Category: लाइफ स्टाइल

  • नीम करौली बाबा की सीख: कर्म करते रहें, हर चीज को कंट्रोल करने की जिद छोड़ दें, तभी मिलेगा सुकून

    नीम करौली बाबा की सीख: कर्म करते रहें, हर चीज को कंट्रोल करने की जिद छोड़ दें, तभी मिलेगा सुकून

     कई बार जिंदगी में परेशानी किसी बड़ी समस्या की वजह से नहीं, बल्कि उसे लेकर हमारे मन में चल रही लगातार उथल-पुथल से बढ़ जाती है. भविष्य में क्या होगा, कोई अपना साथ छोड़ेगा या नहीं, मेहनत का परिणाम मिलेगा या नहीं, ऐसे सवाल मन को परेशान करते रहते हैं. नीम करौली बाबा की सीख इसी बेचैनी को कम करने का रास्ता बताती है. उनका संदेश है कि इंसान को अपना कर्म करते रहना चाहिए, लेकिन हर चीज को अपने हिसाब से चलाने की जिद छोड़ देनी चाहिए .

    भगवान पर विश्वास रखना जरूरी
    जीवन में कई परिस्थितियां ऐसी आती हैं, जिन पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता. हम कोशिश जरूर कर सकते हैं, लेकिन हर परिणाम हमारी इच्छा के अनुसार हो, यह जरूरी नहीं. ऐसे समय में भगवान पर विश्वास मन को मजबूती देता है .

    नीम करौली बाबा की शिक्षाओं में समर्पण और विश्वास को महत्वपूर्ण माना जाता है. इसका अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति मेहनत करना छोड़ दे . बल्कि संदेश यह है कि अपना काम पूरी ईमानदारी से करें .

    मोह और प्रेम में अंतर समझें
    किसी व्यक्ति से प्रेम करना या अपने परिवार से जुड़ाव रखना स्वाभाविक है. परेशानी तब शुरू होती है, जब किसी रिश्ते या चीज को खोने का डर हमारी मानसिक शांति छीनने लगे .

    जरूरत से ज्यादा लगाव इंसान को लगातार डर में रख सकता है. इसलिए रिश्तों में प्रेम रखें, लेकिन अपनी पूरी खुशी किसी एक व्यक्ति या परिस्थिति पर निर्भर न करें. जो चीज आज हमारे साथ है, उसके बदलने की संभावना को स्वीकार करना भी जीवन का हिस्सा है .

    हर चीज को कंट्रोल करने की कोशिश न करें
    हम चाहते हैं कि नौकरी, रिश्ते, परिवार और भविष्य सब कुछ हमारी योजना के मुताबिक चले. लेकिन जीवन हमेशा हमारी बनाई हुई योजना के अनुसार नहीं चलता. कुछ परिस्थितियां हमारे नियंत्रण से बाहर होती हैं .

    ऐसे में हर चीज को बदलने की कोशिश करने के बजाय यह समझना बेहतर है कि हमें क्या करना है और क्या स्वीकार करना है. अपनी तरफ से पूरी कोशिश करें, लेकिन हर परिणाम को नियंत्रित करने की कोशिश न करें .

    मुश्किल वक्त भी देता है सीख
    जिंदगी में आने वाली हर परिस्थिति अपने साथ कोई न कोई सीख लेकर आती है. असफलता हमें अपनी कमियां समझा सकती है, मुश्किल समय धैर्य सिखा सकता है. किसी चीज का छूट जाना हमें यह एहसास करा सकता है कि जीवन में कुछ भी हमेशा एक जैसा नहीं रहता .

    अगर इंसान हर घटना को सिर्फ परेशानी मानने के बजाय उससे सीखने की कोशिश करे, तो मुश्किल दौर भी उसे भीतर से मजबूत बना सकता है .

    सुकून के लिए कुछ छोड़ना भी जरूरी
    अक्सर हम सोचते हैं कि खुश रहने के लिए जिंदगी में कुछ नया हासिल करना जरूरी है. लेकिन कई बार मानसिक शांति किसी चीज को पाने से नहीं, बल्कि उसे लेकर बनी चिंता छोड़ने से मिलती है .

    नीम करौली बाबा की सीख को इसी रूप में समझा जा सकता है, कर्म करते रहें, अपने रिश्तों और जिम्मेदारियों को निभाएं, लेकिन हर चीज को अपनी मुट्ठी में रखने की कोशिश न करें. भगवान पर भरोसा रखें,  जो हमारे नियंत्रण से बाहर है, उसे स्वीकार करना सीखें . यही सोच मन के बोझ को कम कर सकती है .

  • बालों का झड़ना और डैंड्रफ होगा कम? घर पर बनाएं रीठा-आंवला-शिकाकाई का नेचुरल शैंपू

    बालों का झड़ना और डैंड्रफ होगा कम? घर पर बनाएं रीठा-आंवला-शिकाकाई का नेचुरल शैंपू

     आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी, प्रदूषण और केमिकल युक्त हेयर प्रोडक्ट्स की वजह से बालों का झड़ना, डैंड्रफ और रूखापन एक आम समस्या बन चुका है. बाजार में मिलने वाले महंगे शैंपू में अक्सर सल्फेट और पैराबेन जैसे हानिकारक केमिकल्स होते हैं, जो बालों को अंदर से नुकसान पहुंचाते हैं.

    अगर आप भी अपने बालों को बिना किसी नुकसान के प्राकृतिक रूप से मजबूत, लंबा और घना बनाना चाहते हैं, तो पारंपरिक रीठा शैंपू एक बेहतरीन विकल्प है. रीठा में प्राकृतिक रूप से 'सैपोनिन' मौजूद होता है, जो बालों की गंदगी को गहराई से साफ करता है और स्कैल्प को पोषण प्रदान करता है.

    सामग्री:
    8-10 सूखा रीठा (बीज निकाले हुए)

    5-6 सूखा आंवला

    5-6 सूखा शिकाकाई

    2-3 कप पानी

    रीठा शैंपू बनाने का तरीका
    रातभर भिगोएं: एक बर्तन में रीठा, आंवला और शिकाकाई को 2-3 कप पानी में डालकर रातभर के लिए भिगोकर रख दें.

    उबालें: अगली सुबह इस मिश्रण को धीमी आंच पर 10 से 15 मिनट के लिए उबालें, ताकि सभी जड़ी-बूटियों का अर्क पानी में आ जाए.

    मसलें: मिश्रण को ठंडा होने दें. ठंडा होने के बाद हाथों से रीठा और शिकाकाई को अच्छे से मसल लें ताकि झाग और रस पूरी तरह बाहर निकल आए.

    छानें: अब इस गाढ़े पानी को किसी पतले कपड़े या छलनी की मदद से छानकर एक साफ बोतल में भर लें. आपका नेचुरल रीठा शैंपू तैयार है.

    इस्तेमाल का तरीका
    सबसे पहले अपने बालों को नॉर्मल पानी से अच्छी तरह गीला कर लें.

    तैयार किए गए रीठा शैंपू की थोड़ी मात्रा अपने हाथों में लें और स्कैल्प पर लगाकर हल्के हाथों से 3-5 मिनट तक मसाज करें.

    चूंकि यह 100% नेचुरल है, इसलिए इसमें केमिकल शैंपू जितना ज्यादा झाग नहीं बनेगा, लेकिन यह स्कैल्प को पूरी तरह साफ कर देता है.

    मसाज करने के बाद बालों को सादे पानी से अच्छी तरह धो लें.

    बेहतर परिणामों के लिए हफ्ते में 2 बार इस शैंपू का इस्तेमाल करें.

  • चाणक्य नीति: इन 7 मौकों पर रहें बिल्कुल चुप, वरना बढ़ सकती है आपकी परेशानी

    चाणक्य नीति: इन 7 मौकों पर रहें बिल्कुल चुप, वरना बढ़ सकती है आपकी परेशानी

     कई बार हमें लगता है कि किसी को सही सलाह देकर हम उसकी परेशानी कम कर सकते हैं. लेकिन हर व्यक्ति सलाह सुनने और उसे समझने के लिए तैयार हो, यह जरूरी नहीं है. कुछ परिस्थितियों में जरूरत से ज्यादा बोलना या सामने वाले को समझाने की कोशिश करना उल्टा हमारे लिए ही परेशानी खड़ी कर सकता है. आचार्य चाणक्य ने अपनी नीतियों में ऐसे ही मौकों पर मौन रहने को बुद्धिमानी बताया है. उनके अनुसार सही समय पर चुप रहना भी एक तरह की समझदारी है l

    1.  जब सामने वाला आपकी बात समझना ही न चाहे
    अगर किसी व्यक्ति को अपनी गलती स्वीकार करने या सही बात समझने में कोई रुचि नहीं है, तो उसे बार-बार सलाह देना व्यर्थ हो सकता है. चाणक्य नीति के अनुसार ऐसे व्यक्ति को समझाने में अपनी ऊर्जा खर्च करने के बजाय मौन रहना बेहतर है l

    कई बार बहस में सही साबित होने से ज्यादा जरूरी यह होता है कि हम यह समझें कि सामने वाला हमारी बात सुनने की स्थिति में है या नहीं l

    2.  जहां बात-बात पर बहस हो
    ऐसी जगह जहां लोग किसी विषय को समझने के बजाय केवल बहस करने या अपनी बात साबित करने के लिए जुटे हों, वहां सोच-समझकर बोलना चाहिए l

    चाणक्य के अनुसार बिना जरूरत किसी विवाद में पड़ना बुद्धिमानी नहीं है. हर सवाल का जवाब देना या हर बहस में शामिल होना जरूरी नहीं होता. कुछ मौकों पर चुप रहकर वहां से हट जाना ही बेहतर विकल्प होता है l

    3.  जहां आपको सम्मान नहीं मिल रहा हो
    जिस जगह आपकी बात को महत्व नहीं दिया जा रहा हो या लोग केवल आपको नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे हों, वहां अपनी सफाई देते रहना उचित नहीं है l

    चाणक्य नीति में अपनी योजनाओं और महत्वपूर्ण बातों को हर किसी के सामने जाहिर न करने की सीख दी गई है. ऐसे माहौल में शांत रहकर अपने काम पर ध्यान देना ज्यादा समझदारी भरा कदम हो सकता है l

    4.  जब किसी विषय की पूरी जानकारी न हो
    किसी मुद्दे के बारे में आधी-अधूरी जानकारी होने पर तुरंत अपनी राय देना कई बार नुकसान पहुंचा सकता है. अधूरी जानकारी के आधार पर कही गई बात आपको दूसरों के सामने असहज स्थिति में डाल सकती है l

    इसलिए जब किसी विषय की पूरी जानकारी न हो तो पहले उसे समझना और फिर अपनी बात रखना बेहतर है. कई बार कुछ देर का मौन गलत जानकारी देने से कहीं ज्यादा अच्छा होता है l

    इन मौकों पर भी रखें मौन
    चाणक्य नीति के अनुसार कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति को विशेष रूप से अपनी जुबान पर नियंत्रण रखना चाहिए.

    गुस्से में: क्रोध के दौरान कही गई बात रिश्तों में लंबे समय तक कड़वाहट पैदा कर सकती है.
    पारिवारिक विवाद में: घर की निजी और गोपनीय बातें दूसरों के सामने बताने से बचना चाहिए.
    निंदा के दौरान: किसी की बुराई में शामिल होने के बजाय खुद को उस बातचीत से दूर रखना बेहतर है.

  • डायबिटीज सिर्फ शुगर की बीमारी नहीं, जेंडर के हिसाब से बदल सकता है अन्य रोगों का जोखिम

    डायबिटीज सिर्फ शुगर की बीमारी नहीं, जेंडर के हिसाब से बदल सकता है अन्य रोगों का जोखिम

    नई दिल्ली

    डायबिटीज का असर शरीर के दूसरे अंगों पर भी पड़ता है. इससे दिल, किडनी और मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित हो सकता है. अब एक बड़ी स्टडी में सामने आया है कि डायबिटीज से होने वाली दूसरी स्वास्थ्य समस्याएं पुरुषों और महिलाओं में एक जैसी नहीं होतीं है. इस रिसर्च को PLOS मेडिसिन में प्रकाशित किया गया है। 

    इस रिसर्च में यूके के 28,720 ऐसे मरीजों का हेल्थ रिकॉर्ड निकाला गया, जिनमें हाल ही में टाइप-2 डायबिटीज की पहचान हुई थी. मरीजों में समय के साथ डायबिटीज के कारण होने वाली दूसरी समस्याओं का भी आकलन किया गया. इसमें देखा गया है महिलाओं में क्या समस्याएं हो रही है और इनमें ऐसी कौन सी हैं जो पुरुषों से अलग हैं। 

    डायबिटीज में महिलाओं को मेंटल हेल्थ की समस्याओं का ज्यादा खतरा 
    स्टडी के अनुसार, डायबिटीज का जैसे ही पता चलता है उसके बाद महिलाओं में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं होने की आशंका अधिक होती है, जबकि पुरुषों में दिल और किडनी से जुड़ी समस्याओं का खतरा अधिक रहता है। 

    शोधकर्ताओं ने कहा कि महिला और पुरुष इन स्वास्थ्य समस्याओं का अनुभव अलग-अलग तरह से करते हैं, लेकिन टाइप-2 डायबिटीज वाले लोगों में लिंग और उम्र के आधार पर बीमारी के बढ़ने के तरीके के बारे में अभी तक कोई शोध नहीं किया गया है। 

    महिलाओं और पुरुषों पर अलग-अलग प्रभाव 
    बताते चलें कि ब्रिटेन की क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी एवं अन्य शोधकर्ताओं के अध्ययन का निष्कर्ष प्लोस मेडिसिन नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इसने साल 2010 से 2020 के बीच टाइप-2 डायबिटीज विकसित होने वाले लगभग 28,720 पुरुषों और महिलाओं के स्वास्थ्य रिकॉर्ड का गहन विश्लेषण किया। रोग का पता चलने के बाद के वर्षों में प्रतिभागियों में से 39 प्रतिशत ने कम से कम एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य घटना का अनुभव किया, जिसमें पाया गया कि घटना की प्रगति और समय लिंग के अनुसार अलग-अलग थी। 

    पुरुषों में हाई बीपी और किडनी की बीमारी का जोखिम 
    इसके बाद शोधकर्ताओं ने अध्ययन में पाया कि बीमारी का पता चलने के बाद महिलाओं में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं होने की आशंका अधिक थी जो कि 5.3 प्रतिशत की तुलना में 8.1 प्रतिशत है और उनकी स्थिति ऐसी होती गई जिससे अंत में मौत हो गई। जबकि पुरुषों में हृदय रोग (5.3 प्रतिशत के मुकाबले 8.4 प्रतिशत), अंतिम चरण की गुर्दे की बीमारी और हाइपरटेंशन की उच्च दरें थीं। 

    पुरुषों में दिल और किडनी पर ज्यादा असर

    स्टडी के मुताबिक पुरुषों में डायबिटीज के साथ हार्ट और किडनी से जुड़ी बीमारियों का खतरा महिलाओं की तुलना में ज्यादा था, खास बात यह रही कि पुरुषों में ये समस्याएं डायबिटीज होने के बाद कम उम्र में ही होने लगीं थी. डायबिटीज लंबे समय तक बढ़ी हुई शुगर के कारण नसों को नुकसान पहुंचा सकती है. शुगर लेवल बढ़ने से आंखों की समस्याएं भी हो सकती हैं। 

    महिलाओं में चिंता और डिप्रेशन का खतरा
    रिसर्च में पता चला कि महिलाओं में एंग्जायटी और डिप्रेशन जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं अधिक देखने को मिलीं. जबकि पुरुषों में ये डायबिटीज से होने के बाद कम देखी गईं.  यह भी पाया गया कि डायबिटीज के साथ मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर मौत का जोखिम बढ़ सकता है। 

    डॉक्टरों के लिए भी जरूरी संकेत
    शोधकर्ताओं का कहना है कि डायबिटीज के मरीजों की निगरानी करते समय केवल ब्लड शुगर के आंकड़ों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा. पुरुषों में दिल और किडनी की सेहत पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत हो सकती है, जबकि महिलाओं में मानसिक स्वास्थ्य की स्क्रीनिंग को भी इलाज का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। 

  • पनीर-अंडे ही नहीं, ये 5 सीड्स भी हैं प्रोटीन का पावरहाउस; डाइट में जरूर करें शामिल

    पनीर-अंडे ही नहीं, ये 5 सीड्स भी हैं प्रोटीन का पावरहाउस; डाइट में जरूर करें शामिल

    जब भी बात प्रोटीन लेने की आती है तो सबसे पहले लोगों के दिमाग में पनीर, दूध, अंडे और चिकन आदि आते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार प्रोटीन मांसपेशियों की मजबूती के साथ ही हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक होता है। इसके अलावा, यह स्किन और हेयर के लिए जरूरी माना जाता है। यदि शरीर में प्रोटीन की कमी हो जाए तो इससे व्यक्ति को हमेशा थकान और कमजोरी बनी रह सकती है। यही वजह है कि डाइट में अक्सर प्रोटीन को मुख्य रूप से शामिल करने पर जोर दिया जाता है। लेकिन, कई बार लोगों का ध्यान सीड्स पर नहीं जाता है, जबकि यह भी आपकी प्रोटीन की आवश्यकता को पूरा करने का मुख्य सोर्स बन सकती है। प्रोटीन की जरूरत को पूरा करने के लिए आप डाइट में कद्दू के बीज, हेम्प सीड्स (भांग के बीज), चिया सीड्स, अलसी के बीज और सफेद तिल को शामिल कर सकते हैं। इन सभी बीजों में प्रोटीन के साथ ही हेल्दी फैट, फाइबर और अन्य मिनरल्स भी पाए जाते हैं।

    क्या सीड्स वास्तव में प्रोटीन का सोर्स होते हैं?
    एनसीबीआई के अनुसार सीड्स छोटे जरूर होते हैं, लेकिन इनमें प्रोटीन, ओमेगा 3, हेल्दी फैट, मिनरल्स और कई महत्वपूर्ण पोषक तत्व पाए जाते हैं। कद्दू के बीज, चिया सीड्स, अलसी के बीज, सफेद तिल और भांग के बीज आदि में कई तरह के पोषक तत्व हमारे शरीर में ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस को कम करने और हड्डियां व संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए आवश्यक होते हैं।

    लेकिन एक जरूरी बात समझना चाहिए सीड्स को प्रोटीन का एक सोर्स कह सकते हैं, लेकिन इनको अन्य किसी भी सोर्स जैसे पनीर, टोफू, चिकन आदि के साथ तुलना नहीं करनी चाहिए।

    प्रोटीन से भरपूर सीड्स कौन-से हैं?
    कद्दू के बीज
    कद्दू (पंपकिन) के बीज छोटे होते हैं, लेकिन इनमें प्रोटीन, मैग्नीशियम, जिंक, हेल्दी फैट, और फोस्फोरस जैसे पोषक तत्व मिलते हैं। इससे प्राप्त प्रोटीन में मौजूद अमीनो एसिड मांसपेशियों के निर्माण, मसल्स रिपेयर और रखरखाव में मदद करते हैं। साथ ही यह लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस होना करने में मदद करते हैं। जिससे वजन भी कंट्रोल होता है।

    इन सीड्स के सेवन से मिलता है प्रोटीन
    चिया सीड्स
    चिया सीड्स आजकल वजन कम करने और हेल्दी डाइट के लिए लोकप्रिय है। इनमें प्रोटीन के साथ डाइटरी फाइबर और Alpha-Linolenic Acid (ALA) पाया जाता है। इसके अलावा, इससे कैल्शियम, मैग्नीशियम और अन्य मिनरल्स भी मिलते हैं। जो बोन हेल्थ के लिए आवश्यक होते हैं। हार्वर्ड हेल्थ के अनुसार चिया सीड्स में सभी नौ आवश्यक अमीनो एसिड पाए जाते हैं। चिया सीड्स में मौजूद प्रोटीन ब्लड शुगर के स्तर को स्थिर रखने में मदद करता है और एनर्जी का एक निरंतर स्रोत प्रदान करता है।

    भांग के बीज (Hemp Seeds)
    भांग के बीज को प्लांट बेस्ड डाइट में खास महत्व दिया जाता है क्योंकि इनमें सभी जरूरी अमीनो एसिड्स की अच्छी मात्रा पाई जा सकती है। यह पाचन क्रिया को दुरुस्त करता है और मांसपेशियों को मजबूत बनाता है। इसमें मौजूद अमिनो एसिड शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड ब्लड वैसल्स को रिलैक्स करता है और ब्लड प्रेशर को भी सपोर्ट करता है।

    अलसी के बीज
    एनसीबीआई के मुताबिक अलसी के बीज में मौजूद प्रोटीन शरीर के इम्यून सिस्टम को मजबूत करने में सहायक होता है। इसके साथ ही इसके सेवन से हार्ट से जुड़ी समस्याओं में भी आराम मिलता है। आप अलसी के बीजों को ओट्स और स्मूदी के साथ सेवन कर सकते हैं। शाकाहारी लोगों के लिए प्रोटीन का यह एक आसान विकल्प हो सकता है।
    सफेद तिल

    इन सीड्स के सेवन से मिलता है प्रोटीन
    अगर बात बोन हेल्थ की हो रही है, तो सफेद तिल का जिक्र जरूर होना चाहिए। इनमें प्रोटीन के साथ कैल्शियम, मैग्नीशियम, और हेल्दी फैट पाए जाते हैं। यह जिम एक्सरसाइज आदि के दौरान मसल्स को रिपेयर करने में मदद करते हैं। इसके साथ ही थकान और कमजोरी को दूर करने का एक बेहतरीन विकल्प हो सकते हैं।

    संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए आवश्यक प्रोटीन की जरूरत को पूरा करने के लिए आप सप्लीमेंट्स के साथ भी इन सीड्स का सेवन कर सकते हैं। यह सीड्स प्रोटीन के साथ ही आपको अन्य पोषक तत्व भी प्रदान करते हैं, जो न केवल आपकी मांसपेशियों को मजबूत बनाते हैं, बल्कि आपकी इम्यूनिटी में भी सुधार करते हैं।

  • लिवर को हेल्दी रखने के लिए डाइट में शामिल करें ये 5 सब्जियां, गाजर से चुकंदर तक हैं फायदेमंद

    लिवर को हेल्दी रखने के लिए डाइट में शामिल करें ये 5 सब्जियां, गाजर से चुकंदर तक हैं फायदेमंद

    लिवर शरीर के लिए कई सारे काम करता है। ये एनर्जी देने के साथ शरीर के टॉक्सिंस की सफाई भी करता है। जबकि ज्यादातर लोगों को लगता है कि लिवर केवल खाने को डाइजेस्ट करने के लिए बाइल प्रोड्यूस करता है। लेकिन इसके साथ भी लिवर का कई काम होता है। लिवर फंक्शन को सही तरीके से चलाते रहने के लिए जरूरी है कि हेल्दी फूड्स को खाया जाए, जैसे ये कुछ सब्जियां जो लिवर फंक्शन को स्मूद करने में मदद करती हैं। ये एंटीऑक्सीडेंट्स, फाइबर, विटामिन और मिनरल्स से भरपूर होते हैं। और इन्हें रोज की डाइट में शामिल करना अच्छा होता है।

    शलगम
    शलगम को काफी इग्नोर किया जाता है। जबकि ये फाइबर से भरपूर होते हैं और इसमे कई ऐसे कंपाउंड होते हैं जो डाइजेशन के साथ ही मेटाबॉलिक हेल्थ को सपोर्ट करते हैं। विटामिन सी, जो ऑक्सीडेटिव डैमेज से सेल्स को बचाते हैं। हेल्दी, बैलेंस डाइट में शलगम को जरूर शामिल करना चाहिए, ये लिवर फंक्शन को भी सपोर्ट करने में मदद करते हैं।

    शकरकंद
    शकरकंद के फायदों को जरा भी इग्नोर नहीं किया जा सकता है। फाइबर, विटामिन सी, बीटा कैरोटिन के साथ ही इसके न्यूट्रिशन की लिस्ट लंबी है। शकरकंद यानि स्वीट पोटैटो में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स इंफ्लेमेशन को कम करने और ओवरऑल लिवर हेल्थ को सही रखने में मदद करते हैं। यहीं नहीं इसमे मौजूद कॉम्प्लेक्स कार्ब्स धीरे-धीरे एनर्जी देती है और गट हेल्थ को इंप्रूव करती है। जिससे बॉडी के नेचुरल डिटॉक्सिफिकेशन में मदद मिलती है।

    गाजर
    लिवर को हेल्दी रखना है तो गाजर जरूर खाएं। गाजर में बीटा कैरोटिन होता है जो बॉडी में जाकर विटामिन ए में कन्वर्ट हो जाता है और लिवर सेल्स को फ्री रैडिक्लस से होने वाले डैमेज से बचाता है। गाजर में मौजूद फाइबर डाइजेशन को सपोर्ट करता है और टॉक्सिंस को रिमूव करने मे मदद करता है। सबसे खास बात गाजर को कच्चा, उबला या फिर सूप में ब्लेंड करके जिस तरह भी खाएं फायदा ही करता है।

    मूली
    मूली में कैलोरी कम और न्यूट्रिशन ज्यादा होते हैं। वेट लॉस करने वालों को भी मूली-गाजर को डाइट में शामिल करना चाहिए। ये लिवर और गालब्लैडर के फंक्शन को सपोर्ट करने वाले कंपाउंड प्रोड्यूस करता है। मूली की प्रॉपर्टीज शरीर के कचरे को आसानी से शरीर के बाहर करने में मदद करती है। मूली को सलाद में मिलाकर खाएं या अकेले ही खाएं, दोनों तरह से फायदा ही करती है।

    चुकंदर
    लिवर हेल्थ को दुरुस्त रखना है तो चुंकदर खाने की सलाह मिल जाती है। चुकंदर के गुण इसे लिवर के लिए सुपरफूड बनाते हैं। इसमे बिटालेंस एंटीऑक्सीडेंट होता है जो ऑक्सीडेटिस स्ट्रेस से बचाता है। साथ ही लिवर के नेचुरल क्लीजिंग प्रोसेस को सपोर्ट करता है और ब्लड फ्लो इंप्रूव करता है। यहीं नहीं चुकंदर में हाई फाइबर होता है जो डाइजेशन में मदद करता है। जिससे शरीर के वेस्ट मैटेरियल आसानी से मल के जरिए शरीर के बाहर निकल जाते हैं। चुकंदर का जूस पिए, उबालकर खाएं या फिर सलाद में शामिल करें।

    खाते समय कौन सी सावधानी जरूरी है
    हेल्दी रहने के लिए केवल कुछ फूड्स, सब्जियों पर नहीं टिके रहना चाहिए। हर हफ्ते बदलकर और अलग-अलग सब्जियों को चुनकर खाना चाहिए। लिवर के लिए जड़ वाली सब्जियां हेल्दी होती है।

    कच्ची खाने के बजाय हल्का सा उबालकर, रोस्ट करके या फिर ग्रिल करके खाएं लेकिन ध्यान रहे कि डीप फ्राई करने से बचें।

    हाई फाइबर, प्रोटीन और न्यूट्रिशन वाले फूड्स को खाने के साथ ही शरीर को पर्याप्त मात्रा में पानी मिलना चाहिए। हाइड्रेटेड रहने से बॉडी को नेचुरली डिटॉक्स करना आसान होगा।

  • ग्वालियर में 5 साल में 1857 केस, मध्यप्रदेश में बढ़ रहा सर्वाइकल कैंसर का खतरा; पहचानें लक्षण

    ग्वालियर में 5 साल में 1857 केस, मध्यप्रदेश में बढ़ रहा सर्वाइकल कैंसर का खतरा; पहचानें लक्षण

    ग्वालियर 
     कैंसर से हर साल दुनियाभर में करोड़ों मौतें होती हैं. भारत में भी इसके आंकड़े डरावने हैं. बात करें मध्यप्रदेश की तो 2025 में यहां कैंसर के 88 हजार से ज्यादा नए मरीज सामने आए थे. लेकिन कई प्रकार के कैंसर में से एक सर्वाइकल कैंसर मध्य प्रदेश को तेजी से अपनी चपेट में ले रहा है. चिंता की बात ये है कि हर साल लगभग 4 हजार महिलाएं प्रदेश में सर्वाइकल कैंसर से पीड़ित हो रही हैं. चौंकाने वाली बात तो ये है कि अकेले ग्वालियर में पिछले 5 सालों में 1800 से ज्यादा सर्वाइकल कैंसर के मामले दर्ज हुए। 

    महिलाओं में होने वाला दूसरा सबसे आम कैंसर, लेकिन जानलेवा
    ग्वालियर अंचल में सर्वाइकल कैंसर दूसरे कैंसर की तुलना में तेजी से पैर पसार रहा है. 100 में 99 महिलाओं में होने वाला यह कैंसर ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एचपीवी) के संक्रमण की वजह से होता है. आईसीएमआर की रिपोर्ट के अनुसार स्तन कैंसर के बाद यह महिलाओं में होने वाला दूसरा सबसे आम कैंसर है. ये ऐसी बीमरी है कि, समय पर पता चल जाए तो इलाज के जरिए मरीज ठीक भी हो सकता है लेकिन बाद में मरीज का बचना मुश्किल होता है. ग्वालियर में इसके मामले तेजी से बढ़ रहे हैं 

    5 सालों में लगातार बढ़ा सर्वाइकल कैंसर का ग्राफ
    ग्वालियर में बीते पांच वर्षों में हर साल सर्वाइकल कैंसर के केस बढ़े हैं, जहां 2021 में ग्वालियर में 288 केस सामने आए थे, वहीं साल दर साल ये संख्या बढ़ती जा रही है. ग्वालियर स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, बीते 5 सालों में से 2021 में 288, 2022 में 359, 2023 में 335, 2024 में 349 और 2025 में अब तक सर्वाधिक 368 महिलाओं को सर्वाइकल कैंसर पाया गया.जबकि 1 जनवरी 2026 से 31 जुलाई 2026 तक ही 158 केस हो चुके हैं. यानी पांच सालों में 1857 मामले आए हैं. ये वे आंकड़े हैं जो सरकारी अस्पतालों तक पहुचे हैं. और सरकारी रिकॉर्ड में हैं. इसके अलावा ग्वालियर से बाहर इलाज कराने वाली महिलाएं रिकॉर्ड में नहीं हैं। 

    क्या होता है सर्वाइकल कैंसर?
    सर्वाइकल कैंसर महिलाओं में होने वाली गंभीर बीमारी है, जो गर्भाशय ग्रीवा यानि बच्चेदानी के निचले हिस्से की कोशिकाओं में होने वाला कैंसर है. यह अचानक नहीं होता बल्कि महिला के ह्यूमन पैपिलोमा वायरस के संपर्क में आने पर फैलता है. यदि समय पर इसे डिटेक्ट ना किया जाए और समय पर इलाज ना मिले तो ये जानलेवा हो सकता है। 

    सर्वाइकल कैंसर से बचाव का सबसे कारगर तरीका
    इन हालातों पर जब हमने विशेषज्ञों से संपर्क किया तो कैंसर हॉस्पिटल की सीनियर डॉक्टर गुंजन श्रीवास्तव के मुताबिक, '' महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर साइलेंट किलर माना जाता है. कैंसर से मौतों के मामले में सबसे ज्यादा मृत्यु सर्वाइकल कैंसर की वजह से होती है. किशोरावस्था में खासकर 9 से 15 वर्ष की आयु में ही बेटियों को एंटी एचपीवी वैक्सीन लगवा देना चाहिए, क्योंकि ह्यूमन पैपिलोमा वायरस के संपर्क में आने से पहले अगर वैक्सीन लग जाती है तो यह ज्यादा कारगर होती है. और सर्वाइकल कैंसर से बचाव करती है.'' डॉ गुंजन श्रीवास्तव के मुताबिक 30 साल की उम्र के बाद महिलाओं को खासकर शादीशुदा महिलाओं को पैप स्मीयर टेस्ट हर तीन साल में करना चाहिए। 

    कैसे पहचानें सर्वाइकल कैंसर के लक्षण?
    जया आरोग्य अस्पताल समूह के ऑनकोलॉजी डिपार्टमेंट के एचओडी डॉ. अक्षय निगम कहते हैं, '' सर्वाइकल कैंसर अपने प्री कैंसर स्टैट्ज में कुछ मुख्य लक्षणों से पहचाना जा सकता है. और पहली ही स्टेज में इलाज के द्वारा पूरी तरह ठीक किया जा सकता है. इसके मुख्य लक्षण हैं, महिलाओं में पेल्विक पेन, अनियमित रक्तस्राव, बदबूदार डिस्चार्ज, लगातार वाइट डिस्चार्ज. ऐसा होने पर तुरंत स्त्रीरोग विशेषज्ञ से जांच कराना चाहिए. और अगर जांच में सर्वाइकल कैंसर की पुष्टि होती है तो तुरंत कैंसर विशेषज्ञ से कंसल्ट करें। 

    मध्यप्रदेश में किशोरियों को निशुल्क लगाई जा रही वैक्सीन
    मध्यप्रदेश में सर्वाइकल कैंसर के खतरे को देखते हुए शासन द्वारा भी स्वास्थ्य विभाग के जरिए 14 से 15 वर्ष की बालिकाओं को निशुल्क टीकाकरण कराया जा रहा है. लगातार प्रचार प्रसार से लोगों में जागरूकता भी आई है. ग्वालियर के जिला टीकाकरण अधिकारी दे आरके गुप्ता के मुताबिक, "शासन सर्वाइकल कैंसर से बचाव के बचाव के लिए 14 से 15 आयु वर्ग की बच्चियों के लिए निशुल्क एचपीवी वैक्सीन लगवा रही है, ग्वालियर में उसके लिए 23311 वैक्सीन का स्टॉक उपलब्ध कराया गया था. अच्छी बात यह है की लोगो ने इस टीकाकरण में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया है जिससे अब तक ग्वालियर जिले में 22472 वैक्सीन डोज लगाए जा चुके हैं. और यह काम निशुल्क सभी सरकारी अस्पतालों में लगातार जारी है। 

  • पैंक्रियाटिक कैंसर के इलाज में नई उम्मीद, ‘रासोंक’ दवा से घटा मौत का जोखिम; FDA ने दी मंजूरी

    पैंक्रियाटिक कैंसर के इलाज में नई उम्मीद, ‘रासोंक’ दवा से घटा मौत का जोखिम; FDA ने दी मंजूरी

     नई दिल्ली

    पैंक्रियाज में होने वाले कैंसर को पैंक्रियाटिक कैंसर कहते हैं. इससे अधिकतर मामले आखिरी स्टेज में सामने आते हैं. ऐसे में मरीजों की जान बचाना बहुत मुश्किल हो जाता है. लेकिन अब एक नई दवा ने उम्मीद जगाई है.  अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने नई दवा रासोंक को मेटास्टैटिक पैंक्रियाटिक कैंसर यानी जो कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों में भी फैल गया है उसके इलाज के लिए मंजूरी दे दी है. यह दवा खासतौर पर उन मरीजों के लिए मंजूर की गई है, जिनका पहले इलाज हो चुका है या जो किसी कारण से सामान्य कीमोथेरेपी नहीं ले सकते। 

    खास बात यह है कि इसे दिन में सिर्फ एक बार गोली के रूप में लिया जा सकता है. इस दवा को लेकर ट्रायल किए गए थे. ट्रायल में दवा काफी फायदेमंद मिली है. इससे पैंक्रियाटिक कैंसर के मरीजों के जीवन को बढ़ाने में मदद मिली है. हालांकि ये कैंसर का इलाज नहीं है, लेकिन इस बीमारी से मौत के खतरे को कम कर सकती है। 

    मरीजों के जिंदा रहने की दर बढ़ी

    दवा को मंजूरी देने से पहले किए गए बड़े क्लिनिकल ट्रायल में इसके बहुत अच्छे नतीजे सामने आए हैं. इस दवा से पैंक्रियाटिक कैंसर के जिन मरीजों की बीमारी एडवांस यानी अंतिम स्टेज के आसपास पहुंच गई है उनके जिंदा रहने की दर में सुधार देखा गया है. कुछ मरीजों में सर्वाइवल का फायदा पहले से इस्तेमाल हो रहे इलाज की तुलना में करीब दोगुना तक रहा है.  हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि दवा कैंसर को पूरी तरह खत्म कर देती है. लेकिन फायदा यह है कि जिन मरीजों में पैंक्रियाज का कैंसर शरीर के दूसरे अंगों में फैल गया था उनमें मरीजों की जिंदगी को लंबा करने और लक्षणों को कम करने में मदद मिली है। 

    किस तरह काम करती है यह दवा?
    पैंक्रियाटिक कैंसर के कई मामलों में KRAS नाम के जीन में बदलाव या म्यूटेशन पाया जाता है. यह बदलाव कैंसर कोशिकाओं को तेजी से बढ़ने और शरीर में फैलने में मदद कर सकता है. नई दवा इसी कैंसर पैदा करने वाले रास्ते को निशाना बनाकर काम करने के लिए विकसित की गई है. यही वजह है कि इसे पैंक्रियाटिक कैंसर के इलाज में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। 

    हर मरीज के लिए नहीं होगी दवा
    FDA की मंजूरी का मतलब यह नहीं है कि पैंक्रियाटिक कैंसर का हर मरीज इस गोली को ले सकता है. डॉक्टर मरीज के कैंसर की स्टेज, पहले हुए इलाज, ट्यूमर की जेनेटिक जांच और उसकी कुल स्वास्थ्य स्थिति को देखकर तय करेंगे कि यह दवा उसके लिए सही है या नहीं है। 

  • स्वाइन फ्लू से बचाव का असरदार उपाय? जानें कौन-सी वैक्सीन लगवाएं और कैसे करती है शरीर की सुरक्षा

    स्वाइन फ्लू से बचाव का असरदार उपाय? जानें कौन-सी वैक्सीन लगवाएं और कैसे करती है शरीर की सुरक्षा

       नई दिल्ली 
       दिल्ली ही नहीं अब कई दूसरे राज्यों में भी स्वाइन फ्लू के केस बढ़ रहे हैं. लोगों को तेज बुखार, खांसी, जुकाम, गले में दर्द जैसे लक्षण हो रहे हैं. कुछ मरीजों को सांस लेने में भी परेशानी हो रही है. बढ़ते मामलों के बीच स्वाइन फ्लू से बचाव करना बहुत जरूरी हो गया है. इससे बचाव कैसे करें? क्या स्वाइन फ्लू से बचने के लिए भी कोई वैक्सीन है? अगर है तो कौन सी, कब लगवानी चाहिए. इस बारे में डॉक्टर ने बताया है। 

    स्वाइन फ्लू इन्फ्लूएंजा वायरस का ही एक प्रकार है. फ्लू वैक्सीन से ही स्वाइन फ्लू समेत इन्फ्लूएंजा के दूसरे स्ट्रेन से बचाव हो जाता है. हर साल फ्लू की वैक्सीन को अपडेट किया जाता है. ऐसे में यह सभी स्ट्रेन के खिलाफ प्रभावी होती है. ये वैक्सीन आमतौर पर उस सीजन में फैलने वाले इन्फ्लूएंजा वायरस के प्रमुख स्ट्रेन को ध्यान में रखकर तैयार की जाती हैं. इससे यह स्वाइन फ्लू से भी आसानी से बचाव कर सकती है। 

    कौन सी Vaccine लगवानी चाहिए, क्या है नाम? 

    दिल्ली के आरएमएल हॉस्पिटल में मेडिसिन विभाग में प्रोफेसर डॉ. सुभाष गिरि ने इस बारे में Aajtak.in को बताया है. डॉ. सुभाष कहते हैं कि स्वाइन फ्लू से बचाव के लिए जो वैक्सीन लगती है उसका नाम सीजनल इन्फ्लूएंजा वैक्सीन है. इसको मॉडर्न क्वाड्रिवेलेंट फ्लू शॉट कहते हैं। 

    डॉ. सुभाष कहते हैं कि इन्फ्लूएंजा वायरस समय के साथ बदलते रहते हैं. यही वजह है कि फ्लू वैक्सीन को भी समय-समय पर अपडेट किया जाता है. आमतौर पर 6 महीने या उससे अधिक उम्र के लोग इसको लगवा सकते हैं. लेकिन अगर किसी को कोई गंभीर स्वास्थ्य समस्या है तो उसको वैक्सीन लेने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। 

    कब लगवानी चाहिए वैक्सीन और कितने दिन में असर करती है?
    फ्लू वैक्सीन लगवाने के बाद शरीर को फ्लू के खिलाफ इम्यूनिटी बनाने में करीब दो हफ्ते लग सकते हैं. इसलिए यह सही समय है कि आप अपने डॉक्टर की सलाह लेकर ये टीका लगवा सकते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि इस समय स्वाइन फ्लू के केस काफी बढ़ रहे हैं. ऐसे में समय पर टीका लगने के कई फायदे हैं. इससे स्वाइन फ्लू से होने वाले गंभीर लक्षणों से बचाव किया जा सकता है. ऐसे में हॉस्पिटल में भर्ती होने की आशंका भी कम होती है। 

    किन लोगों के लिए ज्यादा जरूरी है?
    हालांकि फ्लू किसी को भी हो सकता है, लेकिन कुछ लोगों में यह गंभीर रूप ले सकता है. इसलिए छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और डायबिटीज, दिल या फेफड़ों की बीमारी वाले लोगों को फ्लू से बचाव पर खास ध्यान देना चाहिए. कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों में भी संक्रमण गंभीर होने की आशंका रहती है. ऐसे में इन लोगों को वैक्सीन जरूर लगवा लेनी चाहिए। 

    कितनी हो सकती है Vaccine की कीमत?
    भारत में फ्लू वैक्सीन की कीमत ब्रांड, वैक्सीन के प्रकार के हिसाब से अलग-अलग हो सकती है. प्राइवेट अस्पतालों में इसकी कीमत कुछ सौ रुपये से लेकर लगभग 1,000 से 2,000 रुपये या इससे अधिक तक हो सकती है. अगर आप ये वैक्सीन लगवाना चाहते हैं तो अपने डॉक्टर से सलाह लेकर किसी हॉस्पिटल में जाकर इसको लगवा सकते हैं. इसका कोई नुकसान नहीं है, बल्कि ये इन्फ्लूएंजा से बचाने का ही काम करती है। 

  • पैंक्रियाटिक कैंसर के इलाज में बड़ी सफलता, FDA ने पहली RAS टारगेटेड दवा को दी मंजूरी

    पैंक्रियाटिक कैंसर के इलाज में बड़ी सफलता, FDA ने पहली RAS टारगेटेड दवा को दी मंजूरी

    पैनक्रिएटिक कैंसर यानी अग्राशय के कैंसर को दुनिया के सबसे जानलेवा कैंसर माना जाता है, क्योंकि यह शुरुआती स्टेज में पकड़ में ही नहीं आता है. हालांकि, अब मरीजों के लिए एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है. अमेरिका की फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने एडवांस्ड पैनक्रिएटिक कैंसर के लिए एक क्रांतिकारी नई दवा का मंजूरी दे दी है, जिसे दशकों से डॉक्टर और वैज्ञानिक तलाश कर रहे थे. आइए जानते हैं यह दवा क्या है, कैसे काम करती है, और मरीजों के लिए यह कितनी असरदार साबित हुई है.

    कौन सी दवा को मिली मंजूरी?
    फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने 'डाराक्सोनरासिब' वैक्सीन को मंजूरी दी है, जिसे रेवोल्यूशन मेडिसिन्स कंपनी रासोंक ब्रांड नाम से बेचेगी. यह अपनी तरह की पहली गोली है, जो एक म्यूटेटेड प्रोटीन को ब्लॉक करती है. यह 90 प्रतिशत से ज्यादा पैनक्रिएटिक कैंसर मामलों में ट्यूमर की ग्रोथ को बढ़ा देता है. फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने इसे तय वक्त से छह महीने पहले ही एक्सपेडाइटेड अप्रूवल दे दिया, जो इस दवा की अहमियत को दिखाता है.

    क्या टारगेट करती है यह दवा?
    यह नई दवा आरएएसजीन फैमिली में होने वाले म्यूटेशन को निशाना बनाती है, जो सेल ग्रोथ को नियंत्रित करता है. इसमें केआरएएस म्यूटेशन को पैनक्रिएटिक कैंसर बढ़ाने का सबसे बड़ी वजह माना जाता है. लेकिन इस प्रोटीन की बनावट ऐसी है कि इससे जुड़ने वाली कोई दवा बनाना कई दशक तक नामुमकिन माना जाता था, यही वजह है कि इसे अनड्रगेबल कहा जाता था. रेवोल्यूशन मेडिसिन्स की यह दवा एक तरह के मॉलिक्यूलर ग्लू के जरिए कई केआरएएस सबटाइप्स से जुड़ने में कामयाब रहती है.

    मरीजें को क्यों है फायदेमंद?
    इस स्टडी में 500 मरीज शामिल हुए थे, जिनका मेटास्टैटिक यानी फैल चुका कैंसर पहले के इलाज पर रिस्पॉन्स करना बंद कर चुका था. मरीजों को रैंडमली इस नई दवा या पुराने कीमोथेरेपी ट्रीटमेंट पर रखा गया है. नतीजों में पाया गया कि नई दवा लेने वाले मरीजों की जिंदा रहने का मौका लगभग दोगुनी हो सकती है. साथ ही उनमें खतरनाक साइड इफेक्ट भी कम देखे जा सकते हैं.

    कितनी है दवा की कीमत
    कंपनी के मुताबिक, इस दवा के एक महीने के कोर्स की कीमत करीब 39,800 डॉलर है, यानी भारतीय रुपयों में करीब 33 लाख रुपये के आसपास आता है. यह रोजाना ली जाने वाली गोली के रूप में आएगी. पैनक्रिएटिक कैंसर का इलाज करने वाले डॉक्टरों को उम्मीद है कि इस दवा की मंजूरी दूसरे कैंसर के लिए भी नए रास्ते खोल सकती है, क्योंकि इसी बुनियाद पर दर्जनों एक्सपेरिमेंटल दवाएं भी डेवलपमेंट स्टेज में हैं. कंपनी अब इसी टेक्नोलॉजी को फेफड़ों के कैंसर के साथ कई और तरह के कैंसर पर भी टेस्ट कर रही है.

    अमेरिकन कैंसर सोसाइटी के मुताबिक अकेले अमेरिका में इस साल करीब 67,000 नए पैनक्रिएटिक कैंसर मामले सामने आए हैं, जबकि 52,000 से ज्यादा लोगों की इससे मौत होने का खतरा होता है. इस बीमारी की पांच साल की जिंदा रहने की दर सिर्फ 13 प्रतिशत है, जो इसे सबसे जानलेवा कैंसर में से एक बनाती है.