Category: राज्य

  • किशाऊ प्रोजेक्ट पर पंजाब सरकार सख्त, पानी के हक के लिए SC का रुख

    किशाऊ प्रोजेक्ट पर पंजाब सरकार सख्त, पानी के हक के लिए SC का रुख

    चंडीगढ़ 
    किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना को लेकर विवाद बढ़ गया है। पंजाब सरकार अब इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में है। छह राज्यों के बीच हुए समझौते से पंजाब को बाहर रखा गया है। आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ प्रवक्ता नील गर्ग ने यह जानकारी दी।

    गर्ग ने कहा कि पंजाब इस मामले में कानूनी लड़ाई लड़ेगा। उनका कहना है कि यमुना के पानी में पंजाब के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती। 15 सितंबर को नई दिल्ली में यह समझौता हुआ था। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल मौजूद थे। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के मुख्यमंत्रियों ने हस्ताक्षर किए। पंजाब इस समझौते का हिस्सा नहीं बना। पंजाब को इस प्रक्रिया से बाहर रखना स्वीकार्य नहीं है। 1954 में पंजाब के यमुना संबंधी अधिकार स्वीकार किए गए थे। पंजाब पुनर्गठन के बाद भी ये अधिकार खत्म नहीं माने जा सकते।

    पंजाब की आपत्ति और कानूनी आधार
    गर्ग ने बताया कि पंजाब की गैरमौजूदगी में उसके हितों को प्रभावित करने वाला फैसला नहीं हो सकता। पंजाब को यमुना में उसके हिस्से का पानी मिलना चाहिए। 1954 के समझौते की अनदेखी का कोई कानूनी आधार नहीं है। पंजाब को विश्वास में नहीं लेना आपत्तिजनक है। यह मामला अब नए कानूनी विवाद का रूप ले सकता है।

    क्या है किशाऊ बांध परियोजना
    किशाऊ परियोजना हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर टोंस नदी पर प्रस्तावित है। टोंस यमुना की एक प्रमुख सहायक नदी है। इस परियोजना में 1,562 दस लाख घन मीटर जल भंडारण की क्षमता होगी। समझौते के तहत हरियाणा को 633 एमसीएम पानी मिलेगा। उत्तर प्रदेश को 411 एमसीएम, राजस्थान को 124 एमसीएम और दिल्ली को 80 एमसीएम पानी आवंटित किया गया है।

    परियोजना के लाभ और केंद्र का सहयोग
    परियोजना की बिजली उत्पादन क्षमता 422 मेगावाट होगी। इससे सालाना करीब 1,476 दस लाख यूनिट स्वच्छ बिजली पैदा होने का अनुमान है। लगभग 97 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा विकसित करने का लक्ष्य है। 

    केंद्र सरकार ने इस परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया है। इसके वित्तीय बोझ का करीब 90 फीसदी हिस्सा केंद्र सरकार उठाएगी। यह परियोजना लंबे समय से अंतरराज्यीय जल बंटवारे के मतभेदों के कारण अटकी हुई थी। 

    किस राज्य को कितना पानी मिलेगा?
    परियोजना के तहत हरियाणा को 836 क्यूसेक पानी मिलने का प्रस्ताव है। वहीं, उत्तर प्रदेश को 543.2 क्यूसेक, राजस्थान को 163.52 क्यूसेक और दिल्ली को 105.28 क्यूसेक पानी मिलेगा। इस लिहाज से परियोजना केवल एक राज्य की जल जरूरत पूरी करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तर भारत के कई राज्यों के लिए जल उपलब्धता और अंतरराज्यीय समन्वय को मजबूत करने वाली पहल बन सकती है।

    क्या है किशाऊ परियोजना
        किशाऊ परियोजना उत्तराखंड के देहरादून और हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले की सीमा पर टोंस नदी पर निर्मित की जाने वाली एक राष्ट्रीय महत्व की परियोजना है।

        टोंस नदी यमुना नदी की प्रमुख सहायक नदी है।
        इस परियोजना के तहत 232.6 मीटर ऊंचा कंक्रीट का गुरुत्व बांध बनाया जाएगा।
        निर्माण कार्य पूरा होने पर यह टिहरी बांध के बाद एशिया का दूसरा सबसे ऊंचा बांध बन जाएगा।
        इस बांध से 660 मेगावॉट हरित ऊर्जा क्षमता का सृजन होगा।
        करीब 15,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली किशाऊ परियोजना की जल भंडारण क्षमता 1561.91 मिलियन घन मीटर है।
        परियोजना में जल भंडारण के साथ बहुउद्देशीय उपयोग का प्रविधान है।
        राज्यों के बीच सहमति बनने के बाद निर्माण से जुड़ी आगे की प्रक्रिया में तेजी आने की उम्मीद है।

    क्या है किशाऊ परियोजना का उद्देश्य?
    हर साल लगभग 1,379 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन किया जाएगा। यह बिजली उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बीच समान रूप से बांटी जाएगी। इसकी जल भंडारण क्षमता 1,324 मिलियन घन मीटर होगी। परियोजना का उद्देश्य जल संरक्षण, पेयजल आपूर्ति, सिंचाई और बिजली उत्पादन जैसे बहुउद्देशीय लाभ सुनिश्चित करना है।

    यमुना को कैसे मिलेगा लाभ?
    किशाऊ बांध से बिजली और पानी के अलावा यमुना की सफाई करने में भी मदद मिलेगी। इससे मानसून के दौरान बाढ़ की विभीषिका को नियंत्रित करने में भी मदद मिलेगी। गर्मी के मौसम में टोंस और आगे चलकर यमुना नदी में निरंतर जल प्रवाह बनाए रखा जा सकेगा, जिससे यमुना नदी को साफ करने के अभियान में मदद मिल सकेगी।

    छह दशक से क्यों अटका था किशाऊ?
    किशाऊ परियोजना स्थापित करने की योजना करीब छह दशक पहले बनी। परियोजना को लेकर शुरुआती स्तर पर स्थल, भूगर्भीय परिस्थितियों और तकनीकी पहलुओं का अध्ययन हुआ। इसके बाद डीपीआर, लागत, जल बंटवारे और छह राज्यों की वित्तीय हिस्सेदारी जैसे मुद्दे सामने आते गए।

    परियोजना को वर्ष 2008 में राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा भी मिला, लेकिन अंतरराज्यीय सहमति का पेंच नहीं सुलझ पाया। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश ने आगे बढ़कर संयुक्त उपक्रम बनाया, मगर परियोजना को वास्तविक गति देने के लिए छह राज्यों के बीच व्यापक सहमति जरूरी थी। अब यही सबसे बड़ा अड़ंगा दूर होता दिखाई दे रहा है।

    किशाऊ में कितना पानी जमा होगा?
    नई डीपीआर ने परियोजना की तस्वीर काफी बदल दी है। बांध की ऊंचाई घटाकर 232.6 मीटर की गई है, लेकिन जलाशय की जीवंत भंडारण क्षमता बढ़ाकर 1561.91 एमसीएम कर दी गई है। पहले यह क्षमता करीब 1324 एमसीएम थी। यानी नई व्यवस्था में लगभग 237.81 एमसीएम अतिरिक्त पानी संग्रहित किया जा सकेगा।

    लीटर में समझें तो यह करीब 23,781 करोड़ लीटर अतिरिक्त पानी है। यही अतिरिक्त भंडारण मानसून के दौरान पानी को रोकने और गैर-मानसूनी महीनों में उसका इस्तेमाल करने की क्षमता बढ़ाएगा।

    किशाऊ के आंकड़े एक नजर में

    बांध की ऊंचाई : 232.6 मीटर

    जीवंत भंडारण क्षमता : 1561.91 एमसीएम

    अतिरिक्त भंडारण : 237.81 एमसीएम

    स्थापित बिजली क्षमता : 422 मेगावाट

    औसत वार्षिक बिजली उत्पादन : 1457 मिलियन यूनिट

    पुराने मुकाबले अतिरिक्त उत्पादन : 78 मिलियन यूनिट

    प्रस्तावित सिंचाई क्षेत्र : लगभग 97,076 हेक्टेयर

    एमओयू में राज्य : छह

  • 2027 की जंग के लिए पंजाब में सियासी हलचल तेज, चारों दलों ने शुरू की तैयारी

    2027 की जंग के लिए पंजाब में सियासी हलचल तेज, चारों दलों ने शुरू की तैयारी

    चंडीगढ़ 

    पंजाब विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी शुरुआती रणनीति जमीन पर उतार दी है। आम आदमी पार्टी सरकार के करीब साढ़े चार साल के कामकाज और विकास मॉडल को जनता तक पहुंचाने में जुटी है। भाजपा केंद्र और अन्य राज्यों में अपनी सरकारों के कामकाज को आधार बनाकर पंजाब में विकल्प पेश कर रही है। 

    शिरोमणि अकाली दल प्रकाश सिंह बादल की विरासत और अपने पारंपरिक पंथक आधार को मजबूत करने की कोशिश में है। कांग्रेस गुटबाजी से ऊपर उठकर एकजुटता का संदेश दे रही है। इस बीच दलों की यात्राओं, रैलियों और घर-घर संपर्क अभियानों का सिलसिला शुरू हो चुका है।

    आप : विकास मॉडल को घर-घर ले जाएगी
    वित्तमंत्री हरपाल सिंह चीमा के अनुसार आप ने 2027 की तैयारी में सरकार के करीब साढ़े चार साल के रिपोर्ट कार्ड और विकास मॉडल को जनता तक पहुंचाने पर फोकस किया है। पार्टी ने 20 सितंबर से राज्यव्यापी घर-घर संपर्क अभियान शुरू किया है। इसमें 2.68 लाख से अधिक बूथ कमेटी सदस्य हर परिवार तक पहुंचने की योजना के तहत काम कर रहे हैं। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने धूरी से अभियान की शुरुआत की।

    भाजपा : ट्रैक रिकॉर्ड के सहारे दावेदारी
    भाजपा नेता सभी 117 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने और सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं। प्रदेशाध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों के अनुसार पार्टी केंद्र और अन्य राज्यों की भाजपा सरकारों के कामकाज को जनता के सामने रख रही है। वह नक्सलवाद में कमी, उत्तर प्रदेश में संगठित अपराध के खिलाफ कार्रवाई और आतंकवाद के खिलाफ केंद्र की नीति को भाजपा के ट्रैक रिकॉर्ड के उदाहरण के तौर पर गिनाते हैं। उनका कहना है कि पंजाब में नशे और गैंगस्टरवाद की समस्या का समाधान भी भाजपा की डबल सरकार कर सकती है। भाजपा की नशा मुक्त पंजाब यात्रा सभी 117 सीटों तक पहुंच रही है।

    शिअद : बड़े बादल की विरासत पर भरोसा
    शिरोमणि अकाली दल अपनी पारंपरिक सियासी जमीन मजबूत करने के लिए पांच बार मुख्यमंत्री रहे प्रकाश सिंह बादल की विरासत को प्रमुखता से सामने रख रहा है। पार्टी उनके कार्यकाल में हुए विकास कार्यों और ग्रामीण क्षेत्रों से सीधे जुड़ाव को अपनी पहचान के तौर पर पेश कर रही है। शिअद अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल की रैलियों में अकाली सरकारों के दौरान हुए विकास कार्यों का उल्लेख लगातार हो रहा है। पार्टी बड़े बादल की राजनीतिक विरासत के सहारे पुराने समर्थक वर्ग को फिर लामबंद करने के साथ अपनी क्षेत्रीय पहचान को भी चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है।

    कांग्रेस : एकजुटता के संदेश के साथ मैदान में
    कांग्रेस राहुल गांधी के नाम और एकजुटता के संदेश के सहारे चुनावी जमीन मजबूत करने में जुटी है। सचिन पायलट के पंजाब प्रभारी बनने के बाद पार्टी सामूहिक नेतृत्व का संदेश दे रही है। 15 सितंबर के प्रदर्शन में पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, प्रदेशाध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, नेता प्रतिपक्ष प्रताप बाजवा और पूर्व उपमुख्यमंत्री व सांसद सुखजिंदर रंधावा का एक मंच पर आना इसी रणनीति का हिस्सा रहा। पायलट ने चन्नी और वड़िंग के हाथ मिलवाकर कार्यकर्ताओं और पंजाबियों को संदेश दिया कि चुनाव राहुल गांधी के नेतृत्व और सामूहिक ताकत के साथ लड़ा जाएगा। 

     

  • बिहार में 2.36 करोड़ LPG कनेक्शन, 15% उपभोक्ताओं की e-KYC बाकी; सब्सिडी पर पड़ेगा असर?

    बिहार में 2.36 करोड़ LPG कनेक्शन, 15% उपभोक्ताओं की e-KYC बाकी; सब्सिडी पर पड़ेगा असर?

    पटना
     बिहार में घरेलू एलपीजी के करीब 15 फीसदी उपभोक्ताओं ने अब तक ई-केवाइसी और बायोमेट्रिक आधार प्रमाणीकरण की प्रक्रिया पूरी नहीं करायी है. पेट्रोलियम कंपनियों की ओर से एक अक्टूबर से बायोमेट्रिक आधार प्रमाणीकरण अनिवार्य किए जाने के बाद ऐसे उपभोक्ताओं को सब्सिडी वाले सिलिंडर को लेकर परेशानी का सामना करना पड़ सकता है.

    राज्य में 2.36 करोड़ से अधिक एलपीजी उपभोक्ता
    बिहार के 38 जिलों में तीन प्रमुख पेट्रोलियम कंपनियों के 2.36 करोड़ से अधिक घरेलू एलपीजी उपभोक्ता हैं. इनमें से करीब 55 लाख उपभोक्ताओं ने अब तक ई-केवाइसी नहीं करायी है. ऐसे में एक अक्टूबर की समय सीमा नजदीक आने के साथ बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं को प्रमाणीकरण प्रक्रिया पूरी करनी होगी.

    बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण नहीं कराने पर सब्सिडी को लेकर चिंता
    जिन उपभोक्ताओं ने अभी तक ई-केवाइसी और बायोमेट्रिक आधार प्रमाणीकरण नहीं कराया है, उन्हें सब्सिडी वाले सिलिंडर की सुविधा मिलने में परेशानी होने की आशंका है. हालांकि, पेट्रोलियम कंपनियों ने ऐसे उपभोक्ताओं के लिए सिलिंडर की कीमत बढ़ाने को लेकर अब तक कोई आधिकारिक जानकारी जारी नहीं की है.

    मई से चलाया जा रहा जागरूकता अभियान
    पेट्रोलियम कंपनियों ने उपभोक्ताओं को बायोमेट्रिक आधार प्रमाणीकरण कराने के लिए मई से ही जागरूक करना शुरू कर दिया था. इसके बावजूद लाखों उपभोक्ताओं ने अब तक प्रक्रिया पूरी नहीं करायी है. कंपनियों की ओर से उपभोक्ताओं को समय रहते ई-केवाइसी और बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण पूरा कराने के लिए कहा जा रहा है.

    एक अक्टूबर से लागू होगी अनिवार्यता
    घरेलू एलपीजी उपभोक्ताओं के लिए एक अक्टूबर से बायोमेट्रिक आधार प्रमाणीकरण अनिवार्य किया गया है. ऐसे में जिन उपभोक्ताओं का प्रमाणीकरण अभी बाकी है, उनके लिए प्रक्रिया जल्द पूरी करना जरूरी होगा, ताकि सिलिंडर से जुड़ी सुविधाओं में किसी तरह की परेशानी न हो.

  • पटना की ऐतिहासिक जलमीनार फिर होगी गुलजार, 2,500 वर्गफीट में बनेगा कैफेटेरिया

    पटना की ऐतिहासिक जलमीनार फिर होगी गुलजार, 2,500 वर्गफीट में बनेगा कैफेटेरिया

    पटना
     वीरचंद पटेल पथ पर मिलर हाईस्कूल के पास खड़ी ऐतिहासिक जलमीनार पटना की उस दौर की कहानी अपने भीतर समेटे है, जब शहर में पानी पहुंचाने के लिए स्टीम इंजन का सहारा लिया जाता था।

    वर्ष 1915 से 1918 के बीच बनी करीब 130 फीट ऊंची यह जलमीनार अब फिर चर्चा में है। नगर निगम इसे उसके मूल स्वरूप को बचाते हुए जीर्णोद्धार कर ऐतिहासिक धरोहर के रूप में विकसित करने की तैयारी में है।

    108 वर्ष पुरानी इस जलमीनार के जीर्णोद्धार और परिसर के सुंदरीकरण पर 3.38 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। परिसर में करीब 2,500 वर्गफीट क्षेत्र में आधुनिक कैफेटेरिया भी बनाया जाएगा।

    ऐति‍हासिक धरोहर के रूप में होगी विकसित
    इसमें बैठने की जगह, रसोई, काउंटर और अन्य जरूरी सुविधाएं होंगी। इससे विद्यार्थियों, लोगों और यहां आने वाले पर्यटकों को सुविधा मिलेगी। काम पूरा करने के लिए छह महीने की अवधि तय की गई है।

    यह जलमीनार पटना की पुरानी जलापूर्ति व्यवस्था की गवाह है। वर्ष 1915 से 1918 के बीच बनी इस मीनार में करीब एक लाख गैलन पानी संग्रहित किया जा सकता था

    खास बात यह है कि उस समय पानी को ऊपर चढ़ाने के लिए आधुनिक मोटर नहीं, बल्कि स्टीम इंजन का इस्तेमाल होता था। एएन कालेज के पास स्थित कुएं से स्टीम इंजन के जरिये पानी इस जलमीनार तक पहुंचाया जाता था।

    जैसे ही जलमीनार पूरी भर जाती थी, यहां से लाल सिग्नल दिखाया जाता था। यह संकेत एएन कालेज के पास लगे स्टीम इंजन तक पहुंचता था और इंजन बंद कर दिया जाता था।

    जलमीनार की यह व्यवस्था उस समय की तकनीकी समझ और इंजीनियरिंग का उदाहरण थी। फ्लोटिंग इंडिकेटर तकनीक से पानी का स्तर बढ़ने के साथ इंडिकेटर की स्थिति बदलती थी और जलमीनार के भरने का संकेत मिलता था।

    उस समय इससे जुड़ा जलापूर्ति नेटवर्क 200 से 250 किलोमीटर तक फैला हुआ था। पहले यह व्यवस्था बांकीपुर वाटर सप्लाई हेड वर्क्स के अंतर्गत थी।

    1978 तक इस जलमीनार से होती थी जलापूर्ति
    इसके जरिये वर्तमान के नूतन राजधानी, पाटलिपुत्र और बांकीपुर अंचल के विभिन्न क्षेत्रों में पानी पहुंचाया जाता था। यानी आज जिन इलाकों में शहर का बड़ा हिस्सा बसा हुआ है, वहां दशकों पहले इसी व्यवस्था के जरिये घरों तक पानी पहुंचता था।

    सितंबर 1978 तक इससे जलापूर्ति होती रही। इसके बाद यह ऐतिहासिक ढांचा उपयोग से बाहर हो गया। लाल ईंटों से बनी इस जलमीनार की स्थापत्य शैली भी इसे खास बनाती है।

    गुंबददार संरचना वाली यह इमारत करीब एक सदी से अधिक समय से शहर के बदलते स्वरूप की गवाह रही है। जलमीनार के साथ पूरे परिसर का भी विकास किया जाएगा।

    करीब 14,400 वर्गफीट क्षेत्र में समग्र विकास की योजना है। सजावटी रोशनी से जलमीनार को आकर्षक रूप दिया जाएगा। जलीमनार परिसर में पहले दो जलापूर्ति केंद्र थे।

    एक जलापूर्ति केंद्र समेत करीब 60 प्रतिशत जमीन एमएलसी आवास के लिए चली गई। बचे जलापूर्ति केंद्र की क्षमता 120 अश्वशक्ति है, जो अभी चालू है। वर्तमान में परिसर तक पहुंचने में अवैध पार्किंग बड़ी समस्या है।

    जलमीनार की नींव सुरक्षित, पारंपरिक तकनीक से होगा जीर्णोद्धार
    जलमीनार की स्थिति का आकलन एनआइटी पटना के सिविल इंजीनियरिंग विभाग ने किया है। रिपोर्ट के अनुसार, जलमीनार में समग्र झुकाव, नींव में दरार या मिट्टी के अलग होने के संकेत नहीं मिले।

    हालांकि, कुछ स्थानों पर नमी, लिंटल में दरार और सीढ़ियों की खराब स्थिति जैसी समस्याएं मिली हैं। इनके सुधार को जीर्णोद्धार योजना में शामिल किया गया है।

    मूल निर्माण सामग्री के अनुकूल चूने आधारित और सांस लेने योग्य पारंपरिक सामग्री का इस्तेमाल किया जाएगा। अनावश्यक बदलाव से बचते हुए मौजूदा संरचना को सुरक्षित रखने की योजना है।

    प्रस्ताव में जलमीनार की वास्तुकला को उभारने के लिए वार्म एलईडी लाइट लगाने की भी योजना है। इससे रात में भी इसकी पहचान बनी रहेगी।

    हेरिटेज गार्डन के मध्य होगी ऐतिहासिक जलमीनार
    योजना के तहत 10,880 वर्गफीट में हेरिटेज गार्डन विकसित किया जाएगा। इसके मध्य ऐतिहासिक जलमीनार रहेगी। चारों ओर पौधों की क्यारियां और हरियाली विकसित होगी।

    मुख्य प्रवेश द्वार से जलमीनार तक पैदल पथ बनाया जाएगा। दोनों ओर छायादार पेड़ लगाए जाएंगे। चारदीवारी पर प्राकृतिक पत्थर की क्लैडिंग और सजावटी लोहे की रेलिंग होगी।

    प्रवेश द्वार पर कलात्मक लोहे का गेट और खंभों पर सजावटी लाइटें लगाई जाएंगी। परिसर में वर्षा जल संचयन की भी व्यवस्था होगी।

        14,400 वर्गफीट क्षेत्र का होगा विकास
        2,500 वर्गफीट में बनेगा कैफेटेरिया
        4,325 वर्गफीट में परिसर विकसित होगा
        1,963.50 वर्गफीट क्षेत्र में है जलमीनार
        5,600 वर्गफीट में बिछेगा पेवर ब्लाॅक

     

  • एशियन गेम्स में दीपिका-मनीषा का शानदार प्रदर्शन, 11 गोल के साथ चमकीं दीपिका

    एशियन गेम्स में दीपिका-मनीषा का शानदार प्रदर्शन, 11 गोल के साथ चमकीं दीपिका

    हिसार.

    एशियन गेम्स में भारतीय खिलाड़ियों का शानदार प्रदर्शन जारी है। भारतीय महिला हाकी टीम में हिसार की दीपिका सहरावत ने जहां उज्बेकिस्तान के खिलाफ एक मैच में आठ गोल दागकर अपनी अलग पहचान बनाई, वहीं इंडोनेशिया के खिलाफ लगातार दूसरे मैच में तीन गोल कर हैट्रिक लगाई।

    दीपिका टूर्नामेंट में 11 गोल कर सबसे आगे चल रही है। वहीं दूसरी ओर भारतीय कबड्डी टीम ने सोमवार को अपने अभियान की शुरुआत बांग्लादेश को 42-21 से हराकर की। इस मुकाबले में हिसार के गांव भिवानी रोहिल्ला की मनीषा ने लेफ्ट कवर से डिफेंडर की भूमिका निभाई। वहीं हसनगढ़ की निकिता नैन भी भारतीय टीम का हिस्सा हैं।

    दीपिका ने आठ गोल कर तोड़ा अपना ही रिकार्ड 
    भारतीय महिला हाकी टीम ने उज्बेकिस्तान को 19-0 से हराया था। इस मुकाबले में दीपिका सहरावत ने अकेले आठ गोल दागे। इस प्रदर्शन के साथ उन्होंने अपना ही पिछला रिकार्ड पीछे छोड़ दिया।

  • गुलजार सिंह के बयान पर सियासी घमासान, संजय सिंह ने BJP-अकाली दल को घेरा

    गुलजार सिंह के बयान पर सियासी घमासान, संजय सिंह ने BJP-अकाली दल को घेरा

    चंडीगढ़.

    आम आदमी पार्टी ने पंजाब को बदनाम करने के लिए साजिश रच रही भाजपा, अकाली और कांग्रेस को लेकर बड़ा खुलासा किया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद संजय सिंह ने कहा कि जिस जग्गा सिंह को भाजपा अपना ‘‘भाई’’ बता रही है, वह नशा तस्कर है और उस पर एनडीपीएस समेत 9 केस दर्ज हैं, जबकि मोहन जीत सिंह पर भी 8 केस दर्ज हैं।

    विपक्ष दलों ने गुलजार सिंह पर भी दबाव बनाकर ‘‘आप’’ के खिलाफ बयान दिलवाया। ये लोग पंजाब को बदनाम करने के लिए किसी भी हद तक गिर सकते हैं। आज जब भगवंत मान सरकार अभियान चलाकर अकाली दल, भाजपा और कांग्रेस की सरकारें में लाए गए नशे का खात्मा कर रही है तो इसे रोकने के लिए सभी एकजुट हो गए हैं। लेकिन आम आदमी पार्टी पंजाब को बदनाम करने की भाजपा, कांग्रेस और अकाली की साजिश को सफल नहीं होने देगी।

  • फिल्मी सितारों को भा रहा बिहार, नई नीति के बाद 15+ प्रोजेक्ट्स की तैयारी; क्षेत्रीय फिल्मों को 50% तक सब्सिडी

    फिल्मी सितारों को भा रहा बिहार, नई नीति के बाद 15+ प्रोजेक्ट्स की तैयारी; क्षेत्रीय फिल्मों को 50% तक सब्सिडी

    पटना
    पटना का जेपी गंगा पथ, कैमूर का दुर्गावती डैम, राजगीर का ग्लास ब्रिज और वाल्मीकि टाइगर रिजर्व… अब ये सिर्फ घूमने की जगहें नहीं, बड़े पर्दे की नई लोकेशन बनने जा रही हैं. बिहार में फिल्म निर्माण को बढ़ावा देने वाली नई नीति का असर जमीन पर दिखाई देने लगा है. दिसंबर से राज्यभर में 15 से ज्यादा फिल्मों की शूटिंग शुरू होने की तैयारी है. इन परियोजनाओं के जरिए करीब 100 करोड़ रुपये के निवेश की उम्मीद है.

    अब तक फिल्म शूटिंग में 200 करोड़ हुए खर्च
    पिछले कुछ सालों में बिहार का फिल्म कनेक्शन तेजी से मजबूत हुआ है. 2024 से अब तक राज्य में 45 से ज्यादा फिल्मों, वेब सीरीज और म्यूजिक प्रोजेक्ट्स की शूटिंग या निर्माण से करीब 200 करोड़ रुपये खर्च होने का दावा किया गया है. इसका असर सिर्फ फिल्म सेट तक सीमित नहीं है. होटल, परिवहन, स्थानीय खान-पान, कलाकारों और तकनीकी टीम से जुड़े लोगों के लिए भी काम के अवसर बढ़ रहे हैं.

    इन फिल्मी कलाकारों ने दिखाई दिलचस्पी
    बिहार में शूटिंग को लेकर फिल्म इंडस्ट्री की दिलचस्पी बढ़ी है. सुनील शेट्टी, संजय मिश्रा, गोविंदा और सोनू सूद जैसे कलाकारों के राज्य में शूटिंग के लिए सहमति देने की बात सामने आई है. फिल्म निर्देशकों के मुताबिक बड़े सितारों वाली परियोजनाएं आने पर प्रोडक्शन बजट 100 करोड़ से लेकर 500 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है.

    क्षेत्रीय सिनेमा के लिए सब्सिडी का प्रावधान
    नई फिल्म प्रोत्साहन नीति में भोजपुरी, मैथिली, मगही, अंगिका और बज्जिका जैसी क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों के लिए 50 प्रतिशत तक अनुदान का प्रावधान है. जबकि हिंदी और अंग्रेजी फिल्मों को 25 प्रतिशत तक सहायता दी जाएगी. इसके अलावा राज्य में 75 प्रतिशत से ज्यादा शूटिंग करने वाली फीचर फिल्मों को प्रदर्शन में प्राथमिकता और हर एक श्रेणी में 50 लाख रुपये तक की सहायता का प्रावधान बताया गया है.

    इन लोकेशन्स को किया गया सेलेक्ट
    जेपी गंगा पथ को कमर्शियल और गानों की शूटिंग के लिए पसंद किया जा रहा है. दुर्गावती डैम की प्राकृतिक खूबसूरती, वीटीआर के जंगल, राजगीर का ग्लास ब्रिज, नालंदा का वेणु वन और मुंगेर का भीमबांध फिल्मकारों को आकर्षित कर रहे हैं.

  • बिजली चोरी पर शिकंजा: 41 जगह पकड़ी चोरी, 40 कनेक्शन कटे; मीटर रीडिंग में भी बड़ा फर्जीवाड़ा

    बिजली चोरी पर शिकंजा: 41 जगह पकड़ी चोरी, 40 कनेक्शन कटे; मीटर रीडिंग में भी बड़ा फर्जीवाड़ा

    लखनऊ
    यूपी के विद्युत वितरण क्षेत्र देवीपाटन मंडल में बकाया वसूली और लाइन लॉस घटाने के महा अभियान में बड़ी गड़बड़ी पकड़ी गई है। गोंडा जिले में बड़गांव खण्ड प्रथम के परसोनी बनवारा में 16853 यूनिट की स्टोर रीडिंग पकड़ी गई। रीडिंग में 16 हजार यूनिट की हेराफेरी सामने आई है। बडगांव उपखण्ड अधिकारी भरत सिंह ने संबंधित मीटर रीडर और कार्यदायी संस्था टेरासॉफ्ट के विरुद्ध कार्रवाई की संस्तुति की है।

    मुख्य अभियंता यदुनाथ यथार्थ के निर्देश पर उत्तरी, खरगूपुर, चांदपुर, शिवपुरा, चरचरी, चौधरीडीह और रहवा जैसे हाई लॉस फीडरों पर 10 से 15 टीमें तैनात की गई हैं। ये टीमें घर-घर जाकर बकाया जमा करा रही हैं और नेवर पेड उपभोक्ताओं को नोटिस दे रही हैं। नोटिस के बाद भी भुगतान न करने पर संयोजन काटे जाएंगे। जांच में गोण्डा में 15, बहराइच में 12 और बलरामपुर-श्रावस्ती में 14 कुल 41 जगह बिजली चोरी पकड़ी गई, जिन पर एफआईआर की कार्रवाई की जा रही है। सोमवार को गोंडा जिले में 743 नोटिस पर 44.47 लाख, बहराइच में 790 नोटिस पर 65.17 लाख और बलरामपुर-श्रावस्ती में 939 नोटिस पर 55.13 लाख की वसूली हुई। मुख्य अभियंता यदुनाथ यथार्थ ने कहा कि बकाया बिलों का समय से भुगतान कर उपभोक्ता विद्युत व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में सहयोग करें। उन्होंने दो टूक कहा कि विभागीय कार्यों में लापरवाही बरतने, स्टोर रीडिंग करने वाले को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जायेगा और उनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई जारी रहेगी।

    रामापुर में 40 कनेक्शन काटे :
    अधिशासी अभियंता रणबीर सिंह के निर्देश पर विद्युत दुबहा गांव में सघन विद्युत चेकिंग अभियान एवं राजस्व वसूली कैंप का आयोजन किया गया। इस कार्रवाई से बकायादारों और बिजली चोरी करने वालों में हड़कंप मचा रहा। अभियान के दौरान विद्युत विभाग की टीम ने बड़े पैमाने पर जांच की। बकाया भुगतान न करने पर लगभग 40 उपभोक्ताओं के बिजली कनेक्शन मौके पर ही काट दिए गए। वहीं, 15 उपभोक्ताओं ने कार्रवाई से बचते हुए मौके पर ही 65,000 रुपये का राजस्व जमा कराया। जांच के दौरान 5 उपभोक्ताओं के मीटर में रीडिंग स्टोर पाई गई, जिसे टीम ने मौके पर ही अपडेट कर नया बिल जारी किया। अवर अभियंता अर्जुन कुमार पाल ने सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि यदि किसी भी व्यक्ति ने बिना बकाया जमा किए चोरी से दोबारा केबल जोड़ने का प्रयास किया, तो उसके खिलाफ विद्युत अधिनियम की धारा दर्ज कर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

    छोटे फाल्ट को ठीक करने में लग रहे 14 से 20 घंटे, लोग परेशान
    परसपुर में नगर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में कटौती को लेकर उपभोक्ताओं में नाराजगी है। नगर के गिरीश नारायण सिंह सहित अन्य उपभोक्ताओं का कहना है आए दिन रात करीब 9-10 बजे लाइन में फाल्ट होने से बिजली कट जाती है। छोटे फाल्ट को ठीक करने में भी 14 से 20 घंटे तक का समय लग जा रहा है। गर्मी में रातभर बिजली न रहने से वृद्धों, बीमारों और छोटे बच्चों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। बताते हैं कुछ प्रभावशाली लोगों के कनेक्शन को दूसरे फेस से जोड़कर आपूर्ति बहाल कर दी जाती है, जबकि उड़े वाले फेस से जुड़े सैकड़ों परिवार पूरी रात बिजली के इंतजार में रात काटनी पड़ रही हैं। कुछ सक्षम लोग मजबूरी में जनरेटर चलाते हैं, जिससे ध्वनि और वायु प्रदूषण की समस्या भी बढ़ती है। उपभोक्ताओं ने अधिकारियों से मांग की है कि फाल्ट होने पर तत्काल मरम्मत की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए और विद्युत आपूर्ति शीघ्र बहाल हो। साथ ही चेतावनी दी है कि व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ तो नगरवासी उच्च अधिकारियों और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि से शिकायत करेंगे।

  • झारखंड में बंजर भूमि का होगा कायाकल्प, मिलेट्स की खेती और पौधरोपण पर खर्च होंगे ₹20 करोड़

    झारखंड में बंजर भूमि का होगा कायाकल्प, मिलेट्स की खेती और पौधरोपण पर खर्च होंगे ₹20 करोड़

    रांची
     राज्य में बंजर भूमि विकास योजना के तहत झारखंड को इस वर्ष केंद्र से 20 करोड़ रुपये मिलेंगे। हालांकि यह राशि प्राप्त करने के लिए राज्य सरकार को पिछले वर्ष दिए गए 13 करोड़ रुपये की राशि खर्च होने का उपयोगिता प्रमाणपत्र देना होगा। वन एवं पर्यावरण विभाग इसकी तैयारी कर रहा है।

    इस योजना के तहत राज्य के पलामू और संताल परगना प्रमंडलों में औसत से कम हुई वर्षा की वजह से इस राशि से मिलेट्स की खेती के लिए किसानों को सहायता दी जाएगी। राज्य में पानी की कमी वाली भूमि पर मिलेट्स या मोटे अनाज (श्रीअन्न) की खेती की जाती है।

    बंजर भूमि विकास के तहत यहां पौधरोपण और छोटे चेक डैम भी बनाए जाते हैं। बंजर भूमि यानी ऊंची भूमि पर छत्तीसगढ़ और ओडिशा में पिछले दो सालों में रिकॉर्ड मिलेट्स का उत्पादन हुआ है। झारखंड में भी इस तरह की भूमि पर प्रयोग को सफल बनाने के लिए राज्य सरकार ने योजना बनाई है।

    बिहार में बंजर भूमि विकास के तहत पिछले साल मिली राशि से छोटे-बड़े करीब 750 चेकडैम बनाए गए हैं। इसके अलावा सामाजिक वानिकी के तहत इस राशि से 70 हजार नए पौधे लगाए गए हैं।

    बंजर भूमि पर कृषि कार्य से जुड़े किसान विकास केंद्र के सहायक वैज्ञानिक संजय मिश्रा ने बताया कि चेकडैम की वजह से मिट्टी में नमी बढ़ी है। इससे यहां श्रीअन्न के साथ फलदार पौधे भी लगे हैं, जिनकी वृद्धि अच्छी है।

    राज्य सरकार बंजर भूमि का जिला स्तर पर नया डाटाबेस भी तैयार कर रही है। इसमें उस भूमि का सर्वे भी किया जाएगा, जहां मिट्टी की ऊपर परत उपजाऊ नहीं रह गई है।

  • किसानों को मिले ₹100 प्रति क्विंटल प्रोत्साहन, पराली जलाने पर रोक का बाजवा ने सुझाया तरीका

    किसानों को मिले ₹100 प्रति क्विंटल प्रोत्साहन, पराली जलाने पर रोक का बाजवा ने सुझाया तरीका

    चंडीगढ़.

    पंजाब विधानसभा में विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा ने पराली जलाने के मुद्दे पर केंद्र की भाजपा सरकार की प्रस्तावित दंडात्मक व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए किसानों के लिए आर्थिक प्रोत्साहन की मांग की है।

    बाजवा ने कहा कि पराली जलाने की समस्या का समाधान किसानों को केवल अपराधी मानकर जुर्माना लगाने से नहीं होगा। इसके लिए किसानों की आर्थिक मजबूरियों को समझते हुए व्यवहारिक विकल्प उपलब्ध कराने होंगे।

    बाजवा नहीं करते पराली जलाने का समर्थन
    बाजवा ने कहा कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के तहत वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) ने पराली जलाने पर किसानों के खिलाफ जुर्माने का प्रस्ताव रखा है। प्रस्तावित व्यवस्था में खेत के आकार आधार पर प्रत्येक घटना के लिए 5,000, 10,000 और 30,000 रुपये तक जुर्माना लगाने की बात कही गई है।

    खेतों को रेड कैटेगरी में डाला जाएगा –
    सरकार ने पराली जलाने की समस्या का समाधान निकाला है। देश की राजधानी दिल्ली से पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में किसान पराली जलाते हैं, जिससे प्रदूषण काफी बढ़ सकता है। पर्यावरण मंत्रालय ने इस पराली जलाने की समस्या को रोकने के लिए नए नियम बनाने का प्रस्ताव दिया है। नए नियमों के तहत पराली जलाए जाने वाले खेतों को रेड कैटेगरी में डाला जाएगा।

    क्या होंगे पराली जलाने को लेकर नया नियम?
    पर्यावरण मंत्रालय ने पराली जलाने को लेकर ड्राफ्ट नियम बुधवार को जारी किए। ड्राफ्ट नियमों के तहत, जिस खेत में पराली जलाई जाएगी, उसे घटना की तारीख से 15 महीने के लिए 'रेड कैटेगरी' में रखा जाएगा। हालांकि, इस कैटेगरी में डाले जाने के क्या नतीजे होंगे, यह अभी साफ नहीं है। नियमों के तहत, 'अगर उसी जमीन पर बाद में फिर से पराली जलाने की घटना होती है या इन नियमों के तहत लगाया गया पर्यावरण जुर्माना (अगर कोई हो) तय समय में जमा नहीं किया जाता है, तो 'रेड एंट्री' अगले 15 महीनों के लिए भी लागू रहेगी।'