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  • यूपी में बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए योगी सरकार के निर्देश, जलभराव वाले इलाकों में पहुंचाया जा रहा राशन-पानी

    यूपी में बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए योगी सरकार के निर्देश, जलभराव वाले इलाकों में पहुंचाया जा रहा राशन-पानी

    योगी सरकार के निर्देश पर बाढ़ प्रभावितों को नावों से पहुंचाया जा रहा भोजन और राशन

    लखनऊ के जलभराव वाले क्षेत्रों में 1,900 खाद्य पैकेट और पेयजल वितरित

    नावों के जरिए भोजन पैकेट के साथ कच्चा और सूखा राशन भी पहुंचाया

    लोहरामऊ और दाउदनगर में ड्रोन से एंटी लार्वा छिड़काव, शनिवार से तीन ड्रोन लगाने की तैयारी

    नगर आयुक्त ने फैजुल्लागंज और गुल्मी खेड़ा समेत प्रभावित क्षेत्रों का किया दौरा
     
    लखनऊ, 

     गोमती नदी का जलस्तर बढ़ने से जलभराव की समस्या से जूझ रहे लखनऊ के इलाकों में योगी सरकार के निर्देश पर राहत एवं बचाव कार्य लगातार जारी हैं। लखनऊ नगर निगम की टीमें प्रभावित परिवारों तक भोजन, राशन और स्वच्छ पेयजल पहुंचाने के साथ सफाई एवं स्वास्थ्य सुरक्षा के इंतजामों में जुटी हैं। शुक्रवार को नगर आयुक्त गौरव कुमार ने फैजुल्लागंज, गुल्मी खेड़ा समेत विभिन्न प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर राहत कार्यों का निरीक्षण किया और संबंधित अधिकारियों को आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।

    नावों से पहुंचाई गई राहत सामग्री

    प्रभावित क्षेत्रों में आवागमन की परेशानी को देखते हुए नावों के माध्यम से लोगों तक राहत सामग्री पहुंचाई जा रही है। निजी संस्थाओं के सहयोग से नगर निगम की टीम ने करीब 500 से 600 पके भोजन के पैकेट के साथ कच्चा और सूखा राशन वितरित किया। जोन-3 और जोन-6 के अंतर्गत हयात नगर, बरावन कला, टांड़ खेड़ा, सुखलाल खेड़ा, मुन्नू खेड़ा, दौलत खेड़ा, लक्ष्मी हॉस्पिटल वाली गली और गुल्मी खेड़ा समेत अन्य प्रभावित क्षेत्रों में राहत सामग्री पहुंचाई गई।

    नगर निगम की टीम ने सुबह और शाम दोनों पालियों में कुल 1,900 खाद्य पैकेट और पेयजल की बोतलें वितरित कीं। प्रशासन का जोर प्रभावित परिवारों को समय पर भोजन और स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने पर है।

    अधिकारियों ने संभाली राहत कार्यों की कमान

    जोन-3 में जोनल अधिकारी अजीत राय, जोनल सेनेटरी ऑफिसर सचिन सक्सेना और अधिशासी अभियंता नजमी मुजफ्फर ने राहत कार्यों की निगरानी की। वहीं, जोन-6 में जोनल अधिकारी अमरजीत सिंह यादव, जोनल सेनेटरी ऑफिसर राकेश कुमार और अधिशासी अभियंता अशोक यादव ने व्यवस्थाओं का जायजा लिया। ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय में राहत सामग्री के प्रबंधन के लिए करीब 70 कर्मचारियों को लगाया गया। कर्मचारियों ने पिछले दो दिनों में पहुंची खाद्य सामग्री को उतारकर ट्रैक्टरों पर लोड किया, जिससे इसे प्रभावित इलाकों तक पहुंचाने में आसानी हो सके।

    बीमारियों की रोकथाम के लिए ड्रोन से एंटी लार्वा का छिड़काव 

    जलभराव के बाद मच्छरों के प्रजनन और संक्रामक बीमारियों के खतरे को कम करने के लिए लोहरामऊ और दाउदनगर में ड्रोन के जरिए एंटी लार्वा का छिड़काव कराया गया। जलस्तर स्थिर होने के बाद अभियान का दायरा बढ़ाने की तैयारी है। शनिवार से तीन ड्रोन लगाने की योजना बनाई गई है, ताकि अधिक से अधिक प्रभावित क्षेत्रों में छिड़काव किया जा सके। नगर निगम की टीमें राहत वितरण, सफाई, स्वास्थ्य सुरक्षा और अन्य जरूरी व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने में लगी हैं।

  • MP में मौसम संबंधी आपदाओं से 537 लोगों की जान गई, अब स्थानीय जोखिम के हिसाब से तैयारी पर जोर

    MP में मौसम संबंधी आपदाओं से 537 लोगों की जान गई, अब स्थानीय जोखिम के हिसाब से तैयारी पर जोर

    भोपाल 

    आप इस बात की कल्पना कीजिए कि लगभग हर सुबह की शुरुआत किसी ना किसी प्राकृतिक आपदा की खबर से हो. कहीं भीषण गर्मी, कहीं तूफान, कहीं बाढ़ तो कहीं भूस्खलन. भारत के लिए साल 2025 में यह कल्पना नहीं, बल्कि सच्चाई बन चुकी थी. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) और पत्रिका डाउन टू अर्थ के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी से नवंबर 2025 के बीच 334 में से 331 दिन ऐसे रहे, जब देश के किसी ना किसी हिस्से में अत्यधिक मौसमीय घटना (Extreme Weather Event) दर्ज की गई. यानी पूरे साल का लगभग 99 प्रतिशत समय. अगर 2024 से तुलना करें तो पिछले साल यह आंकड़ा 295 दिनों का था. इन आपदाओं में 4400 से अधिक लोगों की जान गई और करीब 1.74 करोड़ हेक्टेयर फसल बर्बाद हो गई, जो बदलते जलवायु संकट की भयावह तस्वीर पेश करती है। 

    साल 2025 में मौसम संबंधी घटनाओं की वजह से मध्यप्रदेश में 537 लोगों की मौत हुई। पर्यावरण और विकास के मुद्दों पर काम करने वाले संगठन सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की ओर से यह रिपोर्ट जारी की गई है।कहीं गर्मी, कहीं बारिश, कहीं सूखा तो कई जगहों पर भूजल और बोरवेल का दबाव लोगों के सामने चुनौती बनकर आया है। इसका असर लोगों की आजीविका और कमाई पर भी पड़ा है।अलग-अलग इलाकों की अपनी समस्याएं हैं। ऐसे में वहां की जरूरत के हिसाब से तैयारी भी जरूरी है।इसी को समझने के लिए वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (WRI) ने मध्यप्रदेश में जलवायु जोखिमों का अध्ययन किया और उनसे निपटने के उपायों पर रिपोर्ट तैयार की है।

    कंक्रीट और बदलता मौसम पैटर्न WRI की रिसर्च में सबसे अहम बात यह सामने आई है। दावा किया गया है कि मध्यप्रदेश में जलवायु जोखिम एक जैसा नहीं है। शहरों में बढ़ती गर्मी और कंक्रीट का विस्तार चुनौती बन रहा है।

    वहीं ग्रामीण इलाकों में बारिश का बदलता पैटर्न, सूखा, पानी की उपलब्धता और खेती की बदलती परिस्थितियां बड़ा जोखिम हैं। जंगल वाले क्षेत्रों में आग, पानी और वन आधारित आजीविका पर असर पड़ रहा है।

    इसी वजह से WRI की रिसर्च में जगह के हिसाब से जोखिम की पहचान और उसी के अनुसार समाधान तैयार करने पर जोर दिया गया है।

    5 बड़े शहरों के हाल जानें

    1. भोपाल : शहर एक, अंदर 4 से 6 डिग्री तक का अंतर WRI की नई हीट रिसर्च में भोपाल का उदाहरण बताता है कि गर्मी का असर शहर के हर हिस्से में एक जैसा नहीं है।

    झीलों और हरित क्षेत्रों के कारण कई हिस्सों को प्राकृतिक ठंडक मिलती है, लेकिन घनी बसाहट और कम छायादार इलाकों में हालात बदल जाते हैं।

    यहां तापमान आसपास के रिहायशी क्षेत्रों की तुलना में 4 से 6 डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा पाया गया।

    यानी शहर में रहने की जगह और आसपास की हरियाली यह तय करने लगी है कि एक ही गर्मी में किस व्यक्ति को कितनी गर्मी झेलनी पड़ेगी।

    2. इंदौर : कंक्रीट और कामकाजी आबादी पर दबाव इंदौर में तेजी से बढ़ता शहरी क्षेत्र, बढ़ती निर्माण गतिविधियां और घनी होती बसाहट गर्मी के जोखिम को बढ़ा रही हैं।

    WRI ने खास तौर पर औद्योगिक और कामकाजी क्षेत्रों में बाहर काम करने वाले लोगों के लंबे समय तक गर्मी के संपर्क में रहने को जोखिम से जोड़ा है।

    यानी गर्मी का असर सिर्फ तापमान के आंकड़े तक सीमित नहीं है। इसका असर काम के घंटों, उत्पादकता और परिवार की आय तक पहुंच सकता है।

    3. ग्वालियर : शहर का घना हिस्सा ज्यादा गर्म ग्वालियर में WRI ने शहर के घने निर्मित हिस्से को गर्मी रोकने वाले क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया है। घनी इमारतें, सड़कें और कम खुले स्थान गर्मी को लंबे समय तक बनाए रखते हैं।

    इससे शहर के मध्य हिस्से में गर्मी का संपर्क ज्यादा देर तक बना रह सकता है। यहां भी जोखिम पूरे शहर में बराबर नहीं है।

    4. जबलपुर : आधी आबादी को हरियाली का लाभ नहीं जबलपुर की स्थिति कुछ अलग है। यहां जंगल, खुले क्षेत्र और जलस्रोत शहर को गर्मी से प्राकृतिक राहत देते हैं। इसके बावजूद WRI के मुताबिक करीब 49 प्रतिशत आबादी के आसपास गर्मी से राहत देने वाली पर्याप्त हरियाली उपलब्ध नहीं है।

    इसका मतलब यह है कि प्राकृतिक संसाधन मौजूद होने के बावजूद शहर के हर हिस्से तक उनका फायदा नहीं पहुंच रहा है।

    5. उज्जैन : बाहर रहने वालों का जोखिम ज्यादा उज्जैन में धार्मिक पर्यटन के कारण बड़ी संख्या में लोग खुले स्थानों में समय बिताते हैं। WRI ने शिप्रा के रामघाट जैसे पर्यटन क्षेत्रों का उदाहरण दिया है, जहां छाया सीमित है।

    ऐसे स्थानों पर बढ़ती गर्मी का सीधा असर स्थानीय लोगों के साथ बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों पर पड़ता है।

    गांवों में बारिश बदली तो खेती और पानी दोनों प्रभावित WRI की ग्रामीण रिसर्च के मुताबिक किसान पानी की कमी से ही नहीं, गर्मी और अनियमित बारिश से भी परेशान हैं।

    बेमौसम बारिश से फसल में फूल आने की प्रक्रिया प्रभावित होती है, दाना कमजोर बन सकता है और कीटों का प्रकोप बढ़ सकता है।

    वहीं मानसून में देरी से भूजल रिचार्ज कम होता है, जिससे गर्मियों में ग्रामीण इलाकों में पानी की समस्या बढ़ सकती है।

        बड़वानी : जमीन-पानी बचाने से जुड़ी ग्रामीण आय – WRI ने बड़वानी में जलवायु जोखिम को सिर्फ खेती के नुकसान तक सीमित नहीं माना है। अध्ययन में बताया गया है कि जमीन और पानी की स्थिति सीधे ग्रामीण परिवारों की आय पर असर डालती है। इसलिए स्थानीय लोगों की भागीदारी से जमीन और प्राकृतिक संसाधनों को बहाल करने पर जोर दिया गया है।

        सीधी : जमीन की खराब होती स्थिति भी जलवायु जोखिम – सीधी में WRI ने जमीन, पानी और खेती को ग्रामीण आजीविका से जोड़कर देखा है। जमीन की गुणवत्ता या पानी की उपलब्धता प्रभावित होने पर खेती और परिवार की कमाई पर भी असर पड़ता है। इसलिए जलवायु से निपटने की योजना में मौसम के साथ जमीन और प्राकृतिक संसाधनों को बचाना भी जरूरी बताया गया है।

    एक ही जिले में अलग-अलग जोखिम बैतूल WRI की रिसर्च में इस बदलाव को समझने का एक जमीनी मॉडल है। अध्ययन में जिले के दो ब्लॉकों में अलग-अलग जलवायु जोखिम सामने आए।

    कहीं पानी की कमी और गिरता भूजल चिंता है, तो कहीं तेज बारिश, फ्लैश फ्लड और भूस्खलन का खतरा है।

    अध्ययन में मक्का और धान जैसी ज्यादा पानी वाली फसलों और मल्टीपल क्रॉपिंग का भी उल्लेख है। इससे जलस्रोतों पर दबाव बढ़ सकता है।

    WRI ने भूजल की स्थिति के अनुसार खेती की योजना बनाने, पानी का रिचार्ज बढ़ाने और आय के दूसरे साधन विकसित करने पर जोर दिया है।

    लगातार आपदाओं का रहा साल
    2025 में भारत का कोई भी कोना सुरक्षित नहीं रहा. 36 के 36 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश किसी ना किसी समय चरम मौसम की चपेट में आए. फरवरी से ही हीट वेव्स ने दस्तक दे दी तो नवंबर तक कई इलाकों में बाढ़ और भारी बारिश जारी रही. उत्तर-पश्चिम भारत सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र रहा, जहां 311 दिन अत्यधिक मौसमीय घटनाएं दर्ज की गईं. वहीं हिमाचल प्रदेश में इसकी सबसे अधिक आवृत्ति रही, जहां करीब 80 प्रतिशत दिनों में कोई ना कोई आपदा आती रही। 

    आकाशीय बिजली और आंधी-तूफान से 1500 मौत
    मॉनसून बाढ़ से 2707 लोगों की जान गई. आंध्र प्रदेश में सबसे अधिक 608 मौतें, जबकि मध्य प्रदेश में 537 लोगों की जान गई. प्री-मॉनसून महीनों में ही 990 मौतें हुईं, जो 2022 की तुलना में लगभग 3 गुना थीं. अगस्त में आई बाढ़ के बाद पंजाब के कई जिलों में खेत पूरी तरह तबाह हो गए। 

    इन आंकड़ों के पीछे मानवीय त्रासदी और आर्थिक नुकसान दर्दनाक मानवीय कहानियां छिपी हैं. झारखंड में भूस्खलन से कई सारे परिवारों का सब कुछ खत्म हो गया. गुजरात में करीब 44 लाख हेक्टेयर फसल पानी में डूब गई. महाराष्ट्र को सबसे बड़ा झटका लगा, जहां 84 लाख हेक्टेयर फसल नष्ट हुई, जो 2022 की तुलना में लगभग 9 गुना अधिक नुकसान है। 

    इन नुकसानों का मतलब है- खाली पड़ी थालियां, उजड़े रोजगार और वे समुदाय जिन्हें फिर से शून्य से शुरुआत करनी पड़ी. ग्रामीण गरीबों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ा, क्योंकि उनके पास ना तो बचत है और ना ही आपदा के बाद उबरने के पर्याप्त संसाधन ही बचे हैं। 

    इस तबाही के पीछे जलवायु कारण
    विशेषज्ञों के अनुसार, इस संकट की जड़ में मानव-जनित जलवायु परिवर्तन (Anthropogenic Climate Change) है. 1990 के दशक की शुरुआत से भारत का औसत तापमान 0.89 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है. भारत की 70% कृषि व्यवस्था के लिए जरूरी दक्षिण-पश्चिम मानसून कई इलाकों में 0.5 से 1.5 मिमी प्रति दशक प्रति दिन की दर से कमजोर पड़ा है. खासतौर पर गंगा-सिंधु-ब्रह्मपुत्र के मैदानी इलाकों में। 

    इसके बावजूद बारिश की अत्यधिक घटनाएं बढ़ रही हैं. उदाहरण के लिए तटीय गुजरात में कम समय में बहुत तेज बारिश देखने को मिल रही है. महासागरों का तापमान 0.12 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक बढ़ा है. इसके कारण अरब सागर में चक्रवात 1980 के दशक की तुलना में 40% अधिक शक्तिशाली हो गए हैं। 

    समुद्र स्तर हर साल 3.3 मिमी की दर से बढ़ रहा है. सूखे और लंबे होते जा रहे हैं. मौसम की पारंपरिक लय टूट चुकी है. सर्दियों में गर्मी के थपेड़े और सूखे मौसम में बाढ़ की घटनाएं अब आम हो रही हैं। 

    आगे क्या और क्या करना होगा?
    यदि उत्सर्जन में तेजी से कटौती नहीं हुई, तो स्थिति और भयावह हो सकती है. जलवायु के मौजूदा मॉडल बताते हैं कि सदी के मध्य तक वैश्विक तापमान 1.2 से 1.3 डिग्री सेल्सियस और बढ़ सकता है. मॉनसून की कुल बारिश 6–8% बढ़ेगी, लेकिन उतार-चढ़ाव बेहद अस्थिर होगा. हीटवेव 1–2 महीने तक लंबी हो सकती हैं। 

    समुद्री हीटवेव साल में 200 दिन तक पहुंच सकती है. तटीय इलाकों में अत्यधिक समुद्र स्तर हर साल की घटना बन सकता है. सन् 2100 तक हिमालयी ग्लेशियर 30% से 50% तक सिकुड़ सकते हैं, जिससे करोड़ों लोगों का जल-स्रोत खतरे में पड़ जाएगा। 

    समाधान अभी भी संभव है
    विशेषज्ञों का कहना है कि अभी भी समय है, लेकिन बेहद कम. इसके उपायों में जलवायु-सहनीय खेती (Resilient Farming) को बढ़ावा देना. मजबूत अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करना. संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन (COP) जैसे वैश्विक समझौतों को ईमानदारी से लागू करना. बड़े स्तर पर उत्सर्जन में कटौती और न्यायपूर्ण अनुकूलन (Equitable Adaptation) शामिल है। 

    भारत के पास ज्यादा समय नहीं 
    भारत के पास इंतजार का वक्त नहीं बचा है. जलवायु संकट की घड़ी लगातार टिक-टिक कर रही है. 2025 की घटनाओं ने भी यह साफ कर दिया है कि बेहतरी की दिशा में कदम उठाया जाना बहुत जरूरी है. अब कार्रवाई को टालने की कोई गुंजाइश नहीं बची है। 

     

  • टेक सेक्टर में नौकरियों की बंपर वापसी, 1.23 लाख वैकेंसी; फ्रेशर्स के लिए बढ़ी चिंता

    टेक सेक्टर में नौकरियों की बंपर वापसी, 1.23 लाख वैकेंसी; फ्रेशर्स के लिए बढ़ी चिंता

     नई द‍िल्ली
    भारत के टेक्नोलॉजी जॉब मार्केट से एक बहुप्रतीक्षित और राहत भरी खबर आई है. देश में टेक नौकरियों की संख्या पिछले 18 महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है. अक्टूबर में एक्टिव जॉब्स का आंकड़ा 1.23 लाख के पार हो गया है. लेकिन, अगर आप कॉलेज पासआउट हैं और यह सोच रहे हैं कि बाजार खुलने का सीधा फायदा आपको मिलेगा, तो ठहरिए—आंकड़ों की इस चमक के पीछे एक बड़ा कैच (पेच) छुपा है। 

    स्टाफिंग फर्म 'Xpheno' की ताजा 'एक्टिव टेक जॉब्स आउटलुक' रिपोर्ट के मुताबिक, अक्टूबर 2026 में नौकरियों की मांग सितंबर के मुकाबले 5% और पिछले साल के इसी महीने के मुकाबले 17% बढ़ी है. हालांकि, रिकवरी की यह बयार सबके लिए एक जैसी नहीं है, इस बाजार पर पूरी तरह से अनुभवी पेशेवरों का कब्जा दिख रहा है। 

    1.23 लाख नौकरियां… आखिर किसे मिल रहा है मौका?
    आंकड़ों का हिसाब-किताब देखें तो मिड-सीनियर (अनुभवी) रोल्स की मांग सबसे ज्यादा है. अकेले इस सेगमेंट में 68,000 वेकेंसी हैं, जो कुल ओपनिंग्स का 55% हिस्सा हैं. इसमें सालाना आधार पर 19% का उछाल दर्ज किया गया है। 

    दूसरी तरफ, फ्रेशर्स या एंट्री-लेवल नौकरियों की संख्या महज 15,000 पर सिमट कर रह गई है. हालांकि यह आंकड़ा पिछले साल से 15% ज्यादा है, लेकिन सितंबर के मुकाबले इसमें 6% की गिरावट दर्ज की गई है. साफ संदेश है कि बाजार तो बड़ा हो रहा है, लेकिन मलाई अनुभवी हाथों के हिस्से ही आ रही है। 

    हायरिंग लेवल का पूरा गणित
    मिड-सीनियर: 68,000 (कुल का 55%, YoY +19%)
    एंट्री-लेवल: 15,000 (YoY +15%, लेकिन MoM -6%)
    मिड-जूनियर: 7,000 (MoM +40%, YoY +17%)
    सीनियर रोल्स: 2,000 (मांग का छोटा हिस्सा)
    अन्य/अपरिभाषित पद: 31,000

    कंपनियों को कैसी स्किल्स की तलाश है?
    इस रिकवरी को सबसे ज्यादा सहारा आईटी सर्विसेज से मिल रहा है, जहां 66,000 एक्टिव नौकरियां हैं जो पिछले साल अक्टूबर से 57% ज्यादा हैं। 

    कंपनियां अब सिर्फ डिग्री देखकर नौकरियां नहीं बांट रहीं. Xpheno के मुताबिक, एआई इंजीनियरिंग (AI Engineering), डेटा एनालिस्ट और टेक्निकल लीडरशिप जैसे रोल्स की जबरदस्त डिमांड है. टॉप 6 आईटी कंपनियों के डेटा से पता चलता है कि इन खास रोल्स में टैलेंट पूल पिछले दो तिमाहियों में 14% से 22% तक बढ़ा है। 

    कोर टेक्नोलॉजी और इंजीनियरिंग रोल्स 61,000 नौकरियों के साथ सबसे आगे हैं. इसके बाद टेक बिजनेस डेवलपमेंट व सेल्स (14,000), टेक कंसल्टिंग (5,000) और आईटी प्रोजेक्ट मैनेजमेंट (3,000) का नंबर आता है। 

    वर्क-फ्रॉम-होम का जमाना खत्म, ऑफिस वापसी का दौर
    ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) में 18,000 वेकेंसी हैं, जो पिछले साल के मुकाबले 64% ज्यादा हैं. लेकिन सबसे बड़ा बदलाव काम करने के तरीके में आया है. 

    वर्क-फ्रॉम-ऑफिस (WFO): 1 लाख नौकरियां (कुल मांग का 81%) पूरी तरह ऑफिस से काम करने वाली हैं.
    रिमोट और हाइब्रिड: वर्क-फ्रॉम-होम (रिमोट) नौकरियों में 23% और हाइब्रिड रोल्स में 19% की भारी गिरावट आई है.

    बेंगलुरु का दबदबा कायम, लेकिन टियर-2 और 3 शहरों ने चौकाया
    टेक जॉब्स के मामले में 31,000 नौकरियों के साथ बेंगलुरु देश का सबसे बड़ा हब बना हुआ है. इसके बाद हैदराबाद (14,000) और दिल्ली-एनसीआर (9,000) का नंबर आता है. लेकिन असली चौंकाने वाला आंकड़ा टियर-2 और टियर-3 शहरों से आया है. छोटे शहरों में एक्टिव टेक नौकरियों की संख्या बढ़कर 40,000 पहुंच गई है, जिसमें सालाना आधार पर 67% की रिकॉर्ड तेजी देखी गई है। 

  • MP में नई रेल लाइन से यात्री और माल परिवहन होगा तेज, ट्रेनों की लेटलतीफी में कमी आने की उम्मीद

    MP में नई रेल लाइन से यात्री और माल परिवहन होगा तेज, ट्रेनों की लेटलतीफी में कमी आने की उम्मीद

    भोपाल 
    पश्चिम मध्य रेलवे में लगातार बढ़ते रेल यातायात के दबाव से निपटने के लिए तीसरी रेल लाइन के विस्तार पर काम किया जा रहा है। रेलवे 500 किलोमीटर लंबी तीसरी रेल लाइन बिछाने की तैयारी है। बताया जाता है कि परियोजना का सर्वे अंतिम चरण में है। रेलवे बोर्ड की मंजूरी मिलने के बाद काम शुरु किया जाएगा। करीब तीन साल में काम पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। तीसरी लाइन बनने के बाद यात्री और मालगाड़ियों के लिए नया रेल पाथ उपलब्ध होगा। इससे ट्रेनों को रोकने और लाइन क्लियर होने के इंतजार की समस्या कम होगी। ट्रेनों की गति बढ़ाने के साथ परिचालन को भी व्यवस्थित किया जा सकेगा।

    कार्य अंतिम स्तर पर
    थर्ड लाइन को लेकर सर्वे का कार्य अंतिम स्तर पर है। इसके तैयार होने से न केवल ट्रेनों की संख्या में इजाफा होगा, बल्कि पंक्चुअलिटी भी बेहतर होगी। इससे औद्योगिक और व्यापारिक गतिविधियों को भी लाभ मिलेगा। – डॉ. मधुर वर्मा, सीपीआरओ, पमरे

    रोजाना 450 से अधिक ट्रेनों का दबाव
    पश्चिम मध्य रेलवे का इटारसी जंक्शन प्रमुख रेल केंद्रों में शामिल है। यहां से रोजाना 450 से अधिक ट्रेनों का आवागमन होता है। यात्री ट्रेनों के साथ बड़ी संख्या में मालगाड़ियां भी इस नेटवर्क से गुजरती हैं। मौजूदा दो लाइनों पर बढ़ते यातायात के कारण कई बार ट्रेनों को लाइन क्लियरेंस के लिए रोकना पड़ता है। तीसरी लाइन बनने के बाद परिचालन के लिए अतिरिक्त क्षमता उपलब्ध होगी।
    7 हजार करोड़ खर्च होने का अनुमान

    सूत्रों के अनुसार, तीसरी लाइन परियोजना पर करीब 7 हजार करोड़ खर्च होने का अनुमान है। रेलवे के प्रारंभिक अनुमान के अनुसार, एक किलोमीटर रेल लाइन बिछाने में करीब 12 से 15 करोड़ रुपए तक खर्च हो सकता है। यह खर्च भौगोलिक स्थिति पर निर्भर करेगा। इसमें ट्रैक निर्माण के साथ सिग्नलिंग, विद्युतीकरण और अन्य जरूरी रेल अधोसंरचना के काम भी शामिल होंगे।

    जबलपुर को भी मिलेगा फायदा
    इस रेलखंड से जबलपुर होकर कई लंबी दूरी की ट्रेनें संचालित होती हैं। यह रेलखंड माल परिवहन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। तीसरी लाइन बनने के बाद ट्रेनों के संचालन में सुधार का लाभ बड़ी संख्या में यात्रियों को मिलने की उम्मीद है। यात्री ट्रेनों के कारण मालगाड़ियों को लंबे समय तक रोकने की जरूरत कम होगी। इससे माल परिवहन की गति बढ़ने के साथ औद्योगिक और व्यापारिक गतिविधियों को भी लाभ मिल सकता है।

    यह है स्थिति
    500 किलोमीटर लंबी रेल लाइन।
    07 हजार करोड़ रुपए अनुमानित लागत।
    450 से अधिक ट्रेनों का होता है आवागमन।
    300 यात्री ट्रेनें, और 150 मालगाड़ियों की आवाजाही

    यह होगा फायदा
    ट्रैक मेंटेनेंस के लिए समय मिलेगा।
    ट्रैक का रखरखाव आसान होगा।
    ट्रेनों की गति बढ़ेगी।
    परिचालन व्यवस्था बेहतर होगी।
    कोचिंग ट्रेनों की संख्या बढ़ सकेगी।

  • Navratri 2026:  11 अक्टूबर शुरू होंगे शारदीय नवरात्र, घटस्थापना का मुहूर्त और पूजा

    Navratri 2026: 11 अक्टूबर शुरू होंगे शारदीय नवरात्र, घटस्थापना का मुहूर्त और पूजा

    Sharadiya Navratr2026 : शारदीय नवरात्र में मां दुर्गा की आराधना की शुरुआत कलश स्थापना के साथ होती है.  इस दिन घरों और मंदिरों में विशेष पूजा की जाती है.  अगर आप भी नवरात्र में घटस्थापना की तैयारी कर रहे हैं, तो शुभ मुहूर्त, पूजा सामग्री और स्थापना की विधि जान लेना जरूरी है.  साल 2026 में शारदीय नवरात्र की शुरुआत 11 अक्टूबर, रविवार से होगी.

    कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त क्या है?
    पंचांग के अनुसार, शारदीय नवरात्र के पहले दिन यानी 11 अक्टूबर को कलश स्थापना की जाएगी.  नई दिल्ली के लिए उपलब्ध पंचांग के मुताबिक, घटस्थापना का सुबह का शुभ मुहूर्त सुबह 6:19 बजे से 10:12 बजे तक बताया गया है.  वहीं, वैकल्पिक अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:44 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक रहेगा.  

    ध्यान रखें कि घटस्थापना का मुहूर्त शहर के अनुसार बदल सकता है.  इसलिए अपने शहर के स्थानीय पंचांग में दिए गए समय की पुष्टि कर लें.

    कब शुरू होगी प्रतिपदा तिथि?
    हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 10 अक्टूबर 2026 की रात से शुरू होकर 11 अक्टूबर की रात तक रहेगी.  उदया तिथि के आधार पर नवरात्र का पहला दिन 11 अक्टूबर को माना जाएगा.  इसी दिन मां शैलपुत्री की पूजा और कलश स्थापना की परंपरा है.

    कलश स्थापना के लिए किन चीजों की जरूरत होगी?
    घटस्थापना से पहले पूजा की सामग्री तैयार कर लेना बेहतर रहता है.  इसके लिए मिट्टी का पात्र, जौ, साफ मिट्टी, जल से भरा कलश, नारियल, आम या अशोक के पत्ते, लाल कपड़ा, रोली, अक्षत, फूल, दीपक, धूप और फल जैसी सामग्री रख सकते हैं.  परंपरा के अनुसार सामग्री में क्षेत्र और परिवार की पूजा-पद्धति के आधार पर अंतर हो सकता है.

    कैसे करें कलश स्थापना?
    सबसे पहले पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई करें . मां दुर्गा की तस्वीर या प्रतिमा को साफ स्थान पर स्थापित करें.  इसके बाद पूजा की चौकी तैयार करें. परंपरा के अनुसार मिट्टी के पात्र में मिट्टी और जौ बोएं.

    अब कलश में जल भरें.  उसमें सुपारी, अक्षत या सिक्का डालें.  कलश के मुख पर आम या अशोक के पत्ते लगाकर नारियल स्थापित करें.  इसके बाद मां दुर्गा का ध्यान करते हुए विधिवत पूजा के बाद आरती करें.

    नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा
    नवरात्र के पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है.  धार्मिक मान्यताओं में उन्हें शक्ति, स्थिरता और प्रकृति का प्रतीक माना जाता है.  भक्त इस दिन पूजा-अर्चना और व्रत का संकल्प लेते हैं.  इसके बाद नौ दिनों तक मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की आराधना की जाती है.

    नवरात्र से पहले इन बातों का रखें ध्यान
    कलश स्थापना से पहले पूजा स्थल को साफ रखें, जरूरी सामग्री पहले से जुटा लें.  पूजा के दौरान स्वच्छता और अपनी परंपरा के अनुसार नियमों का पालन करें.  अगर अखंड ज्योति जलाने की योजना है, तो उसकी सुरक्षित व्यवस्था भी पहले कर लें.

     

  • नवरात्र 2026 से पहले कर लें ये तैयारियां, पूजा सामग्री से लेकर घटस्थापना तक जानें जरूरी बातें

    नवरात्र 2026 से पहले कर लें ये तैयारियां, पूजा सामग्री से लेकर घटस्थापना तक जानें जरूरी बातें

    Sharadiya Navratri
    शारदीय नवरात्र शुरू होने में अब कुछ ही दिन बाकी हैं.  इस दौरान मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है और घरों में कलश स्थापना से लेकर अखंड ज्योति तक कई धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं.  मान्यता है कि नवरात्र से पहले घर की साफ-सफाई और पूजा स्थल की तैयारी कर लेना शुभ माना जाता है.  इस बार शारदीय नवरात्र की शुरुआत 11 अक्टूबर 2026 से होकर 19 अक्टूबर को महानवमी मनाई जाएगी.

    नवरात्र से पहले घर की सफाई करें
    नवरात्र शुरू होने से पहले घर के पूजा स्थल और आसपास की अच्छी तरह सफाई कर लें.  धार्मिक मान्यताओं में साफ-सुथरे स्थान को पूजा के लिए विशेष महत्व दिया गया है.  इसलिए मंदिर की सफाई के साथ वहां रखी पुरानी या खराब हो चुकी पूजा सामग्री को भी व्यवस्थित कर लें.

    घर के मुख्य द्वार, पूजा घर और रसोई की सफाई पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है. नवरात्र के दौरान कई लोग सात्विक भोजन और व्रत का पालन करते हैं, इसलिए रसोई को भी पहले से व्यवस्थित करना सुविधाजनक रहेगा.

    पूजा की सामग्री पहले से जुटा लें
    नवरात्र में कलश स्थापना की जाती है, इसलिए पूजा सामग्री पहले से तैयार रखना बेहतर है.  कलश, नारियल, आम के पत्ते, रोली, अक्षत, फूल, दीपक, धूप, फल और पूजा में इस्तेमाल होने वाली अन्य सामग्री की व्यवस्था पहले ही कर लें.

    अगर आप नौ दिनों तक अखंड ज्योति जलाने वाले हैं तो दीपक, तेल या घी और पर्याप्त मात्रा में बाती भी पहले से रख लें.  इससे पूजा के समय किसी जरूरी सामान की कमी नहीं होगी.

    घर के पूजा स्थल को सजाएं
    नवरात्रि से पहले पूजा घर को फूलों, साफ कपड़े और दीपक से सजाया जा सकता है.  मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर को साफ करके उचित स्थान पर स्थापित करें.  पूजा स्थल के आसपास अनावश्यक सामान न रखें.

    धार्मिक मान्यता के अनुसार नवरात्रि के दौरान पूजा स्थल को शांत और स्वच्छ रखना शुभ माना जाता है.

    नवरात्रि में घटस्थापना का महत्व
    नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना की जाती है.  2026 में शारदीय नवरात्र 11 अक्टूबर, रविवार से शुरू होगी.  नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार घटस्थापना का मुहूर्त सुबह 6:19 बजे से 10:12 बजे तक बताया गया है.  हालांकि पूजा का मुहूर्त शहर के अनुसार बदल सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग के समय को प्राथमिकता देना बेहतर है.

    महालया कब है?
    दुर्गा पूजा और नवरात्र से पहले महालया का भी विशेष महत्व माना जाता है.  साल 2026 में महालया 10 अक्टूबर को है.  बंगाली परंपरा में महालया के साथ देवी पक्ष की शुरुआत मानी जाती है . इसके बाद मां दुर्गा के आगमन की तैयारियां तेज हो जाती हैं.

    दुर्गा पूजा कब से शुरू होगी?
    2026 में कोलकाता समेत बंगाल में दुर्गा पूजा का मुख्य उत्सव 17 अक्टूबर से शुरू होगा.  षष्ठी से लेकर विजयादशमी तक पूजा और उत्सव का सिलसिला चलेगा.  पश्चिम बंगाल के आधिकारिक पूजा कैलेंडर के अनुसार 17 अक्टूबर को महाषष्ठी, 18 अक्टूबर को महासप्तमी, 19 अक्टूबर को महाअष्टमी, 20 अक्टूबर को महानवमी और 21 अक्टूबर को विजयादशमी होगी.

    वहीं, देश के अधिकांश हिस्सों में शारदीय नवरात्र 11 से 19 अक्टूबर तक रहेगी, 20 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी.  क्षेत्रीय पंचांग के अनुसार तारीखों में अंतर हो सकता है.

    नवरात्रि से पहले मन और घर दोनों तैयार करें
    नवरात्रि को केवल पूजा-पाठ का समय ही नहीं बल्कि आत्मचिंतन और सकारात्मक शुरुआत का अवसर भी माना जाता है.  इसलिए इन नौ दिनों की शुरुआत से पहले घर को व्यवस्थित करने के साथ अपने दैनिक जीवन में भी अनुशासन लाने की कोशिश करें.  पूजा-पाठ, व्रत और धार्मिक नियमों का पालन अपनी परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार किया जा सकता है.

  • Shardiya Navratri 2026: घटस्थापना के साथ जरूर करें ये 5 कार्य, घर में आएगी सकारात्मक ऊर्जा

    Shardiya Navratri 2026: घटस्थापना के साथ जरूर करें ये 5 कार्य, घर में आएगी सकारात्मक ऊर्जा

    Navratr 2026
    नवरात्रि का पावन पर्व 11 अक्टूबर, रविवार से आरंभ हो रहा है। देवी आराधना के लिए समर्पित इन नौ दिनों में भक्त श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार व्रत रखते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं और मां दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं। मान्यता है कि नवरात्रि में विधि-विधान से की गई साधना मन को शांति देने के साथ जीवन में सकारात्मक ऊर्जा भी बढ़ाती है। ऐसे में नवरात्रि के पहले दिन यानी आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से कुछ विशेष कार्य करना शुभ माना जाता है।

    1. कलश स्थापना करें
    नवरात्रि के प्रथम दिन घर में विधि-विधान से कलश स्थापित करना शुभ माना जाता है। कलश को शक्ति, समृद्धि और जीवन का प्रतीक माना जाता है। देवी पूजा की शुरुआत कलश स्थापना और मां दुर्गा के आह्वान से की जाती है। मान्यता है कि नवरात्रि के पूरे नौ दिनों तक कलश की स्थापना भक्त को नियमित पूजा, जप और साधना से जोड़े रखती है।

    2. दुर्गा सप्तशती का पाठ करें
    नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती का पाठ विशेष महत्व रखता है। संभव हो तो प्रतिदिन इसका पाठ करें। यदि समय कम हो तो देवी कवच, अर्गला स्तोत्र और कीलक स्तोत्र का नियमित पाठ किया जा सकता है। सुविधा के अनुसार दुर्गा सप्तशती के 13 अध्यायों को नौ दिनों में बांटकर भी पढ़ा जा सकता है। मान्यता है कि देवी की महिमा का पाठ करने से मनोबल बढ़ता है और मां की कृपा प्राप्त होती है।

    3. नवार्ण मंत्र का जाप करें
    नवरात्रि में नवार्ण मंत्र का जाप देवी उपासना का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। मंत्र है- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे'। मान्यता के अनुसार इस मंत्र के जाप से मां सरस्वती, मां लक्ष्मी और मां काली की आराधना का फल प्राप्त होता है। इसे रुद्राक्ष की माला से जप सकते हैं। समय कम हो तो रोज कम से कम एक माला यानी 108 बार जाप करें।

    4. कन्याओं को भोजन कराएं
    नवरात्रि में कन्या पूजन और कन्याओं को भोजन कराने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं में कन्याओं को देवी स्वरूप माना गया है। सामर्थ्य हो तो प्रतिपदा से महानवमी तक कन्याओं को भोजन कराया जा सकता है। किसी अनाथालय में बच्चियों को भोजन कराना भी सेवा का अच्छा माध्यम हो सकता है।

    5. जरूरतमंदों की सहायता करें
    नवरात्रि केवल पूजा-पाठ ही नहीं, बल्कि सेवा और दान-पुण्य का भी अवसर है। इस दौरान जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र, फल, दवाएं, जूते-चप्पल जैसी उपयोगी वस्तुएं दान करें। सामर्थ्य रखने वाले लोग बच्चों की शिक्षा और पालन-पोषण में सहयोग करके उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में मदद कर सकते हैं। सच्चे मन से की गई सेवा को देवी आराधना का ही एक रूप माना जाता है।

  • योगी कैबिनेट की मंजूरी: यूपी में किसानों से होगी मोटे अनाज की खरीद, 2026-27 की क्रय नीति स्वीकृत

    योगी कैबिनेट की मंजूरी: यूपी में किसानों से होगी मोटे अनाज की खरीद, 2026-27 की क्रय नीति स्वीकृत

    किसानों से 2.85 लाख मीट्रिक टन मोटा अनाज खरीदेगी योगी सरकार
     
    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में खरीफ विपणन वर्ष 2026-27 की क्रय नीति को मंजूरी
     
    मक्का, बाजरा और ज्वार की खरीद के लिए प्रदेश में 455 क्रय केंद्र खोलने का प्रस्ताव
     
    बाजरे के समर्थन मूल्य में 125 और हाइब्रिड ज्वार में 324 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी
     
    किसानों से 31 दिसंबर तक होगी खरीद, यथासंभव 48 घंटे में बैंक खाते में पहुंचेगा भुगतान
     
    लखनऊ

     प्रदेश के किसानों को मोटे अनाज का न्यूनतम समर्थन मूल्य दिलाने के लिए योगी सरकार ने खरीफ विपणन वर्ष 2026-27 की क्रय नीति तय कर दी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में मक्का, बाजरा और ज्वार की सरकारी खरीद के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। इसके तहत प्रदेश में कुल 2.85 लाख मीट्रिक टन मोटे अनाज की खरीद का कार्यकारी लक्ष्य प्रस्तावित है। खरीद के लिए 455 क्रय केंद्र खोलने की तैयारी है। बाजरे और हाइब्रिड ज्वार के समर्थन मूल्य में भी वृद्धि हुई है। खरीद की अवधि एक अक्टूबर से 31 दिसंबर तक निर्धारित की गई है।
     
    कैबिनेट बैठक के बाद खाद्य एवं रसद मंत्री मनोज पांडेय ने क्रय नीति की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि किसानों से भारत सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर मोटे अनाज की खरीद की जाएगी। उपज का भुगतान बैंक खातों के सत्यापन के बाद यथासंभव 48 घंटे के भीतर सीधे किसानों के खातों में कराया जाएगा।
     
    बाजरा 2900 और मक्का 2410 रुपये प्रति क्विंटल खरीदा जाएगा
    नई क्रय नीति के अनुसार, बाजरे का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2775 रुपये से बढ़ाकर 2900 रुपये प्रति क्विंटल किया गया है। इसमें 125 रुपये की वृद्धि हुई है। मक्का का समर्थन मूल्य 2410 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित है। वहीं, हाइब्रिड ज्वार का समर्थन मूल्य 3699 रुपये से बढ़कर 4023 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है। इसमें 324 रुपये की बढ़ोतरी हुई है। ज्वार मालदांडी का समर्थन मूल्य 4073 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है।
     
    बाजरे की 2.20 लाख मीट्रिक टन खरीद का लक्ष्य
    प्रदेश में मोटे अनाज की सरकारी खरीद के लिए कुल 2.85 लाख मीट्रिक टन का कार्यकारी लक्ष्य प्रस्तावित है। इसमें बाजरे की 2.20 लाख मीट्रिक टन, ज्वार की 50 हजार मीट्रिक टन और मक्का की 15 हजार मीट्रिक टन खरीद शामिल है। सबसे अधिक खरीद का लक्ष्य बाजरे के लिए रखा गया है।
     
    बाजरे के 300, ज्वार के 80 और मक्का के 75 केंद्र खुलेंगे

    मोटे अनाज की खरीद के लिए प्रदेश में कुल 455 क्रय केंद्र खोलने का प्रस्ताव है। इनमें बाजरे के 300, ज्वार के 80 और मक्का के 75 केंद्र होंगे। क्रय केंद्र मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में स्थापित किए जाएंगे, जहां संबंधित फसल की अच्छी आवक होती है और सरकारी खरीद की पर्याप्त संभावना रहती है।
     
    इन 25 जिलों में होगी मक्का की खरीद
    मक्का की खरीद बुलंदशहर, बदायूं, हरदोई, उन्नाव, मैनपुरी, आगरा, फिरोजाबाद, अलीगढ़, एटा, कासगंज, हाथरस, कानपुर नगर, कानपुर देहात, इटावा, औरैया, फर्रुखाबाद, कन्नौज, बहराइच, गोंडा, देवरिया, बलिया, जौनपुर, मिर्जापुर, सोनभद्र और ललितपुर में की जाएगी।
     
    बाजरे की खरीद के लिए 33 जिले निर्धारित
    बाजरे की खरीद बुलंदशहर, रामपुर, संभल, अमरोहा, बरेली, बदायूं, शाहजहांपुर, हरदोई, उन्नाव, आगरा, मथुरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, अलीगढ़, एटा, कासगंज, हाथरस, कानपुर नगर, कानपुर देहात, इटावा, फर्रुखाबाद, औरैया, कन्नौज, बलिया, जौनपुर, गाजीपुर, मिर्जापुर, प्रयागराज, कौशांबी, फतेहपुर, जालौन, चित्रकूट और हमीरपुर में होगी।
     
    ज्वार की खरीद के लिए चुने गए 13 जिले

    ज्वार की सरकारी खरीद उन्नाव, हरदोई, फिरोजाबाद, कानपुर नगर, कानपुर देहात, फतेहपुर, मिर्जापुर, झांसी, जालौन, बांदा, हमीरपुर, महोबा और चित्रकूट में की जाएगी।
     
    ऑनलाइन पंजीकरण और बायोमेट्रिक सत्यापन अनिवार्य
    सरकारी खरीद के लिए किसानों को खाद्य एवं रसद विभाग की वेबसाइट www.fcs.up.gov.in पर ऑनलाइन पंजीकरण कराना होगा। क्रय केंद्रों पर कंप्यूटरीकृत सत्यापित खतौनी, फोटोयुक्त पहचान पत्र और आधार कार्ड के आधार पर मक्का, बाजरा और ज्वार की खरीद होगी। इलेक्ट्रॉनिक प्वाइंट ऑफ परचेज (ई-पॉप) मशीन के माध्यम से किसानों का बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण किया जाएगा। खरीद की प्रक्रिया राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) द्वारा विकसित सॉफ्टवेयर पर ऑनलाइन संचालित होगी।
     
    आधार से जुड़े बैंक खाते में सीधे मिलेगा भुगतान
    किसानों से खरीदी गई उपज का भुगतान उनके आधार से जुड़े और एनपीसीआई से मैप किए गए बैंक खातों में किया जाएगा। इसके लिए भारत सरकार के सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली (पीएफएमएस) पोर्टल के माध्यम से बैंक खातों का सत्यापन होगा। सत्यापन के बाद यथासंभव 48 घंटे के भीतर किसानों के खातों में धनराशि भेजने की व्यवस्था की गई है।

  • UP में जेवर एयरपोर्ट के नामकरण पर बड़ा फैसला, अब ‘नरेंद्र मोदी इंटरनेशनल एयरपोर्ट’ के नाम से होगी पहचान

    UP में जेवर एयरपोर्ट के नामकरण पर बड़ा फैसला, अब ‘नरेंद्र मोदी इंटरनेशनल एयरपोर्ट’ के नाम से होगी पहचान

    जेवर एयरपोर्ट अब कहलाएगा ‘नरेन्द्र मोदी इंटरनेशनल एयरपोर्ट’: सीएम योगी

    सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने पर प्रधानमंत्री के सम्मान में योगी कैबिनेट का बड़ा फैसला, नामकरण प्रस्ताव पारित

    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रेस वार्ता में गिनाईं पीएम मोदी के 25 वर्षों की उपलब्धियां

    कहा- सेवा, समर्पण और ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना से जनसेवा से जनकल्याण और जनभागीदारी से जनविश्वास तक पहुंची यात्रा

    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने पर अभिनंदन प्रस्ताव भी पारित

    मुख्यमंत्री ने कहा- प्रधानमंत्री के 25 वर्षों की निरंतर और समर्पित सार्वजनिक सेवा भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास का गौरवपूर्ण अध्याय

    प्रधानमंत्री के नेतृत्व और मार्गदर्शन में प्रदेश सरकार ‘विकसित उत्तर प्रदेश, विकसित भारत-2047’ के संकल्प को साकार करने के लिए पूरी ऊर्जा, निष्ठा और प्रतिबद्धता से काम करती रहेगी: सीएम

    लखनऊ
     नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट, जेवर अब ‘नरेन्द्र मोदी इंटरनेशनल एयरपोर्ट’ के नाम से जाना जाएगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में शुक्रवार को हुई उत्तर प्रदेश कैबिनेट की बैठक में एयरपोर्ट के नामकरण का प्रस्ताव पारित किया गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सार्वजनिक जीवन में 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर लिए गए इस निर्णय को मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के प्रति प्रदेश सरकार की कृतज्ञता और उत्तर प्रदेश के विकास में उनके मार्गदर्शन एवं योगदान के सम्मान का प्रतीक बताया।

    कैबिनेट बैठक के बाद आयोजित प्रेस वार्ता में मुख्यमंत्री ने बताया कि कैबिनेट ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने पर अभिनंदन प्रस्ताव भी पारित किया है। 7 अक्टूबर को प्रधानमंत्री जी ने सरकार के मुखिया के रूप में 25 वर्षों की निरंतर और समर्पित सार्वजनिक सेवा पूरी की। यह भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास का गौरवपूर्ण अध्याय है। 25 वर्षों की यह यात्रा ‘सेवा, समर्पण और राष्ट्र प्रथम’ की भावना से संचालित रही है। यह यात्रा केवल सत्ता या शासन की यात्रा नहीं, बल्कि ‘जनसेवा से जनकल्याण और जनभागीदारी से जनविश्वास’ की यात्रा है।

    जेवर एयरपोर्ट का नामकरण, प्रधानमंत्री के प्रति कृतज्ञता का संदेश
    मुख्यमंत्री ने कहा कि नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट, जेवर प्रधानमंत्री जी की ओर से उत्तर प्रदेश को मिली एक बड़ी सौगात है। यह एयरपोर्ट आने वाले समय में प्रदेश की अर्थव्यवस्था, उद्योग, पर्यटन और वैश्विक कनेक्टिविटी को नई ऊंचाई देगा। इसी भावना के साथ कैबिनेट ने एयरपोर्ट का नाम ‘नरेन्द्र मोदी इंटरनेशनल एयरपोर्ट’ किए जाने का प्रस्ताव पारित किया है। कैबिनेट प्रधानमंत्री जी के 25 वर्षों के सार्वजनिक जीवन, उनके सतत मार्गदर्शन, उत्तर प्रदेश के विकास के प्रति उनकी निरंतर प्रतिबद्धता और देश को नई दिशा देने वाले नेतृत्व के प्रति आभार व्यक्त करती है। कैबिनेट ने प्रधानमंत्री जी के यशस्वी नेतृत्व के प्रति अभिनंदन भी व्यक्त किया। प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व और मार्गदर्शन में प्रदेश सरकार ‘विकसित उत्तर प्रदेश, विकसित भारत-2047’ के संकल्प को साकार करने के लिए पूरी ऊर्जा, निष्ठा और प्रतिबद्धता से काम करती रहेगी।

    काशी से जेवर तक, यूपी से प्रधानमंत्री का विशेष जुड़ाव
    मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री जी काशी से निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं और उत्तर प्रदेश की धरती से देश का नेतृत्व कर रहे हैं। 2014 में प्रधानमंत्री जी ने काशी आगमन पर कहा था- ‘मुझे मां गंगा ने बुलाया है।’ इसके बाद काशी और प्रधानमंत्री जी का संबंध केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रहा। काशी के विकास, आध्यात्मिक पुनर्जागरण और उत्तर प्रदेश के समग्र विकास के बीच एक नया संबंध बना। प्रधानमंत्री जी के मार्गदर्शन और केंद्र-प्रदेश की ‘डबल इंजन’ सरकार के समन्वय से उत्तर प्रदेश में विकास की नई कार्यसंस्कृति विकसित हुई। 2017 से पहले उत्तर प्रदेश प्रशासनिक जड़ता, असुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहा था। इसके बाद पारदर्शी और तकनीक आधारित सुशासन, मजबूत कानून-व्यवस्था, आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर और निवेश के अनुकूल वातावरण को विकास का आधार बनाया गया।

    2,483 किमी राष्ट्रीय राजमार्ग, एक्सप्रेसवे और नमो भारत से बदली कनेक्टिविटी
    मुख्यमंत्री ने बताया कि उत्तर प्रदेश में करीब 2,483 किलोमीटर लंबे 42 राष्ट्रीय राजमार्गों पर लगभग ₹60 हजार करोड़ खर्च किए गए हैं। दिल्ली-सहारनपुर-देहरादून एक्सप्रेसवे, दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे और कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे जैसी परियोजनाओं ने प्रदेश की कनेक्टिविटी को नई गति दी है। ₹30 हजार करोड़ से अधिक लागत से दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ नमो भारत/आरआरटीएस परियोजना देश में हाई-स्पीड सार्वजनिक परिवहन की नई मिसाल बनी है। लखनऊ, कानपुर, आगरा, मेरठ, गाजियाबाद तथा नोएडा-ग्रेटर नोएडा में मेट्रो नेटवर्क का विस्तार हुआ है। इसी बदलती कनेक्टिविटी का नया केंद्र जेवर का इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनने जा रहा है। सीएम ने इसे उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा एयरपोर्ट और भविष्य में देश के बड़े एविएशन हब में विकसित होने वाली परियोजना बताया।

    फ्रेट कॉरिडोर से डिफेंस कॉरिडोर तक, औद्योगिक तस्वीर बदली
    मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश देश के बड़े लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक केंद्र के रूप में उभर रहा है। दादरी ईस्टर्न और वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का प्रमुख जंक्शन बन चुका है। 1,050 किलोमीटर से अधिक डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर प्रदेश से गुजर रहा है। वाराणसी में राष्ट्रीय जलमार्ग-1 पर देश का पहला मल्टीमॉडल इनलैंड पोर्ट टर्मिनल और 100 एकड़ का देश का पहला फ्रेट विलेज विकसित हुआ है। लखनऊ में ब्रह्मोस मिसाइल असेंबली यूनिट, उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर और 1,000 एकड़ का पीएम मित्र टेक्सटाइल पार्क औद्योगिक विकास की नई दिशा तय कर रहे हैं।

    किसानों को सीधे लाभ, फसल ऋण से गन्ना भुगतान तक
    किसान कल्याण का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने बताया कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत उत्तर प्रदेश के तीन करोड़ से अधिक किसानों को एक लाख करोड़ रुपये से अधिक धनराशि सीधे उनके खातों में भेजी जा चुकी है। करीब 86 लाख किसानों की ऋणमाफी की गई है। प्रदेश में 5.50 करोड़ किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से ₹13,42,978 करोड़ का फसल ऋण वितरित किया गया। 79.51 लाख किसानों को फसल क्षति के मद में भुगतान मिला है, जबकि गन्ना किसानों को ₹3.30 लाख करोड़ से अधिक का रिकॉर्ड भुगतान किया गया है।

    आवास, राशन और पानी से गरीबों के जीवन में बदलाव
    मुख्यमंत्री ने बताया कि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत उत्तर प्रदेश में 65 लाख से अधिक गरीब परिवारों को आवास मिले हैं। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत 3.67 करोड़ राशन कार्डधारक परिवारों के करीब 15 करोड़ लोगों को मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा रहा है। जल जीवन मिशन के तहत 2.46 करोड़ से अधिक ग्रामीण परिवारों को नल से जल का कनेक्शन दिया जा चुका है। खास तौर पर बुंदेलखंड और विंध्य क्षेत्र में इसका व्यापक प्रभाव पड़ा है। जनधन योजना, बैंकिंग विस्तार और बैंक मित्रों के नेटवर्क ने प्रदेश में वित्तीय समावेशन को भी मजबूत किया है।

    आयुष्मान से एम्स तक स्वास्थ्य सुरक्षा का विस्तार
    मुख्यमंत्री ने बताया कि आयुष्मान भारत के तहत प्रदेश में करीब 6.08 करोड़ आयुष्मान कार्ड बनाए गए हैं। राज्य में 9.90 करोड़ से अधिक नागरिकों को स्वास्थ्य सुरक्षा कवरेज मिला है। गंभीर बीमारियों से जूझ रहे 1.09 करोड़ से अधिक मरीजों को ₹18,798 करोड़ के मुफ्त उपचार का लाभ मिला है। आरोग्य मेलों के माध्यम से 14.67 करोड़ नागरिकों को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई गईं। गोरखपुर और रायबरेली में एम्स का संचालन भी स्वास्थ्य क्षेत्र की बड़ी उपलब्धियों में शामिल है।

    शौचालय, उज्ज्वला और नमामि गंगे से बदली तस्वीर
    सीएम योगी ने बताया कि स्वच्छ भारत मिशन के तहत प्रदेश में 3.37 करोड़ से अधिक शौचालय और 59,183 सामुदायिक शौचालय बनाए गए हैं। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत 1.86 करोड़ मुफ्त एलपीजी कनेक्शन दिए गए। प्रदेश सरकार होली और दीपावली पर महिलाओं को मुफ्त एलपीजी सिलेंडर उपलब्ध करा रही है। नमामि गंगे के तहत गंगा की निर्मलता और अविरलता के लिए व्यापक काम हुआ है। काशी सहित गंगा के विभिन्न तटों पर विकास और संरक्षण की परियोजनाओं ने धार्मिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से नई पहचान बनाई है।

    महिला सशक्तीकरण से गांव की अर्थव्यवस्था को ताकत
    मुख्यमंत्री ने कहा कि लखपति दीदी अभियान के तहत 10 लाख स्वयं सहायता समूहों से एक करोड़ से अधिक महिलाएं जुड़ी हैं। प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना के तहत 15 लाख से अधिक स्ट्रीट वेंडर्स को आर्थिक सहायता मिली है। स्वामित्व योजना के तहत 91 हजार से अधिक गांवों में काम हुआ और 1.10 करोड़ से अधिक ग्रामीण परिवारों को घरौनी के रूप में संपत्ति का प्रमाण मिला। महिलाओं की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक भागीदारी बढ़ी है। ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण तथा अनुसूचित जाति-जनजाति और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े लोगों के कल्याण के लिए अनेक कदम उठाए गए हैं।

    यूपी का हुनर ‘लोकल से ग्लोबल’ तक
    मुख्यमंत्री ने कहा कि एक जिला-एक उत्पाद योजना ने उत्तर प्रदेश के स्थानीय उत्पादों और हस्तशिल्प को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है। प्रधानमंत्री जी ने विदेश यात्राओं के दौरान काशी की गुलाबी मीनाकारी, निजामाबाद की ब्लैक पॉटरी, कन्नौज का इत्र और लखनऊ की जरदोजी जैसे यूपी के उत्पादों को वैश्विक मंच दिया। विदेशी राष्ट्राध्यक्षों को यूपी के इन स्थानीय उत्पादों को उपहार में देना ‘लोकल से ग्लोबल’ की अवधारणा को मजबूती देने वाला कदम रहा। उत्तर प्रदेश खाद्यान्न, दुग्ध, गन्ना, आम, आंवला और मोटे अनाज के उत्पादन में देश के अग्रणी राज्यों में है।

    युवाओं को नौकरी, प्रशिक्षण और डिजिटल ताकत
    सीएम ने कहा कि स्वामी विवेकानंद युवा सशक्तीकरण योजना के तहत 62 लाख से अधिक युवाओं को स्मार्टफोन और टैबलेट दिए गए। प्रदेश में 9.50 लाख से अधिक सरकारी नियुक्तियां हुई हैं और 65 लाख युवाओं को निजी क्षेत्र में रोजगार मिला है। रोजगार मेलों, आईटीआई और कौशल विकास मिशन के माध्यम से 31.11 लाख से अधिक युवाओं को प्रशिक्षण दिया गया। मेरठ में मेजर ध्यानचंद खेल विश्वविद्यालय, काशी में आधुनिक खेल परिसर और नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस जैसी परियोजनाओं से खेल और युवा प्रतिभाओं को नई दिशा मिली है।

    राम मंदिर से महाकुंभ तक, सांस्कृतिक चेतना का पुनर्जागरण
    मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के योगदान को आर्थिक और बुनियादी ढांचे के विकास से आगे आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक पुनर्जागरण से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और रामलला की प्राण प्रतिष्ठा से 500 वर्षों की प्रतीक्षा समाप्त हुई। काशी विश्वनाथ धाम का पुनर्विकास हुआ और गंगा घाट से बाबा विश्वनाथ धाम तक भव्य एवं दिव्य मार्ग बना। विदेश से करीब 100 वर्ष पुरानी मां अन्नपूर्णा की प्रतिमा वापस लाई गई और काशी विश्वनाथ धाम में पुनर्स्थापित की गई। भगवान बुद्ध के पिपरहवा अवशेष 127 वर्ष बाद भारत वापस आए। प्रयागराज महाकुंभ में 66 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं का आगमन हुआ। मुख्यमंत्री ने काशी तमिल संगमम, अभिधम्म दिवस, बौद्ध सर्किट, संत रविदास जन्मस्थली विकास परियोजना, संग्रहालय एवं प्रतिमा परियोजनाएं, चौरी-चौरा शताब्दी आयोजन तथा लखनऊ में अटल बिहारी वाजपेयी ‘राष्ट्र प्रेरणा स्थल’ जैसे कार्यों को सांस्कृतिक पुनर्जागरण की कड़ी बताया। उन्होंने वाराणसी के संगीत और लखनऊ की पाक कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने, सारनाथ से जुड़े बौद्ध स्थलों को वैश्विक पहचान मिलने तथा सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के प्रयासों का भी उल्लेख किया। उन्होंने महामना मदन मोहन मालवीय और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न से सम्मानित किए जाने को भी प्रदेश की महान विभूतियों के योगदान के राष्ट्रीय सम्मान के रूप में रेखांकित किया।

  • पाकिस्तान के नक्शे में बड़े बदलाव की तैयारी? 12 से 15 नए प्रांत बनाने की चर्चा, पंजाब-सिंध में चिंता

    पाकिस्तान के नक्शे में बड़े बदलाव की तैयारी? 12 से 15 नए प्रांत बनाने की चर्चा, पंजाब-सिंध में चिंता

     इस्लामाबाद

    पाकिस्तान में देश का राजनीतिक नक्शा बदलने की चर्चा है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर चार बड़े प्रांतों को छोटे हिस्सों में बांटने के पक्ष में हैं. इससे देश में 12 से 15 नए प्रांत बनाए जा सकते हैं. एक विकल्प में 160 छोटे प्रशासनिक क्षेत्र बनाने की भी बात है। 

    फिलहाल पाकिस्तान में चार प्रांत हैं. इनमें पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान शामिल हैं. इनके बंटवारे से प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव हो सकता है. लेकिन इसका असर सिर्फ सरकारी कामकाज तक सीमित नहीं रहेगा. इससे देश में राजनीतिक ताकत का संतुलन भी बदल सकता है। 

    पाकिस्तान के प्रांतों में आबादी का बड़ा अंतर

    दरअसल, पाकिस्तान के चारों प्रांत आबादी और क्षेत्रफल के लिहाज से काफी अलग हैं. पंजाब देश का सबसे ज्यादा आबादी वाला प्रांत है. यहां करीब 12.8 करोड़ लोग रहते हैं. यह पाकिस्तान की आधी से ज्यादा आबादी है. वहीं दूसरी ओर, बलूचिस्तान क्षेत्रफल के लिहाज से सबसे बड़ा प्रांत है. लेकिन यहां करीब डेढ़ करोड़ लोग रहते हैं। 

    द इकोनॉमिस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब जैसे बड़े प्रांत का प्रशासन चलाना भी चुनौती है. ग्रामीण इलाकों में लोगों को सरकारी सेवाओं के लिए घंटों सफर करना पड़ सकता है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पंजाब की एक चौथाई से कम आबादी को घर पर साफ पीने का पानी नियमित रूप से मिलता है। 

     सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर का तर्क है कि बड़े प्रांतों को प्रभावी तरीके से चलाना मुश्किल है. हालांकि, पाकिस्तान की आर्थिक समस्याओं की वजह सिर्फ प्रशासनिक ढांचा नहीं है. देश कमजोर आर्थिक विकास, महंगाई और भारी कर्ज के बोझ से भी जूझ रहा है। 

    पाकिस्तान में सेना लंबे समय से राजनीति में अहम भूमिका निभाती रही है. देश के इतिहास के दो-पांचवें से ज्यादा समय तक सेना सीधे सत्ता में रही है. निर्वाचित सरकारें भी कई बार उसके प्रभाव में काम करती रही हैं. द इकोनॉमिस्ट की रिपोर्ट में सेना की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, सेना के पास बड़ी जमीन और कारोबार हैं. सरकारी संसाधनों में भी उसकी अहम हिस्सेदारी है। 

    ऐसे में प्रांतों को छोटे हिस्सों में बांटने से सत्ता का संतुलन बदल सकता है. अगर नए प्रांत केंद्र सरकार पर ज्यादा निर्भर हुए, तो सेना और केंद्र के लिए उन पर प्रभाव बनाए रखना आसान हो सकता है. हालांकि, यह इस प्रस्ताव के संभावित राजनीतिक असर से जुड़ा आकलन है। 

    पंजाब और सिंध क्यों हैं अहम?
    पाकिस्तान के प्रांत केवल प्रशासनिक इकाइयां नहीं हैं. वे राजनीतिक ताकत के बड़े केंद्र भी हैं. पंजाब को परंपरागत रूप से पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) का मजबूत गढ़ माना जाता है. वहीं, सिंध में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) का प्रभाव रहा है। 

    इन प्रांतों की बड़ी आबादी और चुनावी ताकत उन्हें केंद्र के सामने मजबूत स्थिति देती है. अगर इन्हें छोटे हिस्सों में बांटा जाता है, तो उनकी राजनीतिक ताकत बंट सकती है. इससे केंद्र सरकार का प्रभाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है. इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि छोटे प्रांतों को चलाना आसान होगा या नहीं. सवाल यह भी है कि क्या इससे केंद्र के लिए प्रांतों पर नियंत्रण रखना आसान हो जाएगा। 

    पाकिस्तान में प्रशासनिक ढांचे को बदलने की मांग पहले भी उठ चुकी है. योजना मंत्री अहसान इकबाल छोटे प्रशासनिक क्षेत्र और ज्यादा प्रांत बनाने की जरूरत पर बात कर चुके हैं. इसमें 12 से 15 प्रांत बनाने और 160 तक छोटे प्रशासनिक क्षेत्र तैयार करने का विचार भी शामिल रहा है। 

    यह चर्चा ऐसे समय हो रही है, जब असीम मुनीर का पाकिस्तान की राजनीति में प्रभाव बढ़ा है. रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने PML-N और PPP के साथ काम करते हुए अपनी स्थिति मजबूत की है. वहीं, पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान जेल में हैं. उनके समर्थक उनकी रिहाई की मांग करते रहे हैं. अधिकारियों ने उनके आंदोलन के खिलाफ कार्रवाई भी की है। 

    प्रांतों के पुनर्गठन की चर्चा के बीच खैबर पख्तूनख्वा में भी तनाव है. यह प्रांत इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के शासन में है. रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार और PTI के बीच बातचीत नाकाम होने के बाद इमरान खान के हजारों समर्थकों ने इस्लामाबाद की ओर मार्च शुरू किया. पाकिस्तानी सरकार ने राजधानी के आसपास सुरक्षा बढ़ाई और प्रदर्शनकारियों को अंदर आने से रोकने की बात कही. मालूम हो, इससे केंद्र और खैबर पख्तूनख्वा की सरकार के बीच तनाव बढ़ा है. यह प्रांत उग्रवादी हिंसा की समस्या से भी जूझ रहा है। 

    बलूचिस्तान और पाक के कब्जे वाले कश्मीर में भी चुनौतियां
    बलूचिस्तान में लंबे समय से अलगाववादी हिंसा होती रही है. यहां संसाधनों और इस्लामाबाद की भूमिका को लेकर भी विवाद हैं. ऐसे में प्रांत को बांटने का फैसला जमीन, संसाधनों और स्थानीय राजनीतिक अधिकारों से जुड़े संवेदनशील सवाल खड़े कर सकता है। 

    पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में भी शासन, महंगाई, टैक्स और आर्थिक हालात को लेकर असंतोष सामने आता रहा है. इन हालात के बीच देश की आंतरिक सीमाओं को बदलना आसान नहीं होगा. छोटे प्रांत बनाने के पक्ष में प्रशासनिक तर्क दिए जा रहे हैं. लेकिन इस बदलाव से राजनीतिक ताकत का बंटवारा भी हो सकता है. इसलिए यह प्रस्ताव पाकिस्तान का नक्शा बदलने के साथ-साथ सत्ता के संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है।