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  • पंजाब में अवैध खनन पर हाईकोर्ट की सख्ती, 233 जगहों पर कार्रवाई के निर्देश

    पंजाब में अवैध खनन पर हाईकोर्ट की सख्ती, 233 जगहों पर कार्रवाई के निर्देश

     चंडीगढ़ 

    पंजाब के पठानकोट और गुरदासपुर जिलों में कथित अवैध खनन के मामलों पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। भारतीय सर्वेक्षण विभाग की रिपोर्ट में राज्य में 233 स्थानों पर अवैध खनन गतिविधियों की पहचान होने के बाद हाईकोर्ट ने चार सप्ताह के भीतर जिम्मेदार व्यक्तियों और अधिकारियों के खिलाफ उचित कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने चेतावनी दी है कि यदि कार्रवाई नहीं हुई तो मामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपी जा सकती है।

    मुख्य न्यायाधीश अश्वनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की पीठ ने 24 सितंबर 2026 को गुरबीर सिंह पन्नू बनाम भारत संघ तथा इससे संबंधित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान यह निर्देश जारी किए। मामला पठानकोट और गुरदासपुर जिलों में कथित अवैध खनन गतिविधियों से जुड़ा है।

    48 घंटे में हलफनामा दाखिल करने का आदेश
    सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि पिछली सुनवाई में दिए गए निर्देशों के बावजूद पंजाब के खनन निदेशक की ओर से हलफनामा दाखिल नहीं किया गया। इस पर अदालत ने 48 घंटे के भीतर हलफनामा दाखिल करने और उसकी अग्रिम प्रति याचिकाकर्ताओं के वकीलों को उपलब्ध कराने का आदेश दिया। 

    233 स्थानों की रिपोर्ट के बाद बढ़ी सख्ती
    अदालत ने कहा कि भारतीय सर्वेक्षण विभाग की तीन जुलाई 2026 की रिपोर्ट में राज्य के 233 स्थानों पर अवैध खनन की पहचान की गई है। रिपोर्ट सामने आने के बाद राज्य सरकार को तत्काल कदम उठाने और मामले की गंभीरता को देखते हुए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

    अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होगी
    हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि संबंधित अधिकारी समय रहते उचित कार्रवाई नहीं करते हैं तो अगली सुनवाई में उनकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय की जाएगी। राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर की गई कार्रवाई का पूरा ब्यौरा हलफनामे के माध्यम से अदालत में पेश करना होगा।

    16 नवंबर को अगली सुनवाई
    अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर 2026 के लिए निर्धारित की है। इस दौरान राज्य सरकार को बताना होगा कि अवैध खनन वाले चिन्हित स्थानों पर क्या कार्रवाई की गई और जिम्मेदार व्यक्तियों व अधिकारियों के खिलाफ कौन-कौन से कदम उठाए गए। 

  • अवैध निर्माण की शिकायत करने वाली संस्था ने मांगा पक्षकार बनने का अधिकार, हाईकोर्ट में आवेदन

    अवैध निर्माण की शिकायत करने वाली संस्था ने मांगा पक्षकार बनने का अधिकार, हाईकोर्ट में आवेदन

    इंदौर
    भवन के अवैध हिस्से को नियमित करने के लिए शासन द्वारा शुरू की गई कंपाउंडिंग योजना को लेकर नया पेच सामने आ गया है। इस योजना को चुनौती देने वाली जनहित याचिका में अब कालोनी बसाने वाली गृह निर्माण संस्था भी पक्षकार बनेगी। याचिका की सुनवाई के दौरान संस्था की ओर से प्रस्तुत हस्तक्षेप आवेदन को कोर्ट ने स्वीकार कर लिया है।

    संस्था का कहना है कि भवन में हो रहे अवैध निर्माण की शिकायत उसी ने की थी, ऐसे में उसे सुने बिना फैसला दिया जाना गलत होगा। कोर्ट ने शासन और निगम को एक अक्टूबर से पहले जवाब पेश करने के निर्देश दिए हैं।

    हाईकोर्ट में इस मामले में दो जनहित याचिकाएं लंबित हैं, जो कल्पना सेतपाल और वर्षा गुरनानी ने दायर की हैं। दोनों याचिकाओं में राज्य शासन द्वारा भवनों के अवैध हिस्से को नियमित करने के लिए लाए गए कंपाउंडिंग नियमों को चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि वर्ष 2022 में शासन द्वारा लाए गए नियमों में भवन के ऊपरी हिस्से में किए गए निर्माण को कंपाउंडिंग में शामिल नहीं किया गया, जो गलत है।

    गृह निर्माण संस्था ने हस्तक्षेप आवेदन दिया
    एक याचिका केसरबाग रोड स्थित नेमानगर में बन रहे भवन को लेकर स्वामी कल्पना सेतपाल ने दायर की है। इस पर नेमानगर गृह निर्माण संस्था ने हस्तक्षेप आवेदन प्रस्तुत किया है। आवेदन में कोर्ट को बताया गया है कि भवन की शिकायत संस्था द्वारा ही की गई थी, इसलिए उसे भी सुना जाना चाहिए। संस्था ने कहा है कि कंपाउंडिंग के नियम को चुनौती देना ही गलत है।

     

  • वेटिंग लिस्ट उम्मीदवारों को झटका, इस्तीफे के बाद खाली पद नई भर्ती से भरने होंगे

    वेटिंग लिस्ट उम्मीदवारों को झटका, इस्तीफे के बाद खाली पद नई भर्ती से भरने होंगे

    बिलासपुर
    छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वेटिंग लिस्ट उम्मीदवारों को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने एक मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि इस्तीफे के कारण खाली हुई किसी पद को पुरानी वेटिंग लिस्ट से नहीं भरा जा सकता है। कोर्ट ने स्टेट पावर ट्रांसमिशन कंपनी लिमिटेड में जूनियर इंजीनियर भर्ती से जुड़े एक मामले में यह बात कही है।

    जस्टिस बीडी गुरु की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए दो उम्मीदवारों द्वारा लगाई गई याचिकाओं को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के खाली पद फ्रेश वैकेंसी माने जाते हैं। जिन्हें भरने के लिए नए सिरे से विज्ञापन जारी कर चयन प्रक्रिया को पूरा करना होगा।

    क्या है मामला
    दरअसल, मामला बिजली कंपनियों, स्टेट पावर ट्रांसमिशन कंपनी लिमिटेड में जूनियर इंजीनियर के पदों से जुड़ा हुआ है। जूनियर इंजीनियर पद में भर्ती के लिए आवेदन जारी किया गया था। यह आवेदन ओबीसी वर्ग के तहत 15 सितंबर 2023 को जारी किए गए थे। अक्टूबर में चयन लिस्ट जारी की गई। जिसमें भूपेश वर्मा और विकास कुमार गुप्ता को सफलता नहीं मिली। उनका नाम वेटिंग लिस्ट में था।

    चयन लिस्ट जारी होने के बाद कई चयनित उम्मीदवारों ने ज्वाइन करने के बादअपने पदों से इस्तीफा दे दिया। जिससे कई पद खाली हो गए। जिसके बाद भूपेश वर्मा और विकास कुमार गुप्ता ने विभाग में आवेदन दिया कि वेटिंग लिस्ट वाले उम्मीदवारों को नियुक्ति दी जाए। लेकिन विभाग ने उन दोनों के आवेदन पर कोई विचार नहीं किया। जिसके बाद दोनों ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई।

    कोर्ट ने दिया फैसला
    मामले की सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जब कोई चयनित उम्मीदवार ज्वाइन करने के बाद इस्तीफा दे देता है तो खाली हुआ पद फ्रेश वैकेंसी होती है। इसे पिछली चयन या प्रतीक्षा सूची को ऑपरेट करके नहीं भरा जा सकता है। बल्कि इस पद के लिए नए विज्ञापन के जरिए चयन प्रक्रिया करनी होगी।

     

  • मुस्लिम पति की संपत्ति पर हिंदू पत्नी के उत्तराधिकार का सवाल, कोर्ट में मामला

    मुस्लिम पति की संपत्ति पर हिंदू पत्नी के उत्तराधिकार का सवाल, कोर्ट में मामला

     जबलपुर
     मध्य प्रदेश में इंदौर की एक हिंदू युवती और जबलपुर के मुस्लिम युवक हसनैन अंसारी के अंतरधार्मिक विवाह से जुड़ा एक विवाद विशेष विवाह अधिनियम की संवैधानिकता के प्रश्न तक पहुंच गया है।

    युवती के पिता और विश्व हिंदू परिषद के धर्म प्रसार विभाग के पदाधिकारी दिग्विजय सिंह ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर मुख्य पीठ में विशेष विवाह अधिनियम, 1954 की धारा चार की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए याचिका में मुस्लिम पति की संपत्ति में हिंदू पत्नी के उत्तराधिकार के अधिकार और विवाह के बाद उत्पन्न होने वाले कानूनी प्रश्न उठाए हैं।

    याचिकाकर्ताओं का मुख्य प्रश्न है कि विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत मुस्लिम युवक और हिंदू युवती का विवाह होने के बाद हिंदू पत्नी को मुस्लिम पति की संपत्ति में उत्तराधिकार का अधिकार किस कानून के तहत मिलेगा। हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर इस मामले में जवाब मांगा है।

    क्या है पूरा मामला?
    प्रकरण के अनुसार, युवती और हसनैन अंसारी ने विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह के लिए आवेदन किया था। इस पर हाई कोर्ट की एकल पीठ ने विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश दिए थे, लेकिन नवंबर 2024 में युवती के पिता की याचिका पर हाई कोर्ट की युगलपीठ ने विवाह प्रक्रिया आगे बढ़ाने के एकलपीठ के आदेश पर रोक लगा दी थी।

    अब युवती के पिता की ओर से दायर नई याचिका में इस प्रकरण का दायरा केवल विवाह प्रक्रिया के विवाद तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि विशेष विवाह अधिनियम की धारा-चार के अंतर्गत हिंदू युवती और मुस्लिम युवक के विवाह पश्चात महिला व उसके बच्चों को मिलने वाले अधिकारों को सुनिश्चित किए जाने पर केंद्रित हो गया है। केंद्र सरकार का जवाब मिलने के बाद हाई कोर्ट आगे की सुनवाई करेगा।

    याचिका में यह हैं प्रश्न?
    युवती के पिता की ओर से विशेष विवाह अधिनियम की धारा -चार को चुनौती देते हुए अंतरधार्मिक विवाह की वैधानिकता और उसके परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले उत्तराधिकार के अधिकारों पर सवाल उठाया गया है।

    याचिका में विशेष विवाह अधिनियम और मुस्लिम पर्सनल ला के बीच उत्पन्न होने वाली कानूनी स्थिति का भी मुद्दा उठाया गया है। ऐसे मामले में पत्नी और संतान के उत्तराधिकार तथा व्यक्तिगत कानून से जुड़े प्रश्नों पर भी न्यायालय से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की गई है।

     

  • 85 वर्षीय बुजुर्ग मां की गुहार पर कोर्ट का फैसला, पांचों बेटों पर लगा गुजारा भत्ता

    85 वर्षीय बुजुर्ग मां की गुहार पर कोर्ट का फैसला, पांचों बेटों पर लगा गुजारा भत्ता

    हरदा 

    मध्य प्रदेश के हरदा जिले में एक एसडीएम कोर्ट ने पांच बेटों को 85 साल की एक बुजुर्ग मां को भरण-पोषण के तौर पर हर महीने दो-दो हजार रुपये देने के आदेश दिए हैं।मध्य प्रदेश के हरदा जिले की खिरकिया तहसील की एसडीएम कोर्ट ने वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम के तहत एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने 85 साल की एक बुजुर्ग महिला के 5 बेटों को हर महीने की 10 तारीख तक अपनी मां को दो-दो हजार रुपये यानी कुल 10 हजार रुपये का भरण-पोषण देने का आदेश दिया है। अदालत ने पैसे नहीं देने पर कानूनी कार्रवाई और जमीन की आमदनी से सीधे भुगतान की चेतावनी दी है।

    मां के गुजारे के लिए हर महीने रकम देने के आदेश
    प्राप्त जानकारी के अनुसार, 85 साल की बजुर्ग विधवा महिला गीताबाई की याचिका पर सुनवाई करते हुए एसडीएम रजनी वर्मा की अदालत ने उनके पांच बेटों को अपनी मां के भरण-पोषण के लिए हर महीने एक तय रकम देने का आदेश दिया।

    बुजुर्ग महिला ने दी थी यह शिकायत
    गीताबाई ने एसडीएम कोर्ट में आवेदन देकर बताया था कि वे वृद्धावस्था के कारण चलने-फिरने, देखने और सुनने में असमर्थ हैं। ग्राम पीपल्या स्थित खसरा नंबर 66/2 (रकबा 3.861 हेक्टेयर) की संयुक्त जमीन में उनका 1/8 हिस्सा दर्ज है। उनके बेटों की ओर से इस जमीन को लीज पर दिया जाता है। उससे मिली पूरी इनकम का वे खुद ही उपभोग करते हैं।

    बेटे नहीं देते थे मां को पैसे
    बुजुर्ग मां का आरोप था कि जमीन की आमदनी में से बेटे उनको कोई हिस्सा नहीं देते। सभी बेटे उनकी आर्थिक मदद नहीं करते हैं। बेटे उनका कोई ध्यान भी नहीं रखते हैं। इतना ही नहीं जमीन पर बैंक का केसीसी कर्ज बकाया है जिसका भुगतान भी बेटे नहीं कर रहे हैं।

    मां को हर महीने देने होंगे 2-2 हजार रुपये
    मामले की सुनवाई और दस्तावेजों के अवलोकन के बाद एसडीएम कोर्ट ने 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरणपोषण और कल्याण अधिनियम, 2007' के तहत बुजुर्ग महिला के पांचों बेटों राजेन्द्रप्रसाद, गोपालप्रसाद, गोविन्द, नारायण और प्रमोद सोनी को निर्देश दिया कि वे हर महीने की 10 तारीख तक अपनी मां को 2-2 हजार रुपये इस तह कुल 10 हजार रुपये प्रतिमाह नकद भुगतान करें या उनके बैंक खाते में जमा कराएं।

    नहीं किया भुगतान तो ऐक्शन
    अदालत ने यह भी आदेश दिया कि यदि बेटे नियमित रूप से यह रकम बुजुर्ग महिला के खाते में पैसे जमा नहीं करते हैं तो पीपल्या स्थित खसरा नंबर 66/2 की खोट या बटाई से मिली कुल आमदनी में से मां के हिस्से की राशि सीधे उनको प्रदान की जाएगी। अदालत ने यह भी कहा कि उसके आदेश की अवहेलना करने पर आरोपी बेटों के खिलाफ नियमानुसार कानूनी वसूली और दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।

  • घर छोड़कर निकाह करने वाली 17 साल की युवती को हाईकोर्ट से सुरक्षा

    घर छोड़कर निकाह करने वाली 17 साल की युवती को हाईकोर्ट से सुरक्षा

    चंडीगढ़
     पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने मुस्लिम व्यक्तिगत कानून से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि यौवन प्राप्त कर चुका मुस्लिम लड़का या लड़की अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह कर सकता है। अदालत ने कहा कि मुस्लिम व्यक्तिगत कानून में सामान्यतः 15 वर्ष की आयु को यौवन की आयु माना जाता है, जब तक इसके विपरीत कोई प्रमाण सामने न हो। हालांकि, हाईकोर्ट ने संबंधित निकाह की वैधता पर कोई अंतिम राय नहीं दी है।

    मामला लुधियाना का है, जहां 17 वर्ष 8 माह की युवती ने परिवार की इच्छा के विरुद्ध 26 वर्षीय युवक से निकाह किया था। दोनों मुस्लिम हैं और उनका कहना था कि वे एक-दूसरे को कुछ समय से जानते हैं तथा आपसी सहमति से साथ रहना चाहते हैं। याचिका के अनुसार युवती के पिता इस रिश्ते के खिलाफ थे। इसके बाद युवती ने 22 अगस्त 2026 को अपना पैतृक घर छोड़ दिया और उसी दिन मुस्लिम रीति-रिवाज के अनुसार युवक से निकाह कर लिया।

    परिवार की धमकियों के बाद पुलिस से मांगी सुरक्षा
    परिवार की ओर से विरोध और कथित धमकियों के चलते दोनों ने 30 अगस्त को पुलिस के समक्ष जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए शिकायत दी। उन्होंने अदालत से पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराने की मांग की और आशंका जताई कि परिवार की ओर से उन्हें नुकसान पहुंचाया जा सकता है। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के प्रावधानों पर विचार किया।

    पसंद से विवाह की स्वतंत्रता
    अदालत ने कहा कि मुस्लिम कानून के तहत यौवन प्राप्त कर चुका लड़का या लड़की अपनी पसंद से विवाह करने के लिए स्वतंत्र है। मुस्लिम व्यक्तिगत कानून में सामान्यतः 15 वर्ष की आयु को यौवन प्राप्त करने की उम्र माना जाता है, जब तक इसके विपरीत कोई प्रमाण उपलब्ध न हो।

    हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि वह इस स्तर पर दोनों के निकाह की वैधता पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दे रही है। याचिका का उद्देश्य मुख्य रूप से जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा प्राप्त करना था।

    हाईकोर्ट ने अंततः याचिका का निपटारा करते हुए लुधियाना ग्रामीण के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया कि वह 30 अगस्त को दी गई सुरक्षा संबंधी शिकायत पर विचार करें। पुलिस को मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के अनुसार कानून के तहत आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए।

     

  • सड़क निर्माण में लापरवाही पर हाईकोर्ट सख्त, जांच में फेल हुए NHAI-PWD के नमूने

    सड़क निर्माण में लापरवाही पर हाईकोर्ट सख्त, जांच में फेल हुए NHAI-PWD के नमूने

     ग्वालियर
    खराब सड़कों के लिए कुख्यात नगर निगम की सड़कों की गुणवत्ता फेल सामने आई लेकिन अब भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण(एनएचएआई) और लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) जैसी एजेंसियों की सड़कें भी मानकों पर खरी नहीं उतर पाईं।

    नगर निगम के बाद अब एनएचएआई की मेहरा टोल से सिकरौदा चौराहा तक और पीडब्ल्यूडी की एजी ऑफिस से विक्की फैक्ट्री की सड़क के अधिकांश नमूने फेल सामने आए।

    शहर की सड़कों की गुणवत्ता को लेकर दायर जनहित याचिका में सोमवार को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई।

    सड़क निर्माण की गुणवत्ता की जांच के लिए गठित आयोग की रिपोर्ट में एनएचएआई के अधीन मेहरा टोल से सिकरौदा चौराहा मार्ग के अधिकांश नमूने फेल पाए गए हैं।

    आयोग की रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि नेटवर्क सर्वे व्हीकल (एनएसवी) की अंतरिम रिपोर्ट के अनुसार भी सड़क निर्धारित मापदंडों के अनुरूप नहीं मिली।

    इसी तरह पीडब्ल्यूडी के अधीन एजी ऑफिस से विक्की फैक्ट्री मार्ग से लिए गए अधिकांश नमूनों का भी यही हाल मिला।

    मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की युगलपीठ ने की। कोर्ट ने दोनों रिपोर्ट संबंधित विभागों को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं और जवाब के लिए समय दिया है।

    कोर्ट ने आयोग के पूरे कार्य को रिकॉर्ड पर लेते हुए कहा कि अब संबंधित अधिकारियों और विभागों को भी अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए ग्वालियर शहर के हित में काम करना चाहिए।

    कोर्ट ने उम्मीद जताई कि अलग-अलग विभागों में पदस्थ अधिकारी भी शहर के हित में काम करने के लिए आगे आएंगे।

    छह माह में होना था सर्वे, दस्तावेज ही नहीं मिला
    एनएचएआई के अधीन सड़क की रिपोर्ट पर सुनवाई के दौरान आयोग की ओर से बताया गया कि एनएचएआई को प्रत्येक छह माह में सड़क का असंयोजित सर्वे कराना आवश्यक है। हालांकि, जांच के दौरान ऐसा कोई दस्तावेज नहीं मिला, जिससे यह प्रमाणित हो सके कि संबंधित सड़क का एनएसवी सर्वे कभी कराया गया था।

    रिपोर्ट में वार्षिकी भुगतान से संबंधित विभिन्न खामियां भी सामने आने की बात कही गई। हाई कोर्ट ने आयोग को रिपोर्ट की प्रति एनएचएआई के अधिवक्ता आशीष सरस्वत को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। सरस्वत ने जवाब प्रस्तुत करने के लिए समय मांगा, जिसे कोर्ट ने मंजूर कर लिया।

    सीलबंद लिफाफे में आई मूल जांच रिपोर्ट
    18 सितंबर के आदेश के पालन में सोमवार को राजनंदिनी एंटरप्राइज एंड कंसल्टेंसी की मूल जांच रिपोर्ट भी कोर्ट में पेश की गई।

    अधिवक्ता गौरव मिश्रा ने सीलबंद लिफाफे में बिटुमिन टेस्ट रिपोर्ट, आरईसी क्रमांक 202409/07/13, दिनांक 11 जुलाई 2024 तथा डिजाइन मिक्स (डीबीएम) टेस्ट रिपोर्ट, आरईसी क्रमांक 202409/16/45, दिनांक 16 सितंबर 2024 पेश की।

    कोर्ट में सीलबंद लिफाफा खोला गया। इसके बाद कार्यालय को निर्देश दिया गया कि दोनों दस्तावेजों की छायाप्रति सड़क जांच आयोग को उपलब्ध कराई जाए और मूल दस्तावेजों को दोबारा सीलबंद कर सुरक्षित रखा जाए। आयोग को इन रिपोर्टों पर अपनी टिप्पणी प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।

    निगम को पैचवर्क पूरा करने के लिए 24 घंटे
    नगर निगम की ओर से अधिवक्ता ने बताया कि सड़कों पर किए गए पैचवर्क को सही ठहराने का प्रयास किया गया है, लेकिन उन्होंने यह सुनिश्चित करने के लिए 24 घंटे का समय मांगा कि आयोग द्वारा नमूने लेने के लिए सड़क खोदे जाने के कारण जहां पैचवर्क किया गया है, वह निर्धारित मापदंडों के अनुसार हो।

    कोर्ट ने निगम को 24 घंटे का समय देते हुए निर्देश दिया कि आयोग द्वारा नमूने लेने के लिए खोदी गई सड़क के सभी हिस्सों का पैचवर्क निर्धारित विनिर्देशों के अनुसार किया जाए।

    इसमें 150 मिलीमीटर तक की गहराई में पैचवर्क करने संबंधी तकनीकी विनिर्देश का पालन करने को कहा गया। इस निर्देश के साथ संबंधित आवेदन का निराकरण कर दिया गया।

    स्मार्ट सिटी की सड़कों पर भी उठे सवाल
    याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अवधेश सिंह तोमर ने स्मार्ट सिटी की सड़कों की खराब स्थिति का मुद्दा उठाते हुए स्मार्ट सिटी ग्वालियर के मुख्य कार्यपालन अधिकारी को मामले में पक्षकार बनाए जाने की मांग की। इस संबंध में अंतरिम आवेदन प्रस्तुत किया गया था।

    सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि स्मार्ट सिटी के अधीन सड़कों की स्थिति भी खराब होने का आरोप लगाया गया है, लेकिन अभी तक स्मार्ट सिटी के स्वामित्व और नियंत्रण वाली सड़कों से नमूने नहीं लिए गए हैं।

    इस बिंदु का उल्लेख आवेदन में नहीं होने पर कोर्ट ने तोमर को आवेदन में संशोधन के लिए एक सप्ताह का समय दिया।

    हर सड़क की जांच के लिए जनहित याचिका का दायरा नहीं बढ़ाएंगे
    सचिन तेंदुलकर मार्ग से भगवान सिंह माथुर सिटी एन्क्लेव को जोड़ने वाली संपर्क सड़क की खराब स्थिति को लेकर हस्तक्षेप आवेदन भी प्रस्तुत किया गया था।

    इसमें सड़क की स्थिति पूरी तरह खराब होने का आरोप लगाया गया, कोर्ट ने कहा कि नगर निगम को ग्वालियर शहर की सभी सड़कों के निर्माण और मरम्मत की अनुमति पहले ही दी जा चुकी है।

    कोर्ट प्रत्येक सड़क को लेकर अलग-अलग जांच कराकर उसका निर्माण कराने की स्थिति में नहीं है। कोर्ट ने हस्तक्षेप आवेदन को खारिज कर दिया।

    आयोग के काम की कोर्ट ने की सराहना
    सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सड़क जांच आयोग के काम की विशेष रूप से सराहना की। बता दें कि इस आयोग में अध्यक्ष गौरव समाधिया, सदस्य पवन रघुवंशी और हिमांशु शर्मा हैं।

    कोर्ट ने कहा कि पहले एक सड़क से नमूने लेने में आयोग को 12 से 13 घंटे तक सड़क पर काम करना पड़ा था।
    बाद में आयोग द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों से स्पष्ट हुआ कि सदस्यों ने केवल मौके पर जाकर निर्धारित मानकों के अनुसार नमूने ही नहीं लिए, बल्कि तकनीकी पहलुओं और भ्रष्टाचार से जुड़े मुद्दों को समझने के लिए भी काफी मेहनत की। कोर्ट ने कहा कि शहर के हित में आयोग ने जिस स्तर पर मेहनत की है, वह सराहनीय है।

    सिकरौदा में हाईवे से सटी शराब दुकान पर भी सवाल
    सुनवाई के दौरान आयोग के अध्यक्ष गौरव समाधिया ने सिकरौदा चौराहा स्थित शराब दुकान का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि नियमानुसार शराब दुकान हाईवे से कम से कम 500 मीटर की दूरी पर होनी चाहिए, लेकिन सिकरौदा चौराहे पर शराब दुकान हाईवे के बिल्कुल पास संचालित हो रही है।

    दुकान पर ‘हर सेलिब्रेशन हमारा है’ टैगलाइन भी प्रदर्शित होने की बात कोर्ट को बताई गई। इस पर शासकीय अधिवक्ता जीके अग्रवाल ने जवाब देने के लिए एक सप्ताह का समय मांगा।

    कोर्ट ने उन्हें यह स्पष्ट करने के लिए समय दिया कि हाईवे से 500 मीटर से कम दूरी पर शराब दुकान का लाइसेंस किन परिस्थितियों में जारी किया गया। वहीं स्थानांतरित करने का समय भी पूछा गया।

    एनएसवी की अंतिम रिपोर्ट पर आज सुनवाई
    आयोग के अध्यक्ष ने कोर्ट को बताया कि एनएसवी की अंतिम रिपोर्ट भी प्रस्तुत किया जाना बाकी है। इस पर कोर्ट ने एनएसवी की रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए मामले को 22 सितंबर के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है। विभिन्न रिपोर्टों पर विचार के लिए मामले की अगली सुनवाई आठ अक्टूबर के लिए निर्धारित की गई है।

     

     

  • अवमानना याचिका पर हाईकोर्ट की सख्ती, छिंदवाड़ा SP के खिलाफ वारंट

    अवमानना याचिका पर हाईकोर्ट की सख्ती, छिंदवाड़ा SP के खिलाफ वारंट

    जबलपुर

    जबलपुर हाईकोर्ट ने अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए छिंदवाड़ा एसपी के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया है। कोर्ट ने जबलपुर रेंज के आईजी को वारंट तामील कराने की जिम्मेदारी सौंपी है। साथ ही एसपी को 1 अक्टूबर 2026 को कोर्ट के समक्ष पेश होने का आदेश दिया। 
    मामला एक रिटायर्ड पुलिसकर्मी के निधन के बाद विभाग द्वारा की गई रिकवरी से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि हाईकोर्ट के रिकवरी पर रोक लगाने और राशि लौटाने के आदेश के बावजूद उसका पालन नहीं किया गया।

    पति की मौत के बाद 2.24 लाख रुपए की रिकवरी
    जबलपुर निवासी सीता तिवारी ने अधिवक्ता सचिन पांडे के माध्यम से अवमानना याचिका दायर की है। याचिका के अनुसार उनके पति संतोष तिवारी छिंदवाड़ा में पुलिस विभाग में पदस्थ थे। सेवाकाल के दौरान 14 अगस्त 2020 को उनका निधन हो गया। इसके बाद विभाग ने उनके खिलाफ 2.24 लाख रुपए की रिकवरी निकाल दी।

    मामले की सुनवाई जस्टिस विवेक जैन की कोर्ट में हुई थी। कोर्ट ने रिकवरी का आदेश निरस्त करते हुए राशि 8 प्रतिशत ब्याज के साथ वापस करने का आदेश दिया था।

    2025 में जारी हुआ था अवमानना नोटिस
    सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि वर्ष 2025 में अवमानना नोटिस जारी होने के बाद भी आदेश के पालन की रिपोर्ट पेश नहीं की गई। कोर्ट को बताया गया कि छिंदवाड़ा एसपी ने 11 फरवरी 2026 को गृह विभाग के अपर सचिव को पत्र लिखकर नोटिस मिलने और आवश्यक मंजूरी के संबंध में जानकारी दी थी, लेकिन इसके बाद भी आदेश के पालन की कार्रवाई नहीं हुई।

    इसी आधार पर हाईकोर्ट ने छिंदवाड़ा एसपी के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी करते हुए उन्हें 1 अक्टूबर को कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया है।

     

  • भोपाल में 190 व्यावसायिक प्रतिष्ठान बंद, 8084 को नोटिस; SC में आज सुनवाई

    भोपाल में 190 व्यावसायिक प्रतिष्ठान बंद, 8084 को नोटिस; SC में आज सुनवाई

    भोपाल
     आवासीय क्षेत्रों में संचालित व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के मामले में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में दोपहर दो बजे से सुनवाई होगी। 15 सितंबर को प्रस्तावित सुनवाई टलने के बाद अब 22 सितंबर को सुनवाई हो रही है। इसके लिए नगर निगम ने सुप्रीम कोर्ट में 34 पेज का नया एफिडेविट पेश किया है। इसमें शहरभर में 8084 प्रतिष्ठानों को नोटिस जारी करने और 190 के खिलाफ कार्रवाई कर कारोबार बंद कराने की जानकारी दी गई है।

    62,500 प्रतिष्ठान चिह्नित, 8084 को नोटिस
    सुप्रीम कोर्ट के पांच अगस्त के निर्देश के बाद नगर निगम ने दावा किया था कि उसने शहर के आवासीय क्षेत्रों में संचालित 62,500 से अधिक प्रतिष्ठानों को चिह्नित किया है। निगम ने 8269 प्रतिष्ठानों को नोटिस जारी करने की भी जानकारी दी थी। सूत्रों के अनुसार, अब नए शपथ पत्र में नोटिस का आंकड़ा 8084 बताया गया है। साथ ही 190 प्रतिष्ठानों को बंद कराने की कार्रवाई की जानकारी भी दी गई है।

    आंकड़ों में आए इस बदलाव को लेकर भी सुनवाई के दौरान सवाल उठ सकते हैं। नगर निगम ने कोर्ट को बताया है कि चिह्नित प्रतिष्ठानों पर लगातार कार्रवाई जारी है।

    सुप्रीम कोर्ट के 5 अगस्त के आदेश के बाद नगर निगम ने रहवासी इलाकों में कमर्शियल गतिविधियां चलाने वाले प्रतिष्ठानों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी। निगम की सूची में ऐसे करीब 62,500 प्रतिष्ठान हैं। इनमें से 8,084 को नोटिस दिए गए। इसके बाद तीन दिन तक कार्रवाई चली। व्यापारियों के विरोध के बाद निगम ने अभियान रोक दिया। अब ये प्रतिष्ठान खुल चुके हैं।

    रिकॉर्ड में 62,500, नोटिस सिर्फ 8,084 प्रतिष्ठान को निगम के रिकॉर्ड में 62,500 कमर्शियल प्रतिष्ठान होने के बावजूद करीब 13% यानी 8,084 को ही नोटिस दिए गए। इनमें भी कार्रवाई 190 तक पहुंची। इसके बाद न नोटिस की कार्रवाई आगे बढ़ी न बंद प्रतिष्ठानों की दोबारा जांच हुई।

    निगम खुद बोला – दोबारा खोलना आपराधिक कृत्य
    निगम की टीमों ने सभी संस्थानों को नियमानुसार बंद क
    राया है। कहीं भी संस्थान दोबारा खुल गए हैं तो यह आपराधिक कृत्य है। कोर्ट में पूछने पर वकील के माध्यम से स्थिति स्पष्ट कर जवाब देंगे।' -भुवन गुप्ता, उपायुक्त (भवन अनुज्ञा)

    रहवासी इलाकों में चल रहे 190 कमर्शियल प्रतिष्ठान बंद कराए थे, सभी फिर खुले; 15 दिन से देखने तक नहीं पहुंचा नगर निगम

    भोपाल के रहवासी इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियों के खिलाफ नगर निगम ने तीन दिन कार्रवाई कर 190 प्रतिष्ठान बंद कराए थे। अब सभी दोबारा खुल चुके हैं, लेकिन करीब 15 दिन से निगम की टीमें इनकी स्थिति देखने तक नहीं पहुंचीं। न दोबारा खुले प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई हुई, न कोई नया प्रतिष्ठान बंद कराया गया।

    10 नंबर मार्केट में सीलिंग के दौरान व्यापारियों ने निगम के पंचनामे के आधार पर प्रतिष्ठान खुद बंद किए थे। अब यहां कई प्रतिष्ठान दिन में बंद रहते हैं और शाम होते ही खुल जाते हैं।

    सीलिंग और पंचनामे के बाद फिर शुरू हुआ कारोबार
    बता दें कि निगम ने आवासीय क्षेत्रों में व्यावसायिक करने वाले सात प्रतिष्ठानों को सील किया, जबकि 183 ने स्वेच्छा से कारोबार बंद करने के पंचनामे बनाए गए। निगम की कार्रवाई के दौरान पंचनामा बनाकर बंद कराए गए कई प्रतिष्ठानों में दोबारा कारोबार शुरू होने की जानकारी सामने आ रही है। ऐसे में मंगलवार की सुनवाई में निगम की कार्रवाई के साथ उसके जमीनी अनुपालन की स्थिति भी अहम रहेगी। कोर्ट जमीनी स्तर पर कार्रवाई की मॉनिटरिंग पर जोर दे सकता है।

  • MP हाईकोर्ट में 35 हजार+ अवमानना प्रकरण, आदेश के बाद फिर कोर्ट पहुंच रहे पक्षकार

    MP हाईकोर्ट में 35 हजार+ अवमानना प्रकरण, आदेश के बाद फिर कोर्ट पहुंच रहे पक्षकार

    जबलपुर
     हाई कोर्ट में एक मुकदमे का आदेश होने के बाद भी विवाद समाप्त नहीं हो रहा है। आदेश का पालन नहीं होने पर वही पक्षकार दोबारा हाई कोर्ट पहुंच रहा है और अवमानना याचिका के रूप में उसी विवाद की दूसरी न्यायिक पारी शुरू हो रही है।अवमानना प्रकरणों की 35 हजार से अधिक संख्या ने न्यायालय के सामने लंबित मामलों के निराकरण की चुनौती को और जटिल बना दिया है।

    मूल याचिका में न्यायालय जहां अधिकार और विवाद का फैसला करता है, वहीं आदेश के बाद अवमानना याचिका में यह देखना पड़ता है कि संबंधित विभाग, अधिकारी या संस्था ने न्यायालय के निर्देश का पालन किया या नहीं। इस प्रक्रिया में नोटिस, जवाब, अनुपालन रिपोर्ट, व्यक्तिगत उपस्थिति और कई बार समय-सीमा तय करने जैसी न्यायिक कवायद करनी पड़ती है।

    हाई कोर्ट में पहले से ही लंबित मामलों का बड़ा बोझ
    हाई कोर्ट में पहले से ही लंबित मामलों का बड़ा बोझ है। मार्च 2025 के अंत में न्यायालय में लंबित प्रकरणों की संख्या 4.71 लाख से अधिक थी। ऐसे में आदेशों के समय पर पालन नहीं होने से उत्पन्न अवमानना प्रकरण न्यायालय के अतिरिक्त समय और संसाधनों की मांग करते हैं।

    इसका असर सीधे तौर पर मूल मामलों के निराकरण की गति पर पड़ने की स्थिति बनती है। हाल के मामलों में भी न्यायालय को अधिकारियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाना पड़ा है।

    न्यायालय ने नोटिस से आगे बढ़कर वारंट तक जारी किए
    कई मामलों में आदेश के बावजूद अनुपालन रिपोर्ट पेश नहीं होने अथवा संबंधित अधिकारियों की उपस्थिति नहीं होने पर न्यायालय ने नोटिस से आगे बढ़कर वारंट तक जारी किए हैं। सितंबर में जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने एक अवमानना प्रकरण में तत्कालीन प्रमुख सचिव राजस्व और सागर के तत्कालीन कलेक्टर के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए थे।

    आदेश के बाद भी खत्म नहीं होता मुकदमा
    अवमानना कानून का उद्देश्य न्यायालय के आदेश की गरिमा और प्रभावशीलता बनाए रखना है। इसलिए अवमानना याचिकाओं की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। असल समस्या उस स्थिति में पैदा होती है जब किसी आदेश के पालन के लिए बार-बार न्यायालय की निगरानी आवश्यक हो जाती है।

    यदि विभागीय स्तर पर आदेश मिलते ही उसकी अनुपालन प्रक्रिया शुरू हो और समय-सीमा के भीतर रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत हो जाए तो बड़ी संख्या में अवमानना याचिकाओं की नौबत टाली जा सकती है।