Category: मध्य प्रदेश

  • मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा से बदलेगा MP का सफर, 20 साल बाद लौटेगी सरकारी बस; 15 हजार बसों की तैयारी

    मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा से बदलेगा MP का सफर, 20 साल बाद लौटेगी सरकारी बस; 15 हजार बसों की तैयारी

    इंदौर
     इंदौर के ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर में दो दिवसीय 'यात्री परिवहन विजन समिट-2026' का औपचारिक शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि करीब दो दशकों के अंतराल के बाद राज्य सरकार सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्र में एक नया और आधुनिक मॉडल लागू करने जा रही है। इस पहल के तहत उन्नत तकनीक का उपयोग कर यात्रियों को अधिक सुगम, त्वरित और सुरक्षित आवागमन की सुविधाएं प्रदान की जाएंगी।

    सार्वजनिक परिवहन की मांग बढ़ी
    प्रदेश में लगातार बढ़ रही यात्रियों की संख्या का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने बताया कि राज्य के पास वर्तमान में 5 लाख किलोमीटर से अधिक का मजबूत सड़क नेटवर्क है। धार्मिक पर्यटन में आई अभूतपूर्व तेजी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जहां पूर्व में उज्जैन में वार्षिक आधार पर 60 से 70 लाख श्रद्धालु आते थे, वहीं हाल के दिनों में यह आंकड़ा बढ़कर 8 करोड़ के पार पहुंच गया है। इस बढ़ती आवाजाही को देखते हुए सुदृढ़ सार्वजनिक परिवहन ढांचा तैयार करना बेहद अनिवार्य हो गया है।

    निजी ऑपरेटरों के सहयोग से 15 हजार बसों का लक्ष्य
    'मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा' के अंतर्गत वर्ष 2030 तक राज्य भर में लगभग 15 हजार नई बसों का परिचालन शुरू करने की कार्य योजना है। सरकार इस पूरी व्यवस्था में निजी बस ऑपरेटरों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करेगी और उन्हें नवीनतम तकनीकों से लैस करेगी। 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक आयोजित होने वाले सेवा संकल्प माह के तहत 25 सितंबर को प्रदेशवासियों को इस नए परिवहन मॉडल की पहली आधिकारिक सौगात मिलेगी।

    इलेक्ट्रिक वाहनों और ग्रीन मोबिलिटी को विशेष प्रोत्साहन
    राज्य में बड़े पैमाने पर हो रहे इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) निर्माण का लाभ सबसे पहले प्रदेश के नागरिकों तक पहुंचाने की रणनीति तैयार की गई है। इंदौर मेट्रो के बाद अब इलेक्ट्रिक, हाइड्रोजन और फ्लेक्स-फ्यूल बसों के संचालन पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में शुरू हो रही यह सेवा नागरिकों के लिए एक नई शुरुआत होगी, जिसके तहत पारंपरिक भगवा रंग की बसें एक बार फिर आधुनिक सुविधाओं के साथ सड़कों पर सेवा देती नजर आएंगी।

     

  • डिंडोरी के साल वन पर मंडराया खतरा, बोरर बीटल संक्रमण से 1.46 लाख पेड़ होंगे प्रभावित; केंद्र ने दी मंजूरी

    डिंडोरी के साल वन पर मंडराया खतरा, बोरर बीटल संक्रमण से 1.46 लाख पेड़ होंगे प्रभावित; केंद्र ने दी मंजूरी

     डिंडोरी
     मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले में साल के जंगलों पर बोरर बीटल का संक्रमण गंभीर रूप ले चुका है। हजारों हेक्टेयर जंगल में फैल चुके इस संक्रमण को रोकने के लिए अब बड़े पैमाने पर संक्रमित पेड़ों की कटाई की जाएगी। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफ) ने बुधवार को राज्य सरकार के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।

    30 हजार हेक्टेयर से ज्यादा जंगल प्रभावित
    बोरर बीटल नामक कीट साल के पेड़ों को अंदर से खोखला कर देता है। अधिकारियों के मुताबिक इसका संक्रमण अब 30,344 हेक्टेयर वन क्षेत्र में फैल चुका है। जांच के दौरान कुल 1,46,784 संक्रमित साल के पेड़ों की पहचान की गई है। इन्हें संक्रमण को आगे फैलने से रोकने के लिए हटाया जाएगा।

    केंद्र की मंजूरी मिलने के बाद राज्य वन विभाग को बड़े स्तर पर सफाई और कटाई अभियान चलाने की अनुमति मिल गई है। विभाग के अनुसार पेड़ों की कटाई अक्टूबर तक शुरू की जाएगी।

    19 लाख बीटल के सिर भी नहीं रोक सके संक्रमण
    संक्रमण पर काबू पाने के लिए सरकारी इनाम की व्यवस्था भी की गई थी। इसके तहत आदिवासी ग्रामीणों ने करीब 19 लाख साल बोरर बीटल के सिर एकत्र किए। हालांकि, इतनी बड़ी संख्या में कीटों को खत्म करने के प्रयास के बावजूद संक्रमण को रोका नहीं जा सका।

    वैज्ञानिक रिपोर्ट के बाद मिली मंजूरी
    कृषि मंत्रालय के प्रमुख बीएस एनीगेरी ने बताया कि विभाग को पर्यावरण संरक्षण मंत्रालय से अनुमति मिल गई है और अक्टूबर तक पेड़ों की कटाई शुरू होगी। प्रस्तावित कटाई और इसके बाद किए जाने वाले वृक्षारोपण को लेकर राज्य सरकार से विस्तृत वैज्ञानिक, तकनीकी और पारिस्थितिक औचित्य मांगा गया था। इसके बाद केंद्र की ओर से कटाई की मंजूरी दी गई है।

  • प्लास्टिक कचरे से संवरा रोजगार, पन्ना की महिलाओं ने शुरू की अनोखी पहल; जंगल सफाई के साथ बढ़ी आमदनी

    प्लास्टिक कचरे से संवरा रोजगार, पन्ना की महिलाओं ने शुरू की अनोखी पहल; जंगल सफाई के साथ बढ़ी आमदनी

    पन्ना 

     पन्ना राष्ट्रीय उद्यान के आसपास के वन गांवों में कभी झाड़ियों और जंगल के किनारे दिखाई देने वाला प्लास्टिक अब ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार का जरिया बन रहा है। जिस कचरे से वन्यजीवों को खतरा पैदा होता था, उसे महिलाएं साफ करने के बाद प्रोसेस कर बैग, फोल्डर, स्टेशनरी और स्मृति चिन्ह जैसे उपयोगी उत्पाद तैयार कर रही हैं। इन उत्पादों को पर्यटक अपने साथ यादगार के तौर पर ले जा रहे हैं।

    2022 में शुरू हुआ प्रोजेक्ट क्लीन डेस्टिनेशंस
    मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड ने वर्ष 2022 में पन्ना पार्क में 'प्रोजेक्ट क्लीन डेस्टिनेशंस' शुरू किया था। इसका उद्देश्य बढ़ते प्लास्टिक कचरे से निपटने के लिए केवल समय-समय पर सफाई अभियान चलाना नहीं, बल्कि एक स्थायी और सामुदायिक कचरा प्रबंधन व्यवस्था तैयार करना था।

    यह पहल 14 ग्राम पंचायतों के 30 गांवों में लागू की गई। अब तक इन क्षेत्रों से 45 टन से अधिक कचरा एकत्र कर उसकी छंटाई और वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेसिंग की जा चुकी है।

    प्लास्टिक से तैयार हो रहे उपयोगी प्रोडक्ट
    कचरे की छंटाई के बाद करीब 42 प्रतिशत गैर-पुनर्चक्रण योग्य प्लास्टिक इकोकारी को भेजा जाता है। यह एक सामाजिक उद्यम है, जो प्लास्टिक को उपयोगी सामग्री में बदलने का काम करता है।

    इसके बाद गांवों की वर्कशॉप में महिलाएं प्रोसेस किए गए प्लास्टिक से अलग-अलग उत्पाद तैयार करती हैं। इसके लिए पारंपरिक चरखे और हथकरघे का इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह प्लास्टिक कचरे को उत्पाद में बदलने के साथ पारंपरिक कारीगरी को भी नए पर्यावरणीय उद्देश्य से जोड़ा गया है।

    महिलाओं के लिए रोजगार से आगे की पहल
    इस प्रोजेक्ट का मकसद केवल महिलाओं को काम या वेतन उपलब्ध कराना नहीं है। इसके जरिए ग्रामीण महिलाओं को प्रशिक्षण, आय और आर्थिक आत्मनिर्भरता के नए अवसर मिल रहे हैं। वहीं पर्यटकों के लिए तैयार किए गए स्मृति चिन्ह पन्ना के जंगलों और उन समुदायों से जुड़ी याद बन रहे हैं, जो इनके संरक्षण में योगदान दे रहे हैं।

    इस मॉडल में पर्यटन से पैदा होने वाला कचरा उसी गंतव्य के आसपास एकत्र होता है। फिर उसे स्थानीय स्तर पर अलग कर प्रोसेस किया जाता है और पारंपरिक शिल्प के जरिए नए उत्पाद में बदला जाता है। इसके बाद वही उत्पाद पर्यटन अर्थव्यवस्था में वापस पहुंचता है।

    2025 में बांधवगढ़ तक पहुंचा मॉडल
    पन्ना में शुरू हुआ यह प्रयोग अब आगे बढ़ चुका है। 2025 में मध्य प्रदेश ने इस मॉडल को बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के आसपास के गांवों तक विस्तार दिया। राज्य का ग्रामीण पर्यटन मिशन अब 100 से अधिक गांवों को कवर करता है और 300 से अधिक महिलाओं के स्वामित्व वाले होमस्टे और नेचर भ्रमण स्थलों को समर्थन दे रहा है।

    इसमें प्राणपुर भी शामिल है, जिसे भारत के पहले हथकरघा शिल्प गांव के रूप में प्रमोट किया जा रहा है। यहां महिलाएं हथकरघा कैफे भी संचालित करती हैं।

    स्वच्छ वातावरण के लिए मिला SKOCH Silver Award
    इस प्रोजेक्ट को 2025 में स्वच्छ वातावरण के लिए SKOCH Silver Award से सम्मानित किया गया। राज्य सरकार ने उद्योग मानकों के अनुरूप पर्यावरणीय, सामाजिक और शासन यानी ESG फ्रेमवर्क अपनाने का भी उल्लेख किया है।

    मध्य प्रदेश की जिम्मेदार पर्यटन रणनीति में प्लास्टिक-मुक्त वन्यजीव क्षेत्र, इलेक्ट्रिक-व्हीकल मोबिलिटी, कम-कार्बन आर्किटेक्चर और सामुदायिक आजीविका को एक साथ जोड़ा जा रहा है। ऐसे में पन्ना का मॉडल सिर्फ सफाई अभियान नहीं, बल्कि संरक्षण के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को जोड़ने वाली पहल के रूप में सामने आ रहा है।

  • गांधीसागर में बढ़ेगा चीतों का कुनबा! कूनो से 17 सितंबर को भेजी जा सकती है निर्वा या वीरा

    गांधीसागर में बढ़ेगा चीतों का कुनबा! कूनो से 17 सितंबर को भेजी जा सकती है निर्वा या वीरा

    श्योपुर
     प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन और भारत में चीता पुनर्वास परियोजना के चार वर्ष पूरे होने के मौके पर मध्य प्रदेश में चीतों को लेकर एक और बड़ा कदम उठाने की तैयारी है। 17 सितंबर को कूनो नेशनल पार्क से एक मादा चीता को गांधीसागर राष्ट्रीय अभयारण्य में शिफ्ट किए जाने की योजना पर विचार चल रहा है। हालांकि, शिफ्टिंग का अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अनुमति के बाद ही लिया जाएगा।

    अभी यह भी तय नहीं हुआ है कि कूनो से किस मादा चीता को गांधीसागर भेजा जाएगा। सूत्रों के अनुसार, निर्वा और वीरा में से किसी एक को गांधीसागर भेजने पर विचार किया जा रहा है। चीता परियोजना से जुड़े अधिकारी चाहते हैं कि कूनो की तर्ज पर गांधीसागर में भी चीतों की संख्या बढ़े और वहां सफलतापूर्वक वंशवृद्धि का सिलसिला आगे बढ़े।

    चार साल पहले कूनो में हुई थी चीता प्रोजेक्ट की शुरुआत
    17 सितंबर 2022 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने जन्मदिन के अवसर पर नामीबिया से लाए गए आठ चीतों को कूनो नेशनल पार्क में छोड़ा था। इसके बाद चीता पुनर्वास परियोजना के दूसरे चरण में दक्षिण अफ्रीका से 12 और चीते भारत लाए गए। कूनो में चीतों की संख्या बढ़ने के साथ उनके लिए दूसरे सुरक्षित रहवास की जरूरत महसूस हुई, जिसके बाद गांधीसागर राष्ट्रीय अभयारण्य को दूसरे घर के रूप में विकसित किया गया।

    पहले दो नर, फिर धीरा को भेजा गया गांधीसागर
    गांधीसागर में चीतों की आबादी बसाने की दिशा में 20 अप्रैल 2025 को कूनो से दो नर चीतों को यहां शिफ्ट किया गया था। इसके बाद वंशवृद्धि की संभावनाओं को मजबूत करने के लिए 17 सितंबर 2025 को मादा चीता धीरा को गांधीसागर लाया गया।

    अब परियोजना के तहत एक और मादा चीता को गांधीसागर भेजने की तैयारी है। इससे यहां नर और मादा चीतों का संतुलित समूह तैयार करने तथा भविष्य में वंशवृद्धि को बढ़ावा देने की उम्मीद है।

    अनुमति का इंतजार
    वन्यजीव विभाग की पीसीसीएफ डॉ. समीता राजौरा ने बताया कि मादा चीता की शिफ्टिंग को लेकर योजना है। मुख्यमंत्री की अनुमति मिलने के बाद ही आगे की कार्रवाई और किस मादा चीता को गांधीसागर भेजा जाना है, इसका अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

     

  • 17 सितंबर से MP में बड़ा अभियान, 50 लाख ग्रामीणों को संपत्ति की निश्शुल्क रजिस्ट्री का मिलेगा लाभ

    17 सितंबर से MP में बड़ा अभियान, 50 लाख ग्रामीणों को संपत्ति की निश्शुल्क रजिस्ट्री का मिलेगा लाभ

     भोपाल
    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन 17 सितंबर से मध्य प्रदेश में जनभागीदारी और जनसेवा को केंद्र में रखकर दो बड़े अभियान शुरू होने जा रहे हैं। स्वामित्व अभियान के तहत प्रदेश के 50 लाख से अधिक ग्रामीणों की संपत्तियों की निश्शुल्क रजिस्ट्री कराकर उन्हें अधिकार अभिलेख सौंपे जाएंगे। वहीं, ‘सेवा से संकल्प’ अभियान के तहत 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक जनसेवा से जुड़े 13 अलग-अलग प्रकल्प संचालित किए जाएंगे।

    अभियान की शुरुआत 17 सितंबर की शाम सात बजे प्रदेशभर में एक साथ 58 लाख से अधिक दीप प्रज्ज्वलित कर होगी। इसका सबसे बड़ा आयोजन उज्जैन के श्रीमहाकाल महालोक में प्रस्तावित है, जहां 25 लाख से अधिक दीप जलाने की तैयारी की जा रही है।

    41,568 गांवों में 68.47 लाख भूखंडों का सर्वे पूरा
    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने गुरुवार को मंत्रालय से वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए सभी संभागायुक्तों और कलेक्टरों को दोनों अभियानों को उत्सव के रूप में आयोजित करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि इनमें जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों, युवाओं और आमजन की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित की जाए।

    स्वामित्व अभियान के तहत प्रदेश के 41,568 गांवों में 68 लाख 47 हजार भूखंडों का सर्वे पूरा हो चुका है। अब इनमें से 50 लाख से अधिक हितग्राहियों के नाम संपत्तियों की निश्शुल्क रजिस्ट्री कराई जाएगी। इसके लिए पंचायत उपकर और अतिरिक्त स्टांप ड्यूटी से छूट का प्रावधान पहले ही किया जा चुका है।

    यह अभियान तीन चरणों में 17 सितंबर से 3 अक्टूबर तक चलेगा।

    हर गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार लगेंगे शिविर

    मुख्यमंत्री ने कलेक्टरों को अभियान का नेतृत्व स्वयं करने के निर्देश दिए हैं। जिला, जोन और सेक्टर स्तर पर अधिकारियों की जिम्मेदारियां तय की जाएंगी। सरकार का जोर इस बात पर है कि पात्र हितग्राहियों को बिना किसी भेदभाव के निर्धारित समय में लाभ मिले और पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रहे।

    मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल ने ग्राम पंचायत स्तर पर सरपंच, सचिव, पटवारी और रोजगार सहायक को मिलकर शिविर आयोजित करने के निर्देश दिए हैं। प्रत्येक गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार को लगने वाले इन शिविरों में प्रतिदिन कम से कम 30 से 40 रजिस्ट्रियां कराने का लक्ष्य रखा गया है।

    ‘आशीर्वाद का दीपक’ से शुरू होगा सेवा से संकल्प अभियान
    17 सितंबर से शुरू होने वाले ‘सेवा से संकल्प’ अभियान का पहला प्रमुख कार्यक्रम ‘आशीर्वाद का दीपक’ होगा। शाम सात बजे प्रदेशभर में लाभार्थी परिवारों के घरों के साथ चयनित ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थलों पर एक साथ दीप प्रज्ज्वलित किए जाएंगे।

    उज्जैन के श्रीमहाकाल महालोक में अकेले 25 लाख से अधिक दीप जलाने की तैयारी है। कार्यक्रम में सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं के साथ समाज के सभी वर्गों को जोड़ने की योजना है। इसके बाद 17 अक्टूबर तक जनसेवा से जुड़े 13 अलग-अलग प्रकल्पों के माध्यम से अभियान को आगे बढ़ाया जाएगा।

  • थाली में रखा चावल और ग्लोबल वार्मिंग का कनेक्शन! IISER भोपाल की स्टडी में सामने आई चौंकाने वाली वजह

    थाली में रखा चावल और ग्लोबल वार्मिंग का कनेक्शन! IISER भोपाल की स्टडी में सामने आई चौंकाने वाली वजह

    भोपाल
     आपकी प्लेट में रखा चावल धान के जिन खेतों से आता है वो न सिर्फ जहरीली मीथेन गैस वातावरण में छोड़ते हैं बल्कि ये ग्लोबल वॉर्मिंग भी बढ़ा रहे हैं। आईसर भोपाल और इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने पर्यावरण को लेकर एक रिसर्च लेटर प्रकाशित किया है। इनके शोध में जो बात सामने आई है वो बहुत चौकाने वाली है।

    देश के पानी से भरे धान के खेत जो दुनिया की एक बड़ी आबादी का पेट भर रहे हैं वो हर साल पर्यावरण में 97 लाख टन मीथेन गैस छोड़ रहे हैं। कार्बनडाई ऑक्साइड की तुलना में मीथेन गैस पर्यावरण में कम समय के लिए रहती है, लेकिन यह अपने अंदर गर्मी को बनाए रखती है। इसकी वजह से ग्लोबल वॉर्मिंग में बढ़ोतरी होती है।

    दोनों संस्थानों के वैज्ञानिकों ने इसके लिए यूरोप कॉपरनिकस प्रोग्राम के सैटेलाइट डाटा का उपयोग किया। इसमें 10 मीटर रिजॉल्यूशन पर धान के खेत का नक्शा बनाया गया। इसमें यह सामने आया कि मीथेन गैस का उत्सर्जन सबसे ज्यादा कहां और कब होता है।

    इस शोध से जुड़े आईसर के वैज्ञानिकों की माने तो अकेले मॉनसून के मौसम में बोई जाने वाली खरीफ फसल से ही देश में चावल से जुड़ी मीथेन का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा निकलता है। देश के ज्यादातर इलाकों में चावल हमारे खाने की थाली का एक मुख्य हिस्सा होता है। लेकिन यही देश के जलवायु पर पड़ने वाले असर का एक बड़ा कारण निकलकर सामने आया है।

    धान के खेतों से मीथेन गैस निकलने की वजह
    धान पानी से भरे खेतों में होती है, इसलिए इसमें ऑक्सीजन की कमी होती है। यहीं पर सूक्ष्मजीव कार्बनिक पदार्थों को सड़ाकर मीथेन गैस को छोड़ते हैं। खेती की यह प्रक्रिया बहुत पुरानी है, लेकिन इससे पर्यावरण पर लगातार प्रभाव पड़ रहा है। देश में करीब चार करोड़ हेक्टेयर जमीन पर चावल की खेती की जाती है। यह जितना लोगों की आजीविका का साधन है उतना ही हवा को नुकसान पहुंचाने वाला भी है।

    मीथेन के उत्सर्जन में हो सकती है 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी
    इस शोध में जो बात सामने है उसमें बताया गया है कि अगर आने वाले समय में तापमान में बढ़ोतरी होती है और बारिश का पैटर्न भी बिगड़ता है तो मीथेन गैस के उत्सर्जन में 25 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। इससे खेती की पैदावार और इससे होने वाजी आजीविका पर भी असर पड़ेगा। इसमें शोधकर्ताओं का कहना है कि मीथेन पर इस शोध को हमें और व्यापक स्तर पर करने की आवश्यकता है।

    वैज्ञानिकों ने बताई बड़ी वजह

    शोधकर्ताओं ने यह महत्वपूर्ण अध्ययन किया है, जिसे विज्ञान जगत की प्रतिष्ठित पत्रिका 'नेचर फूड' जर्नल में जगह मिली है. इस शोध में साफ तौर पर बताया गया है कि साल 2001 से लेकर 2020 के बीच के दो दशकों में पूरे एशिया महाद्वीप में चावल के उत्पादन के कारण ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 

    धान के खेत ग्लोबल वार्मिंग से कैसे जुड़े?
    आखिरकार धान की खेती से पर्यावरण को इतना नुकसान कैसे पहुंच रहा है, इसे समझना बहुत जरूरी है. वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में विस्तार से समझाया है कि धान की फसल को तैयार करने के लिए खेतों को लंबे समय तक पानी से भरकर जलमग्न रखना पड़ता है. जब यह खेत पानी से पूरी तरह भरे रहते हैं, तो वहां की मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है. ऐसी स्थिति में वहां मौजूद बैक्टीरिया बड़ी मात्रा में मीथेन गैस पैदा करने लगते हैं. इसके साथ ही इन खेतों से नाइट्रस ऑक्साइड गैस भी बाहर निकलती है। 

    इसलिए बढ़ रहा है तापमान
    यह दोनों ही गैसें कार्बन डाइऑक्साइड के मुकाबले वातावरण में गर्मी को रोकने में कहीं ज्यादा खतरनाक और असरदार होती हैं. यह गैसें हमारे वायुमंडल में एक मोटी परत बना लेती हैं जो सूरज की गर्मी को वापस अंतरिक्ष में जाने से रोक देती है. इसके कारण धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है और ग्लोबल वार्मिंग का खतरा गहराता जा रहा है। 

    दुनिया में धान की खेती से कितना बढ़ रहा है प्रदूषण?
    इस पूरे मामले को गहराई से समझने के लिए शोध दल के प्रमुख और बोस्टन कॉलेज के प्रोफेसर हानक्विन तियान की देखरेख में एक बड़ा विश्लेषण किया गया. इस शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने 21 हजार से भी ज्यादा क्षेत्रीय आंकड़ों को खंगाला. इसके साथ ही इस काम में आधुनिक मशीन लर्निंग तकनीक और वैश्विक स्तर के विश्लेषण का सहारा लिया गया ताकि नतीजे पूरी तरह सटीक आ सकें। 

    पूर्वी एशिया में मीथेन का उत्सर्जन सबसे ज्यादा
    इस तकनीक से सामने आए नतीजों से पता चला है कि पूर्वी एशिया के देशों में मीथेन का उत्सर्जन सबसे ज्यादा दर्ज किया गया है. वहीं दूसरी तरफ, अफ्रीका महाद्वीप में अब धान की खेती का चलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है, जिसके कारण वह भी अब इस मामले में एक नया हॉटस्पॉट बनकर उभर रहा है. साल 2001 से 2020 के आंकड़ों को देखें तो दुनिया भर में धान के खेतों से होने वाले कुल उत्सर्जन में अकेले एशिया की हिस्सेदारी 90 प्रतिशत से भी ज्यादा रही है. इसमें भी दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों का योगदान सबसे आगे पाया गया है। 

    मीथेन गैस क्यों है इतनी खतरनाक?
    मीथेन जमीनी-स्तर के ओजोन के बनने में मुख्य भूमिका निभाती है. यह एक खतरनाक वायु प्रदूषक और ग्रीनहाउस गैस है, जिसके संपर्क में आने से हर साल 10 लाख लोगों की समय से पहले मौत हो जाती है. मीथेन एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस भी है. 20 साल की अवधि में, यह कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 80 गुना ज्यादा गर्मी पैदा करती है। 

    औद्योगिक काल से पहले 30 प्रतिशत था मीथेन का योगदान 
    औद्योगिक काल से पहले के समय से अब तक ग्लोबल वार्मिंग में मीथेन का योगदान लगभग 30 प्रतिशत रहा है, और 1980 के दशक में रिकॉर्ड रखना शुरू होने के बाद से यह किसी भी अन्य समय की तुलना में तेजी से बढ़ रही है. असल में, यूनाइटेड स्टेट्स नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के आंकड़ों के अनुसार, 2020 में महामारी से जुड़े लॉकडाउन के दौरान जब कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन की गति धीमी हुई, तब भी वायुमंडलीय मीथेन का स्तर तेजी से बढ़ गया। 

    खेती के विस्तार से बढ़ी मुसीबत
    शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का भी अंदेशा जताया है कि आने वाले समय में चावल की खेती का दायरा और ज्यादा फैलने वाला है. आंकड़ों के अनुसार, साल 2015 में दुनिया भर में करीब 39.7 करोड़ एकड़ जमीन पर धान उगाया जा रहा था, जिसके साल 2024 तक बढ़कर 42.6 करोड़ एकड़ तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है। 

    उतसर्जन के पीछे 2 बड़ी वजह
    इस बढ़ते उत्सर्जन के पीछे मुख्य रूप से दो बड़ी वजहें काम कर रही हैं. पहली वजह यह है कि विकासशील देशों में आबादी की भोजन संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए धान की खेती का बहुत तेजी से विस्तार किया जा रहा है. दूसरी बड़ी वजह यह है कि आजकल किसान फसल की कटाई के बाद बचे हुए अवशेषों को पानी से भरे खेतों में ही वापस मिला देते हैं. जब यह अवशेष पानी के अंदर सड़ते हैं, तो इनसे मीथेन गैस बनने की रफ्तार कई गुना ज्यादा बढ़ जाती है। 

    भारत के लिए क्यों बड़ी चुनौती है यह मुद्दा?
    भारत में धान की खेती अब बड़ी चुनौती बनती जा रही है. इसकी सबसे बड़ी वजह पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव है. धान की फसल को बहुत अधिक पानी चाहिए, जिससे खासकर पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में भूजल तेजी से घट रहा है. कई इलाकों में जलस्तर हर साल करीब 0.7 मीटर नीचे जा रहा है। 

    धान की खेती का असर सिर्फ पानी तक सीमित नहीं
    धान आधारित खेती का असर सिर्फ पानी तक सीमित नहीं है. हर साल करीब 9.2 करोड़ टन पराली जलाने से दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों के दौरान प्रदूषण और स्मॉग बढ़ता है. वहीं, जरूरत से ज्यादा यूरिया इस्तेमाल करने से मिट्टी की गुणवत्ता खराब हो रही है और पानी भी दूषित हो रहा है. विशेषज्ञों के अनुसार, धान के खेत देश के कुल मीथेन उत्सर्जन का लगभग 11% हिस्सा पैदा करते हैं. तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी से धान की पैदावार करीब 6% तक घट सकती है. बिहार और पश्चिम बंगाल के कुछ इलाकों में भूजल में आर्सेनिक की मात्रा भी चिंता बढ़ा रही है। 

     

  • भोपाल गैस त्रासदी के 40 साल बाद बड़ा कदम, यूनियन कार्बाइड परिसर की वैज्ञानिक जांच फिर शुरू; सामने आएंगे जहरीले तत्व

    भोपाल गैस त्रासदी के 40 साल बाद बड़ा कदम, यूनियन कार्बाइड परिसर की वैज्ञानिक जांच फिर शुरू; सामने आएंगे जहरीले तत्व

    भोपाल
     दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदियों में शामिल भोपाल गैस त्रासदी के चार दशक बाद यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री परिसर की मिट्टी और पानी की एक बार फिर वैज्ञानिक जांच कराई जाएगी। जांच के जरिए यह पता लगाया जाएगा कि इतने वर्षों बाद भी परिसर में प्रदूषण की स्थिति क्या है और जमीन के नीचे अथवा परिसर में मौजूद तालाबों के पानी में जहरीले रासायनिक तत्व तो मौजूद नहीं हैं।

    जांच रिपोर्ट आने के बाद ही तय होगा कि फैक्ट्री परिसर की जमीन का इस्तेमाल गैस पीड़ितों के स्मारक, अस्पताल या अन्य कार्यों के लिए किया जा सकता है या नहीं। सरकार ने परीक्षण का जिम्मा गुजरात की एक कंपनी को सौंपा है। कंपनी जल्द ही अलग-अलग स्थानों से नमूने लेकर जांच शुरू करेगी। इस पूरी प्रक्रिया पर करीब 2.65 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।

    87 एकड़ जमीन पर प्रस्तावित है स्मारक और अस्पताल
    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने रासायनिक कचरा हटाए जाने के बाद इसी वर्ष जनवरी में यूनियन कार्बाइड परिसर की खाली जमीन पर गैस त्रासदी के पीड़ितों की स्मृति में स्मारक और अस्पताल बनाने की घोषणा की थी। फैक्ट्री परिसर में कुल 87 एकड़ जमीन है।

    अब इस जमीन के भविष्य के उपयोग से पहले एक बार फिर पर्यावरणीय स्थिति का वैज्ञानिक आकलन कराया जा रहा है। जांच में मिट्टी के साथ भूजल और परिसर में बने तालाबों के पानी के नमूनों की भी जांच की जाएगी, ताकि किसी तरह के रासायनिक अवशेष की मौजूदगी का पता लगाया जा सके।

    2010 की जांच में मिले थे पारा और कीटनाशक
    इससे पहले वर्ष 2010 में राष्ट्रीय पर्यावरणीय शोध संस्थान (नीरी), नागपुर ने परिसर की मिट्टी की जांच की थी। इसके अलावा फैक्ट्री परिसर के बाहर भूजल के 30 नमूने लेकर उनका परीक्षण किया गया था।

    तब कुछ नमूनों में पारा (मर्करी) समेत कुछ कीटनाशक निर्धारित मात्रा से अधिक पाए गए थे। ऐसे में चार दशक बाद होने वाली नई जांच से यह स्पष्ट होगा कि मौजूदा समय में परिसर और उसके आसपास प्रदूषण की स्थिति क्या है।

    टेंडर पर भी उठे सवाल
    वहीं, एक संगठन से जुड़ी रचना ढींगरा ने जांच के लिए कंपनी के चयन पर सवाल उठाते हुए कहा है कि अदालत ने इसके लिए ग्लोबल टेंडर किए जाने की आवश्यकता बताई है। सरकार की ओर से गुजरात की कंपनी को जांच का काम सौंपा गया है।

    अब नई जांच की रिपोर्ट पर यह तय होगा कि त्रासदी के चार दशक बाद यूनियन कार्बाइड परिसर की 87 एकड़ जमीन को स्मारक और अस्पताल जैसे सार्वजनिक उपयोग में लाने के लिए पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित माना जा सकता है या नहीं।

  • मुख्य सचिव ने समाधान ऑनलाइन के साथ की विभागीय कार्यों की समीक्षा

    मुख्य सचिव ने समाधान ऑनलाइन के साथ की विभागीय कार्यों की समीक्षा

    भोपाल 

    मुख्यमंत्री जनविश्वास अभियान

    मुख्य सचिव  अशोक बर्णवाल ने मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान अंतर्गत धार में समाधान ऑनलाइन के साथ विभागीय कार्यों एवं सीएम हेल्पलाइन शिकायतों की समीक्षा की।

    मुख्य सचिव  बर्णवाल ने निर्देश दिए कि सीएम हेल्पलाइन की शिकायतों में अधिकारी स्वयं शिकायतकर्ता से बात करें और शिकायतों का एक्टिव रिव्यू शुरू करें। सौ दिवस या उससे अधिक समय से लंबित शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए प्रत्येक शिकायत की समीक्षा कर समयबद्ध निराकरण सुनिश्चित किया जाए।

    समाधान ऑनलाइन में शिकायतकर्ता जुबे खां की पुलिस प्रकरण से संबंधित शिकायत सुनी गई। प्रकरण का निराकरण हो चुका था। मुख्य सचिव ने संबंधित थाने द्वारा की गई देरी को लेकर पुलिस अधीक्षक को तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए। पुलिस अधीक्षक को थानों की समीक्षा करने तथा प्रकरणों में चालान लंबित नहीं रखने और प्रत्येक कार्य के लिए समय-सीमा निर्धारित करने के निर्देश दिए।

    शिकायतकर्ता सुरेश कुमावत के घर जलने के प्रकरण में राशि मिलने में हुए विलंब पर मुख्य सचिव ने संबंधित समय के नायब तहसीलदार एवं रीडर की एक-एक वेतन वृद्धि रोकने के निर्देश दिए।

    पेयजल योजना अंतर्गत शिकायतकर्ता पप्पू मंडलोई की पाइपलाइन फूटने की शिकायत 107 दिवस से लंबित थी। मुख्य सचिव ने नल-जल योजनाओं की प्रभावी मॉनिटरिंग के लिए सिस्टम विकसित करने तथा जिला पंचायत सीईओ को लगातार निगरानी रखते हुए प्रत्येक सप्ताह समीक्षा करने के निर्देश दिए।

    निशक्त विवाह प्रोत्साहन योजना से संबंधित शिकायतकर्ता मती बसंती पिता पहाड़ की शिकायत का निराकरण हो चुका था। मुख्य सचिव ने सामाजिक न्याय विभाग को निर्देशित किया कि इस प्रकार की सभी लंबित शिकायतों का एक सप्ताह में निराकरण सुनिश्चित करें।

    स्वरोजगार योजना में सब्सिडी नहीं मिलने की शिकायतकर्ता दीप कुमार दांगी तथा प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना की किस्त प्राप्त नहीं होने की शिकायतकर्ता कशिश जाधव की शिकायत भी सुनी गई। मुख्य सचिव ने संबंधित विभागों को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए।

    मुख्य सचिव ने स्वास्थ्य विभाग की समीक्षा के दौरान एंबुलेंस के समय पर नहीं पहुंचने की शिकायतों पर गंभीरता से कार्रवाई के निर्देश दिए। उन्होंने कलेक्टर को संबंधित प्रकरणों में एंबुलेंस की राशि काटने के निर्देश दिए। महिला एवं बाल विकास विभाग को एनआरसी में बच्चों को भर्ती कराकर उन्हें आवश्यक स्वास्थ्य लाभ दिलाने के निर्देश दिए। उन्होंने सबसे अधिक लंबित शिकायत वाले विभागों के अधिकारियों से चर्चा कर शिकायतों के शीघ्र निराकरण के निर्देश दिए। प्रत्येक विभाग की अलग-अलग समीक्षा करते हुए अधिकारियों को शिकायतों के निराकरण के साथ उनकी गुणवत्ता पर भी ध्यान देने को कहा।

    बैठक में स्वामित्व योजना की तैयारियों, प्लॉट रजिस्ट्री प्रदान करने तथा अभियान की तैयारियों की भी समीक्षा की गई। इस दौरान सचिव मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश शासन डॉ. सुदाम खाड़े, इंदौर संभागायुक्त  भास्कर लक्षकार, कलेक्टर  राजीव रंजन मीना, पुलिस अधीक्षक  सचिन शर्मा और अन्य जिला अधिकारी उपस्थित रहे।

     

  • इंडियन एथलेटिक्स फाइनल सीरीज़ में मध्यप्रदेश की शानदार कामयाबी, खिलाड़ियों ने रचा गौरव

    इंडियन एथलेटिक्स फाइनल सीरीज़ में मध्यप्रदेश की शानदार कामयाबी, खिलाड़ियों ने रचा गौरव

    भोपाल 

    नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में 10 सितंबर 2026 को आयोजित इंडियन एथलेटिक्स फाइनल सीरीज़ में मध्यप्रदेश के एथलीटों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए अपनी प्रतिभा और मजबूत खेल क्षमता का परिचय दिया। विभिन्न एथलेटिक्स स्पर्धाओं में मध्यप्रदेश के खिलाड़ियों ने 2 स्वर्ण, 2 रजत और 1 कांस्य सहित कुल 5 पदक अर्जित किए। खिलाड़ियों के इस प्रदर्शन ने राष्ट्रीय स्तर पर प्रदेश की खेल प्रतिभाओं की मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई।

    पोल वॉल्ट में देव मीना का स्वर्णिम प्रदर्शन

    पुरुष पोल वॉल्ट स्पर्धा में मध्यप्रदेश के स्टार एथलीट देव मीना ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 5.40 मीटर की ऊंचाई पार कर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। देव ने प्रतियोगिता में तकनीकी दक्षता, आत्मविश्वास और बेहतरीन लय का प्रदर्शन करते हुए शीर्ष स्थान हासिल किया।

    देव मीना का लगातार बेहतर होता प्रदर्शन मध्यप्रदेश की एथलेटिक्स प्रतिभाओं के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। उनके इस प्रदर्शन से प्रदेश को राष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर गौरवान्वित होने का अवसर मिला है।

    नितिका आक्रे ने पोल वॉल्ट में लहराया परचम

    महिला पोल वॉल्ट स्पर्धा में मध्यप्रदेश की प्रतिभाशाली एथलीट नितिका आक्रे ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 4.10 मीटर की ऊंचाई पार कर स्वर्ण पदक जीता। नितिका ने प्रतियोगिता में शानदार तकनीक और दमदार प्रदर्शन के साथ शीर्ष स्थान हासिल किया।

    समरदीप सिंह गिल ने शॉट पुट में जीता रजत

    पुरुष शॉट पुट स्पर्धा में मध्यप्रदेश के समरदीप सिंह गिल ने 19.59 मीटर के प्रदर्शन के साथ रजत पदक अपने नाम किया। समरदीप ने मजबूत प्रदर्शन करते हुए प्रतियोगिता में दूसरा स्थान हासिल किया। उन्होंने एशियन गेम्स के लिए चयनित एथलीट करमवीर सिंह से आगे रहते हुए यह उपलब्धि हासिल की।

    हाई जंप में आदित्य रघुवंशी का शानदार प्रदर्शन

    पुरुष हाई जंप स्पर्धा में मध्यप्रदेश के आदित्य रघुवंशी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 2.15 मीटर की ऊंचाई पार की और रजत पदक हासिल किया। आदित्य ने प्रतियोगिता के दौरान निरंतरता और तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन करते हुए पोडियम पर अपनी जगह बनाई।

    1500 मीटर में सुनील दावर ने जीता कांस्य

    पुरुष 1500 मीटर दौड़ में मध्यप्रदेश के एथलीट सुनील दावर ने 3:43.68 के समय के साथ कांस्य पदक अपने नाम किया। सुनील ने प्रतिस्पर्धी दौड़ में शानदार गति और धैर्य का परिचय देते हुए तीसरा स्थान हासिल किया।

    कुलदीप कुमार ने हासिल किया चौथा स्थान

    पुरुष पोल वॉल्ट में मध्यप्रदेश के एक अन्य एथलीट कुलदीप कुमार ने भी प्रभावी प्रदर्शन किया। कुलदीप ने 5.10 मीटर की ऊंचाई पार करते हुए प्रतियोगिता में चौथा स्थान हासिल किया।

    खेल मंत्री  कैलाश सारंग ने दी खिलाड़ियों को बधाई

    सहकारिता, खेल एवं युवा कल्याण मंत्री  विश्वास कैलाश सारंग ने इंडियन एथलेटिक्स फाइनल सीरीज़ में मध्यप्रदेश के खिलाड़ियों के शानदार प्रदर्शन पर हर्ष व्यक्त करते हुए सभी पदक विजेता खिलाड़ियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दी हैं।

    मंत्री  सारंग ने कहा कि मध्यप्रदेश के खिलाड़ियों का राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित प्रतियोगिताओं में लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन प्रदेश की खेल प्रतिभाओं की बढ़ती क्षमता और मेहनत का प्रमाण है। खिलाड़ियों ने अपनी प्रतिभा, अनुशासन और दृढ़ संकल्प के साथ प्रदेश का गौरव बढ़ाया है। उन्होंने सभी खिलाड़ियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए आगामी राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए शुभकामनाएं दीं।

    मध्यप्रदेश की एथलेटिक्स प्रतिभाओं ने बढ़ाया प्रदेश का मान

    इंडियन एथलेटिक्स फाइनल सीरीज़ में मध्यप्रदेश के खिलाड़ियों का यह प्रदर्शन प्रदेश में विकसित हो रहे मजबूत खेल वातावरण और खिलाड़ियों की निरंतर मेहनत का परिणाम है। एक ही प्रतियोगिता में विभिन्न स्पर्धाओं में खिलाड़ियों द्वारा पदक हासिल करना प्रदेश की एथलेटिक्स प्रतिभाओं की व्यापक क्षमता को दर्शाता है। खेल एवं युवा कल्याण विभाग, मध्यप्रदेश ने सभी पदक विजेता खिलाड़ियों को शानदार उपलब्धि के लिए बधाई दी है। विभाग ने खिलाड़ियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए आगामी राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी इसी प्रकार उत्कृष्ट प्रदर्शन करने के लिए शुभकामनाएं दी हैं।

     

     

  • महिला एवं बाल विकास आयुक्त  संदीप ने इंदौर में बाल संस्थाओं का किया निरीक्षण

    महिला एवं बाल विकास आयुक्त संदीप ने इंदौर में बाल संस्थाओं का किया निरीक्षण

    भोपाल 

    आयुक्त महिला एवं बाल विकास  संदीप जी.आर. ने पदभार संभालते ही विभागीय योजनाओं और संस्थाओं की जमीनी स्थिति की पड़ताल शुरू कर दी है। शुक्रवार को उन्होंने इंदौर पहुंचकर छावनी स्थित राजकीय बाल आश्रम, ऑब्जर्वेशन होम (संप्रेक्षण गृह), स्पेशल होम और वन स्टॉप सेंटर का निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने बच्चों और महिलाओं से सीधे संवाद कर उनकी जरूरतों और समस्याओं को जाना तथा संस्थाओं में उपलब्ध सुविधाओं की समीक्षा की।

    राजकीय बाल आश्रम के निरीक्षण के दौरान आयुक्त ने वहां निवासरत बच्चों से आत्मीय बातचीत की और उनका कुशलक्षेम जाना। उन्होंने बच्चों को उपलब्ध कराई जा रही शिक्षा, भोजन, स्वास्थ्य सहित अन्य सुविधाओं की जानकारी ली। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि संस्थाओं में बच्चों से संबंधित सभी अभिलेख व्यवस्थित और अद्यतन रूप से संधारित किए जाएं। इसके बाद ऑब्जर्वेशन होम और स्पेशल होम पहुंचे आयुक्त ने वहां रह रहे बच्चों से भी विस्तार से बातचीत की। उन्होंने बच्चों की समस्याओं, पढ़ाई और कैरियर को लेकर उनकी रुचियों तथा भविष्य की योजनाओं के बारे में जानकारी ली।

    गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ कौशल प्रशिक्षण पर जोर

    आयुक्त  संदीप जी.आर. ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि बाल संस्थाओं में रह रहे बच्चों की नियमित पढ़ाई और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित की जाए। उन्होंने कहा कि बच्चों को केवल संस्थागत सुविधाएं उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें भविष्य के लिए सक्षम और आत्मनिर्भर बनाना भी जरूरी है। इसके लिए बच्चों को उनकी रुचि और क्षमता के अनुरूप व्यावसायिक प्रशिक्षण एवं कौशल विकास कार्यक्रमों से जोड़े जाने के निर्देश दिए।

    वन स्टॉप सेंटर में महिलाओं को दी जा रही सेवाओं की समीक्षा

    राजकीय बाल आश्रम परिसर स्थित वन स्टॉप सेंटर के निरीक्षण के दौरान आयुक्त  संदीप ने संकट और हिंसा से प्रभावित महिलाओं को उपलब्ध कराई जा रही आपातकालीन सहायता, परामर्श और विधिक सेवाओं की समीक्षा की। उन्होंने सेंटर में मौजूद महिलाओं से बातचीत कर वहां उपलब्ध कराई जा रही निःशुल्क सेवाओं के बारे में उनकी राय जानी। अधिकारियों से भी विभिन्न सेवाओं की स्थिति और उनके प्रभावी संचालन की जानकारी ली। निरीक्षण के दौरान आयुक्त ने सभी संस्थाओं में स्वच्छता, पोषण, स्वास्थ्य देखभाल और सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने को कहा। उन्होंने अधिकारियों को संस्थाओं की व्यवस्थाओं की नियमित निगरानी करने और किसी भी स्तर पर कमी पाए जाने पर तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई करने के निर्देश दिए।

    फीडबैक के आधार पर सेवाओं में सुधार पर जोर

    आयुक्त  संदीप ने कहा कि बच्चों और महिलाओं को उपलब्ध कराई जा रही सेवाओं की गुणवत्ता लगातार बेहतर होनी चाहिए। इसके लिए उनसे नियमित रूप से फीडबैक लिया जाए और उनकी समस्याओं एवं सुझावों के आधार पर आवश्यक सुधार किए जाएं। उन्होंने स्पष्ट किया कि बाल संस्थाओं में बच्चों को सुरक्षित, स्वस्थ और बेहतर वातावरण उपलब्ध कराने के साथ उनके शिक्षा, कौशल विकास और आत्मनिर्भरता पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।