Category: देश

  • दुकानदार ने UPI के लिए मांगा अतिरिक्त चार्ज तो ग्राहक करेंगे किनारा, 76% ने कहा- बदल देंगे पेमेंट मोड

    दुकानदार ने UPI के लिए मांगा अतिरिक्त चार्ज तो ग्राहक करेंगे किनारा, 76% ने कहा- बदल देंगे पेमेंट मोड

    नई दिल्ली

    यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) भुगतान पर 15 अक्टूबर से ₹2,000 से अधिक के मर्चेंट 0.4% मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू होने के बाद UPI ट्रांजैक्शन की कुल वैल्यू में करीब 10% और ट्रांजैक्शन वॉल्यूम में करीब 4% की गिरावट आ सकती है. LocalCircles के मर्चेंट और कंज्यूमर सर्वे के आधार पर यह अनुमान लगाया गया है. सर्वे के मुताबिक, MDR लागू होने के बाद अधिक राशि वाले UPI भुगतान का एक हिस्सा कैश, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड और बैंक ट्रांसफर की ओर जा सकता है। 

    ₹2,000 से अधिक के भुगतान UPI वैल्यू का 67%
    LocalCircles के CEO सचिन तापड़िया के मुताबिक, यह अनुमान MDR लागू होने से पहले किए गए अलग-अलग मर्चेंट और कंज्यूमर सर्वे पर आधारित है. अगस्त में ₹2,000 से अधिक के भुगतान मर्चेंट UPI ट्रांजैक्शन का केवल करीब 4% थे, लेकिन इनका हिस्सा कुल मर्चेंट UPI भुगतान की वैल्यू में 67% था. इन भुगतानों की कुल राशि करीब ₹6 लाख करोड़ प्रति माह बैठती है। 

    अगस्त 2026 में UPI के जरिए कुल 24.51 अरब ट्रांजैक्शन हुए, जिनकी वैल्यू ₹29.82 लाख करोड़ रही. इनमें मर्चेंट भुगतान की संख्या 15.51 अरब और वैल्यू ₹8.95 लाख करोड़ रही. ऐसे में ₹2,000 से अधिक के मर्चेंट भुगतान संख्या में कम होने के बावजूद UPI की कुल वैल्यू पर बड़ा असर डाल सकते हैं। 

    MDR लगने पर 76% यूजर्स बदल सकते हैं भुगतान का तरीका
    2 अक्टूबर को जारी LocalCircles के कंज्यूमर सर्वे में 76% लोगों ने कहा कि अगर UPI इस्तेमाल करने पर अतिरिक्त शुल्क देना पड़ा तो वे बड़े भुगतानों के लिए कैश, कार्ड या बैंक ट्रांसफर का इस्तेमाल कर सकते हैं. केवल 14% लोगों ने कहा कि अगर मर्चेंट MDR का बोझ उन पर डालता है तो वे अतिरिक्त राशि देकर भी UPI का इस्तेमाल जारी रखेंगे। 

    अगर ₹2,000 से अधिक के UPI भुगतान पर मर्चेंट ग्राहक से अतिरिक्त शुल्क लेता है, तो 27% लोग कैश का इस्तेमाल करेंगे, जबकि 26% क्रेडिट कार्ड की ओर जाने की बात कही. 14% डेबिट कार्ड और 4% बैंक ट्रांसफर, NEFT या IMPS का इस्तेमाल कर सकते हैं.

    भविष्य में ₹2,000 से अधिक के भुगतान के लिए 26% लोगों ने क्रेडिट कार्ड और इतने ही लोगों ने कैश को पसंदीदा विकल्प बताया. 13% ने डेबिट कार्ड और 11% ने बैंक ट्रांसफर को प्राथमिकता दी. वहीं, केवल 20% लोगों ने कहा कि अतिरिक्त शुल्क लगने के बावजूद UPI उनका सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला माध्यम रहेगा। 

    UPI वॉल्यूम पर 4% असर का अनुमान
    LocalCircles के मुताबिक, MDR लागू होने के पहले पूरे महीने में UPI की कुल वैल्यू में करीब 10% की गिरावट आ सकती है. वहीं, ट्रांजैक्शन वॉल्यूम में करीब 4% की कमी का अनुमान है। 

    इस 4% गिरावट में करीब 1% सीधा असर उन ट्रांजैक्शन पर पड़ सकता है जिन पर MDR लागू होगा. बाकी करीब 3% गिरावट उपभोक्ताओं के भुगतान व्यवहार में बदलाव से हो सकती है. यानी जहां मर्चेंट अतिरिक्त शुल्क लगाएंगे, वहां ग्राहक UPI के बजाय दूसरे भुगतान माध्यमों का इस्तेमाल कर सकते हैं। 

    ### ₹2,000 तक UPI भुगतान पर नहीं लगेगा शुल्क
    MDR एक तरह का शुल्क है, जो डिजिटल भुगतान को प्रोसेस करने के लिए मर्चेंट की ओर से बैंक और भुगतान कंपनियों को दिया जाता है. प्रस्तावित व्यवस्था के तहत 15 अक्टूबर से ₹2,000 से अधिक के व्यक्ति से मर्चेंट (P2M) UPI भुगतान पर 0.4% MDR लागू होगा। 

    सरकार ने 14 सितंबर को ₹2,000 तक के मर्चेंट UPI भुगतान और RuPay डेबिट कार्ड ट्रांजैक्शन पर जीरो चार्ज जारी रखने का फैसला किया था. UPI QR कोड के जरिए हर महीने ₹1 लाख तक प्राप्त करने वाले छोटे मर्चेंट भी प्रस्तावित MDR से बाहर रहेंगे. LocalCircles का अनुमान है कि मर्चेंट UPI ट्रांजैक्शन का करीब 96% हिस्सा इस व्यवस्था से प्रभावित नहीं होगा। 

    सरकार ने कहा- ग्राहकों से MDR नहीं वसूला जाएगा
    सरकार का कहना है कि MDR का बोझ ग्राहकों पर नहीं डाला जाना चाहिए. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सितंबर में कहा था कि इस शुल्क की जिम्मेदारी ग्राहकों की नहीं है. सरकार भारतीय बैंक संघ (IBA) के साथ मिलकर ऐसा तंत्र तैयार कर रही है, जिसके जरिए बैंक मर्चेंट्स की निगरानी कर सकें और यह सुनिश्चित किया जा सके कि MDR ग्राहकों से न वसूला जाए। 

    ज्यादातर मर्चेंट MDR का बोझ उठाने को तैयार नहीं
    LocalCircles के 32,796 मर्चेंट्स के सर्वे में 41% ने कहा कि वे ₹2,000 से अधिक के UPI भुगतान पर कोई MDR नहीं देंगे. वहीं, 9% मर्चेंट UPI भुगतान स्वीकार ही नहीं करते. सिर्फ 17% मर्चेंट 0.4% या उससे अधिक MDR वहन करने के लिए तैयार दिखे. 15% ने कहा कि वे अधिकतम 0.04% MDR ही स्वीकार करेंगे। 

    LocalCircles के मुताबिक, MDR का बोझ उठाने को तैयार नहीं होने वाले मर्चेंट कीमत बढ़ा सकते हैं, अलग से शुल्क लगा सकते हैं या ग्राहकों को कैश, कार्ड और बैंक ट्रांसफर जैसे विकल्पों की ओर भेज सकते हैं। 

    जीरो MDR व्यवस्था में हो रहा बदलाव
    प्रस्तावित MDR व्यवस्था UPI पर लंबे समय से चली आ रही जीरो-MDR व्यवस्था में बड़ा बदलाव है. UPI के विस्तार में इस व्यवस्था की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. अगस्त में संसद ने Payment and Settlement Systems Act, 2007 की धारा 10A में संशोधन किया था. इससे RuPay डेबिट कार्ड और UPI ट्रांजैक्शन पर शुल्क लगाने पर लगी व्यापक रोक हट गई और केंद्र को यह तय करने की अनुमति मिली कि किन भुगतान माध्यमों को शुल्क मुक्त रखा जाएगा। 

    सरकार ने UPI सिस्टम को बनाए रखने की लागत का भी हवाला दिया है. UPI ट्रांजैक्शन के लिए प्रोत्साहन राशि वित्त वर्ष 2023-24 में बढ़कर ₹3,631 करोड़ पहुंच गई थी, जबकि वित्त वर्ष 2026-27 के लिए ₹2,000 करोड़ का प्रावधान किया गया है. वित्तीय सेवा विभाग ने संसदीय समिति को बताया है कि लंबे समय तक जीरो MDR व्यवस्था को बनाए रखना वित्तीय रूप से टिकाऊ नहीं हो सकता। 

    नई व्यवस्था में ₹2,000 तक के भुगतान और व्यक्ति से व्यक्ति (P2P) UPI ट्रांसफर पर कोई शुल्क नहीं होगा. ₹75,000 या उससे अधिक के ट्रांजैक्शन पर MDR अधिकतम ₹300 तक सीमित रहेगा. रेलवे, टेलीकॉम, इंश्योरेंस, ईंधन और कृषि इनपुट से जुड़े भुगतान पर ₹5 का फ्लैट शुल्क होगा, जबकि कैपिटल मार्केट से जुड़े भुगतान पर 0.02% MDR लगेगा। 

    कारोबारी संगठनों ने किया विरोध
    प्रस्तावित MDR का कारोबारी संगठनों ने भी विरोध किया है. उनका कहना है कि मर्चेंट बिल को अलग-अलग हिस्सों में बांट सकते हैं, ग्राहकों को बैंक ट्रांसफर की ओर भेज सकते हैं या अतिरिक्त लागत की भरपाई के लिए कीमतों में बदलाव कर सकते हैं। 

    कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) ने इस व्यवस्था का विरोध किया है, जबकि चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री ने इसे वापस लेने की मांग की है. 30 सितंबर को CAIT के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने वित्त मंत्री से मुलाकात की थी, जिसके बाद प्रस्तावित 'नो UPI डे' प्रदर्शन वापस ले लिया गया। 

    LocalCircles ने सुझाव दिया है कि शुरुआत में ₹2,000 से अधिक के भुगतान पर 0.4% MDR सिर्फ बड़े कॉरपोरेट मर्चेंट्स पर लागू किया जाए और MSMEs को इससे बाहर रखा जाए. संगठन का अनुमान है कि इससे संभावित MDR राजस्व का करीब 98% हासिल किया जा सकता है, जबकि छोटे कारोबारियों पर असर भी सीमित रहेगा। 

  • केंद्रीय कर्मचारियों के लिए बड़ी खबर! 8वें वेतन आयोग के दौर में दूसरी बार DA बढ़ने की उम्मीद

    केंद्रीय कर्मचारियों के लिए बड़ी खबर! 8वें वेतन आयोग के दौर में दूसरी बार DA बढ़ने की उम्मीद

    नई दिल्ली

     केंद्रीय कर्मचारियों को महंगाई भत्ता यानी डीए में बढ़ोतरी का बेसब्री से इंतजार है। साल की दूसरी छमाही के लिए डीए बढ़ोतरी का ऐलान इसी महीने यानी अक्टूबर में ही होने की उम्मीद है। आठवें वेतन आयोग के दौर में यह दूसरी बार होगा जब सरकार महंगाई भत्ते का ऐलान करेगी। इससे पहले अप्रैल महीने में भी केंद्रीय कर्मचारियों के लिए डीए को 2 पर्सेंट बढ़ाया गया था।

    कब हुआ था 8वें वेतन आयोग का गठन
    वैसे तो सरकार ने पिछले साल जनवरी महीने में ही आठवें वेतन आयोग के गठन को लेकर एक नोटिफिकेशन जारी कर दिया था लेकिन 2025 के नवंबर महीने में टर्म्स ऑफ रेफरेंस और समिति का गठन हुआ। इससे एक महीने पहले यानी अक्टूबर 2025 में सातवें वेतन आयोग के आखिरी दौर में सरकार ने डीए बढ़ोतरी का ऐलान कर दिया था। बता दें कि सातवें वेतन आयोग की अवधि दिसंबर 2025 में खत्म हो गई। अब ऐसा माना जा रहा है कि सरकार 8वें वेतन आयोग की सिफारिशें जब लागू करेगी तो जनवरी 2026 से ही प्रभावी होगा।

    अप्रैल में पहली बार डीए का ऐलान
    आठवें वेतन आयोग के गठन के बाद सरकार ने अप्रैल महीने में पहली बार डीए का ऐलान किया था। यह ऐलान जनवरी से जून छमाही के लिए किया गया था। डीए में 2 पर्सेंट की बढ़ोतरी हुई और इसका कैल्कुलेशन सातवें वेतन आयोग के तहत ही किया गया। वर्तमान में केंद्रीय कर्मचारियों का भत्ता 60 पर्सेंट है।

    कितनी हो सकती है बढ़ोतरी?
    केंद्र सरकार के कर्मचारियों को फिलहाल 60 पर्सेंट की दर से डीए मिल रहा है। AICPI-IW के उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर DA में 4 से 5 पर्सेंट बढ़ोतरीका अनुमान लगाया जा रहा है। अगर यह बढ़ोतरी होती है तो केंद्रीय कर्मचारियों का डीए 64 पर्सेंट से 65 पर्सेंट का अतिरिक्त लाभ मिलेगा। हालांकि, अंतिम डीए दर का फैसला सरकार की आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगा। बता दें कि 8वां वेतन आयोग कर्मचारियों के पूरे वेतन ढांचे, भत्तों और पेंशन की समीक्षा कर रहा है। 8वें वेतन आयोग की सिफारिशों में फिटमेंट फैक्टर सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक है। इसके आधार पर नए वेतन ढांचे में बेसिक पे में बड़ा बदलाव हो सकता है।

    वहीं, डीए पर क्या फैसला होगा, इसके बारे में वेतन आयोग की सिफारिशें आने के बाद ही फैसला होगा। ऐसा अनुमान है कि वेतन आयोग अपनी सिफारिशें मई या जून 2027 तक सरकार को सौंप देगा। इसके बाद सरकार इसे लागू करेगी।

  • West Bengal Name Change: 27 साल से जारी कवायद, अब ‘पश्चिम बंगा’ नाम पर फिर गरमाई सियासत

    West Bengal Name Change: 27 साल से जारी कवायद, अब ‘पश्चिम बंगा’ नाम पर फिर गरमाई सियासत

    कलकत्ता

    पश्चिम बंगाल का नाम बदलने की चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है. पश्चिम बंगाल बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने सोमवार को कहा कि सीएम सुवेंदू अधिकारी की सरकार जल्द विधानसभा में नाम बदलने का विधेयक ला सकती है. उन्होंने दावा किया कि अगले विधानसभा सत्र में पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर ‘पश्चिम बंगा’ करने का प्रस्ताव रखा जा सकता है. बीजेपी नेता के मुताबिक यह फैसला राज्य को उसके इतिहास और बंगाली पहचान से जोड़ने के मकसद से लिया गया है. पिछले 27 सान में तीन बार पश्चिम बंगाल का नाम बदलने की कोशिशें राज्‍य सरकारों की तरफ से की गई. हालांकि केंद्र और राज्‍य में अलग अलग पार्टी की सरकार होने के कारण पहले ऐसा नहीं हो सका. इस बार इस बात की संभावना प्रबल है कि वेस्‍ट बंगाल का नाम बदलकर पश्चिम बंगा रख दिया जाए। 

    अब वेस्‍ट बंगाल नहीं, पश्चिम बंगा?
    समिक भट्टाचार्य ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा
    कि लोगों को जल्द ‘बांग्ला’ या ‘वेस्‍ट बंगाल जैसे नामों का इस्तेमाल नहीं करना पड़ेगा. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार बहुत जल्द विधानसभा में विधेयक पेश करेगी. हालांकि यह प्रस्ताव कब और किस प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ेगा, इसकी अंतिम स्थिति विधानसभा में विधेयक आने के बाद ही साफ होगी. नाम बदलने का मुद्दा पश्चिम बंगाल में नया नहीं है. इसके पीछे बंगाली पहचान और औपनिवेशिक दौर से जुड़े नाम को बदलने की दलील पहले भी दी जाती रही है. लेकिन राजनीतिक सहमति और केंद्र की मंजूरी नहीं मिलने के कारण मामला आगे नहीं बढ़ सका। 

    1999 से चल रही नाम बदलने की कहानी
    पश्चिम बंगाल का नाम बदलने की कोशिशों का इति
    हास करीब ढाई दशक पुराना है. 1999 में ज्योति बसु के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार ने पश्चिम बंगा नाम रखने का प्रस्ताव विधानसभा में रखा था. उस समय बांग्ला नाम पर भी चर्चा हुई थी. प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया लेकिन मंजूरी नहीं मिली. 2011 में ममता बनर्जी सरकार आने के बाद यह मुद्दा फिर उठा. उस समय पश्चिम बंगा नाम का प्रस्ताव रखा गया. सरकार का तर्क था कि अंग्रेजी वर्णक्रम में वेस्‍ट बंगाल नीचे आता है. इससे राष्ट्रीय बैठकों में राज्य के प्रतिनिधियों को अपनी बारी के लिए इंतजार करना पड़ता है. हालांकि केंद्र ने इसे मंजूरी नहीं दी। 

    2016 में फिर बदला प्रस्ताव
    2016 में नाम बदलने की कवायद दोबारा शुरू हुई. सरकार ने अलग-अलग भाषाओं में ‘बांग्ला’, ‘बंगाल’ और ‘बंगाल’ जैसे नामों पर विचार किया. 2018 में विधानसभा ने सर्वसम्मति से ‘बांग्ला’ नाम रखने का प्रस्ताव पास किया. यह प्रस्ताव भी केंद्र की मंजूरी हासिल नहीं कर सका. केंद्र की ओर से संवैधानिक संशोधन की जरूरत बताई गई. साथ ही बीजेपी के एक वर्ग ने ‘बांग्ला’ नाम को बांग्लादेश से मिलता-जुलता होने पर आपत्ति जताई थी. यानी नाम बदलने की कोशिश कई बार हुई लेकिन हर बार मामला राजनीतिक और संवैधानिक पेच में फंस गया। 

    वाराणसी में बनेगा पश्चिम बंगा भवन
    समिक भट्टाचार्य ने वाराणसी में प्रस्तावित ‘पश्चिम बंगा भवन’ की जानकारी भी दी. उनके मुताबिक राज्य का संस्कृति और पर्यटन विभाग केंद्र और कूचबिहार के राजपरिवार के वंशजों के साथ मिलकर इसकी योजना पर काम कर रहा है. यह भवन सांस्कृतिक केंद्र के साथ बंगाल से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए ठहरने की जगह भी होगा. इसमें सम्मेलन कक्ष, पुस्तकालय और बंगाली साहित्य व गीतों का संग्रह प्रस्तावित है. वाराणसी और बंगाल के पुराने आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संबंध को भी इस परियोजना की बड़ी वजह बताया गया है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार पश्चिम बंगा नाम का प्रस्ताव विधानसभा से आगे निकलकर केंद्र की मंजूरी तक पहुंच पाएगा? पिछले अनुभवों को देखते हुए इस पर सबकी नजर रहेगी। 

  • कम बारिश और घटते जल भंडार से बढ़ी चिंता, महाराष्ट्र में 16 अक्टूबर से पानी पर 10% कटौती

    कम बारिश और घटते जल भंडार से बढ़ी चिंता, महाराष्ट्र में 16 अक्टूबर से पानी पर 10% कटौती

    मुंबई 
    महाराष्ट्र में पानी की कमी को लेकर सरकार ने अभी से तैयारी शुरू कर दी है. कम बारिश और अल-नीनो के असर की चिंता के बीच राज्य सरकार ने 16 अक्टूबर से कम से कम 10% पानी की कटौती करने का फैसला लिया है. यह कटौती महानगरपालिका, नगरपालिका और ग्राम पंचायतों समेत स्थानीय निकायों में लागू होगी. सरकार का कहना है कि इसका मकसद आने वाले महीनों के लिए पानी बचाना और लोगों के लिए पीने का पानी सुरक्षित रखना है। 

    जलसंपदा मंत्री गिरीश महाजन के मुताबिक, इस साल मॉनसून के बाद महाराष्ट्र के बांधों में औसतन 75.25% पानी बचा है. पिछले साल इसी समय यह आंकड़ा 88.82% था. यानी पिछले साल के मुकाबले इस बार बांधों में कम पानी है. राज्य के 265 तालुकों में सूखे की स्थिति घोषित की गई है. ऐसे में सरकार ने अभी से पानी बचाने और उसके इस्तेमाल को कम करने का फैसला लिया है। 

    सरकार ने बांधों और जलाशयों में मौजूद पानी के इस्तेमाल की योजना 31 अगस्त 2027 तक के लिए बनाई है. इसमें सबसे पहले लोगों के पीने के पानी की जरूरत पूरी की जाएगी. पानी का हिसाब लगाते समय गर्मी में पानी के उड़ने, बांधों में जमा गाद और बिना अनुमति पानी निकालने जैसी चीजों को भी ध्यान में रखा जाएगा. हर बांध में 10% अतिरिक्त पानी आपात स्थिति के लिए बचाकर रखा जाएगा. अगर पानी की कमी बहुत ज्यादा होती है तो तकनीकी जांच के बाद बांध के सबसे नीचे जमा पानी यानी डेड स्टोरेज का इस्तेमाल किया जा सकता है। 

    पानी की लीकेज रोकने पर जोर
    16 अक्टूबर से पानी की कटौती लागू होने के साथ स्थानीय निकायों को पानी की बर्बादी रोकने के लिए भी काम करना होगा. पाइपलाइन से पानी लीक होने की समस्या को दूर करने के लिए अभियान चलाया जाएगा. सरकार ने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट यानी एसटीपी को पूरी क्षमता से चलाने को भी कहा है. यहां गंदे पानी को साफ किया जाता है. इस पानी का इस्तेमाल बागवानी, निर्माण और सफाई जैसे कामों में किया जा सकता है. इससे इन कामों के लिए साफ पानी कम इस्तेमाल होगा। 

    उद्योगों को भी पानी बचाना होगा
    सरकार ने उद्योगों से भी पानी बचाने को कहा है. उद्योगों को अपने इस्तेमाल किए गए पानी का कम से कम 30% पानी दोबारा इस्तेमाल या रिसाइकिल करना होगा. इसके अलावा बांधों, नदियों और नहरों से बिना अनुमति पानी निकालने पर भी कार्रवाई की जाएगी. सरकार ने संबंधित विभागों को ऐसे मामलों पर नजर रखने के निर्देश दिए हैं. बिना अनुमति पानी निकालने के लिए इस्तेमाल होने वाले पंप और दूसरे सामान को जब्त भी किया जा सकता है। 

    खेती के लिए पानी का इस्तेमाल भी तय होगा
    पानी की कमी का असर खेती पर भी पड़ सकता है. सरकार की योजना के मुताबिक, सिंचाई के लिए पानी देने से पहले पीने के पानी, जानवरों और चारे की जरूरत पूरी की जाएगी. रबी की अनाज वाली फसलों और चारे वाली फसलों को पहले पानी दिया जाएगा. इसके बाद दूसरी रबी फसलों की जरूरत पूरी की जाएगी. बारहमासी फसलों को पानी तभी मिलेगा, जब जरूरी जरूरतों को पूरा करने के बाद पानी बचा होगा। 

    महाराष्ट्र में इस साल बारिश की कमी का असर कई इलाकों में दिखा है. राज्य के 265 तालुकों में सूखे की स्थिति घोषित की गई है. इन इलाकों में बारिश कम होने के साथ लंबे समय तक सूखा रहने जैसी स्थिति भी सामने आई है. सरकार को चिंता है कि अल-नीनो का असर आगे भी रह सकता है।  

    इसी वजह से अगले मॉनसून तक पानी का हिसाब पहले से रखने की तैयारी की जा रही है. सरकार की कोशिश है कि आने वाले महीनों में लोगों को पीने के पानी की परेशानी न हो. 16 अक्टूबर से लागू होने वाली 10% पानी की कटौती इसी तैयारी का हिस्सा है। 

  • Maharashtra Bike Taxi: अब सिर्फ इलेक्ट्रिक बाइक टैक्सी चलेगी, एग्रीगेटर्स को 6 महीने में बदलनी होगी फ्लीट

    Maharashtra Bike Taxi: अब सिर्फ इलेक्ट्रिक बाइक टैक्सी चलेगी, एग्रीगेटर्स को 6 महीने में बदलनी होगी फ्लीट

     मुंबई

    महाराष्ट्र में बाइक टैक्सी चलाने वालों के लिए आने वाले कुछ महीने काफी अहम होने वाले हैं. अगर आप ओला, उबर, रैपिडो जैसे प्लेटफॉर्म के साथ पेट्रोल बाइक टैक्सी चला रहे हैं, तो अब ज्यादा समय नहीं बचा है. राज्य सरकार ने बाइक टैक्सी एग्रीगेटर्स को अपनी फ्लीट पेट्रोल से इलेक्ट्रिक करने के लिए समयसीमा तय कर दी है. पेट्रोल से इलेक्ट्रिक पर जाने के लिए ज्यादातर ऑपरेटरों को 6 महीने का समय दिया गया है, जबकि कुछ लाइसेंस होल्डर्स को 3 महीने की अतिरिक्त मोहलत मिलेगी। 

    महाराष्ट्र ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट ने अक्टूबर में बाइक-टैक्सी एग्रीगेटर्स और रीजनल ट्रांसपोर्ट ऑफिस (RTO) को इस संबंध में पत्र भेजा है. यह कदम मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के निर्देश के बाद उठाया गया. सरकार के फैसले के मुताबिक, महाराष्ट्र में बाइक टैक्सी सेवाओं को तय समयसीमा के भीतर 100% इलेक्ट्रिक फ्लीट की ओर जाना होगा. यानी पेट्रोल बाइक से चल रही सेवाओं को धीरे-धीरे इलेक्ट्रिक वाहनों में बदलना होगा। 

    पेट्रोल बाइक वालों को कितने महीने मिलेंगे?

    अभी पेट्रोल बाइक टैक्सी चला रहे ऑपरेटरों के लिए पहला चरण 6 महीने का है. इसी अवधि में उन्हें इलेक्ट्रिक वाहन की अनिवार्यता पूरी करने की दिशा में आगे बढ़ना होगा. हालांकि, महाराष्ट्र बाइक टैक्सी रूल्स, 2025 के तहत प्रोविजनल या टेंपररी लाइसेंस वाले ऑपरेटरों को 3 महीने की अतिरिक्त मोहलत दी गई है. यानी इन ऑपरेटरों के लिए कुल समय 9 महीने तक हो सकता है। 

    एग्रीगेटर्स ने मांगी थी 2030 तक की मोहलत
    ओला, उबर, रैपिडो जैसे बाइक टैक्सी एग्रीगेटर्स ने इस बदलाव के लिए ज्यादा समय चाहती थीं. एग्रीगेटर्स ने सरकार से 2030 तक की मोहलत देने की मांग की थी. उनका कहना था कि पूरी फ्लीट को इलेक्ट्रिक व्हीकल में बदलने में समय लगेगा. कंपनियों ने अपनी मांग के पीछे महाराष्ट्र इलेक्ट्रिक व्हीकल पॉलिसी और बड़े स्तर पर वाहनों को बदलने में आने वाली चुनौतियों का हवाला दिया था. लेकिन सकार ने 203र0 तक की मोहलत देने के बजाय मौजूदा समयसीमा तय की है। 

    बाइक टैक्सी राइडर्स के सामने चुनौती
    सिर्फ कंपनियां ही नहीं, बाइक टैक्सी चलाने वाले राइडर भी इस बदलाव को लेकर अपनी चिंता जता चुके हैं. सितंबर में महाराष्ट्र बाइक टैक्सी वेलफेयर एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और दूसरे अधिकारियों को पत्र लिखकर बदलाव के लिए 1.5 साल का समय मांगा था. एसोसिएशन के अध्यक्ष अमित गावडे के मुताबिक, ज्यादातर बाइक टैक्सी राइडर मिडिल या लोअर-मिडिल क्लास परिवारों से आते हैं. ऐसे में अचानक इलेक्ट्रिक बाइक खरीदने के लिए बड़ा निवेश करना उनके लिए आसान नहीं है. राइडरों ने चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी लाइफ को लेकर भी चिंता जताई थी. यानी उनके लिए मामला सिर्फ बाइक बदलने का नहीं, बल्कि उसे चलाने की लागत और चार्जिंग की सुविधा से भी जुड़ा है। 

    पहले 50:50 मॉडल पर हुई थी चर्चा
    महाराष्ट्र सरकार ने शुरुआत में पेट्रोल और इलेक्ट्रिक बाइक को साथ चलाने वाले 50:50 मॉडल पर भी विचार किया था. इसमें कंपनियों को अपने बेड़े में पेट्रोल और इलेक्ट्रिक दोनों तरह की मोटरसाइकिल रखने की अनुमति देने की बात थी. परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के मुताबिक, कैबिनेट ने इस मॉडल को मंजूरी नहीं दी. सरकार को आशंका थी कि ज्यादा लागत के कारण कंपनियां इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद को टाल सकती हैं। 

  • छोटे कारोबारियों को बड़ी सौगात! ₹10,000 करोड़ का Growth Fund, लॉजिस्टिक्स सिस्टम होगा मजबूत

    छोटे कारोबारियों को बड़ी सौगात! ₹10,000 करोड़ का Growth Fund, लॉजिस्टिक्स सिस्टम होगा मजबूत

    नई दिल्ली

    केंद्र सरकार ने ट्रांसपोर्ट, लॉजिस्टिक्स और छोटे कारोबार को लेकर दो बड़े फैसले किए हैं. केंद्रीय कैबिनेट ने इंटीग्रेटेड ट्रांसपोर्ट एंड लॉजिस्टिक्स अथॉरिटी यानी ITLA बनाने को मंजूरी दी है. साथ ही स्‍मॉल एंड मीड‍ियम एंटरप्राइजेज ग्रोथ फंड (SGF) के लिए 10,000 करोड़ रुपये के फंड को मंजूरी दी गई है. सरकार एक तरफ देश में सड़क, रेलवे, बंदरगाह, हवाई सेवा और दूसरे ट्रांसपोर्ट सिस्टम को आपस में जोड़कर काम कराने की तैयारी कर रही है. दूसरी तरफ छोटे और मझोले कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए 10 हजार करोड़ रुपये का ग्रोथ फंड बनाया जा रहा है. इससे आम आदमी, किसान, छोटे दुकानदार और छोटे कारोबारी को सीधा फायदा होगा। 

    आपके भी मन में सवाल होगा क‍ि आख‍िर इस तरह की अथॉर‍िटी की जरूरत क्‍यों पड़ी. मान लीजिए किसी किसान ने अपने खेत में गेहूं पैदा किया. गेहूं गांव से मंडी जाएगा, वहां से किसी दूसरे शहर में जाएगा और फिर किसी फैक्ट्री या गोदाम तक पहुंचेगा. इस पूरे सफर में सड़क, ट्रक, रेलवे, गोदाम और कई बार बंदरगाह तक की जरूरत पड़ सकती है. अगर सड़क अच्छी है लेकिन रेलवे कनेक्शन नहीं है, रेलवे है लेकिन माल उतारने-चढ़ाने की व्यवस्था कमजोर है या बंदरगाह तक पहुंचने में बहुत समय लग रहा है तो पूरे सिस्टम का खर्च बढ़ जाता है. यही खर्च आखिरकार सामान की कीमत में भी जुड़ता है. मोदी सरकार की नई ITLA का मकसद इसी पूरी कड़ी को एक साथ देखकर योजना बनाना है। 

    अभी कैसे होता है?
    अभी सड़क, रेलवे, बंदरगाह, हवाई सेवा, जलमार्ग और दूसरे ट्रांसपोर्ट सिस्टम से जुड़े काम अलग-अलग मंत्रालयों और एजेंसियों के जरिए होते हैं. ITLA इन सबके बीच बेहतर तालमेल बनाने वाली संस्था के तौर पर काम करेगी. ITLA को आप सरकार का ऐसा सिस्टम समझ सकते हैं, जो यह देखने की कोशिश करेगा कि देश में माल और लोगों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने के लिए कौन सा रास्ता सबसे बेहतर है. इसमें सड़क, रेलवे, बंदरगाह, शिपिंग, हवाई सेवा, जलमार्ग, कोस्टल शिपिंग, शहरी परिवहन और लॉजिस्टिक्स सभी को एक साथ देखा जाएगा। 

    यानी सरकार सिर्फ यह नहीं देखेगी कि सड़क कहां बनानी है. यह भी देखा जाएगा कि उस सड़क का रेलवे, बंदरगाह या दूसरे परिवहन साधनों से कनेक्शन कैसा है. इससे एक ही काम के लिए अलग-अलग विभागों में योजना बनाने की बजाय एक साझा प्लान के हिसाब से काम करने की कोशिश होगी। 

    10 साल या उससे ज्यादा का ट्रांसपोर्ट मास्टर प्लान बनेगा
    ITLA की सबसे बड़ी जिम्मेदारियों में से एक नेशनल ट्रांसपोर्ट मास्टर प्लान तैयार करना होगी. यह छोटी अवधि की योजना नहीं होगी. सरकार ने इसे 10 साल या उससे ज्यादा की अवधि को ध्यान में रखकर बनाने की बात कही है. इसका मतलब यह है कि सरकार आने वाले वर्षों में देश में ट्रांसपोर्ट की जरूरत कहां बढ़ेगी, किस इलाके में सड़क चाहिए, कहां रेलवे कनेक्शन चाहिए, किस बंदरगाह की क्षमता बढ़ानी है और माल की आवाजाही किस तरह आसान बनाई जा सकती है] इन सबको पहले से प्लान करने की कोशिश करेगी. अगर किसी इलाके में अगले 10-15 साल में उद्योग, खेती या कारोबार बढ़ने वाला है तो वहां की सड़क और माल ढुलाई की जरूरत का अंदाजा पहले से लगाया जा सकता है। 

    500 करोड़ से बड़े प्रोजेक्ट की भी होगी जांच
    ITLA की भूमिका सिर्फ प्लान बनाने तक सीमित नहीं होगी. 500 करोड़ रुपये या उससे ज्यादा लागत वाली केंद्र सरकार की ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की तकनीकी जांच भी ITLA करेगी. इन परियोजनाओं की निगरानी और उनके असर का आकलन भी किया जाएगा. यानी किसी बड़े सड़क, रेलवे या दूसरे ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट पर सैकड़ों-हजारों करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं तो यह देखने की व्यवस्था होगी कि परियोजना तकनीकी रूप से सही है या नहीं और इससे अपेक्षित फायदा मिल रहा है या नहीं. यानी बड़ा प्रोजेक्ट सिर्फ बनाना ही मकसद नहीं होगा, उससे कितना फायदा हुआ, यह भी देखा जाएगा। 

    FASTag से GSTN तक का डेटा एक जगह आएगा
    ITLA का एक और महत्वपूर्ण काम नेशनल ट्रांसपोर्ट डेटा रिपॉजिटरी बनाना होगा. इसमें FASTag, Vahan, GSTN e-way bill, GPS और ट्रैफिक सिस्टम जैसे अलग-अलग स्रोतों से मिलने वाले डेटा को एक साथ लाने की योजना है। 

    इसका फायदा क्या होगा?
    मान लीजिए किसी हाईवे पर हर दिन हजारों ट्रक गुजर रहे हैं. FASTag से टोल और वाहनों की आवाजाही का डेटा मिलता है. GSTN e-way bill से यह पता लगाया जा सकता है कि सामान की आवाजाही किस तरह हो रही है. GPS और ट्रैफिक सिस्टम से यह समझने में मदद मिल सकती है कि ट्रैफिक कहां और कितना है. अगर यह जानकारी एक साथ मिलेगी तो सरकार को यह समझने में आसानी होगी कि कहां सड़क पर दबाव बढ़ रहा है, माल किस रूट से ज्यादा जा रहा है और कहां नई सुविधा की जरूरत है. यानी भविष्य में ट्रांसपोर्ट से जुड़े फैसले ज्यादा डेटा के आधार पर लेने की कोशिश होगी। 

    इसका फायदा आम आदमी को क्‍या फायदा
    अगर माल एक शहर से दूसरे शहर तक जल्दी और कम खर्च में पहुंचता है तो कारोबारी की लागत घट सकती है. अगर किसान की फसल मंडी तक जल्दी पहुंचती है तो नुकसान कम हो सकता है. अगर फैक्ट्री तक कच्चा माल समय पर पहुंचता है तो उत्पादन बेहतर हो सकता है. और अगर पूरे सिस्टम की लागत कम होती है तो लंबे समय में इसका फायदा कारोबार, किसान और उपभोक्ता, तीनों को मिल सकता है। 

    10 हजार करोड़ का SGF फंड है क्‍या?
    SGF के लिए 10,000 करोड़ रुपये रखे गए हैं. यह फैसला छोटे और मझोले कारोबार के लिए महत्वपूर्ण है. देश में बहुत से कारोबार ऐसे हैं जो छोटी या मध्यम इकाई से शुरू होते हैं. इनमें मैन्युफैक्चरिंग यूनिट, सप्लायर, सर्विस कारोबार और दूसरी कारोबारी इकाइयां शामिल हैं. इन कारोबारों को आगे बढ़ने के लिए नई मशीन खरीदने, उत्पादन बढ़ाने, कारोबार का विस्तार करने या नई क्षमता तैयार करने के लिए पूंजी की जरूरत पड़ती है. SGF का उद्देश्य ऐसे छोटे और मझोले उद्यमों की ग्रोथ को सहारा देना है. हालांकि 10 हजार करोड़ रुपये का मतलब यह नहीं है कि हर छोटे दुकानदार या कारोबारी को सीधे उसके खाते में पैसा मिलेगा. यह एक ग्रोथ फंड है. इससे किस तरह के उद्यमों को और किन नियमों के तहत मदद मिलेगी। 

     

  • UPI पेमेंट पर चार्ज का असर! 76% यूजर्स बदल सकते हैं भुगतान का तरीका, बड़े ट्रांजैक्शन पर भी पड़ेगा असर

    UPI पेमेंट पर चार्ज का असर! 76% यूजर्स बदल सकते हैं भुगतान का तरीका, बड़े ट्रांजैक्शन पर भी पड़ेगा असर

    नई दिल्ली

    UPI से 2,000 रुपये से ज्यादा के पेमेंट पर 0.4 प्रतिशत MDR यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट लगाने की तैयारी है। यह नियम 15 अक्टूबर से लागू हो सकता है। इसमें UPI P2P यानी ग्राहक से व्यापारी वाले भुगतान शामिल होंगे। यह चार्ज व्यापारी को देना है। लेकिन, सवाल यह है कि अगर व्यापारी या दुकानदार यह खर्च ग्राहकों पर डाल देते हैं, तो क्या होगा? लोकल सर्कल्स के नए सर्वे में इसका बड़ा असर दिख रहा है। सर्वे में 291 जिलों के 67,000 से ज्यादा UPI यूजर्स ने जवाब दिए।

    ग्राहक क्या करेंगे अगर UPI पर फीस लगे?
    सर्वे के मुताबिक, अगर व्यापारी UPI पेमेंट पर अलग से फीस जोड़ते हैं, तो…

        14 प्रतिशत लोग कहते हैं वे UPI से ही पेमेंट करेंगे और फीस भी देंगे।
        27 प्रतिशत लोग कैश से पेमेंट करेंगे।
        26 प्रतिशत लोग क्रेडिट कार्ड पर शिफ्ट हो जाएंगे।
        14 प्रतिशत लोग डेबिट कार्ड इस्तेमाल करेंगे।
        4 प्रतिशत लोग बैंक ट्रांसफर, NEFT या IMPS चुनेंगे।
        नौ प्रतिशत लोग व्यापारी से कोई और ऐसा पेमेंट ऑप्शन मांगेंगे जिस पर अलग चार्ज न हो।
        2 प्रतिशत लोग खरीदारी टाल देंगे या करेंगे ही नहीं।
        4 प्रतिशत लोग तय नहीं कर पाए कि वे क्या करेंगे।

    ₹2,000 से ऊपर की खरीद में कौन से पेमेंट मोड का करेंगे इस्तेमाल ?
    जब लोगों से पूछा गया कि अगर UPI पर अलग चार्ज लगे तो ₹2,000 से ऊपर की खरीद में वे सबसे ज्यादा कौन सा तरीका इस्तेमाल करेंगे तो उनका जवाब कुछ ऐसा रहा..

        26 प्रतिशत लोग क्रेडिट कार्ड चुनेंगे।
        26 प्रतिशत लोग कैश चुनेंगे।
        13 प्रतिशत लोग डेबिट कार्ड चुनेंगे।
        11 प्रतिशत लोग बैंक ट्रांसफर, NEFT या IMPS चुनेंगे।
        सिर्फ 20 प्रतिशत लोग UPI का इस्तेमाल करते रहेंगे।
        4 प्रतिशत लोग अनिश्चित हैं।

    यानी LocalCircles का मानना है कि 76 प्रतिशत UPI यूजर्स बड़े पेमेंट के लिए UPI छोड़ सकते हैं, अगर उस पर अतिरिक्त शुल्क लगता है।

    क्या व्यापारी भी MDR नहीं देना चाहते?
    सर्वे में व्यापारियों की राय भी सामने आई है। 242 जिलों के 32,000 से ज्यादा व्यापारियों ने ये जवाब दिए…

        सिर्फ 17 प्रतिशत व्यापारी ₹2,000 से ऊपर के UPI पेमेंट पर 0.4 प्रतिशत MDR देने को तैयार हैं।

        41 प्रतिशत व्यापारी कोई भी MDR देने को तैयार नहीं हैं।

        9 प्रतिशत व्यापारी UPI ही नहीं लेते।

        15 प्रतिशत व्यापारियों ने 0.04 प्रतिशत को अधिकतम सीमा बताया।

    UPI ट्रांजैक्शन वैल्यू 10 प्रतिशत क्यों गिर सकती है?
    लोकल सर्कल्स का अनुमान है कि 15 अक्टूबर से 0.4 प्रतिशत MDR लागू होने के बाद पहले पूरे महीने में UPI ट्रांजैक्शन वैल्यू 10 प्रतिशत तक घट सकती है। दरअसल, ₹2,000 से ऊपर के UPI पेमेंट संख्या में बहुत कम हैं। मर्चेंट ट्रांजैक्शन वॉल्यूम का 5 प्रतिशत से भी कम, लेकिन वैल्यू के हिसाब से ये करीब 67 प्रतिशत हैं, यानी लगभग ₹6 लाख करोड़ महीना। यह कुल UPI ट्रांजैक्शन वैल्यू का करीब एक-पांचवां हिस्सा है।

    अनुमान है कि UPI ट्रांजैक्शन वॉल्यूम 4 प्रतिशत गिर सकती है। इसमें 1 पर्सेंटेज पॉइंट सीधा नुकसान MSME व्यापारियों पर होगा और 3 पर्सेंटेज पॉइंट नेटवर्क इफेक्ट से, क्योंकि लोग उन व्यापारियों के साथ कुल UPI इस्तेमाल भी कम कर सकते हैं।

    चूंकि 83 प्रतिशत व्यापारी 0.4 प्रतिशत MDR खुद नहीं झेलना चाहते, इसलिए हो सकता है कि वे यह खर्च सरचार्ज, प्रोडक्ट की कीमत बढ़ाकर, या ग्राहकों को दूसरे पेमेंट मोड की तरफ मोड़कर वसूल करें। अगर ऐसा हुआ, तो 76 प्रतिशत ग्राहक ₹2,000 से ऊपर की खरीद में दूसरा पेमेंट मोड चुन सकते हैं।

  • 8वें वेतन आयोग की प्रक्रिया हुई तेज, केंद्रीय कर्मचारियों की सैलरी-भत्तों से जुड़ी सुविधाओं का जुटाया जा रहा डेटा

    8वें वेतन आयोग की प्रक्रिया हुई तेज, केंद्रीय कर्मचारियों की सैलरी-भत्तों से जुड़ी सुविधाओं का जुटाया जा रहा डेटा

    नई दिल्ली

    8वें वेतन आयोग को लेकर केंद्रीय कर्मचारियों के लिए एक बड़ा अपडेट सामने आया है। एक मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, वेतन आयोग ने केंद्रीय कर्मचारियों को मिलने वाले अलग-अलग बेनिफिट्स एंड फैसिलिटीज की जानकारी जुटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। आयोग अब इन बेनिफिट्स से रिलेटेड जानकारी का स्टडी करेगा, ताकि कर्मचारियों के सैलरी, अलाउंसेस और अन्य सर्विस बेनिफिट्स की रिव्यू की जा सके।

    फाइनेंसियल एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अब आयोग ने सेंट्रल गवर्नमेंट एम्प्लॉयी ग्रुप इंश्योरेंस स्कीम (CGEGIS) से जुड़ी जानकारी मांगी है। सेंट्रल पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट (CPWD) ने 1 अक्टूबर 2026 को इस संबंध में एक ऑफिस मेमोरेंडम जारी किया है। इसमें मिनिस्ट्री ऑफ हाउसिंग एंड अर्बन अफेयर्स (MoHUA) के तहत आने वाले डिपार्टमेंट्स एंड ऑफिसेज से सेंट्रल गवर्नमेंट एम्प्लॉईज ग्रुप इंश्योरेंस स्कीम यानी CGEGIS से जुड़ा डेटा मांगा गया है। बता दें कि यह केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए एक ग्रुप इंश्योरेंस स्कीम है, जिसमें इंश्योरेंस कवर के साथ सेविंग्स का प्रोविजन भी होता है।

    दिए गए हैं निर्देश
    CPWD ने रिलेटेड ऑफिसेज से कहा है कि वे तय फॉर्मेट यानी एनेक्सचर-एम (Annexure-M) में यह जानकारी उपलब्ध कराएं। इसके लिए संबंधित SDG और ADG को निर्देश दिए गए हैं और जानकारी 9 अक्टूबर तक CPWD को भेजनी है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि CGEGIS के तहत मिलने वाले लाभ में कोई बदलाव या बढ़ोतरी कर दी गई है। फिलहाल यह सिर्फ जानकारी जुटाने की प्रक्रिया है।

    नवंबर 2025 में बना था 8वां वेतन आयोग
    बता दें कि 8वां वेतन आयोग केंद्र सरकार ने नवंबर 2025 में बनाया था। इसकी अध्यक्षता जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई कर रही हैं। आयोग में प्रो. पुलक घोष पार्ट-टाइम मेंबर और पंकज जैन मेंबर-सेक्रेटरी हैं। आयोग को केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स की सैलरी, अलाउंसेस, रिटायरमेंट बेनिफिट्स और दूसरी सर्विस कंडीशंस की रिव्यू कर सरकार को अपनी सिफारिशें देनी हैं।

    सुझाव भेजने की अंतिम तारीख 15 जून थी
    वेतन आयोग पहले ही कर्मचारियों, पेंशनरों, कर्मचारी संगठनों और दूसरे स्टेकहोल्डर्स से सुझाव ले चुका है। सुझाव भेजने की अंतिम तारीख 15 जून 2026 तक बढ़ाई गई थी। अब आयोग अलग-अलग विभागों से जरूरी आंकड़े जुटाने के साथ जमीनी स्तर पर भी बातचीत कर रहा है। आयोग की वेबसाइट के मुताबिक, अक्टूबर में बेंगलुरु और मुंबई में भी बैठकें प्रस्तावित हैं।

    ऐसे में CGEGIS से जुड़ी जानकारी मांगा जाना कर्मचारियों के लिए इसलिए अहम है क्योंकि यह सरकारी सेवा से जुड़े लाभों में शामिल है और अब इसकी जानकारी भी 8वें वेतन आयोग के स्टडी का हिस्सा बन रही है। हालांकि, अभी इससे CGEGIS में किसी बदलाव, ज्यादा इंश्योरेंस कवर या एडिशनल बेनिफिट्स की घोषणा नहीं हुई है। फिलहाल इसे 8वें वेतन आयोग की चल रही डेटा जुटाने और रिव्यू प्रोसेस के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

  • कृषि में AI-रोबोटिक्स की एंट्री, जम्मू-कश्मीर में बदलेगी खेती की तस्वीर; LG मनोज सिन्हा ने बताया विजन

    कृषि में AI-रोबोटिक्स की एंट्री, जम्मू-कश्मीर में बदलेगी खेती की तस्वीर; LG मनोज सिन्हा ने बताया विजन

    जम्मू
     जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने कृषि और बागवानी क्षेत्र में उभरती आधुनिक चुनौतियों से निपटने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), रोबोटिक्स और स्मार्ट फार्मिंग जैसी भविष्योन्मुखी तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाने का जोरदार आह्वान किया है।

    SKUAST-कश्मीर में AI और रोबोटिक्स पर आयोजित एक आंतरिक संगोष्ठी को संबोधित करते हुए उपराज्यपाल ने कहा कि कृषि क्षेत्र अब केवल पारंपरिक खाद्य सुरक्षा की चुनौतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि नवाचार, तकनीक और आधुनिक इंजीनियरिंग हस्तक्षेपों के माध्यम से भविष्य का नेतृत्व करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

    मानव बुद्धिमत्ता और एआई का होगा तालमेल
    सिन्हा ने कहा कि जम्मू-कश्मीर इन मुद्दों पर विचार-विमर्श के लिए उपयुक्त मंच प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र का कृषि परिदृश्य ऐतिहासिक रूप से किसानों को कठिन परिस्थितियों से निपटने और सीमित संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने के लिए प्रेरित करता रहा है।

    1960 के दशक में भारत के सामने आई चुनौतियों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि उस समय देश खाद्यान्न की कमी से जूझ रहा था और आयात पर काफी हद तक निर्भर था।

    कृषि वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों और इंजीनियरों ने मशीनीकरण सहित विभिन्न उपायों के जरिए कृषि क्षेत्र को बदलने और हरित क्रांति में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

    उन्होंने कहा कि अब कृषि इंजीनियरिंग को उत्पादन बढ़ाने, कम संसाधनों में अधिक उपज हासिल करने, फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से कृषि और बागवानी को सुरक्षित रखने जैसी व्यावहारिक और तात्कालिक चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करना होगा।

    सिन्हा ने कहा, “इन चुनौतियों का समाधान अतीत के औजारों से नहीं किया जा सकता। हमें नए औजारों की जरूरत है।” उन्होंने आधुनिक तकनीकों और नए दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया।

    खेती में महिलाओं की भूमिका को तकनीक से मिले मजबूती
    उपराज्यपाल ने कहा कि हाल के महीनों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में तेजी से हुए बदलावों ने दुनियाभर में इसके प्रति रुचि और चिंताएं दोनों बढ़ाई हैं। ऐसे में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि AI और मानव बुद्धिमत्ता एक-दूसरे के पूरक बनकर काम करें, न कि उन्हें अलग-अलग देखा जाए।

    उन्होंने समाज के व्यापक वर्ग को लाभ पहुंचाने वाले नवाचारों की आवश्यकता पर भी जोर दिया। विशेष रूप से महिलाओं की भूमिका का उल्लेख करते हुए सिन्हा ने कहा कि महिला नेतृत्व वाली इंजीनियरिंग और तकनीकी पहल केवल चर्चा का विषय न रहें, बल्कि उनके ठोस और व्यावहारिक परिणाम सामने आने चाहिए।

    कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी का उल्लेख करते हुए उन्होंने श्रम बल से जुड़े आंकड़ों का हवाला दिया और कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में महिलाएं कृषि गतिविधियों से जुड़ी हैं, जबकि इस क्षेत्र में काम करने वाले कई श्रमिकों को नियमित मजदूरी भी नहीं मिलती।

    उपराज्यपाल ने कृषि इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और संस्थानों से ऐसी तकनीक एवं समाधान विकसित करने का आह्वान किया जो समावेशी और संसाधन-कुशल हों तथा बदलती जलवायु परिस्थितियों में खेती को अधिक टिकाऊ बनाने में मदद करें।

  • भविष्य की डेटा सिक्योरिटी में भारत की बड़ी कामयाबी, क्वांटम Key Distribution में रचा नया रिकॉर्ड

    भविष्य की डेटा सिक्योरिटी में भारत की बड़ी कामयाबी, क्वांटम Key Distribution में रचा नया रिकॉर्ड

     नई दिल्ली

    भारत ने मुक्त अंतरिक्ष में क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन यानी QKD के क्षेत्र में एक बड़ा मील का पत्थर हासिल किया है. क्यूएनयू लैब्स, बीआईएसएजी-एन और आईआईटी गांधीनगर ने गांधीनगर परिसरों के बीच फील्ड ट्रायल पूरा किया. इस परीक्षण में 5.56 किलोमीटर की दूरी पर स्थिर क्वांटम बिट एरर रेट पांच प्रतिशत से कम रहा। 

    ये Key बीआईएसएजी-एन के पोस्ट-क्वांटम प्लेटफॉर्म पर एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन के लिए इस्तेमाल की गईं. इसमें क्वांटम हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों शामिल थे ताकि कम्यूनिकेशन अधिक मजबूत हो. डॉ. विनय ठाकुर और सुनील गुप्ता जैसे अधिकारियों ने इसे क्वांटम-प्रतिरोधी नेटवर्क और उपग्रह लिंक की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया. यह दूरी भारत के पिछले फ्री-स्पेस रिकॉर्ड से दोगुनी है। 

    क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन कैसे काम करता है
    क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन एक ऐसी तकनीक है जिसमें जानकारी को क्वांटम कणों यानी फोटॉनों के जरिए भेजा जाता है. पारंपरिक तरीकों में हैकर्स बीच में बैठकर डेटा चुरा सकते हैं लेकिन क्वांटम सिस्टम में कोई भी छेड़छाड़ तुरंत पता चल जाती है क्योंकि क्वांटम अवस्था बदल जाती है। 

    इस परीक्षण में फ्री-स्पेस यानी हवा के माध्यम से सिग्नल भेजा गया जो फाइबर ऑप्टिक केबल से अलग है. कम एरर रेट से साबित हुआ कि यह तकनीक व्यावहारिक परिस्थितियों में भी काम कर सकती है. पोस्ट-क्वांटम प्लेटफॉर्म के साथ जोड़ने से भविष्य के क्वांटम कंप्यूटरों के हमलों से भी बचाव संभव होगा।  

    सामान्य जीवन में इसका उपयोग और फायदे
    सामान्य जीवन में यह तकनीक अभी सीधे घरों में नहीं आएगी लेकिन इसके प्रभाव धीरे-धीरे रोजमर्रा की सुरक्षा को मजबूत करेंगे. सबसे पहले बैंक और वित्तीय लेनदेन में इसका उपयोग हो सकता है. जब आप ऑनलाइन भुगतान करते हैं या नेट बैंकिंग करते हैं तो क्वांटम कुंजियां डेटा को इतना सुरक्षित बना देंगी कि कोई हैकर बीच में जानकारी नहीं चुरा सकेगा। 

    सरकारी सेवाओं जैसे आधार, पासपोर्ट या डिजिटल प्रमाणपत्रों के आदान-प्रदान में भी यह सुरक्षा बढ़ाएगी. स्वास्थ्य क्षेत्र में मरीजों के निजी मेडिकल रिकॉर्ड को अस्पतालों और डॉक्टरों के बीच सुरक्षित तरीके से भेजने में मदद मिलेगी. मोबाइल ऐप और क्लाउड स्टोरेज में व्यक्तिगत तस्वीरें, संदेश और दस्तावेज ज्यादा सुरक्षित रहेंगे। 

    भविष्य में जब उपग्रह आधारित क्वांटम नेटवर्क बनेगा तो दूरदराज के इलाकों में भी सुरक्षित इंटरनेट और संचार संभव होगा. स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स में ट्रैफिक सिस्टम, बिजली ग्रिड और निगरानी कैमरों का डेटा हैकिंग से बचाया जा सकेगा. कुल मिलाकर यह तकनीक आम आदमी के डिजिटल जीवन को अधिक भरोसेमंद बनाएगी भले ही वह सीधे दिखाई न दे। 

    राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के तहत भारत क्वांटम कंप्यूटिंग, संचार और सेंसिंग में आगे बढ़ना चाहता है. यह परीक्षण दिखाता है कि प्रयोगशाला से बाहर मैदान में भी तकनीक सफल हो सकती है. उपग्रह लिंक की बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भविष्य में देश भर में और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षित संचार के लिए उपग्रह जरूरी होंगे। 

    कम दूरी से शुरू करके धीरे-धीरे लंबी दूरी तय करने का यह तरीका सही दिशा में है. अधिकारियों की प्रशंसा से साफ है कि सरकार इस क्षेत्र को प्राथमिकता दे रही है. आने वाले वर्षों में ऐसे और परीक्षण होंगे जो व्यावसायिक उपयोग की ओर ले जाएंगे। 

    यह उपलब्धि सिर्फ वैज्ञानिक सफलता नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और डिजिटल आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम है. क्वांटम तकनीक पारंपरिक एन्क्रिप्शन की कमजोरियों को दूर कर सकती है. सामान्य जीवन में इसके फायदे धीरे-धीरे बैंकिंग, स्वास्थ्य, शिक्षा और सरकारी सेवाओं तक पहुंचेंगे. भारत जैसे देश के लिए जहां डिजिटल लेनदेन तेजी से बढ़ रहे हैं यह सुरक्षा परत बहुत जरूरी है. कुल मिलाकर 5.56 किलोमीटर का यह रिकॉर्ड भविष्य के सुरक्षित संचार नेटवर्क की नींव रखता है।