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  • जज के कथित अपमानजनक व्यवहार से नाराज वकील, इंदौर अभिभाषक संघ के नेतृत्व में किया प्रदर्शन

    जज के कथित अपमानजनक व्यवहार से नाराज वकील, इंदौर अभिभाषक संघ के नेतृत्व में किया प्रदर्शन

    इंदौर
     कुटुंब न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश धीरेंद्र सिंह से जुड़े मामले में अधिवक्ताओं में भारी रोष है। न्यायाधीश धीरेंद्र सिंह के कथित अपमानजनक व्यवहार के विरोध में इंदौर अभिभाषक संघ के नेतृत्व में बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं ने प्रदर्शन किया। बताया गया कि प्रदर्शनकारी अधिवक्ता जज के कोर्ट रूम में भी पहुँचे और वहाँ विरोध दर्ज कराया।

    अधिवक्ताओं का आरोप है कि संबंधित अधिकारी का व्यवहार वकीलों के प्रति लगातार अच्छा नहीं रहा है। उनके अनुसार वकील कोर्ट में आते हैं तो उनसे "आप मुझे दिख नहीं रहे हो" जैसी बातें कही जाती हैं। आरोप यह भी है कि बहस के दौरान वकीलों को अपनी बात पूरी करने और जिरह (क्रॉस) करने नहीं दिया जाता, और उनके मुवक्किलों के सामने ही यह तक कह दिया जाता है कि "आपको वकालत करना नहीं आती, वकालत छोड़कर कोई और काम करें।"

    प्रदर्शन में शामिल अधिवक्ता ने बताया कि वे चुनाव जीतकर आए हैं और जब से पदभार संभाला है, तब से इस अधिकारी की रोज शिकायतें आ रही हैं। उन्होंने कहा, "इस आचरण से वकीलों में काफी रोष था। हम दो बार लिखित में उच्च न्यायालय को शिकायत कर चुके हैं, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। आज सुबह भी हम उच्च न्यायालय में शिकायत करके आए हैं।"

    अधिवक्ताओं ने इसके बाद संबंधित वरिष्ठ न्यायाधीश से भी मुलाकात की और उन्हें अपनी बात बताई। उनका कहना है कि उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि आचरण में सुधार न हुआ तो वे उग्र आंदोलन से भी पीछे नहीं हटेंगे। प्रदर्शन बाल न्यायालय पर भी हुआ, जहाँ संबंधित अधिकारी पीठासीन अधिकारी हैं।

    सामाजिक संस्था का समर्थन: इस आंदोलन को सामाजिक संस्था पौरुष, इंदौर ने भी समर्थन दिया। संस्था के अध्यक्ष अशोक दशोरा ने बताया कि वकीलों के साथ हो रहे कथित अन्याय के मुद्दे पर संस्था के सदस्यों ने कोर्ट के मुख्य गेट पर प्रदर्शन किया और नारेबाजी की। दशोरा का आरोप है कि अब तक कोर्ट रूम में पुरुषों के साथ जजों द्वारा बदतमीज़ी और अपमान किया जाता रहा है और अब ऐसी घटनाएँ वकीलों के साथ भी हो रही हैं, जिसका संस्था पुरज़ोर विरोध करती है। संस्था के सदस्यों ने "अगर न्याय की बात है, हम एडवोकेट्स के साथ हैं", "अधिवक्ताओं का सम्मान करो" और "गर्व करो, अभिमान नहीं" जैसे नारों की तख्तियाँ लेकर विरोध जताया। आंदोलनकारी वकीलों ने भी हाथों में हाथ लेकर ये नारे लगाए। अभिभाषक संघ के पदाधिकारियों ने संस्था के समर्थन की सराहना की।

  • Indore News: पंच परमेश्वर और ग्रामीण विकास योजनाओं में गड़बड़ी का आरोप, इंदौर जिले में 45 मामले दर्ज

    Indore News: पंच परमेश्वर और ग्रामीण विकास योजनाओं में गड़बड़ी का आरोप, इंदौर जिले में 45 मामले दर्ज

     इंदौर
     सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार की शिकायतें किस तरह अलग-अलग स्तरों पर सामने आ रही हैं, इसकी तस्वीर दो आंकड़ों से मिलती है। एक ओर 4 सितंबर 2024 से 6 अक्टूबर 2026 के बीच सरकारी योजनाओं से जुड़े 45 प्रकरण दर्ज किए गए। दूसरी ओर लोकायुक्त इंदौर के वर्ष 2026 के आंकड़ों में 44 अपराध पंजीबद्ध होने की जानकारी है।

    लोकायुक्त के मामलों में सबसे बड़ा हिस्सा रिश्वत लेते पकड़े जाने यानी ट्रैप कार्रवाई का है। दर्ज 44 अपराधों में 40 ट्रैप के, एक पद के दुरुपयोग और तीन आय से अधिक संपत्ति से जुड़े छापों के मामले हैं। एसपी (लोकायुक्त) डा. राजेश सहाय के मुताबिक सरकारी योजनाओं से संबंधित 45 प्रकरणों की सूची में पंच परमेश्वर योजना सबसे ऊपर है। इसके तहत 18 मामले दर्ज हैं।

    प्रधानमंत्री कुटीर निर्माण योजना के पांच और प्रधानमंत्री सीसी रोड निर्माण से जुड़े चार प्रकरण सूची में हैं। मनरेगा की पशुपालन योजना के तीन मामले दर्ज किए गए, जबकि मनरेगा समग्र शिक्षा अभियान के तहत बाउंड्रीवॉल निर्माण और शौचालय रिपेयरिंग से जुड़े मामलों की संख्या क्रमश: एक और दो है।

    प्रधानमंत्री सोलर पैनल सब्सिडी योजना से जुड़े दो प्रकरण भी सूची में शामिल हैं। इसके अलावा प्रधानमंत्री सड़क निर्माण, संबल योजना, राज्य मार्ग सड़क निर्माण, ग्रामीण विकास के तहत सीसी रोड निर्माण, बिरसा मुंडा स्वरोजगार योजना और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना जैसी योजनाओं से जुड़े मामले भी दर्ज किए गए हैं। पंच परमेश्वर योजना में 18 प्रकरण होना जांच का अहम बिंदु है।

    लोकायुक्त इंदौर के वर्ष 2026 के आंकड़ों के अनुसार कुल 44 अपराध पंजीबद्ध किए गए। इनमें 40 ट्रैप प्रकरण हैं। यानी दर्ज मामलों में लगभग 91 प्रतिशत ट्रैप कार्रवाई से संबंधित हैं। एक मामला पद के दुरुपयोग और तीन आय से अधिक संपत्ति के मामलों में छापे से जुड़े हैं।

    ट्रैप मामलों की बड़ी संख्या बताती है कि लोकायुक्त की कार्रवाई में रिश्वत लेते पकड़े जाने वाले मामलों का हिस्सा प्रमुख है। वहीं, पद के दुरुपयोग और अनुपातहीन संपत्ति से जुड़े मामलों की संख्या कम है। हालांकि, ये आंकड़े केवल दर्ज प्रकरणों का वर्गीकरण बताते हैं, इनसे भ्रष्टाचार के सभी मामलों की वास्तविक संख्या का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

    27 मामलों में चालान, छह में सजा
    लोकायुक्त के आंकड़ों में 27 मामलों में चालान पेश किए जाने और छह मामलों में सजा होने की जानकारी दी गई है। यह कार्रवाई की प्रगति का अहम संकेतक है। दोनों सूचियां भ्रष्टाचार के अलग-अलग पहलुओं को सामने लाती हैं। सरकारी योजनाओं के मामलों में सड़क निर्माण, आवास, ग्रामीण विकास और अन्य योजनाओं से जुड़े प्रकरण हैं, जबकि लोकायुक्त के वार्षिक आंकड़ों में ट्रैप कार्रवाई का दबदबा दिखाई देता है।

  • छेड़छाड़ के मामले में केरल हाईकोर्ट का फैसला चर्चा में, महिला की छाती पर कोहनी मारने के केस में बदला निचली अदालत का आदेश

    छेड़छाड़ के मामले में केरल हाईकोर्ट का फैसला चर्चा में, महिला की छाती पर कोहनी मारने के केस में बदला निचली अदालत का आदेश

    त्रिशूर
    केरल हाईकोर्ट ने महिला की छाती पर कोहनी मारने के मामले में एक व्यक्ति को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इससे महिला की गरिमा भंग करने का इरादा साबित नहीं होता।जस्टिस जोबिन सेबेस्टियन ने क्रिमिनल रिव्यू पिटीशन मंजूर की। उन्होंने चालक्कुडी की ज्यूडिशियल फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट कोर्ट-I की सजा रद्द कर दी।

    इस सजा को त्रिशूर की एडिशनल सेशंस कोर्ट-III ने भी बरकरार रखा था। मामला IPC की धारा 354 के तहत दर्ज था।मजिस्ट्रेट कोर्ट ने आरोपी को एक महीने की कैद और ₹1000 जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके बाद अपीलीय अदालत ने भी दोषसिद्धि और सजा बरकरार रखी थी।

    पीड़ित का पक्ष

        महिला पंचायत रोड से पैदल जा रही थी। तभी आरोपी ने उसकी छाती पर दायीं तरफ कोहनी से वार किया। इससे महिला की गरिमा भंग हुई।
        इसी आधार पर आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 354 के तहत कार्रवाई की गई। इसके बाद आरोपी ने हाईकोर्ट में रीव्यू पिटीशन दायर की थी।

    आरोपी का पक्ष
        निचली अदालतों ने सबूतों का सही आकलन नहीं किया। पुराने विवाद के कारण झूठा फंसाया जा रहा है।

        घटना को लेकर कोई स्वतंत्र सबूत नहीं है। FIR दर्ज कराने में एक दिन की देरी की गई।

    सरकार का पक्ष
        सरकारी वकील ने कहा कि ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत ने सबूतों का सही आकलन किया था।

        फैसलों में ऐसा कोई गैरकानूनीपन, अनियमितता या गंभीर गलती नहीं है, जिसके आधार पर पुनरीक्षण में दखल दिया जाए।

    हाईकोर्ट ने कहा- इरादा व्यक्ति के मन की स्थिति
    हाईकोर्ट ने कहा कि IPC की धारा 354 लगाने के लिए महिला की गरिमा भंग करने का इरादा साबित होना जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि घटना की प्रकृति और परिस्थितियों की बारीकी से जांच करनी होगी। इससे आरोपी के इरादे का पता लगाया जा सकता है।

    अदालत ने कहा, “मामले में आरोपी पर लगाया गया आरोप यह है कि उसने शिकायतकर्ता की छाती पर कोहनी से वार किया। मुझे समझ नहीं आता कि इसे महिला की गरिमा भंग करने का आपराधिक इरादा कैसे माना जा सकता है।”

    कोर्ट ने आगे कहा, “इसलिए मुझे यह मानने में कोई हिचक नहीं है कि IPC की धारा 354 का अपराध बनाने के लिए जरूरी आपराधिक इरादा इस मामले में मौजूद नहीं है।”

    कोर्ट ने सबूतों की भी जांच की
    हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि के आधार की भी जांच की। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने मुख्य रूप से महिला और उसकी मां की गवाही पर भरोसा किया था। अपीलीय अदालत ने भी इन्हीं दोनों के बयानों के आधार पर दोषसिद्धि बरकरार रखी थी।

    ऐसी स्थिति में महिला की गवाही की ज्यादा सावधानी से जांच जरूरी थी। अदालत ने कहा कि उस पर भरोसा करने से पहले स्वतंत्र पुष्टि जरूरी थी।

    हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यौन हमले के मामले में पीड़ित की गवाही को, घायल गवाह की गवाही के समान माना जाता है।

    कोर्ट ने कहा कि गवाह का शिकायतकर्ता से संबंध होना, अपने आप में उसकी गवाही खारिज करने का आधार नहीं है। हाईकोर्ट ने इसके बाद दोषसिद्धि और सजा रद्द कर दी। आरोपी को बरी कर दिया गया।

  • पति-पत्नी विवाद पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, मानसिक क्रूरता पर तलाक; भरण-पोषण के लिए अलग दावा संभव

    पति-पत्नी विवाद पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, मानसिक क्रूरता पर तलाक; भरण-पोषण के लिए अलग दावा संभव

    बिलासपुर 
    छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने पति के प्रति पत्नी के व्यवहार को मानसिक क्रूरता मानते हुए एक पारिवारिक अदालत द्वारा मंजूर किए गए तलाक के फैसले को सही ठहराया है. अदालत ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में साफ किया कि शादीशुदा जिंदगी में बार-बार के विवाद और बिना मजबूत सबूतों के लगाए गए गंभीर आरोप मानसिक क्रूरता के दायरे में आते हैं। 

    इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने यह भी व्यवस्था दी कि यदि पत्नी ने निचली अदालत में स्थायी गुजारा भत्ते (अल्मोनी) की मांग नहीं की थी, तो वह इसके लिए कानून के मुताबिक अलग से आवेदन दायर कर सकती है। 

    यह पूरा मामला 17 फरवरी 2016 को हुई एक शादी से जुड़ा है, जहां दंपत्ति विवाह के बाद महज छह से सात दिन ही साथ रहे. इसके बाद सरकारी कर्मचारी पति अपनी नौकरी के सिलसिले में दंतेवाड़ा चला गया, जबकि पत्नी नर्सिंग की पढ़ाई पूरी करने के लिए हॉस्टल में रहने लगी. इसके बाद दोनों के रिश्तों में कड़वाहट आ गई। 

    पति ने आरोप लगाया कि पत्नी अक्सर उसके और उसके माता-पिता के साथ झगड़ा करती थी, बिना बताए मायके चली जाती थी और किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंधों में थी. पति का यह भी आरोप था कि पत्नी ने उसे परेशान करने के लिए उसके सरकारी विभाग में झूठी शिकायतें दर्ज कराई थीं। 

    दूसरी तरफ, पत्नी ने इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए दावा किया था कि उसके ससुराल वाले उसे 4 लाख रुपये और पिता की जमीन ट्रांसफर करने के लिए प्रताड़ित करते थे. पत्नी का आरोप यह भी था कि पति के अन्य महिलाओं से संबंध हैं। 

    अंबिकापुर की पारिवारिक अदालत ने 11 नवंबर 2024 को पति के पक्ष में तलाक की मंजूरी दी थी, लेकिन गुजारा भत्ता तय नहीं किया था. इसी फैसले को चुनौती देने और तलाक रद्द कराने के साथ-साथ गुजारा भत्ता पाने के लिए पत्नी ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। 

    जस्टिस पार्थ प्रतीक साहू और जस्टिस सुषमा सावंत की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलों और सबूतों का गहन अध्ययन किया. हालांकि पति पत्नी के कथित अफेयर से जुड़े टेलीफोन रिकॉर्डिंग या चश्मदीद गवाह जैसे सीधे सबूत पेश नहीं कर सका, लेकिन जिरह के दौरान पत्नी के वकील द्वारा पूछे गए सवालों ने मामले का रुख बदल दिया. जिरह में पत्नी की ओर से यह सुझाव दिया गया था कि उसने विवादित घटना को लेकर माफी मांगी थी।  

    पीठ ने टिप्पणी की कि यदि कोई घटना घटी ही नहीं थी, तो माफी मांगने जैसा सुझाव देने का कोई औचित्य नहीं बनता. इसके अलावा, पत्नी की मां ने उसके समर्थन में हलफनामा तो दिया, लेकिन वे जिरह के लिए कटघरे में उपस्थित नहीं हुईं. अदालत ने इन परिस्थितियों को देखते हुए पति के पक्ष को अधिक विश्वसनीय माना और तलाक को बरकरार रखा। 

    जहां तक गुजारा भत्ते की बात है, उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत वित्तीय सहायता तय करने के लिए दोनों पक्षों की आय और संपत्ति की जांच जरूरी है. चूंकि पत्नी ने पारिवारिक अदालत में इस मांग को नहीं रखा था और न ही कोई साक्ष्य पेश किए थे, इसलिए अपीलीय स्तर पर पहली बार इस पर निर्णय नहीं लिया जा सकता. अदालत ने पत्नी की अपील खारिज करते हुए उसे सक्षम न्यायालय में गुजारा भत्ते के लिए अलग से नया आवेदन करने की स्वतंत्रता दी है। 

  • मोहाली कोर्ट का बड़ा आदेश, बब्बर खालसा से जुड़े 3 आरोपी समेत 4 भगोड़े घोषित; पेश होने के निर्देश

    मोहाली कोर्ट का बड़ा आदेश, बब्बर खालसा से जुड़े 3 आरोपी समेत 4 भगोड़े घोषित; पेश होने के निर्देश

    चंडीगढ़
     प्रतिबंधित आतंकी सं
    गठन बब्बर खालसा इंटरनेशनल (बीकेआइ) से जुड़े तीन आरोपितों समेत चार लोगों को मोहाली की विशेष एनआइए अदालत ने भगोड़ा घोषित किया है।गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बाद भी आरोपितों के नहीं मिलने पर अदालत ने उनके खिलाफ उद्घोषणा जारी की है। इनमें जसविंदर सिंह उर्फ बागी उर्फ मन्नू अगवान उर्फ जस्सा, करण सिंह उर्फ अभी, मलविंदर सिंह उर्फ सुख और गुरप्रीत सिंह उर्फ गोपी नवाशहरियां शामिल हैं। अदालत ने सभी को 16 नवंबर 2026 को पेश होने के लिए कहा है।

    यूएपीए सहित कई मामलों में केस दर्ज
    एनआइए की ओर से दर्ज मामले में आतंकी साजिश, हथियार और विस्फोटक से जुड़े आरोप हैं। एनआइए ने यह केस 22 मई 2025 को दर्ज किया था। इसमें प्रतिबंधित आतंकी संगठन बीकेआइ से जुड़े नेटवर्क की जांच की जा रही है। मामले में यूएपीए, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, आर्म्स एक्ट और भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के तहत कार्रवाई की गई है।

    पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के सामने आए दस्तावेजों के अनुसार जसविंदर सिंह उर्फ बागी उर्फ मन्नू अगवान उर्फ जस्सा को बीकेआइ का सक्रिय गुर्गा बताया गया है। उसके खिलाफ आतंकी साजिश रचने, लोगों में डर पैदा करने और देश-विरोधी गतिविधियों से जुड़े आरोप हैं। जांच में उसके नेटवर्क के हथियारों की तस्करी, टारगेट किलिंग और जबरन वसूली जैसी गतिविधियों से जुड़े होने की बात भी सामने आई है।

    पंजाब में आतंकी संगठनों और गैंगस्टर नेटवर्क की जांच जारी
    करण सिंह उर्फ अभी और मलविंदर सिंह उर्फ सुख के नाम भी इसी नेटवर्क से जुड़े मामले में सामने आए हैं। दोनों पर जसविंदर और उसके साथियों के साथ मिलकर आपराधिक और देश-विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप हैं। सुरक्षा एजेंसियां पंजाब में आतंकी संगठनों और गैंगस्टर नेटवर्क के बीच संपर्क की भी जांच कर रही हैं।

    इसी मामले से जुड़े न्यायिक रिकॉर्ड में फाजिल्का के गैंगस्टर से नेता बने जसविंदर सिंह रॉकी की हत्या का संदर्भ भी सामने आता है। रॉकी की वर्ष 2016 में हिमाचल प्रदेश के परवाणू में हत्या कर दी गई थी। न्यायिक रिकॉर्ड में इस घटना की जिम्मेदारी प्रतिबंधित आतंकी संगठन बीकेआइ द्वारा लिए जाने की सूचना का उल्लेख है।

    मोहाली अदालत ने गुरप्रीत सिंह उर्फ गोपी नवाशहरियां को भी भगोड़ा घोषित किया है। वह शहीद भगत सिंह नगर जिले के गांव बिरोवाल का रहने वाला बताया गया है। अदालत के अनुसार गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बाद भी वह नहीं मिला। अब चारों को 16 नवंबर को अदालत में पेश होना होगा। निर्धारित समय में पेश नहीं होने पर उनके खिलाफ आगे की कार्रवाई की जा सकती है।

  • झारखंड हाईकोर्ट में CGL नियुक्ति विवाद की सुनवाई, 2700 अभ्यर्थियों की नौकरी पर फैसला बाकी

    झारखंड हाईकोर्ट में CGL नियुक्ति विवाद की सुनवाई, 2700 अभ्यर्थियों की नौकरी पर फैसला बाकी

    रांची
     झारखंड हाई कोर्ट में सीजीएल परीक्षा रद करने के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई जारी है। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि मामले में सीआईडी की जांच जारी है।

    इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि वह सीआईडी की जांच को लेकर सुनवाई नहीं कर रही है। अदालत ने कहा कि वह 2700 अभ्यर्थियों को एक नोटिफिकेशन के माध्यम से हटाए जाने के मामले की सुनवाई कर रही है। अदालत ने कहा कि यह मामला गंभीर है और वह मामले में जल्द से जल्द निर्णय देना चाहती है।

    अदालत ने कहा कि उसे सिर्फ यह देखना है कि सरकार की ओर से जारी अधिसूचना के लिए सभी प्रक्रियाओं का पालन किया गया है या नहीं। सरकार के जवाब को देखते हुए अदालत ने कहा कि ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सरकार ने दबाव में नियुक्ति रद करने का निर्णय लिया है। फिलहाल मामले में दोपहर 2:15 बजे से फिर सुनवाई होगी। 

    विभिन्न परीक्षाओं के अभ्यर्थियों ने दी चुनौती
    उल्लेखनीय है कि अदालत के समक्ष अलग-अलग याचिकाओं के जरिए अभ्यर्थियों ने सरकार और आयोग के विज्ञापन रद्द करने के निर्णय को चुनौती दी है. प्रार्थी रमेश उरांव व अन्य की ओर से याचिका दायर कर जेएसएससी सीजीएल परीक्षा-2023 को रद्द करने की सरकार की अधिसूचना को चुनौती दी गई है, जबकि प्रार्थी सुभाष मुरमू व अन्य ने सीडीपीओ नियुक्ति परीक्षा रद्द किए जाने के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. इसके साथ ही प्रार्थी दीपमाला, आशीष अक्षत, आकांक्षा मिंज व अन्य ने जेपीएससी 11वीं से 13वीं प्रतियोगिता परीक्षा तथा प्रार्थी सौरभ सिंह व अन्य ने फूड सेफ्टी ऑफिसर परीक्षा रद्द करने के फैसले को निरस्त करने की मांग की है। 

    अभ्यर्थियों के भविष्य पर छाया संकट
    प्रार्थियों की ओर से कोर्ट में दलील दी गई कि परीक्षा प्रक्रियाओं के अंतिम चरण या विज्ञापन जारी होने के बाद अचानक बिना किसी ठोस व तार्किक कारण के पूरी नियुक्ति प्रक्रिया को रद्द करना गलत है. सरकार के इस कदम से वर्षों से तैयारी कर रहे हजारों योग्य अभ्यर्थियों का भविष्य अधर में लटक गया है और उनकी उम्र सीमा भी समाप्त हो रही है. फिलहाल हाईकोर्ट की इस पीठ में मामले पर बहस जारी है और अदालत के रुख पर राज्यभर के युवाओं की नजरें टिकी हुई हैं। 

  • DA भुगतान पर पंजाब सरकार घिरी, हाईकोर्ट में आज अहम सुनवाई; कल कहा था- ‘लुका-छिपी नहीं चलेगी’

    DA भुगतान पर पंजाब सरकार घिरी, हाईकोर्ट में आज अहम सुनवाई; कल कहा था- ‘लुका-छिपी नहीं चलेगी’

    चंडीगढ़ 

    पंजाब के सरकारी मुलाजिमों और पेंशनरों के बकाया DA मामले में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट आज (6 अक्टूबर) फिर सुनवाई करेगा। पंजाब के चीफ सेक्रेटरी केएपी सिन्हा आज भी व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में हाजिर होंगे। उन्हें कोर्ट ने समन किया है।

    सोमवार (5 अक्टूबर) को हुई सुनवाई में हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने के मामले में तथ्यों को गलत तरीके से पेश कर रही है।

    कोर्ट ने कहा- सुप्रीम कोर्ट जाना आपका अधिकार है, लेकिन ट्वीट कर फैसले को चुनौती देंगे तो हम इसकी तारीफ नहीं करेंगे। सरकार खुद के लिए कड़ी कार्रवाई की स्थिति पैदा कर रही है। अब बहुत हो चुका, अब और लुका-छिपी नहीं चल सकती।

    बता दें कि 3 अगस्त 2026 को हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को कर्मचारियों और पेंशनरों को IAS, IPS और IFS अधिकारियों के बराबर लंबित DA/DR देने को कहा था। कोर्ट ने यहां तक कहा था कि बकाया देने तक सरकार बड़े स्तर पर एडवरटाइजमेंट जैसे खर्च भी बंद करे।

    पहले जानिए कि मुख्य विवाद क्या है?
    पंजाब के मुलाजिम और पेंशनर्स मांग कर रहे हैं कि उन्हें छठे पंजाब पे कमीशन के अनुसार DA केंद्र सरकार के पैटर्न पर मिलना चाहिए। उनका कहना है कि राज्य का टैक्स राजस्व बढ़ा है, इसलिए सरकार को ₹14,200 करोड़ का बकाया एरियर तुरंत ब्याज समेत देना चाहिए।

    इस पर पंजाब सरकार का तर्क है कि 2021 के पे-रूल्स में कोई निश्चित केंद्रीय दर अनिवार्य नहीं है। इतनी बड़ी रकम अचानक जारी करने से राज्य का वित्तीय ढांचा प्रभावित होगा और वह पहले से ही कर्मचारियों को कई केंद्रीय श्रेणियों से ज्यादा वेतन दे रही है।

    अब विवाद की पूरी टाइमलाइन पढ़िए
        8 अप्रैल 2026 (सिंगल बेंच का फैसला):
    हाई कोर्ट के सिंगल जज की बेंच ने पंजाब सरकार को आदेश दिया कि वह अपने कर्मचारियों और पेंशनर्स को केंद्रीय पैटर्न के अनुसार उसी दर पर DA/DR जारी करे, जिस दर पर पंजाब में तैनात IAS, IPS अधिकारियों को दिया जाता है। कोर्ट ने इसके लिए 30 जून 2026 तक की डेडलाइन तय की थी।

        3 अगस्त 2026 (हाई कोर्ट की डबल बेंच का सख्त आदेश): पंजाब सरकार ने सिंगल बेंच के फैसले के खिलाफ अपील दायर की। हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली डिवीजन बेंच ने सरकार की अपील खारिज कर दी और आदेश दिया कि 15 दिनों के भीतर सभी लंबित किस्तों का भुगतान किया जाए। कोर्ट ने यह भी शर्त रखी कि देरी होने पर 6% सालाना साधारण ब्याज देना होगा और जब तक भुगतान नहीं होता, सरकार प्रिंट या सोशल मीडिया पर विज्ञापनों जैसे गैर-जरूरी खर्चों पर रोक लगाए।

        17 अगस्त 2026 (हाई कोर्ट की डेडलाइन खत्म): हाई कोर्ट की ओर से दी गई 15 दिनों की डेडलाइन समाप्त हो गई, लेकिन सरकार ने भुगतान नहीं किया। इसके विरोध में पंजाब स्टेट मिनिस्टीरियल सर्विसेज यूनियन और अन्य संगठनों ने हड़ताल की चेतावनी दी।

        27 अगस्त 2026 (कर्मचारियों की महा-हड़ताल और सरकार का एक्शन): लंबित DA, एरियर और पुरानी पेंशन योजना (OPS) को लेकर कर्मचारियों ने राज्यव्यापी सामूहिक हड़ताल की। जवाब में भगवंत मान सरकार ने नो वर्क, नो पे (काम नहीं तो वेतन नहीं) का नियम लागू कर कर्मचारियों को कारण बताओ (शो-कॉज) नोटिस जारी कर दिए।

        1 सितंबर 2026 (सरकार पहुंची सुप्रीम कोर्ट): पंजाब सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) दाखिल की। सरकार ने तर्क दिया कि इतनी बड़ी रकम का एक साथ भुगतान करना वित्तीय और संवैधानिक रूप से संभव नहीं है।

        8 से 9 सितंबर 2026 (पेन-डाउन स्ट्राइक और सरकार का झुकना): शो-कॉज नोटिस के विरोध में कर्मचारियों ने आंदोलन तेज करते हुए पेन-डाउन स्ट्राइक शुरू कर दी और सामूहिक छुट्टी पर चले गए। चौतरफा दबाव के बाद, 9 सितंबर को सरकार ने सभी कर्मचारियों के खिलाफ जारी किए गए कारण बताओ नोटिस वापस ले लिए, जिसके बाद कर्मचारियों ने अपनी हड़ताल स्थगित की।

        11 सितंबर 2026 (हाई कोर्ट का अल्टीमेटम): सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने पंजाब सरकार की याचिका (SLP) में 9 तकनीकी आपत्तियां निकाली थीं। हाई कोर्ट ने पंजाब सरकार को इन आपत्तियों को दूर करने और सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू करवाने के लिए 10 दिन का समय दिया।

        18 से 27 सितंबर 2026 (8% डीए बढ़ोतरी का ऐलान): मुख्यमंत्री भगवंत मान और कर्मचारी यूनियनों के बीच एक अहम बैठक हुई। गतिरोध को कम करने के लिए सरकार ने अंतरिम राहत के रूप में 8% डीए बढ़ोतरी का नोटिफिकेशन जारी किया। इससे राज्य में DA 42% से बढ़कर 50% हो गया। हालांकि, पुराने बकाए का मुद्दा अभी भी जस का तस बना रहा।

        5 अक्टूबर 2026 (मुख्य सचिव की पेशी और हाई कोर्ट की फटकार): मामले की सुनवाई के दौरान पंजाब के मुख्य सचिव केएपी सिन्हा हाई कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश हुए। सरकार ने हलफनामा देकर कहा कि मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इस पर हाई कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताते हुए कहा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट की अपील के स्टेटस को लेकर तथ्यों को गलत तरीके से पेश कर रही है और कोर्ट को गुमराह कर रही है। कोर्ट ने नोट किया कि 1 सितंबर को याचिका दायर होने के बावजूद तकनीकी आपत्तियां अभी तक दूर नहीं की गई हैं। ऐसा लग रहा है कि सरकार सिर्फ समय बिताने की कोशिश कर रही है। हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री से खुद स्टेटस रिपोर्ट मांगी है।

  • पंजाब में करप्शन केस CBI के हवाले, हाईकोर्ट ने दिए जांच के आदेश; 2 महीने में रिपोर्ट तलब

    पंजाब में करप्शन केस CBI के हवाले, हाईकोर्ट ने दिए जांच के आदेश; 2 महीने में रिपोर्ट तलब

    चंडीगढ़ 
    पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने सीएम भगवंत मान के ओएसडी राजबीर सिंह घुम्मन और अन्य लोगों पर भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच सीबीआई को साैंप दी है। कोर्ट ने पंजाब के डीजीपी को ईडी की ओर से भेजे गए पत्रों की जांच सीबीआई को सौंपने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने वकील निखिल सराफ की ओर से दायर एक पीआईएल पर यह आदेश दिया। कोर्ट ने सीबीआई को दो महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। 

    सरकार से जुड़े करप्शन के मामले की जांच अब CBI करेगी। पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने इस संबंध में आदेश जारी किए हैं। कोर्ट ने CBI को 2 महीने में जांच रिपोर्ट सौंपने को कहा है।इस मामले में ED ने पंजाब के DGP को पत्र भेजकर करप्शन के आरोपों को लेकर केस दर्ज करने को कहा था। जब पुलिस ने केस दर्ज नहीं किया तो ED ने हाईकोर्ट का रुख किया।इसके बाद मामले में जनहित याचिका दायर की गई थी। अब हाईकोर्ट ने मामले की जांच CBI को सौंप दी है।

    भ्रष्टाचार के आरोपों पर ED ने DGP को क्यों लिखी चिट्ठी?

        ईडी ने क्या कहा: प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने पंजाब के डीजीपी गौरव यादव को कई पत्र भेजकर कथित भ्रष्टाचार और सरकारी कामकाज में दखल के मामले में एफआईआर दर्ज करने की मांग की है। ईडी की जांच में ट्रांसफर-पोस्टिंग, सरकारी टेंडर, नीतिगत फैसलों, जमीन के इस्तेमाल में बदलाव और दूसरे सरकारी कामों को प्रभावित करने के आरोप सामने आने की बात कही गई है। जुलाई और अगस्त 2026 में भेजे गए पत्रों को लेकर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में भी मामला पहुंचा।

        किस पर आरोप हैं: ईडी की कार्रवाई में नितिन गोहल, रियल एस्टेट कारोबारी अजय सहगल, सुरेश कुमार बजाज और अन्य लोगों के नाम सामने आए हैं। जांच में मुख्यमंत्री के ओएसडी राजबीर सिंह घुम्मण से जुड़े संपर्कों का भी उल्लेख किया गया है। ईडी का आरोप है कि कुछ लोग सरकारी अधिकारियों की पोस्टिंग-ट्रांसफर और दूसरे प्रशासनिक फैसलों को प्रभावित करने के लिए बिचौलिये की भूमिका निभा रहे थे।
        ट्रांसफर-पोस्टिंग से लेकर टेंडर तक: ईडी के मुताबिक जांच में मिले चैट और अन्य सामग्री में अधिकारियों की पोस्टिंग, तबादलों और सरकारी पदों पर नियुक्ति से जुड़ी बातचीत का उल्लेख है। मार्कफेड के टेंडर, अधिकारियों की पोस्टिंग, लाइसेंस और अन्य सरकारी मंजूरियों को प्रभावित करने के आरोप भी लगाए गए हैं। ईडी ने भ्रष्टाचार निवारण कानून के साथ-साथ आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और जालसाजी से जुड़ी धाराओं के तहत अपराध बनने की बात कही है।

        तलाशी में क्या मिला: ईडी ने मई 2026 में नितिन गोहल, अजय सहगल और अन्य से जुड़े ठिकानों पर तलाशी ली थी। एजेंसी के मुताबिक इस दौरान दस्तावेज और डिजिटल सामग्री मिली। करीब एक करोड़ रुपए नकद बरामद होने का भी दावा किया गया है। ईडी ने मोबाइल फोन से मिले वाट्सऐप चैट और कॉल रिकॉर्ड को भी जांच का हिस्सा बनाया है।

        जमीन और रियल एस्टेट का एंगल: मामला एक बड़े चेंज ऑफ लैंड यूज (सीएलयू) और मनी लॉन्ड्रिंग जांच से भी जुड़ा है। ईडी की कार्रवाई मूल रूप से करीब 348 करोड़ रुपए के सनटेक सिटी प्रोजेक्ट से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच के दौरान आगे बढ़ी। एजेंसी ने आरोप लगाया कि सरकारी अधिकारियों के जरिए कुछ रियल एस्टेट संस्थाओं को जमीन के इस्तेमाल में बदलाव और दूसरी मंजूरियां दिलाने की कोशिश की गई।
        डीजीपी ने क्या किया: ईडी के पत्र के बाद पंजाब पुलिस ने मामले को सीधे एफआईआर में बदलने के बजाय ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन से कानूनी राय मांगी। इसी बीच ईडी ने दोबारा पत्र भेजकर कार्रवाई की मांग की। सितंबर में ईडी ने हाईकोर्ट को बताया कि पंजाब पुलिस को उसकी ओर से कई संचार भेजे जा चुके हैं, लेकिन एफआईआर दर्ज नहीं हुई।
        मामला हाईकोर्ट पहुंचा: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अगस्त 2026 में इस मामले पर पंजाब सरकार से जवाब मांगा। कोर्ट ने कहा कि लगाए गए आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और राज्य से सावधानीपूर्वक जवाब अपेक्षित है। ईडी को डीजीपी को भेजे गए अपने पत्र कोर्ट के सामने रखने को भी कहा गया। सितंबर में मामले पर फैसला सुरक्षित रख लिया गया।
        सरकार और आरोपियों का पक्ष: मुख्यमंत्री भगवंत मान ने ईडी के आरोपों को खारिज करते हुए इन्हें बेबुनियाद बताया। नितिन गोहल ने भी ईडी के आरोपों से इनकार किया है और कहा है कि चैट तथा बातचीत को गलत संदर्भ में पेश किया गया।

  • हाई कोर्ट का बड़ा आदेश: माता-पिता की नौकरी, सैलरी से अकेले तय नहीं होगी OBC क्रीमीलेयर पात्रता

    हाई कोर्ट का बड़ा आदेश: माता-पिता की नौकरी, सैलरी से अकेले तय नहीं होगी OBC क्रीमीलेयर पात्रता

     ग्वालियर
     मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने ओबीसी प्रमाण पत्र को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि माता-पिता के वेतनमान और पदोन्नति के आधार पर ही संतान को क्रीमीलेयर में नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा ओबीसी प्रमाण पत्र का आवेदन खारिज करने के आदेश को रद कर दिया और मामले पर नियमों के अनुसार दोबारा विचार करने के निर्देश दिए।

    2020 में खारिज हुआ था आवेदन
    मामला रागिनी राठौर से जुड़ा है। उनके ओबीसी प्रमाण पत्र के आवेदन को अनुविभागीय अधिकारी ने 23 अक्टूबर 2020 को खारिज कर दिया था। इसके बाद रागिनी ने अपर कलेक्टर के समक्ष अपील की, लेकिन 29 नवंबर 2022 को वहां भी एसडीओ के आदेश को बरकरार रखा गया।

    इसके बाद रागिनी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दोनों आदेशों को चुनौती दी।

    पिता की सरकारी नौकरी और वेतन को बनाया था आधार
    याचिका में बताया गया कि अधिकारियों ने रागिनी के पिता की आय को केवल वेतन के आधार पर देखते हुए उन्हें क्रीमीलेयर की श्रेणी में माना और इसी आधार पर ओबीसी प्रमाण पत्र का आवेदन खारिज कर दिया।

    रागिनी के पिता की प्रारंभिक नियुक्ति सिविल जज वर्ग-दो के पद पर हुई थी। इसके बाद 16 जून 2008 को 40 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद उन्हें सिविल जज वर्ग-एक के पद पर पदोन्नति मिली। याचिका के अनुसार, उनके पिता की आय का स्रोत केवल वेतन था।

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला
    हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन मामले में 11 मार्च 2026 को दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि क्रीमीलेयर का निर्धारण करते समय केवल माता-पिता के वेतन, वेतनमान या पदोन्नति को आधार बनाकर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

    खंडपीठ ने प्रशासनिक अधिकारियों के आदेश रद करते हुए कहा कि मामले के सभी प्रासंगिक पहलुओं की जांच सक्षम प्राधिकारी द्वारा की जानी चाहिए।
    OBC प्रमाण पत्र जारी करने पर कोर्ट ने नहीं दिया अंतिम आदेश

    हालांकि, हाई कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि उसके आदेश का मतलब रागिनी राठौर को स्वतः ओबीसी प्रमाण पत्र जारी करना नहीं है। कोर्ट ने उनके दावे पर कोई अंतिम राय नहीं दी है।

    प्रमाण पत्र जारी किया जाएगा या नहीं, इसका निर्णय सक्षम अधिकारी को लागू नियमों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर नए सिरे से करना होगा। यानी हाई कोर्ट ने सिर्फ प्रशासनिक आदेशों को रद कर मामले पर नियमानुसार पुनर्विचार का रास्ता साफ किया है।

     

  • भोपाल में भवन नियमों की अनदेखी! सील दुकानें दोबारा खुलीं, नगर निगम पर उठे सवाल

    भोपाल में भवन नियमों की अनदेखी! सील दुकानें दोबारा खुलीं, नगर निगम पर उठे सवाल

     भोपाल
     रिहायशी इलाकों में धड़ल्ले से चल रही व्यावसायिक गतिविधियों और भवन नियमों के उल्लंघन पर सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देश के बावजूद नगर निगम की कार्रवाई अब तक जमीन पर दिखाई नहीं दे रही है। 22 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि मौजूदा मास्टर प्लान और भवन नियमों के अनुसार कार्रवाई की जाए। आदेश को करीब एक सप्ताह बीत चुका है, लेकिन निगम ने अब तक कोई बड़ा अभियान शुरू नहीं किया है।

    सुप्रीम कोर्ट का आदेश बेअसर
    सबसे गंभीर स्थिति उन प्रतिष्ठानों की है, जिन्हें निगम ने स्वेच्छा से बंद कराने के बाद पंचनामा तैयार किया था। इनमें से भी बड़ी संख्या में प्रतिष्ठान अब दोबारा खुलने लगे हैं। यानी जिन दुकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के बंद होने का निगम ने बाकायदा दस्तावेज तैयार किया, वे ही फिर से संचालित हो रहे हैं।

    सीलिंग पर कोर्ट में पहुंची शिकायतें
    22 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान भोपाल के रहवासियों की शिकायतों का हवाला दिया गया था। इनमें बताया गया कि कुछ प्रतिष्ठानों को दिन में सील किया गया, लेकिन शाम को वे फिर खोल दिए जाते हैं। कुछ मामलों में सीलिंग के कुछ घंटे या दिन बाद बिना किसी नए घटनाक्रम, शो-कॉज के जवाब या सक्षम प्राधिकरण के निर्णय के परिसर दोबारा खोले जाने की बात भी सामने आई।

    कोर्ट ने इन शिकायतों को रिकार्ड पर लेते हुए स्पष्ट किया कि सीलिंग के निर्देशों का सख्ती से पालन होना चाहिए। अधिकारियों को बिना भेदभाव कार्रवाई करने और ‘पिक एंड चूज’ से बचने के निर्देश भी दिए गए। इसके बावजूद निगम की ओर से अब तक ऐसा अभियान नजर नहीं आया, जिससे लगे कि इन निर्देशों को लेकर गंभीरता से कार्रवाई शुरू कर दी गई है।

    मास्टर प्लान-2047 जारी, फिर भी कार्रवाई का इंतजार
    सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद प्रदेश सरकार मास्टर प्लान-2047 का ड्राफ्ट भी जारी कर चुकी है। हालांकि, निगम प्रशासन को कार्रवाई मौजूदा नियमों के अनुसार ही कार्रवाई करनी है। इसके बावजूद रिहायशी क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों की जांच, चिन्हांकन और कार्रवाई को लेकर निगम की सुस्ती सवाल खड़े कर रही है।

        नगर निगम द्वारा सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर कार्रवाई की जा रही है।- भुवन गुप्ता, उपायुक्त, नगर निगम।