Category: धर्म अध्यात्म

  • पुत्र न हो तो कौन करेगा श्राद्ध? गरुड़ पुराण में बताया गया है पूरा अधिकार-क्रम

    पुत्र न हो तो कौन करेगा श्राद्ध? गरुड़ पुराण में बताया गया है पूरा अधिकार-क्रम

    सनातन धर्म और गरुड़ पुराण में पितृऋण से मुक्ति और पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति के लिए श्राद्ध कर्म को अनिवार्य माना गया है. धर्मशास्त्रों में ज्येष्ठ पुत्र को पिता के श्राद्ध और पिंडदान का मुख्य अधिकारी माना गया है. हालांकि, यदि पुत्र न हो या पुत्र जीवित न हो या किसी कारणवश उपस्थित न हो, तो गरुड़ पुराण में स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि पितृ कर्म कभी रुकना नहीं चाहिए. इसके लिए शास्त्रों में एक निश्चित अधिकार-क्रम निर्धारित किया गया है, जिसके अनुसार परिवार और समाज के अन्य लोग भी इस पवित्र कर्म को संपन्न कर सकते हैं.

    पुत्र की अनुपस्थिति में निकटतम परिजनों के अधिकार
    गरुण पुराण के मुताबिक, पुत्र न होने की स्थिति में सबसे पहला अधिकार पौत्र यानी पोते और प्रपौत्र यानी परपोते का होता है, क्योंकि वे उसी वंश श्रृंखला का हिस्सा माने जाते हैं. यदि वंश में पुरुष संतति न हो, तो मृतक की धर्मपत्नी को अपने पति का श्राद्ध और पिंडदान करने का पूर्ण शास्त्रसम्मत अधिकार प्राप्त होता है.

    यदि केवल बेटियां हैं, तो गरुड़ पुराण के अनुसार पुत्री भी अपने पिता का श्राद्ध कर सकती है. इसी क्रम में पुत्री का पुत्र यानी दौहित्र (नाती) भी अपने नाना-नानी के श्राद्ध कर्म का पूर्ण अधिकारी होता है. इसके अतिरिक्त, घर में पुरुष सदस्य न होने पर परिवार की ज्येष्ठ पुत्रवधू यानी बड़ी बहू भी अपने सास-ससुर का पिंडदान कर सकती है.

    अन्य संबंधियों व विशेष परिस्थितियों में श्राद्ध का विधान
    गरुड़ पुराण के अनुसार, संतान न होने की स्थिति में मृतक का सगा भाई या भाई का पुत्र यानी भतीजा भी इस दायित्व को निभा सकता है. निकटतम परिवार में किसी के न होने पर सगोत्र या सपिंड (एक ही गोत्र के रिश्तेदार) को यह अधिकार मिलता है.

    यदि मृतक का कोई भी पारिवारिक या रक्त संबंधी जीवित न हो, तो उसका शिष्य, गुरु या परम मित्र भी उसकी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध कर सकता है. गरुड़ पुराण यहां तक कहता है कि यदि कोई भी सगा-संबंधी न हो, तो कोई योग्य ब्राह्मण भी मृतक के निमित्त तर्पण कर सकता है. इसका मूल भाव यही है कि श्रद्धापूर्वक किया गया कार्य ही मुख्य है और किसी भी परिस्थिति में पूर्वजों की आत्मा की शांति का यह कर्म अधूरा नहीं रहना चाहिए.

  • सपने में मंदिर, सांप या सूर्योदय दिखे तो क्या होता है? जानें 7 सपनों के संकेत

    सपने में मंदिर, सांप या सूर्योदय दिखे तो क्या होता है? जानें 7 सपनों के संकेत

     क्या आपने कभी रात में ऐसा सपना देखा है, जिसे सुबह उठने के बाद भी आप भूल नहीं पाए? कुछ सपने इतने स्पष्ट होते हैं कि उनकी एक-एक तस्वीर लंबे समय तक हमारे मन में बनी रहती है. कभी सपने में मंदिर दिखाई देता है, कभी भगवान के दर्शन होते हैं. कभी सांप दिखाई देता है, तो कभी साफ पानी. कई बार हम खुद को आसमान में उड़ता हुआ देखते हैं. कभी कोई दिवंगत व्यक्ति सपने में दिखाई देता है और कभी अंधेरे के बीच अचानक तेज रोशनी या सूर्योदय नजर आता है. लेकिन सवाल यह है कि क्या ये सपने सिर्फ हमारे मन की कल्पना होते हैं या फिर इनमें हमारी भावनाओं और जीवन की परिस्थितियों से जुड़े संकेत भी छिपे हो सकते हैं?

    भारतीय परंपरा में सपनों को लंबे समय से अलग-अलग नजरिए से समझा जाता रहा है. स्वप्न शास्त्र में कुछ सपनों को शुभ संकेतों से जोड़ा गया है, जबकि कुछ सपनों को व्यक्ति की मानसिक स्थिति और भावनाओं का प्रतिबिंब माना जाता है. हालांकि, एक बात समझना बेहद जरूरी है कि हर सपना भविष्यवाणी नहीं होता. कई बार दिनभर के विचार, तनाव, डर, इच्छाएं, यादें और भावनाएं रात में सपनों का रूप ले लेती हैं. इसलिए किसी सपने को देखकर तुरंत यह मान लेना सही नहीं है कि भविष्य में कोई निश्चित घटना होने वाली है. आज हम पंडित श्रीपति त्रिपाठी जी से ऐसे ही 7 सपनों के बारे में जानेंगे, जिन्हें स्वप्न शास्त्र में खास महत्व दिया गया है. इनमें सातवां सपना विशेष रूप से ध्यान खींचने वाला माना जाता है.

    सपने में मंदिर या भगवान के दर्शन
    अगर सपने में आपको कोई मंदिर दिखाई देता है, आप मंदिर के अंदर जाते हैं या भगवान के दर्शन करके प्रार्थना करते हैं, तो इसे आमतौर पर सकारात्मक सपना माना जाता है. खासकर अगर मंदिर साफ-सुथरा हो, वहां दीपक जल रहा हो और वातावरण शांत हो, तो यह मन की शांति और सकारात्मक भावनाओं से जुड़ा हो सकता है.

    अगर सपने में भगवान शिव दिखाई दें, तो इसे आध्यात्मिक शांति और आंतरिक शक्ति से जोड़कर देखा जाता है. भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण के दर्शन संरक्षण और संतुलन की भावना का प्रतीक माने जा सकते हैं. वहीं, माता के दर्शन भक्ति और सुरक्षा की भावना से जुड़े हो सकते हैं. हालांकि, सिर्फ भगवान का सपना देखना किसी निश्चित घटना के होने की गारंटी नहीं है. सपने के दौरान आपको कैसा महसूस हुआ, यह भी महत्वपूर्ण है.

    सपने में साफ और शांत पानी देखना
    सपनों में पानी दिखाई देना आम बात है. लेकिन पानी कैसा दिखाई दे रहा है, इसका खास महत्व माना जाता है. अगर सपने में साफ, स्वच्छ और शांत पानी दिखाई दे, जैसे निर्मल नदी, शांत तालाब या साफ जल, तो इसे सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जाता है. यह मानसिक शांति, भावनात्मक संतुलन और जीवन में नई शुरुआत की इच्छा का प्रतीक हो सकता है.

    वहीं, अगर पानी गंदा, बहुत अशांत या डरावना दिखाई दे, तो यह तनाव, बेचैनी या किसी परेशानी से जुड़ा हो सकता है. इसलिए साफ पानी का सपना आपके मन में चल रही सकारात्मक भावनाओं और शांति की इच्छा को भी दर्शा सकता है.

    सपने में सांप दिखाई देना
    सांप का सपना आते ही बहुत से लोग डर जाते हैं. लेकिन स्वप्न परंपरा में सांप को हमेशा अशुभ नहीं माना जाता है. सांप शक्ति, परिवर्तन, डर, रहस्य और आंतरिक ऊर्जा जैसे कई प्रतीकों से जुड़ा हो सकता है.

    अगर सपने में सांप दिखाई दे लेकिन वह आपको नुकसान न पहुंचाए, तो कुछ आध्यात्मिक मान्यताओं में इसे बदलाव या आंतरिक शक्ति का प्रतीक माना जाता है. वहीं, अगर सांप को देखकर आपको बहुत डर लगा, तो यह आपके भीतर मौजूद किसी चिंता या तनाव को भी दिखा सकता है. इसलिए, केवल सांप दिखाई देने से घबराने की जरूरत नहीं है. सपना समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि सांप ने क्या किया और आपको उस समय कैसा महसूस हुआ.

    खुद को आसमान में उड़ते हुए देखना
    क्या आपने कभी सपना देखा है कि आप आसमान में उड़ रहे हैं या किसी बहुत ऊंची जगह पर खड़े हैं और नीचे पूरी दुनिया दिखाई दे रही है? उड़ने का सपना अक्सर आजादी और अपनी सीमाओं से बाहर निकलने की इच्छा से जुड़ा हो सकता है.

    अगर सपने में उड़ते समय आपको खुशी और उत्साह महसूस हो रहा था, तो यह आगे बढ़ने की इच्छा और सकारात्मक सोच का संकेत हो सकता है. लेकिन अगर ऊंचाई पर आपको गिरने का डर लग रहा था, तो यह किसी परिस्थिति को लेकर असुरक्षा या चिंता को भी दर्शा सकता है. इसलिए सपना क्या था, इसके साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि उस सपने में आपको कैसा महसूस हुआ.

    सपने में किसी दिवंगत व्यक्ति को देखना
    किसी दिवंगत प्रियजन का सपने में आना सबसे भावनात्मक अनुभवों में से एक हो सकता है. ऐसे सपने को देखकर कई लोग डर जाते हैं, लेकिन इसे तुरंत अशुभ मानना सही नहीं है. जिन लोगों से हमारा गहरा भावनात्मक संबंध होता है, उनकी यादें हमारे मन में लंबे समय तक रहती हैं. इसलिए उनका सपने में आना हमारी यादों, भावनाओं या अधूरी बातों से जुड़ा हो सकता है.

    अगर वह व्यक्ति सपने में शांत और प्रसन्न दिखाई दे और सपना देखने के बाद आपको भी शांति महसूस हो, तो इसे उस व्यक्ति की स्मृति और भावनात्मक जुड़ाव के रूप में देखा जा सकता है. अगर सपना परेशान करने वाला था, तो यह आपके मन में मौजूद दुख या अधूरी भावनाओं की ओर इशारा कर सकता है. ऐसे सपने से डरने के बजाय उस प्रियजन को श्रद्धा से याद करें और उनके लिए प्रार्थना करें.

    सपने में तेज रोशनी, दीपक या सूर्योदय देखना
    अब बात करते हैं सातवें और खास सपने की. अगर सपने में आपको तेज रोशनी दिखाई दे, दीपक जलता हुआ नजर आए या लंबे अंधेरे के बाद सूर्योदय दिखाई दे, तो इसे आध्यात्मिक दृष्टि से सकारात्मक प्रतीक माना जाता है. अंधेरे से प्रकाश की ओर बढ़ना अक्सर निराशा से आशा और भ्रम से स्पष्टता की ओर बढ़ने का प्रतीक माना जाता है. प्रकाश को ज्ञान, उम्मीद और सकारात्मक बदलाव से भी जोड़ा जाता है.

    अगर आप सपने में किसी अंधेरी जगह से निकलकर रोशनी की ओर जाते हुए दिखाई देते हैं, तो यह आपके भीतर बदलाव और आगे बढ़ने की इच्छा को दर्शा सकता है. अगर आप हाल में किसी परेशानी, तनाव या असमंजस से गुजर रहे हैं और इसके बाद आपको प्रकाश या सूर्योदय का सपना आता है, तो यह आपके मन की सकारात्मक दिशा को दिखा सकता है.

    कुछ सपने हमें याद क्यों रहते हैं?
    पंडित श्रीपति त्रिपाठी के मुताबिक, कई बार जागने के कुछ मिनट बाद ही हमें अपना सपना याद नहीं रहता. लेकिन कुछ सपने लंबे समय तक याद रहते हैं. ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि वह सपना हमारे लिए भावनात्मक रूप से महत्वपूर्ण था.

    अगर कोई सपना बार-बार आ रहा है या लंबे समय तक याद रहता है, तो सुबह उठकर उसे लिख लेना उपयोगी हो सकता है. सपने की तारीख लिखें, आपने क्या देखा, कौन-कौन लोग थे और सपने के दौरान आपको कैसा महसूस हुआ. इन सब चीजों को नोट कर सकते हैं. समय के साथ इससे आपको अपनी भावनाओं और विचारों को समझने में मदद मिल सकती है.

    हर सपना भविष्यवाणी नहीं होता

    एक बात बिल्कुल स्पष्ट रूप से समझ लें कि रात में आने वाला हर सपना ज्योतिषीय या आध्यात्मिक संकेत नहीं होता है. अगर आपने दिनभर भगवान शिव की पूजा की है, तो रात में शिव मंदिर का सपना आ सकता है. अगर आपने किसी प्रिय व्यक्ति को बहुत याद किया है, तो वह सपने में दिखाई दे सकता है. अगर आप परीक्षा, नौकरी या व्यापार को लेकर तनाव में हैं, तो उससे जुड़ा सपना भी आ सकता है. इसलिए सपने को समझते समय अपनी वर्तमान परिस्थितियों और मानसिक स्थिति को भी ध्यान में रखना चाहिए.

    किसी एक सपने के आधार पर बड़ा आर्थिक, वैवाहिक, स्वास्थ्य या जीवन से जुड़ा फैसला नहीं लेना चाहिए. सपनों को अपने मन और भावनाओं को समझने का एक अवसर मानना ज्यादा बेहतर है. सपना शुभ लगे तो भगवान का धन्यवाद करें और अगर सपना डरावना हो तो घबराएं नहीं. अपने मन को शांत रखें और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ें. क्योंकि आखिरकार, सिर्फ सपने नहीं, बल्कि आपके विचार, कर्म, फैसले और मेहनत ही आपके जीवन की दिशा तय करते हैं.

  • नाग पंचमी पर नागचंद्रेश्वर मंदिर में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब, जानें क्यों साल में सिर्फ एक बार खुलते हैं कपाट

    नाग पंचमी पर नागचंद्रेश्वर मंदिर में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब, जानें क्यों साल में सिर्फ एक बार खुलते हैं कपाट

    सावन के तीसरे सोमवार के अवसर पर उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में भगवान शिव के दर्शन के लिए आज श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा. इस दौरान साल में केवल एक बार नाग पंचमी पर खुलने वाले नागचंद्रेश्वर मंदिर में भी दर्शनार्थियों की भारी भीड़ देखने को मिली. मंदिर परिसर में भक्तों की ज्यादा भीड़ के कारण अचानक भगदड़ जैसी स्थिति बन गई. जिससे कई भक्तों के बेहोश और तबीयत खराब होने की खबर सामने आई है. हालांकि, महाकालेश्वर मंदिर समिति ने सोशल मीडिया पर चल रही इस जानकारी को असत्य बताया है. लेकिन, अचानक क्यों नागचंद्रेश्वर मंदिर के आसपास भगदड़ जैसे हालात बन गए? क्यों यह मंदिर साल में 1 ही बार नाग पंचमी पर खुलता है. आइए जानते हैं इस मंदिर के बारे में. l

    नागचंद्रेश्वर मंदिर की मान्यता
    नागचंद्रेश्वर मंदिर उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थापित है. इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके कपाट साल में केवल एक बार नाग पंचमी के अवसर पर 24 घंटे के लिए श्रद्धालुओं के दर्शन हेतु खोला जाता है l

    पौराणिक कथा के अनुसार, नागराज तक्षक ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या की थी. उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भोलेनाथ ने उन्हें अमरता का वरदान दिया था. हालांकि, यह वरदान मिलने के बाद भी तक्षक संतुष्ट नहीं थे. उन्होंने महादेव से प्रार्थना की कि वे सदैव उनके सानिध्य में रहना चाहते हैं, इसलिए उन्हें महाकाल वन में निवास करने की अनुमति दी जाए. भगवान शिव ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली. इसके साथ ही, भोलेनाथ ने आशीर्वाद दिया कि उनके एकांत और साधना में कोई विघ्न न पड़े. यही कारण है कि तक्षक देव के एकांत को बनाए रखने के लिए इस मंदिर के कपाट साल में केवल एक बार, नाग पंचमी के दिन ही खोले जाते हैंl

    नागचंद्रश्वर मंदिर में होती है त्रिकाल पूजा
    श्री नागचंद्रेश्वर का अलौकिक रूप उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर की तीसरी मंजिल पर विराजमान है, जिसे नागराज तक्षक का पवित्र निवास स्थान माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर में भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन मात्र से व्यक्ति को सभी प्रकार के सर्प दोषों से मुक्ति मिल जाती है l

    नागचंद्रेश्वर मंदिर के कपाट खुलते ही यहां त्रिकाल पूजा यानी दिन में तीन अलग-अलग समय पर होने वाली विशेष पूजा का विधान है l

    पहली पूजा- रात 12 बजे मंदिर के पट खुलने के तुरंत बाद महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा प्रथम पूजन संपन्न किया जाता है l

    दूसरी पूजा (दोपहर)- नाग पंचमी के दिन दोपहर 12 बजे शासकीय प्रशासन की ओर से अधिकारियों द्वारा द्वितीय पूजन किया जाता है l

    तीसरी पूजा (संध्या)- शाम 7:30 बजे भगवान महाकाल की संध्या आरती के उपरांत मंदिर समिति की ओर से महाकाल मंदिर के पुरोहित-पुजारी तृतीय पूजन करते हैं l

    इसके बाद रात 12 बजे विशेष महाआरती संपन्न की जाती है और आरती के पश्चात मंदिर के कपाट पुनः एक साल के लिए बंद कर दिए जाते हैं l

    नागचंद्रेश्वर मंदिर की परंपरा
    हर साल नाग पंचमी के अवसर पर मध्य रात्रि 12 बजे जैसे ही नागचंद्रेश्वर मंदिर के कपाट खुलते हैं, भगवान शिव और नागराज के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगना शुरू हो जाता है. सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार, महानिर्वाणी अखाड़े के संतों द्वारा मंदिर के पट खोलने की विधि संपन्न की जाती है. इस पूजा विधान के तहत शैव परंपरा के अनुसार नारियल बांधकर विधिवत पूजन-अर्चन किया जाता है. इसके पश्चात 'जय श्री महाकाल' और भगवान नागचंद्रेश्वर के जयघोष के साथ मंदिर के कपाट आम श्रद्धालुओं के दर्शन हेतु खोल दिए जाते हैं l

  • नाग पंचमी विशेष: ऐसे हुई नागों की उत्पत्ति, कद्रू ने मांगे थे एक हजार नाग पुत्र

    नाग पंचमी विशेष: ऐसे हुई नागों की उत्पत्ति, कद्रू ने मांगे थे एक हजार नाग पुत्र

    आज नाग पंचमी है. हिंदू धर्म में नाग पंचमी का त्योहार नाग देवताओं की उपासना और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का एक अत्यंत पावन अवसर माना जाता है. इस दिन नागों की पूजा करने से सर्प भय से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है. वहीं, हिंदू धर्मग्रंथों में शेषनाग, वासुकि नाग, तक्षक नाग, कर्कोटक नाग, धृतराष्ट्र नाग, कालिया नाग, पिंगल और महानाग जैसे कई शक्तिशाली नागों का वर्णन मिलता है. आज हम इन्हीं पराक्रमी नागों के पृथ्वी पर जन्म लेने से जुड़ी एक पौराणिक कथा के बारे में बताएंगे, जिसका उल्लेख महाभारत के आदिपर्व में मिलता है.

    कैसे हुई नागों की उत्पत्ति?
    महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार, सतयुग में दक्ष प्रजापति की दो सुंदर कन्याएं थीं- कद्रू और विनता. दोनों बहनें रूप-सौंदर्य और गुणों से संपन्न थीं. बाद में दोनों का विवाह महर्षि कश्यप के साथ हुआ. एक दिन महर्षि कश्यप अपनी दोनों पत्नियों से प्रसन्न होकर बोले, 'तुम दोनों में से जिसकी जो इच्छा हो, वह वर मांग सकती है.' महर्षि कश्यप की बात सुनकर कद्रू ने समान तेज और पराक्रम वाले एक हजार नाग पुत्रों की कामना की. वहीं विनता ने बुद्धि, शरीर और पराक्रम में कद्रू के पुत्रों से भी श्रेष्ठ केवल दो पुत्रों का वर मांगा.

    महर्षि कश्यप ने दोनों की इच्छानुसार उन्हें वरदान दे दिया. वरदान पाकर दोनों बहनें बहुत प्रसन्न हुईं. इसके बाद महर्षि कश्यप ने अपनी दोनों पत्नियों से कहा कि वे धैर्यपूर्वक अपने-अपने गर्भ की रक्षा करें और फिर वे तपस्या के लिए चले गए. कुछ समय बाद कद्रू ने एक हजार अंडे दिए, जबकि विनता ने दो अंडे दिए. दोनों ने अपने-अपने अंडों को सुरक्षित स्थान पर रख दिया. लंबे समय तक प्रतीक्षा करने के बाद लगभग पांच सौ वर्षों के पश्चात कद्रू के एक हजार अंडों से उसके नाग पुत्र जन्म लेने लगे.

    लेकिन विनता के दोनों अंडों से अभी तक कोई संतान बाहर नहीं आई थी. अपने अंडों से संतान को जन्म लेते न देखकर विनता अधीर हो गईं. उन्होंने जल्दबाजी में एक अंडा फोड़ दिया. अंडा फूटने पर उसमें से एक बालक बाहर आया, जिसका ऊपरी शरीर पूरी तरह विकसित था, लेकिन उसके पैरों और शरीर का निचला हिस्सा पूरी तरह विकसित नहीं हुआ था. यह बालक अरुण था.

    नागों और अरुण का जन्म
    कहा जाता है कि अपनी माता की जल्दबाजी से क्रोधित होकर अरुण ने उन्हें श्राप दे दिया. उसने कहा, 'मां, तुम्हारे अधीर होने के कारण मेरा शरीर पूरी तरह विकसित नहीं हो पाया. इसलिए तुम्हें अपनी सौत कद्रू की पांच सौ वर्षों तक दासी बनकर रहना होगा. हालांकि, तुम्हारा दूसरा पुत्र तुम्हें इस दासता से मुक्त कराएगा. लेकिन यदि तुम उसे भी समय से पहले अंडा फोड़कर बाहर निकालोगी, तो उसका भी वही हाल होगा जो मेरा हुआ है. इसलिए तुम्हें धैर्य रखना होगा और उसके पूर्ण विकसित होने की प्रतीक्षा करनी होगी.'

    गरुड़ देव का प्राकट्य
    इसके बाद अरुण आकाश में चले गए और आगे चलकर सूर्यदेव के सारथी बने. समय बीतने के बाद विनता के दूसरे अंडे से गरुड़ का जन्म हुआ. गरुड़ अत्यंत शक्तिशाली और तेजस्वी थे. जन्म लेते ही उन्होंने अपने पराक्रम से देवताओं और सभी प्राणियों को चकित कर दिया. आगे चलकर गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन बने.

    अब कहानी में एक ऐसा प्रसंग आता है, जिसने विनता को अपनी ही बहन कद्रू की दासी बनने के लिए मजबूर कर दिया. एक बार देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया. समुद्र मंथन से अनेक दिव्य वस्तुओं के साथ एक अद्भुत और श्वेतवर्ण अश्व भी प्रकट हुआ, जिसका नाम उच्चैःश्रवा था.

    उच्चैःश्रवा को देखकर कद्रू ने विनता से कहा, 'बहन, बताओ, इस घोड़े का रंग कैसा है?" विनता ने कहा, 'इसका पूरा शरीर सफेद है.'

    लेकिन कद्रू ने कहा, 'इसका शरीर तो सफेद है, लेकिन इसकी पूंछ काली है.'
    दोनों बहनों के बीच इस बात को लेकर विवाद हो गया. आखिरकार दोनों ने शर्त लगा ली कि यदि विनता की बात सही निकली और उच्चैःश्रवा की पूंछ सफेद हुई, तो कद्रू विनता की दासी बनेगी. लेकिन यदि पूंछ काली हुई, तो विनता को कद्रू की दासी बनना पड़ेगा. दोनों बहनें अगले दिन घोड़े को देखने के लिए तैयार हो गईं.

    कद्रू मन ही मन सोचने लगी कि किसी भी तरह उसे विनता को अपनी दासी बनाना है. इसलिए उसने अपने एक हजार नाग पुत्रों को आदेश दिया कि वे काले बालों का रूप धारण करके उच्चैःश्रवा की पूंछ से लिपट जाएं, ताकि उसकी पूंछ काली दिखाई दे.

    लेकिन, कद्रू के कई पुत्रों ने अपनी माता की इस चाल में उसका साथ देने से इनकार कर दिया. इससे कद्रू अत्यंत क्रोधित हो गई और उसने उन नागों को श्राप दे दिया कि जब पांडव वंश में जन्मे राजा जनमेजय सर्प यज्ञ करेंगे, तब उस यज्ञ की प्रज्वलित अग्नि में वे सभी जलकर भस्म हो जाएंगे. कद्रू के इस भयंकर श्राप से नाग पुत्र चिंतित हो गए. तभी कर्कोटक नाग ने अपनी माता से कहा, 'माता, आप चिंता न करें. मैं काले बाल का रूप धारण करके उच्चैःश्रवा की पूंछ से लिपट जाऊंगा और उसकी पूंछ काली दिखाई देने लगेगी.'

    कर्कोटक की बात सुनकर कद्रू प्रसन्न हो गई. अगले दिन जब सूर्य उदय हुआ, तब कद्रू और विनता अपनी शर्त के अनुसार उच्चैःश्रवा को देखने के लिए समुद्र के उस पार पहुंचीं. वहां जाकर विनता ने देखा कि उच्चैःश्रवा का पूरा शरीर तो सफेद था, लेकिन उसकी पूंछ काली दिखाई दे रही थी. यह देखकर विनता समझ गईं कि वह बाजी हार चुकी हैं. उन्होंने अपनी बहन कद्रू से कहा, 'मैं यह बाजी हार गई हूं. शर्त के अनुसार अब मैं आपकी दासी हूं.'

    अमृत प्राप्ति और विनता की दासता से मुक्ति
    इस प्रकार विनता को अपनी ही बहन कद्रू की दासी बनकर रहना पड़ा. समय बीतता गया. एक दिन गरुड़ को अपनी माता की दासता के बारे में पता चला. अपनी माता को कद्रू और उसके नाग पुत्रों की दासता से मुक्त कराने के लिए गरुड़ ने अद्भुत पराक्रम किया. आगे चलकर गरुड़ ने देवताओं से अमृत प्राप्त किया और उसे नागों के सामने रखकर अपनी माता विनता को दासता से मुक्त कराया.

    गरुड़ के अद्भुत पराक्रम और

  • सावन शिवरात्रि पर बेटे के लिए चुनें महादेव से जुड़े ये 10 यूनिक नाम

    सावन शिवरात्रि पर बेटे के लिए चुनें महादेव से जुड़े ये 10 यूनिक नाम

    सावन का महीना हिंदू धर्म में भगवान शिव के आधीन बताया गया है. ऐसे में पूरे महीने में लोग महादेव की भक्ति में डूब जाते हैं. मंदिरों में हर-हर महादेव के जयकारे गूंजते हैं, शिवलिंग पर जलाभिषेक होता है और भक्त भोलेनाथ की आराधना में लीन नजर आते हैं. इस साल सावन शिवरात्रि 11 अगस्त, मंगलवार को मनाई जा रही है. ये दिन भगवान शिव की पूजा और जलाभिषेक के लिए बेहद खास माना जाता है.

    ऐसे में अगर आपके घर में नन्हे बेटे का आगमन हुआ है या आप अपने राजकुमार के लिए एक ऐसा नाम तलाश रहे हैं, जो यूनिक होने के साथ भगवान शिव से जुड़ा हो, तो बेटे का नामकरण करने के लिए सावन शिवरात्रि से बेहतर मौका क्या हो सकता है. माना जाता है कि नाम का व्यक्ति के जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है, इसलिए माता-पिता अपने बच्चे का नाम रखते समय उसके अर्थ और उससे जुड़ी भावनाओं का भी खास ध्यान रखते हैं.

    आजकल माता-पिता अपने बच्चों को ऐसे नाम देना पसंद करते हैं जो सुनने में मॉडर्न हों, लेकिन उनकी जड़ें भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं से जुड़ी हों. भगवान शिव के कई ऐसे नाम हैं जो आज के दौर में भी बेहद खूबसूरत और यूनिक लगते हैं. अगर आप भी अपने बेटे के लिए महादेव से प्रेरित नाम ढूंढ रहे हैं, तो इन यूनिक नामों की लिस्ट आपकी तलाश खत्म कर सकती है.

    1. जतिन: इस लिस्ट में पहला नाम जतिन है. जतिन भगवान शिव का ही एक नाम माना जाता है. ये नाम आजकल की मॉडर्न लाइफस्टाइल के हिसाब से छोटा, सिंपल और सुनने में काफी अट्रैक्टिव भी लगता है. जतिन का मतलब तपस्वी और शुभ करने वाला बताया जाता है. अगर आप बेटे के लिए ऐसा नाम चाहते हैं जो शिव से जुड़ाव के साथ गंभीर भी रखता हो, तो जतिन अच्छा ऑप्शन हो सकता है.

    2. विभव: आप अपने बेटे को विभव नाम भी दे सकते हैं. विभव नाम सुनने में रॉयल और अट्रैक्टिव लगता है. इसका मतलब शक्तिशाली और वैभव से जुड़ा माना जाता है. ये नाम भगवान शिव की शक्ति और उनके विराट स्वरूप की याद दिलाता है.

    3. शिवांग: अगर आप बेटे के नाम को सीधे तौर पर 'शिव' से जोड़ना चाहते हैं, तो शिवांग बेहद खूबसूरत ऑप्शन हो सकता है. शिवांग का मतलब 'शिव का अंग' बताया जाता है. नाम अपने आप में ही भगवान भोलेनाथ से गहरा जुड़ाव दर्शाता है और सुनने में भी काफी यूनिक लगता है.

    4. आरव: आरव आजकल के मॉडर्न माता-पिता द्वारा काफी पसंद किया जा रहा है. इसे भगवान शिव से जुड़े नामों में भी शामिल किया जाता है. इसका अर्थ शांत और सुंदर भाव से जोड़ा जाता है. अगर आप बेटे के लिए छोटा, प्यारा और आसानी से बोला जाने वाला नाम चाहते हैं, तो आरव चुन सकते हैं.

    5. अनिकेत: अनिकेत भगवान शिव का एक नाम माना जाता है. इसका मतलब उस परम सत्ता से जुड़ा है जो किसी एक स्थान तक सीमित नहीं है. ये नाम सुनने में बेहद क्लासी और अलग लगता है. खास बात ये है कि इसमें धार्मिक जुड़ाव के साथ एक गहरा आध्यात्मिक मतलब भी छिपा है.

    6. रुद्र: महादेव को रुद्र नाम भी से भी जाना जाता है. ये नाम भगवान शिव के प्रचंड और शक्तिशाली रूप को दर्शाता है. छोटा होने के साथ-साथ रुद्र नाम सुनने में काफी दमदार भी लगता है. अगर आप उन माता-पिता में शामिल हैं, जो बेटे के लिए स्ट्रॉन्ग और ट्रेडिशनल नामों की तलाश कर रहे हैं तो ये आपके लिए अच्छा ऑप्शन हो सकता है.

    7. शंभू: शंभू भगवान शिव का एक बहुत ही सुंदर नाम है. इसका संबंध शिव के शुभ स्वरूप से माना जाता है. ये नाम बहुत आम नहीं है, इसलिए अगर आप बेटे के लिए ट्रेडिशनल लेकिन थोड़ा अलग नाम चाहते हैं, तो शंभू को अपनी लिस्ट में शामिल कर सकते हैं.

    8. नीलकंठ: समुद्र मंथन के दौरान विष पीने के बाद भगवान शिव का कंठ नीला हो गया था, जिसके बाद उन्हें नीलकंठ कहा गया. ये नाम त्याग, शक्ति और धैर्य का प्रतीक माना जाता है. आपके बेटे के लिए ये एक बहुत ही अर्थपूर्ण और धार्मिक नाम हो सकता है.

    9. ईशान: ईशान भगवान शिव से जुड़े नामों में शामिल है. ये नाम सुनने में बहुत ही मॉडर्न लगता है. अगर आप ऐसा नाम चाहते हैं जो स्कूल से लेकर प्रोफेशनल लाइफ तक हर जगह अच्छा लगे, तो ईशान एक खूबसूरत ऑप्शन है.

    10. शिवाय: शिवाय नाम सीधे भगवान शिव से जुड़ा हुआ है और आजकल मॉडर्न माता-पिता के बीच भी पसंद किया जा रहा है. ये नाम छोटा, अट्रैक्टिव और धार्मिक भाव लिए हुए है. 

  • रक्षाबंधन पर चंद्र ग्रहण का साया, जानें भारत में सूतक लगेगा या नहीं

    रक्षाबंधन पर चंद्र ग्रहण का साया, जानें भारत में सूतक लगेगा या नहीं

    भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन का पर्व इस साल 28 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा.  इस साल श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि पर एक दुर्लभ खगोलीय संयोग बन रहा है, क्योंकि इसी दिन साल का आखिरी चंद्र ग्रहण भी लगने जा रहा है.  रक्षाबंधन जैसे शुभ त्योहार के दिन चंद्र ग्रहण होने के कारण देश भर में लोग इस बात को लेकर संशय में हैं कि क्या इससे राखी बांधने के नियमों या शुभ मुहूर्त पर कोई असर पड़ेगा? आइए, धर्म शास्त्रों और ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर समझते हैं कि इसका क्या प्रभाव होगा.

    चन्द्र ग्रहण का समय और आंशिक चरण की अवधि
    ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, 28 अगस्त को लगने वाला यह चंद्र ग्रहण एक गहरा आंशिक चंद्र ग्रहण (Deep Partial Lunar Eclipse) होगा.

    ग्रहण का समय: यह खगोलीय घटना सुबह 08:00 बजे से शुरू होकर सुबह 09 बजकर 43 मिनट तक अपने चरम पर रहेगी.

    कुल अवधि: ग्रहण की कुल प्रभाव अवधि लगभग 5 घंटे 39 मिनट तक रहेगी.

    दृश्यता: यह ग्रहण मुख्य रूप से पूरे यूरोप, अफ्रीका, और उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका के हिस्सों में दिखाई देगा.  भारत में यह ग्रहण बिल्कुल दिखाई नहीं देगा.

    ग्रहण कहां-कहां दिखाई देगा?
    यह खगोलीय घटना दुनिया के विभिन्न हिस्सों में स्पष्ट रूप से नजर आएगी.

    यूरोप और अफ्रीका: पूरे यूरोप और अफ्रीकी महाद्वीप के अधिकांश क्षेत्रों में इस चंद्र ग्रहण का पूरा नजारा देखा जा सकेगा.

    उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका: अमेरिका के उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों में भी यह ग्रहण साफ तौर पर दिखाई देगा.

    अन्य क्षेत्र: इसके अलावा पश्चिमी एशिया और अटलांटिक महासागर के कुछ हिस्सों में भी इसे देखा जा सकेगा.  अमेरिकी क्षेत्रों में चांद के निकलते ही इस पर धरती की छाया का अनूठा दृश्य देखने को मिलेगा.

    भारत में सूतक काल और धार्मिक प्रभाव
    हिंदू धर्म शास्त्रों और वैदिक ज्योतिष के अनुसार, ग्रहण का सूतक काल और उसके धार्मिक नियम केवल उन्हीं क्षेत्रों में मान्य होते हैं, जहाँ ग्रहण प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है.

    सूतक का नियम: चूंकि 28 अगस्त का चंद्र ग्रहण भारत में कहीं भी दृश्यमान नहीं है, इसलिए भारत में इसका सूतक काल पूरी तरह से मान्य नहीं होगा.

    धार्मिक कार्य: सूतक न लगने के कारण मंदिरों के कपाट बंद करने या दैनिक पूजा-अर्चना पर रोक लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है. श्रद्धालु बिना किसी संशय के अपनी नियमित पूजा, दान और मांगलिक कार्य सामान्य दिनों की तरह कर सकते हैं.

    रक्षाबंधन और राखी बांधने का मुहूर्त
    ग्रहण और सूतक के प्रभाव न होने के कारण रक्षाबंधन के पर्व और राखी बांधने के समय पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा.बहनें बिना किसी हिचकिचाहट के सुबह के शुभ मुहूर्त में भाई की कलाई पर राखी बांध सकती हैं.

    रक्षाबंधन 2026 के लिए पंचांग के अनुसार भद्रा पहले ही समाप्त हो चुकी होगी, इसलिए 28 अगस्त की सुबह का समय राखी बांधने के लिए अत्यंत शुभ और दोषमुक्त है.

    विशेष ध्यान देने वाली बातें
    खगोलीय महत्व: भले ही यह भारत में न दिखे, लेकिन अन्य देशों में चंद्रमा का लगभग 96% भाग पृथ्वी की छाया में ढका रहेगा, जिससे यह गहरा लाल या तांबे के रंग का दिखाई देगा, जिसे ब्लड मून की संज्ञा भी दी जाती है.

    मंत्र जाप: ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि यदि कोई चाहे, तो ग्रहण के समय (सुबह 08:00 से 09:43 बजे के बीच) घर में रहकर राहु-केतु के मंत्रों, महामृत्युंजय मंत्र या अपने इष्ट देव के मंत्रों का जाप कर सकता है, जो आध्यात्मिक दृष्टि से श्रेयस्कर माना जाता है.

  • सड़क पर दिखें ये 7 चीजें तो रहें सावधान, धार्मिक मान्यताओं में बताया अशुभ संकेत

    सड़क पर दिखें ये 7 चीजें तो रहें सावधान, धार्मिक मान्यताओं में बताया अशुभ संकेत

     सड़क पर चलते समय क्या आपने कभी ऐसी कोई चीज देखी है, जिसे देखकर आप एक पल के लिए रुक गए हों या मन में यह सवाल आया हो कि आखिर यह यहां क्यों पड़ी है? क्या वह चीज काले वस्त्र से जुड़ी थी, श्रृंगार की कोई वस्तु थी या फिर कुछ ऐसा था जिसे देखकर आपको अजीब महसूस हुआ?

    अगर आपके साथ भी ऐसा कभी हुआ है, तो आपका एक पल के लिए रुकना और उस चीज को देखकर सावधान होना स्वाभाविक है. हिंदू धर्म की कई मान्यताओं और पुराणों से जुड़ी कथाओं में रास्ते में दिखाई देने वाली कुछ वस्तुओं को शुभ-अशुभ संकेतों से जोड़कर देखा गया है. ऐसी ही कुछ चीजों का उल्लेख शकुन शास्त्र में भी बताया जाता है. मान्यता है कि सड़क पर पड़ी कुछ चीजों को अनदेखा करके आगे बढ़ जाना ही बेहतर होता है. आखिर कौन-सी हैं ये चीजें? आइए जानते हैं.

    आज इंसान किसी भी घटना के पीछे वैज्ञानिक कारण तलाशता है. यह अच्छी बात है, लेकिन हमारी धार्मिक परंपराओं में भी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े कई सवालों के जवाब और सावधानियां बताई गई हैं. हालांकि इन मान्यताओं को धार्मिक विश्वास के रूप में ही समझना चाहिए, वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं.

    सड़क पर पड़ा मृत जीव
    कई बार सड़क पर किसी जानवर की मृत्यु हो जाने के बाद उसका शव या उसके अवशेष पड़े दिखाई देते हैं. आमतौर पर ऐसा सड़क दुर्घटना या किसी अन्य कारण से होता है. धार्मिक मान्यताओं में ऐसे मृत जीवों के संपर्क से बचने की सलाह दी गई है. मान्यता है कि शव या उसके अवशेषों के आसपास नकारात्मकता का प्रभाव हो सकता है. इसी वजह से कहा जाता है कि यदि गलती से किसी मृत जीव के संपर्क में आ जाएं तो घर जाकर स्नान कर लेना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए. हालांकि, व्यावहारिक रूप से भी मृत जानवरों से दूरी बनाना जरूरी है, क्योंकि उनसे संक्रमण का खतरा हो सकता है.

    सड़क पर पड़ा बालों का गुच्छा
    दूसरी चीज है बाल. हिंदू धर्म में बालों को लेकर कई तरह की धार्मिक परंपराएं मौजूद हैं. जन्म, मृत्यु और कुछ विशेष संस्कारों के अवसर पर मुंडन की परंपरा भी देखने को मिलती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, बालों का संबंध व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक ऊर्जा से जोड़ा गया है. इसी वजह से सड़क या रास्ते में पड़े कटे हुए बालों को उठाने या छूने से बचने की सलाह दी जाती है. इसके पीछे धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं. वहीं व्यावहारिक रूप से भी सड़क पर पड़े किसी अनजान व्यक्ति के बालों या गंदगी को छूने से बचना स्वच्छता की दृष्टि से बेहतर है.

    पूजा या हवन में इस्तेमाल की गई सामग्री
    तीसरी चीज है पूजा-पाठ, हवन या किसी धार्मिक अनुष्ठान में इस्तेमाल की गई सामग्री. कई बार पूजा के बाद बची हुई सामग्री को लोग सड़क, चौराहे या किसी सुनसान जगह पर रख देते हैं. इनमें फूल, राख, नींबू, नारियल, कपड़ा या अन्य पूजा सामग्री शामिल हो सकती है. धार्मिक मान्यताओं में ऐसी सामग्री को बिना वजह छूने या अपने साथ घर ले जाने से बचने की सलाह दी जाती है. खासकर यदि किसी वस्तु को जानबूझकर किसी चौराहे या विशेष स्थान पर रखा गया हो, तो उसे उठाने से बचना ही बेहतर माना जाता है.

    काले वस्त्र या श्रृंगार की चीजें
    रास्ते में यदि आपको काले कपड़े, काजल, सिंदूर, चूड़ी या किसी अन्य श्रृंगार की वस्तु बिखरी हुई दिखाई दे, तो धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उसे उठाने से बचना चाहिए. कई परंपराओं में ऐसी वस्तुओं को विशेष पूजा, अनुष्ठान या टोटके से जोड़कर देखा जाता है. हालांकि, सड़क पर पड़ी हर वस्तु को किसी तांत्रिक क्रिया से जोड़ना सही नहीं है. यह जरूरी नहीं कि वहां रखी हर चीज के पीछे कोई धार्मिक या नकारात्मक उद्देश्य हो. फिर भी अनजान वस्तुओं को छूने के बजाय उनसे दूरी बनाए रखना समझदारी है.

    कांटों से भरा रास्ता
    पांचवीं चीज है कांटों से भरा रास्ता. धार्मिक मान्यताओं में कांटों को जीवन में आने वाली परेशानियों और बाधाओं से जोड़कर देखा जाता है. इसलिए रास्ते में अगर बहुत ज्यादा कांटे बिखरे हुए हों तो वहां से गुजरने से बचने की सलाह दी जाती है. इसका एक सीधा व्यावहारिक कारण भी है. कांटों से पैरों में चोट लग सकती है और संक्रमण का खतरा भी हो सकता है. इसलिए, धार्मिक मान्यता हो या व्यावहारिक सावधानी, कांटों से भरे रास्ते से बचना ही बेहतर है.

    किसी दूसरे व्यक्ति के स्नान का पानी
    छठी चीज है किसी व्यक्ति द्वारा स्नान करने के बाद रास्ते में बहा हुआ पानी. कुछ धार्मिक मान्यताओं में स्नान को शरीर और मन की शुद्धि से जोड़ा गया है. माना जाता है कि स्नान के बाद शरीर की अशुद्धियां जल के साथ दूर हो जाती हैं. इसी वजह से कुछ परंपराओं में दूसरे व्यक्ति के स्नान से निकले पानी को जानबूझकर छूने से बचने की बात कही गई है. हालांकि आधुनिक दृष्टि से भी सड़क पर जमा या बह रहे अनजान पानी से दूरी बनाना बेहतर है, क्योंकि उसमें गंदगी और कीटाणु हो सकते हैं.

    सड़क पर पड़ी गंदगी
    सातवीं और सबसे महत्वपूर्ण चीज की. यह कोई विशेष वस्तु नहीं, बल्कि सड़क पर पड़ी गंदगी है. इसमें मल-मूत्र, कचरा, बालों के गुच्छे, सड़े हुए पदार्थ या अन्य गंदी चीजें शामिल हो सकती हैं. ऐसी चीजों को छूने या उनके ऊपर से नंगे पैर चलने से बचना चाहिए. धार्मिक मान्यताओं में इन्हें अशुद्धता से जोड़ा गया है, जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से भी गंदगी के संपर्क में आने से संक्रमण और त्वचा संबंधी समस्याओं का खतरा हो सकता है. इसलिए यदि रास्ते में ऐसी कोई चीज दिखाई दे तो उससे दूरी बनाकर निकलें.

  • कैलाश पर्वत के 10 रहस्य, जहां समय बदलने से लेकर शंभाला नगरी तक के दावे

    कैलाश पर्वत के 10 रहस्य, जहां समय बदलने से लेकर शंभाला नगरी तक के दावे

    दुनिया में एक ऐसी भी जगह है, जिसके बारे में कहा जाता है कि वहां समय अपनी रफ्तार बदल लेता है? जहां पहुंचने वाले लोगों को अपने बाल और नाखून सामान्य से ज्यादा तेजी से बढ़ते हुए महसूस होते हैं.

    क्या आप मानेंगे कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट, जिसकी ऊंचाई करीब 8,849 मीटर है, हजारों पर्वतारोही फतह कर चुके हैं. लेकिन एक ऐसा पर्वत भी है, जिसकी ऊंचाई एवरेस्ट से करीब 2,200 मीटर कम यानी लगभग 6,638 मीटर है. इसके बावजूद आज तक कोई भी व्यक्ति इसके शिखर पर चढ़ने में सफल नहीं हुआ. जिसने भी इसे फतह करने की कोशिश की, उसके सामने मुश्किलें खड़ी होती गईं. कोई मौसम की मार से वापस लौट आया तो किसी की यात्रा बीच रास्ते में ही रुक गई.

    हिंदू धर्म में कैलाश पर्वत को भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है. बौद्ध धर्म में भी इसका विशेष महत्व है. जैन धर्म और तिब्बती बोन परंपरा में भी कैलाश को बेहद पवित्र माना गया है. लेकिन स्थानीय मान्यताओं में इसके साथ कई रहस्यमयी कहानियां भी जुड़ी हुई हैं. कोई इसे देवताओं का निवास कहता है, तो कोई इसके आसपास किसी गुप्त नगरी के होने की बात करता है. आज हम बात कर रहे हैं तिब्बत में स्थित रहस्यमयी कैलाश पर्वत की. एक ऐसा पर्वत, जो सिर्फ पत्थरों और बर्फ से नहीं बना, बल्कि जिसके साथ सदियों से अनगिनत रहस्य और धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं.

    कैलाश पर चढ़ना इतना मुश्किल क्यों?
    कैलाश पर्वत का नाम सुनते ही आंखों के सामने बर्फ से ढका एक विशाल, लगभग पिरामिड जैसी आकृति वाला पर्वत दिखाई देता है. लेकिन कैलाश सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं है. इसकी भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक संरचना भी इसे बेहद खास बनाती है. आखिर कैलाश पर्वत पर चढ़ना इतना मुश्किल क्यों है?

    एक वजह है इसकी बेहद कठिन भौगोलिक परिस्थितियां. यहां ऊंचाई बहुत ज्यादा है, मौसम तेजी से बदल सकता है, रास्ते कठिन हैं और बर्फीली परिस्थितियां पर्वतारोहण को बेहद जोखिम भरा बना देती हैं. लेकिन अब सवाल यह है कि जब इंसान एवरेस्ट जैसी दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर पहुंच चुका है, तो कैलाश के

    शिखर तक क्यों नहीं पहुंच पाया?
    इसका जवाब सिर्फ धार्मिक आस्था में नहीं, बल्कि इतिहास में भी छिपा है. 20वीं सदी में कई विदेशी पर्वतारोहियों ने कैलाश पर चढ़ने में रुचि दिखाई. कुछ अभियानों में खराब मौसम और कठिन परिस्थितियों के कारण प्रयास रोकने पड़े. कैलाश से जुड़ी कई कहानियों में अचानक मौसम बिगड़ने, रास्ता भटकने और चढ़ाई के दौरान असामान्य अनुभव होने का जिक्र मिलता है. हालांकि इन घटनाओं में से कई के स्वतंत्र और वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं. यानी जो बातें कैलाश को और ज्यादा रहस्यमयी बनाती हैं, उनमें से कई स्थानीय मान्यताओं और पर्वतारोहियों की कथाओं पर आधारित हैं.

    क्या कैलाश पर इंसान तेजी से बूढ़ा हो जाता है?
    कहा जाता है कि कैलाश क्षेत्र में जाने वाले कुछ लोगों ने महसूस किया कि उनके बाल और नाखून सामान्य से ज्यादा तेजी से बढ़ रहे हैं. इंटरनेट पर ऐसी कहानियां भी मिलती हैं, जिनमें कैलाश पर कुछ ही घंटों में इंसान के बूढ़े होने का दावा किया गया है. इसे कभी-कभी Rapid Aging यानी तेजी से उम्र बढ़ने की घटना कहा जाता है. लेकिन यहां एक जरूरी बात समझना बेहद जरूरी है.

    आज तक ऐसा कोई विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, जिससे यह साबित हो कि कैलाश पर्वत पर इंसान की उम्र सामान्य से कई गुना तेजी से बढ़ती है या वहां समय की गति बदल जाती है. ऊंचाई वाले क्षेत्रों में कम ऑक्सीजन, अत्यधिक ठंड, शारीरिक तनाव, डिहाइड्रेशन और बदलते वातावरण का शरीर पर असर जरूर पड़ सकता है. लेकिन इसे अचानक दशकों की उम्र बढ़ जाने का प्रमाण नहीं माना जा सकता है. फिर भी यही अप्रमाणित कहानियां कैलाश के रहस्य को और गहरा जरूर करती हैं.

    क्या कैलाश पर चढ़ने से पर्वतारोहियों ने खुद इनकार किया?
    दुनिया के महान पर्वतारोहियों में से एक रेनहोल्ड मेसनर का नाम भी कैलाश से जोड़ा जाता है. उन्होंने एवरेस्ट पर बिना ऑक्सीजन के चढ़ाई की थी. लेकिन कैलाश के मामले में उनका रुख अलग था. कैलाश को लेकर उनके नाम से कई तरह के कथन इंटरनेट पर मौजूद हैं, लेकिन उनके सटीक शब्दों को लेकर अलग-अलग दावे मिलते हैं.

    हालांकि, इतना जरूर है कि कैलाश को लेकर पर्वतारोहण और धार्मिक भावनाओं के बीच एक अलग तरह का संबंध रहा है. कैलाश को जीतने की जगह उसकी पवित्रता का सम्मान करना ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है.

    क्या कैलाश एक प्राकृतिक पर्वत नहीं है?
    अब आते हैं कैलाश के सबसे बड़े रहस्यों में से एक पर. कैलाश को दूर से देखने पर इसकी आकृति बेहद अलग नजर आती है. कई लोगों को यह एक विशाल पिरामिड जैसा दिखाई देता है. इसी वजह से समय-समय पर यह दावा किया गया कि कैलाश कोई सामान्य प्राकृतिक पर्वत नहीं, बल्कि किसी प्राचीन सभ्यता द्वारा बनाया गया विशाल पिरामिड हो सकता है.

    रूसी वैज्ञानिक और नेत्र विशेषज्ञ डॉ. अर्नेस्ट मुलदाशेव से भी इस तरह के दावे जोड़े जाते हैं. उन्होंने कैलाश को लेकर कई विवादास्पद परिकल्पनाएं प्रस्तुत की थीं. हालांकि, इन दावों को मुख्यधारा के भूवैज्ञानिक विज्ञान में प्रमाणित तथ्य नहीं माना जाता है. भूवैज्ञानिक दृष्टि से कैलाश एक प्राकृतिक पर्वतीय संरचना है. फिर भी इसकी असामान्य आकृति ने इसे रहस्य और कल्पना का विषय जरूर बना दिया है.

    क्या कैलाश के अंदर है शंभाला नगरी?
    कैलाश से जुड़ी एक और रहस्यमयी कहानी है शंभाला की. तिब्बती बौद्ध परंपराओं में शंभाला का उल्लेख एक आध्यात्मिक और रहस्यमय भूमि के रूप में मिलता है. समय के साथ इससे जुड़ी कई कहानियां प्रचलित हुईं. कुछ कथाओं में इसे एक ऐसी गुप्त जगह बताया गया, जहां सिद्ध पुरुष रहते हैं. कुछ आधुनिक दावों में तो यहां तक कहा गया कि कैलाश पर्वत के अंदर कोई गुप्त नगरी या सुरंगों का जाल मौजूद है.

    लेकिन कैलाश के अंदर ऐसी किसी स्वर्ण नगरी या गुप्त सभ्यता के मौजूद होने का कोई प्रमाण नहीं मिला है. यानी शंभाला की कहानी धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं में महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इसे प्रमाणित भौगोलिक स्थान मानना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा.

    कैलाश पर ओम और स्वास्तिक का रहस्य
    कैलाश से जुड़ी सबसे लोकप्रिय मान्यताओं में एक है, पहाड़ पर दिखाई देने वाली ओम जैसी आकृति. कई तस्वीरों में कैलाश की बर्फ और चट्टानों की बनावट ऐसी दिखाई देती है कि लोगों को उसमें ओम का स्वरूप नजर आता है.

    शाम के समय पहाड़ की छाया को भी कुछ लोग स्वास्तिक जैसी आकृति से जोड़ते हैं. भक्तों के लिए यह भगवान शिव के प्रतीकों जैसा है. लेकिन प्राकृतिक पर्वतीय संरचनाओं में अलग-अलग आकृतियां दिखाई देना असामान्य नहीं है. प्रकाश, बर्फ, चट्टानों की संरचना और कैमरे के एंगल के कारण भी अलग-अलग आकृतियां नजर आ सकती हैं. इसलिए इसे वैज्ञानिक प्रमाण की जगह धार्मिक आस्था और प्राकृतिक संयोग के रूप में देखना ज्यादा उचित है.

    क्या कैलाश धरती का केंद्र है?
    कैलाश से जुड़ा एक और दावा बेहद लोकप्रिय है. कहा जाता है कि कैलाश को Axis Mundi, यानी पृथ्वी की धुरी या ब्रह्मांड के केंद्र के रूप में देखा जाता है. लेकिन यहां भी एक फर्क समझना जरूरी है.

    Axis Mundi कोई वैज्ञानिक भौगोलिक शब्द नहीं है जिसके आधार पर कैलाश को पृथ्वी का वास्तविक केंद्र घोषित किया गया हो. यह अलग-अलग संस्कृतियों में ब्रह्मांडीय या आध्यात्मिक केंद्र के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल होने वाली अवधारणा है. कैलाश को कई धार्मिक परंपराओं में ब्रह्मांड के केंद्र जैसा आध्यात्मिक महत्व दिया गया है.

    6666 किलोमीटर वाली उत्तर ध्रुव की दूरी और 13,332 किलोमीटर वाली दक्षिण ध्रुव की दूरी का दावा भी इंटरनेट पर खूब मिलता है, लेकिन इसे कैलाश की विशेष वैज्ञानिक स्थिति का प्रमाण नहीं माना जा सकता.

    क्या कैलाश की रक्षा करता है यति?
    कैलाश से जुड़ी एक और रोमांचक कहानी है, यति या हिम मानव की. हिमालय और तिब्बत के कई इलाकों में यति की लोककथाएं सदियों से प्रचलित हैं. कैलाश क्षेत्र में भी बड़े पैरों के निशान और रहस्यमयी जीवों को देखे जाने की कहानियां सुनने को मिलती हैं. कुछ लोगों का मानना है कि यह कोई रहस्यमयी प्राणी है जो कैलाश की रक्षा करता है. लेकिन आज तक यति के अस्तित्व का कोई निर्णायक वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है. इसलिए यति को फिलहाल हिमालय की लोककथाओं और रहस्यमयी परंपराओं का हिस्सा ही माना जाता है.

    मानसरोवर और राक्षस ताल का रहस्य
    अब बात करते हैं कैलाश के पास स्थित दो प्रसिद्ध झीलों की, मानसरोवर और राक्षस ताल. दोनों झीलें एक-दूसरे के बेहद करीब हैं, लेकिन धार्मिक मान्यताओं में इनके स्वरूप को बिल्कुल अलग बताया गया है. मानसरोवर को पवित्र और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है. हिंदू धर्म में इसे भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ा हुआ माना जाता है.

    दूसरी तरफ राक्षस ताल का संबंध रावण से जोड़ा जाता है. मान्यता है कि रावण ने यहां भगवान शिव की तपस्या की थी. मानसरोवर का पानी मीठा है, जबकि राक्षस ताल का पानी खारा है. इन दोनों झीलों के आकार और जलरसायन में अंतर के पीछे प्राकृतिक और भूगर्भीय कारण हैं. धार्मिक दृष्टि से हालांकि दोनों का महत्व बिल्कुल अलग है.

    कैलाश से आने वाली रहस्यमयी आवाजें
    कई यात्री दावा करते हैं कि कैलाश क्षेत्र में कभी-कभी ऐसी आवाजें सुनाई देती हैं, जो डमरू या किसी गूंजती हुई ध्वनि जैसी लगती हैं. भक्त इसे भगवान शिव के डमरू की ध्वनि से जोड़ते हैं. वहीं वैज्ञानिक दृष्टि से पहाड़ों में हवा का दबाव, चट्टानों की संरचना, बर्फ का खिसकना और आसपास की घाटियों में ध्वनि का प्रतिध्वनित होना ऐसी आवाजों का कारण हो सकता है. यानी एक ही घटना को आस्था और विज्ञान अपने-अपने नजरिए से देखते हैं.

    क्या मिलारेपा कैलाश के शिखर पर पहुंचे थे?
    कैलाश के इतिहास से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कहानियों में से एक तिब्बती बौद्ध योगी मिलारेपा की है. कहा जाता है कि 11वीं सदी में मिलारेपा ने कैलाश पर एक आध्यात्मिक मुकाबले में हिस्सा लिया था. कहानी के अनुसार, एक अन्य साधक के साथ उनकी प्रतियोगिता हुई कि कौन कैलाश के शिखर तक पहले पहुंचेगा.

    कहा जाता है कि दूसरे साधक ने अपनी आध्यात्मिक शक्तियों का इस्तेमाल किया, जबकि मिलारेपा ध्यान में बैठे रहे और अंत में आध्यात्मिक शक्ति के जरिए शिखर तक पहुंच गए. यह कहानी ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित पर्वतारोहण रिकॉर्ड नहीं है, बल्कि तिब्बती धार्मिक परंपरा का हिस्सा है. इस कथा का संदेश बेहद खूबसूरत है, कैलाश को शरीर से जीतना जरूरी नहीं, बल्कि मन और आत्मा से उसके सामने झुकना ही सबसे बड़ी उपलब्धि है.

    चार धर्मों के लिए पवित्र है कैलाश
    कैलाश की सबसे खास बात यह है कि यह सिर्फ हिंदू धर्म के लिए ही पवित्र नहीं है. हिंदू धर्म में इसे भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है. बौद्ध धर्म में कैलाश को ब्रह्मांडीय महत्व प्राप्त है और इसे बुद्ध डेमचोक से जोड़ा जाता है. जैन धर्म में कैलाश क्षेत्र को अष्टापद से जोड़ा जाता है, जहां प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के मोक्ष की मान्यता है. वहीं बौद्ध धर्म में भी कैलाश को अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली स्थान माना जाता है. चार अलग-अलग धार्मिक परंपराएं और आस्था का एक बड़ा केंद्र है कैलाश. शायद यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है.

  • गरुड़ पुराण में गर्भवती महिला और बच्चों के अंतिम संस्कार को लेकर क्या नियम हैं?

    गरुड़ पुराण में गर्भवती महिला और बच्चों के अंतिम संस्कार को लेकर क्या नियम हैं?

    हम सभी जानते हैं कि सामान्य हिंदू परंपरा में किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसका अंतिम संस्कार किया जाता है. चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, मृत शरीर को अग्नि के सुपुर्द करने की परंपरा रही है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि गर्भवती महिला और छोटे बच्चों की मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार की विधि सामान्य से अलग मानी जाती है?

    गरुड़ पुराण में मृत्यु और उसके बाद किए जाने वाले संस्कारों को लेकर कई तरह के नियम और मान्यताएं बताई गई हैं. इन्हीं में गर्भवती महिला और कम उम्र में मृत्यु को प्राप्त होने वाले बच्चों के अंतिम संस्कार का भी उल्लेख मिलता है l

    जब कोई महिला गर्भवती होती है, तो उसके गर्भ में एक शिशु पल रहा होता है. ऐसे में अगर गर्भवती महिला की मृत्यु हो जाए तो धार्मिक परंपराओं के अनुसार सबसे पहले गर्भ में पल रहे बच्चे को बाहर निकालने की बात कही गई है. अगर बच्चा जीवित हो, तो उसका पालन-पोषण सामान्य बच्चे की तरह किया जाना चाहिए. लेकिन अगर गर्भ में पल रहे बच्चे की भी मृत्यु हो चुकी हो, तो उसके अंतिम संस्कार को लेकर अलग धार्मिक नियम बताए गए हैं l

    गर्भवती महिला के अंतिम संस्कार को लेकर क्या मान्यता है?
    गरुड़ पुराण के अनुसार, गर्भवती महिला की मृत्यु होने पर उसके अंतिम संस्कार से पहले गर्भस्थ शिशु को बाहर निकालने की बात कही गई है. इसके बाद महिला के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की जाती है. धार्मिक परंपराओं में मृत्यु के बाद दान-पुण्य को भी महत्वपूर्ण माना गया है. इसलिए मृतक की स्थिति के अनुसार दान आदि करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है l

    वहीं, यदि किसी गर्भवती महिला के पति की मृत्यु हो जाए, तो ऐसी स्थिति में महिला को धैर्य और संयम के साथ अपने बच्चे का पालन-पोषण करना चाहिए. पुराने समय की सामाजिक परंपराओं में पति की मृत्यु के बाद महिला के जीवन को लेकर कई नियम और मान्यताएं थीं. हालांकि, सती प्रथा जैसी प्रथाएं आज कानूनन समाप्त हो चुकी हैं और इन्हें वर्तमान समय की धार्मिक या सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं माना जा सकता l

    छोटे बच्चों की मृत्यु पर क्या होती है अंतिम क्रिया?
    गरुड़ पुराण और हिंदू धार्मिक परंपराओं में कम उम्र में मृत्यु को प्राप्त होने वाले बच्चों के अंतिम संस्कार को लेकर भी अलग-अलग नियमों का उल्लेख मिलता है. मान्यता है कि बहुत छोटे या नवजात बच्चे की मृत्यु होने पर सामान्य वयस्कों की तरह उसका दाह संस्कार नहीं किया जाता, बल्कि कुछ परंपराओं में उसे दफनाने की बात कही गई है l

    ऐसे बच्चे के शरीर को श्वेत वस्त्र में लपेटकर उचित स्थान पर दफनाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है. कुछ धार्मिक मान्यताओं में अंतिम समय में तुलसी दल रखने और अन्य धार्मिक वस्तुओं के प्रयोग की बात भी कही गई है l

    इसके पीछे धार्मिक मान्यता यह है कि बहुत कम उम्र का बच्चा जीवन के कर्मों और पाप-पुण्य की उस अवस्था में नहीं पहुंचा होता, जिस तरह एक वयस्क व्यक्ति पहुंचता है. इसलिए उसके लिए अलग संस्कार बताए गए हैं l

    उम्र बढ़ने के साथ बदल जाती है अंतिम संस्कार की विधि
    धार्मिक ग्रंथों में बच्चों की उम्र के अनुसार अंतिम संस्कार और मृत्यु के बाद किए जाने वाले कर्मों में अंतर बताया गया है. बहुत कम उम्र के बच्चों के लिए जहां दफनाने की परंपरा बताई गई है. वहीं कुछ अधिक उम्र के बच्चों के लिए अलग संस्कारों का उल्लेख मिलता है. अलग-अलग परंपराओं और क्षेत्रों में इन नियमों में अंतर भी देखने को मिलता है l

    कुछ धार्मिक मान्यताओं में छोटे बच्चों की मृत्यु के बाद विशेष दान-पुण्य करने की बात कही गई है. कहीं दूध का दान, कहीं जल से भरे घड़े का दान और कहीं खीर या भोजन कराने जैसी परंपराओं का उल्लेख मिलता है l

    बच्चों की मृत्यु के बाद क्या करना चाहिए?
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कम उम्र में मृत्यु को प्राप्त होने वाले बच्चों के लिए उनकी उम्र के आधार पर अलग-अलग कर्मकांड बताए गए हैं. कुछ परंपराओं में ब्राह्मणों या बालकों को भोजन कराने और दान-पुण्य करने की बात कही गई है. वहीं, कुछ आयु वर्ग के बच्चों के लिए मृत्यु के बाद किए जाने वाले संस्कारों में एकादश और द्वादश कर्मों को लेकर भी अलग नियम बताए गए हैं l

    हालांकि, इन संस्कारों की विधि ग्रंथ, संप्रदाय, क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है. इसलिए किसी वास्तविक परिस्थिति में स्थानीय पुरोहित या संबंधित धार्मिक परंपरा के जानकार से सलाह लेना उचित माना जाता है l

  • आज आसमान में दिखेगा दुर्लभ खगोलीय नजारा, साल के आखिरी सूर्य ग्रहण की ये है खासियत

    आज आसमान में दिखेगा दुर्लभ खगोलीय नजारा, साल के आखिरी सूर्य ग्रहण की ये है खासियत

    आज 12 अगस्त 2026 को भारतीय समय के अनुसार, यह ग्रहण (Surya Grahan time) रात 09 बजकर 04 मिनट पर शुरू होगा और 13 अगस्त की देर रात 01 बजकर 27 मिनट पर समाप्त होगा। ग्रहण का पीक यानी चरम रात 11 बजकर 16 मिनट पर होगा। जानें आज लगने वाले सूर्य ग्रहण से जुड़ी सभी जरूरी बातें। श्रावण कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि पर साल का दूसरा और अंतिम सूर्य ग्रहण लगने जा रहा है। जानें आज लगने वाले सूर्य ग्रहण से जुड़ी सभी जरूरी बातें। यह एक पूर्ण सूर्य ग्रहण है जो कि कर्क राशि और अश्लेषा नक्षत्र में लगेगा। पंडित नरेंद्र उपाध्याय बताते हैं कि सूर्य ग्रहण एक नकारात्मक घटना होती है जिसका देश-दुनिया के साथ राशियों पर भी प्रतिकूल प्रभाव ही पड़ता है। हालांकि कुछ विशेष परिस्थितियों में ग्रहण शुभ भी होता है। सूर्य ग्रहण हमेशा अमावस्या तिथि पर ही लगता है। यह ग्रहण सावन अमावस्या पर लग रहा है, जिसे हरियाली अमावस्या भी कहा जाता है। सावन अमावस्या तिथि पर शिव उपासना के साथ स्नान, दान और पितरों के तर्पण का विशेष महत्व होता है।

    जानें कब कुंडली में 'विजय योग' बनाते हैं राहु-सूर्य

    सूर्य और राहु की युति से बनने वाले ग्रहण योग का नाम सुनते ही आमतौर पर लोग भयभीत हो जाते हैं. इसे अक्सर नकारात्मक प्रभाव देने वाला योग माना जाता है. लेकिन इसका फल पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि यह युति किस भाव और किस राशि में बन रही है. कई स्थितियों में यही ग्रहण योग राजयोग की तरह सकारात्मक परिणाम भी देता है. छठा भाव भी ऐसी ही विशेष स्थिति वाला भाव माना जाता है। 

    छठा भाव शत्रु, रोग, ऋण और प्रतियोगिता का कारक भाव होता है. जब इस भाव में सूर्य और राहु की युति से ग्रहण योग बनता है तो प्रारंभिक स्तर पर कुछ चुनौतियां जरूर सामने आती हैं. व्यक्ति को अपने कार्यक्षेत्र में विरोध, बाधाएं और सहयोगियों से मतभेद का सामना करना पड़ सकता है. साथ ही, पिता के साथ विचारों में टकराव की स्थिति भी बन सकती है. लेकिन इन सबके बावजूद यह योग व्यक्ति को अंदर से मजबूत और संघर्षशील बनाता है। 

    ग्रहण योग कब बनाता है विजय योग?
    छठे भाव में बनने वाला यह ग्रहण योग व्यक्ति को अपने शत्रुओं पर विजय दिलाने की क्षमता देता है. विरोधी चाहे कितने भी मजबूत क्यों न हों, वे लंबे समय तक टिक नहीं पाते हैं. कोर्ट-कचहरी से जुड़े मामलों में भी ऐसे व्यक्ति को सफलता मिलने की संभावना अधिक रहती है. यही कारण है कि इस योग को कई मामलों में ‘विजय योग’ के रूप में भी देखा जाता है। 

    आज सूर्य ग्रहण के बाद मेष राशि वाले क्या उपाय करें?
     मेष राशि वालों के लिए ग्रहण के परिणाम अच्छे नहीं है। इस समय आपको पारिवारिक और आर्थिक परेशानियां परेशान कर सकती हैं। पैसों का नुकसान हो सकता है। मेष राशि वालों को इस समय वाहन प्रयोग में सावधानी बरतनी चाहिए। चोट-चपेट से बचाव करें। इस दौरान अपनी योजनाओं को गोपनीय रखें, वरना बना हुआ काम टल सकता है। ग्रहण के खराब प्रभाव से बचने के लिए सूर्य ग्रहण खत्म होने के बाद गुड़ का दान करना अच्छा रहेगा।

    विशेष रूप से यदि ऐसा व्यक्ति वकालत या कानून से जुड़े क्षेत्र में हो तो उसे इस योग का विशेष लाभ मिलता है. उसकी तार्किक क्षमता, आत्मविश्वास और विरोधियों को परास्त करने की योग्यता उसे सफल बनाती है. कार्यस्थल पर भी भले ही कुछ लोग बाधाएं उत्पन्न करें, लेकिन व्यक्ति का प्रभाव और दबदबा बना रहता है, जिससे अंततः सफलता उसी के हिस्से में आती है। 

    तुला राशि में ग्रहण योग देता है लाभ
    यदि यह ग्रहण योग सूर्य की नीच राशि तुला में बनता है तो इसके परिणाम और भी रोचक हो जाते हैं. इस स्थिति में सूर्य चौथे भाव का स्वामी होकर छठे भाव में स्थित होता है. ज्योतिष में छठे भाव में नीच ग्रह का होना कई बार शुभ फलदायी माना जाता है, क्योंकि यह नकारात्मकताओं को नियंत्रित करने की क्षमता देता है. ऐसे में व्यक्ति को संपत्ति, वाहन और भौतिक सुख-सुविधाओं का लाभ मिल सकता है। 

    हालांकि ऐसे व्यक्तियों को अपने स्वभाव में संतुलन बनाए रखना चाहिए. विशेष रूप से बड़बोलापन और अहंकार से बचना जरूरी है, क्योंकि यह उनके संबंधों और छवि को नुकसान पहुंचा सकता है. संयमित व्यवहार और सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने से इस योग के अच्छे परिणाम और भी बढ़ सकते हैं. छठे भाव में सूर्य-राहु का ग्रहण योग केवल भय का कारण नहीं होती, बल्कि सही समझ और दृष्टिकोण के साथ वही स्थिति सफलता और विजय का मार्ग भी प्रशस्त कर सकती है। 

     सूर्य ग्रहण का देश-दुनिया पर प्रभाव
    सूर्य ग्रहण कर्क राशि में लग रहा है। यह जल तत्व की राशि है। इस राशि में ग्रहण लगने के कारण जल से जुड़ी प्राकृतिक घटनाओं का प्रभाव देखने को मिल सकता है। इसके अलावा भूकंप जैसी घटनाओं की भी आशंका जताई गई है। ग्रहण का असर राजनीति या सत्ता पर भी देखने को मिल सकता है।

     सूर्य ग्रहण के सूर्य बदलेंगे राशि
    सूर्य ग्रहण के कुछ दिन सूर्य अपनी राशि बदलेंगे। 17 अगस्त 2026 को सूर्य सिंह राशि में गोचर करेंगे। सिंह राशि में सूर्य आने का प्रभाव देश-दुनिया के साथ मानव जीवन पर पड़ेगा। सूर्य ग्रहण के बाद सूर्य गोचर से सिंह, कुंभ और कन्या राशि वालों को अच्छे परिणाम प्राप्त होंगे।

     यहां 64 साल बाद दिखेगा ऐसा दुर्लभ सूर्य ग्रहण
    1999 से 27 वर्ष बाद 12 अगस्त 2026 को यूरोप की मुख्य भूमि पर पूर्ण सूर्य ग्रहण लगने वाला है। अब 64 वर्ष बाद 23 सितंबर 2090 को पूर्ण सूर्य ग्रहण का नजारा यूनाइटेड किंगडम और यूरोप के लोग देख पाएंगे। सूर्य ग्रहण के दौरान कुछ समय के लिए चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है। सूर्य का एक हिस्सा पूरी तरह से ढक जाता है और आसमान में इस समय अनोखा नजारा देखने को मिलता है।

     सूर्य ग्रहण को खुली आंखों से देखा जा सकता है या नहीं?
    खगोलीय वैज्ञानिकों के अनुसार, सूर्य ग्रहण को खुली आंखों से नहीं देखना चाहिए। ग्रहण के समय निकलने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणें आंखों की रोशनी को नुकसान पहुंचा सकती हैं।

     सूर्य ग्रहण कब होगा पीक पर
    आज रात 11 बजकर 16 मिनट पर सूर्य अपने पीक पर होगा। आसमान में पूर्ण सूर्य ग्रहण की घटना रात 10 बजकर 29 मिनट पर होगी। इस समय चंद्रमा सूर्य का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा ढक लेगा। हालांकि भारत में इस समय रात होने के कारण लोग यह अद्भुत नजारा नहीं देख पाएंगे।