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  • सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की ज्ञानेश कुमार के निलंबन की मांग, ECI को देना होगा जवाब

    सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की ज्ञानेश कुमार के निलंबन की मांग, ECI को देना होगा जवाब

    नई दिल्ली

    मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है. वह अब भी अपने पद पर बने रहेंगे. सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सस्पेंड करने का आदेश पारित करने से इनकार कर दिया है. जी हां, चुनाव आयोग और एसआईआर विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट में आज ज्ञानेश कुमार मामले पर सुनवाई हुई. सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानेश कुमार मामले पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने के लिए अंतरिम आदेश पारित करने से इनकार कर दिया. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। 

    सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
    दरअसल, चुनाव आयोग से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने के लिए अंतरिम आदेश पारित करने की मांग की गई थी. याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने दलील दी कि अगर अंतरिम आदेश पारित नहीं किया गया तो देश जल उठेगा. याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता से समझौता हुआ है। 
    इस पर सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई सूर्यकांत की बेंच ने कहा कि अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट सही भी हो सकती है और गलत भी. हम इस मामले को देख रहे हैं. सीजेआई सूर्यकांत की अध्‍यक्षता वाली तीन जजों में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं। 

    क्या है पूरा विवाद?
    मामला मुख्य रूप से निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR)से जुड़े फैसलों को लेकर है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि CEC ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में निर्वाचन आयोग के कुछ फैसले ऐसे तरीके से लिए गए, जिनमें आयोग के अन्य दो सदस्यों, निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की सहमति या जानकारी नहीं थी। याचिकाओं में दावा किया गया है कि पिछले करीब 10 महीनों में SIR से जुड़े कई फैसलों और आदेशों को लेकर दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने आपत्ति दर्ज कराई थी। एक रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे मामलों की संख्या कम से कम 14 बताई गई है। हालांकि, यह आरोप अभी न्यायिक रूप से साबित नहीं हुए हैं और निर्वाचन आयोग का पक्ष भी इस मामले में महत्वपूर्ण होगा। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण किसी एक व्यक्ति में नहीं, बल्कि निर्वाचन आयोग नामक संवैधानिक संस्था में निहित है। उनका कहना है कि CEC आयोग के अध्यक्ष होते हैं, लेकिन वे स्वयं पूरे आयोग के स्थान पर निर्णय लेने की शक्ति नहीं रखते।

    याचिकाकर्ताओं ने क्या मांग की?
    पटना निवासी राकेश कुमार सिंह और दिल्ली के अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से अलग-अलग याचिकाएं दाखिल की गई हैं। इनमें CEC के कामकाज पर सवाल उठाते हुए विभिन्न फैसलों और प्रक्रियाओं की न्यायिक जांच की मांग की गई है। एक याचिका में ज्ञानेश कुमार को CEC पद से निलंबित करने को अंतरिम राहत के तौर पर मांगा गया था। इसके साथ ही याचिकाकर्ता ने SIR तथा उससे जुड़े फैसलों को चुनौती दी है। दूसरी याचिका में पूरे मामले की स्वतंत्र जांच के लिए सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में न्यायिक जांच आयोग या विशेष जांच दल (SIT) गठित करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि निर्वाचन आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया में गंभीर संवैधानिक और कानूनी सवाल पैदा हुए हैं। हालांकि, इन आरोपों पर अभी अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं आया है।

    सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल निलंबन क्यों नहीं किया?
    सुनवाई के दौरान अदालत ने संकेत दिया कि केवल मीडिया रिपोर्टों या आरोपों के आधार पर किसी संवैधानिक पदाधिकारी के खिलाफ तत्काल अंतरिम आदेश पारित नहीं किया जा सकता। अदालत ने पहले निर्वाचन आयोग से जवाब और संबंधित रिकॉर्ड मांगने का रास्ता चुना है। पीठ ने यह भी कहा कि निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्था से कानून के मुताबिक काम करने की अपेक्षा की जाती है। अदालत ने आयोग से यह स्पष्ट करने को कहा है कि विवादित फैसले सर्वसम्मति से, बहुमत से या केवल CEC द्वारा लिए गए थे। इससे आगे की सुनवाई में निर्णय प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता पर महत्वपूर्ण बहस हो सकती है।

    कोर्ट ने दिया अहम संकेत
    सुनवाई के दौरान अदालत की ओर से यह संकेत भी दिया गया कि यदि यह पाया जाता है कि निर्वाचन आयोग के किसी फैसले में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, तो अदालत उस फैसले पर आगे कार्रवाई कर सकती है। यानी सोमवार का आदेश CEC को क्लीन चिट नहीं है। अदालत ने केवल तत्काल निलंबन जैसी अंतरिम राहत देने से फिलहाल इनकार किया है और मामले में जवाब मांगा है। यह अंतर समझना महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लगाए गए आरोपों को सही नहीं माना है, लेकिन उन्हें गलत भी नहीं ठहराया है। मामले की अगली प्रक्रिया निर्वाचन आयोग के जवाब और अदालत के सामने पेश किए जाने वाले रिकॉर्ड पर निर्भर करेगी।

    SIR भी विवाद के केंद्र में
    इस पूरे विवाद की एक बड़ी कड़ी मतदाता सूची के Special Intensive Revision यानी SIR से जुड़ी है। याचिकाकर्ताओं ने SIR की संवैधानिक और कानूनी वैधता पर भी सवाल उठाए हैं। उनकी मांग है कि यदि यह प्रक्रिया निर्धारित कानूनी अधिकार और प्रक्रिया के अनुरूप नहीं थी, तो उससे जुड़े फैसलों और कदमों को निरस्त किया जाए। याचिकाओं में यह भी आरोप लगाया गया है कि SIR से जुड़े कुछ निर्णय और चुनावी सॉफ्टवेयर या दिशानिर्देशों में किए गए बदलाव आयोग के सभी सदस्यों की सहमति के बिना किए गए। दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग ने पहले कहा है कि आयोग के भीतर अलग-अलग राय होना असामान्य नहीं है और उसके आदेश निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत जारी किए जाते हैं।

    अब आगे क्या होगा?
    सुप्रीम कोर्ट के सोमवार के आदेश के बाद अब निर्वाचन आयोग और अन्य संबंधित पक्षों को अदालत के सामने अपना पक्ष रखना होगा। खासतौर पर यह स्पष्ट करना होगा कि जिन फैसलों को लेकर सवाल उठाए गए हैं, वे किस प्रक्रिया के तहत लिए गए और उनमें CEC तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों की क्या भूमिका थी। अदालत यह भी देख सकती है कि संविधान के अनुच्छेद 324 और संबंधित कानून के तहत आयोग के सामूहिक निर्णय की क्या सीमा है और CEC की अध्यक्षीय भूमिका तथा आयोग की सामूहिक शक्ति के बीच कानूनी अंतर किस तरह लागू होता है।

    ECI से मांगा जवाब
    फिलहाल सबसे अहम बात यह है कि CEC ज्ञानेश कुमार पद पर बने रहेंगे और सुप्रीम कोर्ट ने उनके तत्काल निलंबन का अंतरिम आदेश नहीं दिया है। साथ ही, मामले की न्यायिक जांच जारी रहेगी और निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा गया है। इसलिए सोमवार का आदेश मामले का अंतिम फैसला नहीं है, बल्कि आगे की सुनवाई की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण कदम है। यानी, ‘CEC ज्ञानेश कुमार को सुप्रीम कोर्ट ने क्लीन चिट दे दी’ कहना भी सही नहीं होगा और ‘कोर्ट ने उन्हें निलंबित कर दिया’ कहना भी गलत होगा। सही स्थिति यह है कि अदालत ने तत्काल अंतरिम निलंबन से इनकार करते हुए निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा है और आरोपों की जांच का रास्ता खुला रखा है।

    मामले में सुप्रीम कोर्ट की अहम बातें
        मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सोमवार को स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर के दौरान वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने के लिए इस्तेमाल होने वाले 'फॉर्म 6' के किसी भी बदले हुए वर्शन को मंजूरी नहीं दी है।

        पीठ ने पूछा कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त को निलंबित कर दिया जाता है तो निर्वाचन आयोग का कामकाज कौन संभालेगा और “चुनाव कौन कराएगा?” पीठ ने कहा कि किसी भी आदेश से पहले संबंधित पक्षों का जवाब लेना आवश्यक है।

        सीजेआई ने कहा कि कानून अनिवार्य है और कोर्ट उम्मीद करता है कि उसका पालन किया जाएगा। यदि कानून का उल्लंघन पाया जाता है तो कोर्ट संबंधित फैसलों को निरस्त कर सकता है।

        जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने भी सवाल किया कि क्या प्रतिवादियों को सुने बिना ऐसा आदेश पारित किया जा सकता है।
        उन्होंने कहा कि यदि रिकॉर्ड से यह सामने आता है कि कोई निर्णय सर्वसम्मति से नहीं लिया गया था तो कोर्ट उस निर्णय पर रोक लगा सकता है और उसे अधिकारातीत (ultra vires) घोषित कर सकता है। लेकिन केवल इस आधार पर कि सभी फैसले एकतरफा लिए गए थे, प्रतिवादियों को सुने बिना निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।

    क्या है मामला?
    कोर्ट वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) को लेकर चुनाव आयोग के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था। याचिका में यह तर्क दिया गया कि चुनाव आयोग, जो कई सदस्यों वाली एक संवैधानिक संस्था है, उसे मिली शक्तियों का इस्तेमाल कानून के तहत जरूरी सामूहिक निर्णय लेने की प्रक्रिया का पालन किए बिना किया जा रहा है।

    यह विवाद एक अंग्रेजी अख की एक रिपोर्ट के बाद शुरू हुआ है, जिसमें कहा गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 बार मतदाता सूची, वोटर रजिस्ट्रेशन और आयोग के टेक्नोलॉजी सिस्टम से जुड़े फैसलों पर औपचारिक रूप से आपत्ति जताई थी।

    SC की अहम टिप्पणी
    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर रिकॉर्ड से यह सामने आता है कि संबंधित फैसला सर्वसम्मति से नहीं लिया गया था, तो कोर्ट उन आदेशों को रद्द कर देगा. कोर्ट ने फिलहाल ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने का अंतरिम आदेश देने से इनकार करते हुए केंद्र और ECI से जवाब मांगा है. अब इस मामले पर अगली सुनवाई अगले सप्ताह होगी। 

  • ज्ञानेश कुमार के खिलाफ संसद में हटाने का प्रस्ताव लाने की तैयारी, विपक्षी दल हुए लामबंद

    ज्ञानेश कुमार के खिलाफ संसद में हटाने का प्रस्ताव लाने की तैयारी, विपक्षी दल हुए लामबंद

    नई दिल्ली

    मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष लामबंद हो गया है। विपक्षी दल सीईसी के खिलाफ संसद के दोनों सदनों में महाभियोग लाने जा रहा है। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर अन्य विपक्षी दलों से संपर्क किया है और अगले दो हफ्तों में नोटिस को जमा भी कर दिया जाएगा। यह जानकारी सूत्रों के हवाले से न्यूज एजेंसी एएनआई ने दी है।

    दरअसल, ज्ञानेश कुमार लंबे समय से विवादों में हैं। देशभर में एसआईआर प्रक्रिया पर पहले ही विपक्षी दल सवाल उठा चुके हैं, जबकि बीते दिन इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। रिपोर्ट में बताया गया था कि तीन सदस्यों वाले चुनाव आयोग में मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर) से जुड़े मुद्दों पर तीन में से दो निर्वाचन आयुक्तों -सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी- ने बार-बार सवाल उठाए थे। हालांकि, इस पर चुनाव आयोग ने कहा कि विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग मत होना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है तथा उसके सभी फैसले स्थापित वैधानिक प्रक्रियाओं के अनुरूप हैं।

    ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इससे पहले भी विपक्षी दलों ने महाभियोग लाने की कोशिश की थी। 24 अप्रैल को राज्यसभा में 73 विपक्षी सांसदों ने कथित साबित गलत व्यवहार के आधार पर उन्हें पद से हटाने की मांग करते हुए एक नोटिस दिया था। कांग्रेस ने उस समय कहा था कि नोटिस में नौ खास आरोप थे। कांग्रेस सूत्रों और विपक्षी नेताओं के अनुसार, वह नोटिस अभी भी पेंडिंग है। हालांकि, अब सूत्रों का कहना है कि विपक्ष नया नोटिस लाने जा रहा है, जिसमें नए दावे किए जाएंगे।

    एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं। इनमें एसआईआर, नए मतदाताओं को जोड़ने, मतदाता सूची से नाम हटाने और वोटर डेटाबेस के केंद्रीकरण जैसे मुद्दे शामिल थे। रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्ष ने इसे चुनाव आयोग के भीतर गंभीर मतभेद का संकेत बताया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निशाने पर लिया।

    कांग्रेस, टीएमसी समेत तमाम दलों ने ज्ञानेश कुमार को तुरंत इस्तीफा देने के लिए कहा। कांग्रेस ने ज्ञानेश कुमार को हटाने और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में निष्पक्ष जांच की मांग की। टीएमसी ने उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव आगे बढ़ाने की मांग की, जबकि सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान लेने की अपील की। CPI(M) ने भी ज्ञानेश कुमार को हटाने और SIR रोकने की मांग की है। इसके अलावा, डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन ने भी उनके तत्काल हटाए जाने और SIR पर रोक लगाने की मांग की।

    10 महीने में 14 बार दर्ज हुई आपत्ति
    द इंडियन एक्सप्रेस की जांच के मुताबिक, तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के भीतर पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार SIR से जुड़े फैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की गई। ये आपत्तियां चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दर्ज की थीं। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों अधिकारियों ने कुछ फैसलों और आदेशों को अपनी जानकारी या मंजूरी के बिना लिए जाने पर सवाल उठाए थे। एक दिन में चार बार तक आपत्ति दर्ज किए जाने की बात भी सामने आई।

    इन आपत्तियों में नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाताओं के नाम हटाने और जोड़ने, फॉर्म 6 में बदलाव और चुनावी डेटा के डिजिटल सिस्टम तक पहुंच से जुड़े मुद्दे शामिल थे। दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ कदमों को ‘अनधिकृत’ और ‘अवैध’ बताया था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि चुनावी डेटाबेस को दिल्ली में केंद्रीकृत किए जाने को लेकर सवाल उठाए गए थे।

    चुनाव आयोग ने कहा- सभी फैसले सर्वसम्मति से हुए
    द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग ने अपने जवाब में कहा कि आयोग के भीतर अलग-अलग विचार होना निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग ने 14 नोट्स के अस्तित्व, तारीख और सामग्री को खारिज नहीं किया, लेकिन इन्हें ‘सुझाव’ बताया। आयोग के अनुसार, पिछले एक साल में लिए गए सभी फैसले सर्वसम्मति से हुए हैं।

    महुआ मोइत्रा ने पुलिस में दी शिकायत
    इसी विवाद के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद महुआ मोइत्रा ने गुरुवार को दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ शिकायत दी। ANI से बात करते हुए मोइत्रा ने उन पर प्रक्रिया के उल्लंघन, एकतरफा फैसले लेने और मतदाता सूची में कथित हेरफेर के आरोप लगाए।

    मोइत्रा ने चुनाव आयुक्तों को कानूनी संरक्षण देने वाले चीफ इलेक्शन कमिश्नर एंड अदर इलेक्शन कमिश्नर्स (अपॉइंटमेंट, कंडीशंस ऑफ सर्विस एंड टर्म ऑफ ऑफिस) एक्ट, 2023 की धारा 16 का भी हवाला दिया। उनका तर्क था कि यदि चुनाव आयोग सामूहिक रूप से काम करता है तो ही यह सुरक्षा लागू हो सकती है। उन्होंने दावा किया कि द इंडियन एक्सप्रेस की जांच में सामने आई 14 आपत्तियों से पता चलता है कि कई फैसलों में बाकी दो चुनाव आयुक्तों की सहमति नहीं थी। ये मोइत्रा के आरोप हैं और इन्हें स्वतंत्र रूप से साबित तथ्य के रूप में नहीं रखा जा सकता।

  • विद्यार्थी विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का भविष्य हैं : मुख्य चुनाव आयुक्त  ज्ञानेश कुमार

    विद्यार्थी विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का भविष्य हैं : मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार

    भोपाल

    भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने आज लखनऊ में "चुनावी साक्षरता क्लब (ईएलसी 2.0) और ईसीआईएनईटी" पर दूसरा क्षेत्रीय सम्मेलन आयोजित किया। सम्मेलन का उद्देश्य युवा नागरिकों के बीच चुनावी साक्षरता और लोकतांत्रिक जागरूकता को मजबूत करना है। उत्तर प्रदेश के स्कूलों और कॉलेजों के छात्रों और शिक्षकों सहित प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए, विद्यार्थियों को राष्ट्र का भविष्य बताते हुए, मुख्य चुनाव आयुक्त  ज्ञानेश कुमार ने कहा कि चुनावी प्रक्रियाओं के ज्ञान और समझ को आगे बढ़ाने और लोकतंत्र को समृद्ध करने के लिए चुनावी परिषदें अनिवार्य हैं।

    मुख्य चुनाव आयुक्त  ज्ञानेश कुमार ने बताया कि भारत में चुनाव संविधान, कानून और चुनाव आयोग द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार ही कराए जाते हैं और राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों या उनके प्रतिनिधियों की समवर्ती लेखापरीक्षा के तहत सभी चरणों में पारदर्शिता के साथ संचालित होते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों और युवा मतदाताओं को भारत की चुनावी प्रणाली, लोकतांत्रिक मूल्यों, मतदाता पंजीकरण, मतदान और मतगणना प्रक्रियाओं तथा भारतीय चुनाव आयोग की भूमिका और कार्यप्रणाली से परिचित कराने की आवश्यकता पर बल दिया। युवा नागरिकों की भागीदारी के महत्व पर जोर देते हुए, मुख्य चुनाव आयुक्त  ज्ञानेश कुमार ने कहा कि चुनावी प्रक्रिया में उनका विश्वास और सूचित भागीदारी लोकतंत्र के भविष्य में एक निवेश है। ईएलसी 2.0, जिसका ताना "लोकतंत्र सीखें। लोकतंत्र का नेतृत्व करें।" है, युवा और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं को न केवल लोकतंत्र को समझने के लिए बल्कि सार्थक रूप से भाग लेने और इसकी प्रगति में योगदान करने के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य को सुदृढ़ करता है।

     ज्ञानेश कुमार ने सोमवार को अपने पुराने विद्यालय, कोल्विन तालुकदार कॉलेज का दौरा किया और वहां के शिक्षकों और छात्रों से बातचीत की। कल, दौरे के दूसरे दिन मुख्य आयुक्त  ज्ञानेश कुमार उत्तर प्रदेश के बूथ स्तरीय अधिकारियों (बीएलओ) के साथ बातचीत करेंगे।

    ईएलसी 2.0 चुनावी साक्षरता क्लबों को स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में संरचित, दृश्यमान और डिजिटल रूप से सक्षम प्लेटफार्मों के रूप में पुनर्परिभाषित करता है। इस पहल में युवा नागरिकों के बीच चुनावी साक्षरता और उनके परिवारों, शैक्षणिक संस्थानों और समुदायों में चुनावी जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए निरंतर, वर्ष भर चलने वाली गतिविधियों की परिकल्पना की गई है। ईएलसी 2.0 व्यापक ईसीआईएनईटी डिजिटल प्लेटफॉर्म का लाभ उठाएगा, जो एक बटन के क्लिक पर नामांकन से लेकर मतदान तक सभी चुनाव संबंधी सेवाएं प्रदान करता है। ईसीआईएनईटी पर एक समर्पित ईएलसी पोर्टल का उपयोग करके ईएलसी का एक सुव्यवस्थित अखिल भारतीय नेटवर्क विकसित किया जाएगा। भारत के विशाल शैक्षिक तंत्र को देखते हुए यह पहल महत्वपूर्ण है, जिसमें लगभग 15 लाख स्कूल, लगभग 25 करोड़ विद्यार्थी और एक करोड़ से अधिक शिक्षक शामिल हैं। उच्च शिक्षा क्षेत्र में लगभग 1,500 विश्वविद्यालय और लगभग 70,000 शिक्षण संस्थान हैं, जिनमें अनुमानित 4.33 करोड़ छात्र नामांकित हैं। इस व्यापक संस्थागत नेटवर्क के माध्यम से, ईएलसी 2.0 तथ्यात्मक और अनुभवात्मक चुनावी शिक्षा को बढ़ावा देना चाहता है, भारत की चुनावी प्रणाली की पारदर्शिता, अखंडता और विश्वसनीयता के बारे में जागरूकता बढ़ाना चाहता है, और युवा नागरिकों को सूचित लोकतांत्रिक भागीदारी के राजदूत बनने के लिए प्रोत्साहित करना चाहता है। ईएलसी (इलेक्ट्रॉनिक लीगल सेंटर) चुनावी प्रक्रिया के विभिन्न चरणों, जिनमें चुनावी पंजीकरण, मतदान और मतगणना शामिल हैं, के बारे में जानकारी प्रसारित करने के लिए मंच के रूप में भी काम करेंगे, साथ ही ईसीआईएनईटी ऐप और भारत निर्वाचन आयोग की अन्य प्रमुख पहलों के माध्यम से भी जानकारी प्रसारित करेंगे।