Category: धर्म अध्यात्म

  • कल से शुरू हो रहा है साल का अंतिम महीना: सुख-समृद्धि चाहते हैं तो इन भूलों से बचें

    कल से शुरू हो रहा है साल का अंतिम महीना: सुख-समृद्धि चाहते हैं तो इन भूलों से बचें

    हिंदू कैलेंडर के अनुसार, 2 फरवरी 2026 से साल के अंतिम महीने यानी फाल्गुन माह की शुरुआत हो रही है. यह महीना न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और वसंत के आगमन के लिए जाना जाता है, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी इसका विशेष महत्व है. फाल्गुन का समापन 3 मार्च 2026 को होगा. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस महीने में भगवान विष्णु, शिव जी और श्री कृष्ण की उपासना करने से जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं. फाल्गुन के महीने में भगवान शिव का अभिषेक करना बहुत ही कल्याणकारी होता है, क्योंकि इसी माह में शिव-शक्ति के मिलन का उत्सव महाशिवरात्रि मनाया जाता है. आइए जानते हैं इस माह का महत्व, पूजा विधि और वे गलतियां जिनसे आपको बचना चाहिए.

    फाल्गुन माह का विशेष महत्व

    फाल्गुन माह को आनंद और उल्लास का महीना कहा जाता है. इसी महीने में महाशिवरात्रि और होली जैसे बड़े त्योहार मनाए जाते हैं. चंद्रमा का जन्म भी इसी माह में माना जाता है, इसलिए मानसिक शांति के लिए इस महीने में चंद्र देव की पूजा फलदायी होती है.

    भूलकर भी न करें ये गलतियां!

    फाल्गुन के महीने में कुछ नियमों का पालन करना अनिवार्य माना गया है, ताकि घर की सुख-शांति बनी रहे.

    देर तक न सोएं: इस महीने से मौसम बदलने लगता है. सुबह देर तक सोना स्वास्थ्य और सौभाग्य दोनों के लिए हानिकारक माना जाता है.

    नशीले पदार्थों से परहेज: फाल्गुन में तामसिक भोजन (मांस-मदिरा) और नशीली चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए. यह भक्ति का महीना है.

    साफ-सफाई का अभाव: इस महीने में स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें. गंदे कपड़े पहनना या घर में गंदगी रखना दरिद्रता को आमंत्रण देता है.

    क्रोध और वाद-विवाद: यह प्रेम का महीना है. किसी का अपमान न करें और न ही घर में झगड़ा होने दें, वरना लक्ष्मी जी रुष्ट हो सकती हैं.

    शीतल जल का त्याग न करें: स्वास्थ्य की दृष्टि से इस महीने से ठंडे पानी से स्नान करना और अधिक पानी पीना शुरू कर देना चाहिए.

    फाल्गुन माह की पूजा विधि

    इस पवित्र माह में अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए आप इस विधि से पूजा कर सकते हैं.

    ब्रह्म मुहूर्त में स्नान: प्रतिदिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें. यदि संभव हो तो पानी में थोड़ा गंगाजल मिला लें.

    सूर्य को अर्घ्य: तांबे के लोटे में जल, रोली और फूल डालकर सूर्य देव को जल अर्पित करें.

    श्री कृष्ण की उपासना: फाल्गुन में भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप या राधा-कृष्ण की पूजा करें. उन्हें अबीर-गुलाल और पीले फूल अर्पित करें.

    दान पुण्य: इस महीने में अपनी क्षमता के अनुसार अनाज, कपड़े या शुद्ध घी का दान जरूरतमंदों को करें.

    फाल्गुन में क्या करें?

        रंगों का प्रयोग: भगवान को प्रतिदिन गुलाल चढ़ाएं और स्वयं भी तिलक लगाएं.
        मंत्र जाप: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का नियमित जाप करें.

     

  • महाशिवरात्रि कब है? 15 या 16 फरवरी, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा के खास मंत्र

    महाशिवरात्रि कब है? 15 या 16 फरवरी, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा के खास मंत्र

     इस साल महाशिवरात्रि का त्योहार सर्वार्थ सिद्धि योग में मनाया जाएगा. फाल्गुन माह की शिवरात्रि व्रत का यह दुर्लभ संयोग आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है. सनातन धर्म की शाश्वत परंपरा में महाशिवरात्रि को एक ऐसा दिव्य पर्व माना गया है जिसमें अज्ञान का अंधकार विलीन हो सकता है. साधक के भीतर ज्ञान का दीप प्रज्वलित होता है और जीवन शिव तत्व की अनुभूति से आलोकित हो उठता है. महाशिवरात्रि की तिथि, मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में ज्योतिषाचार्य डॉ. श्रीपति त्रिपाठी ने विस्तार से जानकारी दी है.

    महाशिवरात्रि की तिथि
    फाल्गुन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि का आरंभ 15 फरवरी को दोपहर 05:04 बजे होगा और इसका समापन 16 फरवरी को दोपहर 05:34 बजे होगा.  ऐसे में महाशिवरात्रि का त्योहार 15 फरवरी 2026 को मनाया जाएगा और व्रत का पारण 16 फरवरी को किया जाएगा.

    श्रवण नक्षत्र और सर्वार्थ सिद्धि का संयोग
    इस बार महाशिवरात्रि का पर्व श्रवण नक्षत्र और सर्वार्थ सिद्धि के दुर्लभ संयोग में आ रहा है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब कोई महापर्व सिद्ध योग में पड़ता है तो उसमें किए गए जप, तप, दान और पूजा असाधारण फल प्रदान करती है. सर्वार्थ सिद्धि योग का अर्थ ही है सभी कार्यों की सिद्धि कराने वाला योग. ऐसे में महाशिवरात्रि का यह दुर्लभ संयोग साधकों के लिए सांसारिक सुख ही नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति और मोक्ष की दिशा में अग्रसर होने का स्वर्णिम अवसर लेकर आई है.

    पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती का पावन विवाह संपन्न हुआ था. कठोर तपस्या के पश्चात माता पार्वती ने शिव को पति के रूप में प्राप्त किया और वैराग्य में लीन शिव ने गृहस्थ जीवन स्वीकार कर लोक कल्याण का मार्ग अपनाया. यह प्रसंग केवल विवाह कथा नहीं बल्कि प्रेम त्याग और समर्पण की पराकाष्ठा का प्रतीक है. इसी कारण महा शिवरात्रि को दांपत्य सुख-सौभाग्य और पारिवारिक स्थिरता का महापर्व भी माना जाता है.

    1. ओम नमः शिवाय

    2. ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।

    3. ॐ हौं जुं स: मृत्युंजयाय नम:॥

    4. ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥