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  • हिमाचल पर मंडराया बड़ा खतरा! घेपन झील फटी तो मच सकती है भारी तबाही, सरकार लगाएगी अर्ली वार्निंग सिस्टम

    हिमाचल पर मंडराया बड़ा खतरा! घेपन झील फटी तो मच सकती है भारी तबाही, सरकार लगाएगी अर्ली वार्निंग सिस्टम

    केलांग.

    नेपाल में चीन अधिकृत तिब्बत की पहाड़ियों में ग्लेशियर फटने से आई बाढ़ के कारण जान माल का भारी नुकसान हुआ है. ऐसे में अब हिमाचल प्रदेश के जिला लाहौल-स्पीति प्रशासन ने 4070 मीटर की ऊंचाई पर घेपन ग्लेशियल झील को लेकर जिला प्रशासन सतर्क हो गया है और झील के पानी की निगरानी की जा रही है. अहम बात है कि इस झील का आकार बीते कुछ सालों में 173 फीसदी बढ़ गया है।
    जानकारी क अनुसार, अब झील के पास प्रशासन ने अर्ली वार्निंग सिस्टम लगा दिया है. डीसी लाहौल-स्पीति किरण भड़ाना ने बताया कि घेपन ग्लेशियल झील के जलस्तर और अन्य महत्वपूर्ण मानकों की निरंतर निगरानी की जा रही है औऱ सी-डैक, तिरुवनंतपुरम के जरिये झील पर अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया जाएगा. उन्होंने बताया कि यह प्रणाली सितंबर माह में स्थापित किए जाने का प्रस्ताव है ।

    उपायुक्त ने बताया कि सी-डैक की ओऱ से सिस्सू झील पर अर्ली वार्निंग सिस्टम का परीक्षण सफलतापूर्वक किया गया है. इस दौरान झील से संबंधित आवश्यक आंकड़े एवं सूचनाएं सफलतापूर्वक प्राप्त की गईं. उन्होंने कहा कि घेपन झील पर भी इसी तकनीक के माध्यम से निगरानी प्रणाली स्थापित करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है. यह प्रणाली स्थापित करने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) से अंतिम स्वीकृति आदेश अपेक्षित हैं।

    14 दिनों तक वैज्ञानिक अध्ययन करेगी विशेषज्ञ टीम
    किरण भड़ाना ने बताया कि घेपन ग्लेशियल झील से जुड़े संभावित जोखिमों का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन करने के लिए भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के पांच विशेषज्ञों की टीम 1 सितंबर, 2026 को झील क्षेत्र का दौरा करेगी. विशेषज्ञ टीम लगभग 14 दिनों तक क्षेत्र में रहकर झील एवं इसके आसपास के क्षेत्रों का विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षण करेगी. उन्होंने बताया कि विशेषज्ञ टीम की ओर से घेपन झील क्षेत्र की मैपिंग, हिमस्खलन एवं भूस्खलन की दृष्टि से संभावित संवेदनशील क्षेत्रों का सीमांकन, झील की गहराई, जल प्रवाह तथा मौसम संबंधी आंकड़ों का अध्ययन किया जाएगा. इस वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर तैयार विस्तृत रिपोर्ट राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को उपलब्ध करवाई जाएगी. डीसी उन्होंने यह भी बताया कि जिला प्रशासन की ओर से घेपन झील की वर्तमान स्थिति का प्रत्यक्ष अवलोकन करने के लिए सितंबर माह में एक अलग टीम भी झील क्षेत्र में भेजी जाएगी।

    इसरो ने किया था आगाह
    डीसी किरण भड़ाना ने बताया कि नवंबर 2023 में इसरो द्वारा विभिन्न माध्यमों से जिला प्रशासन को घेपन झील के बढ़ते आकार के संबंध में सूचित किया गया था. इसरो ने अवगत करवाया था कि झील का आकार सामान्य स्तर की तुलना में काफी बढ़ गया है तथा संभावित जोखिम को देखते हुए आवश्यक एहतियाती कदम उठाने की सलाह दी गई थी. उन्होंने बताया कि इसके बाद जुलाई 2024 में तत्कालीन उपायुक्त के नेतृत्व में विभिन्न विभागों के 23 अधिकारियों एवं कर्मचारियों की टीम ने 4070 मीटर की ऊंचाई पर स्थित घेपन झील का दौरा किया था. इस दौरान झील के संभावित रूप से फटने की स्थिति तथा उससे होने वाले संभावित नुकसान को कम करने के लिए आवश्यक उपायों पर विस्तृत अध्ययन किया गया और एक रिपोर्ट राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को प्रस्तुत की गई।

    झील फटने की स्थिति में नुकसान कम
    किरण भड़ाना ने कहा कि विशेषज्ञों की ओर से सुझाए गए उपायों को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है, जिला प्रशासन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी संभावित आपदा की स्थिति में जन-धन की हानि को न्यूनतम किया जा सके तथा प्रभावित क्षेत्रों में समय रहते बचाव एवं राहत कार्य शुरू किए जा सकें.
    उन्होंने बताया कि घेपन झील के संभावित फटने की स्थिति में सिस्सू से हिमाचल प्रदेश की अंतिम सीमा तक 34 स्थानों को संवेदनशील क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया है. इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की ओऱ से समय-समय पर आपदा से बचाव, त्वरित प्रतिक्रिया एवं आवश्यक सावधानियों के संबंध में जागरूक और प्रशिक्षित किया जा रहा है. इस प्रक्रिया में विभिन्न विभागों को भी शामिल किया जा रहा है, ताकि आपदा की स्थिति में प्रत्येक विभाग अपनी जिम्मेदारियों एवं भूमिका से पूरी तरह अवगत रहे ।

    उन्होंने बताया कि सिस्सू और शाशिन गांव में स्थानीय त्वरित प्रतिक्रिया दल का गठन भी किया गया है. इसके साथ ही आपदा जोखिम न्यूनीकरण से जुड़े कार्यों को और गति प्रदान करने के लिए राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण से अतिरिक्त वित्तीय सहयोग की मांग की गई है।

    32 संवेदनशील स्थानों पर होगी हाई फ्लड लेवल मार्किंग
    उपायुक्त ने बताया कि घेपन झील की दूरी सिस्सू से लगभग 11 किलोमीटर है, जबकि झील से उदयपुर होते हुए जिले की अंतिम सीमा तक की दूरी लगभग 90 किलोमीटर है. संभावित बाढ़ के प्रभाव को देखते हुए जिले के संवेदनशील क्षेत्रों में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के तहत हाई फ्लड लेवल मार्किंग का कार्य शुरू किया गया है. उन्होंने बताया कि एचएफएल मार्किंग का मुख्य उद्देश्य बाढ़ के संभावित स्तर को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ाना तथा आपदा जोखिम को कम करने के लिए जमीन पर एक स्पष्ट एवं स्थायी संदर्भ बिंदु उपलब्ध करवाना है. इसके लिए कुल 32 स्थानों की पहचान की गई है. उन्होंने कहा कि संवेदनशील स्थानों पर की जाने वाली मार्किंग से सामान्य एवं संभावित बाढ़ के स्तर का स्पष्ट संकेत मिलेगा. इससे नदी किनारे रहने वाले लोगों में बाढ़ के जोखिम को लेकर जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ आपदा की स्थिति में तैयारी एवं त्वरित प्रतिक्रिया को भी मजबूत किया जा सकेगा ।

    ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड की निगरानी के लिए विशेष समिति
    उपायुक्त ने बताया कि सभी एहतियाती उपायों के अतिरिक्त जिला स्तर पर एक ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) मॉनिटरिंग कमेटी का गठन किया जा रहा है. इसमें विभिन्न विभागों के अधिकारी तथा पर्वतारोहण एवं संबंधित क्षेत्र के अनुभवी लोग शामिल किए जाएंगे. यह समिति घेपन झील एवं इसके आसपास के क्षेत्र का समय-समय पर फील्ड निरीक्षण करेगी तथा संभावित जोखिमों, जिनमें आसपास की ढीली चट्टानें एवं अस्थिर भू-भाग सहित अन्य संभावित खतरे शामिल हैं, का आकलन करेगी. समिति जोखिम कम करने की रणनीतियों, आवश्यक शमन उपायों तथा आपदा की स्थिति में प्रभावी प्रतिक्रिया के लिए आवश्यक कार्ययोजना पर भी काम करेगी. उपायुक्त किरण भड़ाना ने कहा कि जिला प्रशासन वैज्ञानिक निगरानी, विशेषज्ञ अध्ययन, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, सामुदायिक प्रशिक्षण तथा विभागीय समन्वय के माध्यम से घेपन ग्लेशियल झील से जुड़े संभावित जोखिमों को कम करने के लिए निरंतर कार्य कर रहा है. उन्होंने कहा कि प्रशासन का प्राथमिक उद्देश्य संभावित आपदा से पहले प्रभावी तैयारी सुनिश्चित करना और किसी भी आपात स्थिति में लोगों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना है।

  • Flex Fuel गाड़ी खरीदने का सोच रहे हैं? पहले समझें E20, E85 और E100 का फर्क

    Flex Fuel गाड़ी खरीदने का सोच रहे हैं? पहले समझें E20, E85 और E100 का फर्क

    मुंबई 

    भारत में EV कंपनियां तेजी से बढ़ रही हैं लेकिन दूसरी तरफ पेट्रोल इंजन के लिए भी नए ऑप्शन तलाशे जा रहे हैं. कई कंपनियां अब भारत में E100 Flex Fuel वाहन लाने की तैयारी कर रही हैं. Maruti Suzuki Wagon R से लेकर Hyundai Creta तक Flex Fuel वर्जन में आ चुकी हैं। 

    अभी देश में पेट्रोल में Ethanol ब्लेंडिंग तेजी से बढ़ाई जा रही है. जहां एक तरफ लोग पेट्रोल में ज्यादा एथेनॉल मिलाने को लेकर सवाल उठा रहे हैं, वहीं सरकार और वाहन कंपनियां अब ऐसे इंजन तैयार करने की दिशा में बढ़ रही हैं, जो ज्यादा मात्रा में एथेनॉल वाले फ्यूल पर भी चल सकें. लेकिन आखिर Flex Fuel क्या है और E100 वाहन सामान्य पेट्रोल वाहन से कितने अलग होंगे?

    क्या होता है Flex Fuel?
    आसान भाषा में समझें तो Flex Fuel व्हीकल ऐसे वाहन होते हैं जो पेट्रोल और एथेनॉल के अलग-अलग मिक्स्चर वाले फ्यूल पर चल सकते हैं. ऐसे वाहन नॉर्मल पेट्रोल, E20, E85 और कुछ मामलों में E100 तक इस्तेमाल कर सकते हैं. फ्यूल में मौजूद एथेनॉल की मात्रा को E नंबर से बताया जाता है. उदाहरण के लिए E20 में 20 प्रतिशत Ethanol और 80 प्रतिशत पेट्रोल होता है. E85 में 85 प्रतिशत Ethanol होता है. इसी तरह E100 लगभग पूरी तरह एथेनॉल फ्यूल होता है। 

    हालांकि, E20 के लिए तैयार वाहन और E100 Flex Fuel वाहन एक जैसे नहीं होते हैं. E20 व्हीकल को एक निश्चित मात्रा में Ethanol वाले पेट्रोल के लिए तैयार किया जाता है, जबकि Flex Fuel वाहन को फ्यूल में Ethanol की अलग-अलग मात्रा के साथ काम करने के लिए डिजाइन करना पड़ता है. इसके लिए फ्यूल लाइन, सील्स, इंजेक्टर, फ्यूल पंप, सेंसर्स, इंजन मैपिंग और कैलिब्रेशन जैसे कई हिस्सों में बदलाव करने पड़ते हैं. वजह ये है कि Ethanol का बिहेव पेट्रोल से अलग होता है. ये अलग तरीके से जलता है और इसकी एनर्जी एफिशियंसी भी पेट्रोल से कम होती है। 

    E100 में सबसे बड़ा फायदा
    Ethanol का एक बड़ा फायदा इसका हाई ऑक्टेन रेटिंग है. हाई ऑक्टेन फ्यूल इंजन में नॉकिंग को बेहतर तरीके से रोकता है. इससे इंजीनियर ज्यादा प्रभावी इंग्निशन टाइमिंग और कुछ मामलों में ज्यादा कंप्रेशन रेश्यो का इस्तेमाल कर सकते हैं. यानी अगर इंजन को Ethanol के हिसाब से अच्छी तरह तैयार किया जाए, तो परफॉर्मेंस बेहतर हो सकती है. टर्बो चार्ज इंजन और परफॉर्मेंस कार में भी लंबे समय से Ethanol Blends के फायदे देखे जाते रहे हैं. लेकिन यहां एक बड़ी कमी भी है। 

    E100 वाहन के माइलेज पर हो सकता है असर
    Ethanol की एनर्जी डेंसिटी पेट्रोल से कम होती है. आसान भाषा में कहें तो एक लीटर Ethanol में एक लीटर पेट्रोल की तुलना में कम एनर्जी होती है. इसका मतलब है कि E100 वाहन को समान दूरी तय करने के लिए ज्यादा फ्यूल की जरूरत पड़ सकती है. इस वजह से केवल यह देखना काफी नहीं होगा कि Ethanol पेट्रोल से सस्ता है या नहीं. असली सवाल ये होगा कि प्रति किलोमीटर वाहन चलाने में कितना खर्च आता है। 

    अगर Ethanol की कीमत पेट्रोल से काफी कम रखी जाती है, तो ज्यादा फ्यूल कंजप्शन के बावजूद वाहन चलाना सस्ता पड़ सकता है. लेकिन अगर दोनों फ्यूल की कीमत में ज्यादा अंतर नहीं हुआ तो कम माइलेज के कारण ग्राहक को बार-बार तेल भरवाना पड़ सकता है। 

    E100 गाड़ी चलाने में कैसा लगेगा?
    रोजमर्रा की ड्राइविंग में E100 Flex Fuel वाहन सामान्य पेट्रोल वाहन से बहुत अलग महसूस नहीं होगा. मॉडर्न Flex Fuel वाहन में सेंसर्स और ECU मैपिंग फ्यूल में मौजूद Ethanol की मात्रा को पहचानकर फ्यूल सप्लाई और Ignition को अपने आप बदल सकते हैं. यानी ड्राइवर को हर बार फ्यूल भरवाते समय कोई अलग मोड चुनने या इंजन की सेटिंग बदलने की जरूरत नहीं होगी. एक्सलेरेशन सामान्य पेट्रोल वाहन जैसा हो सकता है.  लेकिन High-Ethanol फ्यूल पर माइलेज कम होना लगभग तय माना जा रहा है. इसलिए इसका असर सबसे ज्यादा फ्यूल कंजम्प्शन और हर महीने के खर्च में दिखाई देगा। 

    ठंड में स्टार्ट करना हो सकती है चुनौती
    Ethanol पेट्रोल की तरह आसानी से वेपोरॉइज नहीं होता है. ज्यादा एथेनॉल वाले फ्यूल में ठंड के मौसम में इंजन स्टार्ट करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है. भारत ठंडा देश नहीं है लेकिन उत्तर भारत के सर्द इलाकों और पहाड़ी क्षेत्रों में यह वाहन की कैलिब्रेशन के लिए चुनौती बन सकता है. कंपनियों को ये सुनिश्चित करना होगा कि अलग-अलग मौसम में वाहन आसानी से स्टार्ट हो। 

  • EPFO 3.0 से बदल सकता है PF सिस्टम, तेज क्लेम सेटलमेंट और ₹5 लाख तक निकासी की सुविधा

    EPFO 3.0 से बदल सकता है PF सिस्टम, तेज क्लेम सेटलमेंट और ₹5 लाख तक निकासी की सुविधा

     नई दिल्ली

    प्रोविडेंट फंड (PF) से पैसे निकालने वाले करोड़ों नौकरीपेशा कर्मचारियों के लिए बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) अपने मौजूदा सिस्टम को अपग्रेड कर EPFO 3.0 लाने की तैयारी में है. इसके तहत एडवांस क्लेम की प्रक्रिया को तेज और आसान बनाने पर फोकस किया जा रहा है। 

    रिपोर्ट्स के मुताबिक, बीमारी, शादी या घर खरीदने जैसी जरूरतों के लिए ₹5 लाख तक के एडवांस क्लेम 3 से 4 दिन में सेटल किए जा सकते हैं. हालांकि, इस प्रस्तावित सुविधा को लेकर EPFO की ओर से अंतिम आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है. इसलिए फिलहाल इसे संभावित बदलाव के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। 

    क्या है EPFO 3.0?

    EPFO 3.0 को मौजूदा आईटी सिस्टम का ज्यादा आधुनिक और सेंट्रलाइज्ड वर्जन माना जा रहा है. इसका मकसद PF से जुड़े कामकाज को ज्यादा तेज, आसान और सुविधाजनक बनाना है. मौजूदा व्यवस्था में EPFO का डेटा अलग-अलग रीजनल ऑफिस के सर्वर से जुड़ा हुआ है. इसकी वजह से कई बार पोर्टल पर तकनीकी दिक्कतें और सर्वर डाउन जैसी समस्याएं सामने आती हैं. नए सिस्टम में डेटा और प्रोसेसिंग को ज्यादा सेंट्रलाइज्ड और आधुनिक बनाने की योजना है. सीधे शब्दों में कहें तो EPFO चाहता है कि PF खाते से जुड़े काम बैंकिंग सेवाओं की तरह ज्यादा आसान और डिजिटल तरीके से किए जा सकें। 

    ऑटो सेटल होंगे ₹5 लाख तक के क्लेम?
    EPFO 3.0 में ऑटो-सेटलमेंट को और व्यापक बनाने की योजना बताई जा रही है. इसके तहत एडवांस क्लेम को सिस्टम खुद प्रोसेस कर सकता है. बीमारी, शादी और घर खरीदने जैसी जरूरतों से जुड़े क्लेम में अगर सभी जरूरी जानकारी और शर्तें पूरी होती हैं, तो कंप्यूटराइज्ड सिस्टम डेटा का वेरिफिकेशन कर सकता है. ऐसे मामलों में हर क्लेम को मैनुअली अप्रूव करने के लिए अधिकारी के हस्तक्षेप की जरूरत कम हो सकती है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, ₹5 लाख तक के एडवांस क्लेम को करीब 3 से 4 दिन में सेटल करने का लक्ष्य हो सकता है. क्लेम मंजूर होने के बाद पैसे सीधे कर्मचारी के बैंक खाते में ट्रांसफर किए जाएंगे। 

    क्लाउड-बेस्ड होगा नया EPFO सिस्टम
    EPFO 3.0 को क्लाउड-बेस्ड सिस्टम में अपग्रेड करने की तैयारी है. इसका मकसद मौजूदा तकनीकी समस्याओं को कम करना और पोर्टल की क्षमता व स्थिरता बढ़ाना है. अभी कई बार कर्मचारी PF से जुड़ा काम करने के लिए पोर्टल पर लॉगिन करते हैं, लेकिन सर्वर या वेबसाइट की तकनीकी समस्या के कारण उन्हें परेशानी होती है. नए सिस्टम से ऐसी दिक्कतों को कम करने और ऑनलाइन सेवाओं को ज्यादा सुचारू बनाने की उम्मीद है। 

    ATM और UPI से PF विड्रॉल की सुविधा?
    EPFO के डिजिटल बदलाव की चर्चा सिर्फ ऑनलाइन क्लेम तक सीमित नहीं है. भविष्य में PF खाते को आधुनिक बैंकिंग सिस्टम और UPI जैसे डिजिटल पेमेंट नेटवर्क से जोड़ने की योजना पर भी काम होने की बात सामने आई है. इसके तहत छोटे एडवांस या इमरजेंसी जरूरतों के लिए कर्मचारियों को लंबी प्रक्रिया से गुजरने की जरूरत कम हो सकती है. मेडिकल इमरजेंसी जैसी परिस्थितियों में तय सीमा तक ATM या UPI के जरिए PF से पैसे निकालने की सुविधा देने के विकल्प पर भी विचार किए जाने की बात कही जा रही है. हालांकि, यह सुविधा अभी लागू नहीं हुई है और इसके लिए आधिकारिक नियम व प्रक्रिया का इंतजार करना होगा। 

    EPFO 3.0 के लॉन्च में क्यों हो रही देरी?
    EPFO 3.0 की कुछ सुविधाओं को पहले जुलाई में लॉन्च किए जाने की चर्चा थी. हालांकि, वेबसाइट और सिस्टम से जुड़ी तकनीकी दिक्कतों के कारण लॉन्च टल गया. इसके बाद अगस्त में लॉन्च होने की संभावना जताई गई, लेकिन यह भी नहीं हो सका. अब सितंबर में इसके कुछ फीचर्स शुरू किए जाने की उम्मीद की जा रही है. हालांकि, जब तक EPFO की ओर से आधिकारिक घोषणा नहीं होती, तब तक लॉन्च की तारीख और सुविधाओं को लेकर अंतिम स्थिति स्पष्ट नहीं मानी जा सकती। 

  • लेट ट्रेन से जन्मा शानदार स्टार्टअप आइडिया, ऐप के लिए Google ने चुकाए ₹280 करोड़

    लेट ट्रेन से जन्मा शानदार स्टार्टअप आइडिया, ऐप के लिए Google ने चुकाए ₹280 करोड़

     नई दिल्ली

    कई बार रोजमर्रा की छोटी-सी परेशानी ही किसी बड़े आइडिया की शुरुआत बन जाती है. Where is My Train ऐप की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. ट्रेन के लेट होने और उसकी सही लोकेशन पता नहीं चलने की परेशानी से एक ऐसा ऐप बनाने का आइडिया आया, जो आज लाखों यात्रियों के काम आता है. आइए जानते हैं इसके बारे में। 

     जानिए कैसे बनाया गया ऐप
    अहमद निजाम और उनकी टीम ने ट्रेन से सफर करने वाले लोगों की इसी परेशानी को समझा. रेलवे स्टेशन पर यात्रियों को अक्सर यह पता नहीं होता था कि ट्रेन कहां पहुंची है और स्टेशन पर आने में उसे कितना समय लगेगा. ट्रेन लेट होने पर यह परेशानी और भी बढ़ जाती थी। 

    इसी समस्या को हल करने के लिए टीम ने व्हेयर इज़ माई ट्रेन ऐप तैयार किया. इसे साल 2015 में लॉन्च किया गया था. ऐप का मकसद काफी आसान था. यात्रियों को उनकी ट्रेन की सही लोकेशन और दूसरी जरूरी जानकारी एक ही जगह पर मिल सके। 

    ऐप का सबसे खास फीचर
    इस ऐप की सबसे खास बात इसका ऑफलाइन ट्रेन ट्रैकिंग फीचर था. यानी कई मामलों में यूजर बिना इंटरनेट और GPS के भी ट्रेन की लोकेशन पता कर सकता था. इसके लिए ऐप मोबाइल टावर से मिलने वाली जानकारी का इस्तेमाल करता था. भारत में ऐसे कई इलाके हैं, जहां इंटरनेट कनेक्शन कमजोर रहता है. ऐसे में यह फीचर यात्रियों के लिए काफी काम का साबित हुआ। 

    ऐप में सिर्फ ट्रेन की लोकेशन ही नहीं, बल्कि कई दूसरी सर्विस भी दी गईं. इसमें लाइव ट्रेन स्टेटस, ट्रेन का टाइमटेबल, PNR स्टेटस, प्लेटफॉर्म की जानकारी और कोच की स्थिति जैसी सुविधाएं शामिल थीं. यही वजह रही कि धीरे-धीरे यह ऐप यात्रियों के बीच काफी लोकप्रिय हो गया। 

    जानिए गूगल ने कैसे खरीदा
    ऐप की बढ़ती पॉपुलैरिटी ने Google का ध्यान अपनी तरफ खींचा. साल 2018 में गूगल ने व्हेयर इज़ माई ट्रेन बनाने वाली कंपनी Sigmoid Labs को खरीद लिया. इस डील की ऑफिशियल कीमत गूगल की तरफ से सार्वजनिक नहीं की गई थी. हालांकि, कई मीडिया रिपोर्ट्स में इस डील की कीमत करीब 280 करोड़ रुपये बताई गई। 

    इस पूरी कहानी की खास बात यह है कि शुरुआत किसी बड़ी कंपनी या बड़े निवेश से नहीं, बल्कि एक आम समस्या को हल करने के आइडिया से हुई थी. ट्रेन के लेट होने जैसी छोटी परेशानी से शुरू हुआ यह आइडिया आगे चलकर करोड़ों रुपये की डील तक पहुंच गया। 

    व्हेयर इज़ माई ट्रेन की कहानी यह बताती है कि अगर किसी रोजमर्रा की समस्या का आसान और काम का समाधान तैयार किया जाए, तो वह बड़ी संख्या में लोगों की जिंदगी आसान कर सकता है. यही वजह है कि यह ऐप ट्रेन से सफर करने वाले यात्रियों के लिए काफी उपयोगी साबित हुआ। 

  • अल नीनो का असर बढ़ा! रिकॉर्ड गर्मी के बाद सितंबर में भी कमजोर रह सकता है मॉनसून

    अल नीनो का असर बढ़ा! रिकॉर्ड गर्मी के बाद सितंबर में भी कमजोर रह सकता है मॉनसून

    नई दिल्ली

    मॉनसून की सुस्ती के साथ अल नीनो हावी होता जा रहा है. इसी का असर अगस्त में देखा गया, जब कम बारिश के कारण देश में अगस्त महीने की गर्मी 125 सालों में सबसे ज्यादा रही है. भारत मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक अगस्त महीने के दौरान औसत अधिकतम तापमान 1901 के बाद चौथा सबसे अधिक है, जो पिछले 125 साल में अगस्त का चौथा सबसे अधिक टेंपरेचर है. खासकर रात का तापमान ज्यादा परेशान कर रहा है. भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, आमतौर पर अगस्त मानसून का सबसे भीगा और ठंडा महीना होता है, लेकिन इस बार औसत तापमान 28.01 डिग्री दर्ज किया गया, जो सामान्य से लगभग 0.67 डिग्री अधिक है। 

    रात का तापमान बना सबसे बड़ा कारण
    अगस्त 2026 के इतना गर्म होने का कारण दोपहर की धूप नहीं बल्कि सूरज ढलने के बाद का मौसम रहा है. अगस्त में रात में औसत न्यूनतम तापमान 24.36 डिग्री दर्ज किया गया. यह 1901 के बाद अगस्त का सबसे अधिक रात का तापमान है.जबकि दिन का औसत अधिकतम तापमान 31.66 डिग्री रहा, जो रिकॉर्ड में चौथा सबसे अधिक रहा.पूर्व में बंगाल, झारखंड और पूर्वोत्तर इलाकों में रातों का तापमान रिकॉर्ड हाईलेवल पर पहुंच गया है। 

    सितंबर में भी मॉनसून सुस्त
    भारत मौसम विभाग का कहना है कि जून, जुलाई और अगस्त का ट्रेंड सितंबर में भी बना रहेगा.पूरे देश में औसत से कम बारिश का पूर्वानुमान है.सितंबर 2026 के दौरान पूरे देश में मासिक वर्षा सामान्य से कम (LPA 91%) के करीब रहने की संभावना है.इस साल दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के दौरान देशभर में मॉनसून कमजोर रहने से 4 जून से 31 अगस्त 2026 के बीच औसत से 14% कम बारिश हुई है। 

    मॉनसून की बारिश में भी असमानता
    अगस्त महीने में देश भर में मॉनसूनी बारिश की 16 फीसदी से अधिक की कमी दर्ज की गई. बारिश की कमी, कहीं कम और कहीं ज्यादा बारिश के कारण और असमान वितरण भी देखा गया. उत्तर प्रदेश में भी नोएडा, गाजियाबाद समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुकाबले अवध (लखनऊ-कानपुर आदि) और पूर्वांचल में अच्छी बारिश हुई. दिल्ली में अगस्त में ठीकठाक बारिश हुआ. हरियाणा में गुरुग्राम के आसपास इलाकों को छोड़कर कम बारिश हुई. राजस्थान में कम बारिश चिंता का सबब रही है। 

    प्रशांत महासागर में अल नीनो का असर
    प्रशांत महासागर अल नीनो को लेकर हालात लगातार मजबूत रहे हैं. प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान 3 डिग्री तक बढ़ने का खतरा है. ग्लोबल वार्मिंग और मजबूत अल नीनो के मॉनसून के दौरान तापमान रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकता है। 

    सितंबर में बारिश का अनुमान
    गंगा के मैदानी इलाकों वाले पश्चिम बंगाल और उससे सटे उत्तरी तटीय ओडिशा और उत्तर-पश्चिमी बंगाल की खाड़ी के ऊपर बने कम दबाव वाले क्षेत्र की वजह से भारत मौसम विभाग ने कई राज्यों में अगले कुछ दिन के दौरान भारी बारिश की चेतावनी जारी की है. छत्तीसगढ़ में सितंबर को ज्यादातर जगहों पर हल्की से मध्यम बारिश और कुछ जगहों पर भारी से बहुत भारी बारिश के साथ-साथ कहीं-कहीं बहुत ज्यादा भारी बारिश होने की संभावना है। 

    2 और 3 सितंबर, 2026 को कुछ जगहों पर भारी बारिश हो सकती है.पश्चिम बंगाल में भी ज्यादातर जगहों पर हल्की से मध्यम बारिश की संभावना है.ओडिशा, पूर्वी और पश्चिमी मध्य प्रदेश, झारखंड और बिहार में भी अगले 2 दिन अच्छी बारिश के आसार हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश में 2 से 6 सितंबर के दौरान कुछ जगहों पर भारी बारिश की संभावना है। 

  • रफ्तार और रेंज में ब्रह्मोस से आगे ‘प्रलय’, क्यों कहा जा रहा इसे भारत का नया ब्रह्मास्त्र?

    रफ्तार और रेंज में ब्रह्मोस से आगे ‘प्रलय’, क्यों कहा जा रहा इसे भारत का नया ब्रह्मास्त्र?

    मुंबई 

    भारत अपने डिफेंस सिस्‍टम को मॉडर्न वॉरफेयर के लिहाज से अपग्रेड कर रहा है. आर्मी, एयरफोर्स और नेवी को नई टेक्‍नोलॉजी से एडवांस किया जा रहा है. खासकर मिसाइल, फाइटर जेट और ड्रोन के सेगमेंट में हजारों करोड़ रुपये का निवेश किया जा रहा है. नेक्‍स्‍ट जेनरेशन का फाइटर जेट डेवलप करने के लिए AMCA प्रोजेक्‍ट लॉन्‍च किया गया है. इसके तहत पांचवीं के साथ ही छठी और उससे आगे की पीढ़ियों का लड़ाकू विमान डेवलप करने की योजना है. वहीं, मिसाइल डेवलपमेंट के क्षेत्र में भारत लगातार इतिहास रच रहा है. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने हिन्‍द महासागर में तकरीबन 3000 किलोमीटर के लिए NOTAM जारी किया है. डिफेंस एक्‍सपर्ट का मानना है कि लंबी से मध्‍यम दूरी तक मार करने वाली मिसाइल का परीक्षण किया जा सकता है. इस बीच, DRDO एक और योजना बना रहे है. इसके तहत लॉन्‍ग रेंज एंटी-शिप मिसाइल के रेंज को दोगुना से ज्‍यादा किया जाएगा। 

    दरअसल, भारत अपनी समुद्री सुरक्षा और लंबी दूरी की मारक क्षमता को और मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है. DRDO लॉन्ग रेंज एंटी-शिप मिसाइल (LR-AShM) के एक्‍सटेंडेड रेंज वाले वेरिएंट की संभावनाओं का अध्ययन कर रहा है, जिसकी मारक क्षमता करीब 3,500 किलोमीटर तक ले जाने का लक्ष्य हो सकता है. हालांकि, इसको लेकर कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है. मौजूदा LR-AShM 1,500 किलोमीटर तक मार करने में सक्षम है. ऐसे में इसकी रेंज को दोगुने से भी अधिक बढ़ाकर 3,500 किलोमीटर तक ले जाने से यह सिस्‍टम केवल कोस्‍टल सिक्‍योरिटी तक सीमित न रहकर हिंद महासागर क्षेत्र में दूर मौजूद नौसैनिक खतरों के खिलाफ एक रणनीतिक हथियार बन सकती है. इसका इस्तेमाल जमीन से तैनात लॉन्चरों के जरिए समुद्र में काफी दूर मौजूद वॉरशिप और अन्य नौसैनिक लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए किया जा सकेगा। 

    हाइपरसोनिक टेक्‍नोलॉजी बनेगी अहम आधार
    ‘डिफेंस डॉट इन’ की रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित एक्‍सटेंडेड रेंज वाला वेरिएंट मौजूदा LR-AShM की हाइपरसोनिक बूस्ट-ग्लाइड तकनीक पर आधारित हो सकता है. इस तकनीक में शुरुआती रॉकेट फेज मिसाइल को बेहद ऊंचाई और अत्यधिक गति तक पहुंचाते हैं. इसके बाद हाइपरसोनिक ग्लाइड व्‍हीकल अलग होकर वायुमंडल की ऊपरी परतों में एयरोडायनामिक लिफ्ट का इस्तेमाल करते हुए लंबी दूरी तय करता है. रिपोर्ट के मुताबिक, मिसाइल की गति करीब मैक-10 (तकरीबन 12348 किलोमीटर प्रति घंटा) तक पहुंचाने और हजारों किलोमीटर की यात्रा के दौरान उसे नियंत्रित रखने के लिए रॉकेट मोटर, ईंधन, एयरोडायनामिक डिजाइन और फ्लाइट पाथ में बड़े बदलाव की जरूरत होगी. केवल अतिरिक्त ईंधन जोड़कर 3,500 किलोमीटर की रेंज हासिल करना संभव नहीं होगा. इसके लिए प्रोपल्‍सन सिस्‍टम और स्टेजिंग को भी नए सिरे से विकसित करना पड़ सकता है। 

    LR-AShM बनाम ब्रह्मोस मिसाइल

     

    LR-AShM मिसाइल ब्रह्मोस मिसाइल
    मौजूदा क्षमता से दोगुनी से ज्यादा होगी रेंज: DRDO कथित तौर पर Long Range Anti-Ship Missile (LR-AShM) के एक एक्‍सटेंडेड वेरिएंट पर काम करने की संभावनाओं का अध्ययन कर रहा है, जिसकी मारक क्षमता 3,500 किलोमीटर तक हो सकती है. मौजूदा LR-AShM की बताई गई क्षमता करीब 1,500 किलोमीटर है. 3,500 किमी की रेंज हासिल होने पर यह प्रणाली तटीय रक्षा से आगे बढ़कर समुद्र में काफी दूर मौजूद नौसैनिक ठिकानों और युद्धपोतों के खिलाफ रणनीतिक क्षमता प्रदान कर सकती है. 800-900 KM तक मारक क्षमता: भारत के एक्‍सटेंडेड घरेलू ब्रह्मोस वेरिएंट की ऑपरेशनल रेंज करीब 800 से 900 किलोमीटर तक बताई जाती है. वहीं, निर्यात संस्करण की रेंज करीब 290 किमी और Su-30MKI से लॉन्च होने वाले संस्करण की क्षमता करीब 450-500 किमी बताई गई है.
    हाइपरसोनिक टेक्‍नोलॉजी: प्रस्तावित मिसाइल मौजूदा LR-AShM की हाइपरसोनिक boost-glide तकनीक को आगे बढ़ा सकती है. रॉकेट बूस्टर मिसाइल को बेहद ऊंचाई और करीब Mach 10 तक की गति देने के बाद अलग होगा, जिसके बाद हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन वायुमंडल की ऊपरी परतों में एयरोडायनामिक लिफ्ट का इस्तेमाल करते हुए लंबी दूरी तय करेगा. इतनी दूरी हासिल करने के लिए रॉकेट मोटर, ईंधन, मिसाइल की संरचना और उड़ान पथ में बड़े बदलाव की जरूरत होगी. दुनिया की सबसे तेज क्रूज मिसाइलों में शामिल: ब्रह्मोस करीब Mach 2.8 से Mach 3 की रफ्तार से लक्ष्य की ओर बढ़ सकती है. इसकी सुपरसोनिक स्पीड दुश्मन को प्रतिक्रिया के लिए बेहद कम समय देती है.
    2,000 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान बड़ी चुनौती: 3,500 किलोमीटर की उड़ान के दौरान हाइपरसोनिक गति बनाए रखना सबसे बड़ी तकनीकी चुनौतियों में से एक होगा. अत्यधिक गति पर वायुमंडलीय घर्षण से पैदा होने वाली गर्मी मिसाइल के बाहरी हिस्से का तापमान 2,000 डिग्री सेल्सियस से अधिक तक पहुंचा सकती है. ऐसे में DRDO को बेहतर heat shielding, उच्च तापमान सहने वाली सामग्री और अधिक एयरोडायनमिक डिजाइन विकसित करना होगा. तीनों सेनाओं के लिए अहम हथियार: ब्रह्मोस को जमीन, समुद्र और हवा से लॉन्च किया जा सकता है. भारतीय वायुसेना के Su-30MKI लड़ाकू विमान से भी इसका एयर-लॉन्च्ड वेरिएंट इस्तेमाल किया जाता है.
    NavIC और एडवांस नेविगेशन से सटीक निशाना साधने पर जोर: हजारों किलोमीटर दूर समुद्री लक्ष्य को सटीकता से निशाना बनाने के लिए बेहद एडवांस नेविगेशन सिस्‍टम जरूरी होगी. संभावित रूप से भारत के NavIC सैटेलाइट नेटवर्क के साथ मिसाइल के onboard sensors को जोड़ा जा सकता है. इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के दौरान सैटेलाइट सिग्नल बाधित होने की स्थिति में ring-laser या fibre-optic gyroscopes जैसे आंतरिक नेविगेशन सिस्टम मिसाइल को लक्ष्य तक पहुंचाने में मदद कर सकते हैं. 200-300 किलोग्राम तक वॉरहेड: मिसाइल में करीब 200 से 300 किलोग्राम का पेलोड ले जाने की क्षमता बताई जाती है. इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से पारंपरिक हमलों के लिए किया जाता है.
    समुद्र में भारत की A2/AD क्षमता को मिल सकता है बड़ा बढ़ावा: अगर 3,500 किलोमीटर क्षमता वाला संस्करण विकसित होता है तो भारत जमीन से लॉन्च होने वाली मिसाइल के जरिए समुद्र में बहुत दूर मौजूद दुश्मन के नौसैनिक बेड़े को निशाना बना सकेगा. इससे भारत की Anti-Access/Area-Denial (A2/AD) क्षमता मजबूत होगी और मेन लैंड एवं स्‍ट्रैटजिक आइलैंड जोन के आसपास एक व्यापक सुरक्षा कवच तैयार हो सकता है. हालांकि, 3,500 किलोमीटर की रेंज फिलहाल एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य है. दो चरणों वाला प्रोपल्शन सिस्टम: ब्रह्मोस में पहले चरण में सॉलिड-प्रोपेलेंट बूस्टर और इसके बाद लिक्विड रैमजेट इंजन काम करता है. यही तकनीक इसे लंबी दूरी तक तेज गति से लक्ष्य भेदने की क्षमता देती है.

    2,000 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा टेम्‍प्रेचर चुनौती

    हाइपरसोनिक स्‍पीड से लंबी दूरी तय करने में सबसे बड़ी तकनीकी चुनौतियों में से एक अत्यधिक तापमान होगा. लंबे समय तक ऐसी गति पर उड़ान भरने से मिसाइल की बाहरी सतह पर तापमान 2,000 डिग्री सेल्सियस से अधिक पहुंच सकता है. ऐसे में DRDO को बेहतर हीट शील्डिंग, अधिक मजबूत स्‍ट्रक्‍चरल मैटेरियल और बेहतर एयरोडायनामिक डिजाइन पर काम करना होगा. इसके अलावा 3,500 किलोमीटर जैसी दूरी पर सटीक निशाना साधने के लिए अत्यंत विश्वसनीय नेविगेशन सिस्‍टम जरूरी होगी. ऐसे में स्वदेशी NavIC सैटेलाइट नेविगेशन सिस्‍टम को मिसाइल के गाइडेंस में शामिल किए जाने की संभावना है। 

    इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और प्रीसीजन अटैक

    भविष्य की ऐसी मिसाइल को दुश्मन की इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर कैपेबिलिटी के बीच भी काम करने में सक्षम होना होगा. सैटेलाइट सिग्नल बाधित होने की स्थिति में आंतरिक नेविगेशन सेंसर, जैसे फाइबर ऑप्टिक या रिंग-लेजर जाइरोस्कोप, मिसाइल को रास्ते पर बनाए रखने में अहम भूमिका निभा सकते हैं. यदि 3,500 किलोमीटर क्षमता वाली LR-AShM विकसित होती है तो इससे भारत की समुद्री रणनीति को बड़ा फायदा मिल सकता है. जमीन से ही इतनी लंबी दूरी तक नौसैनिक लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता भारत को एक व्यापक एंटी-एक्सेस/एरिया-डिनायल (A2/AD) क्षमता देगी. इससे भारतीय मेनलैंड और आइलैंड एरिया के आसपास दुश्मन के युद्धपोतों के लिए जोखिम बढ़ जाएगा। 

    यह क्षमता ब्रह्मोस जैसी मौजूदा मिसाइल प्रणालियों का स्थान लेने के बजाय उनकी पूरक हो सकती है. ब्रह्मोस अपेक्षाकृत कम दूरी पर तेज और प्रभावी हमला करने की क्षमता देता है, जबकि लंबी दूरी का हाइपरसोनिक बूस्ट-ग्लाइड हथियार दूर समुद्र में मौजूद लक्ष्यों के खिलाफ अलग स्तर की क्षमता प्रदान करेगा. फिलहाल 3,500 किलोमीटर की रेंज को आधिकारिक रूप से स्वीकृत सैन्य क्षमता नहीं माना जा सकता. इसे हासिल करने के लिए कई वर्षों के डिजाइन, तकनीकी विकास, परीक्षण और मूल्यांकन की जरूरत होगी. यदि DRDO इस लक्ष्य को सफलतापूर्वक हासिल करता है, तो यह भारत की लंबी दूरी की मिसाइल और समुद्री युद्ध क्षमता में एक महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि होगी। 

  • महाराष्ट्र की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 2.06 करोड़ नाम गायब, जानें नाम वापस जुड़वाने की पूरी प्रक्रिया

    महाराष्ट्र की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 2.06 करोड़ नाम गायब, जानें नाम वापस जुड़वाने की पूरी प्रक्रिया

    मुंबई 

    महाराष्ट्र में स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रोसेस के तहत जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 2.06 करोड़ लोगों के नाम हटा दिए गए हैं। ये लोग पिछली वोटर लिस्ट में शामिल कुल मतदाताओं का लगभग 21.14 प्रतिशत थे। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) ने सोमवार 31 अगस्त को यह जानकारी दी। राज्य के चुनाव अधिकारियों के अनुसार, मौजूदा ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में 7.71 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम शामिल हैं। इनमें 3.95 करोड़ पुरुष, 3.75 करोड़ महिलाएं और 3,087 थर्ड जेंडर (अन्य लिंग) के मतदाता शामिल हैं।

    मुंबई में मतदाताओं की संख्या में लगभग 36.1 लाख की कमी आई है। यानी करीब 35 फीसदी वोटर ड्राफ्ट लिस्ट से बाहर हो गए हैं। महाराष्ट्र की पिछली वोटर लिस्ट में जून तक करीब 9.8 करोड़ मतदाता दर्ज थे। जबकि SIR के बाद जारी ड्राफ्ट लिस्ट में यह संख्या घटकर लगभग 7.7 करोड़ रह गई है। यानी आंकड़ों के हिसाब से करीब 21.1 फीसदी की कमी आई है।

    हालांकि, चुनाव अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि ड्राफ्ट सूची से नाम बाहर होने का मतलब यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति का नाम हमेशा के लिए वोटर लिस्ट से हट गया है। ऐसे लोगों को 30 सितंबर तक अपना दावा और आपत्ति दाखिल करने का मौका दिया गया है।

    क्यों हटाए गए नाम?
    अधिकारियों ने बताया कि 2,06,88,487 मतदाताओं के नाम इसलिए हटाए गए क्योंकि उनके एन्यूमरेशन फॉर्म (गणना फर्म) जमा नहीं हो पाए। उनसे संपर्क नहीं हो सका। शायद उनकी मृत्यु हो गई थी। या उन्होंने अपना निवास स्थान बदल लिया था। SIR प्रोसेस से पहले महाराष्ट्र में 9.78 करोड़ मतदाता रजिस्टर्ड थे।

    इनमें से 78.86 प्रतिशत को ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में शामिल किया गया है। अधिकारियों ने बताया कि सबसे ज्यादा फॉर्म 28.6 लाख पुणे में जमा नहीं हो पाए। इसके बाद ठाणे (28.5 लाख), मुंबई उपनगर (26.5 लाख), नागपुर (14.43 लाख), नासिक (10.27 लाख) और मुंबई शहर (9.5 लाख) का नंबर आता है।

    मुंबई में 36.1 लाख मतदाता कम
    SIR के बाद मुंबई के मतदाता आंकड़ों में भी बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, मुंबई में करीब 36.1 लाख मतदाता कम हुए हैं, जो पिछली लिस्ट की तुलना में लगभग 35 फीसदी है। यह कमी कई कारणों से हुई है। मतदाता गणना के दौरान जिन लोगों के फॉर्म उपलब्ध नहीं हो सके या जिनके बारे में जानकारी नहीं मिली, उन्हें विभिन्न कैटेगरी में रखा गया।

    17 लाख डुप्लीकेट नामों का भी मामला
    मुख्य निर्वाचन अधिकारी एस. चोक्कलिंगम के अनुसार, करीब 17 लाख डुप्लीकेट मतदाताओं के नाम एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में दर्ज पाए गए थे। इन नामों को एक साथ मिलाकर हटाया गया है। इसलिए इन्हें पूरी तरह से 'फर्जी' या 'डुप्लीकेट मतदाता' मानना सही नहीं होगा। यानी एक ही व्यक्ति का नाम अगर एक से अधिक जगह दर्ज था। उसे एक निर्वाचन क्षेत्र में बरकरार रखते हुए दूसरे स्थान से हटाया गया, तो इससे कुल मतदाता संख्या में कमी दिखाई देती है।

    30 सितंबर तक वापस जुड़ सकता है नाम
    ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से नाम बाहर होने वाले मतदाताओं के लिए यह आखिरी मौका नहीं है। वे 30 सितंबर तक दावा और आपत्ति दाखिल कर सकते हैं। अगर किसी पात्र मतदाता का नाम ड्राफ्ट लिस्ट में नहीं है तो उसे अपने क्षेत्र के संबंधित चुनाव अधिकारी या BLO से संपर्क करके अपना दावा पेश करना होगा। जरूरी प्रक्रिया और दस्तावेज पूरे करने के बाद नाम को वोटर लिस्ट में शामिल कराने का अवसर मिलेगा।

    18 साल के होने वाले युवाओं को भी मौका
    इस प्रक्रिया में पहली बार वोटर बनने वाले युवाओं के लिए भी महत्वपूर्ण अवसर है। जो युवा 1 अक्टूबर से पहले 18 वर्ष की उम्र पूरी कर रहे हैं, वे भी इस अवधि के दौरान मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं। इससे पहली बार मतदान करने वाले पात्र युवाओं को भी आगामी चुनावी प्रक्रिया में शामिल होने का रास्ता मिलेगा।

    ऑनलाइन ऐसे चेक करें अपना नाम
    वोटर ड्राफ्ट लिस्ट में अपना नाम देखने के लिए नागरिक ECI के वोटर पोर्टल और महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट का इस्तेमाल कर सकते हैं। वोटर अपने EPIC नंबर के जरिए भी नाम और संबंधित डिटेल्स की जांच कर सकते हैं। इसके अलावा जिला निर्वाचन अधिकारियों के स्तर पर भी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट उपलब्ध कराई गई है।

    नाम नहीं है तो कौन सा फॉर्म भरना होगा?
    ड्राफ्ट लिस्ट में नाम नहीं होने पर पात्र व्यक्ति Form 6 के जरिए वोटर लिस्ट में नाम शामिल कराने के लिए आवेदन कर सकता है। यानी जिन लोगों का नाम SIR के दौरान ड्राफ्ट लिस्ट से बाहर हो गया है, उनके पास अभी दावा दाखिल कर अपना नाम वापस सूची में शामिल कराने का अवसर मौजूद है।

        नाम जोड़ने के लिए: Form 6
        मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए: Form 7
        एड्रेस या अन्य डिटेल्स में सुधार के लिए: Form 8

    ड्राफ्ट लिस्ट को अंतिम सूची न समझें
    महाराष्ट्र में मतदाता संख्या में इतनी बड़ी गिरावट के बाद सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह ड्राफ्ट मतदाता सूची है। यह फाइनल लिस्ट नहीं। जिन लोगों के नाम इसमें नहीं हैं, वे 30 सितंबर तक दावा और आपत्ति दाखिल कर सकते हैं। इसलिए महाराष्ट्र और खासकर मुंबई के मतदाताओं के लिए जरूरी है कि वे अपना नाम अभी चेक करें। अगर नाम गायब है या डिटेल्स में कोई गलती है, तो तय समय सीमा के भीतर आवेदन कर सुधार या नाम शामिल कराने की प्रक्रिया पूरी करें।

    आखिर 2.07 करोड़ नाम इस लिस्ट में क्यों आए?

    चुनाव आयोग ने इस आंकड़े का पूरा हिसाब भी जनता के सामने रखा है:

        76.80 लाख वोटर ऐसे हैं जो परमानेंटली कहीं और शिफ्ट हो चुके हैं (ठोस जानकारी मिलने के बाद).
        75.52 लाख लोग वेरिफिकेशन के दौरान घर पर मिले ही नहीं या उनका पता नहीं चल पाया.
        34.81 लाख वोटरों का निधन हो चुका है (सर्टिफिकेट या परिवार की रिपोर्ट के आधार पर).
        17.63 लाख नाम डुप्लीकेट हैं या वो किसी और इलाके में भी रजिस्टर्ड हैं.
        2.23 लाख वोटर अन्य कारणों से इस लिस्ट में हैं.

    शहरों की भागदौड़ और असली वोटरों की परेशानी
    चुनाव आयोग खुद यह मानता है कि इस ड्राफ्ट में 100% सटीकता का दावा नहीं किया जा सकता. इसकी एक बड़ी वजह ग्राउंड रियलिटी है. नियम के मुताबिक, बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) को घर-घर जाकर चेक करना होता है. अगर कोई नहीं मिलता, तो उन्हें तीन बार तक जाना पड़ता है। 

    शहरी इलाकों में ज्यादातर लोग नौकरी-पेशा हैं और रात 7-8 बजे के बाद ही घर लौटते हैं. वहीं, वेरिफिकेशन करने वाली ज्यादातर BLO महिलाएं होती हैं, जिनके लिए देर रात तक काम करना संभव नहीं होता. ऐसे में जो लोग दिन में घर पर नहीं मिलते, उन्हें 'अनुपस्थित' मान लिया जाता है. अधिकारियों का मानना है कि इस वजह से कई असली वोटरों के नाम भी गलती से इस 'अनकलेक्टेड' कैटेगरी में चले गए होंगे। 

    अब आपको क्या करना है?
    मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने याद दिलाया है कि यह सिर्फ एक ड्राफ्ट है, फाइनल लिस्ट नहीं. फाइनल वोटर लिस्ट आने से पहले दावों और आपत्तियों की पूरी प्रक्रिया चलेगी। 

    लिस्ट चेक करने के लिए आप अपने जिले के कलेक्टर की वेबसाइट पर जा सकते हैं. इसके अलावा राजनीतिक दलों के बूथ-लेवल एजेंटों को भी इसकी कॉपियां दी गई हैं. यह सिर्फ अधिकारियों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि हर वोटर का फर्ज है कि वो अपना नाम चेक करे. तो देर किस बात की? आज ही चेक करें कि वोटर लिस्ट में आपका नाम सुरक्षित है या नहीं!

  • PM मोदी का जिनपिंग-पुतिन से हैंडशेक, शहबाज शरीफ के चुपचाप गुजरने का वीडियो चर्चा में

    PM मोदी का जिनपिंग-पुतिन से हैंडशेक, शहबाज शरीफ के चुपचाप गुजरने का वीडियो चर्चा में

     नई दिल्ली

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस वक्त किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में हैं. वह शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ के शिखर सम्मेलन में शामिल हुए. सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ समेत संगठन के कई नेता पहुंचे. इसी दौरान एक ऐसा पल सामने आया, जिसमें पीएम मोदी ने जिनपिंग और पुतिन से एक साथ गर्मजोशी से मुलाकात की, जबकि शहबाज शरीफ उनके बगल से चुपचाप गुजरते नजर आए। 

    दरअसल, एससीओ के सभी नेता एक साथ जुट रहे थे. इसी दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक साथ सामने से आते दिखाई दिए. सामने पहुंचते ही शी जिनपिंग ने पीएम मोदी की तरफ हाथ बढ़ाया और दोनों नेताओं ने हैंडशेक किया. इसी दौरान पीएम मोदी ने पुतिन के हाथ पर भी गर्मजोशी से हाथ रखा. कुछ सेकेंड के इस पल में पीएम मोदी, जिनपिंग और पुतिन तीनों एक साथ नजर आए। 

    इसके बाद शी जिनपिंग आगे बढ़कर मंच की तरफ चले गए. लेकिन पीएम मोदी और पुतिन की बातचीत कुछ देर और जारी रही. दोनों नेता एक-दूसरे से गप-शप करते दिखाई दिए. इसके बाद पुतिन एक करीबी दोस्त की तरह पीएम मोदी को मंच तक ले जाते नजर आए. इस दौरान उन्होंने पीएम मोदी की पीठ पर हाथ भी रखा. मंच तक पहुंचने के बाद पुतिन अपने स्थान की तरफ बढ़ गए। 

    इसी दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी अपने स्थान की तरफ जाते दिखाई दिए. वीडियो में वह पीएम मोदी, जिनपिंग और पुतिन के पास से शांत तरीके से आगे बढ़ते नजर आते हैं. जब तीनों नेताओं के आसपास लोगों की भीड़ जुटी थी, उस वक्त शहबाज शरीफ उनके पीछे से आगे बढ़ते दिखाई दिए। 

    जिनपिंग के साथ मिलाया हाथ 
    इस घटना से जुड़ी अंदर की भी तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं, जिसमें वो जिनपिंग के साथ एक दोस्ताना अंदाज में नजर आ रहे हैं और दोनों नेता हाथ मिलाते हुए साफ-साफ दिख रहे हैं। 

    पुतिन-मोदी की मुलाकात रही सुर्खियों में 
    इससे पहले सोमवार को पीएम मोदी ने यहीं पर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी मुलाकात थी. यहां पर दोनों देशों के नेताओं ने एक दूसरे को शुभकामना दी और आने वाले ब्रिक्स सम्मेलन में पुतिन ने पहुंचने की बात भी कही. इसके अलावा भारत-रूस के सालाना समिट में भी एक बार फिर पीएम मोदी और पुतिन की मुलाकात होने वाली है. इन सबके साथ ही प्रधानमंत्री ने रूसी राष्ट्रपति से यूक्रेन युद्ध को लेकर भी चर्चा की और कहा कि मानवता के हित में युद्ध का अंत होना चाहिए। 

    एससीओ सम्मेलन से पीएम मोदी ने नेताओं के साथ अपनी तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर शेयर कीं. इन तस्वीरों में शहबाज शरीफ रूसी राष्ट्रपति पुतिन के बगल में खड़े दिखाई दिए. वहीं पीएम मोदी दूसरी तस्वीर में पुतिन के दोस्त और बेलारूस के राष्ट्रपति एलेक्जेंडर लुकाशेंको और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान के बीच खड़े नजर आए। 

    बिश्केक में सामने आया यह पूरा दिलचस्प वाकया इसलिए भी दिलचस्प रहा क्योंकि एक ही मंच पर पीएम मोदी, जिनपिंग और पुतिन की मौजूदगी पर ग्लोबल मीडिया की नजर रही. वहीं, इसी दौरान शहबाज शरीफ का चुपचाप आगे बढ़ते हुए दिखना वीडियो का अलग ही हिस्सा बन गया। 

  • सिंधु जल संधि पर हेग कोर्ट को भारत ने क्यों ‘अवैध’ बताया? जानें फैसले के खिलाफ क्या है पूरा तर्क

    सिंधु जल संधि पर हेग कोर्ट को भारत ने क्यों ‘अवैध’ बताया? जानें फैसले के खिलाफ क्या है पूरा तर्क

    नई दिल्ली
     भारत के निजी मामले में दखलअंदाजी करने की कोशिश कर रही अंतरराष्ट्रीय संस्था को भारत ने उसकी हैसियत याद दिला दी। इस संस्था ने सिंधु समझौते पर पाकिस्तान के पक्ष में फैसला दिया था। संस्था को लगा कि इससे भारत के ऊपर दबाव बनेगा, लेकिन भारत ने उस अंतरराष्ट्रीय संस्था को सीधे ठेंगा दिखा दिया और उसके किसी भी आदेश को मानने से साफ मना कर दिया। इस संस्था का नाम ' कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ' (CoA) है और इसका ऑफिस नीदरलैंड के सुंदर और बेहद अहम शहर द हेग में है।

    संस्था को ही बता दिया गैर कानूनी
    भारत ने सोमवार को 'कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन' के फैसले को मानने से मना कर दिया। संस्था का फैसला सिंधु जल संधि से जुड़ा था। इतना ही नहीं भारत ने कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन 'गैर-कानूनी तरीके से गठित तक बता दिया और कहा कि संस्था के फैसले का भारत के संप्रभु फैसलों पर कोई असर नहीं पड़ता। विदेश मंत्रालय (MEA) ने एक बयान में कहा कि 'कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन' का गठन वर्ल्ड बैंक ने किया था। ये पाकिस्तान के साथ भारत की 1960 की संधि की शर्तों का साफ तौर पर उल्लंघन था।

    कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन का निर्देश खारिज
    इन घटनाक्रमों से साफ है कि सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद फिर बढ़ गया। दरअसल, हेग स्थित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने कहा था कि भारत सिंधु जल संधि को एकतरफा तौर पर न तो रोक सकता है और न ही खत्म कर सकता है। भारत ने इस फैसले को सीधे तौर पर खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत ने इस कोर्ट को कभी मान्यता नहीं दी है। इसलिए भारत न तो इसकी कार्यवाही में शामिल हुआ और न ही इसके पहले दिए गए किसी फैसले को स्वीकार किया है।

    सिंधु जल संधि अस्थायी तौर पर स्थगित
    भारतीय विदेश मंत्रालय के मुताबिक कोर्ट का मौजूदा या भविष्य में आने वाला कोई भी फैसला भारत की ओर से चलाए जा रहे प्रोजेक्ट या उसके फैसलों पर असर नहीं डालेगा। विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि भारत का सिंधु जल संधि को अबेयंस में रखने का फैसला लागू है। यानी भारत ने संधि के तहत अपनी जिम्मेदारियों को फिलहाल रोक रखा है। मंत्रालय ने कहा कि भारत अपने इस फैसले पर कायम है। दरअसल, अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित करने का फैसला लिया था। भारत का कहना रहा है कि पाकिस्तान के साथ सामान्य संबंधों के लिए आतंकवाद और पानी के मुद्दे को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।

    अदालत ने रतले प्रोजेक्ट पर भी टिप्पणी की
    मध्यस्थता अदालत ने जम्मू-कश्मीर में बन रहे रतले जलविद्युत संयंत्र से जुड़े कुछ निर्माण कार्यों पर अस्थायी रोक लगाने का निर्देश भी दिया है। अदालत का कहना है कि सिंधु जल संधि के तहत किसी एक देश को अपने स्तर पर संधि को रोकने, निलंबित करने या खत्म करने का अधिकार नहीं है।

    वहीं भारत इस पूरे निष्कर्ष को मानने से इनकार कर रहा है। भारत का तर्क है कि जिस संस्था के अधिकार क्षेत्र को ही वह स्वीकार नहीं करता, उसके फैसले उसके लिए बाध्यकारी नहीं हो सकते।

    सिंधु जल संधि: आखिर विवाद है किस बात पर?
    भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि 1960 में हुई थी। इसके तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर दोनों देशों के अधिकार और जिम्मेदारियां तय की गई थीं।

    हाल के वर्षों में इस संधि को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा है। भारत ने संधि को स्थगित रखने का फैसला लिया है जबकि पाकिस्तान लगातार संधि को लागू रखने की मांग करता रहा है। इसी विवाद के बीच पाकिस्तान की पहल पर मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू हुई। भारत ने इस प्रक्रिया में शामिल होने से इनकार किया और अपनी अलग आपत्तियां दर्ज कराईं।

    भारत का रुख साफ: संधि पर हमारा फैसला कायम
    विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में दोहराया कि भारत इस तथाकथित मध्यस्थता संस्था के किसी भी फैसले को मान्यता नहीं देता।

    भारत के मुताबिक, इस संस्था का गठन ही संधि के प्रावधानों के खिलाफ है। इसलिए उसके द्वारा सुनाया गया कोई भी फैसला भारत के लिए बाध्यकारी नहीं है। इस तरह सिंधु जल संधि को लेकर अब दो बिल्कुल अलग दावे सामने हैं। हेग की मध्यस्थता अदालत संधि को लागू मान रही है जबकि भारत अदालत के अधिकार क्षेत्र और उसके फैसले- दोनों को ही खारिज कर रहा है।

    इस विवाद का असर भारत-पाकिस्तान के बीच पानी के बंटवारे के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर में चल रही जलविद्युत परियोजनाओं पर भी देखने को मिल सकता है।
    सिंधु जल संधि: भारत को पाकिस्तान से दोबारा बातचीत की जरूरत क्यों पड़ी? 

    समझिए विवाद की पूरी कहानी
    भारत ने पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को ‘स्थगित’ (In Abeyance) रखने का फैसला अभी तक बरकरार रखा है। पिछले कुछ हफ्तों में पाकिस्तान की ओर से कई तीखी और राजनीतिक बयानबाज़ियां सामने आई हैं। पाकिस्तान ने पिछले महीने इस संधि पर एक तथाकथित ‘अंतरराष्ट्रीय’ कॉन्फ्रेंस भी आयोजित की। इसमें वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों और प्रमुख नेताओं ने चेतावनी दी कि अगर सिंधु नदी बेसिन की नदियों के जल प्रवाह में किसी तरह की रुकावट डाली गई तो इसके गंभीर परिणाम होंगे और युद्ध जैसी हालात भी पैदा हो सकते हैं।

    आर्बिट्रेशन कोर्ट ने बयान में क्या कहा था?
    कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने सोमवार को जारी अपने बयान में कहा था कि भारत ने जिस आधार पर संधि को स्थगित किया है, वह संधि को रोकने या खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने कहा कि सिंधु जल संधि अभी भी पूरी तरह लागू है और भारत को संधि के तहत अपनी जिम्मेदारियां निभानी चाहिए। भारत ने इस दावे को भी स्वीकार नहीं किया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि यह कोर्ट जिस तरह से बनाया गया है, वह खुद सिंधु जल संधि की शर्तों का उल्लंघन है। इसलिए भारत के लिए इसके फैसले की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है।

    पाकिस्तान संधि लागू करने की लगा रहा गुहार
    भारत का कहना है कि कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के पास इन मामलों में अधिकार क्षेत्र ही नहीं है। वहीं पाकिस्तान संधि को लागू रखने और भारत पर उसकी शर्तों का पालन कराने की मांग करता रहा है। इस ताजा फैसले के बाद भी भारत ने साफ कर दिया है कि वह इस कोर्ट की बात नहीं मानेगा और सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का उसका फैसला जारी रहेगा।

  • NCLT का नया फैसला, सुभाष चंद्रा की राहत पर ब्रेक; पुराने आदेश को किया स्थगित

    NCLT का नया फैसला, सुभाष चंद्रा की राहत पर ब्रेक; पुराने आदेश को किया स्थगित

    नई दिल्ली

    जी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा की निजी दिवालिया प्रक्रिया से जुड़े मामले में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने 25 अगस्त को दिए गए फैसले पर रोक लगा दी है। NCLT की पांच सदस्यीय पीठ ने कहा कि पिछले फैसले को लेकर स्पष्ट बहुमत नहीं बन पाया था। अब मामले की नए सिरे से सुनवाई होगी।पीठ ने इस मामले से जुड़े सभी पक्षों को नोटिस जारी किया है। साथ ही सुभाष चंद्रा को किसी भी संपत्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दूसरे के नाम करने या उससे अलग करने से भी रोक दिया गया है।

    NCLT की 5 सदस्यीय बेंच का फैसला
    राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) ने एस्सेल समूह के चेयरमैन सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवाला मामले में पुनर्भुगतान योजना पर फैसला करने के लिए पांच सदस्यीय पीठ का गठन किया। यह मामला 22,000 करोड़ रुपये से अधिक के दावों से जुड़ा है।

    दो सदस्यीय पीठ के बहुमत के फैसले पर नहीं पहुंच पाने के बाद यह कदम उठाया गया। दो सदस्यीय पीठ ने तीसरे न्यायाधीश को मामला भेजे जाने के बावजूद प्रस्तावित 6.5 करोड़ रुपये की पुनर्भुगतान योजना पर बहुमत से सहमति नहीं बन पाने के बाद एस्सेल समूह के चेयरमैन के खिलाफ व्यक्तिगत दिवाला मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए न्यायाधिकरण के अध्यक्ष के पास भेज दिया था।

    बता दें कि चार साल से चल रहे मामले को मूल पीठ के दोनों सदस्यों के बीच मतभेद के बाद इसे तीसरे सदस्य नीलेश शर्मा के पास भेजा गया था। शर्मा ने 25 अगस्त को 144 पन्नों के अपने आदेश में करीब 22,006.57 करोड़ रुपये के ऋणदाताओं के दावों के मुकाबले चंद्रा की व्यक्तिगत दिवाला समाधान योजना के तहत 6.5 करोड़ रुपये के भुगतान को मंजूरी दी थी।

    तीन सदस्यीय पीठ के फैसले में मतभेद
    मामले की सुनवाई कर रही तीन सदस्यीय पीठ के सदस्यों के बीच आदेश को लेकर मतभेद सामने आए। इसके बाद मामले को NCLT की पांच सदस्यीय विशेष पीठ के सामने भेजा गया। मंगलवार को स्पेशल बेंच ने मामले की सुनवाई शुरू की। पीठ ने कहा कि पहले दिए गए आदेशों में मतभेद थे और किसी स्पष्ट बहुमत की राय सामने नहीं आई थी, जिसे लागू किया जा सके।

    इसी आधार पर स्पेशल बेंच ने पुराने आदेश पर रोक लगा दी। NCLT ने मामले से जुड़े सभी पक्षों को नोटिस भी जारी किया है। साथ ही सुभाष चंद्रा को अपनी संपत्तियों को किसी भी तरह से ट्रांसफर करने से रोकने का निर्देश दिया गया है। यह रोक सीधे तौर पर किए जाने वाले ट्रांसफर के साथ-साथ अप्रत्यक्ष तरीके से संपत्ति ट्रांसफर करने पर भी लागू है।

    ₹22,006 करोड़ के लोन को ₹6.25 करोड़ में निपटाने पर उठे सवाल
    25 अगस्त के पुराने आदेश में NCLT ने चंद्रा के ₹22,006 करोड़ से ज्यादा के लोन को करीब ₹6.25 करोड़ में चुकाने का आदेश दिया था। हालांकि, ये लोन सुभाष चंद्रा के व्यक्तिगत लोन नहीं थे। चंद्रा इन लोन के गारंटर थे। गारंटर होने की वजह से ही उनके खिलाफ दिवालियापन से जुड़ी कार्रवाई में यह मामला सामने आया था।

    पुराने आदेश के तहत सिर्फ ₹6.25 करोड़ के भुगतान के जरिए इतने बड़े लोन का निपटारा करने का रास्ता खुल गया था और दिवालियापन की कार्रवाई को खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ने की स्थिति बन गई थी। लेकिन इस फैसले के बाद कई सवाल उठे। सबसे बड़ा सवाल यही था कि ₹22,006 करोड़ से ज्यादा के इतने बड़े लोन का निपटारा करीब ₹6.25 करोड़ के भुगतान से कैसे किया जा सकता है।

    विवाद बढ़ा तो स्पेशल बेंच ने संभाली सुनवाई
    पुराने फैसले को लेकर विवाद बढ़ने के बाद मामला NCLT की पांच सदस्यीय विशेष पीठ के सामने पहुंचा। मंगलवार को सुनवाई के दौरान स्पेशल बेंच ने पहले के आदेशों में मौजूद मतभेद और स्पष्ट बहुमत की कमी को आधार बनाया और उस आदेश पर रोक लगा दी।

    अब इस मामले में सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया गया है। साथ ही सुभाष चंद्रा की संपत्तियों के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ट्रांसफर पर रोक लगा दी गई है। ऐसे में 25 अगस्त को सामने आए उस आदेश का असर फिलहाल रुक गया है, जिसमें ₹22,006 करोड़ से ज्यादा के लोन को करीब ₹6.25 करोड़ में निपटाने का रास्ता साफ हुआ था।