Category: विदेश

  • पश्चिम एशिया में गहराया संकट! बाब अल-मंडेब पर हूतियों का कब्जा, होर्मुज में जहाज पर मिसाइल अटैक

    पश्चिम एशिया में गहराया संकट! बाब अल-मंडेब पर हूतियों का कब्जा, होर्मुज में जहाज पर मिसाइल अटैक

    नई दिल्ली
    18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में भारत, सऊदी अरब, ईरान और यूएई सहित सदस्य देशों की ओर से पश्चिम एशिया (West Asia) में 'अधिकतम संयम' बरतने की अपील और "नई दिल्ली घोषणापत्र" जारी करने के महज 24 घंटे के भीतर क्षेत्रीय तनाव और गहरा गया है।

    रणनीतिक रूप से अति-संवेदनशील स्ट्रैट ऑफ होर्मुज से गुजर रहे एक कमर्शियल जहाज पर एक अज्ञात मिसाइल से हमला किया गया है। यूनाइटेड किंगडम मैरिटाइम ट्रेड ऑपरेशंस (UKMTO) के अनुसार, जहाज को पहुंचे नुकसान और चालक दल के सदस्यों की स्थिति की जांच की जा रही है, जबकि इलाके में बाकी जहाजों को काफी ज्यादा सतर्कता बरतने की चेतावनी जारी की गई है।

    मोखा पोर्ट और बाब अल-मंडेब पर हूतियों का कब्जा
    ईरान समर्थित यमन के हूती विद्रोहियों ने लाल सागर के रणनीतिक समुद्री मार्ग बाब अल-मंडेब स्ट्रेट पर स्थित आखिरी दो प्रमुख द्वीपों और महत्वपूर्ण मोखा बंदरगाह पर पूर्ण नियंत्रण कर लिया है।

    मोखा पोर्ट पर कब्जे के बाद हूतियों ने सऊदी अरब के शरूराह सैन्य अड्डे पर हथियार डिपो और कमांड सेंटर को निशाना बनाकर मिसाइलें दागीं। अल जजीरा के मुताबिक, सऊदी सीमा पर हुए इस हमले में दो लोग घायल हुए हैं।

    स्ट्रैट ऑफ होर्मुज के विकल्प के रूप में इस्तेमाल होने वाले लाल सागर के इस व्यापारिक मार्ग पर हूतियों के बढ़ते नियंत्रण से सऊदी अरब के कच्चे तेल के वैश्विक निर्यात पर सीधा संकट खड़ा हो गया है।

    ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकिर कलीबाफ और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के प्रवक्ता हुसैन मोहब्बी ने यमन के 'अंसार अल्लाह' (हूती) की इन सैन्य सफलताओं का खुले तौर पर स्वागत किया है।

    प्रेसिडेंट ट्रंप ने ठुकराई सऊदी की सैन्य कार्रवाई की मांग
    सीबीएस न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से हूतियों के खिलाफ सीधी अमेरिकी सैन्य कार्रवाई शुरू करने का अनुरोध किया था।

    हालांकि, रिपोर्टों के मुताबिक राष्ट्रपति ट्रंप ने इस चरण में हूतियों के खिलाफ प्रत्यक्ष अमेरिकी सैन्य अभियानों में शामिल होने से इनकार कर दिया है।

    ईरान और ओमान तय करेंगे होर्मुज के नए समुद्री रूट
    इस बीच, चीन की सिन्हुआ न्यूज एजेंसी के अनुसार, ईरान और ओमान ने स्ट्रैट ऑफ होर्मुज के लिए नए एंट्री और एग्जिट रूट के ब्योरे पर सहमति व्यक्त की है।

    ईरानी अधिकारियों ने बताया कि दोनों देश सोमवार को मस्कट में होने वाली एक क्षेत्रीय बैठक के दौरान खाड़ी देशों के प्रतिनिधियों को इन नए नेविगेशन मार्गों की विस्तृत जानकारी देंगे, ताकि तनाव के बीच वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला बाधित न हो।

    BRICS की अपील के बेअसर होने की आशंका
    यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है, जब शनिवार को नई दिल्ली में ब्रिक्स देशों ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर पश्चिम एशिया में नागरिकों, नागरिक बुनियादी ढांचे की सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और एनर्जी सप्लाई चेन को सुचारू बनाए रखने के लिए तत्काल शांति व कूटनीतिक वार्ता का आह्वान किया था। लेकिन जमीनी हकीकत बताती है कि लाल सागर और फारस की खाड़ी में युद्ध का दायरा लगातार चौड़ा होता जा रहा है।

  • लाल सागर में खुला नया मोर्चा, हूतियों के कब्जे से बढ़ा तेल संकट; 100 डॉलर के पार पहुंचा क्रूड

    लाल सागर में खुला नया मोर्चा, हूतियों के कब्जे से बढ़ा तेल संकट; 100 डॉलर के पार पहुंचा क्रूड

     रियाद
    सऊदी अरब ने शुक्रवार को ड्रोन हमले के बाद अपनी महत्वपूर्ण पूर्वी-पश्चिमी तेल पाइपलाइन को अस्थायी रूप से बंद कर दिया। इस दौरान, ईरान समर्थित यमन के हूती लड़ाकों ने लाल सागर के दक्षिणी प्रवेश द्वार पर स्थित एक रणनीतिक द्वीप पर कब्जा कर लिया है। इससे पहले से ही चल रहे क्षेत्रीय युद्ध में एक और मोर्चा खुल गया है। इस्लामी मिलिशिया ने बाब अल-मंदेब के नौवहन मार्ग के आसपास वर्षों में अपनी सबसे बड़ी क्षेत्रीय बढ़त हासिल कर ली है। हूतियों की यह बढ़त वैश्विक तेल और गैस की कीमतों को और बढ़ाने के ईरान के प्रयासों को मजबूत कर सकती है। इससे अमेरिका पर युद्ध समाप्त करने के लिए दबाव बढ़ाने की उसकी कोशिशों को बल मिल सकता है।

    1,200 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन
    सऊदी अरब ने कहा कि उसने पिछले दिन हुए ड्रोन हमले के बाद अरब प्रायद्वीप के आर-पार फैली 1,200 किलोमीटर लंबी पूर्वी-पश्चिमी पाइपलाइन को बंद कर दिया है। सऊदी अरब ने इस फैसले को एहतियाती कदम बताया है। सऊदी विदेश मंत्रालय ने इस हमले के लिए इराक से उड़ाए गए कई ड्रोन को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि हमले में लोग घायल हुए हैं। सरकारी सऊदी प्रेस एजेंसी में जारी बयान में सऊदी अरब ने कहा कि वह तत्काल जवाबी कार्रवाई नहीं करेगा, ताकि इराकी सरकार को आवश्यक कदम उठाने का अवसर दिया जा सके। सऊदी अरब ने हालांकि कहा कि वह अपनी संप्रभुता, सुरक्षा, प्रतिष्ठानों और नागरिकों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने का अधिकार सुरक्षित रखता है।

    इराक सरकार ने की निंदा
    इराक सरकार ने हूतियों के हमले की निंदा की है। प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी आधिकारिक बयान में कहा गया कि जांच में यह पुष्टि होने के बाद कि हमले में इस्तेमाल किये गये ड्रोन वास्तव में इराक के थे, एक सैन्य कमांडर को औपचारिक रूप से पद से हटा दिया गया है। बाद में इराक के सूत्रों ने बताया कि ईराक ने एहतियाती कदम के तौर पर ईरान के साथ शलमचेह सीमा चौकी को बंद करने का आदेश दिया है और हमले के लिए जिम्मेदार लोगों की तलाश के लिए व्यापक अभियान शुरू किया है। सऊदी अरब और अमेरिका ने जुलाई में इराक में ईरान समर्थित मिलिशिया के ठिकानों पर संयुक्त रूप से बमबारी की थी। दोनों देशों ने इन मिलिशिया पर सऊदी तेल प्रतिष्ठानों पर ड्रोन हमले करने का आरोप लगाया था, जिनकी जिम्मेदारी हूतियों ने ली थी।

    बेहद महत्वपूर्ण है यह पाइपलाइन
    गौरतलब है कि 1980 के दशक में निर्मित पूर्वी-पश्चिमी पाइपलाइन सऊदी अरब के तेल निर्यात के लिए बेहद महत्वपूर्ण रही है। यह पाइपलाइन उस समय से सऊदी तेल निर्यात के लिए महत्वपूर्ण बनी हुई है, जब युद्ध के दौरान ईरान ने होर्मुज के रास्ते होने वाले तेल परिवहन को बाधित कर दिया था। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के अनुसार, जून की शुरुआत तक सऊदी अरब ने कथित तौर पर पाइपलाइन के पश्चिमी छोर पर स्थित लाल सागर के बंदरगाह के जरिए कच्चे तेल का निर्यात दोगुने से अधिक बढ़ाकर प्रतिदिन 50 लाख बैरल से अधिक कर दिया था। बाब अल-मंदेब में स्थित छोटे और बंजर ज्वालामुखीय द्वीप मायून, जिसे पेरिम के नाम से भी जाना जाता है, लेकिन हूतियों के कब्जे की पुष्टि यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी और एक हूती अधिकारी ने की है।

    लाल सागर पर निर्भर है सऊदी अरब
    दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक सऊदी अरब, ईरान द्वारा होर्मुज में जहाजों को निशाना बनाये जाने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक कच्चा तेल पहुंचाने के लिए लाल सागर पर अधिक निर्भर हो गया है। करीब 28 किलोमीटर चौड़े बाब अल-मंदेब को बंद करने के हूतियों के प्रयासों ने इस वैकल्पिक मार्ग का इस्तेमाल करना भी लगातार मुश्किल बना दिया है। हूती सशस्त्र बलों ने शुक्रवार को जारी एक बयान में तटीय क्षेत्र में अपनी और बढ़त का दावा किया, हालांकि इसमें मायून, बंदरगाह शहर मोखा या बाब अल-मंदेब का विशेष रूप से उल्लेख नहीं किया गया। समूह ने सऊदी अरब के खिलाफ जैसी बढ़ोतरी, वैसी बढ़ोतरी की नीति अपनाने का संकल्प जताया और कहा कि सऊदी जहाजों को छोड़कर सभी कंपनियों के लिए समुद्री नौवहन सुरक्षित है।

    तेल बाजार में चिंता
    इन घटनाक्रमों से तेल बाजारों में चिंता बढ़ गई है। इस सप्ताह कच्चे तेल की कीमत फिर 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गयी, जिससे भविष्य में वाशिंगटन के साथ किसी भी बातचीत में तेहरान को अधिक दबाव बनाने का मौका मिल सकता है। जुलाई में नाकाबंदी की घोषणा करने के बाद से हूती लाल सागर में सऊदी जहाजों पर हमले कर रहे हैं और सऊदी अरब के भीतर तेल प्रतिष्ठानों को भी निशाना बना रहे हैं। समूह का कहना है कि उसके हमले यमन में हूतियों के नियंत्रण वाले क्षेत्रों की सऊदी अरब की लंबे समय से जारी नाकाबंदी के जवाब में हैं। एक हूती प्रसारक के अनुसार, गुरुवार को हूतियों द्वारा बंदरगाह शहर मोखा पर कब्जा किये जाने के बाद सऊदी अरब ने मोखा हवाई अड्डे पर हवाई हमला किया। तत्काल किसी के हताहत होने या बड़े नुकसान की रिपोर्टें नहीं है।

  • सरकारी नौकरी के लिए ट्रंप से वफादारी क्यों? अमेरिकी कोर्ट ने आवेदकों से ऐसे सवाल पूछने पर लगाई रोक

    सरकारी नौकरी के लिए ट्रंप से वफादारी क्यों? अमेरिकी कोर्ट ने आवेदकों से ऐसे सवाल पूछने पर लगाई रोक

    वाशिंगटन

    अमेरिका में सरकारी नौकरी के लिए राजनीतिक वफादारी साबित नहीं करनी होगी. बोस्टन की अदालत ने डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन के उस नियम पर रोक लगा दी है, जिसमें आवेदकों से उनकी सोच पूछी जा रही थी. कोर्ट ने साफ कहा कि किसी उम्मीदवार से उसकी राजनीतिक राय जानने का सरकार को कोई हक नहीं है। 

    यह मामला उन सरकारी नौकरियों से जुड़ा है, जिन्हें राजनीतिक पद नहीं माना जाता. इसके बावजूद आवेदकों से पूछा जा रहा था कि वे ट्रंप की नीतियों और उनके कार्यकारी आदेशों को आगे बढ़ाने में किस तरह मदद करेंगे. कर्मचारी संगठनों ने इसे राजनीतिक सोच जानने वाला सवाल बताया था. उनका कहना था कि सरकारी नौकरी पाने के लिए किसी उम्मीदवार से राजनीतिक निष्ठा साबित करने को नहीं कहा जा सकता। 

    न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, बोस्टन की संघीय अदालत के जज जॉर्ज ओ'टूल ने तीन कर्मचारी यूनियनों का पक्ष माना. इन संगठनों ने पिछले साल ट्रंप प्रशासन के खिलाफ मुकदमा दायर किया था. कोर्ट के इस फैसले के बाद प्रशासन ऐसे सवाल को सरकारी नौकरी के आवेदन में जारी नहीं रख सकेगा। 

    ट्रंप के आदेश के बाद शुरू हुआ था सवाल
    मामला दरअसल ट्रंप प्रशासन के एक कार्यकारी आदेश से जुड़ा है. इसी आदेश को लागू करने के लिए सरकारी नौकरी के आवेदन में 'लॉयल्टी' से जुड़ा सवाल शामिल किया गया था. आवेदकों से एक तरह का जवाब मांगा जा रहा था कि वे ट्रंप की नीतियों को आगे बढ़ाने में किस तरह मदद करेंगे. सरकार के स्तर पर यह प्रक्रिया सरकारी कर्मचारियों की भूमिका से जुड़ी बताई गई थी. मगर कर्मचारी संगठनों ने इसका विरोध किया. उनका तर्क था कि जिन नौकरियों का काम राजनीतिक दल या किसी नेता के प्रति वफादारी से तय नहीं होता, वहां उम्मीदवार की राजनीतिक सोच जानना सही नहीं है। 

    जज बोले- राजनीतिक सोच पूछने की जरूरत नहीं
    रिपोर्ट्स के मुताबिक, जज जॉर्ज ओ'टूल ने अपने फैसले में कहा कि सरकार के पास आवेदकों की राजनीतिक मान्यताओं के बारे में इस तरह की जानकारी मांगने का कोई वैध हित नहीं है. यानी सिर्फ सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करने वाले व्यक्ति से यह जानना जरूरी नहीं है कि वह किसी राष्ट्रपति की राजनीतिक नीतियों के बारे में क्या सोचता है। 

    इस फैसले से ट्रंप प्रशासन की भर्ती प्रक्रिया को बड़ा झटका लगा है. कर्मचारी संगठनों के मुताबिक, देशभर में 70 हजार से ज्यादा संघीय सरकारी नौकरियों के विज्ञापनों में यह सवाल शामिल किया गया था। 

    तीन कर्मचारी संगठनों ने किया था मुकदमा
    तीन सरकारी कर्मचारी यूनियनों ने पिछले साल इस व्यवस्था को कोर्ट में चुनौती दी थी. उनका कहना था कि सरकारी नौकरी के उम्मीदवारों को अपनी योग्यता के आधार पर चुना जाना चाहिए, न कि उनकी राजनीतिक सोच के आधार पर। 

    अब अदालत के आदेश के बाद ट्रंप प्रशासन के लिए सरकारी नौकरियों के आवेदकों से इस तरह की 'लॉयल्टी' जानकारी मांगना रोक दिया गया है. मामला सिर्फ एक सवाल का नहीं है. इसके जरिए यह बहस भी सामने आई है कि सरकारी नौकरी में उम्मीदवार की योग्यता देखी जाए या उसकी राजनीतिक सोच। 

  • जहां था सिर्फ रेगिस्तान, वहां लौट आई हरियाली; गधों ने 44 साल में बदल दी पूरी तस्वीर

    जहां था सिर्फ रेगिस्तान, वहां लौट आई हरियाली; गधों ने 44 साल में बदल दी पूरी तस्वीर

    यरुशलम

    गधों को लेकर जितनी तरह का कहावतें प्रचलित हैं उनसे लगता है कि यह दुनिया के बहुत ही सुस्त और अनुपयोगी जीव है। हालांकि गधे हमेशा से ही इंसानों के लिए उपयोगी रहे हैं। बोझा ढोने के लिए ही नहीं बल्कि पर्यावरण के लिहाज से भी गधों के अंदर अद्वितीय क्षमता होती है। सबसे बड़ी बात यह ऐसा जीव है जिसमें खूब सहनशक्ति और धैर्य होता है। रेमन क्रेटर के रेगिस्तान में तो 28 जंगली गधों ने ऐसा कमाल किया कि रेत में भी हलियाली लौट आई। आज यहां 500 से 600 गधे कुलाचे भर रहे हैं। जरूरत के हिसाब से गधों का शरीर भी परिवर्तित हो गया। आज ये गधे देखने मे छोटे-छोटे घोड़ों की तरह नजर आते हैं।

    ईरान से मंगवाए गए गधे
    लगभग 44 साल पहले इजरायल ने नेगेव रेगिस्तान में ईरानी और अफ्रीकी नस्ल के जंगली गधों को छोड़ा था। दरअसल 20 शताब्दी में शिकार की वजह से यहां गधों की संख्या लगभग खत्म हो गई थी। ईरान और इजरायल में अब भले ही दुश्मनी हो लेकिन उस समय इजरायल ने पर्यावरण बचाने के लिए तत्कालीन शाह मोहम्मद रजा पहलवी से बात की। 1968 में ईरान से 28 गधे भेजे गए। इन्हें पहले योतवाता वाइल्डलाइफ रिजर्व में लाया गया और कुछ दिन यहां रखा गया।

    1982 में 28 गधे सूखे रेगिस्तान में छोड़ दिए गए। आज इस इलाके के नक्शा बदल चुका है। यहां कई तरह की वनस्पतियां विकसित होने लगी हैं। वहीं गधे भी इस माहौल में अच्छी तरह सर्वाइव कर गए। इजरायली अधइकारियों का कहना था कि इस इलाके में गधों को छोड़ने से एक तो इस प्रजाति की सुरक्षा होगी दूसरा रेगिस्तान में फिर से जीवन लौट आएगा। जिन दो नस्लों को यहां छोड़ा गया था, दोनों ही खत्म होने की कगार पर थीं।

    ईरान में इस्लामिक क्रांति के दौरान इजरायल के साथ संबंध अच्छे थे। इसीदौरान शाह ने इजरायल को गधे गिफ्ट किए थे। इन्हें हवाई जहाज से इजरायल लाया गया था। इसके बाद कुछ गधे इथियोपिया से मंगवाए गए। जब इन्हें रामोन क्रेटर में छोड़ा गया तो यहीं उनका पसंदीदा अड्डा बन गया। गधों ने यहां भयंकर गर्मी और शुष्क जलवायु का सामना किया। इन गधों के आकार में परिवर्तन हो गया और ये छोटे-छोटे घोड़े जैसे दिखने लगे। गधे अब सुस्त जीव नहीं बल्कि 70 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार से दौड़ने वाले घोड़ बन गए थे। अब ये यहां 45 डिग्री के तापमान में भी सर्वाइव कर लेते हैं और बिना पानी के भी कई दिनों तक रह सकते हैं। इसके अलावा इन गधों को अब गड्ढा खोदने की कला भी आ गई है। गड्ढे में पानी भर जाता है तो दूसरे जीव भी पानी पीते हैं। इसके अलावा गड्ढे के आसपास हरियाली भी हो जाती है।

     

  • ईरान की अंडरग्राउंड फैक्ट्रियां फिर एक्टिव, बैलिस्टिक मिसाइलों का उत्पादन शुरू होने का दावा

    ईरान की अंडरग्राउंड फैक्ट्रियां फिर एक्टिव, बैलिस्टिक मिसाइलों का उत्पादन शुरू होने का दावा

    तेहरान 

    अमेरिका और मिडिल ईस्ट के खुफिया अधिकारियों के अनुसार ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइलों का उत्पादन दोबारा शुरू कर दिया है. ये मिसाइलें युद्ध से पहले जमा किए गए यंत्रों को जोड़कर बनाई जा रही हैं. ये सारा काम अंडरग्राउंड फैसिलिटी में हो रहा है। 

    यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका और इजरायल ने हालिया सैन्य अभियान के दौरान ईरान की मिसाइल क्षमताओं को बड़ा नुकसान पहुंचाने का दावा किया था. अब वही क्षमता धीरे-धीरे वापस आती दिख रही है। 

    युद्ध के शुरुआती चरण में ईरान के मिसाइल लॉन्चपैड और औद्योगिक यूनिट्स पर भारी हमले हुए थे. इन हमलों का मकसद ईरान की मिसाइल निर्माण क्षमता को नष्ट करना था. लेकिन खुफिया जानकारी बताती है कि ईरान ने पहले से ही कई जरूरी पार्ट्स जमा कर रखे थे।

    अब इन्हीं स्टॉक किए गए पार्ट्स को भूमिगत जगहों पर ले जाकर मिसाइलें असेंबल की जा रही हैं. अंडरग्राउंड फैसिलिटी का इस्तेमाल इसलिए हो रहा है ताकि हवाई हमलों से बचा जा सके. काम बिना रुकावट चलता रहे। 

    ईरान दो तरह की बैलिस्टिक मिसाइलें बना रहा है. पहली लिक्विड-प्रोपेलेंट मिसाइलें, जिन्हें लॉन्च से ठीक पहले ईंधन भरना पड़ता है. दूसरी सॉलिड-प्रोपेलेंट मिसाइलें, जिन्हें पहले से तैयार करके रखा जा सकता है और जरूरत पड़ने पर तुरंत दागा जा सकता है. सॉलिड-प्रोपेलेंट मिसाइलें ज्यादा खतरनाक मानी जाती हैं क्योंकि इन्हें लंबे समय तक छिपाकर रखना आसान होता है. प्रतिक्रिया का समय बहुत कम हो जाता है। 

    अमेरिका और इजरायल के दावों पर सवाल
    अमेरिका और इजरायल ने युद्ध के दौरान ईरान की मिसाइल क्षमता को कमजोर करने को अपनी बड़ी उपलब्धि बताया था. उन्होंने दावा किया था कि कई उत्पादन स्थल नष्ट हो गए हैं और ईरान की मिसाइल स्टॉक में काफी कमी आई है. लेकिन अब खुफिया रिपोर्ट्स बता रही हैं कि उत्पादन फिर शुरू हो गया है. इससे उन दावों की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। 

    अगर ईरान अंडरग्राउंड फैसिलिटी में आसानी से मिसाइलें बना सकता है तो भविष्य में भी हवाई हमलों से पूरी क्षमता खत्म करना मुश्किल होगा. यह स्थिति क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए नई चुनौती पैदा कर रही है. मिडिल ईस्ट में तनाव पहले से ही ऊंचा है. ईरान की मिसाइल क्षमता बढ़ने से उसके पड़ोसी देशों और इजरायल के लिए खतरा बढ़ सकता है। 

    सॉलिड-प्रोपेलेंट मिसाइलें खासकर चिंता का विषय हैं क्योंकि इन्हें जल्दी तैनात किया जा सकता है. लिक्विड वाली मिसाइलों को ईंधन भरने में समय लगता है, इसलिए उनका पता लगाना और रोकना थोड़ा आसान होता है. लेकिन दोनों तरह की मिसाइलों का उत्पादन जारी रहना अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए परेशानी का सबब है। 

    अंडरग्राउंड प्रोडक्शन की रणनीति  
    ईरान लंबे समय से अपनी संवेदनशील सैन्य सुविधाओं को भूमिगत रखने की रणनीति अपनाता रहा है. पहाड़ी इलाकों और गहरे सुरंगों में फैक्ट्रियां बनाकर वह हवाई हमलों से बचाव करता है. युद्ध के बाद भी यही रणनीति काम आ रही है. स्टॉक किए गए पार्ट्स का इस्तेमाल करके वह नए उत्पादन प्लांट्स पर निर्भरता कम कर रहा है. इससे उत्पादन की रफ्तार तो धीमी हो सकती है, लेकिन रुक नहीं रही। 

    विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम दिखाता है कि आधुनिक युद्ध में किसी देश की सैन्य क्षमता को पूरी तरह नष्ट करना कितना मुश्किल है. एक बार स्टॉक जमा हो जाए और भूमिगत नेटवर्क मजबूत हो तो हमलों के बाद भी रिकवरी संभव हो जाती है। 

    अमेरिका और इजरायल के लिए अब नई चुनौती यह है कि वे कैसे इन भूमिगत स्थलों का पता लगाएं और उन्हें निशाना बनाएं. साथ ही राजनयिक दबाव और प्रतिबंधों के जरिए भी ईरान पर अंकुश लगाने की कोशिश जारी रह सकती है। 

    ईरान की मिसाइल क्षमता लौटने से पूरे मिडिल ईस्ट का सुरक्षा संतुलन प्रभावित हो सकता है. खाड़ी देश, इजरायल और अमेरिका सभी इस घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं. अगर उत्पादन की रफ्तार बढ़ी तो ईरान अपनी स्थिति मजबूत महसूस कर सकता है। 

    वहीं विरोधी पक्ष को अपनी रक्षा व्यवस्था और मजबूत करनी पड़ सकती है. यह मुद्दा सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि राजनयिक स्तर पर भी चर्चा का विषय बनेगा. अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह तय करना होगा कि ईरान की मिसाइल गतिविधियों पर कैसे नजर रखी जाए और आगे की कार्रवाई क्या हो। 

    कुल मिलाकर यह खबर साफ संकेत देती है कि युद्ध के बावजूद ईरान अपनी मिसाइल क्षमता को पूरी तरह खोने को तैयार नहीं है. अंडरग्राउंड फैसिलिटी और पहले से जमा पार्ट्स के सहारे वह धीरे-धीरे उत्पादन फिर शुरू कर चुका है. आने वाले समय में इस पर और खुफिया जानकारी सामने आएगी, लेकिन फिलहाल यह घटनाक्रम अमेरिका-इजरायल गठबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है। 

     

  • अदालत के बाहर बिलखती रहीं दो मासूम हिंदू बहनें, पाकिस्तान में जबरन धर्म परिवर्तन और निकाह का आरोप

    अदालत के बाहर बिलखती रहीं दो मासूम हिंदू बहनें, पाकिस्तान में जबरन धर्म परिवर्तन और निकाह का आरोप

    सिंध प्रांत
    पाकिस्तान के सिंध प्रांत से सामने आई दो नाबालिग हिंदू बहनों की गुहार आपको झकझोरकर रख देगी. रोते-सिसकते उनकी बस एक ही मांग थी, कि उन्हें अपने माता-पिता के पास घर भेज दिया जाए. लेकिन कोर्ट ने उन्हें परिवार के साथ भेजने के बजाय दो दिनों के लिए सेफ हाउस भेजने का आदेश दे दिया। 

    मामला तंदो अल्लाहयार के जिला कोर्ट का है, जहां सुनावाई के बाद दोनों बहनें रोती बिलखती नजर आईं. दोनों बहनों की पहचान सीता और रूपी के तौर पर बताई जा रही है. जानकारी के मुताबिक उनकी उम्र करीब 13 और 14 साल है। 

    परिवार का आरोप है कि दोनों को पहले अगवा किया गया, फिर धर्म परिवर्तन कराया गया और मुस्लिम युवकों से जबरन उनकी शादी करा दी गई. हालांकि अभी कर किसी सार्वजनिक पुलिस या कोर्ट दस्तावेजों से बच्चियों की उम्र और दावे की पुष्टि नहीं हुई है। 

    कोर्ट के बाहर रोती रहीं बच्चियां
    दोनों बहनों को तंदो अल्लाहयार की अदालत में पिछले हफ्ते दर्ज हुए किडनैपिंग के मामले में पेश किया गया था. सुनवाई के बाद बच्चियों ने अपने परिवार के पास जाने की इच्छा जताई.वहां मौजूद पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बताया कि वे लगातार रो रही थीं और घर जाने की बात कह रही थीं। 

    अदालत ने फिलहाल दोनों को दो दिन के लिए सेफ हाउस भेज दिया. कुछ अल्पसंख्यक अधिकारों से जुड़े कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि बच्चियों की बात सीधे सुनी जाए और उन्हें स्वतंत्र कानूनी और मनोवैज्ञानिक मदद दी जाए। 

    10 दिन में 6 नाबालिग लड़कियों के दावे से चिंता बढ़ी
    यह मामला इसलिए भी और है क्योंकि एक दिन बाद तंदो अल्लाहयार से 14 साल की एक और हिंदू लड़की पांसी कोहली के अपहरण की खबर सामने आई थी.  एक पाकिस्तानी पत्रकार के मुताबिक, 10 दिनों के अंदर जिले में छह नाबालिग हिंदू लड़कियों के अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन के मामले सामने आ चुके हैं।  

    सिंध पाकिस्तान में सबसे ज्यादा हिंदू आबादी वाला इलाका है. यहां हिंदू लड़कियों के अपहरण, धर्म परिवर्तन और मुस्लिम युवकों से शादी के आरोप पहले भी सामने आते रहे हैं. खास तौर पर गरीब और कमजोर परिवारों की बेटियां ज्यादा असुरक्षित मानी जा रही हैं। 

    कानून की नजर में नाबालिग, फिर शादी कैसे?
    अगर दोनों बहनों की उम्र 13 और 14 साल होने की पुष्टि होती है, तो सिंध के कानून के मुताबिक वे नाबालिग मानी जाएंगी. सिंध में शादी की न्यूनतम उम्र 18 साल है. यानी उम्र की पुष्टि होने पर 18 साल से कम उम्र में हुई शादी कानून के खिलाफ होगी. अब इस मामले में यह देखना अहम होगा कि बच्चियों की उम्र और उनकी इच्छा को लेकर कोर्ट क्या फैसला सुनाती है। 

    कब थमेगा डर का ये सिलसिला?
    यह कहानी दो बहनों के साथ पाकिस्तान में रहने वाले उन हजारों अल्पसंख्यक परिवारों की भी है, जो हर दिन अपनी बेटियों की सुरक्षा को लेकर डर के साये में जीते हैं। 

    लगातार नाबालिग लड़कियों के अपहरण, जबरन शादी और धर्म परिवर्तन के मामलों से पाकिस्तान की न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर अब सवाल उठ रहे हैं. अब नजर इस बात पर है कि आखिर इन बच्चियों को न्याय मिलेगा, या हजारों बच्चियों की तरह वो भी अदालती सुनवाई का हिस्सा बन कर रह जाएंगी। 

  • जमीन की कमी और गैस संकट के बीच यूरोप का अनोखा प्रयोग, समुद्र में बना एनर्जी आइलैंड; ब्रिटेन-डेनमार्क से जुड़ेगा ग्रिड

    जमीन की कमी और गैस संकट के बीच यूरोप का अनोखा प्रयोग, समुद्र में बना एनर्जी आइलैंड; ब्रिटेन-डेनमार्क से जुड़ेगा ग्रिड

    ब्रसेल्स

     सौ बात की एक बात कि बिजली पैदा करने को लेकर यूरोप के देश बेल्जियम से एक ऐसी ख़बर आई जिस पर ज़्यादा लोगों का ध्यान नहीं गया लेकिन सबको ध्यान देने की ज़रूरत है. बिजली पैदा करने के लिए दुनिया में क्या-क्या किया जा रहा है, इस पर सब को नज़र रखने की ज़रूरत है. क्योंकि दुनिया में ताक़त का खेल इसी आधार पर होता जा रहा है कि किसके पास कितनी ऊर्जा बनाने की कपैसिटी है. ईरान युद्ध में सारा खेल ही तेल के व्यापार को कंट्रोल करने का है. AI की जंग जो चल रही है, उसमें दुनिया के डेटा सेंटरों पर कंट्रोल करने के लिए बड़ी भारी मात्रा में बिजली की ज़रूरत पड़ेगी, ये सब देश समझ रहे हैं. ऊधर रूस और यूक्रेन युद्ध में यूरोप ने देख लिया कि उसके हाथ इसलिए बंधे हुए हैं क्योंकि उसको सर्दियों में अपने हीटिंग सिस्टम चलाने के लिए रूस की गैस की ज़रूरत पड़ती है. और यूरोप में अब जिस हिसाब से गर्मी पड़ने लग गई है तो वो ये भी समझ रहे हैं कि अब तो वहां भी AC लगाने पड़ेंगे आगे चल कर। 

    अभी तक पंखे भी नहीं देखे थे उन्होंने. तो बिजली कहां से आएगी इतनी? कोयले से बना नहीं सकते क्योंकि कोयला जला-जला कर ही तो 100 साल में दुनिया का ये हाल हो गया है कि दुनिया भर में गर्मी बढ़ गई है. यूरोप दूसरों को नसीहत दे रहा है कि कोयला मत जलाओ तो ख़ुद कैसे जला लेगा? तेल और गैस के लिए या तो रूस के सामने झुकना पड़ता है या अरब देशों पर निर्भर रहना पड़ता है. परमाणु बिजली के लिए यूरेनियम की मारामारी है. सोलर बिजली के लिए ज़मीन भी चाहिए जो यूरोप के कई देशों में उतनी है नहीं और बड़ी बात ये कि सूरज तो वहां निकलता ही कितने दिन है साल में? तो यूरोप के कई देश बनाते हैं बिजली हवा से। 

    हवा से मतलब विंडमिल से. पवन चक्कियों से. वो देखा है ना आपने बड़ा से पंखा लगा देते हैं ऊंचाई पर और वो हवा से चलता है तो नीचे चक्की चलती है और उससे बिजली बनाते हैं. लेकिन उसके लिए क्या चाहिए? एक तो बहुत सारी पवन चक्कियां एक साथ लगाने के लिए ख़ाली मैदान चाहिएं जहां खुली हवा तेज़ी से चलती हो. इतनी ज़मीन कहां से लाएं एक साथ? और ज़मीन पर पवन चक्कियां लगा दें तो खेती नहीं कर सकते वहां फिर. वो अलग नुक़सान है. क्योंकि अगर पवन चक्कियां वहां लगाएं जहां पर भी थोड़ी-बहुत जगह मिले तो वो तो कर सकते हैं लेकिन फिर ये दूर-दूर लगे पंखों से बिजली बनाकर एक जगह लाने के लिए इतना सारी केबल लगानी पड़ेगी, नहीं तो उसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कैसे करेंगे? और यूरोप के बेल्जियम जैसे देशों के पास तो वैसे भी इतनी सारी खुली ज़मीन नहीं है एक साथ. तो जानते हैं बेल्जियम क्या कर रहा है?

    बेल्जियम ने लगाया टापू वाला दिमाग
    बेल्जियम ने देखा कि सबसे ज़्यादा खुली और तेज़ हवा बिना किसी रुकावट के कहां चलती है? दिन हो रात कौन-सी ऐसी जगह है जहां पवन चक्कियों के पंखे फ़र्र-फ़र्र चलते रहेंगे और बिजली बनाते रहेंगे? और ज़मीन भी नहीं छोड़ने पड़ेगी उनके लिए? समुद्र में. जी, बेल्जियम ने सोचा कि अगर समुद्र में पवन चक्कियां लगा दें तो? पानी में ताल बिछाकर बिजली ज़मीन तक ले आएंगे. लेकिन समुद्र में पवन चक्कियां लगाएंगे कहां? तैरते हुए प्लैटफ़ॉर्म पर तो लगा नहीं सकते क्योंकि वो तो हवा से डोल जाएंगे. तो बेल्जियम क्या कर रहा है कि समुद्र में एक पूरा टापू बना रहा है. जी, पूरा नया टापू समुद्र के अंदर. ये अपने आप में दुनिया का एक नया अजूबा बनाया जा रहा है.  वो समुद्र में एक पूरा टापू बना रहा है बिजली पैदा करने के लिए। 

    कहां बन रहा यह आइलैंड?
    नॉर्थ सी में, उत्तर सागर में, बेल्जियम अपने तट से क़रीब 45 km दूर एक आर्टिफ़िशियल एनर्जी आइलैंड बना रहा है. प्रिंसेस एलिज़ाबेथ आइलैंड के नाम से. ये दुनिया का पहला ऐसा टापू बन रहा है. और ये टापू बनाया कैसे जा रहा है वो असली समझने वाली बात है. जैसे बच्चों के खिलौने होते हैं ना जिनमें ब्लॉक जोड़-जोड़ कर कोई बिल्डिंग बनाई जाती है या कुछ भी बनाया जाता है? वैसे बना रहा है. सिमेंट के, कॉन्क्रीट के बड़े-बड़े ब्लॉक बना रहा है, बक्से बना रहा है. और इन बक्सों में समंदर में डाल दिया जाएगा और उनको जोड़कर पूरा टापू बना देंगे. द नेदरलैंड्स के फ़्लिसिंगेन बंदरगाह में 23 ऐसे बड़े-बड़े कॉन्क्रीट के डिब्बे बनाए गए हैं. बड़े-बड़े मतलब एक-एक डिब्बा क़रीब 58m लंबा है, 28m चौड़ा है और 23 से 32m ऊंचा है. 58x28x32 समझ रहे हैं आप? मतलब एक 7 मंज़िला बिल्डिंग समझ लीजिए चौड़ी वाली. दो को जोड़ दो एक फ़ुटबॉल के मैदान जितनी जगह से भी ज़्यादा घेर लें, इतने बड़े-बड़े डिब्बे हैं. और हर डिब्बे का वज़न कितना? हर एक का वज़न है क़रीब 22,000 टन। 

    कैसे बन रहा आइलैंड
    मतलब समझ लो कोई 15,000 गाड़ियों जितना वज़न एक डिब्बे का. इतना सिमेंट लगा कर बने हैं ये डिब्बे. और ये तो अभी ख़ाली डिब्बों की बात हो रही है. खोखले बनाए गए हैं. 23 ऐसे डिब्बे. और इनको उतार दिया गया है समुद्र में. इन भारी डिब्बों को जहाज़ों से खींचकर समुद्र में ले जाया गया और वहां समुद्र के तल में डुबो दिया गया. और अब इनकी दीवारों के अंदर भरी जाएगी रेत. क़रीब बीस लाख क्यूबिक मीटर रेत भरी जा रही है. और ऐसे बनाया जा रहा है समुद्र के अंदर एक 6 हेक्टेयर का ठोस टापू. 6 हेक्टेयर मतलब लगभग 15 एकड़ का टापू बनेगा. मतलब समझ लो फ़ुटबॉल के 12 मैदानों जितना. उस पर बंदरगाह बनाया जाएगा, हेलीपैड बनाया जाएगा. और एक साथ 250 से ज़्यादा पवन चक्कियां लगाई जाएंगी, उनकी टर्बआइन लगाई जाएंगीं जिससे बिजली बनेगी और तारें बिछाई जाएंगी तट तक. डिब्बे समुद्र में उतार दिये गए हैं. बाक़ी काम में 5 साल लग जाएंगे. 2031 से बिजली मिलना शुरू हो जाएगी बेल्जियम को इससे। 

    कैसे बिजली पैदा होगी?
    यानी समुद्र में लगने वाली सैकड़ों पवन च
    क्कियों की बिजली को एक जगह इकट्ठा कर लिया जाएगा और फिर केबलों से ज़मीन तक पहुंचाया जाएगा. कितननी बिजली बनेगी, 3.5 GW बिजली बनने की उम्मीद है इससे. कोई ईंधन नहीं लगेगा. कोई कोयला नहीं, तेल नहीं, गैस नहीं. सिर्फ़ हवा से इतनी बिजली एक साथ एक ही जगह से बना ले जाएगी क्योंकि समुद्र में हवा बिना रुकावट से दिन-रात चलती रहती है. बेल्जियम को पीक बिजली की डिमांड होती है लगभग 9-10 GW और सर्दियों में हीटर चलते हैं तो लगभग 12 GW डिमांड हो जाती है. इस एक टापू से 3.5 GW मिल जाएगी मतलब पूरे देश की एक तिहाई ज़रूरत यहां से पूरी हो जाएगी. एक ही जगह से और ये फ़ॉर्मुला चल निकला तो सोचिए आगे बाक़ी देश भी क्या-क्या कर सकते हैं?

    समंदर में कितनी बिजली बनेंगी
    ज़मीन पर ये करने के लिए एक तो सैकड़ों पवन चक्कियां लगाने के लिए खेती की ज़मीन ख़ाली करनी पड़ेगी तो वो तो नुक़सान है ही. ऊपर से समुद्र में हवा ज़्यादा तेज़ चलती है और ज़्यादा स्थिर तरीक़े से चलती है, इसलिए एक ही क्षमता वाली पवन चक्की समुद्र में ज़मीन से कहीं ज़्यादा बिजली देती है. अगर वहां टापू पर 250 पवन चक्कियां लगानीं पड़ेंगी तो ज़मीन पर उतनी बिजली बनाने के लिए 350 पवन चक्कियां लगानी पड़ेंगीं. बेल्जियम बहुत छोटा और घना बसा हुआ देश है, ज़मीन उतनी है नहीं. पवन चक्कियों की आवाज़ भी होती है. और क़ुदरत के नज़ारे भी छुप जाते हैं पवन चक्कियां लगाने से. ख़ूबसूरत तो है ही सारा यूरोप. तो पवन चक्कियों के बड़े फ़ार्म लगाना वहां मुमकिन ही नहीं है। 

    नॉर्थ सी बनेगा यूरोप का बिजलीघर
    नॉर्थ सी यानी उत्तर सागर में हवा लगातार चलती है और तेज़ चलती है, इसलिए ये इलाक़ा पवन ऊर्जा के लिए दुनिया के सबसे अच्छे इलाक़ों में एक माना जाता है. रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप समझ चुका है कि गैस के लिए रूस पर निर्भर रहना ख़तरनाक है. आगे चलकर ये टापू ब्रिटेन के साथ भी केबल से जुड़ सकता है. और डेनमार्क के साथ भी जुड़ सकता है, ताकि पड़ोसी देशों को ये बिजली बेच भी सके. टापू को और बड़ा किया जा सकता है. मतलब नॉर्थ सी को यूरोप का बिजलीघर बनाया जा सकता है, पावरहाउस बनाया जा सकता है. सारा खेल ही पावर का है. और दुनिया देखिए क्या-क्या प्लैन बना रही है पावर के लिए. सौ बात की एक बात। 

  • स्पेस स्टेशन से बच्चों को मिला खास सबक, हांगकांग की पहली अंतरिक्ष यात्री ने सिखाया ‘हवा में पिंग-पोंग’

    स्पेस स्टेशन से बच्चों को मिला खास सबक, हांगकांग की पहली अंतरिक्ष यात्री ने सिखाया ‘हवा में पिंग-पोंग’

    हांगकांग
    हांगकांग की पहली अंतरिक्ष यात्री लाई का-यिंग ने बुधवार सुबह तियानगोंग स्पेस स्टेशन से 90 मिनट की लाइव क्लास लेते हुए स्कूल के बच्चों को जीरो ग्रेविटी वाली दुनिया का टूर कराया है. इस काम में उनके दो साथियों, कमांडर कर्नल झू यांगझू और झांग झियुआन ने भी मदद की है। 

    बच्चों को दिखाया स्लीपिंग एरिया
    करीब डेढ़ घंटे तक चली इस क्लास में लाई ने बच्चों को सबसे पहले अपना स्लीपिंग एरिया दिखाया, जो बच्चों की ड्रॉइंग्स, हांगकांग पुलिस के एंटी स्कैम मैस्कॉट और परिवार की तस्वीरों से सजा था. इस दौरान लाई ने बताया कि जब वो चीन के ऊपर से गुजरती हैं तो स्पेस स्टेशन की खिड़की से रात में हांगकांग के ग्रेटर बे एरिया की चमकती लाइटें ढूंढती हैं, क्योंकि वे बहुत चमकदार होती हैं। 

    पानी की बूंद से खेला पिंग-पोंग
    इस लाइव क्लास के दौरान लाई ने स्पेस स्टेशन के अंदर बने छोटे से सब्ज़ी के बगीचे के काम करने के तरीके के बारे में भी बताया, जबकि झू ने पौधों में पानी डालकर दिखाया और अंतरिक्ष में उगाए गए सलाद पत्ता को चखकर उसके स्वाद के बारे में भी बच्चों को बताया. इसके बाद लाई ने अपने साथियों संग मिलकर पानी से बनी पिंग-पोंग बॉल से टेबल टेनिस भी खेला. बच्चों ने हैरान होकर देखा कि वहां हवा में तैरती पानी की बूंदों से पिंग-पोंग खेला जाता है। 

    खाने में क्या-क्या खाते हैं एस्ट्रोनॉट?
    स्पेस में खाने के बारे में बताते हुए लाई ने कहा कि हम चावल, नूडल्स, ब्रेड, सब्जियां और मीट वाला संतुलित खाना खाते हैं. यहां छोटा केक बनाने की मशीन भी हैं, लेकिन उन्हें अपने फेवरेट हांगकांग-स्टाइल एग वफल की बहुत याद आती है। 

    इस क्लास का मकसद क्या था?
    साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, मई 2026 में उड़ान भरने वाले इस क्रू का मकसद सिर्फ अंतरिक्ष की जिंदगी दिखाना नहीं है. यह टीम वहां जेब्राफिश, चूहों और आर्टिफिशियल भ्रूणों पर 100 से ज्यादा साइंटिफिक स्टडी कर रही है ताकि स्पेस में रिप्रोडक्शन को समझा जा सके. इसके साथ ही नए मटीरियल और स्पेस बैटरियों की टेस्टिंग भी हो रही है। 

  • कृष्ण-बलराम की सबसे पुरानी छवि भारत में नहीं! अफगानिस्तान से मिले 2 हजार साल पुराने सिक्कों ने चौंकाया

    कृष्ण-बलराम की सबसे पुरानी छवि भारत में नहीं! अफगानिस्तान से मिले 2 हजार साल पुराने सिक्कों ने चौंकाया

    काबुल 

    अगर आपसे कहें कि भगवान श्रीकृष्ण और बलराम की सबसे प्राचीन छवियों में से एक भारत के किसी मंदिर में नहीं, बल्कि हजारों मील दूर अफगानिस्तान की वादियों में, एक विदेशी ग्रीक (यूनानी) राजा के सिक्कों पर मिली है तो क्या आप यकीन करेंगे? सुनने में यह किसी फिल्मी कहानी जैसा लग सकता है, लेकिन यह इतिहास की वो जीती-जागती हकीकत है जिसने पूरी दुनिया के इतिहासकारों और पुरातत्वविदों को हैरान कर दिया है. आज हम आपको ले चलते हैं 2200 साल पीछे के उस दौर में, जहां ग्रीक और भारतीय संस्कृति का ऐसा मिलन हुआ, जिसकी गवाही आज भी चांदी के ये दुर्लभ सिक्के दे रहे हैं। 

    ऐ-खानम की खुदाई में वो रहस्यमयी सिक्का
    बात 180 ईसा पूर्व के आसपास की है. मध्य एशिया का बैक्ट्रिया (जो आज का अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान का इलाका है), पूरब और पश्चिम के व्यापार और विचारों का सबसे बड़ा चौराहा हुआ करता था. वहां राज करता था एक यूनानी-बैक्ट्रियन राजा अगाथोक्लीज (King Agathocles) .

    अफगानिस्तान के ऐ-खानम में जब पुरातत्वविदों ने खुदाई की, तो जमीन के सीने से चांदी के चौकोर सिक्के निकले. जब इतिहासकारों ने इन सिक्कों को साफ करके गौर से देखा, तो उनके होश उड़ गए। 

    एक तरफ हलधर बलराम: सिक्के के एक पहलू पर एक दिव्य आकृति उकेरी गई थी, जिसके बाएं हाथ में हल और दाएं हाथ में मूसल था. ये कोई और नहीं, बल्कि हमारे हलधर बलराम थे। 

    दूसरी तरफ चक्रधारी कृष्ण: सिक्के को पलटते ही नजर आए छह तीलियों वाले सुदर्शन चक्र को थामे स्वयं भगवान वासुदेव कृष्ण। 

    देवी सुभद्रा की भी मौजूदगी: इतना ही नहीं, कुछ सिक्कों पर उनकी बहन देवी सुभद्रा का भी अंकन मिला यानी वही पावन त्रिमूर्ति जिसे आज हम पुरी के जगन्नाथ धाम में पूजते हैं। 

    यूनानी राजा की भक्ति
    राजा अगाथोक्लीज ने इन सिक्कों पर जो कारीगरी करवाई थी, वो उस दौर के सांस्कृतिक तालमेल की सबसे खूबसूरत मिसाल है. सिक्के के एक तरफ ग्रीक भाषा थी, तो दूसरी तरफ आम भारतीय जनमानस की भाषा यानी ब्राह्मी लिपि में प्राकृत. कहीं-कहीं खरोष्ठी लिपि का भी इस्तेमाल हुआ। 

    भगवान के वस्त्र और मुद्राएं विशुद्ध भारतीय थीं, जबकि उनके सिर का मुकुट और जूते यूनानी प्रभाव दर्शा रहे थे. जरा सोचिए, एक विदेशी शासक अपने राज्य में वैधता और जनता का दिल जीतने के लिए भारतीय देवताओं की शरण में जा रहा था।   

    कश्मीर से लेकर विदिशा तक जुड़ती कड़ियां

    यह कोई इकलौता वाकया नहीं था. इतिहास के पन्ने पलटें तो कई ऐसे सबूत मिलते हैं जो बताते हैं कि कृष्ण-बलराम की भक्ति उस दौर में सीमाओं के पार फैल चुकी थी. प्राचीन व्यापार मार्ग पर स्थित चिलास (कश्मीर) में पत्थरों पर उकेरे गए विशाल चित्र मिले हैं, जहां कुषाण शैली के चोगे पहने दो पुरुष हल और चक्र थामे नजर आते हैं. साथ में खरोष्ठी लिपि में उनके नाम दर्ज हैं।   

    विदिशा का गरुड़ स्तंभ (मध्य प्रदेश): शुंग काल में आए यूनानी राजदूत हेलियोडोरस ने विदिशा में एक विशाल स्तंभ बनवाया और खुद को गर्व से 'परम भागवत' (वासुदेव कृष्ण का अनन्य भक्त) घोषित किया। 

    मेगस्थनीज की डायरी: यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने भी अपनी किताब 'इंडिका' में लिखा था कि शूरसेन (मथुरा) के लोग जिस देवता की पूजा करते हैं, वे यूनान के 'हेराक्लीज' जैसे पराक्रमी हैं जो सीधे तौर पर भगवान कृष्ण का ही संदर्भ था। 

  • नेतन्याहू की वापसी पर सवाल! इजरायल के ताजा सर्वे में याशार सबसे बड़ी पार्टी, जानें किसे कितनी सीटें

    नेतन्याहू की वापसी पर सवाल! इजरायल के ताजा सर्वे में याशार सबसे बड़ी पार्टी, जानें किसे कितनी सीटें

    तेल अवीव
    इजरायल में आम चुनाव से पहले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए सर्वे के आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं. सोमवार को जारी एक ओपिनियन पोल के मुताबिक, अगर आज चुनाव होते हैं तो पूर्व इजरायली सेना प्रमुख गादी आइजनकोट की याशार पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बन सकती है. सर्वे में नेतन्याहू की जीत-हार को लेकर भी बड़े दावे सामने आ रहे हैं। 

    सर्वे में याशार को 25 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है, जबकि नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 21 सीटों पर सिमटती दिख रही है. यह सर्वे इजरायल के मार्केट रिसर्च और पब्लिक ओपिनियन पोलिंग संस्थान मिडगैम ने चैनल 12 के लिए किया है. पिछले सर्वे के मुकाबले याशार को एक सीट का फायदा हुआ है, जबकि लिकुड की दो सीटें कम हुई हैं. इजरायल की संसद यानी नेसेट में कुल 120 सीटें हैं। 

    विपक्षी गठबंधन को बहुमत से ज्यादा सीटों का अनुमान
    सर्वे के मुताबिक, पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट की टुगेदर पार्टी को 13 सीटें मिलने का अनुमान है. हालांकि, यह उसके हालिया सर्वे में सबसे कम आंकड़ा है और पिछली बार के मुकाबले पार्टी को दो सीटों का नुकसान हुआ है। 

    यायर गोलान की अगुवाई वाली डेमोक्रेट्स पार्टी 11 सीटों पर बनी हुई है. वहीं एविगडोर लिबरमैन की यिसराइल बेतेनु पार्टी को 8 सीटें मिलने का अनुमान है. यूनाइटेड टोरा यहूदी धर्म पार्टी को भी 8 और आर्येह डेरी की शास पार्टी को 7 सीटें मिल सकती हैं। 

    बेजलेल स्मोट्रिच और मोशे फेइग्लिन की अगुवाई वाले राइट-विंग धार्मिक जियोनिज्म और जेहुत गठबंधन को 6 सीटें मिलने का अनुमान है. ओफर विंटर की अमचा यिसराइल को 4 सीटें मिल सकती हैं। 

    इजरायल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अरब पार्टियों में जॉइंट लिस्ट को 7 और मंसूर अब्बास की यूनाइटेड अरब लिस्ट को 4 सीटें मिलने का अनुमान है. वहीं बेनी गैंट्ज की ब्लू एंड व्हाइट और अवी माओज की नोआम यिसराइल समेत कई पार्टियां 3.25 फीसदी के चुनावी थ्रेशोल्ड को पार करती नहीं दिख रही हैं। 

    पीएम पद की पसंद में भी आइजनकोट आगे
    राजनीतिक गुटों की बात करें तो विपक्षी खेमे को कुल 68 सीटें मिलने का अनुमान है. इनमें 57 सीटें यहूदी पार्टियों और 11 सीटें अरब पार्टियों की हैं. नेतन्याहू के खेमे को 52 सीटें मिलने का अनुमान है. स्मोट्रिच और विंटर की पार्टियों के चुनावी थ्रेशोल्ड पार करने से नेतन्याहू के खेमे को दो सीटों का फायदा हुआ है। 

    इजरायल में सरकार बनाने के लिए 120 सदस्यीय नेसेट में कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है. ऐसे में मौजूदा सर्वे के आंकड़े विपक्ष को बढ़त देते हैं, लेकिन सरकार बनाने के लिए गठबंधन की तस्वीर अहम होगी

    प्रधानमंत्री पद के लिए भी नेतन्याहू पिछड़ते दिख रहे हैं. सर्वे में 42 फीसदी लोगों ने गादी आइजनकोट को प्रधानमंत्री पद के लिए ज्यादा उपयुक्त बताया, जबकि नेतन्याहू के पक्ष में 35 फीसदी लोग रहे. यानी आइजनकोट को नेतन्याहू पर 7 प्रतिशत अंकों की बढ़त मिली। 

    यह सर्वे ऐसे समय आया है जब 27 अक्टूबर के आम चुनाव के लिए पार्टियों ने अपनी उम्मीदवार सूची जमा कर दी है. आइजनकोट ने बेनेट की पार्टी के साथ गठबंधन नहीं किया है. वहीं ओफर विंटर ने भी स्मोट्रिच की पार्टी के साथ जाने के बजाय अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है।