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  • झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, JSSC CGL से नियुक्त अधिकारियों को नहीं हटाएगी सरकार

    झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, JSSC CGL से नियुक्त अधिकारियों को नहीं हटाएगी सरकार

    रांची
    झारखंड हाईकोर्ट के जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने जेएसएससी सीजीएल प्रतियोगिता परीक्षा (संख्या-10 /2023) के माध्यम से विभिन्न विभागों में नियुक्त 99 अधिकारियों की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई की. मामले की सुनवाई के दाैरान अदालत ने पक्ष सुनने के बाद प्रार्थियों को हटाये जाने से संबंधित राज्य सरकार की अधिसूचना पर रोक लगा दिया. इसी तरह के समान मामले में पूर्व में अदालत द्वारा सरकार की अधिसूचना पर रोक लगाई जा  चुकी है. साथ ही अदालत ने मामले में राज्य सरकार को जवाब दायर करने का निर्देश दिया.

    नियुक्त अभ्यर्थी कर रहे हैं नौकरी, 15 सितंबर को अगली सुनवाई
    मामले की अगली सुनवाई के लिए अदालत ने 15 सितंबर की तिथि निर्धारित की. इससे पूर्व प्रार्थियों की ओर से पूर्व महाधिवक्ता सह वरीय अधिवक्ता राजीव रंजन, अधिवक्ता श्रेय मिश्रा ने पैरवी की. उन्होंने अदालत को बताया कि जेएसएससी द्वारा आयोजित सीजीएल प्रतियोगिता परीक्षा से अनुशंसित अभ्यर्थियों की नियुक्त हो चुकी है. वे नाैकरी कर रहे हैं.

    विज्ञापन रद्द करने की अधिसूचना को 150 अधिकारियों ने दी चुनौती
    अब राज्य सरकार द्वारा परीक्षा का विज्ञापन रद्द कर दिया गया है, जो अवैध है. उल्लेखनीय है कि प्रार्थी आकाश गौरव सहित 150 अधिकारियों ने याचिका दायर की है. प्रार्थियों ने 18 अगस्त को जेएसएससी सीजीएल-2023 का विज्ञापन रद्द करने की राज्य सरकार की अधिसूचना को चुनाैती दी है. साथ ही उसे निरस्त करने की मांग की है.

  • सरकारी पद से नहीं मिलती अतिरिक्त शक्ति, हाई कोर्ट ने सहकारी मिल के MD को दी बड़ी राहत

    सरकारी पद से नहीं मिलती अतिरिक्त शक्ति, हाई कोर्ट ने सहकारी मिल के MD को दी बड़ी राहत

    चंडीगढ़
     सहकारी संस्थाओं में सरकारी हिस्सेदारी या किसी अधिकारी का पद उसे संस्था के वैधानिक अधिकारों से अधिक शक्ति नहीं देता। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने सोनीपत सहकारी चीनी मिल के प्रबंध निदेशक के खिलाफ हुई विभागीय कार्रवाई को रद करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।

    जस्टिस संदीप मौदगिल ने कहा कि किसी सहकारी चीनी मिल के प्रबंध निदेशक के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने का अधिकार मिल की अपनी प्रबंधन समिति के पास है। केवल उपयुक्त पद पर बैठे अधिकारी या हरियाणा राज्य सहकारी चीनी मिल संघ के प्रबंध निदेशक के पत्र के आधार पर ऐसी कार्रवाई नहीं की जा सकती।

    मामला सोनीपत सहकारी चीनी मिल के तत्कालीन प्रबंध निदेशक अश्वनी कुमार से जुड़ा है। वह हरियाणा सिविल सेवा के अधिकारी हैं और तीन सितंबर 2019 को उन्हें मिल का प्रबंध निदेशक नियुक्त किया गया था।

    मिल के विस्तार से जुड़ी एक परियोजना में ठेकेदार को भुगतान किए जाने के बाद तकनीकी सलाहकार ने काम और उपकरणों की आपूर्ति को लेकर आपत्तियां उठाई थीं। इसके बाद उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू हुई।

    अश्वनी कुमार को 13 फरवरी 2023 को आरोपपत्र जारी किया गया। विभागीय जांच पूरी होने के बाद उन पर 25 जुलाई 2025 को अनिवार्य सेवानिवृत्ति की बड़ी सजा लगा दी गई। आरोप था कि काम में कमियां सामने आने और सक्षम अधिकारियों के निर्देशों के बावजूद उन्होंने ठेकेदार को भुगतान जारी कर दिया, जिससे सहकारी संस्था को आर्थिक नुकसान हुआ।

    अश्वनी कुमार ने हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू करने का अधिकार उपयुक्त प्रबंधन समिति के पास था, लेकिन ऐसा कोई प्रस्ताव रिकॉर्ड में नहीं है।

    हाई कोर्ट ने हरियाणा सहकारी समितियां अधिनियम की धारा 25, 31 और 39 तथा संबंधित उपनियमों का उल्लेख करते हुए कहा कि सहकारी संस्था की अंतिम सत्ता उसके सदस्यों की सामान्य सभा में निहित होती है और संस्था का संचालन उसके निदेशक मंडल के माध्यम से होता है। प्रबंध निदेशक भी समिति के नियंत्रण और अधीक्षण में काम करता है।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हरियाणा राज्य सहकारी चीनी मिल संघ और सोनीपत सहकारी चीनी मिल दो अलग-अलग सहकारी संस्थाएं हैं। शुगरफेड सदस्य मिलों को सलाह, तकनीकी सहायता और मार्गदर्शन दे सकता है, लेकिन उसके प्रबंध निदेशक को किसी सदस्य चीनी मिल के प्रबंध निदेशक पर अनुशासनात्मक नियंत्रण हासिल नहीं है।

    कोर्ट ने कहा कि उपायुक्त यदि पदेन अध्यक्ष भी हों, तब भी अध्यक्ष का पद उन्हें प्रबंधन समिति की सामूहिक शक्तियां अकेले इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं देता। रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं मिला, जिसमें मिल की प्रबंधन समिति ने भुगतान
    रोकने या प्रबंध निदेशक के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का निर्णय लिया हो।

    हाई कोर्ट ने माना कि कार्रवाई की पूरी नींव ही अधिकार क्षेत्र की गलती पर आधारित थी। अदालत ने 25 जुलाई 2025 का अनिवार्य सेवानिवृत्ति आदेश और उससे जुड़ी पूरी विभागीय कार्रवाई रद कर दी। अश्वनी कुमार को कानून के अनुसार सभी परिणामी सेवा लाभ देने के भी निर्देश दिए गए। फैसला 20 अगस्त 2026 को सुनाया गया।ो

     

  • पतरातू आदिवासी जमीन विवाद में हाईकोर्ट का फैसला, रिवीजन अथॉरिटी का आदेश बरकरार

    पतरातू आदिवासी जमीन विवाद में हाईकोर्ट का फैसला, रिवीजन अथॉरिटी का आदेश बरकरार

    रांची
    झारखंड हाई कोर्ट ने रामगढ़ जिले के पतरातू अंचल की आदिवासी जमीन से जुड़े मामले में दाखिल याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने कहा कि छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी एक्ट) के तहत आदिवासी जमीन के हस्तांतरण पर विशेष प्रतिबंध है और कानून का उल्लंघन कर किया गया हस्तांतरण वैध नहीं माना जा सकता।

    अदालत ने रिवीजन अथारिटी के आदेश को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी। मामला रामगढ़ के घुटवा गांव स्थित खाता नंबर 42 के प्लाट नंबर 1273 की 0.92 एकड़ जमीन से जुड़ा है।

    खरीदने के बाद भी नहीं हुआ नामांतरण 
    प्रार्थियों के अनुसार, यह जमीन वर्ष 1970 में सादिक मियां ने रजिस्टर्ड सेल डीड के जरिए खरीदी थी और तब से वे जमीन पर कब्जे में थे। बाद में जमीन का नामांतरण कराने के लिए आवेदन भी दिया गया, लेकिन नामांतरण नहीं हो सका।

    दूसरे पक्ष की ओर से दावा किया गया कि उसने इसी प्लाट की 0.67 एकड़ जमीन वर्ष 2003 में खरीदी थी। इसके लिए तत्कालीन उपायुक्त से अनुमति भी ली गई थी और उसके नाम पर म्यूटेशन किया गया था।

    उसका कहना था कि जमीन खरीदने के छह महीने के भीतर उसे जमीन से बेदखल कर दिया गया। इसके बाद उसने सीएनटी एक्ट की धारा 46(4-ए) के तहत जमीन वापसी के लिए आवेदन दिया।

    याचिकाकर्ताओं ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा था कि संबंधित जमीन आदिवासी जमीन है और दूसरे पक्ष की ओर से किया गया दावा समय-सीमा के बाहर है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि बेदिया समुदाय अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल नहीं है।

    हालांकि, अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने छह सितंबर 1950 की संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश की अधिसूचना का हवाला देते हुए कहा कि बिहार के लिए जारी सूची में बेदिया को अनुसूचित जनजाति में शामिल किया गया था।

    केवल निर्धारित शर्तों से ही होगी हस्तांतरित
    अदालत ने सीएनटी एक्ट की धारा 6 का उल्लेख करते हुए कहा कि रैयत की परिभाषा में उसके उत्तराधिकारी भी शामिल हैं। कोर्ट ने यह भी पाया कि वर्ष 2003 में जमीन खरीदने के लिए उपायुक्त से अनुमति ली गई थी और उसके बाद संबंधित पक्ष के नाम पर म्यूटेशन भी हुआ था।

    कोर्ट ने कहा कि सीएनटी एक्ट की धारा 46(1) के तहत अनुसूचित जनजाति के रैयत की जमीन दूसरे अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति को भी केवल निर्धारित शर्तों और उपायुक्त की पूर्व अनुमति से ही हस्तांतरित की जा सकती है।

    वहीं, धारा 46(3) के तहत कानून का उल्लंघन कर किया गया हस्तांतरण किसी भी अदालत में वैध नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी माना कि वर्ष 2003 में जमीन खरीदने वाले पक्ष को छह महीने के भीतर बेदखल कर दिया गया था। इसलिए सीएनटी एक्ट की धारा 46(4-ए)(a) में निर्धारित 12 साल की समय-सीमा उसके मामले में बाधा नहीं बनती।

  • नर्सिंग ऑफिसर की याचिका पर बड़ा फैसला, ऑस्ट्रेलिया जाने की मिली अनुमति; सरकार का आदेश रद्द

    नर्सिंग ऑफिसर की याचिका पर बड़ा फैसला, ऑस्ट्रेलिया जाने की मिली अनुमति; सरकार का आदेश रद्द

    चंडीगढ़
    पंजाब एवं हरियाणा  हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार द्वारा सरकारी कर्मचारियों के विदेश जाने पर लगाई गई पूर्ण पाबंदी को खारिज कर दिया है। अदालत ने इस फैसले को मनमाना और संवैधानिक अधिकारों का हनन बताते हुए सरकार के तर्कों पर कड़ा ऐतराज जताया।

    मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस हरप्रीत सिंह बरार ने कहा कि सरकार की यह पाबंदी उसके द्वारा बताए गए उद्देश्यों के मुकाबले बेहद असंतुलित थी। अदालत ने टिप्पणी की कि सरकार का यह कदम "अखरोट तोड़ने के लिए भारी हथौड़े का इस्तेमाल करने जैसा है।

    हाईकोर्ट ने सवाल उठाया कि किसी कर्मचारी को अपने पेशेवर कौशल को बढ़ाने के लिए विदेश जाने से रोकने से सरकार के ईंधन बचाने के लक्ष्य में भला कैसे मदद मिल सकती है?

    क्या है पूरा मामला?
    यह विवाद रोहतक स्थित PGIMS की नर्सिंग ऑफिसर शीतल रानी की याचिका से जुड़ा है। शीतल ने ऑस्ट्रेलिया में एक पेशेवर कोर्स और रजिस्ट्रेशन परीक्षा में शामिल होने के लिए छुट्टी की अर्जी दी थी।

    फरवरी 2021 में शीतल रानी PGIMS रोहतक में नर्सिंग ऑफिसर के पद पर तैनात हुईं। जनवरी 2024 में उन्हें ऑस्ट्रेलियाई वीजा आवेदन की मंजूरी मिली और बाद में विजिटर वीजा जारी हो गया। 29 सितंबर में ऑस्ट्रेलिया में उनकी परीक्षा निर्धारित थी, जिसके लिए उन्होंने 'अर्न्ड लीव' के लिए आवेदन किया।

    क्यों खारिज हुई थी छुट्टी?
    हरियाणा सरकार ने 10 जून को एक दिशा-निर्देश जारी किया था। इसके तहत सितंबर तक सरकारी कर्मचारियों के विदेश जाने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया था। इस नीति में केवल गंभीर मेडिकल इलाज के मामलों को ही छूट दी गई थी, जिसके चलते शीतल रानी की छुट्टी की अर्जी निरस्त कर दी गई थी।

    हाईकोर्ट ने सरकार के इस आदेश को पूरी तरह खारिज करते हुए संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता नर्सिंग ऑफिसर को परीक्षा में शामिल होने के लिए ऑस्ट्रेलिया जाने की तुरंत अनुमति दी जाए।

  • कोयला लोडिंग-अनलोडिंग प्लेटफॉर्म को लेकर हाई कोर्ट सख्त, ACC लिमिटेड से जुड़ा मामला चर्चा में

    कोयला लोडिंग-अनलोडिंग प्लेटफॉर्म को लेकर हाई कोर्ट सख्त, ACC लिमिटेड से जुड़ा मामला चर्चा में

    जबलपुर
     प्रदेश के सिंगरौली जिले के सरई रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर-एक पर अदाणी समूह की कंपनी एसीसी लिमिटेड द्वारा कोयला लोडिंग-अनलोडिंग के मामले में हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने समूह को प्लेटफार्म खाली कराने के अंतरिम निर्देश दिए हैं। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया व न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई की।

    तीन माह की अनुमति, तीन साल से लोडिंग-अनलोडिंग
    सरई के ग्राम शिवगढ़ निवासी अधिवक्ता विनय जायसवाल ने याचिका दायर की है। आरोप है कि यात्रियों के लिए निर्धारित प्लेटफार्म का इस्तेमाल करीब तीन वर्षों से कोयला लोडिंग-अनलोडिंग के लिए किया जा रहा है, जबकि शुरुआत में अनुमति केवल तीन महीने के लिए दी गई थी।

    कोयले की धूल-कालिख से यात्री परेशान
    याचिका में कहा गया कि कोयले की धूल, कालिख और मलबे से यात्रियों के साथ आसपास के नागरिकों को भी परेशानी हो रही है। सुनवाई के दौरान रेलवे की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल सुनील कुमार जैन ने जवाब पेश किया।
    रोज 700 से ज्यादा यात्रियों का आवागमन

    रेलवे ने बताया कि सरई ग्राम स्टेशन पर प्रतिदिन करीब 741 यात्री आते हैं। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता एसके कश्यप ने रेलवे के जवाब का हवाला देते हुए बताया कि यात्रियों से रेलवे को करीब 16.46 लाख रुपये, जबकि कोयला लोडिंग-अनलोडिंग से करीब 26.48 करोड़ रुपये का राजस्व मिला।

    रेलवे ने बताया कि एसीसी ने पहले सरई ग्राम से करीब 10 किलोमीटर दूर सुरसुराईघाट झारा रेलवे स्टेशन से कोयला लोडिंग की अनुमति मांगी थी।

    हालांकि, परिचालन संबंधी अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण सरई ग्राम स्टेशन से लोडिंग की अनुमति दी गई। इसके लिए एसीसी का 20 जून 2023 का पत्र भी कोर्ट में पेश किया गया।

     

  • बदहाल सड़कों पर हाईकोर्ट का नगर निगम से सवाल, प्रोजेक्ट रिपोर्ट नहीं तो होगी सख्त कार्रवाई

    बदहाल सड़कों पर हाईकोर्ट का नगर निगम से सवाल, प्रोजेक्ट रिपोर्ट नहीं तो होगी सख्त कार्रवाई

     ग्वालियर
     ग्वालियर की बदहाल सड़कों को लेकर दायर जनहित याचिका पर हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने मंगलवार को नगर निगम को जमकर फटकार लगाई। न्यायालय ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि नगर निगम ने सड़कों के निर्माण और मरम्मत के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट पेश नहीं की तो यह माना जाएगा कि निगम शहर की सड़कें ठीक करने में रुचि नहीं रखता और उसने ग्वालियरवासियों को भगवान भरोसे छोड़ दिया है। कोर्ट ने साफ किया कि जनहित याचिका लंबित होने का बहाना बनाकर नगर निगम सड़कों के निर्माण, पैचवर्क या मरम्मत से पीछे नहीं हट सकता।

    न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ ने कैलाशचंद अग्रवाल की याचिका पर सुनवाई करते हुए नगर निगम को एक सप्ताह में शहर की सड़कों के निर्माण के साथ क्षतिग्रस्त सड़कों के पैचवर्क और मरम्मत की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। कोर्ट ने कहा कि इस जनहित याचिका का मूल उद्देश्य ग्वालियर के लोगों को सुचारू और गुणवत्तापूर्ण सड़कें उपलब्ध कराना है। मामले की अगली सुनवाई 8 सितंबर 2026 को होगी।

    सड़क खराब है तो निर्माण से क्यों भाग रहा निगम
    सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से पूछा गया कि क्या क्षतिग्रस्त सड़कों पर पैचवर्क या मरम्मत के लिए भी कोर्ट की अनुमति आवश्यक होगी। इस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निगम सड़कें ठीक करने का काम कर सकता है। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि वह यह बहाना नहीं बना सकता कि मामला अदालत में लंबित होने के कारण सड़क निर्माण नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने नगर निगम को शहर की सड़कों का निर्माण मध्य प्रदेश नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग द्वारा 8 नवंबर 2025 को जारी एसओआर के अनुसार करने की अनुमति दी है। लेकिन इसके साथ निगरानी की जिम्मेदारी भी तय कर दी गई है।

    मेजरमेंट बुक में गड़बड़ी मिली तो आयुक्त भी जिम्मेदार
    हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि सड़क निर्माण से संबंधित प्रत्येक मेजरमेंट बुक को नगर निगम आयुक्त स्वयं स्थल पर जाकर काम का भौतिक सत्यापन करने के बाद ही प्रमाणित करेंगे। यदि मेजरमेंट बुक में दर्ज काम और मौके पर वास्तव में हुए निर्माण में अंतर पाया गया तो संबंधित अधिकारियों और ठेकेदार के साथ नगर निगम आयुक्त भी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे।

    आठ से घटकर अब तीन नई सड़कों की जांच
    सड़क निर्माण की गुणवत्ता जांच के लिए गठित आयोग ने कोर्ट को बताया कि हनुमान टॉकीज से गुढ़ा-गुड़ी का नाका तक सड़क से नमूने लेने में करीब 11 घंटे लगे। जांच प्रक्रिया में समय और संसाधन अधिक लगने को देखते हुए कोर्ट ने सभी पक्षों की सहमति से जांच के लिए प्रस्तावित आठ सड़कों की संख्या कम कर दी। अब नगर निगम, पीडब्ल्यूडी और एनएचएआई की एक-एक सड़क की जांच होगी। पहले से एक सड़क से नमूने लिए जा चुके हैं। इस तरह आगे तीन विभागों की एक-एक सड़क को जांच के लिए चुना जाएगा।

    सड़क का नाम आधा घंटा पहले बताएगा आयोग
    कोर्ट ने यह भी व्यवस्था की कि जांच के लिए चुनी जाने वाली सड़कों का नाम पहले से सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। आयोग के अध्यक्ष गौरव समाधिया हाईकोर्ट परिसर से टीम के रवाना होने से महज आधा घंटा पहले संबंधित सड़कों की जानकारी देंगे। इसके लिए पहले से चिह्नित सात सड़कों में से आयोग तीन सड़कों का चयन कर सकेगा। यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले कोर्ट के समक्ष सड़क की जांच से पहले ही उसके निर्माण या मरम्मत का प्रयास किए जाने का मामला सामने आया था। कोर्ट ने ऐसे किसी भी हस्तक्षेप से जांच प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका को गंभीरता से लिया था।

    बिना सड़क खोदे होगी एक्स-रे जैसी जांच
    एनएचएआई की ओर से नेटवर्क सर्वे व्हीकल (एनएसवी) से सड़क की जांच कराने का सुझाव दिया गया। कोर्ट ने इसे स्वीकार करते हुए एनएचएआई को अपने खर्च पर वाहन उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। 30 अगस्त को एनएचएआई, पीडब्ल्यूडी और नगर निगम की चुनी गई एक-एक सड़क को एनएसवी से स्कैन किया जाएगा। जरूरत पड़ने पर 3 और 6 सितंबर को नगर निगम और पीडब्ल्यूडी की सड़कों से भौतिक नमूने भी लिए जाएंगे। एनएसवी तकनीक से सड़क को खोदे बिना उसकी अंदरूनी स्थिति और परतों की जांच की जा सकेगी। एनएचएआई की सड़क से भौतिक नमूने लिए जाएं या नहीं, इसका निर्णय बाद में किया जाएगा।

    रिपोर्ट आने के बाद तय होगी जिम्मेदारी
    कोर्ट ने साफ किया कि खराब सड़क निर्माण के लिए किसी अधिकारी, कर्मचारी या ठेकेदार की दीवानी अथवा आपराधिक जिम्मेदारी जांच रिपोर्ट आने के बाद ही तय की जा सकेगी। नमूनों की जांच के लिए दो नमूने पीडब्ल्यूडी टेस्टिंग लैब और प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना की प्रयोगशाला को भेजे जाएंगे। एक नमूना जिला न्यायालय ग्वालियर के मालखाने में सुरक्षित रखा जाएगा, जबकि एक नगर निगम को दिया जाएगा।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि ग्वालियर की जनता को अच्छी सड़कें मिलना जरूरी है। इसलिए निर्माण कार्य को अदालत की कार्यवाही के कारण रोका नहीं जा सकता। नगर निगम को अब एक सप्ताह में अपनी पूरी कार्ययोजना अदालत के सामने रखनी होगी।

  • कार्यवाहक CJ शर्मा को हटाने की मांग, जस्टिस संदीप मेहता का CJI को पत्र

    कार्यवाहक CJ शर्मा को हटाने की मांग, जस्टिस संदीप मेहता का CJI को पत्र

    जयपुर 

     सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस संदीप मेहता ने कई पत्रों के जरिये भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत से तुरंत राजस्थान से बाहर का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने का आग्रह किया है. उन्होंने आरोप लगाया है कि राजस्थान उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा अपने प्रशासनिक अधिकारों का दुरुपयोग कर रहे हैं। 

    जस्टिस मेहता ने 2, 10 और 17 अगस्त को तीन पत्र लिखे. पता चला है कि जस्टिस मेहता ने जस्टिस शर्मा पर कुप्रशासन का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा कि जस्टिस शर्मा मामलों को चुनिंदा तरीके से अपनी पीठ में भेजने के लिए 'रोस्टर के मास्टर' (मामलों का आवंटन करने वाले प्राधिकारी) के रूप में अपनी शक्तियों का उपयोग कर रहे हैं। 

    जस्टिस मेहता ने 2 अगस्त के अपने पत्र में कहा कि उन्होंने पहले भी CJI को ऐसे ही मामलों के बारे में बताया था, जिसमें में उन मामलों का जिक्र किया गया था जिन्हें बिना किसी स्पष्ट कारण के अन्य पीठों से अचानक वापस लेकर जस्टिस शर्मा की अदालत में भेज दिया गया था। 

    जस्टिस मेहता ने बताया कि राजस्थान के उनके दौरे के दौरान, उच्च न्यायालय के कई जजों ने जस्टिस शर्मा के व्यवहार पर अपनी पीड़ा साझा की थी। 

    जस्टिस मेहता ने याद दिलाया कि CJI ने शुरुआत में उन्हें ऐसे मामलों की सूची सौंपने के लिए कहा था, लेकिन बाद में आरोपों को लिखित रूप में न देने की सलाह दी और इसके बजाय आश्वासन दिया कि उचित कार्रवाई की जाएगी. फिर भी, उन्होंने कहा कि राजस्थान के बाहर से किसी मुख्य न्यायाधीश को नियुक्त करने के उनके अनुरोध पर अब तक कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली है। 

    दूसरे पत्र में, जस्टिस मेहता ने 26 सितंबर को अपने रिटायरमेंट से ठीक पहले जस्टिस शर्मा द्वारा लंबे छक्के लगाने के प्रयास के जीते-जागते प्रमाण के रूप में दो विशिष्ट उदाहरणों का हवाला दिया। 

    10 अगस्त के पत्र में, उन्होंने जस्टिस शर्मा द्वारा कुछ वकीलों के साथ कथित पक्षपात और रोस्टर शक्तियों के दुरुपयोग के और अधिक विशिष्ट उदाहरणों का जिक्र किया। 

    17 अगस्त के अपने पत्र में, जस्टिस मेहता ने कहा कि उन्होंने अपने पहले के पत्रों में जस्टिस शर्मा के भारी कुप्रशासन और गंभीर रूप से संदेहास्पद गतिविधियों को पहले ही उजागर कर दिया था. जस्टिस मेहता ने पूछा कि उन्हें काम जारी रखने की अनुमति क्यों दी जा रही है। 17 अगस्त के पत्र में यह भी आरोप लगाया गया कि राजस्थान उच्च न्यायालय के एक मौजूदा न्यायाधीश ने साथी न्यायाधीशों से जस्टिस शर्मा के उस आचरण की शिकायत की जो उनकी पत्नी (जो एक वरिष्ठ जिला न्यायपालिका अधिकारी) के प्रति प्रतिशोध की भावना से प्रेरित था. इस पत्र में राजस्थान उच्च न्यायालय के प्रशासन और अधीनस्थ न्यायपालिका के सदस्यों के साथ किए जाने वाले व्यवहार को लेकर भी अन्य आरोप जोड़े गए थे। 

    नवंबर 2016 में जस्टिस शर्मा को राजस्थान उच्च न्यायालय में नियुक्त किया गया था. उन्हें जनवरी 2022 में पटना उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया गया. स्वास्थ्य के आधार पर राजस्थान वापस लौटने के उनके अनुरोध को मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने नामंजूर कर दिया था, और उन्हें पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय भेज दिया गया था. कॉलेजियम ने बाद में अपने फैसले में बदलाव किया और मई 2025 में उनके राजस्थान लौटने की सिफारिश की। 

  • हाईकोर्ट से मिला झटका तो राजभर बोले- ‘अखिलेश जी हिजाब पर क्या सोचते हैं, मौलाना जानना चाहते हैं’

    हाईकोर्ट से मिला झटका तो राजभर बोले- ‘अखिलेश जी हिजाब पर क्या सोचते हैं, मौलाना जानना चाहते हैं’

    लखनऊ

    योगी सरकार में मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) प्रमुख ओम प्रकाश राजभर इन दिनों सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर लगातार हमलावर हैं। 25 अगस्त को ओपी राजभर ने अखिलेश यादव से हिजाब से जुड़े मामले पर सवाल पूछा है।

    हाईकोर्ट के आदेश पर अखिलेश से पूछा सवाल
    राजभर ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में लिखा, “मित्र अखिलेश जी, हाईकोर्ट का आदेश तो आपने पढ़ा ही होगा। स्कूलों में हिजाब पहनने पर हाईकोर्ट की तरफ़ से रोक लगा दी गई है। लेकिन आपके प्रवक्ता तो खुलकर हाईकोर्ट के खिलाफ खड़े हो गए हैं। आपका क्या रुख़ है?”

    ओपी राजभर ने अखिलेश यादव से पूछा कि क्या आप भी हाईकोर्ट के खिलाफ खड़े होंगे? कह दीजिए अपने मन की। कह दीजिए हाईकोर्ट के इस आदेश से आपका मन दुखा है।

    ‘अखिलेश जी, मौलाना आपका रूख जानना चाहते हैं’- राजभर

    अखिलेश यादव को टैग करते हुए ओपी राजभर ने कहा, “अखिलेश जी, आपके जवाब का इंतज़ार है? बताइए हिजाब को लेकर आप क्या सोचते हैं? मौलाना लोग जानना चाहते हैं? जय संविधान।”

    हिजाब मामले में हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका

    बता दें कि स्कूलों में हिजाब पहनने को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत गरमा गई है। दरअसल, प्रयागराज के टैगोर पब्लिक स्कूल की 11वीं कक्षा की एक मुस्लिम छात्रा की तरफ से इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर हुई थी। याचिकाकर्ता ने स्कूल की तय यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की अनुमति मांगी थी। इस याचिका को इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने खारिज कर दिया।

    ‘हिजाब इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं’

    इस याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने कहा कि हिजाब पहनना इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा के तौर पर स्थापित नहीं है। अदालत ने कहा कि स्कूल का ड्रेस कोड सभी छात्रों के लिए समान और गैर-भेदभावपूर्ण है तथा अनुशासन बनाए रखने के लिए संस्थान को इसे लागू करने का अधिकार है।

    सिर्फ दावे के आधार पर अनुमति नही- कोर्ट

    अदालत ने कहा कि ऐसा कोई धार्मिक या कानूनी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि हिजाब पहनना इस्लाम में एक अनिवार्य प्रथा है। सिर्फ दावे के आधार पर इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कहा कि समान रूप से लागू किए गए स्कूल ड्रेस कोड में व्यक्तिगत पसंद के आधार पर बदलाव की मांग नहीं की जा सकती।

    अब अखिलेश यादव से राजभर ने किया सवाल

    कोर्ट द्वारा याचिका खारिज होने के बाद अब ओपी राजभर ने अखिलेश यादव से इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करने को कहा है। राजभर ने सवाल किया कि क्या अखिलेश यादव भी हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ खड़े होंगे या विरोध करेंगे।

  • पर्सनल आईडी से टिकट बुकिंग पर हाई कोर्ट की स्पष्टता, रेलवे एजेंट को मिली राहत

    पर्सनल आईडी से टिकट बुकिंग पर हाई कोर्ट की स्पष्टता, रेलवे एजेंट को मिली राहत

    जबलपुर 
     मध्य प्रदेश हाई कोर्ट जस्टिस हिमांशु जोषी की एकलपीठ ने साफ किया है "अधिकृत एजेंट के खिलाफ रेलवे एक्ट की धारा 143 के तहत अपराध नहीं बनता." इस प्रकार रेलवे कोर्ट के एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित आपराधिक प्रकरण को निरस्त करने के आदेश जारी किए। 

    आरपीएफ ने धारा 143 के तहत अपराध दर्ज किया
    याचिकाकर्ता अविनाश कुमार सोनी की तरफ से दायर की गयी याचिका में कहा गया "वह साल 2015 से आईआरसीटीसी अधिकृत ई-टिकटिंग एजेंट है. उसका सिंगरौली में सायबर कैफे है." मामले के अनुसार रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स के अधिकारियों ने उसके साइबर कैफे पर छापा मारा और दो रेलवे टिकट जब्त की, जो अधिकृत एजेंट आईडी के बजाय याचिकाकर्ता की पर्सनल आईडी से जारी किए गए थे. आरपीएफ ने उसके खिलाफ रेलवे एक्ट 1989 की धारा 143 के तहत अपराध दर्ज किया. जांच के बाद सक्षम रेलवे कोर्ट में चार्जशीट दायर की गई। 

    अनधिकृत टिकट का सबूत नहीं
    याचिकाकर्ता की तरफ से पैरवी करते हुए अधिवक्ता विशाल डेनियल ने तर्क दिया "याचिकाकर्ता अधिकृत एजेंट है और ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि वह रेलवे टिकट खरीदने या सप्लाई करने का अनधिकृत कारोबार कर रहा था. आरपीएफ ने 20 नवम्बर 2019 को उसके सायबर कैफे में छापेमारी की थी. छापेमारी के समय याचिकाकर्ता दुकान पर मौजूद नहीं था. वह वाराणसी में चार्टर्ड अकाउंटेंसी की पढाई कर रहा था और वह लॉ ग्रेजुएट भी है। 

    पिता को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लिया
    छापेमारी के दौरान दुकान में उपस्थित याचिकाकर्ता के पिता को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लेते हुए कंप्यूटर सिस्टम, प्रिंटर और आईआरसीटीसी का अधिकार डोंगल को बिना अधिकार के जब्त कर लिया गया था. एकलपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का हवाला देते हुए कहा "आरोप केवल टिकट बुक करने के तरीके तक सीमित है. याचिकाकर्ता अधिकृत एजेंट आईडी के बजाय व्यक्तिगत यूजर आईडी के माध्यम से टिकट बुक की. इस तरह के आरोप को अगर सही भी मान लिया जाए तो भी यह रेलवे अधिनियम की धारा 143 के तहत दंडनीय अपराध नहीं बनता है." एकलपीठ ने सुनवाई के बाद लंबित प्रकरण को निरस्त करने के आदेश जारी किए। 

  • मेरिटोरियस शिक्षकों को राहत: स्कूल चयन का मिलेगा दूसरा मौका, जबलपुर हाईकोर्ट के निर्देश

    मेरिटोरियस शिक्षकों को राहत: स्कूल चयन का मिलेगा दूसरा मौका, जबलपुर हाईकोर्ट के निर्देश

    जबलपुर 

    मध्य प्रदेश के सिवनी जिले की मिडिल स्कूल शिक्षिका साक्षी ताम्रकार सहित अन्य अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर शिक्षक भर्ती में पदस्थापना प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। याचिका में आरोप लगाया गया कि अधिक मेरिट वाले अभ्यर्थियों को पसंद का स्कूल चुन सकेंगे। 

    मामले की शनिवार को सुनवाई जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा की डिवीजन बेंच ने की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद नियमों में ऐसा बदलाव नहीं किया जा सकता, जिससे अभ्यर्थियों के अधिकार प्रभावित हों। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिए कि जनजातीय कार्य विभाग में पहले से पदस्थ मेरिटोरियस अभ्यर्थियों को स्कूल शिक्षा विभाग में चॉइस फिलिंग का अवसर दिया जाए। इसके बाद उनकी मेरिट के आधार पर पदस्थापना की जाए।

    2018 की शिक्षक भर्ती से जुड़ा है मामला
    दरअसल, 2018 में शिक्षक पात्रता परीक्षा के आधार पर स्कूल शिक्षा और जनजातीय कार्य विभाग में संयुक्त शिक्षक भर्ती निकाली गई थी। साक्षी ताम्रकार सहित 54 याचिकाओं में अभ्यर्थियों ने बताया कि आरक्षित वर्ग के कई उम्मीदवारों ने सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों से भी अधिक अंक हासिल किए थे।

    मेरिट के आधार पर उन्हें जनजातीय कार्य विभाग के स्कूलों में नियुक्ति मिली। इसके बाद नवंबर-दिसंबर 2022 में जारी निर्देशों के चलते एक विभाग में नियुक्त होकर जॉइन कर चुके शिक्षकों को रिक्त पदों के लिए होने वाली काउंसलिंग और चॉइस फिलिंग से बाहर कर दिया गया।

    याचिकाकर्ताओं का कहना था कि बाद के निर्देशों से भर्ती की मूल प्रक्रिया प्रभावित हुई। अधिक मेरिट वाले अभ्यर्थी स्कूल शिक्षा विभाग में अपनी पसंद का स्कूल नहीं चुन सके, जबकि कम मेरिट वालों को पसंदीदा स्कूल मिल गए।

    साक्षी ताम्रकार का मामला बना अहम आधार
    सुनवाई के दौरान अधिवक्ता प्रशांत कुमार बड़ारया, अंशुमान सिंह और अमित कुमार चतुर्वेदी ने अभ्यर्थियों की ओर से पक्ष रखा। कोर्ट के सामने साक्षी ताम्रकार के मामले का विशेष उल्लेख किया गया। उनका दस्तावेज सत्यापन पूरा हो चुका था और चॉइस लिस्ट में नाम भी शामिल था। इसके बावजूद ट्राइबल विभाग से नियुक्ति पत्र जारी होने के कारण उन्हें चॉइस फिलिंग का मौका नहीं मिला।

    2 महीने में चॉइस फिलिंग, मेरिट से होगी पोस्टिंग
    डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि दो महीने के भीतर संबंधित अभ्यर्थियों को स्कूल चॉइस फिलिंग पॉलिसी के तहत प्राथमिकताएं दर्ज करने का अवसर दिया जाए। इसके बाद उनकी मेरिट के आधार पर पदस्थापना तय होगी।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि नई प्रक्रिया से यदि पहले से कार्यरत कम मेरिट वाले शिक्षक प्रभावित होते हैं, तो उन्हें उपलब्ध रिक्तियों के आधार पर संबंधित विभाग या दूसरे विभाग में समायोजित किया जाए।

    अदालत ने माना कि भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद चयन की मूल शर्तों और अभ्यर्थियों के अधिकारों को प्रभावित करने वाले बदलाव नहीं किए जा सकते। फैसले से शिक्षक भर्ती-2018 के मेरिटोरियस अभ्यर्थियों को राहत मिलने की उम्मीद है। साथ ही स्कूल शिक्षा और जनजातीय कार्य विभाग में पदस्थापना को लेकर लंबे समय से चले आ रहे विवाद पर भी इसका असर पड़ सकता है।