एवं विद्युत गृहों में एक वर्ष का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त कर सकेंगे. ट्रेनिंग लेने पर प्रशिक्षण अवधि के दौरान 8 हजार रुपये से लेकर 10 हजार रुपये प्रतिमाह तक स्टाइपेंड भी दिया जाएगा। 

    यहां होगी ट्रेनिंग और ऐसे मिलेगा नौकरी का मौका
    मुख्यमंत्री सीखो-कमाओ योजना के अंतर्गत युवाओं को जबलपुर स्थित पावर कंपनी मुख्यालय के साथ प्रदेश में स्थित विभिन्न जल एवं ताप विद्युत गृहों में कार्य करते हुए व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करने का अवसर मिलेगा. योजना के अंतर्गत इलेक्ट्रीशियन, इन्फॉर्मेशन एंड कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी एवं सिस्टम मेंटेनेंस, कंप्यूटर ऑपरेटर एवं प्रोग्रामिंग असिस्टेंट, स्टेनो (हिन्दी/अंग्रेजी), सिविल इंजीनियरिंग, मानव संसाधन, अकाउंट्स सहित विभिन्न कार्यश्रेणियों में प्रशिक्षण के अवसर उपलब्ध कराए गए हैं. इससे युवाओं को अपनी शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप विद्युत उत्पादन एवं कंपनी के विभिन्न कार्यक्षेत्रों की कार्यप्रणाली को नजदीक से समझने का अवसर मिलेगा। 

    एक वर्ष की प्रशिक्षण अवधि, प्रशिक्षण के बाद स्टाइपेंड
    ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद निर्धारित पात्रता के अनुसार अभ्यर्थियों का चयन किया जाएगा. चयनित प्रशिक्षणार्थियों को उनके द्वारा चयनित कार्यश्रेणी व जिले के अनुरूप कंपनी के विभिन्न विद्युत गृहों एवं कार्यालयों में प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा. प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रारंभ होने के एक माह बाद प्रशिक्षणार्थियों को पात्रता के अनुसार 8 हजार से 10 हजार प्रतिमाह स्टाइपेंड का भुगतान प्रारंभ होगा. प्रशिक्षण की कुल अवधि एक वर्ष निर्धारित है। 

    18-29 वर्ष के मध्य प्रदेश के स्थानीय निवासी कर सकते हैं आवेदन
    योजना का लाभ लेने के लिए आवेदक का मध्य प्रदेश का स्थानीय निवासी होना आवश्यक है. अभ्यर्थी की आयु 18 से 29 वर्ष के मध्य होनी चाहिए. शैक्षणिक योग्यता के अंतर्गत निर्धारित कार्यश्रेणी के अनुसार 12वीं, आईटीआई, डिप्लोमा अथवा स्नातक उत्तीर्ण होना आवश्यक है. मुख्यमंत्री सीखो-कमाओ योजना के अंतर्गत आवेदन प्रक्रिया 23 सितंबर 2026 से प्रारंभ हो चुकी है. इच्छुक एवं पात्र अभ्यर्थी 15 अक्टूबर की रात 11:59 बजे तक ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। 

    ऑनलाइन पोर्टल से ही होगा आवेदन
    इच्छुक अभ्यर्थियों को मुख्यमंत्री सीखो-कमाओ योजना के ऑनलाइन पोर्टल https://mmsky.mp.gov.in/Web/Candidate/Registration के माध्यम से आवेदन करना होगा. योजना में पंजीयन के लिए समग्र आईडी एवं आधार की ई-केवाईसी आवश्यक है. अभ्यर्थियों को ध्यान रखना होगा कि मुख्यमंत्री सीखो-कमाओ योजना के अंतर्गत उपलब्ध ये पद प्रशिक्षण हेतु हैं तथा इन्हें नियमित नौकरी अथवा स्थायी रोजगार के रूप में नहीं माना जाएगा. आवेदन से संबंधित किसी भी प्रकार की कठिनाई अथवा जानकारी के लिए अभ्यर्थी अपने संबंधित जिला स्तरीय आईटीआई से संपर्क कर सकते हैं। 

  • क्रूज से बोट तक नए नियम लागू होंगे, MP में बनेगी अलग जल परिवहन अथॉरिटी

    क्रूज से बोट तक नए नियम लागू होंगे, MP में बनेगी अलग जल परिवहन अथॉरिटी

    भोपाल
     मध्यप्रदेश में अब पानी के रास्ते सफर का पूरा सिस्टम बदलने की तैयारी है। बड़े तालाब, नदियों और बांधों में चलने वाले क्रूज, बोट और दूसरे जल परिवहन साधनों के लिए अलग अथॉरिटी बनाई जाएगी। इसके जरिए यह तय होगा कि पानी के जहाजों का रजिस्ट्रेशन कौन करेगा, संचालन के नियम क्या होंगे और जल परिवहन की जिम्मेदारी किस विभाग के पास रहेगी।

    अभी राज्य में जल परिवहन का इस्तेमाल मुख्य रूप से पर्यटन गतिविधियों के लिए किया जाता है। नई व्यवस्था के बाद इसे पर्यटन से आगे ले जाकर व्यवस्थित इनलैंड वॉटर ट्रांसपोर्ट सिस्टम के रूप में विकसित करने की तैयारी है।

    क्रूज-बोट के लिए अलग नियम होंगे
    अथॉरिटी बनने के बाद क्रूज, बोट और अन्य जलयान मनमाने तरीके से संचालित नहीं होंगे। इनके संचालन और रजिस्ट्रेशन के लिए नियम तय किए जाएंगे। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाएगा कि अलग-अलग जल क्षेत्रों में किस तरह के जलयान चल सकेंगे और उनकी संचालन व्यवस्था किस विभाग के अधीन होगी।

    मुख्य सचिव की अध्यक्षता में कमेटी
    अथॉरिटी के गठन और नियमों का खाका तैयार करने के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में कमेटी बनाई गई है। इस कमेटी में वित्त, परिवहन, जल संसाधन, नर्मदा घाटी विकास, विधि और पर्यटन विभाग के अधिकारियों के साथ इनलैंड वॉटरवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया (IWAI) के प्रतिनिधि भी शामिल हैं। यानी नई व्यवस्था तैयार करते समय परिवहन के साथ पर्यटन और जल संसाधन से जुड़े पहलुओं को भी साथ रखा जा रहा है।

    सबसे बड़ा सवाल. कौन करेगा संचालन?
    नई अथॉरिटी के सामने अहम काम यह तय करना होगा कि जलयानों का रजिस्ट्रेशन और संचालन किस विभाग के जिम्मे रहेगा। अलग-अलग राज्यों में इसकी व्यवस्था अलग है। उत्तर प्रदेश और असम जैसे राज्यों में परिवहन विभाग की भूमिका है, जबकि गुजरात और तटीय क्षेत्रों में मरीन विभाग इस तरह की जिम्मेदारी संभालता है। मध्यप्रदेश में किस मॉडल को अपनाया जाए, इस पर कमेटी की सिफारिश के आधार पर आगे फैसला होगा।

    पर्यटन से ट्रांसपोर्ट तक बढ़ेगा दायरा
    अभी भोपाल के बड़े तालाब समेत प्रदेश के कई जल क्षेत्रों में बोट और क्रूज मुख्य रूप से पर्यटन का हिस्सा हैं। नई अथॉरिटी का उद्देश्य केवल पर्यटकों के लिए जलयान चलाना नहीं होगा। इसके जरिए इनलैंड वॉटर ट्रांसपोर्ट को एक अलग परिवहन माध्यम के तौर पर विकसित करने की संभावनाएं भी देखी जाएंगी। इससे भविष्य में जल मार्गों का इस्तेमाल यात्री या अन्य परिवहन गतिविधियों के लिए किए जाने का रास्ता तैयार हो सकता है।

    दूसरे राज्यों तक भी पहुंच सकता है जल परिवहन
    नई व्यवस्था का दायरा मध्यप्रदेश की सीमाओं तक सीमित रखने की योजना नहीं है। अथॉरिटी बनने के बाद अंतरराज्यीय जल परिवहन की संभावनाओं पर भी काम किया जा सकता है। इसके लिए दूसरे राज्यों के साथ जल मार्गों की कनेक्टिविटी, नियम और संचालन व्यवस्था जैसे पहलुओं पर आगे रूपरेखा तैयार होगी।

    अब पानी पर भी बनेगा ट्रांसपोर्ट का सिस्टम
    मध्यप्रदेश में बड़ी नदियों और जलाशयों का नेटवर्क है। ऐसे में नई अथॉरिटी के गठन से पहली बार जल परिवहन को लेकर एक केंद्रीकृत नियामक व्यवस्था तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ेगा। क्रूज और पर्यटन बोट से शुरू होने वाली यह व्यवस्था आगे यात्री परिवहन और अंतरराज्यीय जल कनेक्टिविटी तक पहुंचती है या नहीं, यह अथॉरिटी के नियम और सरकार के अगले फैसलों पर निर्भर करेगा।

  • राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा से बदलेगी शिक्षण पद्धति, 28 सितंबर से उन्मुखीकरण

    राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा से बदलेगी शिक्षण पद्धति, 28 सितंबर से उन्मुखीकरण

    राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा से और समृद्ध होगी माध्यमिक कक्षाओं की शिक्षण पद्धति

    28 सितम्बर से राज्य स्तरीय विषय विशेषज्ञों का उन्मुखीकरण, शिक्षण में नए आयामों और नवाचारों पर होगा फोकस

    भोपाल 

    मध्यप्रदेश में कक्षा 6वीं से 8वीं तक के विद्यार्थियों के शिक्षण-अधिगम को नई दिशा देने के लिए माध्यमिक शिक्षकों को नई एनसीईआरटी पाठ्य पुस्तकों की शिक्षण पद्धति और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा-2023 की अनुशंसाओं के अनुरूप प्रशिक्षित किया जाएगा। संचालक राज्य शिक्षा केंद्र हरजिंदर सिंह ने बताया कि सत्र 2026-27 में गणित, विज्ञान एवं सामाजिक विज्ञान पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए प्रशिक्षण की श्रृंखला शुरू की जा रही है। प्रथम चरण 28 सितम्बर से शुरू होगा और 1 अक्टूबर 2026 तक चलेगा। इस दौरान चयनित एसआरजी (राज्य संसाधन समूह) विषय विशेषज्ञों का चार दिवसीय राज्य स्तरीय उन्मुखीकरण कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। यह प्रशिक्षण राज्य शिक्षा केंद्र द्वारा किया जाएगा। इस श्रृंखला के अगले चरण में राज्य से चयनित मास्टर ट्रेनर्स का 5-दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण 5 अक्टूबर से 6 नवम्बर तक संभागीय मुख्यालयों की डाइट में होगा। इसके पश्चात ब्लॉक स्तर पर कक्षा 6वीं से 8वीं तक गणित, विज्ञान एवं सामाजिक विज्ञान पढ़ाने वाले समस्त माध्यमिक शिक्षकों का प्रशिक्षण 12 अक्टूबर से 20 नवम्बर तक आयोजित किया जाएगा।

    नई पाठ्य पुस्तकों की नई एप्रोच पर होगा फोकस

    संचालक सिंह ने बताया कि एसआरजी उन्मुखीकरण कार्यक्रम में कक्षा 7 की नई पाठ्य पुस्तकों में अपनाई गई नई एप्रोच, गतिविधि आधारित शिक्षण तथा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा-2023 की अनुशंसाओं के अनुरूप प्रभावी शिक्षण पद्धतियों पर विषय विशेषज्ञों का उन्मुखीकरण किया जाएगा। इसका उद्देश्य एसआरजी को इस प्रकार तैयार करना है कि वे आगामी प्रशिक्षणों में मास्टर ट्रेनर्स एवं शिक्षकों को नई पाठ्य पुस्तकों की अवधारणा और शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावी ढंग से समझा सकें।

    चार दिवसीय उन्मुखीकरण कार्यक्रम में विषय आधारित प्रशिक्षण के साथ शिक्षकों के समग्र व्यावसायिक विकास से जुड़े नवाचारी विषयों को भी शामिल किया गया है। इनमें जॉयफुल लर्निंग, मानसिक स्वास्थ्य, नैतिकता एवं मूल्य, आईजीओटी पोर्टल-केकेके, कौशल बोध तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे विषय प्रमुख हैं। प्रशिक्षण के दौरान शिक्षण-अधिगम सामग्री (टीएलएम) तैयार करने की गतिविधि भी कराई जाएगी, जिससे शिक्षक कक्षा में अवधारणाओं को अधिक प्रभावी और रोचक तरीके से विद्यार्थियों तक पहुंचा सकें। उन्होंने बताया कि एसआरजी के राज्य स्तरीय उन्मुखीकरण में राज्य शिक्षा केंद्र के विषय विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। प्रशिक्षण कार्यक्रम में पीपल संस्था द्वारा सहयोगी भूमिका निभाई जाएगी। शिक्षकों के प्रशिक्षण तक यह पूरी श्रृंखला नई एनसीईआरटी पाठ्य पुस्तकों के अनुरूप शिक्षण प्रक्रिया को विद्यालय स्तर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

     

  • MP में निकाय चुनाव की टाइमिंग बदलेगी? परिसीमन और नए निकायों का काम अटकने से 6 महीने की देरी के संकेत

    MP में निकाय चुनाव की टाइमिंग बदलेगी? परिसीमन और नए निकायों का काम अटकने से 6 महीने की देरी के संकेत

    भोपाल
     मध्य प्रदेश में अगले साल प्रस्तावित नगरीय निकाय चुनाव प्रशासनिक प्रक्रियाओं और सियासी टाइमिंग के बीच उलझते नजर आ रहे हैं। जनगणना के कार्य के पूरा होने तक वार्डों के परिसीमन और नए नगरीय निकायों के गठन का काम अटकने के कारण चुनाव कार्यक्रम करीब छह महीने आगे खिसकने की पूरी संभावना बन रही है।

    परिसीमन और जनगणना का पेंच
    प्रदेश के कुल 413 नगरीय निकायों (जिसमें 16 नगर निगम, 99 नगर पालिका और 298 नगर परिषद शामिल हैं) में 7,679 पार्षद पदों के साथ-साथ महापौर और अध्यक्ष पदों के चुनाव होने हैं। हालांकि, इन चुनावों की राह में जनगणना के आधिकारिक आंकड़ों का इंतजार सबसे बड़ा रोड़ा बन गया है। आबादी के नए आंकड़ों के बिना वार्डों का परिसीमन और आरक्षण तय करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। इसके अलावा, सरकार द्वारा कुछ ग्रामीण पंचायतों को मिलाकर नई नगर परिषद बनाने की घोषणा भी की गई है, जिस पर जनगणना पूरी होने तक विराम लग गया है।

    आयोग की तैयारी बनाम सरकार के अधिकार क्षेत्र
        राज्य निर्वाचन आयोग ने अपनी ओर से तैयारियां लगभग पूरी कर ली हैं, जिसके तहत मतदाता सूची को अपडेट किया जा चुका है और ईवीएम की मांग का प्रस्ताव भी सरकार को भेज दिया गया है।

        आयोग का स्पष्ट कहना है कि कार्यकाल पूरा होने से पहले चुनाव कराना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है, जबकि वार्ड परिसीमन, नए निकायों का गठन और आरक्षण की पूरी प्रक्रिया राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आती है।

    प्रत्यक्ष प्रणाली और राजनीतिक समीकरण
    इस बार नगर पालिका और नगर परिषद अध्यक्षों के चुनाव भी प्रत्यक्ष प्रणाली से ही कराए जाने का प्रावधान है। इसके अलावा एससी, एसटी, ओबीसी और महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण के नियम के चलते परिसीमन के बाद सीटों का समीकरण पूरी तरह बदल सकता है। राजनीतिक दल इस चुनाव को आगामी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अपनी जमीनी पकड़ मजबूत करने के बड़े अवसर के रूप में देख रहे हैं, लेकिन चुनाव में देरी होने से दलों की पूरी चुनावी रणनीति और टिकट वितरण के समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।

  • लहसुन में छिपा कैंसर से लड़ने वाला राज! सागर यूनिवर्सिटी स्कॉलर UK में कराएगा पेटेंट

    लहसुन में छिपा कैंसर से लड़ने वाला राज! सागर यूनिवर्सिटी स्कॉलर UK में कराएगा पेटेंट

    सागर
    वैसे तो लहसुन में कई ऐसे गुण पाए जाते हैं, जो मानव स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद होते हैं. लेकिन लहसुन में पाए जाने वाले एंटी कैंसर गुण का फायदा लहसुन को सीधे खाने से नहीं मिलता. सागर यूनिवर्सिटी के बायोटेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट के रिसर्च स्कॉलर मनीष कुमार मांझी ने लहसुन में ऐसे कंपाउंड की खोज की है, जो कैंसर के इलाज में कारगर साबित हुआ है. खास बात ये है कि मुंबई के ACTREC (Advanced Centre for Treatment, Research and Education in Cancer) ने इस रिसर्च पर मुहर लगाई है। 

    रिसर्च का स्तन कैंसर की कोशिकाओं पर टारगेटेड थेरेपी के जरिए सफल प्रयोग भी किया गया. ये कैंसर के अलावा दूसरी स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान नहीं पहुंचाता है. अब बायोटेक्नोलॉजी रिसर्च का यूके पेटेंट लेने की तैयारी कर रहा है. वहीं इसका मेडिसिन के रूप में उपयोग हो सके, इसलिए क्लिनिकल ट्रायल की भी तैयारी की जा रही है। 

    बॉयोटेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट की रिसर्च
    डॉ. हरीसिंह गौर यूनिवर्सिटी के बॉयोटेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट के रिसर्च स्कॉलर मनीष कुमार मांझी ने रिसर्च डिपार्टमेंट के असि. प्रोफेसर डॉ सी पी उपाध्याय के मार्गदर्शन में की है. इस रिसर्च की खासियत ये है कि इसमें लहसुन के एंटी कैंसर गुणों का उपयोग कर ऐसा बसायुक्त नैनो पार्टिकल तैयार किया गया, जो टारगेट डिलीवरी के जरिए सीधा कैंसर कोशिकाओं पर काम करता है और दूसरी स्वस्थ कोशिकाओं को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाता है, ये पूरी तरह से जैविक है। 

    रिसर्च स्कॉलर मनीष मांझी बताते हैं कि, ''स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में लहसुन का उपयोग सदियों से होता रहा है. लहसुन में कई तरह के बायोटेक कंपाउंड पाए जाते हैं. हमने उन कंपाउंड को एक्सट्रैक्ट करके उसकी एंटी कैंसर प्रॉपर्टी पर काम किया है. स्तन कैंसर की कोशिकाओं पर इसका परीक्षण किया गया, इसके काफी अच्छे परिणाम सामने आए हैं। 

    एंटी कैंसर गुणों से भरपूर लहसुन
    कई बीमारियों के इलाज में कारगर लहसुन में एंटी कैंसर गुण भी पाए जाते हैं. लेकिन जब इसे भोजन में उपयोग करते हैं, तो इसके एंटी कैंसर गुणों का फायदा शरीर को नहीं मिलता है. क्योंकि मानव शरीर लहसुन में पाए जाने वाले एंटी कैंसर कंपाउंड को अवशोषित नहीं कर पाता है. इस रिसर्च में इसी एंटी कैंसर कंपाउंड की खोज कर एक वसायुक्त नैनो पार्टिकल तैयार किया गया. जिसे टारगेट डिलीवरी के जरिए कैंसर कोशिकाओं तक पहुंचाया जाता है. ये कंपाउंड शरीर की दूसरी स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाए बिना कैंसर कोशिकाओं को खत्म करने का काम करता है। 

    सागर यूनिवर्सिटी के बायोटेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट की रिसर्च का मुंबई की ACTREC (Advanced Centre for Treatment, Research and Education in Cancer) में परीक्षण किया गया, जो पूरी तरह सफल पाया गया. रिसर्च स्कॉलर मनीष कुमार मांझी बताते हैं कि, ''स्तन कैंसर के लिए जो दवाएं उपयोग होती हैं, वह कैंसर के साथ-साथ शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती हैं. लेकिन हमने नैनो टेक्नोलॉजी के जरिए लहसुन का ऑर्गेनिक कंपाउंड वाला नैनोपार्टिकल बनाया, जो ज्यादा प्रभावी है. ये शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं को प्रभावित किए बिना कैंसर की कोशिकाओं पर काम करता है। 

    पेटेंट और क्लिनिकल ट्रायल की तैयारी
    रिसर्च गाइड असि. प्रोफेसर डॉ. सी पी उपाध्याय बताते हैं कि, ''लहसुन काफी गुणकारी है. लेकिन इसमें ऐसे कई तत्व होते हैं, जो मानव शरीर सीधे अवशोषित नहीं कर पाता है. जिससे लहसुन के गुणों का फायदा शरीर को नहीं मिल पाता है. ऐसी स्थिति में हमारा उद्देश्य था कि हमारे पास लहसुन के बारे में जो जानकारी है, उसके आधार पर ये पता लगाएं कि लहसुन में ऐसे कौन-कौन से कंपाउंड हैं. जिस पर काम कर सकते हैं. विशेष तौर पर हमने एंटी कैंसर कंपाउंड पर काम किया, जिसमें तीन तरह के कंपाउंड मिले. लेकिन एक कंपाउंड Diallyl Disulfide मिला, जो विशेष रूप से स्तन कैंसर (Breast Cancer) और कैंसर कोशिकाओं में जहरीलेपन को बढ़ाकर उन्हें खत्म करने और कैंसर सिग्नल्स को रोकने में मदद करता है। 

    डॉ. उपाध्याय बताते हैं कि, ''ये कंपाउंड लहसुन में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, लेकिन शरीर में अवशोषित नहीं होने के कारण हमने इसे आइसोलेट किया और वसायुक्त नैनो पार्टिकल बनाकर उस पर Diallyl Disulfide कंपाउंड को लोड किया. मुंबई में ACTREC में इसका परीक्षण कराया,तो पाया कि ये कैंसर की कोशिकाओं पर ही काम करता है और स्तन कैंसर को बड़ी तेजी से और प्रभावित तरीके से कम करता है. अब हम इसका यूके पेटेंट लेने की तैयारी कर रहे हैं और भविष्य में इसका उपयोग मेडिसिन के तौर पर हो सके, उसके लिए भी ट्रायल की तैयारी कर रहे हैं। 

  • MP को मिलेंगे 2 बड़े एक्सप्रेसवे, भोपाल-दिल्ली सफर होगा आसान; व्यापार को भी मिलेगी रफ्तार

    MP को मिलेंगे 2 बड़े एक्सप्रेसवे, भोपाल-दिल्ली सफर होगा आसान; व्यापार को भी मिलेगी रफ्तार

    सागर
     मध्य प्रदेश के रोड प्रोजेक्ट जहां देश के दूसरे राज्यों को बेहतर कनेक्टिवटी के लिए अहम भूमिका निभा रहे हैं. साथ ही मध्य प्रदेश के शहरों को देश के महानगरों से जोड़ने का काम कर रहे हैं. इसी कड़ी में मध्य प्रदेश में बन रहे दो एक्सप्रेस वे के चलते देश की राजधानी दिल्ली मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के करीब आ रही है. दरअसल, भोपाल ग्वालियर और ग्वालियर आगरा एक्सप्रेस वे से मध्य प्रदेश से उत्तरप्रदेश, राजस्थान और दिल्ली एनसीआर तक हाईस्पीड कनेक्टिवटी मिलने जा रही है। 

    भोपाल से ग्वालियर तक फोरलेन एक्सेस कंट्रोल्ड कारीडोर बनेगा, तो ग्वालियर से आगरा तक 6 लेन ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस वे बनेगा. इन दोनों एक्सप्रेस वे के कम्पलीट होने के बाद भोपाल से दिल्ली के बीच की दूरी में करीब 4 घंटे का फर्क आएगा. फिलहाल इस सफर में 11-12 घंटे लगते हैं. लेकिन इन दोनों प्रोजेक्ट के कम्पलीट होने पर 7-8 घंटे का समय लगेगा. फिलहाल इन प्रोजेक्ट के निर्माण के पहले की औपचारिकताएं पूरी हो रही हैं और एक अनुमान के मुताबिक, 2027 के अंत या 2028 की शुरूआत में इनका काम शुरू हो जाएगा। 

    भोपाल-ग्वालियर फोरलेन एक्सप्रेस वे
    भोपाल ग्वालियर फोरलेन एक्सप्रेस वे राजधानी भोपाल और ग्वालियर के बीच करीब 320 किमी का प्रोजेक्ट है. जो भोपाल के सूखी सेवनिया इलाके से शुरू होकर ब्यावरा, गुना, शिवपुरी होते हुए ग्वालियर तक पहुंचेगा. फिलहाल भोपाल से ग्वालियर का सफर तय करने में 425 किमी दूरी तय करना होती है, जो सीधे 100 किमी कम हो जाएगी और करीब 320 किमी का सफर तय करना होगा. फिलहाल भोपाल से ग्वालियर पहुंचने में 7-8 घंटे का समय लगता है, जो घटकर 5 से 6 घंटे रह जाएगा. मध्य प्रदेश सड़क विकास निगम (MPRDC) इस प्रोजेक्ट का DPR तैयार करने और टेंडर प्रक्रिया पर काम कर रहा है. एक अनुमान के मुताबिक 2027 के अंत या 2028 की शुरूआत में इसका काम शुरू हो जाएगा। 

    क्या कहते हैं जिम्मेदार
    पीडब्ल्यूडी मंत्री राकेश सिंह कहते हैं कि, ''ये दोनों प्रोजेक्ट मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल को दिल्ली से शानदार कनेक्टिवटी देने का काम करेंगे. इन प्रोजेक्ट का काम पूरा होते ही मध्य प्रदेश के भोपाल, ग्वालियर सहित मुरैना, गुना, शिवपुरी, राजस्थान का धौलपुर और यूपी के आगरा मथुरा के साथ बेहतर कनेक्टिविटी होगी, जो दिल्ली एनसीआर को जोड़ने का काम करेगी। 

    इस प्रोजेक्ट के कारण भोपाल के उत्तरी इलाके की प्रापर्टी में उछाल आएगा.खासकर सागर विदिशा रोड़ पर सूखी सेवनिया से जहां रोड शुरू होगी, वहां रियल एस्टेट से जुड़े प्रोजेक्ट की कीमत बढ़ेगी. गुना और ग्वालियर बाॅयपास से गुजरने वाले इस फोरलेन पर लाजस्टिक कंपनियां अपने गोदाम, कोल्ड स्टोरेज चैन और ट्रक टर्मिनल जैसे प्रोजेक्ट आ रहे हैं. एक प्रोजेक्ट पर एमपीआरडीसी और एक पर एनएचएआई काम कर रहा है। 

    ग्वालियर-आगरा 6 लेन ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस वे
    ग्वालियर से आगरा को जोड़ने के लिए 6 लेन ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस वे का प्रोजेक्ट प्रस्तावित है, जो ग्वालियर के सुसेरा बाॅयपास से शुरू होगा. जो राजस्थान के धौलपुर से आगरा, आगरा इनर रिंग रोड से मथुरा और मथुरा से दिल्ली एनसीआर को जोड़ देगा. इसकी लंबाई करीब 90 किमी होगी. इसकी प्रारंभिक लागत 4600 करोड़ आंकी गयी है. इस प्रोजेक्ट के लिए तीनों राज्यों में करीब 549 हेक्टेयर जमीन अधिग्रहित की जाएगी। 

    फिलहाल भोपाल से आगरा जाने में करीब 11-12 घंटे समय लगता है. इस सिक्स लेन प्रोजेक्ट के पूरा होने पर ये सफर 7 घंटे में पूरा जाएगा. फिलहाल इस प्रोजेक्ट के लिए तीनों राज्यों में जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हो गयी है. ये प्रोजेक्ट ग्वालियर से मुरैना और मुरैना से धौलपुर, धौलपुर से आगरा और आगरा मथुरा होते हुए दिल्ली एनसीआर से कनेक्ट किया जाएगा।