Category: विदेश

  • हूती ड्रोन को हवा में रोका, मक्का समेत कई सऊदी शहर अलर्ट पर

    हूती ड्रोन को हवा में रोका, मक्का समेत कई सऊदी शहर अलर्ट पर

     दुबई 
    सऊदी अरब और हूतियों के बीच जंग फिर तेज हो गई है. दक्षिणी सऊदी के शहरों पर मिसाइल और ड्रोन हमले हुए हैं, मक्का की तरफ भेजे गए ड्रोन को मार गिराने का सऊदी ने दावा किया है. यानबू में तेल लोडिंग रोक दी गई है और यमन में सऊदी गठबंधन के हवाई हमले जारी हैं। 

     हूतियों ने दक्षिणी सऊदी अरब में नए मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं. खमिस मुशैत, अबहा और ताइफ जैसे शहरों में नागरिक और सैन्य इलाकों को निशाना बनाए जाने की खबर है. इन हमलों में 13 नागरिक घायल हुए, घरों को नुकसान पहुंचा और किंग खालिद एयर बेस के पास आग लगने की खबर सामने आई। 

    इस जंग का असर सऊदी अरब के ऊर्जा ठिकानों और अहम समुद्री रास्तों पर भी दिख रहा है. हूतियों ने लाल सागर और बाब अल-मंदब स्ट्रेट के आसपास अपनी गतिविधियां बढ़ाई हैं. इसी बीच सऊदी अरब ने मक्का की तरफ हूतियों की तरफ से भेजे गए ड्रोन को इंटरसेप्ट कर नष्ट करने का दावा किया है. हालिया ड्रोन हमलों के बाद यानबू बंदरगाह पर तेल की लोडिंग भी रोक दी गई है। 

    सऊदी अरब ने हूती हमलों के खिलाफ कड़ी सैन्य कार्रवाई की बात कही है. इसके बाद सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने पश्चिमी और उत्तरी यमन में हूतियों के ठिकानों पर दर्जनों हवाई हमले किए हैं. वहीं अमेरिका ने सऊदी अरब के लिए अपनी ट्रैवल एडवाइजरी को लेवल 3 कर दिया है और नागरिकों से सऊदी की यात्रा पर दोबारा विचार करने को कहा है. ऐसे में सऊदी-हूती जंग से जुड़े हर बड़े अपडेट के लिए जुड़े रहिए। 

    मक्का-मदीना पर हमलों के दावे को लेकर OIC ने की निंदा
    ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन यानी OIC के महासचिवालय ने मक्का और मदीना क्षेत्र पर हूतियों के हमलों और सऊदी अरब के खिलाफ जारी हमलों की निंदा की है. OIC ने कहा कि पवित्र स्थलों, मस्जिदों और नागरिक ठिकानों पर हमले इस्लामी मूल्यों और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हैं। 

    OIC ने सऊदी अरब के साथ पूरी एकजुटता जताई है. संगठन ने पवित्र स्थलों, आम लोगों, सुरक्षा और सऊदी अरब की संप्रभुता की रक्षा के लिए उठाए जा रहे कदमों का समर्थन किया है। 

    Yemen PM ने कहा- बढ़ता हमला अब पूरे क्षेत्र की सुरक्षा के लिए खतरा
    यमन के प्रधानमंत्री शाया मोहसेन अल-जिंदानी ने हूतियों की बढ़ती सैन्य गतिविधियों को लेकर चिंता जताई है. अदन में उन्होंने संसद के डिप्टी स्पीकर मोहम्मद अल-शद्दादी से मुलाकात की. प्रधानमंत्री कार्यालय के मुताबिक, बैठक में हूतियों की सैन्य बढ़त, नागरिकों और विस्थापित लोगों के खिलाफ कथित उल्लंघन और सरकारी संस्थानों के बीच तालमेल पर चर्चा हुई। 

    अल-जिंदानी ने कहा कि हूतियों की बढ़त अब सिर्फ यमन का अंदरूनी सैन्य मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन गई है. उन्होंने हूतियों को ईरान से मिलने वाले समर्थन का भी आरोप लगाया. उनके मुताबिक, सऊदी अरब पर हूतियों के मिसाइल और ड्रोन हमलों को यमन के पश्चिमी तट पर बढ़ी सैन्य गतिविधियों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। 

    हूती हमलों के बीच मिस्र क्यों गए थे सऊदी क्राउन प्रिंस?
    सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने मंगलवार को काहिरा में मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी से मुलाकात की. यह बैठक ऐसे वक्त हुई है जब हूती विद्रोहियों के हमलों से सऊदी अरब के शिपिंग और तेल से जुड़े ठिकानों पर दबाव बढ़ा है. दोनों नेताओं ने लाल सागर और बाब अल-मंदब स्ट्रेट में समुद्री आवाजाही की आजादी और सुरक्षा सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता दोहराई। 

    मिस्र के राष्ट्रपति कार्यालय ने सऊदी अरब को समर्थन देने की बात कही है. हालांकि, दोनों पक्षों ने आगे उठाए जाने वाले किसी ठोस कदम की जानकारी नहीं दी. रिपोर्ट के मुताबिक, मिस्र सऊदी अरब को सैन्य मदद देने की संभावना कम है, लेकिन अरब दुनिया में उसका प्रभाव है और वह सऊदी अरब के समर्थन में दूसरे देशों को साथ लाने में मदद कर सकता है। 

     अल-जौफ में सऊदी समर्थित बलों से सीधी भिड़ंत का दावा
    यमन में हूतियों और सऊदी समर्थित बलों के बीच जंग और तेज होती दिख रही है. हूती समर्थक मीडिया ने एक वीडियो जारी किया है, जिसमें सऊदी समर्थित बलों के साथ सीधी भिड़ंत का दावा किया गया है. करीब से शूट किए गए इस वीडियो में गोलीबारी और हमले होते दिखाई दे रहे हैं. हूती पक्ष के मुताबिक, यह लड़ाई अल-जौफ के पूर्वी इलाके में हुई। 

    वीडियो में लड़ाकों की आवाज भी सुनाई दे रही है. इसमें दुश्मन पर हमला करने और ऑपरेशन वाले इलाके के अंदर उसे निशाना बनाने की बात कही जा रही है. हालांकि, वीडियो में दिखाई दे रही जगह और इसमें किए गए दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। 

    अल-जौफ के पूर्व में सऊदी समर्थित बलों से सीधी भिड़ंत का दावा
    हूती समर्थित मीडिया की ओर से जारी फुटेज में सऊदी समर्थित बलों के साथ सीधी भिड़ंत का दावा किया गया है. बताया गया है कि यह झड़प अल-जौफ के पूर्वी इलाके में हुई। वीडियो में इलाके में सऊदी समर्थित सैन्य जमावड़े को निशाना बनाए जाने का दावा किया गया है. यह फुटेज अंसार अल्लाह की ओर से जारी किया गया है। 

     

  • डीजल महंगा होते ही सड़कों पर उतरे लोग, सीरिया में 40% कीमत बढ़ने से बवाल

    डीजल महंगा होते ही सड़कों पर उतरे लोग, सीरिया में 40% कीमत बढ़ने से बवाल

    दमिश्क

    कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग का असर दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल के दाम पर पड़ने लगा है। अभी भारत में फिलहाल राहत है, लेकिन सीरिया में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने पर लोगों का गुस्सा भड़क गया। वहां लोगों ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। प्रदर्शनकारियों ने टायर जलाए और कई प्रमुख सड़कों को जाम कर दिया। इनमें राजधानी दमिश्क को औद्योगिक शहर अलेप्पो से जोड़ने वाला हाईवे भी शामिल है।

    एक झटके में 40% बढ़ा दिया डीजल का दाम
    रॉयटर्स के मुताबिक सीरिया की सरकार ने शनिवार को डीजल की कीमत 40% बढ़ाकर 175 सीरियाई पाउंड प्रति लीटर कर दी। यह करीब 1.32 डॉलर यानी लगभग ₹127 प्रति लीटर बैठता है। कीमतों में बढ़ोतरी ऐसे समय हुई है जब सीरिया की करीब 90% आबादी गरीबी रेखा के नीचे रह रही है। सीरियाई गृहयुद्ध शुरू होने से पहले 2011 में यह आंकड़ा करीब एक-तिहाई था।

    पेट्रोल और गैस भी महंगी
    सरकार ने डीजल के अलावा कई अन्य ईंधनों की कीमतों में भी बढ़ोतरी की है। घरेलू और औद्योगिक गैस की कीमत करीब 9% बढ़ाई गई है। वहीं, 95 ऑक्टेन पेट्रोल 28% बढ़कर 195 पाउंड और 90 ऑक्टेन पेट्रोल 26% बढ़कर 185 पाउंड प्रति लीटर हो गया है।

    दुनिया के कई देशों में किमतें आसमान पर, लेकिन भारत में राहत
    युद्ध के बाद से भारत में अभी तक पेट्रोल-डीजल के रेट में करीब 8 प्रतिशत की ही बढ़ोतरी की गई है। वहीं, पेट्रोल-डीजल महंगा करने वाले टॉप 5 देशों की बात करें तो नाइजीरिया पेट्रोल के मामले में टॉप पर है। यहां पेट्रोल 60.7 प्रतिशत महंगा हुआ है। जबकि, डीजल 92.3 प्रतिशत।

    यूएई में पेट्रोल 58.4 प्रतिशत महंगा हुआ है तो डीजल के दाम 70.6 प्रतिशत बढ़े हैं। म्यांमार में पेट्रोल 55.4 और डीजल 71.9 प्रतिशत महंगा हुआ है। मलेशिया में पेट्रोल करीब डेढ़ गुना महंगा हो गया तो डीजल के दाम 56 प्रतिशत से अधिक उछल गए हैं।

    अगर केवल डीजल की बात करें इंडेनेशिया दूसरा सबसे अधिक महंगाई की मार झेल रहा है। यह डीजल करीब 87 प्रतिशत महंगा हो चुका है। इसके बाद लेबनान है जहां डीजल 80 प्रतिशत महंगा हुआ है।

    रूस से तेल सप्लाई पर भी दबाव
    सीरिया के ऊर्जा मंत्रालय के प्रवक्ता अब्दुलहमीद सलात के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर ईंधन खरीद की लागत बढ़ने और आयात पर सीरिया की भारी निर्भरता के कारण यह फैसला लिया गया है। परिस्थितियां बदलने पर कीमतें फिर घटाई या बढ़ाई जा सकती हैं।

    सीरिया इस साल रूस से करीब 60,000 बैरल कच्चा तेल प्रतिदिन आयात कर रहा है। हालांकि दमिश्क ने अमेरिका से कहा है कि वह रूसी तेल की खरीद में भारी कटौती करने को तैयार है।

    यूक्रेन के रूसी रिफाइनरियों पर हमलों से रूस में ईंधन उत्पादन प्रभावित हुआ है। इसके बाद मॉस्को ने पेट्रोल और डीजल के निर्यात पर भी पाबंदियां लगाई हैं। इससे सीरिया की तेल क सप्लाई पर दबाव और बढ़ गया है।

    सबसे बड़ी बनियास रिफाइनरी बंद: इसके अलावा सीरिया की सबसे बड़ी बनियास रिफाइनरी करीब तीन महीने से बंद है। यहां पहली बार बड़े स्तर पर रखरखाव का काम चल रहा है, जिससे ईंधन की कमी और गहरा गई है।

    फरवरी से पेट्रोल 86% और डीजल दोगुने से ज्यादा महंगा
    नई बढ़ोतरी के बाद सीरिया में 95 ऑक्टेन पेट्रोल की कीमत फरवरी के मुकाबले करीब 86% बढ़ चुकी है, जबकि डीजल की कीमत दोगुने से भी ज्यादा हो गई है। इस दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 44% बढ़कर 72 डॉलर से 107 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई है।

  • नेपाल में बिजली संकट गहराया, बाढ़ से पावर सिस्टम बेहाल; भारत 18 घंटे रोज देगा बिजली

    नेपाल में बिजली संकट गहराया, बाढ़ से पावर सिस्टम बेहाल; भारत 18 घंटे रोज देगा बिजली

    काठमांडू 
    प्राकृतिक आपदा की मार झेल रहे पड़ोसी देश नेपाल की मदद के लिए भारत ने एक बार फिर दोस्ती का हाथ बढ़ाया है। भीषण बाढ़ और भूस्खलन के कारण नेपाल के हाइड्रोपावर इंफ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान पहुंचा है, जिससे वहां बिजली का गंभीर संकट पैदा हो गया है। इस संकट से उबारने के लिए भारत ने 31 दिसंबर 2026 तक नेपाल को रोजाना 18 घंटे 654 मेगावाट (MW) तक बिजली निर्यात करने की मंजूरी दे दी है।

    नेपाल के 'नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी' के मुताबिक, इस तबाही में अब तक 1,385 से ज्यादा लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 5,130 लोग अभी भी लापता हैं। नेपाल और तिब्बत सीमा के पास बीते 26 अगस्त को हुए बर्फ की चट्टान खिसकने (Avalanche) के बाद आई इस तबाही ने दर्जनों गांवों और बुनियादी ढांचे को तहस-नहस कर दिया है।

    क्यों ठप पड़ गया नेपाल का पावर सेक्टर?
    नेपाल अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह से नदियों और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स पर निर्भर है। लेकिन इस भौगोलिक निर्भरता का एक नुकसान यह भी है कि जब भी बाढ़ या भूस्खलन जैसी आपदा आती है, तो नेपाल का पावर ग्रिड रातों-रात धराशायी हो जाता है।

    12 से ज्यादा पावर प्लांट तबाह: इस विनाशकारी बाढ़ में 12 से ज्यादा हाइड्रोपावर प्लांट या तो बह गए या उन्हें भारी नुकसान पहुंचा है।

    कर्मचारी भी लापता: पावर सेक्टर में काम करने वाले लगभग 900 कर्मचारी भी लापता बताए जा रहे हैं, जिससे मरम्मत का काम भी ठप पड़ा है।

    उलट गए हालात: जो नेपाल हाल के सालों में अपनी अतिरिक्त बिजली भारत को बेच रहा था, इस आपदा ने पासा पलट दिया। अब नेपाल को अपनी घरेलू जरूरतें पूरी करने के लिए भारत से बिजली मांगनी पड़ रही है।

    654 MW बिजली सप्लाई का क्या है प्लान?
    भारतीय विद्युत मंत्रालय ने 13 सितंबर से 31 दिसंबर 2026 तक के लिए इस सप्लाई को हरी झंडी दे दी है। यह बिजली नेपाल को आधी रात 12 बजे से शाम 6 बजे तक यानी दिन के 18 घंटे उपलब्ध कराई जाएगी।

    कुल 654 मेगावाट में से 600 मेगावाट बिजली मुजफ्फरपुर-ढालकेबार 400 kV डबल-सर्किट लाइन के जरिए भेजी जाएगी। बाकी 54 मेगावाट बिजली तनकपुर-महेंद्रनगर 132 kV लाइन से सप्लाई होगी।

    दिन का समय क्यों चुना गया?
    दिन के समय भारत के पास अपनी सौर ऊर्जा की अच्छी-खासी उपलब्धता रहती है। ऐसे में अपनी सरप्लस ग्रीन एनर्जी का इस्तेमाल कर भारत पड़ोसी देश की मदद आसानी से कर पा रहा है।

    भारत ने साफ किया है कि यह व्यवस्था 31 दिसंबर तक के लिए है। जनवरी 2027 से नेपाल को कितनी बिजली दी जाएगी, इसका रिव्यू दिसंबर के आखिरी हफ्ते में किया जाएगा।

    मुश्किल वक्त में काम आई भारत-नेपाल की दोस्ती
    नेपाल के पास नदियां और पनबिजली की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन भारत के पास वह मजबूत ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर और बैकअप है जो किसी भी आपात स्थिति में नेपाल की लाइफलाइन बन सकता है।

    भारत के विद्युत मंत्रालय का कहना है कि इस फैसले से नेपाल को संकट से उबरने में मदद मिलेगी और दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे ऊर्जा संबंधों को और मजबूती मिलेगी। भारत के लिए यह कदम केवल एक मदद नहीं, बल्कि अपनी 'नेबरहुड फर्स्ट' (पड़ोसी प्रथम) कूटनीति की एक ठोस और व्यावहारिक मिसाल है।

  • UK में बढ़ रही अलगाव की आवाज, स्कॉटलैंड से नॉर्दर्न आयरलैंड तक आजादी की मांग के पीछे क्या है वजह?

    UK में बढ़ रही अलगाव की आवाज, स्कॉटलैंड से नॉर्दर्न आयरलैंड तक आजादी की मांग के पीछे क्या है वजह?

    लंदन 

    यूनाइटेड किंगडम फिर टूटने की कगार पर पहुंच गया है. स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड आजादी के लिए आवाज उठा रहे हैं. इसके लिए जनमत संग्रह कराने की तैयारी चल रही है. खासतौर से ये चर्चा इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि तीनों ही देशों के नेता वेल्स की राजधानी कार्डिफ में मिलने वाले है. इससे पहले हुए सर्वेक्षणों में स्कॉटलैंड में आजादी के पक्ष में 45 प्रतिशत, नॉर्दन आयरलैंड में तकरीबन 36 प्रतिशत लोग आजादी के समर्थन में रहे हैं। 

    दुनिया के नक्शे पर यूनाइटेड किंगडम यानी यूके एक मजबूत और सबसे पुराना राजनीतिक यूनियन है. इसमें इंग्लैंड, स्कॉटलैंड वेल्स और उत्तरी आयरलैंड हैं. मगर अब इसके टूटने का खतरा मंडरा रहा है. इंग्लैंड के साथी तीनों देश आजादी मांग रहे हैं. मगर सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों है? सैंकड़ों साल का ये साथ अब छूटने की कगार पर क्यों पहुंच गया है। 

    कैसे बना यूके?
    1707 में एक्ट ऑफ यूनियन के बाद इंग्लैंड और स्कॉटलैंड एक राजनीतिक यूनियन में आए थे. स्कॉटलैंड यूके का हिस्सा तो बना था, मगर उसने अपनी अलग कानूनी और शैक्षणिक व्यवस्था की पहचान को बरकरार रखा. वेल्स इससे पहले ही यूके का हिस्सा बन चुका था. आयरलैंड की कहानी इससे अलग है. ब्रिटिश शासन के खिलाफ आयरिश राष्ट्रवाद लंबे समय तक मजबूत होता रहा. 20 वीं सदी में आयरलैंड दो हिस्सों में बंटा. नॉर्दर्न आयरलैंड यूके में बना रहा, जबकि शेष आयरलैंड आजादी के रास्ते पर आगे बढ़ा। 

    स्कॉटलैंड यूके से अलग क्यों होना चाहता है?
    स्कॉटलैंड की आजादी की मांग कोई नई बात नहीं है. यहां लंबे समय से स्कॉटिश नेशनल पार्टी इस मुद्दे को उठाती रही है. इसके पीछे कई कारण हैं. दरअसल स्कॉटलैंड की अपनी ऐतिहासिक पहचान है. उसकी अलग कानूनी व्यवस्था, शिक्षा प्रणाली हैं. स्वतंत्रता समर्थकों का तर्क है कि जब स्कॉटलैंड की अपनी अलग पहचान है तो उसे अपना भविष्य तय करने का अधिकार होना चाहिए। 

    एक बड़ा मुद्दा यह भी है कि स्कॉटलैंड के मतदाता कई बार जिस राजनीतिक दिशा में वोट करते हैं, लंदन की UK सरकार उससे अलग फैसला लेती है. इसका सबसे बड़ा उदारहण ब्रेक्सिट को बताया जाता है. 2016 के ब्रेक्सिट जनमत संग्रह में स्कॉटलैंड के अधिकांश लोगों ने यूरोपीय संघ में बने रहने के पक्ष में मतदान किया था, लेकिन ब्रिटेन इससे बाहर चला गया। 

    2014 में क्या हुआ था?
    स्कॉटलैंड में UK से अलग होने को लेकर पहले ही जनमत संग्रह हो चुका है. 18 सितंबर 2014 को लोगों से पूछा गया था कि क्या स्कॉटलैंड एक स्वतंत्र देश होना चाहिए? इसमें आजादी के खिलाफ 55.3 प्रतिशत लोगों ने वोट किया था, जबकि आजादी के पक्ष में महज 44.7 प्रतिशत लोग थे. हालांकि स्कॉटलैंड की आजादी के समर्थक ऐसा मानते हैं कि अब हालात बदल चुके हैं. खासतौर से ब्रेक्सिट के बाद जनता से राय लेने का मौका मिलना चाहिए। 

    दूसरा जनमत संग्रह क्यों नहीं हो रहा?
    स्कॉटलैंड की सरकार और आजादी के समर्थक दोबारा जनमत संग्रह की मांग करते रहे हैं, लेकिन यूके सरकार इसकी अनुमति नहीं देती. मामला ब्रिटेन की सर्वोच्च अदालत तक भी पहुंच चुका है. यूके सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि आजादी एक संवैधानिक मुद्दा है, जिस पर यूके की संसद ही फैसला ले सकती है. इसलिए स्कॉटिश संसद के लिए वेस्टमिंस्टर की मंजूरी के बिना जनमत संग्रह कराना आसान नहीं है. यानी लोग क्या चाहते हैं इसके बारे में तभी पता किया जा सकता है जब सरकार इसके बारे में चाहे। 

    नॉर्दन आयरलैंड की कहानी क्या है?
    स्कॉटलैंड के पास चॉइस है कि वह यूके में रहना चाहता है या आजाद होना चाहता है, जबकि नॉर्दन आयरलैंड के सामने सवाल ये है कि उसे यूके में रहना है या आयरलैंड रिपब्लिक में जुड़ना है. उत्तरी आयरलैंड में इसे लेकर दो विचारधारा हैं. कुछ लोगों का मानना है कि इसे यूके का ही हिस्सा रहना चाहिए, जबकि एक बड़े वर्ग का मानना है कि इसे आयरलैंड गणराज्य का ही हिस्सा होना चाहिए. इसे लेकर दशकों से विवाद रहा है, जिसकी शुरुआत 1960 में शुरू हुई थी जो 1990 तक चली. इसे द ट्रबल्स भी कहा जाता है. इस दौरान दोनों पक्षों में हिंसा हुई. 1998 में एक गुड फ्राइडे एग्रीमेंट हुआ जो आयरलैंड का भविष्य तय करता है। 

    क्या था गुड फ्राइडे एग्रीमेंट?
    10 अप्रैल 1998 को हुए इस ऐतिहासिक समझौते में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत तय किया गया. इसमें ये तय किया गया कि नॉर्दन आयरलैंड यूके का हिस्सा तब तक रहेगा जब तक वहां की आबादी ऐसा चाहती है. अगर जनमत संग्रह में लोग आयरलैंड रिपब्लिक के साथ जाना चाहेंगे तो नॉर्दर्न आयरलैंड यूके से बाहर आ सकता है. हाल ही में इसे लेकर राजनीतिक बहस तेज हुई है. हालांकि ये नहीं कहा जा सकता है कि सच में नॉर्दन आयरलैंड के लोग आयरलैंड रिपब्लिक से जुड़ना चाहते हैं या नहीं। 

     

  • AI की रफ्तार रोकने की चर्चा के बीच ट्रंप का चीन को सख्त संदेश, टेक दुनिया में बढ़ी हलचल

    AI की रफ्तार रोकने की चर्चा के बीच ट्रंप का चीन को सख्त संदेश, टेक दुनिया में बढ़ी हलचल

     नई दिल्ली
    अमेरिका और चीन के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को लेकर होड़ लगातार तेज हो रही है. इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कर दिया है कि वह AI के विकास की रफ्तार को कम करने के पक्ष में नहीं हैं. आयरलैंड के डूनबेग में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि अमेरिका AI के विकास में चीन से आगे है और वह इस बढ़त को बनाए रखना चाहते हैं. उन्होंने यहां तक कहा कि AI की वैश्विक दौड़ में जो जीतेगा, वही जीतेगा। 

    ट्रंप ने माना कि AI के लिए कुछ सुरक्षा नियम यानी गार्डरेल्स जरूरी हो सकते हैं. हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि उनकी सरकार किस तरह के नियम लाने की तैयारी कर रही है. AI के तेजी से विकास को लेकर चिंता जताने वालों पर ट्रंप ने कहा कि तकनीक को लेकर ऐसा सोचने वाले लोग नकारात्मक सोच रखते हैं। 

    ट्रंप बोले- AI की रफ्तार नहीं रोकना चाहते
    ट्रंप का यह बयान AI इंडस्ट्री में विकास की रफ्तार को लेकर चल रही बहस के बीच आया है. एंथ्रोपिक AI के CEO डारियो अमोडेई ने एक दिन पहले कहा था कि AI इंडस्ट्री को विकास की रफ्तार कुछ धीमी करनी चाहिए, ताकि सुरक्षा उपायों को तकनीक के साथ कदम मिलाने का समय मिल सके. एलन मस्क और ओपनAI के CEO सैम ऑल्टमैन भी इस मुद्दे पर सार्वजनिक तौर पर सहमति जता चुके हैं। 

    वहीं, ट्रंप AI से जुड़े डेटा सेंटर के निर्माण के समर्थन में बने हुए हैं. अमेरिका में बड़ी टेक कंपनियां छोटे शहरों में कंप्यूटिंग डेटा सेंटर का नेटवर्क तैयार कर रही हैं. हालांकि, दोनों पार्टियों के नेता जमीन, पानी, बिजली की बढ़ती जरूरत और महंगे बिजली बिल को लेकर सवाल उठा रहे हैं। 

    चीन से मुकाबले को लेकर कोई समझौता नहीं
    ट्रंप के बयान से साफ है कि अमेरिका AI की रेस में चीन से अपनी बढ़त बनाए रखना चाहता है. इसी वजह से AI की विकास दर कम करने का सवाल अमेरिका के लिए अहम बन गया है. पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा भी कह चुके हैं कि डेमोक्रेट्स को AI को चुनावी मुद्दा बनाना चाहिए। 

    नेशनल इकोनॉमिक काउंसिल के निदेशक केविन हैसेट के मुताबिक, इस हफ्ते साइबर और साइंस-टेक्नोलॉजी से जुड़े अधिकारी AI की आगे की रणनीति पर बैठक कर सकते हैं. हाउस स्पीकर माइक जॉनसन ने भी AI के लिए कुछ सेफ्टी मेजर्स की जरूरत मानी है, लेकिन अमेरिका को AI में आगे बनाए रखना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी बताया। 

    इसी बहस के बीच एंथ्रोपिक के पूर्व कर्मचारी जैकब कॉक्सन ने अमेरिका और चीन से मिलकर AI विकास की रफ्तार को जिम्मेदारी से कंट्रोल करने की अपील की है. उनका डर है कि अगर दोनों देश बिना पर्याप्त सुरक्षा के एक-दूसरे से आगे निकलने की दौड़ में लगे रहे, तो यही AI रेस खतरनाक साबित हो सकती है। 

  • LAC पर बदली तस्वीर, 2025 में घट गई चीनी सेना की तैनाती; भारत ने उत्तरी सीमा पर बढ़ाई पकड़

    LAC पर बदली तस्वीर, 2025 में घट गई चीनी सेना की तैनाती; भारत ने उत्तरी सीमा पर बढ़ाई पकड़

     नई दिल्ली
    भारत-चीन सीमा से जुड़ी बड़ी खबर सामने आई है. रक्षा मंत्रालय की 2025-26 की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में उत्तरी सीमाओं पर चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी यानी PLA की तैनाती में बड़ी कमी देखी गई है. रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC के सामने अपनी तैनाती घटाई है और अब उत्तरी सीमाओं और पारंपरिक ट्रेनिंग इलाकों में करीब 10 कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड के बराबर बल तैनात हैं। 

    रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की तरफ से सभी LAC सेक्टर में सेना की तैनाती मजबूत बनी हुई है. भारतीय सेना किसी भी उभरती चुनौती से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार और सही स्थिति में है. रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत-चीन के बीच सकारात्मक राजनीतिक, कूटनीतिक और सैन्य स्तर की बातचीत से उत्तरी सीमाओं पर हालात में ज्यादा स्थिरता आई है। 

    चीन के साथ फिर शुरू हुआ सैन्य संवाद
    रिपोर्ट के मुताबिक, भारत और चीन के बीच सैन्य स्तर पर बातचीत भी फिर शुरू हुई है. इसमें अक्टूबर 2025 में पूर्वी लद्दाख में हुई 23वीं कोर कमांडर स्तर की बैठक भी शामिल है. दोनों देशों के बीच सैन्य बातचीत के जरिए सीमा से जुड़े मुद्दों को सुलझाने और तनाव कम करने की कोशिश जारी है। 

    इसके अलावा PLA के साथ बॉर्डर पर्सनल मीटिंग यानी BPM भी सभी सेक्टर में जारी हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि इन बैठकों का माहौल सौहार्दपूर्ण रहा है और इनके जरिए दोनों पक्षों से जुड़े मुद्दों को उठाया और सुलझाया जा रहा है। 

    ऑपरेशन सिंदूर के बाद क्षमताओं की समीक्षा
    रक्षा मंत्रालय ने अपनी रिपोर्ट में ऑपरेशन सिंदूर का भी जिक्र किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की मल्टी-डोमेन क्षमता, इंटेलिजेंस में बढ़त, तकनीकी ताकत और तीनों सेनाओं की संयुक्त ऑपरेशनल तैयारी को दिखाया। 

    ऑपरेशन के बाद सेना ने अपनी क्षमताओं और कमियों की समीक्षा भी की. इसके बाद फोर्स रिस्ट्रक्चरिंग, तीनों सेनाओं के बीच ज्यादा जॉइंटनेस और नई तकनीकों पर फोकस बढ़ाया गया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि बदलते सुरक्षा हालात को देखते हुए भारतीय सेना अपनी तैयारी और क्षमताओं को लगातार मजबूत कर रही है। 

    डिफेंस मिनस्ट्री की सालाना रिपोर्ट में क्या है, बड़ी बातें

        भारत और चीन के बीच प्रगाढ़ हो रहे रिश्तों के बीच ही भारतीय रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट आई है।
        वित्त वर्ष 2025-26 की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2025 में उत्तरी सीमाओं के सामने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की सेनाओं की तैनाती में काफी कमी देखी गई।
        इसमें LAC के साथ वाले इलाकों और पारंपरिक ट्रेनिंग इलाकों में 10-10 'कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड' आकार की सेनाएं तैनात थीं।
        इसका मतलब है कि लद्दाख से अरुणाचल प्रदेश तक फैली LAC पर लगभग 45,000-50,000 चीनी सैनिक थे, और इतनी ही संख्या पारंपरिक ट्रेनिंग इलाकों में भी थी।
        रिपोर्ट के मुताबिक, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की 10 अतिरिक्त ब्रिगेड उसके पारंपरिक ट्रेनिंग इलाकों में तैनात हैं।

    2020 में टकराव, तक लद्दाख सीमा पर तैनात थे 60000 चीन सैनिक: रिपोर्ट
    हालांकि MoD की यह रिपोर्ट इस महीने जारी की गई है, लेकिन इसे अरुणाचल प्रदेश में सीमा पर मौजूदा तनाव के दौर से पहले तैयार किया गया था। उस तनाव के कारण अतिरिक्त सैनिकों को आगे के इलाकों में तैनात करना पड़ा था। 2020 के सीमा संकट के दौरान, लद्दाख सीमा पर लगभग 60,000 चीनी सैनिक तैनात थे। रिपोर्ट में भारतीय तैनाती का जिक्र नहीं है।

    अरुणाचल में टकराव के बाद कितने बदले हालात
    सालाना रिपोर्ट में अरुणाचल की स्थिति का खास तौर पर जिक्र नहीं है, लेकिन कहा गया है कि LAC के सभी सेक्टरों में भारतीय सेना की तैनाती मजबूत और अच्छी स्थिति में है, और वह किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए तैयार है। रिपोर्ट को अंतिम रूप दिए जाने के बाद के महीनों में, अरुणाचल के कम से कम दो इलाकों में सीमा पर तनाव हुआ है, जिसके चलते आगे तैनात सैनिकों की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है।

    लगातार जारी है बॉर्डर पर्सनल मीटिंग्स
    तनाव के बाद स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव (विशेष प्रतिनिधि) स्तर की बातचीत हुई, और उसके बाद मतभेदों को सुलझाने के लिए इस महीने की शुरुआत में कोर कमांडर स्तर की बैठक हुई। रिपोर्ट में कहा गया है कि जमीनी स्तर पर, टकराव के मुद्दों को सुलझाने के लिए सभी सेक्टरों में PLA के साथ सौहार्दपूर्ण और दोस्ताना माहौल में 'बॉर्डर पर्सनल मीटिंग्स' (सीमा कर्मियों की बैठकें) जारी हैं।

    ऑपरेशन सिंदूर पर रिपोर्ट में क्या है?
    'ऑपरेशन सिंदूर' पर बनी रिपोर्ट में भारतीय सशस्त्र बलों के सफल हमलों का जिक्र है, जिन्होंने पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादी बुनियादी ढांचे को नष्ट किया और वहां की सेना को भारी नुकसान पहुंचाया। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि ऑपरेशन के दौरान ड्रोन और एंटी-ड्रोन उत्पाद उपलब्ध कराने में भारतीय उद्योग की क्षमता में कमी थी, जिसे अब तेजी से विकास करके दूर किया जा रहा है।

  • भारत से रिश्तों को लेकर बांग्लादेश का बदला रुख, BRICS समिट के बाद PM तारिक रहमान का बड़ा यू-टर्न

    भारत से रिश्तों को लेकर बांग्लादेश का बदला रुख, BRICS समिट के बाद PM तारिक रहमान का बड़ा यू-टर्न

    नई दिल्ली

    बांग्‍लादेश में शेख हसीना की सरकार को जबरन सत्‍ता से बेदखल करने के बाद मोहम्‍मद यूनुस ने अंतरिम सरकार की कमान संभाली थी. उनके रवैये से भारत और बांग्‍लादेश के रिश्‍ते काफी तल्‍ख हो गए थे. इसके बाद आम चुनाव कराए गए, जिसके बाद तारिक रहमान बांग्‍लादेश के नए प्रधानमंत्री बने. हालांकि, भारत के प्रति उनका रुख अभी तक कुछ ज्‍यादा ठीक नहीं रहा है. बांग्‍लादेश ने जिस तरह से ब्रिक्‍स समिट से दूरी बनाई, उसे रिश्‍तों में और कड़वाहट आई है. हालांकि, लगता है अब ढाका की अक्‍ल ठिकाने आई है. तारिक रहमान के देश ने भारत के साथ संबंधों को सुधारने की बात कही है. हालांकि, शेख हसीना के कार्यकाल में बनाए गए संबंधों को ‘अनकंफर्टेबल’ बताया गया है। 

    बांग्लादेश ने भारत के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को नए सिरे से तय करने की इच्छा जताई है. बांग्लादेश के विदेश मंत्री हुमायूं कबीर ने कहा कि उनका देश भारत के साथ संबंधों को ‘रीसेट’ करना चाहता है और इन्हें आपसी हितों पर आधारित नए रिश्ते के रूप में आगे बढ़ाना चाहता है. उन्होंने शेख हसीना के प्रधानमंत्री रहने के दौरान दोनों देशों के संबंधों को ‘असहज’ करार दिया. कबीर ने कहा कि बांग्लादेश भारत के साथ एक नए रिश्ते की ओर बढ़ना चाहता है. उन्होंने कहा कि इसके लिए बहुपक्षीय मंचों के बजाय दोनों देशों के बीच सीधे द्विपक्षीय संवाद होना चाहिए. उनके मुताबिक, ढाका को भारत को लेकर अपनी ‘अत्यधिक निर्भरता’ वाली सोच से बाहर निकलकर संतुलित विदेश नीति अपनानी चाहिए। 

    अच्‍छे द्विपक्षीय संबंधों की वकालत
    हुमायूं कबीर ने कहा कि बांग्लादेश के लिए भारत महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे अपने संबंधों को केवल भारत के इर्द-गिर्द नहीं रखना चाहिए. कबीर ने कहा, ‘नाश्ता भारत में, दोपहर का भोजन भारत में और रात का खाना भी भारत में तो अपना खाना कब खाएंगे?’ उन्होंने कहा कि बांग्लादेश को इससे बाहर निकलना होगा और भारत को एक अन्य देश के रूप में देखते हुए उसके साथ अच्छे द्विपक्षीय संबंध बनाए रखने चाहिए. कबीर की टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब दोनों देशों के रिश्तों में पिछले करीब दो वर्षों में तनाव बढ़ा है. अगस्त 2024 में युवा आंदोलन के बाद सत्ता से बेदखल हुईं शेख हसीना भारत आ गई थीं. हसीना को भारत में शरण दिए जाने के मुद्दे पर बांग्लादेश की अंतरिम सरकार और नई सरकार ने कई बार नाराजगी जताई है। 

    ब्रिक्स सम्मेलन को लेकर भी बढ़ी दूरी
    भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में ताजा तनाव प्रधानमंत्री तारिक रहमान के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल नहीं होने के फैसले से भी जुड़ा है. ‘हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स’ की रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश ने कहा था कि रहमान को सम्मेलन के लिए उचित तरीके से आमंत्रित नहीं किया गया था. हालांकि, रिपोर्टों के अनुसार भारत ने रहमान को द्विपक्षीय यात्रा और बिम्सटेक के अध्यक्ष के तौर पर ब्रिक्स सम्मेलन में भाग लेने का निमंत्रण दिया था. ढाका ने कथित तौर पर दोनों निमंत्रणों को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया। 

    भारत के साथ 101 समझौतों की समीक्षा
    इसी बीच बांग्लादेश भारत के साथ हुए 101 समझौतों और समझौता ज्ञापनों (एमओयू) की समीक्षा भी कर रहा है. सत्तारूढ़ बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के मुख्य सचेतक नुरुल इस्लाम मोनी ने शुक्रवार को कहा था कि सभी 101 समझौतों की समीक्षा की जा रही है और जल्द ही इसके नतीजे सामने आएंगे. जब उनसे पूछा गया कि क्या चटगांव और मोंगला बंदरगाहों को मित्र देशों के जहाजों के लिए इस्तेमाल की अनुमति देने वाले समझौते रद्द किए जाएंगे, तो उन्होंने कहा कि सभी समझौतों की समीक्षा की जा रही है. कबीर ने भी इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि इन समझौतों की जांच संसदीय प्रक्रिया के तहत की जा रही है। 

  • मिसराता एयरपोर्ट पर सेसना 650 दुर्घटनाग्रस्त, VVIP की पहचान पर बना सस्पेंस

    मिसराता एयरपोर्ट पर सेसना 650 दुर्घटनाग्रस्त, VVIP की पहचान पर बना सस्पेंस

     मिसराता
    लीबिया के मिसराता एयरपोर्ट पर सोमवार को एक विमान हादसे का शिकार हो गया. विमान में एक VVIP के सवार होने की बात सामने आई है. हादसे के बाद इलाके का एयर स्पेस बंद कर दिया गया है. हालांकि अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि विमान में सवार वह प्रमुख व्यक्ति कौन था और हादसा किस वजह से हुआ.

    VVIP पैसेंजर था सवार
    अल अरबिया न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, सोमवार को एक विमान लीबिया के मिसराता एयरपोर्ट पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया. विमान में एक प्रमुख शख्सियत सवार था. हादसे की खबर सामने आते ही इलाके में हलचल बढ़ गई और हवाई क्षेत्र को बंद कर दिया गया. फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि विमान में सवार वह प्रमुख व्यक्ति कौन था. रिपोर्ट में अभी उसकी पहचान का खुलासा नहीं किया गया है.

    लीबिया की मीडिया के मुताबिक सेसना 650 प्लेन में तीन क्रू मेंबर सवार थे. इसमें पायलट जर्मन था और को पायलट और एक फ्लाइट अटेंडेंट तुर्की के थे. शुरुआती जांच के मुताबिक जब प्लेन हवाई अड्डे पर लैंड करने वाला था, तभी उसमें तकनीकी खराबी आ गई. इसी कारण पायलट को रनवे से बाहर जाने के लिए इमरजैंसी लैंडिंग करनी पड़ी. शुरुआती जानकारी से पुष्टि हुई कि इस घटना में किसी के मौत की खबर नहीं है. विमान के मलबे के कारण रनवे पर उड़ानों को बंद कर दिया गया.

    प्लेन क्रैश में जा चुकी है लीबिया के आर्मी चीफ की जान
    लीबिया को पिछले साल भी प्लेन क्रैश के कारण झटका लग चुका है. दिसंबर 2025 में प्लेन करैश में लीबिया के आर्मी चीफ समेत कुल 8 लोगों की मौत हुई थी. हालांकि ये हादसा लीबिया की जमीन पर नहीं हुआ था, बल्कि तुर्की में हुआ था. 23 दिसंबर को तुर्की के एसेनबोगा एयरपोर्ट से त्रिपोली जा रहा प्राइवेट विमान फैल्कन-50 जेट उड़ान के कुछ ही समय बाद क्रैश हुआ था. विमान में तकनीकी खराबी बताई गई थी.

    लीबिया के मिसराता एयरपोर्ट पर एक सेसना 650 (Cessna 650) विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ है, जिसमें एक वीवीआईपी (VVIP) यानी महत्वपूर्ण हस्ती सवार थीं। हालांकि, विमान में सवार इस प्रमुख व्यक्ति की पहचान अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाई है। इस विमान में चालक दल के तीन सदस्य भी शामिल थे, जिनमें पायलट जर्मन और को-पायलट व फ्लाइट अटेंडेंट तुर्की के नागरिक थे।

     

  • दक्षिण अफ्रीका में सड़क हादसे से मचा हाहाकार, 21 लोगों की मौत और कई घायल

    दक्षिण अफ्रीका में सड़क हादसे से मचा हाहाकार, 21 लोगों की मौत और कई घायल

    केप टाउन
    दक्षिण अफ्रीका के वेस्टर्न केप प्रांत में एक भीषण सड़क हादसे ने कई परिवारों को गहरे सदमे में डाल दिया। N1 हाईवे पर दो मिनीबस टैक्सियों की आमने-सामने टक्कर के बाद एक तीसरा वाहन भी दुर्घटनाग्रस्त वाहनों के मलबे से जा टकराया। हादसे में कम से कम 21 लोगों की मौत हो गई, जबकि कई अन्य घायल हुए हैं। दुर्घटना रविवार रात करीब 11:30 बजे वेस्टर्न केप प्रांत में Prince Albert और Leeu-Gamka के बीच N1 हाईवे पर हुई। यह स्थान केप टाउन से करीब 380 किलोमीटर दूर है। दक्षिण अफ्रीका की सड़क यातायात प्रबंधन निगम और स्थानीय अधिकारियों के मुताबिक हादसे में दो मिनीबस टैक्सियां आमने-सामने टकरा गईं।

    इसके बाद एक तीसरा वाहन, जिसे अधिकारियों ने एसयूवी बताया, दुर्घटनाग्रस्त वाहनों से जा भिड़ा। टक्कर इतनी भीषण थी कि मौके पर बड़ी संख्या में लोग हताहत हुए। बचाव दल ने घायलों को अस्पताल पहुंचाया। पुलिस के अनुसार, तीन लोगों को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन वहां पहुंचने पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। हादसे में कई अन्य लोगों को गंभीर चोटें आई हैं।  हादसे के बाद N1 हाईवे के दुर्घटनास्थल वाले हिस्से को बंद कर दिया गया।
     
    बचाव, मलबा हटाने और दुर्घटना की जांच का काम जारी रहा। स्थानीय अधिकारियों ने वाहन चालकों को प्रभावित मार्ग से बचने और यातायात अधिकारियों के निर्देशों का पालन करने की सलाह दी। अधिकारियों ने अभी दुर्घटना की अंतिम वजह स्पष्ट नहीं की है। हादसे के कारणों की जांच की जा रही है। यह भी पता लगाया जा रहा है कि दोनों मिनीबस की आमने-सामने टक्कर किन परिस्थितियों में हुई और तीसरा वाहन दुर्घटनास्थल तक कैसे पहुंचा।

  • पाकिस्तान का आतंकी मसूद अजहर पर बड़ा ऐलान, 70 लाख का इनाम घोषित; FATF से पहले क्यों खेला ये दांव?

    पाकिस्तान का आतंकी मसूद अजहर पर बड़ा ऐलान, 70 लाख का इनाम घोषित; FATF से पहले क्यों खेला ये दांव?

    इस्लामाबाद

    पाकिस्तान ने जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख और संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित वैश्विक आतंकवादी मसूद अजहर के खिलाफ एक बार फिर कार्रवाई का दिखावा किया है. पाकिस्तान की फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (FIA) की मोस्ट वांटेड लिस्ट में मसूद अजहर के नाम के साथ अब 70 लाख रुपये के इनाम का ऐलान किया गया है. यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब अक्टूबर में फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की अहम बैठक होने वाली है। 

    रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान ने इससे पहले भी मसूद अजहर को लेकर कार्रवाई का दावा किया था. साल 2021 में FIA की रेड बुक में उसके सिर पर 50 लाख रुपये का इनाम घोषित किया गया था. वहीं, अब करीब पांच साल बाद इस राशि में 20 लाख रुपये की बढ़ोतरी की गई है। 

    कहां है मसूद अजहर?
    पाकिस्तान का दावा है कि मसूद अजहर पाकिस्तान से गायब है और अफगानिस्तान में है. हालांकि, भारतीय खुफिया एजेंसियों की तकनीकी निगरानी से जुड़े इनपुट में उसके पाकिस्तान में ही छिपे होने की बात सामने आई है। 

    रिपोर्ट में भारतीय खुफिया सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि पिछले करीब छह महीनों के तकनीकी जांच में मसूद अजहर के पाकिस्तान के सिंध प्रांत के नवाबशाह में छिपे होने की जानकारी सामने आई है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर वह पाकिस्तान में ही मौजूद है तो उसके खिलाफ केवल इनाम घोषित करने की कार्रवाई कितनी प्रभावी है। 

    पाकिस्तान की लिस्ट में और भी कई नाम शामिल
    FIA की नई मोस्ट वांटेड लिस्ट में केवल मसूद अजहर ही नहीं, बल्कि मुंबई में हुए 26/11 आतंकी हमले से जुड़े कई संदिग्धों के नाम भी शामिल किए गए हैं. लिस्ट में 19 आतंकियों के नाम बताए गए हैं, जिनमें से कई पर हमले के लिए आर्थिक मदद करने, आतंकियों को समुद्री रास्ते से मुंबई पहुंचाने और लॉजिस्टिक सहायता देने के आरोप हैं. FIA ने कुछ नामों के साथ पहले मौजूद तस्वीर और आतंकी संगठन से जुड़े विवरण को भी हटा दिया है। 

    भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने लगाए ये आरोप
    भारतीय सुरक्षा एजेंसियों का आरोप है कि पाकिस्तान की ऐसी कार्रवाई वास्तविक कदम से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय दबाव को कम करने की कोशिश हो सकती है. गौर करने वाली बात यह भी है कि पाकिस्तान की मोस्ट वांटेड लिस्ट में आतंकियों की संख्या पिछले कुछ सालों में बढ़ी है. 2021 में FIA की रेड बुक में करीब 1,330 मोस्ट वांटेड आतंकी थे, जबकि अब यह संख्या बढ़कर 1,804 हो गई है। 

    FIA की नई लिस्ट में 26/11 से जुड़े 19 आतंकी
    पाकिस्तान की फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (FIA) ने मोस्ट वांटेड आतंकियों की अपनी अपडेटेड लिस्ट जारी की है. इसमें मुंबई के 26/11 आतंकी हमले से जुड़े 19 आतंकियों के नाम शामिल हैं. इनमें कुछ पर हमलावरों को आर्थिक मदद देने, जबकि कुछ पर आतंकियों को समुद्री रास्ते से मुंबई पहुंचाने में सहयोग करने का आरोप है. लिस्ट में शामिल 17 आतंकियों की तस्वीर के साथ 26/11 हमले में उनकी भूमिका का भी उल्लेख किया गया है। 

    हालांकि, लिस्ट में दो आतंकियों के मामले में अहम जानकारियां हटा दी गई हैं. उनके नाम तो मौजूद हैं, लेकिन तस्वीर, लश्कर-ए-तैयबा से संबंध और मुंबई हमले में उनकी भूमिका से जुड़ी जानकारी अब लिस्ट में नहीं है. साल 2021 में जारी FIA की लिस्ट में इन दोनों आतंकियों के बारे में पूरी जानकारी दी गई थी। 

    2021 में भी किया था इनाम का ऐलान
    पाकिस्तान ने साल 2021 में भी मसूद अजहर पर 50 लाख रुपये का इनाम घोषित किया था। अब करीब पांच साल बाद इस रकम में 20 लाख रुपये की बढ़ोतरी कर इसे 70 लाख रुपये कर दिया गया है। पाकिस्तान लंबे समय से दावा करता रहा है कि मसूद अजहर उसके देश में नहीं है और वह अफगानिस्तान में छिपा हुआ है। हालांकि, भारतीय खुफिया एजेंसियों की तकनीकी निगरानी के मुताबिक मसूद अजहर पाकिस्तान में ही छिपा हो सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले करीब छह महीनों से उसके सिंध प्रांत के नवाबशाह में होने के इनपुट सामने आ रहे हैं।

    26/11 के 19 आतंकियों के नाम भी सूची में
    FIA की नई अपडेटेड मोस्ट वांटेड सूची में मुंबई के 26/11 आतंकी हमले से जुड़े 19 आतंकियों के नाम भी शामिल हैं। इनमें से 17 आतंकियों की तस्वीर और 26/11 हमले में उनकी भूमिका का विवरण दिया गया है। हालांकि, दो आतंकियों के मामले में तस्वीर, लश्कर-ए-तैयबा से संबंध और हमले में उनकी भूमिका का विवरण हटा दिया गया है। सिर्फ उनके नाम सूची में रखे गए हैं। तुर्बत के मोहम्मद खान का नाम भी सूची में है। आरोप है कि उसने आतंकियों को मुंबई पहुंचाने के लिए ‘अल-हुसैनी’ नाव उपलब्ध कराई थी। 2021 की सूची में उसकी तस्वीर और भूमिका का भी उल्लेख था, लेकिन नई सूची से ये विवरण हटा दिए गए हैं। इसी तरह बहावलनगर के अब्दुल रहमान की तस्वीर और लश्कर-ए-तैयबा से उसके संबंध का विवरण भी नई सूची में नहीं है।

    दो संदिग्धों की तस्वीर और जानकारी हटाई
    तुर्बत निवासी मोहम्मद खान का नाम नई लिस्ट में शामिल किया गया है. आरोप है कि उसने आतंकियों को मुंबई तक पहुंचाने के लिए ‘अल-हुसैनी’ नाव उपलब्ध कराई थी. लेकिन इस बार FIA ने उसकी तस्वीर के साथ-साथ लश्कर-ए-तैयबा से उसके संबंध और हमले में उसकी भूमिका का विवरण हटा दिया है। 

    इसी तरह बहावलनगर निवासी लश्कर-ए-तैयबा आतंकी अब्दुल रहमान का नाम भी लिस्ट में है, लेकिन उसकी फोटो और आतंकी संगठन से जुड़े होने की जानकारी हटा दी गई है. 2021 की लिस्ट में दोनों के नाम के साथ उनकी तस्वीर और 26/11 हमले में उनकी भूमिका की जानकारी दी गई थी। 

    दो नावों से आतंकियों को समुद्र के रास्ते पहुंचाया
    FIA की मौजूदा लिस्ट में उन 11 आतंकियों के नाम भी हैं, जिन पर 26/11 के हमलावरों को समुद्र के रास्ते आगे बढ़ाने में मदद करने का आरोप है. बताया गया है कि आतंकियों को ‘अल-हुसैनी’ और ‘अल-फौज’ नाम की दो नावों के जरिए समुद्र पार कराया गया था। 

    इन 11 लोगों में मुल्तान के मोहम्मद अमजद खान, बहावलपुर के शाहिद गफूर, साहीवाल के मोहम्मद उस्मान, लाहौर के अतीक उर रहमान, हाफिजाबाद के रियाज अहमद, गुजरांवाला के मोहम्मद मुश्ताक, डेरा गाजी खान के मोहम्मद नईम, कराची के अब्दुल शकूर, मुल्तान के मोहम्मद साबिर सल्फी, लोधरान के मोहम्मद उस्मान और रहीम यार खान के शकील अहमद शामिल हैं। 

    हमले की फंडिंग में भी कई नाम सामने आए
    लिस्ट में ऐसे छह आतंकियों के नाम भी दर्ज हैं, जिन पर 26/11 हमले के लिए लश्कर-ए-तैयबा को आर्थिक मदद देने का आरोप है. इनमें फैसलाबाद निवासी मोहम्मद इफ्तिखार अली का नाम शामिल है. उस पर आरोप है कि उसने हमलावरों और उनके आकाओं के बीच बातचीत के लिए VOIP कनेक्शन की व्यवस्था में 70 हजार पाकिस्तानी रुपये खर्च किए थे। 

    इसके अलावा रावलपिंडी के मोहम्मद जिया पर 80 हजार रुपये, खानेवाल के मोहम्मद अब्बास नासिर पर 2 लाख 53 हजार रुपये, कसूर के जावेद इकबाल पर 1 लाख 86 हजार 430 रुपये, मंडी बहाउद्दीन के मुख्तार अहमद पर 2 लाख 98 हजार 47 रुपये और बटग्राम के अहमद सईद पर 21 लाख रुपये आतंकी हमले के लिए देने का आरोप है। 

    बता दें कि मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 1267 प्रतिबंध समिति ने मई 2019 में वैश्विक आतंकवादी घोषित किया था. उसके संगठन जैश-ए-मोहम्मद पर भी लंबे समय से आतंकवादी गतिविधियों के आरोप लगते रहे हैं।