राजनीतिक

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ संसद में हटाने का प्रस्ताव लाने की तैयारी, विपक्षी दल हुए लामबंद

नई दिल्ली

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष लामबंद हो गया है। विपक्षी दल सीईसी के खिलाफ संसद के दोनों सदनों में महाभियोग लाने जा रहा है। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर अन्य विपक्षी दलों से संपर्क किया है और अगले दो हफ्तों में नोटिस को जमा भी कर दिया जाएगा। यह जानकारी सूत्रों के हवाले से न्यूज एजेंसी एएनआई ने दी है।

दरअसल, ज्ञानेश कुमार लंबे समय से विवादों में हैं। देशभर में एसआईआर प्रक्रिया पर पहले ही विपक्षी दल सवाल उठा चुके हैं, जबकि बीते दिन इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। रिपोर्ट में बताया गया था कि तीन सदस्यों वाले चुनाव आयोग में मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर) से जुड़े मुद्दों पर तीन में से दो निर्वाचन आयुक्तों -सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी- ने बार-बार सवाल उठाए थे। हालांकि, इस पर चुनाव आयोग ने कहा कि विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग मत होना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है तथा उसके सभी फैसले स्थापित वैधानिक प्रक्रियाओं के अनुरूप हैं।

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इससे पहले भी विपक्षी दलों ने महाभियोग लाने की कोशिश की थी। 24 अप्रैल को राज्यसभा में 73 विपक्षी सांसदों ने कथित साबित गलत व्यवहार के आधार पर उन्हें पद से हटाने की मांग करते हुए एक नोटिस दिया था। कांग्रेस ने उस समय कहा था कि नोटिस में नौ खास आरोप थे। कांग्रेस सूत्रों और विपक्षी नेताओं के अनुसार, वह नोटिस अभी भी पेंडिंग है। हालांकि, अब सूत्रों का कहना है कि विपक्ष नया नोटिस लाने जा रहा है, जिसमें नए दावे किए जाएंगे।

एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं। इनमें एसआईआर, नए मतदाताओं को जोड़ने, मतदाता सूची से नाम हटाने और वोटर डेटाबेस के केंद्रीकरण जैसे मुद्दे शामिल थे। रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्ष ने इसे चुनाव आयोग के भीतर गंभीर मतभेद का संकेत बताया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निशाने पर लिया।

कांग्रेस, टीएमसी समेत तमाम दलों ने ज्ञानेश कुमार को तुरंत इस्तीफा देने के लिए कहा। कांग्रेस ने ज्ञानेश कुमार को हटाने और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में निष्पक्ष जांच की मांग की। टीएमसी ने उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव आगे बढ़ाने की मांग की, जबकि सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान लेने की अपील की। CPI(M) ने भी ज्ञानेश कुमार को हटाने और SIR रोकने की मांग की है। इसके अलावा, डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन ने भी उनके तत्काल हटाए जाने और SIR पर रोक लगाने की मांग की।

10 महीने में 14 बार दर्ज हुई आपत्ति
द इंडियन एक्सप्रेस की जांच के मुताबिक, तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के भीतर पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार SIR से जुड़े फैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की गई। ये आपत्तियां चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दर्ज की थीं। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों अधिकारियों ने कुछ फैसलों और आदेशों को अपनी जानकारी या मंजूरी के बिना लिए जाने पर सवाल उठाए थे। एक दिन में चार बार तक आपत्ति दर्ज किए जाने की बात भी सामने आई।

इन आपत्तियों में नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाताओं के नाम हटाने और जोड़ने, फॉर्म 6 में बदलाव और चुनावी डेटा के डिजिटल सिस्टम तक पहुंच से जुड़े मुद्दे शामिल थे। दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ कदमों को ‘अनधिकृत’ और ‘अवैध’ बताया था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि चुनावी डेटाबेस को दिल्ली में केंद्रीकृत किए जाने को लेकर सवाल उठाए गए थे।

चुनाव आयोग ने कहा- सभी फैसले सर्वसम्मति से हुए
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग ने अपने जवाब में कहा कि आयोग के भीतर अलग-अलग विचार होना निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग ने 14 नोट्स के अस्तित्व, तारीख और सामग्री को खारिज नहीं किया, लेकिन इन्हें ‘सुझाव’ बताया। आयोग के अनुसार, पिछले एक साल में लिए गए सभी फैसले सर्वसम्मति से हुए हैं।

महुआ मोइत्रा ने पुलिस में दी शिकायत
इसी विवाद के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद महुआ मोइत्रा ने गुरुवार को दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ शिकायत दी। ANI से बात करते हुए मोइत्रा ने उन पर प्रक्रिया के उल्लंघन, एकतरफा फैसले लेने और मतदाता सूची में कथित हेरफेर के आरोप लगाए।

मोइत्रा ने चुनाव आयुक्तों को कानूनी संरक्षण देने वाले चीफ इलेक्शन कमिश्नर एंड अदर इलेक्शन कमिश्नर्स (अपॉइंटमेंट, कंडीशंस ऑफ सर्विस एंड टर्म ऑफ ऑफिस) एक्ट, 2023 की धारा 16 का भी हवाला दिया। उनका तर्क था कि यदि चुनाव आयोग सामूहिक रूप से काम करता है तो ही यह सुरक्षा लागू हो सकती है। उन्होंने दावा किया कि द इंडियन एक्सप्रेस की जांच में सामने आई 14 आपत्तियों से पता चलता है कि कई फैसलों में बाकी दो चुनाव आयुक्तों की सहमति नहीं थी। ये मोइत्रा के आरोप हैं और इन्हें स्वतंत्र रूप से साबित तथ्य के रूप में नहीं रखा जा सकता।

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