Category: विदेश

  • ईरान संघर्ष के बाद पाकिस्तान की बड़ी डिमांड! अमेरिका से 10 अरब डॉलर की मदद की मांग

    ईरान संघर्ष के बाद पाकिस्तान की बड़ी डिमांड! अमेरिका से 10 अरब डॉलर की मदद की मांग

    इस्लामाबाद

    पाकिस्तान कभी किसी का यूं ही भला नहीं चाहता. वह हर काम अपने फायदे के लिए करता है. ईरान-अमेरिका युद्ध में भी उसने अपने फायदे के लिए बीच-बचाव किया. अब इसकी कीमत वह वसूलना चाहता है. ईरान-अमेरिका जंग में मीडिएटर बनकर पाकिस्तान असल में दलाली कर रहा है. उसके रोल पर सबको पहले से आशंका थी. पूरी दुनिया सोच रही थी कि आखिर आतंकवाद का जनक पाकिस्तान युद्ध खत्म करने में क्यों जुटा है? आखिर वह अमेरिका की जी हुजूरी क्यों कर रहा है, आखिर उसे ईरान के बीच मध्यस्थता की इतनी बेताबी क्यों है? आखिर इसके पीछे उसकी मंशा क्या है? अब इसके पीछे की असल वजह सामने आ गई है. जी हां, पाकिस्तान सच में दलाली ही कर रहा था. दरअसल, पाकिस्तान ने अमेरिका से 10 अरब डॉलर की मुद्रा सहायता यानी करेंसी सपोर्ट फैसिलिटी की मांग की है। 

    समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान युद्ध में मध्यस्थता की भूमिका निभाने के बाद पाकिस्तान ने अमेरिका से 10 अरब डॉलर की करेंसी सपोर्ट सुविधा मांगी है. सूत्र ने बताया कि इससे उसके विदेशी मुद्रा भंडार यानी फॉरेक्स रिजर्व को मजबूत करने और आर्थिक तंगी से जूझ रही अर्थव्यवस्था को राहत देने में मदद मिल सकती है। 

    क्यों अहम है पाकिस्तान की यह मांग
    पाक की ओर से यह मांग ऐसे समय में की गई है जब ईरान युद्ध से जुड़े बातचीत के प्रयासों में पाकिस्तान की भूमिका से उसकी कूटनीतिक स्थिति मजबूत हुई है. ईरान-अमेरिका युद्ध में अपने मध्यस्थ वाले रोल की वजह से इस्लामाबाद को उम्मीद है कि वह अमेरिका और अन्य अंतरराष्ट्रीय साझेदारों से आर्थिक लाभ हासिल कर सकता है। 

    सूत्र के अनुसार, पाकिस्तान ने अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय विनिमय स्थिरीकरण सहायता सुविधा (Bilateral Exchange Stabilisation Support Facility) शुरू करने का अनुरोध किया है. यह सुविधा अधिकतम पांच साल की अवधि के लिए होगी। 

    पाकिस्तान की डिमांड का क्या मकसद
        इस सुविधा का मकसद विदेशी मुद्रा भंडार और रुपये को सहारा देना है. अगर इस प्रस्ताव को मंजूरी मिल जाती है तो पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी होगी. इससे पाकिस्तानी रुपये पर दबाव कम होगा और देश की बहुपक्षीय संस्थाओं से मिलने वाली आर्थिक मदद पर निर्भरता भी घट सकती है. साथ ही, पाकिस्तान आईएमएफ यानी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष कार्यक्रम के तहत राजकोषीय और मौद्रिक सुधार भी लागू करता रहेगा। 

        फिलहाल, पाकिस्तान आईएमएफ के 7 अरब डॉलर के कार्यक्रम के तहत काम कर रहा है. इसके लिए उसे टैक्स बढ़ाने, सरकारी खर्च पर नियंत्रण रखने और कई अन्य आर्थिक सुधार लागू करने पड़े हैं. इन फैसलों की राजनीतिक कीमत भी सरकार को चुकानी पड़ी है। 

        अमेरिकी ट्रेजरी की ओर से मिलने वाली एक्सचेंज स्टेबिलाइजेशन फैसिलिटी बहुत कम देशों को दी जाती है. इसके तहत डॉलर, करेंसी स्वैप या गारंटी जैसी सहायता देकर किसी देश के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत किया जाता है और उसकी मुद्रा को स्थिर रखने में मदद मिलती है. यह अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा कुछ बड़े केंद्रीय बैंकों के साथ किए जाने वाले स्थायी डॉलर स्वैप समझौतों से अलग व्यवस्था है। 

    पहले भी आईएमएफ की मदद से टला डिफॉल्ट
    साल 2023 में पाकिस्तान ने आईएमएफ से 3 अरब डॉलर का स्टैंडबाय पैकेज हासिल कर संभावित डिफॉल्ट टाल दिया था. इसके बाद उसे 7 अरब डॉलर की एक्सटेंडेड फंड फैसिलिटी (EFF) भी मिली. इसके अलावा जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने की क्षमता बढ़ाने के लिए 1.3 अरब डॉलर का अलग कर्ज भी मिला. हालांकि, पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार अभी भी चीन और सऊदी अरब जैसे देशों से मिलने वाली आधिकारिक फंडिंग, रोलओवर और जमा राशि पर काफी हद तक निर्भर है। 

    अमेरिका के साथ आर्थिक रिश्ते मजबूत करना चाहता है पाकिस्तान
    अमेरिका से इस मदद की मांग ऐसे समय में की गई है जब पाकिस्तान, वॉशिंगटन के साथ अपने आर्थिक संबंध और मजबूत करना चाहता है. अगर यह मुद्रा सहायता सुविधा मिलती है तो यह पाकिस्तान के लिए आर्थिक सुरक्षा कवच के साथ-साथ एक मजबूत राजनीतिक संकेत भी होगी. इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम होगा और आईएमएफ की किस्तों तथा आपातकालीन आर्थिक मदद पर निर्भरता घट सकती है। 

    हालांकि, पाकिस्तान के आर्थिक सुधारों से अर्थव्यवस्था में कुछ स्थिरता आई है, लेकिन इसके लिए लोगों पर ज्यादा टैक्स लगाए गए हैं, सरकारी खर्च में कटौती की गई है और विकास व कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च की गुंजाइश सीमित हुई है. इस तरह देखा जाए तो आसिम मुनीर और शहबाज शरीफ अब तक अमेरिका की जी हुजूरी में क्यों लगे थे, इसका सबूत मिल गया है. अब समझ आ गया है कि आखिर पाकिस्तान काफी समय से अमेरिका की गुलामी क्यों क रहा था। 

  • नेतन्याहू पर बदला रुख! मेयर ममदानी ने कहा- ‘गिरफ्तार करना मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं’

    नेतन्याहू पर बदला रुख! मेयर ममदानी ने कहा- ‘गिरफ्तार करना मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं’

    वाशिंगटन
    न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने माना कि वो बेंजामिन नेतन्याहू को गिरफ्तार नहीं कर सकते. इससे पहले उन्होंने इसके लिए कानूनी सलाह लेने की बात कही थी. अब ममदानी ने कहा कि न्यू यॉर्क, इजरायल के बेंजामिन नेतन्याहू के लिए दुनिया की शीर्ष युद्ध-अपराध अदालत द्वारा जारी गिरफ्तारी वारंट को लागू नहीं कर पाएगा, लेकिन उन्होंने केंद्रीय सरकार से ऐसा करने की गुजारिश की। 

    इजरायल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू सितंबर 2026 में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के सेशन में शामिल होने के लिए न्यूयॉर्क जाने वाले हैं। वीडियो में ममदानी ने इजरायली प्रधानमंत्री को 'युद्ध अपराधी' बताया और कहा कि न्यूयॉर्क शहर में उनका स्वागत नहीं है। 

    न्यू यॉर्क मेयर ने X पर पोस्ट किए गए एक वीडियो में कहा, 'यह साफ है कि हमारे पास इस वारंट को लागू करने का स्वतंत्र कानूनी अधिकार नहीं है.' उन्होंने इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC) का जिक्र करते हुए कहा, 'हालांकि, केंद्र सरकार के पास यह अधिकार है और मैं उनसे ICC में शामिल होने और इस वारंट को लागू करने का आह्वान करता हूं। 

    ममदानी ने इस महीने की शुरुआत में न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया था कि वह और शहर का कानूनी विभाग इस बात पर चर्चा कर रहे थे कि अगर नेतन्याहू सितंबर में UN महासभा के लिए न्यूयॉर्क शहर आते हैं तो उन्हें गिरफ्तार किया जाए या नहीं। 

    राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को सोशल मीडिया पोस्ट में नेतन्याहू से कहा कि 'संयुक्त राज्य अमेरिका में रहने के दौरान उन्हें किसी भी तरह से गिरफ्तार नहीं किया जाएगा.' पोस्ट में ममदानी का सीधे तौर पर जिक्र नहीं किया गया था। 

    ममदानी ने पिछले साल अपने मेयर चुनाव अभियान के दौरान कहा था कि वह गाजा युद्ध में नेतन्याहू की भूमिका को लेकर आपराधिक अदालत के वारंट के तहत शहर की पुलिस को उन्हें गिरफ्तार करने का आदेश देने की कोशिश करेंगे। 

    मंगलवार को अपने वीडियो संदेश में, ममदानी ने कहा कि उनके प्रशासन ने सभी उपलब्ध विकल्पों की समीक्षा की है और यह तय किया है कि शहर गिरफ्तारी वारंट को लागू नहीं कर सकता। 

    दुनिया की शीर्ष युद्ध-अपराध अदालत (ICC) ने 2024 में नेतन्याहू और अन्य लोगों के लिए गिरफ्तारी वारंट जारी किए, जिसमें उन पर गाजा युद्ध के संबंध में मानवता के खिलाफ अपराधों का आरोप लगाया गया। 

    ICC ने माना था कि नेतन्याहू और इजरायल के पूर्व रक्षा मंत्री योव गैलेंट ने मानवीय सहायता को रोककर 'युद्ध के तरीके के रूप में भुखमरी' का इस्तेमाल किया है और गाजा में हमास के खिलाफ इजरायल के अभियान में जानबूझकर नागरिकों को निशाना बनाया है – इन आरोपों से इजरायली अधिकारी इनकार करते हैं। 

     

  • UK Cabinet में कनिष्क नारायण की एंट्री, देश के पहले AI मंत्री के रूप में संभालेंगे अहम जिम्मेदारी

    UK Cabinet में कनिष्क नारायण की एंट्री, देश के पहले AI मंत्री के रूप में संभालेंगे अहम जिम्मेदारी

    लंदन 

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI इतना आगे बढ़ चुका है कि अब इसके लिए खास मंत्री रखना पड़ रहा है. सरकारों की प्राथमिकता भी एआई बन चुका है. ब्रिटेन ने एक बड़ा कदम उठाया है। ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री एंडी बर्नहैम ने भारतीय मूल के सांसद कनिष्क नारायण को AI मंत्री के तौर पर कैबिनेट में शामिल किया है. यह पहली बार है जब ब्रिटेन में AI मंत्री को प्रधानमंत्री की कैबिनेट में जगह मिली है। 

    कनिष्क नारायण पहले भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑनलाइन सेफ्टी से जुड़े मंत्री थे, लेकिन अब उनका रोल और बड़ा हो गया है. नई सरकार में उन्हें सीधे कैबिनेट स्तर पर काम करने का मौका मिलेगा. इसका मतलब है कि AI से जुड़े बड़े फैसलों में अब उनका ही रोल होगा। 

    कनिष्क नारायण भारतीय मूल के लेबर पार्टी के नेता हैं. उनका परिवार भारत से जुड़ा है, जबकि उनका राजनीतिक सफर ब्रिटेन में रहा है. वह साल 2024 में वेल्स के वेल ऑफ ग्लेमॉर्गन से सांसद चुने गए थे. सितंबर 2025 में उन्हें AI और ऑनलाइन सेफ्टी मंत्री बनाया गया था. अब प्रधानमंत्री एंडी बर्नहैम ने उन्हें कैबिनेट में प्रमोट कर नई जिम्मेदारी दी है। 

    नई सरकार ने एक और बड़ा फैसला लिया है. डिपार्टमेंट ऑफ साइंस, इनोवेशन एंड टेक्नोलॉजी (DSIT) को खत्म कर उसे बिजनेस एंड ट्रेड डिपार्टमेंट में मिला दिया गया है. हालांकि AI से जुड़े मामलों की जिम्मेदारी कनिष्क नारायण के पास ही रहेगी. सरकार का कहना है कि इससे AI और बिजनेस से जुड़े फैसले तेजी से लिए जा सकेंगे।  

    ब्रिटेन पिछले कुछ सालों से खुद को AI हब बनाने की कोशिश कर रहा है. यहां Google DeepMind जैसी बड़ी AI कंपनियां मौजूद हैं. सरकार AI स्टार्टअप, रिसर्च और डेटा सेंटर में निवेश बढ़ा रही है. AI ग्रोथ जोन्स और सॉवरेन AI फंट जैसे प्रोजेक्ट्स भी इसी स्ट्रैटिजी का हिस्सा हैं। 

    हालांकि नई सरकार के कुछ फैसलों पर सवाल भी उठ रहे हैं. खासकर DSIT को दूसरे विभाग में मिलाने के फैसले की कई टेक एक्सपर्ट्स ने आलोचना की है. उनका कहना है कि AI और टेक्नोलॉजी के लिए अलग विभाग होना चाहिए. इसके बावजूद सरकार का दावा है कि AI उसकी सबसे बड़ी प्रायॉरिटी में रहेगा और कनिष्क नारायण इस एजेंडे को आगे बढ़ाएंगे। 

    AI को लेकर दुनिया में अमेरिका, चीन और यूरोप के बीच तेजी से कंपटीशन बढ़ रहा है. ऐसे समय में ब्रिटेन का AI मंत्री को कैबिनेट स्तर पर लाना एक बड़ा डेवेलपमेंट है. आने वाले समय में इस तरह के और भी अनाउंसमेंट्स दूसरे देशों में भी हो सकते हैं। 

  • कनाडा पर 50% टैरिफ से बढ़ी हलचल, ट्रंप के फैसले से व्यापार युद्ध की आशंका तेज

    कनाडा पर 50% टैरिफ से बढ़ी हलचल, ट्रंप के फैसले से व्यापार युद्ध की आशंका तेज

    वाशिंगटन

    अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने फिर से टैरिफ का बम फोड़ डाला है. इस बार उन्‍होंने कनाडा की वस्‍तुओं पर टैरिफ लगाया है. सोमवार को शराब, ऑटोमोबाइल और डेयरी प्रोडक्ट्स के सेक्‍टर में 'भेदभाव' का हवाला देते हुए कुछ कनाडाई वस्‍तुओं पर 50 फीसदी का नया टैरिफ लगाने का आदेश पर साइन कर दिया है। 

    व्हाइट हाउस के अनुसार, ये शुल्क 30 दिनों में लागू हो जाएंगे. इसमें यह भी कहा गया है कि हालांकि एनर्जी, पोटाश और सेक्‍टर स्‍पेशल टैरिफ से प्रभावित कुछ आयातों को छूट दी गई है, लेकिन नए टैरिफ अमेरिका-मेक्सिको-कनाडा व्यापार समझौते के तहत देश में प्रवेश करने वाले सामानों पर भी लागू होंगे। 

    ट्रंप द्वारा सोमवार को साइन तीन घोषणाओं के अनुसार, प्रभावित कनाडाई वस्तुओं में रेफ्रिजरेशन जैसे बिजली के उपकरण से लेकर मशीनरी तक शामिल हैं. व्‍हाइट हाउस के एक बयान में कहा गया है कि राष्‍ट्रपति ट्रंप कनाडा द्वारा अमेरिका के साथ लगातार किए जा रहे भेदभाव और अनुचित एवं असमान व्‍यवहार के लिए उसे जवाबदेह ठहराने के लिए कार्रवाई कर रहे हैं, जिससे अमेरिका पर बोझ पड़ा है और उन्‍हें नुकसान हुआ है। 

    किस कानून के तहत लगाया जा रहा ये टैरिफ? 
    ट्रंप ने 1930 के टैरिफ अधिनियम की धारा 338 का हवाला दिया, जो एक ऐसा कानून है जो राष्ट्रपति को किसी देश द्वारा अमेरिकी वस्तुओं के साथ भेदभाव करने के संदेह में कांग्रेस की मंजूरी के बिना वस्तुओं पर 50% तक टैरिफ लगाने की अनुमति देता है। 

    कनाडा पर क्‍यों लगाया टैरिफ? 
    पिछले हफ्ते ट्रंप ने कनाडा में लगी भीषण आग से हाल के दिनों में अमेरिकियों को हुए नुकसान के लिए कनाडा को सबक सिखाने के लिए कनाड़ा के सामानों पर हाई टैरिफ लगाने की धमकी दी थी. हालांकि, सोमवार को एक विशेष प्रशासनिक अधिकारी ने पत्रकारों को बतया कि यह कार्रवाई इससे संबंधित नहीं है. सीएनएन की एक रिपोर्ट के अनुसार अधिकारी ने कहा कि राष्‍ट्रपति के पास इस संबंध में अन्‍य विकल्‍प भी हैं। 

    गौरतलब है कि अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप द्वारा कई देशों पर टैरिफ लगाया गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी टैरिफ को गैर कानूनी बता दिया था और रिफंड जारी करने का आदेश दिया था, लेकिन फिर से कनाड़ा पर टैरिफ लगाकर ट्रंप ने एक नया डर पैदा कर दिया है। 

  • ईरान में जुमे की नमाज कराने वाले मौलवी मोहम्मद अनवर की हत्या, सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल

    ईरान में जुमे की नमाज कराने वाले मौलवी मोहम्मद अनवर की हत्या, सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल

    तेहरान 
    ईरान में एक बड़े सुन्नी मौलवी की हत्या कर दी गई है. मिर्जावेह प्रांत के गवर्नर ने बताया कि अज्ञात हथियारबंद लोगों ने शहर की अली इब्न अबी तालिब मस्जिद में सुन्नी मौलवी मोहम्मद अनवर रीगी की हत्या कर दी है. उन्होंने इसे आतंकी हमला करार दिया है. मिर्जावेह ईरान के दक्षिण पश्चिमी प्रांत का इलाका है. उन्होंने कहा कि कुछ हथियारबंद आतंकियों ने उसकी हत्या की है। 

    वे बलूच समुदाय के एक मौलवी थे. ईरान में सुन्नी आबादी वाले क्षेत्रों (खासकर बलूचिस्तान) में वे स्थानीय स्तर पर धार्मिक गतिविधियों से जुड़े रहे। उनकी नियुक्तिमिर्जावेह  की मस्जिद में इमाम-ए-जुम्मा के रूप में हुई थी. यह नियुक्ति विवादास्पद रही, क्योंकि इससे पहले मौलवी अब्दुल क़हार मीरबलोचज़ही को गिरफ्तार किया गया था और कई स्थानीय लोगों ने इस पर विरोध जताया था।  

    सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत ईरान के सबसे गरीब प्रांतों में से एक है. जहां ईरान एक शिया बहुल देश है वहीं सिस्तान-बलूचिस्तान में सुन्नी बलूच आबादी बड़ी संख्या में रहती है. यह प्रांत लंबे समय से इस्लामी या जातीय उग्रवादियों और सुरक्षा बलों या तेहरान के समर्थक गुटों के बीच संघर्ष का गवाह रहा है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार स्थानीय अधिकारियों ने कहा कि जांच चल रही है. उन्होंने यहां के लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है. ​​उन्होंने कहा कि इस हमले का मकसद सुरक्षा को कमजोर करना और प्रांत में सांप्रदायिक मतभेद भड़काना है। 

    अमेरिका के साथ जंग में उलझा है ईरान
    अमेरिका ने लगातार नौवीं रात ईरान के कई ठिकानों पर बमबारी की है, वहीं ईरान भी खाड़ी देशों को निशाना बना रहा है. बढ़ती तल्खी के बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि अमेरिका के साथ युद्ध तब तक नहीं रुकेगा, जब तक हमें लड़ाई में मजबूत बढ़त नहीं मिल जाती. ईरान की सरकारी न्यूज एजेंसी आईआरएनए को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा, "बातचीत भी तभी होनी चाहिए, जब ईरान ऐसी स्थिति में हो जहां उसे लगे कि हालात उसके पक्ष में हैं। 

    अराघची ने कहा कि किसी भी युद्ध का अंत दो तरह से होता है. पहला, जब किसी एक पक्ष को सैन्य जीत मिल जाए. दूसरा, जब दोनों पक्ष बातचीत करके समझौते पर पहुंचें. लेकिन बातचीत तभी करनी चाहिए, जब संघर्ष में अपनी स्थिति मजबूत हो. जल्दबाजी में बातचीत करना सही नहीं होगा. इसके साथ ही उन्होंने ईरान की सुरक्षा को भी अहम बताया. उन्होंने कहा कि लोगों की जान और देश के भविष्य को खतरे में नहीं डाला जा सकता. हर फैसला पूरी जानकारी और सही आकलन के बाद ही लिया जाना चाहिए। 

     मिर्जावेह  में मस्जिद के पास अज्ञात हथियारबंद हमलावरों ने उन पर गोलीबारी की. गोली लगने से वे मौके पर ही शहीद हो गए. यह उन पर दूसरा हमला था. दिसंबर 2024 में भी उन पर गोलीबारी हुई थी, लेकिन उस समय वे बच गए थे। 

    विदेश मंत्री ने बयान देकर जले पर नमक छिड़का

    अमेरिका और ईरान की जंग एक बार फिर चरम पर पहुंच चुकी है. ईरानी हमलों में तीसरे अमेरिकी सैनिक की मौत की पुष्टि हो गई है और अब डोनाल्ड ट्रंप बदला लेने के मूड में हैं. अमेरिकी सेना ने लगातार नौवीं रात ईरान पर हमला बोला है. एक तरफ ट्रंप कह रहे हैं कि ईरानी हमलों में मारे गए अमेरिकी सैनिकों की याद में, उन्हें सम्मान देने के लिए हमले किए जा रहे हैं. वहीं अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कह दिया है कि सेना का कोई भी काम सुरक्षित नहीं होता. यह सब अपने आप में खतरनाक होता है. इस नाजुक मोड़ पर मार्को रुबियो का यह बयान शहीदों के परिवारों को शायद रास नहीं आए। 

    ईरान की सरकारी मीडिया ने कहा है कि अमेरिका के नए हमलों के बाद तबरीज, चाबहार, कोणार्क, बंदर महशहर और बंदर इमाम खुमैनी में विस्फोट की सूचना मिली है। 

    एक और अमेरिकी सैनिक की मौत
    अमेरिकी रक्षा विभाग यानी पेंटागन नेकहा कि ईरान के हमलों में अमेरिकी सेना के एक तीसरे सैनिक की मौत हो गई है. युद्ध का दायरा लगातार बढ़ रहा है और अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में और लड़ाकू विमान भेजने शुरू कर दिए हैं. पेंटागन ने बताया कि शनिवार को उत्तरी इराक में ईरान के एक गिराए गए अटैक ड्रोन को नष्ट करने के दौरान सैनिक की मौत हो गई। 

    मार्को रुबियो का बयान
    जब अमेरिका के विदेश मंत्री से शहीद हुए सैनिकों के बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने कहा, "लेकिन देखिए, हमारी सेना दुनिया भर में, खासकर उस इलाके में लेकिन हर जगह, हर दिन बहुत खतरनाक काम करती है. हमारे यहां ऐसे लोग भी रहे हैं जिनकी ट्रेनिंग के दौरान जान चली गई. सेना जो भी काम करती है, उसमें से कुछ भी सुरक्षित नहीं होता. यह सब अपने आप में खतरनाक होता है…" 

    अभी भी बातचीत के लिए राजी अमेरिका- रुबियो

    विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने पत्रकारों से कहा कि अमेरिका अभी भी ईरान के साथ बातचीत करने के लिए तैयार है, लेकिन बातचीत असल होनी चाहिए. रुबियो ने कहा, "हम जवाब देते रहेंगे. अगर बातचीत का रास्ता खुलता है, यानी अगर ईरान के लिए कुछ अच्छा करने वाले लोग जीतते हैं और सिस्टम या बातचीत की कमान संभालते हैं, तो यह बहुत अच्छी बात होगी… लेकिन अफसोस की बात है कि अभी हालात ऐसे नहीं हैं। 

  • Hormuz Strait में दो मालवाहक जहाजों में विस्फोट, तेल-LPG और खाद से लदे पोत हादसे का शिकार

    Hormuz Strait में दो मालवाहक जहाजों में विस्फोट, तेल-LPG और खाद से लदे पोत हादसे का शिकार

    तेहरान
     ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने सोमवार को दावा किया कि दक्षिणी होर्मुज स्ट्रैट में दो तेल टैंकरों में धमाका हुआ है, जिसके बाद दोनों जहाज बेकार हो गए। IRGC ने एक बयान में कहा कि दोनों टैंकरों ने होर्मुज स्ट्रैट से होकर गुजरने वाले एक असुरक्षित दक्षिणी रास्ते का इस्तेमाल करने की कोशिश की थी।

    IRGC का आरोप है कि उन्हें अमेरिकी सेना ने इस रास्ते का इस्तेमाल करने के लिए उकसाया था।
    IRGC ने कहा, जब तक इस इलाके में अमेरिका की आक्रामकता जारी रहेगी, तब तक यह जलमार्ग असुरक्षित रहेगा। IRGC ने चेतावनी देते हुए कहा, यह रास्ता पेट्रोकेमिकल उत्पादों, या तेल और गैस की एक बूंद के भी आने-जाने के लिए सुरक्षित नहीं होगा।

    साथ ही अमेरिकी सेना से सजा देने वाले ऑपरेशन के लिए तैयार रहने को कहा गया है।
    हालांकि अभी इस घटना की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है। IRGC के बयान में जहाजों के नाम, वे किस देश के झंडे के नीचे चल रहे थे, क्रू में कितने लोग थे या किसी जान-माल के नुकसान के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है।

    ईरानी हमलों से दहल गया अमेरिका, 50000 सैनिक अलर्ट पर

    एक तरफ अमेरिका और ईरान की जंग तेज होने लगी है, तो दूसरी तरफ अमेरिका ने ईरान के पास से अपने विमानों को हटाना शुरू कर दिया है. देखने में तो यह लगता है कि जैसे अमेरिका अपने कदम पीछे ले रहा है. लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है. सीधे तौर पर यह एक युद्ध स्ट्रैटेजी है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने साल में दूसरी बार कतर स्थित अपने सबसे बड़े सैन्य अड्डे अल उदेद एयर बेस से अहम सैन्य विमानों को हटाना शुरू कर दिया है. इस बार अमेरिका अपने सबसे कीमती KC-135 स्ट्रैटोटैंकर विमानों को कतर से निकालकर दक्षिणी इजरायल के ओवडा एयर बेस भेज रहा है। 

    ईरानी हमलों से दहल गया अमेरिका, ट्रंप आनन-फानन में कतर से हटाने लगे जेट
    यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब ईरान की ओर से अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमलों का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है. सैन्य विशेषज्ञ इसे केवल सुरक्षा उपाय नहीं, बल्कि अमेरिका की नई सैन्य रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं. इससे पहले खबर आई थी कि अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने कहा कि पश्चिम एशिया में तैनात 50,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक पूरी तरह सतर्क हैं. अमेरिकी सेना ने ईरान पर हमलों का एक और दौर पूरा कर लिया है। 

    साल में दूसरी बार एयरबेस से हटाने पड़े विमान
    फ्लाइट ट्रैकिंग डेटा और सैटेलाइट तस्वीरों के मुताबिक, जुलाई के मध्य से अल उदेद एयर बेस से दर्जनों KC-135 विमान उड़ान भर चुके हैं. रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अब तक 60 से ज्यादा अमेरिकी एरियल रिफ्यूलिंग विमान इजरायल पहुंच चुके हैं, जबकि इनमें से कम से कम 33 विमान बेन गुरियन एयरपोर्ट पर देखे गए हैं. 18 और 19 जुलाई के बीच भी कई और विमानों के पहुंचने की उम्मीद जताई गई. यह इस साल दूसरी बार है, जब अमेरिका को अल उदेद एयर बेस से अपने विमान हटाने पड़े हैं. इससे संकेत मिल रहे हैं कि वॉशिंगटन अब अपने सबसे बड़े सैन्य अड्डे की सुरक्षा को लेकर पहले से ज्यादा सतर्क हो गया है। 

    क्यों अहम हैं KC-135 टैंकर विमान?
    KC-135 स्ट्रैटोटैंकर अमेरिकी वायुसेना के सबसे महत्वपूर्ण सपोर्ट विमानों में गिने जाते हैं. इनका काम हवा में ही लड़ाकू विमानों और बॉम्बर्स को ईंधन उपलब्ध कराना है. इससे फाइटर जेट लंबी दूरी तक उड़ान भर सकते हैं और कई घंटों तक मिशन पर बने रह सकते हैं. अगर ये विमान उपलब्ध न हों तो किसी भी बड़े हवाई अभियान की क्षमता काफी सीमित हो जाती है। 

    सिर्फ बचाव नहीं, हमले की तैयारी भी
    रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन विमानों को इजरायल भेजने के पीछे दो बड़े मकसद हैं. पहला, इन्हें संभावित ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों से सुरक्षित रखना. दूसरा, अगर क्षेत्र में हालात और बिगड़ते हैं तो इन्हें मोर्चे के करीब रखकर तुरंत सैन्य अभियान में इस्तेमाल किया जा सके। 

    अल उदेद एयर बेस क्यों है इतना अहम?
    कतर का अल उदेद एयर बेस मध्य पूर्व में अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के सैन्य अभियानों का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है. यहीं से अमेरिका पूरे पश्चिम एशिया में अपने हवाई अभियानों का संचालन करता है. ऐसे में इस बेस से विमानों का हटाया जाना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि अमेरिका अब ईरानी खतरे को पहले से कहीं ज्यादा गंभीरता से ले रहा है। 

    ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड पहले भी अल उदेद एयर बेस को निशाना बनाने का दावा कर चुकी है. इसके अलावा 2025 में भी इस बेस पर बैलिस्टिक मिसाइल हमले की आशंकाएं जताई गई थीं. ऐसे में अमेरिका का ताजा कदम बढ़ते तनाव के बीच एक बड़े रणनीतिक बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है। 

    दुनिया का सबसे खतरनाक समुद्री रास्ता बना होर्मुज
    ईरान-अमेरिका जंग की शुरुआत के बाद से ही होर्मुज स्ट्रेट इस समय दुनिया के सबसे खतरनाक समुद्री मार्गों में गिना जा रहा है. खाड़ी से निकलने वाले बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और गैस के टैंकर इसी रास्ते से गुजरते हैं. लगातार बढ़ते सैन्य तनाव के बीच यहां से गुजरने वाले जहाजों के सामने हर पल मिसाइल, ड्रोन या समुद्री माइन का खतरा बना हुआ है. यह पहली बार नहीं है जब ईरान ने होर्मुज में टैंकरों के धमाके का दावा किया हो. पिछले सप्ताह भी IRGC ने कहा था कि दो ऑयल टैंकर माइन से टकराकर फट गए थे. हालांकि उस समय अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा था कि ‘ज्यादातर IRGC के दावों की तरह यह दावा भी गलत है.’ उस दौरान ईरान ने यह भी दावा किया था कि उसने मिसाइल और ड्रोन अभियान चलाकर होर्मुज से गुजरने की कोशिश कर रहे चार जहाजों को रोक दिया था। 

    ईरान में MQ-9 ड्रोन मार गिराने का भी दावा
    अमेरिका ने इस बीच ईरान पर लगातार 9वीं रात हमला किया है. ईरान के बंदरगाहों पर धमाके हो रहे हैं. इसी बीच ईरान की मेहर न्यूज एजेंसी ने दावा किया है कि पश्चिमी ईरान के केरमानशाह प्रांत में एक अमेरिकी MQ-9 ड्रोन को मार गिराया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, IRGC एयरोस्पेस फोर्स की एडवांस एयर डिफेंस सिस्टम ने इस ड्रोन को निशाना बनाया. इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल नहीं हुई है. वहीं, अमेरिका की ओर से भी इन ताजा घटनाओं पर तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। 

  • स्काविनो की B-2 पोस्ट ने बढ़ाई हलचल, ईरान के खिलाफ कार्रवाई की अटकलें तेज

    स्काविनो की B-2 पोस्ट ने बढ़ाई हलचल, ईरान के खिलाफ कार्रवाई की अटकलें तेज

    नई दिल्ली
    ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच व्हाइट हाउस के डिप्टी चीफ ऑफ स्टाफ डैन स्काविनो का एक सोशल मीडिया पैटर्न फिर सुर्खियों में है. दावा किया जा रहा है कि जब-जब उन्होंने B-2 स्पिरिट स्टील्थ बॉम्बर का वीडियो पोस्ट किया, उसके कुछ समय बाद ईरान के खिलाफ बड़े सैन्य अभियान शुरू हुए. अब उनके नए वीडियो पोस्ट ने एक बार फिर संभावित अमेरिकी कार्रवाई की अटकलों को हवा दे दी है.

    बताया जा रहा है कि फरवरी 2026 में स्काविनो ने पहली बार B-2 बॉम्बर का वीडियो शेयर किया था. करीब 24 घंटे बाद अमेरिका और इजरायल ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर संयुक्त हवाई हमले शुरू कर दिए थे.

    इसके बाद फरवरी के आखिर और मार्च की शुरुआत में अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने "ऑपरेशन मिडनाइट हैमर" की पुष्टि की. इस अभियान में चार B-2 बॉम्बर्स ने अंडरग्राउंड मिसाइल और परमाणु ठिकानों पर 2,000 पाउंड के बम गिराए और सैकड़ों सैन्य लक्ष्यों को निशाना बनाया.

    मई 2026 में स्काविनो ने बिना किसी कैप्शन के फिर वही 17 सेकंड का B-2 बॉम्बर वाला वीडियो पोस्ट किया. इसके तुरंत बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बंदर अब्बास समेत ईरान के कमांड सेंटर, एयर डिफेंस सिस्टम और मिसाइल ठिकानों पर नए हमलों का आदेश दिया.

    अब फिर से स्काविनो ने एक और वीडियो शेयर किया है, जिसमें B-2 स्पिरिट बॉम्बर के साथ F-22 रैप्टर लड़ाकू विमान उड़ते दिखाई दे रहे हैं. यह पोस्ट ऐसे समय आया है जब ईरान लगातार अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले कर रहा है और राष्ट्रपति ट्रंप नए सैन्य विकल्पों पर विचार कर रहे हैं.

    B-2 स्पिरिट को अमेरिका का सबसे आधुनिक स्टील्थ स्ट्रैटेजिक बॉम्बर माना जाता है. यह भारी सुरक्षा वाले इलाकों में रडार से बचते हुए घुस सकता है और भूमिगत बंकरों को नष्ट करने वाले शक्तिशाली "बंकर बस्टर" बम ले जाने में सक्षम है. यही वजह है कि विश्लेषकों का मानना है कि इस विमान की तस्वीरें या वीडियो सिर्फ सैन्य ताकत दिखाने के लिए नहीं, बल्कि ईरान को रणनीतिक संदेश देने के लिए भी इस्तेमाल किए जाते हैं. हालांकि, अमेरिकी प्रशासन ने आधिकारिक तौर पर यह नहीं कहा है कि स्काविनो की सोशल मीडिया पोस्ट किसी सैन्य कार्रवाई का संकेत होती हैं.

  • कलात से CPEC तक: बलूचिस्तान की राजनीति और संघर्ष का पूरा सच

    कलात से CPEC तक: बलूचिस्तान की राजनीति और संघर्ष का पूरा सच

    नई दिल्ली
    1947 में जब भारत और पाकिस्तान के रूप में दो नए देशों का जन्म हो रहा था, उसी समय दक्षिण एशिया के एक कोने में एक ऐसा सियासी खेल खेला जा रहा था, जिसकी चिंगारी आज 70 से ज्यादा सालों बाद भी बलूचिस्तान में सुलग रही है। बलूचिस्तान का पाकिस्तान में विलय कैसे हुआ? क्या वहां के शासक भारत के साथ आना चाहते थे? और आज बलूचिस्तान पाकिस्तान और चीन (CPEC) के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है? आइए, इतिहास के उन पन्नों को पलटते हैं जो आज भी भारत-पाकिस्तान और बलूच राष्ट्रवादियों के बीच तीखी बहस का विषय हैं।

    1947 का वो विभाजन: दो हिस्सों में बंटा बलूचिस्तान
    अंग्रेजों के शासनकाल में आज का बलूचिस्तान दो प्रशासनिक इकाइयों में बंटा हुआ था। यह सीधे ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण में था और इसकी सीमाएं रणनीतिक रूप से तय थीं।
    इनमें सबसे बड़ी और सबसे प्रभावशाली रियासत थी 'कलात का खानत', जिसके शासक खान मीर अहमद यार खान थे।

    ब्रिटिश कानून के मुताबिक, भारत की दूसरी रियासतों की तरह कलात के पास भी यह अधिकार था कि वह अंग्रेजों के जाने के बाद अपना राजनीतिक भविष्य खुद चुने। कलात के खान का तर्क था कि अंग्रेजों के साथ उनकी संधि का दर्जा बाकी रियासतों से अलग है, इसलिए वे भारत या पाकिस्तान किसी में शामिल न होकर एक स्वतंत्र राष्ट्र बने रहेंगे।

    कलात की आजादी और पाकिस्तान का 'दबाव'
    पाकिस्तान बनने के ठीक एक दिन बाद, 15 अगस्त 1947 को कलात ने खुद को एक स्वतंत्र देश घोषित कर दिया। अगले कुछ महीनों तक कलात और पाकिस्तान के नए हुक्मरानों के बीच बातचीत का दौर चलता रहा।

    यह बातचीत मार्च 1948 में खत्म हुई, जब खान मीर अहमद यार खान ने 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' पर दस्तखत कर दिए और कलात औपचारिक रूप से पाकिस्तान का हिस्सा बन गया।

    पाकिस्तान का दावा है कि यह विलय पूरी तरह कानूनी और स्वैच्छिक था। इसके उलट, कई बलूच राष्ट्रवादी संगठन और इतिहासकार मानते हैं कि पाकिस्तान ने कलात पर भारी सैन्य और राजनीतिक दबाव बनाया था, जिसके चलते खान को मजबूरन दस्तखत करने पड़े।

    पहले बलूच विद्रोह की शुरुआत
    विलय के तुरंत बाद ही बलूचिस्तान में विरोध की आग भड़क उठी। कलात के खान के छोटे भाई, प्रिंस अब्दुल करीम ने इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने अफगान सीमा के पास से पाकिस्तान सरकार के खिलाफ एक सशस्त्र विद्रोह शुरू कर दिया।

    हालांकि पाकिस्तानी सेना ने इस विद्रोह को कुचल दिया, लेकिन इतिहासकार इसे 'पहला बलूच उग्रवाद' मानते हैं। तब से लेकर आज तक बलूचिस्तान में स्वायत्तता और आजादी की मांग को लेकर कई बार हिंसक आंदोलन हो चुके हैं।

    क्या बलूचिस्तान भारत का हिस्सा बनना चाहता था?
    यह बलूचिस्तान के इतिहास का सबसे रहस्यमयी और विवादित हिस्सा है। ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि 1947 में कलात ने भारत सरकार से संपर्क किया था, लेकिन वह भारत में शामिल होने के लिए नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र पहचान को मान्यता दिलाने और दिल्ली में एक ट्रेड एजेंसी खोलने की इजाजत मांगने के लिए था।
    जब उस वक्त इस बात की अफवाहें उड़ीं, तो भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संसद में स्थिति साफ की थी।

    नेहरू ने साफ शब्दों में कहा कि कलात ने कभी भी भारत में विलय का औपचारिक प्रस्ताव नहीं दिया। उन्होंने इन खबरों को खारिज करते हुए कहा कि बलूचिस्तान की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि भारत में इसके विलय का सवाल ही पैदा नहीं होता।

    आज भी भारतीय अभिलेखागार में ऐसा कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है जो यह साबित करे कि भारत ने कभी कलात के विलय पर विचार किया था।

    आज बलूचिस्तान क्यों है बेहद खास?
    इतिहास के विवादों से इतर, आज बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे महत्वपूर्ण और रणनीतिक क्षेत्र बन चुका है। इसके पीछे तीन बड़े कारण हैं:

    विशाल भूभाग और संसाधन: यह क्षेत्रफल के हिसाब से पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, जो देश के कुल 44 फीसदी हिस्से को कवर करता है (हालांकि यहां की आबादी सबसे कम है)। यह इलाका प्राकृतिक गैस, कोयला, तांबा और सोने जैसे बेशकीमती संसाधनों से समृद्ध है।

    ग्वादर पोर्ट और CPEC: अरब सागर के तट पर स्थित ग्वादर पोर्ट बलूचिस्तान में ही है। यह बंदरगाह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का मुख्य केंद्र है, जो चीन के महत्वाकांक्षी 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) का एक फ्लैगशिप प्रोजेक्ट है।

    शोषण का आरोप: बलूच राष्ट्रवादियों का आरोप है कि इस्लामाबाद उनके प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहा है, लेकिन इसका आर्थिक लाभ स्थानीय लोगों को नहीं मिल रहा। वहीं पाकिस्तान सरकार इन आरोपों को खारिज करते हुए कहती है कि CPEC जैसी परियोजनाओं से इलाके में नौकरियां और इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत हो रहा है।

  • ईरान-US संघर्ष ने पकड़ी रफ्तार, मिसाइल अटैक से कई शहर दहले, MQ-9 ड्रोन तबाह और होर्मुज में मचा हड़कंप

    ईरान-US संघर्ष ने पकड़ी रफ्तार, मिसाइल अटैक से कई शहर दहले, MQ-9 ड्रोन तबाह और होर्मुज में मचा हड़कंप

    तेहरान 

    अमेरिका और ईरान के बीच जारी जंग अब पूरी तरह से विनाशकारी मोड़ पर पहुंच चुकी है. सैन्य संघर्ष के बीच ईरान ने कई बड़े दावे किए हैं. ईरानी मीडिया और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के मुताबिक, ईरान ने बुशेहर के ऊपर उड़ान भर रहे एक अमेरिकी MQ-9 रीपर ड्रोन को मार गिराया है. ईरानी मीडिया ने दावा किया कि करीब 3.4 करोड़ डॉलर कीमत वाला यह ड्रोन कुछ ही पलों में नष्ट हो गया। 

    इसी बीच ईरान के सरकारी टीवी और तसनीम  समाचार एजेंसी ने दावा किया कि होर्मुज स्ट्रेट के दक्षिण में दो ऑयल टैंकर माइनफील्ड से गुजरने के दौरान विस्फोट का शिकार हो गए और उनमें भीषण आग लग गई. ईरानी सेना ने दावा किया है कि उसने कुवैत और जॉर्डन में अमेरिकी कैंपों और ठिकानों को निशाना बनाया है। 

    ईरानी मीडिया का दावा है कि अमेरिका की दर्जनों एयर डिफेंस मिसाइलें छोड़े जाने के बावजूद, ईरान की मिसाइलों ने जॉर्डन के उस मुवाफ़्फ़क साल्टी एयर बेस पर अटैक किया है जहां अमेरिकी सेना मौजूद है. रिपोर्ट के मुताबिक, ईरानी नौसेना की चेतावनी के बावजूद दोनों टैंकर आगे बढ़े, जिसके बाद वे कथित तौर पर बारूदी सुरंगों वाले क्षेत्र में पहुंच गए. IRGC ने दावा किया कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के कारण होर्मुज स्ट्रेट अब पूरी तरह असुरक्षित और बंद है। 

    ईरान की सरकारी मीडिया तस्नीम ने 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) की नौसेना के हवाले से कहा कि अमेरिकी आक्रामकता और हमलों के कारण होर्मज  इस समय "अत्यधिक असुरक्षित और पूरी तरह से बंद" है. ईरानी नौसेना ने पहले ही जहाजों को इस रूट से न गुजरने की चेतावनी दी थी, जिसे दोनों तेल टैंकरों ने नजरअंदाज कर दिया था. इस घटना के बाद वैश्विक तेल बाजार में हाहाकार मचने की आशंका है। 

    समझौते के बावजूद तनातनी
    ईरान और अमेरिका के बीच शुरुआती समझौते के बावजूद कई मुद्दों पर तनातनी बरकरार है। इसमें सबसे अहम मुद्दा होर्मुज जलडमरूमध्य का है। हर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से फीस लेने के मामले पर विवाद है। ईरान इस मुद्दे पर पीछने हटने को राजी नहीं है। वहीं अमेरिका का कहना है कि वह होर्मुज में टोल व्यवस्था को लागू नहीं होने दिया जाएगा।

    ईरान का कहना है कि होर्मुज से गुजरने वाले जहाज निगरानी में ही इस समुद्री रास्ते को पार करेंगे। हालिया विवाद की वजह भी कुछ जहाजों का ईरान के तय रूट को ना मानना है। इसके अलावा लेबनान और कुछ दूसरे मुद्दों पर भी दोनों पक्षों की ओर से आ रहे बयान अलग-अलग तरह के हैं। इससे दोनों देशों में शांति की उम्मीदों को झटका लगा है।

    ईरान के यज्द और अहवाज शहरों पर मिसाइल हमले
    समुद्र और आसमान में जारी इस तबाही के बीच, अमेरिकी वायुसेना ने ईरान की मुख्य भूमि पर हमलों का दायरा बढ़ा दिया है. ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, देश के कई हिस्सों में सिलसिलेवार बड़े धमाके सुने गए हैं:

    यज्द प्रांत : ईरान की तस्नीम एजेंसी के मुताबिक, मध्य ईरान के ऐतिहासिक शहर यज्द में एक के बाद एक 5 भीषण विस्फोट सुने गए हैं। 

    फार्स प्रांत: दक्षिण-पश्चिम फार्स प्रांत के लास इलाके के बाहरी हिस्सों में भी बड़े धमाके की पुष्टि हुई है। 

    अहवाज: ईरान की 'मेहर' न्यूज एजेंसी के अनुसार, दक्षिण-पश्चिमी खुज़ेस्तान प्रांत के प्रमुख शहर अहवाज पर अमेरिकी मिसाइलों से बड़ा हमला किया गया है, जिसकी पुष्टि स्थानीय अधिकारियों ने भी की है। 

    ईरान पर अमेरिका की लगातार सातवें दिन भीषण बमबारी, ट्रंप ने ग्राउंड ऑपरेशन के भी दिए संकेत 

    चौतरफा मिसाइल हमलों, ड्रोन को मार गिराए जाने और तेल टैंकरों में लगी आग के बाद खाड़ी क्षेत्र पूरी तरह से बारूद के ढेर पर बैठ गया है. संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक समुदाय इस महाविनाश को रोकने में अब तक पूरी तरह बेअसर साबित हुए हैं. अमेरिका की ओर से भी MQ-9 ड्रोन गिराए जाने, टैंकरों में विस्फोट या ईरान के विभिन्न शहरों में हमलों को लेकर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। 

  • ईरान-अमेरिका डील के बीच पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ीं, युद्ध का खतरा मंडराया

    ईरान-अमेरिका डील के बीच पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ीं, युद्ध का खतरा मंडराया

    नई दिल्ली
    ईरान और अमेरिका के बीच डील कराने में जुटा पाकिस्तान अब युद्ध में भी उतर सकता है. ऐसी अटकलें इसलिए लगाई जा रही हैं क्योंकि यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब पर मिसाइलें दागी हैं. इस अटैक के बाद इस्लामाबाद को सऊदी और ईरान दोनों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना मुश्किल हो सकता है.

    पाकिस्तान ने पिछले साल सऊदी अरब के साथ एक डिफेंस डील पर साइन किए थे, जिसके बाद उसके हजारों सैनिक सऊदी अरब में तैनात हैं. अब ऐसी आशंका है कि सऊदी और ईरान के बीच तनाव बढ़ सकता है, जो पाकिस्तान को भी युद्ध में घसीट सकता है.

    ये हमारी रेड लाइन है: PAK
    पाकिस्तान के एक अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया, 'हमारी सरकार और फील्ड मार्शल ने ईरान की टॉप लीडरशिप को क्लीयर कर दिया है कि सऊदी अरब पर हमले पाकिस्तान पर हमले हैं. यह हमारी रेड लाइन है.'

    इस्लामाबाद ने पहले ही सऊदी अरब पर ईरान के हमलों को लेकर चिंता जताई थी, लेकिन अधिकारियों और विश्लेषकों ने रॉयटर्स को बताया कि हाल ही में हुए हूती हमलों ने इस्लामाबाद की चिंता को काफी बढ़ा दिया है. सिक्योरिटी एक्सपर्ट मुहम्मद आमिर राणा ने कहा कि पाकिस्तान को इतनी जल्दी तनाव बढ़ने की उम्मीद नहीं थी. अधिकारियों को यह भी आशंका है कि हूती विद्रोहियों के और हमले सऊदी-यमन सीमा के पास तैनात पाकिस्तानी सैनिकों की सुरक्षा को खतरे में डाल सकते हैं और रियाद के साथ हुए रक्षा समझौते के तहत इस्लामाबाद पर जवाबी कार्रवाई करने का दबाव बढ़ा सकते हैं.

    पाकिस्तान को क्या है चिंता?
    रिटायर्ड पाकिस्तानी जनरल गुलाम मुस्तफा ने कहा कि लीडरशिप अभी भी दोनों पक्षों को शांत करने में लगी हुई है. हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि अगर हूती सऊदी अरब के अंदर अपने हमले बढ़ाते हैं तो हालात बदल सकते हैं. इस्लामाबाद को ये भी चिंता है कि इस रीजन में संघर्ष से लाल सागर के माध्यम से होने वाला समुद्री व्यापार बाधित हो सकता है.

    पाकिस्तान की मध्यस्थता ईरान को होगी स्वीकार?
     रिपोर्ट के मुताबिक, हूती-सऊदी के बीच हालिया तनाव ने अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान की भूमिका को और अधिक कठिन बना दिया है, हालांकि पिछले महीने दोनों देशों के बीच एक अंतरिम समझौते में मध्यस्थता करने में पाकिस्तान ने मदद की थी. एक पाकिस्तानी अधिकारी ने कहा कि बढ़ती निराशा के बावजूद पाकिस्तान मध्यस्थता के लिए प्रतिबद्ध है.

    पाकिस्तानी अधिकारी ने रॉयटर्स से कहा, 'हां निराशा तो है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता को छोड़ रहे हैं. हमने इसमें बहुत निवेश किया है और हम इसे जारी रखने में रुचि रखते हैं.'

     पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने गुरुवार को सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की थी. उन्होंने कहा, 'निरंतर जुड़ाव, संवाद और कूटनीति का कोई विकल्प नहीं है.'