Tag: court

  • HC से राहत नहीं, कोर्ट से जेल! स्वतंत्र भारद्वाज को 14 दिन की न्यायिक हिरासत, 21 सितंबर को अगली सुनवाई

    HC से राहत नहीं, कोर्ट से जेल! स्वतंत्र भारद्वाज को 14 दिन की न्यायिक हिरासत, 21 सितंबर को अगली सुनवाई

    नई दिल्ली

    एससी-एसटी और पॉक्सो ऐक्ट में गिरफ्तार किए गए यूट्यूबर स्वतंत्र भारद्वाज को डबल झटका लगा है। एक तरफ उसे निचली अदालत ने उसे 14 दिन के लिए जेल भेज दिया है तो दूसरी तरफ हाई कोर्ट ने याचिका दायर करके राहत की उसकी उम्मीदों को तोड़ दिया। स्वतंत्र भारद्वाज ने अपनी गिरफ्तारी को अवैध घोषित कराने के लिए उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। जस्टिस नवीन चावला और रविंद्र डुडेजा की बेंच ने याचिका को खारिज कर दिया। इससे पहले सोमवार सुबह चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय की बेंच ने तत्काल इस पर सुनवाई को सहमति दी थी।

    दूसरी तरफ, अडिशनल सेशंस जज सौरभ प्रताप सिंह की अदालत ने मारपीट मामले में हिंदुत्ववादी 'इन्फ्लुएंसर' स्वतंत्र भारद्वाज को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सौरभ प्रताप सिंह ललर ने अब भारद्वाज की न्यायिक हिरासत 21 सितंबर तक बढ़ा दी है। भारद्वाज को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जज के सामने पेश किया गया था।

    दलित यूट्यूबर के पिता के साथ मारपीट के आरोप में भारद्वाज को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से गिरफ्तार किया गया था। रविवार को भारद्वाज को एक ड्यूटी मजिस्ट्रेट के सामने ऑनलाइन पेश किया गया था और एक दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था।

    कैसे गिरफ्तार हुआ स्वतंत्र भारद्वाज
    भारद्वाज की ओर से अधिवक्ता उमेश शर्मा ने कहा, 'वह पिछले तीन दिन से हिरासत में है, मैं अनुरोध करता हूं कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका आज ही सूचीबद्ध की जाए।' दिल्ली पुलिस ने 5 जून को भारद्वाज को तब गिरफ्तार किया गया जब उसके एक वीडियो की वजह से करीब दो महीने पहले हुई मारपीट की घटना ने अचानक तूल पकड़ लिया। सीजेपी आंदोलन के दौरान भारद्वाज और एक दलित शख्स के बीच मारपीट हुई थी। भारद्वाज ने हाल ही में एक यूट्यूब चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा कि उसने मारपीट करके सिर फोड़ दिया, लेकिन राजनीतिक पहुंच की वजह से बच गया। उसने कहा था, ‘मैंने सिर फोड़ दिया… क्या आप जानते हैं कि यह अपराध किस धारा के तहत आता है? धारा 307। उसे 7 टांके लगे थे।’ इसके बाद सीजेपी और विपक्षी दलों के नेताओं ने संसद मार्ग थाने पर धरना देकर पुलिस पर दबाव बनाया। पुलिस ने उसके खिलाफ एससी-एसटी ऐक्ट और पॉक्सो ऐक्ट में केस दर्ज करके गिरफ्तार कर लिया था।

    पॉक्सो ऐक्ट में क्यों केस
    शुक्रवार को पुलिस ने नाबालिग छात्रा की शिकायत पर यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) कानून के तहत एक नई शिकायत दर्ज की। शिकायत में ऑनलाइन धमकियों और उत्पीड़न का आरोप लगाया गया है। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 351(3), धारा 78 (पीछा करना) और धारा 79 (महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले कृत्य) के अलावा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67 भी प्राथमिकी में जोड़ी है। पीड़िता ने इससे पहले आरोप लगाया था कि अपने पिता पर हुए कथित हमले के खिलाफ आवाज उठाने और पुलिस में शिकायत दर्ज कराने के बाद उसे दुष्कर्म की धमकियां दी गईं, अपशब्द कहे गए और छेड़छाड़ कर बनाई गईं तस्वीरें भेजी गईं।

  • शादीशुदा या तलाकशुदा बेटी को अनुकंपा नौकरी से वंचित करना गलत, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला

    शादीशुदा या तलाकशुदा बेटी को अनुकंपा नौकरी से वंचित करना गलत, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला

    बिलासपुर
     छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि सिर्फ वैवाहिक स्थिति के आधार पर बेटी को नियुक्ति के विचार से बाहर नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि तलाकशुदा बेटी द्वारा तलाक से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत नहीं करने के आधार पर उसके अनुकंपा नियुक्ति के दावे को खारिज करना उचित नहीं है।

    छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने जल संसाधन विभाग के अस्वीकृति आदेश को निरस्त करते हुए महिला के आवेदन पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है। इसके लिए अधिकारियों को 40 दिन की समय-सीमा दी गई है।

    पिता की मृत्यु के बाद किया था आवेदन
    यह आदेश जस्टिस बिभु दत्ता गुरु ने तीजिया बाई यादव विरुद्ध छत्तीसगढ़ शासन एवं अन्य मामले में सुनाया। याचिकाकर्ता तीजिया बाई यादव पति भरत यादव, उम्र करीब 42 वर्ष, निवासी नवागांव तखतपुर के पिता स्वर्गीय पिल्लू राम यादव जल संसाधन विभाग में चौकीदार के पद पर कार्यरत थे। सेवा में रहते हुए 26 अगस्त 2024 को उनका निधन हो गया।

    पिता की मृत्यु के बाद तीजिया बाई यादव ने निर्धारित प्रक्रिया के तहत अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था। सक्षम अधिकारी ने आवेदन पर विचार करने के बाद दो जुलाई 2025 को आदेश जारी कर उनका दावा खारिज कर दिया। अस्वीकृति का प्रमुख आधार यह था कि आवेदन के साथ तलाक से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए थे।

    शादी के आधार पर बेटी को नहीं कर सकते बाहर
    हाई कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता एफएस खरे ने दलील दी कि केवल वैवाहिक स्थिति अथवा तलाक का दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर विचार करने से इनकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने हाई कोर्ट के 30 नवंबर 2015 के पूर्व निर्णय का भी हवाला दिया।

    इस फैसले में हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि केवल शादीशुदा होने के आधार पर बेटी को अनुकंपा नियुक्ति के विचार से बाहर करना संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप नहीं है। अदालत ने नीति के उन प्रावधानों को असंवैधानिक माना था, जिनके तहत सिर्फ विवाह के आधार पर विवाहित बेटी को अनुकंपा नियुक्ति के लिए विचार से बाहर किया जाता था।

    सरकार ने भी माना, 2015 का फैसला लागू
    राज्य की ओर से उप महाधिवक्ता केजी यादव ने पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि सक्षम अधिकारी ने उपलब्ध दस्तावेजों और लागू नीति के आधार पर आदेश पारित किया था। हालांकि, उन्होंने इस बात का विरोध नहीं किया कि वर्तमान मामले में उठाया गया कानूनी प्रश्न हाई कोर्ट के 30 नवंबर 2015 के फैसले से कवर होता है।

    इन परिस्थितियों को देखते हुए हाई कोर्ट ने जल संसाधन विभाग के दो जुलाई 2025 के अस्वीकृति आदेश को रद्द कर दिया और संबंधित अधिकारियों को तीजिया बाई यादव के अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर कानून के अनुसार नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया।

     

  • ग्राम पंचायतों की जमीन होगी अतिक्रमण मुक्त, हाईकोर्ट बोला- बेदखली आदेश के लिए लंबी प्रक्रिया जरूरी नहीं

    ग्राम पंचायतों की जमीन होगी अतिक्रमण मुक्त, हाईकोर्ट बोला- बेदखली आदेश के लिए लंबी प्रक्रिया जरूरी नहीं

    लखनऊ

    ग्राम पंचायत की जमीनों से अतिक्रमण को हटाने के मामले में हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि राजस्व संहिता की धारा 67 के तहत पारित बेदखली आदेश को लागू करने के लिए लंबी और पेचीदा प्रक्रिया अपनाने की आवश्यकता नहीं है। कहा कि धारा 67 के तहत अतिक्रमण हटाने की कार्यवाही संक्षिप्त प्रकृति की है।

    न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने पूजा देवी की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर यह आदेश दीया है। न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी कहा कि प्रावधान से ही स्पष्ट है कि धारा 67(3) के तहत अतिक्रमणकारी को बेदखल करने के लिए आवश्यक बल का प्रयोग भी किया जा सकता है तथा निर्धारित प्रतिकर की वसूली भू-राजस्व के बकाये के रूप में की जा सकती है।

    वर्तमान राजस्व संहिता एवं नियमों के अनुरूप बनाने पर विचार करने को कहा
    कोर्ट ने आगे कहा कि राजस्व संहिता, 2006 और उसके तहत बनाए गए नियमों में अतिक्रमण हटाने तथा आदेश के अनुपालन की प्रक्रिया निर्धारित है। लिहाजा धारा 67 की कार्यवाही के बाद उसके अनुपालन के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता की विस्तृत और लंबी प्रक्रिया को नहीं अपनाया जा सकता। न्यायालय ने विशेष रूप से कहा कि धारा 67(3) और अध्याय 12 में अतिक्रमण हटाने तथा प्रतिकर की वसूली के लिए पर्याप्त वैधानिक व्यवस्था उपलब्ध है। इस कारण धारा 67 के आदेश को प्रभावी करने के लिए निष्पादन कार्यवाही को अनावश्यक रूप से जटिल या दीर्घकालिक नहीं बनाया जाना चाहिए। इसके साथ ही न्यायालय ने राज्य सरकार को राजस्व न्यायालय मैनुअल के पैरा 460 की समीक्षा कर उसे वर्तमान राजस्व संहिता एवं नियमों के अनुरूप बनाने पर विचार करने को कहा है।

    हाईकोर्ट ने जमीन के कथित अवैध हस्तांतरण के मामले में नए सिरे से जांच का दिया आदेश
    वहीं हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने मोदी रबर लिमिटेड को दी गई 117 एकड़ जमीन में से लगभग 59 एकड़ जमीन के कथित अवैध हस्तांतरण के मामले में नए सिरे से जांच का आदेश दिया है। न्यायालय ने राजस्व परिषद के अधिकारियों की एक समिति को छह सप्ताह के भीतर अपनी जांच रिपोर्ट भी सौंपने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही राज्य सरकार को जांच रिपोर्ट मिलने के तीन सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का आदेश दिया है। न्यायालय ने पूर्व के आदेशों के अनुपालन में हुई देरी पर राज्य सरकार पर 25 हजार रुपये का हर्जाना लगाया है।न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने यह आदेश लोकेश कुमार खुराना की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर पारित किया। इस मामले की अगली सुनवाई 18 नवंबर को तय की गई है। पिछले आदेश के अनुपालन में, राजस्व विभाग की प्रमुख सचिव अपर्णा यू. कोर्ट के समक्ष उपस्थित हुईं।

  • सिंधु जल संधि पर हेग कोर्ट को भारत ने क्यों ‘अवैध’ बताया? जानें फैसले के खिलाफ क्या है पूरा तर्क

    सिंधु जल संधि पर हेग कोर्ट को भारत ने क्यों ‘अवैध’ बताया? जानें फैसले के खिलाफ क्या है पूरा तर्क

    नई दिल्ली
     भारत के निजी मामले में दखलअंदाजी करने की कोशिश कर रही अंतरराष्ट्रीय संस्था को भारत ने उसकी हैसियत याद दिला दी। इस संस्था ने सिंधु समझौते पर पाकिस्तान के पक्ष में फैसला दिया था। संस्था को लगा कि इससे भारत के ऊपर दबाव बनेगा, लेकिन भारत ने उस अंतरराष्ट्रीय संस्था को सीधे ठेंगा दिखा दिया और उसके किसी भी आदेश को मानने से साफ मना कर दिया। इस संस्था का नाम ' कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ' (CoA) है और इसका ऑफिस नीदरलैंड के सुंदर और बेहद अहम शहर द हेग में है।

    संस्था को ही बता दिया गैर कानूनी
    भारत ने सोमवार को 'कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन' के फैसले को मानने से मना कर दिया। संस्था का फैसला सिंधु जल संधि से जुड़ा था। इतना ही नहीं भारत ने कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन 'गैर-कानूनी तरीके से गठित तक बता दिया और कहा कि संस्था के फैसले का भारत के संप्रभु फैसलों पर कोई असर नहीं पड़ता। विदेश मंत्रालय (MEA) ने एक बयान में कहा कि 'कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन' का गठन वर्ल्ड बैंक ने किया था। ये पाकिस्तान के साथ भारत की 1960 की संधि की शर्तों का साफ तौर पर उल्लंघन था।

    कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन का निर्देश खारिज
    इन घटनाक्रमों से साफ है कि सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद फिर बढ़ गया। दरअसल, हेग स्थित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने कहा था कि भारत सिंधु जल संधि को एकतरफा तौर पर न तो रोक सकता है और न ही खत्म कर सकता है। भारत ने इस फैसले को सीधे तौर पर खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत ने इस कोर्ट को कभी मान्यता नहीं दी है। इसलिए भारत न तो इसकी कार्यवाही में शामिल हुआ और न ही इसके पहले दिए गए किसी फैसले को स्वीकार किया है।

    सिंधु जल संधि अस्थायी तौर पर स्थगित
    भारतीय विदेश मंत्रालय के मुताबिक कोर्ट का मौजूदा या भविष्य में आने वाला कोई भी फैसला भारत की ओर से चलाए जा रहे प्रोजेक्ट या उसके फैसलों पर असर नहीं डालेगा। विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि भारत का सिंधु जल संधि को अबेयंस में रखने का फैसला लागू है। यानी भारत ने संधि के तहत अपनी जिम्मेदारियों को फिलहाल रोक रखा है। मंत्रालय ने कहा कि भारत अपने इस फैसले पर कायम है। दरअसल, अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित करने का फैसला लिया था। भारत का कहना रहा है कि पाकिस्तान के साथ सामान्य संबंधों के लिए आतंकवाद और पानी के मुद्दे को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।

    अदालत ने रतले प्रोजेक्ट पर भी टिप्पणी की
    मध्यस्थता अदालत ने जम्मू-कश्मीर में बन रहे रतले जलविद्युत संयंत्र से जुड़े कुछ निर्माण कार्यों पर अस्थायी रोक लगाने का निर्देश भी दिया है। अदालत का कहना है कि सिंधु जल संधि के तहत किसी एक देश को अपने स्तर पर संधि को रोकने, निलंबित करने या खत्म करने का अधिकार नहीं है।

    वहीं भारत इस पूरे निष्कर्ष को मानने से इनकार कर रहा है। भारत का तर्क है कि जिस संस्था के अधिकार क्षेत्र को ही वह स्वीकार नहीं करता, उसके फैसले उसके लिए बाध्यकारी नहीं हो सकते।

    सिंधु जल संधि: आखिर विवाद है किस बात पर?
    भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि 1960 में हुई थी। इसके तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर दोनों देशों के अधिकार और जिम्मेदारियां तय की गई थीं।

    हाल के वर्षों में इस संधि को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा है। भारत ने संधि को स्थगित रखने का फैसला लिया है जबकि पाकिस्तान लगातार संधि को लागू रखने की मांग करता रहा है। इसी विवाद के बीच पाकिस्तान की पहल पर मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू हुई। भारत ने इस प्रक्रिया में शामिल होने से इनकार किया और अपनी अलग आपत्तियां दर्ज कराईं।

    भारत का रुख साफ: संधि पर हमारा फैसला कायम
    विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में दोहराया कि भारत इस तथाकथित मध्यस्थता संस्था के किसी भी फैसले को मान्यता नहीं देता।

    भारत के मुताबिक, इस संस्था का गठन ही संधि के प्रावधानों के खिलाफ है। इसलिए उसके द्वारा सुनाया गया कोई भी फैसला भारत के लिए बाध्यकारी नहीं है। इस तरह सिंधु जल संधि को लेकर अब दो बिल्कुल अलग दावे सामने हैं। हेग की मध्यस्थता अदालत संधि को लागू मान रही है जबकि भारत अदालत के अधिकार क्षेत्र और उसके फैसले- दोनों को ही खारिज कर रहा है।

    इस विवाद का असर भारत-पाकिस्तान के बीच पानी के बंटवारे के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर में चल रही जलविद्युत परियोजनाओं पर भी देखने को मिल सकता है।
    सिंधु जल संधि: भारत को पाकिस्तान से दोबारा बातचीत की जरूरत क्यों पड़ी? 

    समझिए विवाद की पूरी कहानी
    भारत ने पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को ‘स्थगित’ (In Abeyance) रखने का फैसला अभी तक बरकरार रखा है। पिछले कुछ हफ्तों में पाकिस्तान की ओर से कई तीखी और राजनीतिक बयानबाज़ियां सामने आई हैं। पाकिस्तान ने पिछले महीने इस संधि पर एक तथाकथित ‘अंतरराष्ट्रीय’ कॉन्फ्रेंस भी आयोजित की। इसमें वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों और प्रमुख नेताओं ने चेतावनी दी कि अगर सिंधु नदी बेसिन की नदियों के जल प्रवाह में किसी तरह की रुकावट डाली गई तो इसके गंभीर परिणाम होंगे और युद्ध जैसी हालात भी पैदा हो सकते हैं।

    आर्बिट्रेशन कोर्ट ने बयान में क्या कहा था?
    कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने सोमवार को जारी अपने बयान में कहा था कि भारत ने जिस आधार पर संधि को स्थगित किया है, वह संधि को रोकने या खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने कहा कि सिंधु जल संधि अभी भी पूरी तरह लागू है और भारत को संधि के तहत अपनी जिम्मेदारियां निभानी चाहिए। भारत ने इस दावे को भी स्वीकार नहीं किया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि यह कोर्ट जिस तरह से बनाया गया है, वह खुद सिंधु जल संधि की शर्तों का उल्लंघन है। इसलिए भारत के लिए इसके फैसले की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है।

    पाकिस्तान संधि लागू करने की लगा रहा गुहार
    भारत का कहना है कि कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के पास इन मामलों में अधिकार क्षेत्र ही नहीं है। वहीं पाकिस्तान संधि को लागू रखने और भारत पर उसकी शर्तों का पालन कराने की मांग करता रहा है। इस ताजा फैसले के बाद भी भारत ने साफ कर दिया है कि वह इस कोर्ट की बात नहीं मानेगा और सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का उसका फैसला जारी रहेगा।

  • MP हाईकोर्ट में नए चीफ जस्टिस की तैयारी, कॉलेजियम ने केंद्र को भेजा जस्टिस कोगजे का नाम

    MP हाईकोर्ट में नए चीफ जस्टिस की तैयारी, कॉलेजियम ने केंद्र को भेजा जस्टिस कोगजे का नाम

    भोपाल
    देश की न्यायपालिका से जुड़ी एक बड़ी और अहम खबर सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने देश के तीन महत्वपूर्ण उच्च न्यायालयों, राजस्थान, मध्य प्रदेश और जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट के लिए नए मुख्य न्यायाधीशों (Chief Justices) की नियुक्ति की सिफारिश कर दी है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम ने सोमवार को हुई बैठक में इन नामों पर मुहर लगाई।
    राजस्थान हाईकोर्ट को मिला नया मुख्य न्यायाधीश

    छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जज जस्टिस संजय के अग्रवाल को राजस्थान हाईकोर्ट का नया चीफ जस्टिस नियुक्त करने की सिफारिश की गई है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब राजस्थान हाईकोर्ट में एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा के कामकाज को लेकर वकीलों का कड़ा विरोध प्रदर्शन चल रहा था। जोधपुर और जयपुर की बार एसोसिएशनों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया था और न्यायिक कार्यों के बहिष्कार का ऐलान किया था।

    वकीलों का विरोध और विवाद की पृष्ठभूमि
    जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा के खिलाफ चल रहे इस विवाद के पीछे सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस संदीप मेहता द्वारा सीजेआई को लिखे गए तीन पत्र भी अहम रहे। इन पत्रों में प्रशासनिक शक्तियों के कथित दुरुपयोग और केस लिस्टिंग में हस्तक्षेप के आरोप लगाए गए थे, जिसके बाद से राज्य में माहौल काफी गर्माया हुआ था। बढ़ते तनाव को देखते हुए एक्टिंग चीफ जस्टिस ने खुद 1 सितंबर से 5 सितंबर तक न्यायिक कार्य से अलग रहने का फैसला किया था।

    गुजरात हाईकोर्ट में लंबे समय से न्यायिक सेवा
    जस्टिस अल्पेश यशवंत कोगजे वर्तमान में गुजरात हाईकोर्ट में न्यायाधीश के रूप में कार्यरत हैं। उन्हें 6 अप्रैल 2016 को गुजरात हाईकोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। बाद में 15 मार्च 2018 को उन्हें स्थायी न्यायाधीश बनाया गया। कॉलेजियम की सिफारिश पर केंद्र सरकार की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जस्टिस कोगजे मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का पद संभालेंगे। उनकी नियुक्ति के बाद मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की न्यायिक व्यवस्था में नए नेतृत्व की शुरुआत होगी। 

    कॉलेजियम की सिफारिश अब केंद्र सरकार के पास जाएगी। केंद्र की मंजूरी और जरूरी प्रक्रिया पूरी होने के बाद नियुक्ति की अधिसूचना जारी होगी। इसके बाद जस्टिस कोगजे मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस का कार्यभार संभालेंगे।

    कॉलेजियम ने तीन जजों के नाम सुझाए

        जस्टिस अल्पेश यशवंत कोगजे — गुजरात हाईकोर्ट से मध्यप्रदेश हाईकोर्ट
        जस्टिस संजय के. अग्रवाल — छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से राजस्थान हाईकोर्ट
        डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी — राजस्थान हाईकोर्ट से जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट

    क्या है सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम?
    सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की
    नियुक्ति और तबादले की सिफारिश करने वाली व्यवस्था को कॉलेजियम सिस्टम कहा जाता है। इसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं। कॉलेजियम की सिफारिशें केंद्र सरकार को भेजी जाती हैं। केंद्र सरकार आपत्ति होने पर प्रस्ताव पुनर्विचार के लिए लौटा सकती है, लेकिन कॉलेजियम दोबारा वही नाम भेज दे तो सरकार को नियुक्ति करनी होती है।

        कॉलेजियम में सीजेआई के अलावा जस्टिस विक्रम नाथ, बीवी नागरथना, एमएम सुंदरेश और पीएस नरसिंहा शामिल थे।

        मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के लिए गुजरात हाईकोर्ट के जस्टिस अल्पेश यशवंत कोगजे के नाम की सिफारिश की गई है।

        जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पद के लिए जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी का नाम तय हुआ है।

        छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के लिए जस्टिस कृष्णा राम महापात्रा के नाम की सिफारिश पहले ही 6 अगस्त को की जा चुकी है।

    सरकार की मंजूरी के बाद लागू होगी सिफारिशें
    कॉलेजियम द्वारा की गई ये सभी सिफारिशें अब केंद्र सरकार के पास भेजी जाएंगी। संवैधानिक प्रक्रिया के तहत सरकार द्वारा औपचारिक अधिसूचना जारी होने के बाद ये सभी नियुक्तियां प्रभावी होंगी। उम्मीद जताई जा रही है कि इन नए नामों के आने से अदालतों में प्रशासनिक कामकाज और न्यायिक प्रक्रिया सुचारू रूप से आगे बढ़ सकेगी।

     

  • बॉम्बे हाई कोर्ट क्लर्क भर्ती परीक्षा पर बड़ा फैसला, टाइपिंग टेस्ट रद्द; जल्द जारी होंगी नई तारीखें

    बॉम्बे हाई कोर्ट क्लर्क भर्ती परीक्षा पर बड़ा फैसला, टाइपिंग टेस्ट रद्द; जल्द जारी होंगी नई तारीखें

    मुंबई 
    बॉम्बे हाई कोर्ट ने क्लर्क पद पर 16 अगस्त को आयोजित टाइिंग टेस्ट के लिए हुई परीक्षा को रद्द करने का फैसला लिया है. कोर्ट ने प्रशासन को बताया कि चयन प्रक्रिया में निष्पक्षता और पारदर्शिता के सर्वोच्च मानकों को बनाए रखने के लिए यह निर्णय लिया गया है. साथ ही उन्होंने बताया कि टाइपिंग के लिए नई परीक्षा तारीखों,एग्जाम सेंटर और इससे जुड़ी कई अन्य जानकारी बाद में ऑफिशियल वेबसाइट पर शेयर की जाएगी। 

    कब हुई थी परीक्षा?
    हाई कोर्ट की ओर से जारी नोटिस के अनुसार, 8 दिसंबर 2025 को प्रकाशित भर्ती विज्ञापन के तहत क्लर्क पदों के लिए 16 अगस्त 2026 को टाइपिंग टेस्ट आयोजित किया गया था। हालांकि, परीक्षा के दौरान राज्य के कई केंद्रों पर तकनीकी समस्याएं सामने आईं, जिसके कारण बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों को परेशानी का सामना करना पड़ा।

    क्या है वजह?
    जानकारी के अनुसार, सर्वर डाउन होने, कंप्यूटर और कीबोर्ड के सही ढंग से काम नहीं करने जैसी समस्याओं के चलते कई उम्मीदवार परीक्षा पूरी नहीं कर सके। छत्रपति संभाजीनगर, कल्याण, वाशिम और हिंगोली समेत कई परीक्षा केंद्रों से अभ्यर्थियों ने तकनीकी खामियों की शिकायतें की थी। इन समस्याओं के कारण परीक्षा प्रक्रिया को लेकर भ्रम और असंतोष की स्थिति बन गई थी।

    परीक्षा दोबारा कराने की मांग
    तकनीकी गड़बड़ियों से नाराज अभ्यर्थियों ने विभिन्न स्थानों पर विरोध प्रदर्शन भी किया। छत्रपति संभाजीनगर में उम्मीदवारों ने धरना देकर परीक्षा दोबारा कराने की मांग उठाई। अभ्यर्थियों की शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए मामले ने व्यापक ध्यान आकर्षित किया। इस दौरान एनसीपी (शरद पवार गुट) के विधायक रोहित पवार ने भी प्रदर्शन कर रहे उम्मीदवारों का समर्थन किया।

    टाइपिंग टेस्ट को रद्द करने का फैसला
    विवाद बढ़ने के बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने पूरे मामले की समीक्षा की और 16 अगस्त को आयोजित टाइपिंग टेस्ट को रद्द करने का फैसला लिया। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नई परीक्षा के लिए संशोधित कार्यक्रम जल्द ही आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित किया जाएगा। अब अभ्यर्थियों को नई परीक्षा तिथि की घोषणा का इंतजार है। हाई कोर्ट प्रशासन ने उम्मीदवारों से भर्ती प्रक्रिया से जुड़ी सभी आधिकारिक जानकारी केवल बॉम्बे हाई कोर्ट की वेबसाइट से प्राप्त करने की अपील की है।

    क्या लगे थे आरोप? 
    दरअसल, रविवार यानी 16 अगस्त को महाराष्ट्र में आयोजित कई सेंटरों पर परीक्षा में तकनीकी खराबी आई थी.  बॉम्बे हाई कोर्ट की क्लर्क टाइपिंग स्किल टेस्ट में शामिल होने वाले उम्मीदवारों ने कई केंद्रों पर तकनीकी गड़बड़ी का आरोप लगाया था. सर्वर डाउन होने, कंप्यूटर का सही ढंग से काम करें समेत कई अन्य समस्याओं के बाद से छात्रों ने जमकर विरोध प्रदर्शन भी किया था। 

    परीक्षा दोबारा करवाने की मांग 

    तकनीकी खराबी के बाद से छात्रों में प्रदर्शन करते हुए परीक्षा दोबारा कराने की मांग की थी और विवाद बढ़ने के बाद से बॉम्बे हाँ कोर्ट ने इस पूरे मामले की समीक्षा की और परीक्षा रद्द कराने का फैसला किया। 

     

  • पति-पत्नी के अलग-अलग कमरे में रहने का मामला हाईकोर्ट पहुंचा, कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला

    पति-पत्नी के अलग-अलग कमरे में रहने का मामला हाईकोर्ट पहुंचा, कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला

    बेंगलुरु
    कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक फैसले में स्पष्ट किया है कि एक ही मकान में केवल अलग-अलग कमरों में रहना अपने आप में वैवाहिक क्रूरता नहीं माना जा सकता है। अदालत ने यह बात एक पति द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए कही है। फैमिली कोर्ट ने क्रूरता के आधार पर शादी को भंग कर दिया था और पति को अपनी पत्नी को हर महीने भरण-पोषण के लिए 25000 रुपये देने का निर्देश दिया था। आपको बता दें कि दोनों की शादी 11 नवंबर 2001 को हुई थी और उनके दो बच्चे हैं।

    जस्टिस डीके सिंह और जस्टिस एच. शांति भूषण की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई की। कोर्ट ने कहा, "पति-पत्नी अलग-अलग कमरों में रहते हैं। केवल इसी तर्फ परिस्थिति के आधार पर क्रूरता के निष्कर्ष को सही नहीं ठहराया जा सकता है।"

    पति-पत्नी के आरोप-प्रत्यारोप
    पत्नी ने आरोप लगाया कि पति ने उसके साथ शारीरिक, मौखिक और भावनात्मक क्रूरता की। साथ ही यह भा कहा कि बच्चों की उपेक्षा की और उसका व्यवहार मालिकाना हक जताने वाला था। हालांकि दोनों कुछ समय तक एक ही इमारत में रहे, लेकिन वे अलग कमरों में रहते थे और व्यावहारिक रूप से अलग-अलग जीवन जी रहे थे। अंततः पत्नी बच्चों के साथ ससुराल छोड़कर चली गई। पति ने सभी आरोपों का खंडन किया और दावा किया कि पत्नी अपने मायके वालों के बहकावे में थी और रिश्तों में खटास के लिए वह खुद जिम्मेदार थी।

    कर्नाटक हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कानून और वैवाहिक संबंधों के संदर्भ में कई महत्वपूर्ण बात कही है। अदालत ने कहा कि अलग कमरों में रहने की घटना को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता है। बार-बार के झगड़े, मौखिक गाली-गलौज, भावनात्मक उपेक्षा, खराब व्यवहार और सुलह की असफल कोशिशों के समग्र प्रभाव ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत मानसिक क्रूरता को सिद्ध किया है। कोर्ट ने कहा, "किसी जीवनसाथी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अनिश्चित काल तक ऐसे आचरण को सहन करे जो निरंतर मानसिक पीड़ा का कारण बनता हो और वैवाहिक सुरक्षा के बुनियादी तत्वों को नष्ट करता हो।"

    हाईकोर्ट ने पति की इस तर्क को भी खारिज कर दिया गया कि पत्नी द्वारा दर्ज कराई गई आईपीसी की धारा 498-ए की शिकायत को पत्नी द्वारा की गई क्रूरता माना जाए। पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल आपराधिक शिकायत दर्ज कराना या उसमें बरी हो जाना शिकायत के झूठे या दुर्भावनापूर्ण होने का प्रमाण नहीं है। आपको बता दें कि उस केस में पति बरी हो गया था।

    फैमिली कोर्ट द्वारा तय किए गए 25000 रुपये प्रति माह के स्थायी भरण-पोषण को बरकरार रखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी का रोजगार में होना या उसकी अपनी आय होना उसे पति से स्थायी भरण-पोषण प्राप्त करने से वंचित नहीं करता है।

  • न्यायिक व्यवस्था के बेहतर प्रबंधन की पहल, कोर्ट मैनेजर्स के लिए नई नियमावली लागू

    न्यायिक व्यवस्था के बेहतर प्रबंधन की पहल, कोर्ट मैनेजर्स के लिए नई नियमावली लागू

    कोर्ट मैनेजर्स के लिए नई नियमावली को कैबिनेट मंजूरी

    कोर्ट मैनेजमेंट को मजबूत करने की योगी सरकार की बड़ी पहल

    लखनऊ
     न्यायालयों के प्रशासनिक एवं प्रबंधकीय ढांचे को और मजबूत करने की दिशा में योगी सरकार ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में मंगलवार को कैबिनेट बैठक में इलाहाबाद हाईकोर्ट और प्रदेश के जनपदीय न्यायालयों में कार्यरत कोर्ट मैनेजर्स की सेवा व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने के लिए ‘द इलाहाबाद हाईकोर्ट (कोर्ट मैनेजर्स सेंट्रलाइज्ड सर्विस) रूल्स, 2026’ के मसौदे को मंजूरी दे दी है।

    सरकार के इस निर्णय से प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था में कोर्ट मैनेजर्स को एक अधिक सुसंगठित, स्पष्ट और संस्थागत सेवा ढांचा मिल सकेगा। इससे न्यायालयों के प्रशासनिक कामकाज को गति देने और न्यायिक संस्थानों के प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है। यह नियमावली सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 16 मई, 2025 को कोर्ट मैनेजर्स के संबंध में दिए गए निर्देशों के अनुपालन में तैयार की गई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देशों एवं निष्कर्षों के आधार पर नियमावली का मसौदा तैयार कर राज्य सरकार को उपलब्ध कराया गया था, जिसे कैबिनेट ने मंजूरी प्रदान कर दी है।

    81 कोर्ट मैनेजर्स की होगी तैनाती, वेतनमान निर्धारित
    नई व्यवस्था के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट तथा प्रदेश के जनपदीय न्यायालयों में कुल 81 कोर्ट मैनेजर्स की तैनाती की जाएगी। इसके साथ ही उनके वेतन एवं सेवा संबंधी ढांचे को भी पुनरीक्षित किया गया है। कोर्ट मैनेजर्स का वेतनमान ₹56,100 से ₹1,77,500 तक निर्धारित किया गया है।

    प्रशासनिक कामकाज को मिलेगा पेशेवर स्वरूप
    कोर्ट मैनेजर्स न्यायालयों के प्रशासनिक और प्रबंधकीय कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इनके माध्यम से न्यायालयों में मानव संसाधन, आधारभूत सुविधाओं, केस-फ्लो मैनेजमेंट, प्रशासनिक समन्वय और अन्य प्रबंधकीय कार्यों की निगरानी एवं बेहतर संचालन में सहायता मिलेगी। इससे न्यायिक अधिकारियों और न्यायाधीशों को प्रशासनिक दायित्वों के भार में राहत मिलेगी।

    न्यायिक व्यवस्था को आधुनिक और प्रभावी बनाने की दिशा में कदम
    योगी सरकार का यह निर्णय प्रदेश में न्यायिक बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के साथ-साथ कोर्ट मैनेजमेंट को अधिक आधुनिक व परिणामोन्मुख बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। सेवा नियम स्पष्ट होने से कोर्ट मैनेजर्स की जिम्मेदारियों और सेवा शर्तों में भी एकरूपता आएगी। सरकार के इस फैसले से न केवल सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित होगा, बल्कि हाईकोर्ट और जिला न्यायालयों के प्रशासनिक कामकाज में भी बेहतर समन्वय और दक्षता आने की उम्मीद है। इसका प्रत्यक्ष लाभ न्यायालयों में आने वाले वादकारियों और आम नागरिकों को भी मिल सकेगा।

    नई नियमावली लागू करने से राज्य सरकार पर लगभग 3.97 करोड़ रुपये का वार्षिक अतिरिक्त व्यय भार आने का अनुमान है। सरकार द्वारा इस वित्तीय भार को स्वीकार करते हुए कोर्ट मैनेजर व्यवस्था को संस्थागत रूप देने का निर्णय न्यायालयों के प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करने के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

  • LADC Policy Row: पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट में वकीलों की हड़ताल, प्रदर्शन के चलते आज कामकाज बाधित

    LADC Policy Row: पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट में वकीलों की हड़ताल, प्रदर्शन के चलते आज कामकाज बाधित

    चंडीगढ़
     कानूनी सहायता
    बचाव वकील (एलएडीसी) नीति के विरोध में चल रहे वकीलों के आंदोलन ने जोर पकड़ लिया है। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने आंदोलनरत वकीलों के समर्थन में शुक्रवार को हाई कोर्ट में कामकाज पूरी तरह स्थगित रखने का फैसला किया है।

    इससे आज नियमित न्यायिक कार्य प्रभावित रहने की संभावना है। बार एसोसिएशन के मानद सचिव परमप्रीत सिंह बाजवा हैरी की ओर से जारी सूचना में कहा गया है कि एलएडीसी नीति के विरोध में भूख हड़ताल कर रहे वकीलों के साथ एसोसिएशन पूरी मजबूती से खड़ी है। इसे वकीलों का वैध संघर्ष बताते हुए सभी सदस्यों से कामकाज से दूर रहकर आंदोलन को सफल बनाने की अपील की गई है।

    एलएडीसी नीति को लेकर पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ के वकीलों में लगातार विरोध बढ़ रहा है। विभिन्न बार एसोसिएशन प्रदर्शन, कार्य बहिष्कार और क्रमिक भूख हड़ताल के माध्यम से सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद कर रही हैं।

    वकीलों का कहना है कि प्रस्तावित व्यवस्था से कानूनी सहायता के क्षेत्र में निजी वकीलों की भूमिका और उनके पेशेवर अधिकार प्रभावित होंगे। इसी कारण वे नीति को वापस लेने की मांग पर अड़े हैं।

    बार एसोसिएशन ने कहा कि जब तक एलएडीसी नीति वापस नहीं ली जाती, विरोध जारी रहेगा। शुक्रवार को कामकाज स्थगित रखने के फैसले को आंदोलनरत वकीलों के प्रति एकजुटता का प्रतीक बताया गया है।

     

  • बंडी संजय के बेटे की बढ़ीं मुश्किलें, तेलंगाना HC ने गिरफ्तारी रोकने की मांग ठुकराई

    बंडी संजय के बेटे की बढ़ीं मुश्किलें, तेलंगाना HC ने गिरफ्तारी रोकने की मांग ठुकराई

     हैदराबाद

    केंद्रीय मंत्री बंडी संजय कुमार के बेटे बंडी भगीरथ को एक बड़े कानूनी मामले में हाई कोर्ट से झटका लगा है. तेलंगाना हाई कोर्ट ने पॉक्सो (POCSO) कानून के तहत दर्ज एक मामले में भगीरथ को गिरफ्तारी से अंतरिम राहत देने से साफ इनकार कर दिया है। 

    हाई कोर्ट की वेकेशन बेंच ने शुक्रवार शाम को भगीरथ की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई शुरू की. जस्टिस टी. माधवी देवी की अगुवाई में ये सुनावई करीब आधी रात तक चलती रही। 

    लंबी बहस के बाद जज ने अग्रिम जमानत याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया. लेकिन भगीरथ के वकील ने अदालत से गुहार लगाई कि अंतिम फैसला आने तक भगीरथ की गिरफ्तारी पर रोक लगाई जाए. हालांकि, कोर्ट ने इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया। 

    'पीड़िता का बयान देखने के बाद राहत नहीं दे सकती'
    अंतरिम राहत की मांग को ठुकराते हुए जस्टिस टी. माधवी देवी ने कहा, 'मुझे नहीं लगता कि मुझे इस मोड़ पर कोई अंतरिम आदेश देना चाहिए. मैंने पीड़िता का बयान पढ़ा है. उसे देखने के बाद, इस स्तर पर मैं कोई भी अंतरिम राहत देने के पक्ष में नहीं हूं। 

    अदालत में दोनों पक्षों की तीखी बहस
    सुनवाई के दौरान भगीरथ के वकील ने तर्क दिया कि जमानत याचिका पर सुनवाई करते समय अदालत के पास अंतिम फैसला आने तक अंतरिम जमानत देने की अंतर्निहित शक्ति होती है. उन्होंने ये भी कहा कि इस मामले की शिकायतकर्ता ने खुद माना था कि उनकी बेटी साल 2025 से भगीरथ के साथ रिलेशनशिप में थी और दोनों के बीच अच्छे रिश्ते थे। 

    वगहीं, पीड़िता के वकील ने भगीरथ को किसी भी तरह की राहत देने का विरोध किया. उन्होंने दलील दी कि आरोपी के पिता (बंडी संजय) एक बेहद प्रभावशाली व्यक्ति हैं. ऐसे में अगर आरोपी को राहत मिलती है, तो वो सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकता है। 

    क्या है पूरा मामला?
    8 मई एक 17 वर्षीय नाबालिग लड़की की मां ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. शिकायत में आरोप लगाया गया कि भगीरथ उनकी बेटी के साथ रिलेशनशिप में था और उसने लड़की का सेक्सुअल हैरेसमेंट किया. पुलिस ने पहले भारतीय न्याय संहिता और पॉक्सो एक्ट की धाराओं के तहत केस दर्ज किया था. लेकिन कोर्ट के सामने पीड़िता का बयान दर्ज होने के बाद, मामले में पॉक्सो कानून की और भी सख्त धाराएं जोड़ दी गईं। 

    भगीरथ का दावा- 5 करोड़ रुपये की रंगदारी मांगी

    वहीं, भगीरथ ने भी करीमनगर पुलिस में लड़की और उसके परिवार के खिलाफ एक काउंटर शिकायत दर्ज कराई है. भगीरथ का दावा है कि लड़की से उसकी जान-पहचान थी और वो उसके फैमिली फंक्शन में भी गया था. उसने आरोप लगाया कि लड़की और उसके माता-पिता उस पर शादी का दबाव बनाने लगे. जब उसने शादी से इनकार कर दिया, तो वो पैसों की मांग करने लगे और झूठे केस में फंसाने की धमकी दी। 

    भगीरथ का आरोप है कि उसने लड़की के पिता को 50,000 रुपये भी दिए थे, लेकिन बाद में परिवार ने उससे 5 करोड़ रुपये की मांगे और मांग पूरी न होने पर मां ने खुदकुशी करने की धमकी दी। 

    जज ने सोशल मीडिया कैंपेन पर जताई चिंता
    सुनवाई शुरू होने से पहले जस्टिस टी. माधवी देवी ने इस मामले को लेकर सोशल मीडिया पर चलाए जा रहे दुष्प्रचार पर गहरी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि अगर पीड़िता के वकील को उनके सामने बहस करने में कोई आपत्ति है, तो वो इस मामले की सुनवाई नहीं करेंगी. हालांकि, दोनों पक्षों के वकीलों की अपील पर उन्होंने मामले की सुनवाई की।