Category: धर्म अध्यात्म

  • रक्षाबंधन पर लगेगा साल का दूसरा चंद्र ग्रहण, भारत में नहीं दिखेगा ‘ब्लड मून’

    रक्षाबंधन पर लगेगा साल का दूसरा चंद्र ग्रहण, भारत में नहीं दिखेगा ‘ब्लड मून’

     भाई-बहन के अटूट प्रेम और स्नेह का प्रतीक रक्षाबंधन का पावन पर्व इस साल एक बेहद खास और दुर्लभ खगोलीय संयोग लेकर आ रहा है. इस साल श्रावण पूर्णिमा यानी रक्षाबंधन के दिन ही साल का दूसरा चंद्र ग्रहण लगने जा रहा है. इस खगोलीय घटना के दौरान कई जगहों पर ब्लड मून (Blood Moon) का अद्भुत नजारा भी देखने को मिलेगा, जिसे लेकर लोगों के मन में कई तरह की शंकाएं और सवाल उठ रहे हैं.  आइए जानते हैं इस ग्रहण से जुड़ी हर एक जरूरी और महत्वपूर्ण बात.

    कब और कितने बजे लगेगा चंद्र ग्रहण?
    खगोल विज्ञान और पंचांग के अनुसार, साल का यह दूसरा चंद्र ग्रहण 28 अगस्त 2026 को लगेगा. भारतीय समयानुसार यह ग्रहण सुबह 06:53 बजे से शुरू होकर दोपहर 12:31 बजे तक यानी करीब 5 घंटे 39 मिनट तक रहेगा.

    इस दौरान एक दिलचस्प खगोलीय स्थिति यह होगी कि पृथ्वी की गहरी छाया (अम्ब्रा) चंद्रमा के लगभग 93 से 96 प्रतिशत हिस्से को ढक लेगी.  इस वजह से चंद्रमा पूरी तरह काला दिखने के बजाए गहरे तांबे जैसे लाल (कॉपर रेड) रंग का नजर आएगा, जिसे ब्लड मून कहा जाता है.

    क्या भारत में नजर आएगा चंद्र ग्रहण?
    सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत में यह ग्रहण दिखाई देगा? तो आपको बता दें कि यह चंद्र ग्रहण भारत में नजर नहीं आएगा. यह मुख्य रूप से यूरोप, पश्चिमी एशिया, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, अटलांटिक और प्रशांत महासागर के क्षेत्रों में दिखाई देगा.  चूंकि जिस समय यह ग्रहण लग रहा होगा, उस वक्त भारत में दिन का उजाला होगा, इसलिए देश में इसकी दृश्यता शून्य होगी.

    क्या भारत में मान्य होगा सूतक काल?
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चंद्र ग्रहण शुरू होने से लगभग 9 घंटे पहले सूतक काल शुरू हो जाता है, जिसमें सूतक के दौरान तमाम मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है और मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं.

    लेकिन चूंकि 28 अगस्त का यह चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, इसलिए भारत में इसका सूतक काल भी मान्य नहीं होगा.  सूतक न होने के कारण देश में किसी भी प्रकार के धार्मिक नियमों या पाबंदियों का पालन करने की आवश्यकता नहीं है. मंदिर खुले रहेंगे.  सामान्य पूजा-पाठ जारी रह सकेगा.

    क्या रक्षाबंधन के त्योहार या राखी बांधने पर पड़ेगा कोई असर?
    चूंकि यह ग्रहण भारत में दृश्यामान नहीं है और इसका कोई सूतक काल नहीं है, इसलिए रक्षाबंधन के पर्व पर इसका कोई भी नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा.बहनें बिना किसी संकोच या चिंता के पूरे दिन अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांध सकती हैं.पंचांग के अनुसार इस दिन उदया तिथि होने के कारण त्योहार मनाने के लिए पूरा दिन श्रेष्ठ रहेगा.बस परंपरा के अनुसार सामान्य रूप से भद्राकाल आदि का ध्यान रखा जा सकता है.

  • सावन में शिवधामों का रहस्य, त्र्यंबकेश्वर और केदारनाथ की अद्भुत कथाएं।

    सावन में शिवधामों का रहस्य, त्र्यंबकेश्वर और केदारनाथ की अद्भुत कथाएं।

    भक्ति के पावन महीने सावन में महादेव की कृपा पाने के लिए करोड़ों श्रद्धालु शिवधामों की ओर रुख करते हैं. भारत प्राचीन मंदिरों की भूमि है, जहां का हर तीर्थ अपने साथ अद्वितीय रहस्य, चमत्कार और पौराणिक कथाएं समेटे हुए है. खासकर महाराष्ट्र का त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग और उत्तराखंड के केदारनाथ व बद्रीनाथ धाम ऐसे प्रमुख तीर्थ हैं, जिनका सावन के महीने में दर्शन करना विशेष फलदायी माना जाता है. सावन के इस पवित्र अवसर पर आइए जानते हैं इन तीनों ऐतिहासिक और पौराणिक मंदिरों से जुड़ी अनोखी कथाएं, चमत्कारिक घटनाएं और इनके पीछे के गहरे रहस्य.

    त्र्यंबकेश्वर महादेव मंदिर, महाराष्ट्र
    त्र्यंबकेश्वर मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है. इसकी सबसे खास बात यह है कि यहां शिवलिंग एक नहीं, बल्कि तीन मुखों वाला है, जिसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक माना जाता है. यह ज्योतिर्लिंग एक कुंड के भीतर स्थित है और निरंतर जलाभिषेक के कारण धीरे-धीरे क्षरण हो रहा है. मान्यता है कि यह कलियुग में धर्म के पतन का संकेत है.

    पौराणिक कथा के अनुसार, गौतम ऋषि ने अकाल से पीड़ित लोगों के लिए कठोर तप किया. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने गंगा को यहां प्रकट होने का आदेश दिया. यही धारा आगे चलकर गोदावरी नदी बनी, जिसे दक्षिण की गंगा कहा जाता है. मंदिर से जुड़ी एक और मान्यता पांडवों से जुड़ी है. कहा जाता है कि यहां का रत्नजड़ित मुकुट पांडव काल का है, जिसे हर सोमवार कुछ समय के लिए दर्शन हेतु रखा जाता है. मंदिर के पास स्थित कुशावर्त कुंड को गोदावरी का उद्गम माना जाता है, जो कभी सूखता नहीं- यह भी एक रहस्य माना जाता है. त्र्यंबकेश्वर विशेष अनुष्ठानों के लिए भी प्रसिद्ध है, जैसे नारायण नागबली, कालसर्प शांति और महामृत्युंजय जाप. भक्तों का विश्वास है कि इन अनुष्ठानों से कठिन समस्याओं और रोगों से मुक्ति मिलती है.

    केदारनाथ मंदिर, उत्तराखंड
    हिमालय की गोद में स्थित केदारनाथ धाम भगवान शिव का अत्यंत पवित्र ज्योतिर्लिंग है. यह समुद्र तल से लगभग 3,583 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और चारधाम यात्रा का प्रमुख हिस्सा है. केदारनाथ से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा महाभारत काल की है. पांडव युद्ध के पाप से मुक्ति के लिए भगवान शिव की तलाश में निकले. भगवान शिव उनसे नाराज थे और नंदी का रूप लेकर छिप गए. भीम ने उन्हें पहचान लिया और पकड़ने की कोशिश की, जिससे भगवान शिव के शरीर के पांच भाग अलग-अलग स्थानों पर प्रकट हुए, जिन्हें पंच केदार कहा जाता है.

    इस मंदिर का निर्माण रहस्य से भरा हुआ है. भारी पत्थरों से बिना मसाले के बनी यह संरचना सदियों से बर्फ, तूफान और प्राकृतिक आपदाओं को झेलती आई है. वैज्ञानिक भी इसकी मजबूती को देखकर हैरान हैं. 2013 की केदारनाथ आपदा इस मंदिर के इतिहास की सबसे बड़ी घटना रही. भीषण बाढ़ में पूरा क्षेत्र तबाह हो गया, लेकिन मंदिर सुरक्षित रहा. एक विशाल चट्टान मंदिर के पीछे आकर रुक गई, जिसने पानी का रुख बदल दिया. इसे भक्त भीमशिला के नाम से जानते हैं और इसे भगवान शिव का चमत्कार मानते हैं.

    आस्था और विज्ञान का संगम
    इन दोनों मंदिरों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां आस्था और विज्ञान का अद्भुत मेल देखने को मिलता है. जहां भक्त इन घटनाओं को चमत्कार मानते हैं, वहीं वैज्ञानिक इनके पीछे के कारण खोजने की कोशिश करते हैं.

    त्र्यंबकेश्वर और केदारनाथ सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं हैं, बल्कि ये भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और रहस्यमयी विरासत के प्रतीक हैं. यही कारण है कि सदियों बाद भी इनकी महिमा और रहस्य लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं.

  • गरुड़ पुराण में सूर्यास्त बाद अंतिम संस्कार वर्जित, जानें धार्मिक मान्यता

    गरुड़ पुराण में सूर्यास्त बाद अंतिम संस्कार वर्जित, जानें धार्मिक मान्यता

     किसी भी व्यक्ति की मृत्यु होना बेहद दुखद क्षण होता है. जब कोई अपना हमें छोड़कर जाता है, तो एक ओर जहां उसके जाने का गहरा दुख होता है, वहीं दूसरी ओर उसके अंतिम संस्कार की तैयारियां भी शुरू हो जाती हैं. गरुड़ पुराण में मृत्यु और उससे जुड़े कई नियमों और मान्यताओं का विस्तार से वर्णन मिलता है. इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण मान्यता यह है कि सूर्यास्त के बाद किसी भी व्यक्ति का अंतिम संस्कार नहीं किया जाता है.

    रात में अंतिम संस्कार क्यों नहीं किया जाता?
    गरुड़ पुराण के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु सूर्यास्त के बाद होती है, तो उसके अंतिम संस्कार के लिए अगले दिन सूर्योदय तक प्रतीक्षा की जाती है. इसके पीछे धार्मिक और आध्यात्मिक दोनों कारण बताए गए हैं. गरुड़ पुराण में कहा गया है कि रात के समय दाह संस्कार करना वर्जित है, क्योंकि इससे मृत आत्मा को परलोक में कष्ट हो सकता है.

    मान्यता यह भी है कि यदि रात में अंतिम संस्कार किया जाए, तो अगले जन्म में उस व्यक्ति को किसी न किसी प्रकार की शारीरिक कमी या दोष का सामना करना पड़ सकता है. इसलिए दिन के समय ही अंतिम संस्कार करना शुभ माना गया है, क्योंकि यह वह समय होता है जब सूर्य का प्रभाव सक्रिय रहता है. हिंदू धर्म में सूर्य को आत्मा का कारक माना गया है. सूर्य जीवन, ऊर्जा और चेतना का प्रतीक है. मान्यता है कि आत्मा सूर्य से ही उत्पन्न होती है और अंत में उसी में विलीन हो जाती है. इसलिए सूर्य के रहते हुए, यानी दिन के समय अंतिम संस्कार करना आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए अधिक अनुकूल माना जाता है.

    इसके अलावा, यह भी कहा जाता है कि सूर्यास्त के बाद स्वर्ग के द्वार बंद हो जाते हैं और नकारात्मक शक्तियां अधिक सक्रिय हो जाती हैं. ऐसे में यदि दाह संस्कार किया जाए, तो आत्मा के मोक्ष के मार्ग में बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं.

    रात में मृत्यु होने पर क्या करें?
    अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु रात में हो जाए, तो गरुड़ पुराण में कुछ विशेष सावधानियां रखने के लिए भी कहा गया है. जैसे शव को घर के अंदर न रखकर, तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाकर रखना चाहिए. साथ ही शव को कभी भी अकेला नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस समय नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव बढ़ सकता है. परिवार के किसी सदस्य को मृतक के पास बैठकर भगवान से उसकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए. ऐसा करने से आत्मा को शांति मिलती है और वह अपने अगले सफर के लिए तैयार होती है.

    क्या है अंतिम संस्कार?
    हिंदू धर्म में कुल 16 संस्कार बताए गए हैं, जिनमें अंतिम संस्कार सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है. यह केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि आत्मा को शरीर से मुक्त करने और उसे पंचतत्व में विलीन करने की प्रक्रिया है. शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश, इन पांच तत्वों से बना है और दाह संस्कार के माध्यम से ये सभी तत्व पुनः प्रकृति में मिल जाते हैं.

    कुछ विशेष परिस्थितियों में अपवाद भी देखने को मिलते हैं. जैसे साधु-संतों को दाह संस्कार के बजाय समाधि दी जाती है, क्योंकि उनका शरीर साधना और तपस्या के कारण विशेष ऊर्जा से युक्त माना जाता है. इसलिए, मृत व्यक्ति का अंतिम संस्कार विधि-विधान और सही समय पर करना अत्यंत आवश्यक है. इससे न केवल आत्मा को शांति मिलती है, बल्कि उसके मोक्ष प्राप्त करने की संभावनाएं भी बढ़ जाती हैं.

  • रक्षाबंधन पर लगेगा चंद्र ग्रहण, जानें भारत में असर और सूतक काल की सच्चाई

    रक्षाबंधन पर लगेगा चंद्र ग्रहण, जानें भारत में असर और सूतक काल की सच्चाई

    भाई-बहन के पवित्र प्रेम और अटूट विश्वास का पर्व रक्षाबंधन इस वर्ष बेहद खास और अनूठे खगोलीय संयोग के साथ आ रहा है. इस साल सावन मास की पूर्णिमा यानी रक्षाबंधन के दिन ही साल का दूसरा चंद्र ग्रहण लगने जा रहा है. इस दुर्लभ संयोग को लेकर देश भर के लोगों और भाई-बहनों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या ग्रहण के साये का असर इस पावन त्योहार पर पड़ेगा या नहीं.  आइए जानते हैं इससे जुड़ी सभी जरूरी और सटीक जानकारियां.

    कब से कब तक लगेगा चंद्र ग्रहण?
    पंचांग और खगोलीय गणना के अनुसार, साल का यह दूसरा चंद्र ग्रहण 28 अगस्त 2026 को लगेगा.  भारतीय समयानुसार यह ग्रहण सुबह 06:53 बजे शुरू होगा , दोपहर 12:31 बजे तक यानी करीब 5 घंटे 39 मिनट तक रहेगा.  इस दौरान कई देशों में ब्लड मून (Blood Moon) का अद्भुत नजारा भी देखने को मिलेगा, क्योंकि पृथ्वी की छाया चंद्रमा के बड़े हिस्से को ढंक लेगी.

    चंद्र ग्रहण के दौरान चांद का रंग लाल या तांबे जैसा (Copper Red) हो जाता है, जिसे खगोलीय भाषा में ब्लड मून (Blood Moon) कहा जाता है.

    इसके पीछे की मुख्य वैज्ञानिक वजह यह है कि जब पूर्ण चंद्र ग्रहण लगता है, तो सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक सीध में आ जाते हैं.  इस स्थिति में सूर्य की किरणें सीधे चंद्रमा तक नहीं पहुंच पातीं, बल्कि उन्हें पृथ्वी के वायुमंडल से होकर गुजरना पड़ता है.

    वायुमंडल से गुजरते समय सूर्य के प्रकाश का जो नीला रंग होता है, वह प्रकीर्णित (Scatter) होकर बिखर जाता है, जबकि लाल रंग की तरंगदैर्घ्य (Wavelength) सबसे कम बिखरती है और वह वायुमंडल से छनकर चंद्रमा की सतह पर पड़ती है. इसी कारण से ग्रहण के दौरान चंद्रमा हमें चमकीले सफेद की बजाय लाल या गहरे तांबे के रंग का दिखाई देता है.

    क्या भारत में नजर आएगा चंद्र ग्रहण?
    सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या यह खगोलीय घटना भारत में दिखाई देगी? जानकारों के अनुसार, यह चंद्र ग्रहण भारत में नजर नहीं आएगा.  यह मुख्य रूप से यूरोप, अफ्रीका, एशिया के कुछ पश्चिमी हिस्सों, और अमेरिका महाद्वीप में दिखाई देगा. चूंकि भारत में इस समय दिन का उजाला होगा, इसलिए यहाँ इसकी दृश्यता शून्य रहेगी.

    क्या भारत में मान्य होगा सूतक काल?
    धार्मिक नियमों के अनुसार, चंद्र ग्रहण शुरू होने से लगभग 9 घंटे पहले सूतक काल प्रभावी हो जाता है, जिसमें तमाम मांगलिक और धार्मिक कार्यों पर रोक होती है.  लेकिन चूंकि 28 अगस्त का यह चंद्र ग्रहण भारत में दृश्यामान नहीं है, इसलिए भारत में इसका सूतक काल भी मान्य नहीं होगा.

    क्या रक्षाबंधन के त्योहार पर पड़ेगा कोई प्रभाव?
    चूंकि भारत में न तो यह ग्रहण दिखाई देगा और न ही इसका सूतक काल लगेगा, इसलिए रक्षाबंधन के पर्व पर इसका कोई भी नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा. बहनें बिना किसी संकोच या असमंजस के पूरे दिन हर्षोल्लास के साथ अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांध सकेंगी.  पंचांग के अनुसार त्योहार मनाने और राखी बांधने के लिए पूरा दिन श्रेष्ठ रहेगा.

  • रामायण में रावण की मां कैकसी की कहानी, जिसने दशानन को जन्म दिया

    रामायण में रावण की मां कैकसी की कहानी, जिसने दशानन को जन्म दिया

     कुछ दिनों पहले फिल्म रामायण का पहला ट्रेलर रिलीज हो चुका है. ट्रेलर रिलीज होते ही इंटरनेट पर छा गया. इस मूवी में इंडस्ट्री के कई बड़े और मशहूर कलाकार नजर आने वाले हैं, जिसकी वजह से दर्शकों के बीच इसे लेकर काफी उत्साह देखने को मिल रहा है. उसी में से एक कलाकार हैं शोभना, जो इस मूवी में रावण की मां कैकसी का रोल अदा करेंगी. तो आइए जानते हैं कि कौन थी कैकसी, जिसकी कोख से जन्मा था दशानन रावण l  

    कौन थी कैकसी?
    रामायण के उत्तरकांड के मुताबिक, कैकसी रावण की मां थी, जिसका दूसरा नाम निकाशा भी था. रावण की मां कैकसी एक शक्तिशाली राक्षस सुमाली और उनकी पत्नी केतुमती की बेटी थी, जो पाताल लोक पर राज करते थे. राजा सुमाली ने जब देखा कि ऋषि विश्रवा के पुत्र कुबेर धन-धान्य और लंका पर राज कर रहे हैं, तो उसने अपनी पुत्री कैकसी को विश्रवा ऋषि के पास वर की इच्छा प्राप्ति के लिए भेजा. कैकसी जब आश्रम पहुंची थी, तब संध्या काल यानी अशुभ बेला में ऋषि विश्रवा हवन कर रहे थे. कैकसी ने विनम्रतापूर्वक उनके पास जाकर अपने पिता की इच्छा बताई. ऋषि विश्रवा ने कहा कि तुमने अत्यंत भयानक और दारुण समय में आकर संतान की याचना की है, इसलिए तुम्हारे पुत्र क्रूर और भयानक रूप वाले राक्षसी स्वभाव वाले होंगे.

    ऋषि विश्रवा की यह बात सुनकर कैकसी दुखी हो गई और उनके चरणों में गिरकर बोली, 'हे ब्रह्मर्षि! आपसे मुझे ऐसे दुराचारी और अधर्मी पुत्रों की अपेक्षा नहीं थी. कृपया मुझ पर कृपा करें.' कैकसी की प्रार्थना सुनकर ऋषि ने कहा कि, 'तुम्हारा सबसे छोटा पुत्र मेरी ही तरह धर्मात्मा और भक्तिभाव वाला होगा. उसके मन में धर्म के प्रति निष्ठा रहेगी.'

    जिसके चलते सबसे पहले दस सिर और बीस भुजाओं वाले विकराल बालक का जन्म हुआ, जिसके सिर पर काले बादल जैसी कांति थी. उसके जन्म लेते ही अमंगलकारी लक्षण दिखाई देने लगे. पिता विश्रवा ने दस सिर होने के कारण उसका नाम दशग्रीव (रावण) रखा. उसके बाद, विशालकाय कुंभकर्ण का जन्म हुआ, जो स्वभाव से अत्यंत क्रूर, विशाल और महाबली था. फिर, फिर एक डरावने रूप वाली कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम शूर्पणखा (सूर्पणखा) रखा गया. आखिरी में, सौम्य बालक विभीषण का जन्म हुआ, जिसके जन्म के समय आकाश से पुष्प वर्षा हुई थी. इसी के बाद कैकसी ने कुबेर के वैभव को देखकर अपने ज्येष्ठ पुत्र दशग्रीव यानी रावण को उसके भाइयों सहित तपस्या करने के लिए गोकर्ण क्षेत्र भेजा था.

    कैकसी से मिली थी रावण को लंका विजय की प्रेरणा
    उत्तरकांड के अनुसार, कैकसी की प्रेरणा और निर्देश मिलने के बाद रावण, कुंभकर्ण और विभीषण तीनों भाई गोकर्ण आश्रम पहुंचे. वहां उन्होंने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या शुरू की. कहा जाता है कि रावण ने दस हजार वर्षों तक घोर तपस्या की. प्रत्येक एक हजार वर्ष पूरा होने पर वह अपना एक सिर काटकर अग्नि में अर्पित कर देता था. जब वह अपना दसवां सिर काटने वाला था, तब ब्रह्मा जी प्रकट हुए और उसके कटे हुए सभी सिर वापस जोड़ दिए. जिसके बाद रावण ने ब्रह्मा जी से अमरता का वरदान मांगा. ब्रह्मा जी के मना करने पर उसने वरदान मांगा कि देव, दानव, यक्ष, गंधर्व या नाग उसका वध न कर सकें. ब्रह्मा जी ने उसे यह वरदान दे दिया था.

    वरदान पाने के बाद रावण का अहंकार और बल अत्यधिक बढ़ गया था. उसने अपने नाना सुमाली के उकसाने और माता कैकसी की इच्छा पूरी करने के लिए कुबेर के पास दूत भेजा और लंका छोड़ने को कहा.

    कुबेर देवता को पिता विश्रवा की सलाह
    जब कुबेर ने अपने पिता ऋषि विश्रवा से इस बारे में सलाह ली, तो ऋषि विश्रवा ने कुबेर को रावण से युद्ध न करने और लंका छोड़कर कैलाश पर्वत के पास अलकापुरी नगरी बसाने की सलाह दी. कुबेर ने पिता की आज्ञा मानकर शांतपूर्वक लंका छोड़ दी.

    इसके बाद रावण ने धूमधाम से लंका में प्रवेश किया. वह लंका का अधिपति बना और अपनी माता कैकसी का सपना पूरा किया. आगे चलकर रावण ने पुष्पक विमान भी कुबेर से छीन लिया और तीनों लोकों पर अत्याचार कर विजय हासिल की.

  • रामायण फिल्म में मारीच का किरदार, जानें सोने के हिरण की कहानी

    रामायण फिल्म में मारीच का किरदार, जानें सोने के हिरण की कहानी

    लंबे इंतजार के बाद रामायण मूवी का पहला ट्रेलर रिलीज हो चुका है. 4 मिनट के इस ट्रेलर में पूरी कास्ट का इंट्रोडक्शन दिया गया है कि किसने किसका रोल अदा किया है. जैसे श्री राम के किरदार में रणबीर कपूर नजर आएंगे, माता सीता का रोल साई पल्लवी करेंगी, दशानन रावण का रोल यश करेंगे. वहीं, मामा मारीच का रोल सौरभ सचदेवा करते नजर आएंगे. तो चलिए जानते हैं कि कौन थे मारीच, जिसने सोने के हिरण का रूप धारण किया था l  

    कौन थे मारीच?
    मारीच रामायण के बहुत ही महत्वपूर्ण पात्र थे. जब रावण ने माता सीता का हरण किया तो उसमें मारीच की भी अहम भूमिका थी. मारीच राक्षस सुंद और यक्षिणी ताड़का का पुत्र था. ताड़का, यक्षराज सुकेतु की बेटी थी, जिसे भगवान ब्रह्मा से वरदान मिला था. मारीच और उसका भाई सुबाहु दोनों देखने में सुंदर और बहुत शक्तिशाली थे. उन्हें मायावी विद्या का भी अच्छा ज्ञान था और वे जादुई शक्तियों में निपुण थे l  

    सङ्गृह्यास्त्रं ततो रामो दिव्यमाग्नेयमद्भुतम्।
    सुबाहूरसि चिक्षेप सविद्ध: प्रापतद्भुवि।।

    रामायण के बालकांड के मुताबिक, एक बार राक्षस सुंद ने ऋषि अगस्त्य के आश्रम पर हमला कर दिया था. इससे क्रोधित होकर ऋषि अगस्त्य ने अपनी तपस्या की शक्ति से उसे भस्म कर दिया था. सुंद की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी ताड़का और उसके बेटे मारीच और सुबाहु ने भी अगस्त्य ऋषि पर हमला किया. तब ऋषि ने उन्हें श्राप देकर राक्षस बना दिया. कुछ समय बाद ऋषि विश्वामित्र यज्ञ कर रहे थे, लेकिन ताड़का और उसके बेटे बार-बार यज्ञ में बाधा डालते थे. तब विश्वामित्र अयोध्या के राजा दशरथ के पास गए और उनसे श्री राम को यज्ञ की रक्षा के लिए भेजने का आग्रह किया. राजा दशरथ ने मन न होते हुए भी श्री राम और लक्ष्मण को उनके साथ भेज दिया l  

    जब वे ताड़का के वन में पहुंचे, तो ताड़का ने उन पर हमला किया. तब श्री राम ने लक्ष्मण की मदद से उसे मार दिया था. इसके बाद विश्वामित्र ने अपना यज्ञ शुरू किया. छठे दिन मारीच और सुबाहु फिर आए और यज्ञ को नष्ट करने की कोशिश की, लेकिन श्री राम ने अपने बाण से मारीच को बहुत दूर फेंक दिया और सुबाहु का वध कर दिया. इस तरह यज्ञ सफलतापूर्वक पूरा हुआ l

    दंडकारण्य में मारीच का श्री राम से युद्ध

    पराक्रमज्ञो रामस्य शठो दृष्टभयः पुरा।
    समुद्भान्तस्ततोमुक्तस्तावुभौ राक्षसौ हतौ।।

    अरण्यकांड के अनुसार, राजा दशरथ ने कैकेयी के कहने पर श्री राम को 14 साल के वनवास के लिए भेज दिया था. श्री राम के साथ लक्ष्मण और मां सीता भी वन में चले गए थे. तीनों दंडकारण्य होते हुए गोदावरी नदी के किनारे पंचवटी में रहने लगे और वहीं एक कुटिया बनाई. कुछ समय बाद मारीच ने उन्हें देखा और बदला लेने के लिए हमला कर दिया. श्री राम ने उसके साथियों को मार दिया, लेकिन मारीच किसी तरह बचकर भाग गया l  

    इसी दौरान रावण की बहन शूर्पणखा वहां आई और श्री राम से विवाह का प्रस्ताव रखा. श्री राम ने उसे मना कर दिया और उसे लक्ष्मण के पास भेज दिया. लक्ष्मण ने मजाक किया, जिससे शूर्पणखा क्रोधित हो गई और उसने सीता पर हमला करने की कोशिश की. तब लक्ष्मण ने उसकी नाक और कान काट दिए l  

    अपमानित होकर शूर्पणखा लंका पहुंची और रावण को सारी बात बताकर मां सीता का हरण करने के लिए उकसाया. इसके बाद रावण अपने मामा मारीच के पास गया और उसे सोने का हिरण बनकर श्री राम की कुटिया के पास जाने को कहा, ताकि सीता उसे देखकर श्री राम से उसे पकड़ने की जिद करें l  

    श्री राम ने स्वर्ण हिरण का किया वध

    इत्युक्तो लक्ष्मणस्तस्याः क्रुद्धो रामस्य पार्श्वतः।
    उद्धृत्य खङ्गं चिच्छेद कर्णनासं महाबलः।।

    उसके बाद, मारीच और रावण पंचवटी पहुंचे. मारीच ने एक सुंदर सोने के हिरण का रूप धारण कर लिया, जिसके शरीर पर चांदी जैसे धब्बे थे. वह श्री राम की कुटिया के आसपास घूमने लगा. उस समय सीता फूल तोड़ रही थीं. सुंदर हिरण को देखकर वे मोहित हो गईं और श्री राम व लक्ष्मण को उसे दिखाने के लिए बुलाया. लक्ष्मण को शक हुआ कि यह मारीच की चाल हो सकती है, लेकिन सीता के कहने पर श्री राम उस हिरण को पकड़ने के लिए उसके पीछे चले गए और लक्ष्मण को सीता की रक्षा के लिए छोड़ गए l  

    श्री राम काफी देर तक हिरण का पीछा करते रहे और अंत में उसे बाण से मार दिया. मरते समय मारीच ने अपना असली रूप लिया और श्री राम की आवाज में पुकारा, 'हे सीता! हे लक्ष्मण!' यह सुनकर सीता घबरा गईं और लक्ष्मण से श्री राम को देखने जाने को कहा. लक्ष्मण ने समझाया कि श्री राम को कोई नुकसान नहीं हो सकता, लेकिन सीता के बार-बार कहने पर वे मजबूर होकर चले गए. जैसे ही लक्ष्मण वहां से गए, रावण साधु का वेश बनाकर आया. सीता उसे दान देने के लिए आगे बढ़ीं, तभी रावण ने उन्हें पकड़ लिया और उनका हरण कर लिया l 

  • पहले मंगला गौरी व्रत पर भूलकर भी न करें ये 5 गलतियां, नहीं मिलेगा पूर्ण फल

    पहले मंगला गौरी व्रत पर भूलकर भी न करें ये 5 गलतियां, नहीं मिलेगा पूर्ण फल

    सावन का पहला मंगला गौरी व्रत 4 अगस्त यानी कल मनाया जाएगा. सावन महीने के मंगलवार को रखे जाने वाले मंगला गौरी व्रत का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है. यह व्रत माता पार्वती को समर्पित होता है, जिसे सुहागिन महिलाएं अपने अखंड सौभाग्य, सुखी वैवाहिक जीवन और पति की लंबी उम्र के लिए रखती हैं. इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर मां पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है, लेकिन कुछ ऐसी गलतियां हैं जिन्हें इस दिन करने से बचना चाहिए.

    काले या नीले रंग के कपड़े पहनना
    पूजा या व्रत के समय काले या नीले रंग के वस्त्र पहनने से बचना चाहिए. इन रंगों को पूजा-पाठ के लिए शुभ नहीं माना जाता है. इस दिन लाल, पीला, हरा या नारंगी रंग के कपड़े पहनना अत्यंत शुभ होता है.

    सोलह श्रृंगार की अनदेखी
    माता पार्वती को सुहाग की सामग्री अर्पित करना इस व्रत का सबसे अहम हिस्सा है. पूजा में माता को सोलह श्रृंगार (चूड़ियां, सिंदूर, बिंदी, महावर आदि) जरूर चढ़ाएं. ध्यान रखें कि पूजा के बाद यह सुहाग का सामान किसी जरूरतमंद सुहागिन महिला को दान कर दें, इसे खुद इस्तेमाल न करें.

    तामसिक भोजन का सेवन
    मंगला गौरी व्रत के दिन शुद्धता का विशेष ध्यान रखना पड़ता है. इस दिन घर में लहसुन, प्याज, मांस-मदिरा या किसी भी प्रकार के तामसिक भोजन का इस्तेमाल न करें. सात्विक भोजन ही ग्रहण करें.

    पूजा या आरती को अधूरा छोड़ना
    पूजा को जल्दबाजी में न करें. विधि-विधान से माता गौरी और भगवान शिव की पूजा करने के बाद आरती अवश्य गाएं. बिना आरती के पूजा अधूरी मानी जाती है.

    बड़े-बुजुर्गों या पति का अनादर
    व्रत के दिन मन और आचरण दोनों को पवित्र रखना जरूरी है. किसी भी बड़े, विशेषकर अपने पति या घर के बुजुर्गों का अपमान न करें और न ही किसी पर क्रोध करें. घर में वाद-विवाद की स्थिति से दूर रहें.

  • 2027 में दिखेगा सदी का सबसे लंबा सूर्य ग्रहण, छह मिनट रहेगा अंधेरा

    2027 में दिखेगा सदी का सबसे लंबा सूर्य ग्रहण, छह मिनट रहेगा अंधेरा

    खगोल विज्ञान प्रेमियों और दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिए 2 अगस्त 2027 की तारीख किसी महाउत्सव से कम नहीं है.  इस दिन आसमान में एक ऐसी खगोलीय घटना घटने जा रही है, जो सदियों में बमुश्किल एक बार देखने को मिलती है.  यह 21वीं सदी का सबसे लंबा पूर्ण सूर्य ग्रहण (Total Solar Eclipse) होगा, जिसके दौरान चंद्रमा सूरज को पूरी तरह ढक लेगा. धरती के कई हिस्सों में दोपहर के वक्त ही रात जैसा घना अंधेरा छा जाएगा.

    मुख्य विशेषताएं
    ग्रहण की अवधि: पूर्ण सूर्य ग्रहण का यह मुख्य चरण लगभग 6 मिनट और 23 सेकंड तक रहेगा.

    सदी का रिकॉर्ड: यह इस शताब्दी के सबसे लंबे पूर्ण सूर्य ग्रहणों में से एक है, जिसे लेकर वैज्ञानिकों में भारी उत्साह है.

    खगोलीय महत्व: वैज्ञानिक इस दौरान सूर्य के कोरोना (बाहरी वायुमंडल) और सौर हवाओं का बेहद बारीकी से अध्ययन करेंगे.

    कहां-कहां दिखाई देगा यह महा-सूर्य ग्रहण?
    वैज्ञानिकों और अंतरिक्ष एजेंसियों के मुताबिक, इस अद्भुत सूर्य ग्रहण का सबसे शानदार और पूर्ण नजारा मुख्य रूप से उत्तरी अफ्रीका, दक्षिणी यूरोप और मध्य पूर्व (Middle East) के देशों में देखने को मिलेगा. जिन प्रमुख देशों और क्षेत्रों से यह स्पष्ट रूप से गुजरेगा, उनमें स्पेन, मोरक्को, अल्जीरिया, लीबिया, मिस्र, सऊदी अरब, यमन और सोमालिया शामिल हैं.

    मिस्र के ऐतिहासिक शहर लक्सर (Luxor) के पास इस ग्रहण की अवधि सबसे अधिक दर्ज की जाएगी, जिसे देखने के लिए दुनिया भर के खगोलविद् और पर्यटक अभी से अपनी तैयारियां कर रहे हैं.

    क्या भारत में दिखाई देगा यह ग्रहण?
    भारतीय खगोल प्रेमियों के मन में यह सवाल जरूर उठ रहा होगा कि क्या यह ग्रहण भारत में भी दिखाई देगा? आपको बता दें कि भौगोलिक स्थिति के कारण 2 अगस्त 2027 का यह पूर्ण सूर्य ग्रहण भारत से सीधे तौर पर नजर नहीं आएगा.  चूंकि यह घटना मुख्य रूप से अटलांटिक महासागर, यूरोप, अफ्रीका और अरब देशों के ऊपर से गुजरेगी, इसलिए भारतीय उपमहाद्वीप में इसका कोई प्रत्यक्ष प्रभाव या दृश्यता नहीं होगी.  हालांकि, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसकी हर एक गतिविधि को ऑनलाइन माध्यमों और स्पेस एजेंसियों की लाइव स्ट्रीमिंग के जरिए जरूर देखा जा सकेगा.

    क्यों होती है ऐसी घटना और इसका रोमांच?
    खगोल विज्ञान के अनुसार, पूर्ण सूर्य ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बिल्कुल बीच से गुजरता है और सूर्य के प्रकाश को पूरी तरह अवरुद्ध कर देता है.  इस दौरान कुछ पलों के लिए आसमान में तारे और ग्रह जगमगा उठते हैं, तापमान में अचानक गिरावट आ जाती है . पशु-पक्षियों का व्यवहार भी बदल जाता है.  6 मिनट से अधिक समय तक चलने वाला यह ब्लैकआउट अनुभव इंसानी जीवनकाल में बेहद दुर्लभ माना जाता है.

  • सावन सोमवार पर रुद्राभिषेक से पहले जान लें पूजा के सही समय

    सावन सोमवार पर रुद्राभिषेक से पहले जान लें पूजा के सही समय

    3 अगस्त 2026 के दिन सावन का पहला सोमवार पड़ रहा है। सावन सोमवार का दिन बेहद महत्वपूर्ण और खास माना जाता है। इस दिन कई शिव भक्त व्रत रख भोलेनाथ की आराधना करते हैं। कई लोग इस दिन अभिषेक और रुद्राभिषेक भी करते हैं। शुभ मुहूर्त का ध्यान रख कर पूजा-पाठ आरंभ करना चाहिए। गौर फरमाने वाली बात यह रहेगी कि सावन के पहले सोमवार पर सुबह के समय राहुकाल लग रहा है। शुभ मुहूर्त में शिव पूजा और जलाभिषेक करने से उत्तम फल की प्राप्ति होती है। ऐसे में आइए जानते हैं सावन सोमवार पर पूजा कब और कब नहीं करना चाहिए-
    सावन के पहले सोमवार पर पूजा कब करें, जानें सुबह-शाम के मुहूर्त और शिव पूजा कब न करें

    सावन के पहले सोमवार पर पूजा के शुभ मुहूर्त
        ब्रह्म मुहूर्त- 04:07 बजे से 04:49 बजे तक (सुबह)
        प्रातः सन्ध्या- 04:28 बजे से 05:32 बजे तक (सुबह)
        अभिजित मुहूर्त- सुबह 11:46 बजे से दोपहर 12:39 बजे
        विजय मुहूर्त- 02:26 बजे से 03:19 बजे तक (दोपहर)
        गोधूलि मुहूर्त- 06:53 बजे से 07:14 बजे तक (शाम)
        सायाह्न सन्ध्या- 06:53 बजे से 07:57 बजे तक (शाम)
        अमृत काल- 05:07 बजे से 06:45 बजे तक (शाम)
        निशिता मुहूर्त- 11:51 बजे से 12:34 बजे, अगस्त 04 (रात)

    चौघड़िया शुभ मुहूर्त
        अमृत – सर्वोत्तम 05:32 बजे से 07:12 बजे तक (सुबह)
        शुभ – उत्तम 08:52 बजे से 10:32 बजे तक (सुबह)
        चर – सामान्य 01:53 बजे से 03:33 बजे तक (दोपहर)
        चर – सामान्य 06:53 बजे से 08:13 बजे तक (शाम)

    सावन के पहले सोमवार पर पूजा कब करने से बचें?
        राहुकाल- 07:12 से 08:52 बजे तक (सुबह)
        यमगण्ड- सुबह 10:32 बजे से दोपहर 12:12 बजे
        गुलिक काल- 01:53 बजे से 03:33 बजे तक (दोपहर)
        विडाल योग- 05:32 बजे से 10:29 बजे तक (सुबह), दोपहर 10:00 बजे से सुबह 05:32 बजे, अगस्त 04
        वर्ज्य- 07:22 बजे से 08:59 बजे तक (सुबह)
        गण्ड मूल- रात 10:00 बजे से सुबह 05:32 बजे, अगस्त 04
        दुर्मुहूर्त- 12:39 बजे से 01:32 बजे तक (दोपहर), दोपहर 03:19 बजे से 04:13 बजे तक (शाम)
        बाण रोग- शाम 06:51 बजे से पूर्ण रात्रि तक
        पञ्चक- पूरे दिन

    सावन के पहले सोमवार पर रुद्राभिषेक कब करें?
    ज्योतिष शास्त्र और पंचांग के अनुसार, रुद्राभिषेक करने से पहले शिववास का समय देखा जाता है। शिववास के समय जब शिव जी नंदी पर विराजमान होते हैं तब रुद्राभिषेक करना शुभ माना जाता है। इस मुहूर्त में रुद्राभिषेक करने से सफलता मिलती है।

  • फ्रेंडशिप डे पर जानें भीष्म की सीख, चार तरह के दोस्तों की पहचान

    फ्रेंडशिप डे पर जानें भीष्म की सीख, चार तरह के दोस्तों की पहचान

    हर साल अगस्त महीने के पहले रविवार को मित्रता दिवस (friendship Day) मनाया जाता है। हर किसी के जीवन में उनका कोई न कोई दोस्त जरूर होता है। दोस्ती का बंधन सबसे पारदर्शिता और विश्वास पर आधारित होता है, जिसमें आप हर वो बातें अपने दोस्त से कर सकते हैं, जो शायद ही आप किसी और से करें।

    प्राचीन सनातन शास्त्रों में भी मित्रता के बारे में काफी कुछ लिखा गया है। हिंदू धर्म के प्रमुख महाकाव्यों में शामिल महाभारत के शांति पर्व में भीष्म पितामह ने युद्धिष्ठिर को 4 तरह के दोस्त बताएं, जिनसे हमें दोस्ती करनी चाहिए।

    भीष्म पितामह ने मित्र की पहचान करना बताई
    जब भीष्म पितामह मृत्यु शैय्या पर लेटे रहते हैं, तब पांडव पुत्र युधिष्ठिर उनके चरणों के पास आकर सवाल करते हैं कि, सच्चा मित्र और सच्चा शत्रु कौन होता है? तब भीष्ण पितामह इस सवाल का जवाब देते हुए कहते हैं कि, 'समय' और परिस्थितियां ही लाइफ में अच्छे दोस्त या दुश्मन डिसाइड करते हैं। आज का हमारा सबसे अच्छा मित्र कल हमारा सबसे बड़ा कट्टर दुश्मन बन सकता है। परिस्थितियां इसके विपरीत भी देखने को मिल सकती है।

    4 तरह के दोस्त कैसे पहचानें?
    भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को चार तरह की दोस्ती के बारे में बताया।
        सहार्थ
        भजमान
        सहजन
        कृत्रिम

    1. सहार्थ का मतलब, वे लोग जो हममें से दोस्ती करते हैं और इस दोस्ती से कुछ फायदे की उम्मीद रखते हैं। आसान भाषा में इसे समझे तो यह ऐसा है कि, तुम मुझे कुछ दो, मैं भी तुम्हें बदले में कुछ दूंगा। अगर दूसरे व्यक्ति को हममें कुछ सार्थक नहीं दिखाई देता, तो हो सकता है कि, वह हमारा दोस्त न बनें। इसे सहार्थ कहते हैं।

    2. भजमन का मतलब है कि, पारिवारिक बंधन के कारण होनी वाली दोस्ती। उदाहरण के लिए हमारे सगे चचेरे भाई-बहन या अन्य रिश्तेदार इसी श्रेणी में आते हैं। सभी रिश्तेदारों को मिलाकर भजमान माना जाता है।

    3. सहज का मतलब वो दोस्त होते हैं, जो सगे-संबंधियों के माध्यम से दोस्त बनते हैं। सहज में वो लोग भी शामिल होते हैं, जिन्हें हम खुद अपना दोस्त बनाते हैं। उदाहरण के लिए स्कूल या कॉलेज के दोस्त जिनकी साथ दोस्ती की पहल आपके माध्यम से होती है।

    4. कृत्रिम दोस्ती का मतलब ऐसे दोस्त जो आपके साथ आवश्यकता, लाभ या व्यावहारिक उद्देश्य से होती है। इसे आसान भाषा में समझे कि, आप किसी से पैसा देकर दोस्ती करते हैं। ऐसा तब होता है, जब कोई शत्रु अचानक से हमला कर दें, तब आप उस स्थिति में थोड़ा पैसा देकर उससे दोस्ती करके अपनी जान बचा सकते हैं।