Tag: High Court

  • पंजाब के सरकारी कर्मचारियों के DA विवाद में नया मोड़, मुख्य सचिव पर अवमानना केस और हाईकोर्ट में माफी की पेशकश चर्चा में

    पंजाब के सरकारी कर्मचारियों के DA विवाद में नया मोड़, मुख्य सचिव पर अवमानना केस और हाईकोर्ट में माफी की पेशकश चर्चा में

    चंडीगढ़ 

    पंजाब के सरकारी कर्मचारियों के महंगाई भत्ते (DA) के बकाये से जुड़े मामले में आज (12 अक्टूबर) पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में सुनवाई होगी। पिछली सुनवाई में चीफ जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा की बेंच ने इस मामले को नियमित अवमानना केस से अपग्रेड कर आपराधिक अपराध की तरह सुनवाई। 

    इस दौरान पंजाब के मुख्य सचिव केएपी सिन्हा के लिखित माफीनामे पर फैसला हो सकता है। उन्होंने कोर्ट में लिखित रूप से बिना शर्त माफी का प्रस्ताव दिया है। पिछली बेंच ने इस माफीनामे को स्वीकार करने या खारिज करने का फैसला नई बेंच पर छोड़ दिया था।

    आज नई बेंच यह तय करेगी कि मुख्य सचिव की माफी को स्वीकार कर उनके खिलाफ चल रही आपराधिक अवमानना की कार्रवाई को यहीं बंद किया जाए? या कोर्ट को गुमराह करने और गलत तथ्य रखने के लिए उनके खिलाफ औपचारिक रूप से आरोप तय कर कानूनी कार्रवाई को आगे बढ़ाया जाए?

    9 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान मुख्य सचिव केएपी सिन्हा अदालत में पेश हुए थे। मामले में मुख्य सचिव के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई का मुद्दा भी उठा था। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा था कि अदालत की गरिमा से समझौता नहीं किया जा सकता।

    वहीं, पंजाब सरकार की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने कहा था कि मुख्य सचिव का अदालत को गुमराह करने का कोई इरादा नहीं था। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि अदालत चाहे तो मुख्य सचिव बिना शर्त माफी मांगने को तैयार हैं।

    पिछली सुनवाई में क्या-क्या हुआ, 5 पॉइंट में पढ़िए

        सुप्रीम कोर्ट में मामला सूचीबद्ध नहीं हुआ: कर्मचारियों की ओर से सीनियर एडवोकेट संजय कौशल ने कहा कि DA के बकाये से जुड़े हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी, लेकिन यह मामला अब तक सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हुआ है।

        वकील बोले- सुनवाई में इतनी देरी क्यों हो रही: संजय कौशल ने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय से जुड़े मामले में हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने के लिए सरकार ने तुरंत अपील दायर की और उस पर सुनवाई भी तय हो गई। एडवोकेट ने इसे सरकार का दोहरा रवैया बताते हुए कहा कि लाखों कर्मचारियों के बकाये के मामले में इतनी देरी क्यों हो रही है?

        सरकार बोली- पिछली सरकारों का है बकाया: पंजाब सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने पक्ष रखते हुए कहा कि कर्मचारियों का DA बकाया मौजूदा सरकार के समय का नहीं, बल्कि पिछली सरकारों के कार्यकाल से जुड़ा है। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि फैसला देने से पहले अदालत पूरे मामले के रिकॉर्ड की जांच कर चुकी है।

        गलत जानकारी देने पर कोर्ट ने जताई नाराजगी: हाईकोर्ट ने साफ कहा कि सरकार को अपने फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का पूरा अधिकार है। हालांकि, अपील करने के बाद अदालत को गलत जानकारी देना स्वीकार नहीं किया जा सकता।

        अपील की कमियां अब तक दूर क्यों नहीं हुई?: कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि सुप्रीम कोर्ट में दायर अपील की कमियां अब तक दूर क्यों नहीं की गईं? इसी मामले में अदालत ने आपराधिक अवमानना का नोटिस जारी किया था। हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक अवमानना के मामले की सुनवाई तय रोस्टर के अनुसार संबंधित पीठ ही करेगी।

    मामले में अब तक क्या-क्या हुआ, जानिए

        8 अप्रैल 2026: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में कर्मचारियों की याचिकाओं पर विस्तृत सुनवाई शुरू हुई, जिसमें पंजाब सरकार द्वारा केंद्रीय पैटर्न पर बढ़े हुए DA को रोकने की नीति को चुनौती दी गई थी।

        3 अगस्त 2026: पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच (जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर) ने फैसला सुनाया। कोर्ट ने सरकार की वित्तीय तंगी की दलीलें खारिज कीं और करीब 8 लाख कर्मचारियों व पेंशनर्स के बकाये को 15 दिनों के भीतर जारी करने का आदेश दिया। इसी दिन कोर्ट ने सख्त निर्देश दिया कि जब तक बकाया नहीं चुकाया जाता, सरकार अपने प्रचार-प्रसार के लिए बड़े पैमाने पर विज्ञापन (प्रिंट/सोशल मीडिया) जारी नहीं कर सकती।

        31 अगस्त 2026: हाई कोर्ट की ओर से अनुपालन हलफनामा दाखिल करने के लिए मुख्य सचिव को दी गई अंतिम समयसीमा समाप्त हो गई, लेकिन सरकार भुगतान करने में विफल रही।

        1 सितंबर 2026: पंजाब सरकार ने हाई कोर्ट के इस कड़े आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और वहां एक विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की।

        10 सितंबर 2026: हाई कोर्ट ने अनुपालन न होने पर सरकार से दोबारा जवाब मांगा। राज्य सरकार ने बताया कि मामला सुप्रीम कोर्ट में दायर किया जा चुका है। हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की अपील में मौजूद कमियों को 10 दिन में दूर करने का समय दिया।

        1 अक्टूबर 2026: एडवोकेट जनरल और मुख्य सचिव के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में कमियों को दूर कर अपील को दोबारा फाइल किया गया।
        6 अक्टूबर 2026: हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री से स्टेटस रिपोर्ट मंगवाई, जिसमें यह खुलासा हुआ कि पंजाब सरकार की अपील अभी भी कमियों के कारण अटकी हुई है और सूचीबद्ध होने के योग्य नहीं है। कोर्ट ने इसे गलत जानकारी देकर गुमराह करना माना और मुख्य सचिव केएपी सिन्हा को आपराधिक अवमानना का कारण बताओ नोटिस जारी कर 9 अक्टूबर को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का हुक्म दिया।

        9 अक्टूबर 2026: मुख्य सचिव निजी तौर पर कोर्ट में पेश हुए। उनके वकील ने अदालत से बिना शर्त माफी मांगने की पेशकश की। हालांकि, चीफ जस्टिस की बेंच ने राज्य के इस आचरण को बेहद पीड़ादायक बताया और माफी स्वीकार करने से मना करते हुए पूरे मामले को आपराधिक अवमानना से जुड़ी रोस्टर डिवीजन बेंच के पास ट्रांसफर कर दिया।

  • MP हाई कोर्ट ने NSA के इस्तेमाल पर उठाए सवाल, कहा- मनमानी से कानून की गंभीरता हो रही प्रभावित

    MP हाई कोर्ट ने NSA के इस्तेमाल पर उठाए सवाल, कहा- मनमानी से कानून की गंभीरता हो रही प्रभावित

    भोपाल
    मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के मनमाने और लापरवाह तरीके से इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताई है। अदालत ने दो भाइयों की निवारक हिरासत को रद करते हुए उन्हें तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है और चेतावनी दी है कि संविधान के इस बेहद कड़े कानून का इस्तेमाल अब सामान्य प्रक्रिया की तरह लापरवाही से किया जा रहा है।

    मामले में सुनवाई के दौरान जस्टिस विवेक अग्रवाल की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच ने राजेंद्र ठाकुर और राजेश ठाकुर नाम के दो सगे भाइयों की नजरबंदी को खारिज करते हुए उन्हें छोड़ने का आदेश दिया है।

    जानिए दोनों भाईयों पर क्यों लगाया गया था NSA?
    बता दें कि जबलपुर के जिला कलेक्टर ने सार्वजनिक शांति के लिए खतरा बताते हुए 6 जनवरी को इन दोनों भाइयों को तीन महीने के लिए हिरासत में लेने का आदेश दिया था, जिसे बाद में बढ़ा दिया गया था। हाई कोर्ट ने यह फैसला 11 सितंबर को सुनाया था, जिसे 5 अक्टूबर को सार्वजनिक किया गया।

    हाई कोर्ट ने क्या कहा?
    पहले तो अदालत ने पाया कि दोनों भाइयों पर कुल 14 मामले दर्ज थे, जिनमें से 11 मामलों में वे पहले ही बरी हो चुके थे। बाकी बचे 3 मामलों में मारपीट, अछूत हरकत और मामूली बमबाजी जैसे आरोप थे। ऐसे में अदालत ने कहा कि अधिकारियों ने बिना दिमाग लगाए और बिना सही तथ्य जाने ही उन पर NSA लगा दिया।

    एक ही दिन में कागजी कार्रवाई पूरी होने पर सवाल
    दूसरी ओर बेंच ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि सिटी एसपी के प्रस्ताव से लेकर कलेक्टर के नजरबंदी आदेश तक की पूरी फाइल चार अधिकारियों से गुजरी और महज़ एक ही दिन में सारी प्रक्रिया पूरी कर ली गई। अदालत ने कहा कि इतनी जल्दबाजी यह साबित करती है कि अधिकारियों ने स्वतंत्र रूप से सोच-समझकर फैसला नहीं लिया।

    संविधान के नियमों का दिया हवाला
    साथ ही सुनवाई के दौरान अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 ,जो नागरिकों को मौलिक अधिकार देते हैं, के तहत मिले सुरक्षा उपायों का पालन किया जाना चाहिए, ताकि किसी भी नागरिक को मनमाने ढंग से हिरासत में न रखा जाए।

     

  • नाबालिग दुष्कर्म केस में हाई कोर्ट की सख्ती, SIT गठन के निर्देश; DNA रिपोर्ट ने बदला पूरा मामला

    नाबालिग दुष्कर्म केस में हाई कोर्ट की सख्ती, SIT गठन के निर्देश; DNA रिपोर्ट ने बदला पूरा मामला

    जबलपुर
     बागेश्वर धाम में मार्च में सामने आए नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने जांच का दायरा बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। न्यायमूर्ति अजय कुमार निरंकारी की अदालत ने आरोपित राजू जाटव की दूसरी जमानत याचिका खारिज करते हुए छतरपुर एसपी को विशेष जांच टीम गठित करने के निर्देश दिए हैं।

    कोर्ट ने टीम को यह पता लगाने के लिए जांच करने को कहा है कि नाबालिग का यौन उत्पीड़न किस व्यक्ति ने किया था और उसके गर्भ से मिले भ्रूण का जैविक पिता कौन है। जांच को दो महीने के भीतर पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं।

    15 मार्च को अकेली आई थी नाबालिग
    अभियोजन के मुताबिक, नाबालिग 15 मार्च को अकेले बागेश्वर धाम पहुंची थी। 17 मार्च को उसकी मुलाकात राजू जाटव से हुई। आरोप है कि राजू उसे घर छोड़ने की बात कहकर अपने साथ ले गया और करीब 15 दिनों तक अपने पास रखा। इसके बाद वह नाबालिग को ट्रेन से पचोर ले गया।

    पुलिस ने राजू की पत्नी की निशानदेही पर नाबालिग को बरामद किया था। जांच के दौरान नाबालिग के गर्भवती होने की जानकारी सामने आई। गर्भपात के बाद अदालत ने भ्रूण की डीएनए जांच कराने के निर्देश दिए थे।

    डीएनए रिपोर्ट में राजू को जैविक पिता नहीं माना गया

    29 अगस्त को सामने आई डीएनए रिपोर्ट में राजू जाटव को भ्रूण का जैविक पिता नहीं पाया गया। मामले में उस समय नया मोड़ आया, जब नाबालिग ने अदालत के समक्ष राजू द्वारा दुष्कर्म किए जाने से इन्कार किया।

    हालांकि, पुलिस के समक्ष दर्ज उसके पूर्व बयानों में उसने राजू पर जबरन दुष्कर्म करने का आरोप लगाया था। बयानों में अंतर और डीएनए रिपोर्ट के बाद हाई कोर्ट ने मामले की जांच का दायरा बढ़ाने की जरूरत महसूस की।

    अब विशेष जांच टीम पूरे मामले की नए सिरे से पड़ताल करेगी और यह पता लगाएगी कि नाबालिग के साथ वास्तव में किसने यौन अपराध किया तथा गर्भ में पल रहे भ्रूण का जैविक पिता कौन था।

    धाम में अकेले न आएं महिलाएं : धीरेंद्र शास्त्री
    इधर, 3 अक्टूबर की रात बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने महिलाओं और माताओं से अकेले धाम नहीं आने की अपील की। उन्होंने अनजान लोगों और सेवादारों पर आंख मूंदकर भरोसा न करने की सलाह भी दी। हालांकि, उनकी अपील में इस नाबालिग से जुड़े प्रकरण का कोई सीधा उल्लेख नहीं था।

     

  • अवमानना मामले में हाईकोर्ट का सख्त रुख, पूर्व प्रमुख सचिव पर वारंट

    अवमानना मामले में हाईकोर्ट का सख्त रुख, पूर्व प्रमुख सचिव पर वारंट

    जबलपुर 
     मध्य प्रदेश हाई कोर्ट जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने आदेश का पालन नहीं किये जाने को गंभीरता से लिया है. वेटरनरी विभाग के तत्कालीन प्रमुख सचिव उमाकांत उमराव के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करते हुए उन्हें पेश करने के आदेश जारी किये हैं. हाईकोर्ट ने अगली सुनवाई 5 अक्टूबर को उन्हें पेश करने के आदेश जारी किये हैं. वारंट तामील की जिम्मेदारी भोपाल पुलिस आयुक्त सौंपी गयी है। 

    आदेश का पालन नहीं करने पर फिर याचिका
    जबलपुर के सेवानिवृत्त असिस्टेंट वेटरनरी फील्ड ऑफिसर केके गर्ग की तरफ से दायर अवमानना में कहा गया "वेतन से राशि कटौती किए जाने के खिलाफ उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी. हाई कोर्ट ने कटौती की गयी राशि को 90 दिन में वापस करने के आदेश जारी किये थे. आदेश का पालन नहीं किये जाने कारण अवमानना याचिका दायर की गयी." एकलपीठ ने याचिका की सुनवाई के दौरान पाया "अवमानना याचिका पर दिसंबर 2025 को नोटिस जारी किये गये थे। 

    हाई कोर्ट में पेश होने से बचते रहे
    भोपाल के पशु चिकित्सा और डेयरी विकास विभाग के अपर सचिव ने हाई कोर्ट के विशेष कर्तव्य अधिकारी को 22 दिसंबर 2025 को पत्र भेजाकर नोटिस प्राप्त होने तथा पशु चिकित्सा सेवाओं के उप निदेशक जबलपुर को संपर्क अधिकारी नियुक्त किये जाने की जानकारी दी थी. एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा "इसके बाद प्रतिवादियों और संपर्क अधिकारी ने मामले में किसी वकील को नियुक्त करने या अदालत में उपस्थिति दर्ज कराने की जहमत उठाई है. उन्होंने केवल इस अदालत की रजिस्ट्री को पत्र लिखकर मामले से पल्ला झाड़ लिया। 

    कोर्ट ने कहा- बगैर गैर जमानती वारंट के नहीं सुधरेंगे
    हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा "तत्कालीन प्रमुख सचिव उमाकांत उमराव ने कोर्ट में उपस्थिति दर्ज कराने और कोई अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने की परवाह नहीं की. ऐसा लगता है कि गैरजमानती वारंट जारी किए बिना प्रतिवादी अदालत में पेश नहीं होंगे और रिट याचिका में पारित आदेश का पालन करते हुए अवमानना याचिका में सहयोग नहीं करेंगे। 

  • पंजाब वक्फ बोर्ड चपरासी भर्ती मामला, हाई कोर्ट ने प्रदीप कुमार की नियुक्ति पर विचार के दिए निर्देश

    पंजाब वक्फ बोर्ड चपरासी भर्ती मामला, हाई कोर्ट ने प्रदीप कुमार की नियुक्ति पर विचार के दिए निर्देश

     

    चंडीगढ़
     पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पंजाब वक्फ बोर्ड में चपरासी पद की भर्ती से जुड़े मामले में फैसला सुनाते हुए वेटिंग लिस्ट में पहले स्थान पर रहे अभ्यर्थी को नियुक्ति के लिए विचार करने का निर्देश दिया है।

    कोर्ट ने कहा कि जब चयनित अभ्यर्थियों में से कोई उम्मीदवार उपलब्ध पद पर नियुक्ति ग्रहण नहीं करता है और उसकी जगह रिक्ति बनी रहती है, तो मेरिट के अनुसार वेटिंग लिस्ट के अगले उम्मीदवार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    छह साल पहले शुरू हुई भर्ती की प्रक्रिया
    जस्टिस नामित कुमार की पीठ ने यह आदेश प्रदीप कुमार की याचिका पर सुनाया। पंजाब वक्फ बोर्ड ने 30 अगस्त 2020 को विभिन्न पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया शुरू की थी, जिसमें चपरासी के 34 पद शामिल थे।

    बाद में इन पदों की संख्या घटाकर 24 कर दी गई। चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद 24 उम्मीदवारों का चयन किया गया, जबकि पांच अभ्यर्थियों को वेटिंग लिस्ट में रखा गया। प्रदीप कुमार वेटिंग लिस्ट में पहले नंबर पर थे।

    याचिकाकर्ता के अनुसार चयनित 24 उम्मीदवारों में से केवल 23 ने चपरासी पद पर ज्वाइन किया। एक चयनित उम्मीदवार करनवीर सिंह ने चपरासी के पद पर ज्वाइन नहीं किया, बल्कि किसी अन्य पद पर नियुक्त हुआ। सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी में भी 24 में से 23 नियुक्तियां चपरासी पद पर होने और बाद में चार लोगों के इस्तीफा देने की बात सामने आई थी। इस तरह पांच पद रिक्त बताए गए थे।

    वेटिंग लिस्ट की अवधि एक वर्ष थी
    पंजाब वक्फ बोर्ड ने हाई कोर्ट में दलील दी कि वेटिंग लिस्ट की अवधि एक वर्ष थी और याचिकाकर्ता की ओर से प्रस्तुत अभ्यावेदन दिसंबर 2022 में प्राप्त हुआ था। इसी आधार पर उसकी नियुक्ति के दावे को फरवरी 2023 में खारिज कर दिया गया था।

    हाई कोर्ट ने हालांकि पूर्व के न्यायिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि वेटिंग लिस्ट में नाम होने मात्र से नियुक्ति का स्वत अधिकार नहीं बनता, लेकिन नियुक्ति प्राधिकारी को उपलब्ध रिक्ति और अभ्यर्थी की मेरिट को नजरअंदाज कर मनमाने ढंग से कार्रवाई करने की छूट भी नहीं है। अदालत ने कहा कि रिक्ति उपलब्ध होने पर मेरिट के अनुसार अगले अभ्यर्थी को नियुक्ति की पेशकश की जानी चाहिए।

    प्रदीप कुमार की नियुक्ति का दावा खारिज वाला आदेश रद
    हाई कोर्ट ने प्रदीप कुमार की नियुक्ति का दावा खारिज करने वाला आदेश रद कर दिया। पंजाब वक्फ बोर्ड को निर्देश दिया गया कि वह चपरासी पद पर उनकी नियुक्ति के मामले पर विचार करे और अन्य 23 उम्मीदवारों को नियुक्ति दिए जाने की तारीख से वरिष्ठता, वेतन निर्धारण समेत सभी काल्पनिक लाभ देने पर निर्णय ले। यह पूरी कार्रवाई आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के दो महीने के भीतर करनी होगी।

     

  • NEET-UG 2026 काउंसलिंग में शामिल होंगे 3 अभ्यर्थी, हाईकोर्ट ने PwBD अयोग्यता का फैसला रद्द किया

    NEET-UG 2026 काउंसलिंग में शामिल होंगे 3 अभ्यर्थी, हाईकोर्ट ने PwBD अयोग्यता का फैसला रद्द किया

    लखनऊ
    इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने दिव्यांग अभ्यर्थियों के एमबीबीएस प्रवेश से संबंधित एक मामले में दिशा स्पष्ट की है। कहा कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी वैध दिव्यांगता प्रमाण पत्र में दर्ज दिव्यांगता के प्रतिशत को एनएमसी (नेशनल मेडिकल कमीशन) के मेडिकल असेसमेंट बोर्ड द्वारा दोबारा निर्धारित नहीं किया जा सकता। बोर्ड को सिर्फ इतना जांचने का अधिकार है कि अभ्यर्थी उचित सुविधा और सहायक तकनीक के साथ एमबीबीएस पाठ्यक्रम पूरा करने में सक्षम है अथवा नहीं।

    न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने शुभम मिश्रा, सौरभ राणा और गुलफाम अहमद की ओर से दाखिल तीन अलग-अलग याचिकाओं पर एक साथ सुनवायी करते हुए, यह निर्णय दिया है। न्यायालय ने मेडिकल असेसमेंट बोर्ड और अपीलीय मेडिकल असेसमेंट बोर्ड द्वारा जारी उन निष्कर्षों को रद्द कर दिया, जिनमें अभ्यर्थियों को पीडब्ल्यूबीडी (पर्सन विद बेंचमार्क डिसबिल्टीज) आरक्षण के लिए अयोग्य बताया गया था। न्यायालय ने याचियों को नीट-यूजी 2026 की शेष काउंसलिंग में पीडब्ल्यूबीडी आरक्षित श्रेणी के योग्य अभ्यर्थी के रूप में शामिल करने का निर्देश दिया है।

    याची शुभम मिश्रा को मुख्य चिकित्सा अधिकारी, सुलतानपुर ने 45 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता का प्रमाण पत्र जारी किया था। हालांकि, मेडिकल असेसमेंट बोर्ड ने 11 अगस्त 2026 के प्रमाण पत्र में उनकी दिव्यांगता को 45 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत कर दिया और उन्हें पीडब्ल्यूबीडी आरक्षण के लिए अयोग्य बताया। अपीलीय मेडिकल बोर्ड ने भी असेसमेंट बोर्ड के फैसले को बरकरार रखा।

    दर्ज दिव्यांगता प्रतिशत सभी के लिए बाध्यकारी
    इसी प्रकार अन्य याचियों सौरभ राणा व गुलफाम अहमद के दिव्यांगता प्रतिशत को घटा दिया गया। अपने निर्णय में कोर्ट कहा कि आरपीडब्ल्यूडी एक्ट की धारा 57 के तहत सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी और वैध दिव्यांगता प्रमाण पत्र, जब तक सक्षम न्यायिक या वैधानिक मंच द्वारा निरस्त नहीं किया जाता, उसमें दर्ज दिव्यांगता प्रतिशत सभी के लिए बाध्यकारी है। कहा कि मेडिकल बोर्ड को यह देखना है कि अभ्यर्थी अपनी प्रमाणित दिव्यांगता के बावजूद उचित सुविधा और सहायक तकनीक के साथ एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने में सक्षम है या नहीं लेकिन यह प्रक्रिया दिव्यांगता के प्रतिशत को दोबारा तय करने के लिए नहीं है।

  • DA-DR भुगतान विवाद: पंजाब के मुख्य सचिव को कोर्ट में पेश होने के आदेश

    DA-DR भुगतान विवाद: पंजाब के मुख्य सचिव को कोर्ट में पेश होने के आदेश

    चंडीगढ़ 

    पंजाब सरकार के कर्मचारियों और पेंशनरों के लंबित महंगाई भत्ते (डीए) और महंगाई राहत (डीआर) के भुगतान में देरी पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। पूर्व आदेश का पालन नहीं होने और अनुपालन शपथपत्र दाखिल न किए जाने पर अदालत ने पंजाब के मुख्य सचिव को पांच अक्तूबर को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि राज्य सरकार को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट से कोई संरक्षण मिल जाता है तो मुख्य सचिव की व्यक्तिगत पेशी से छूट रहेगी।

    चीफ जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की खंडपीठ पंजाब सरकार और पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड से जुड़े लंबित डीए-डीआर भुगतान के मामलों की सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने कहा कि राज्य सरकार पक्षों के बीच समझौते की स्थिति बनने का हवाला दे रही है, जबकि उनकी मांग केवल हाईकोर्ट के आदेश को लागू कराने की है। इस पर खंडपीठ ने कहा कि राज्य को आदेश के खिलाफ अपील करने का अधिकार है, लेकिन कानूनी उपाय का इस्तेमाल कार्यवाही को अनिश्चितकाल तक टालने के लिए नहीं किया जा सकता।

    हाईकोर्ट ने तीन अगस्त को पंजाब सरकार और पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड को कर्मचारियों और पेंशनरों के लंबित डीए-डीआर की अद्यतन किस्तें अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों को दिए जा रहे केंद्रीय दर के अनुरूप जारी करने का निर्देश दिया था। इसके लिए दो सप्ताह की समय सीमा तय की गई थी। देरी होने पर बकाया राशि पर छह प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज देने का भी आदेश था। 

     अदालत को बताया गया कि राज्य ने एक सितंबर को आदेश के खिलाफ अपील दायर की थी, लेकिन रजिस्ट्री की ओर से बताई गई आपत्तियां अभी तक दूर नहीं की गई हैं। सरकार ने दो सप्ताह का और समय मांगा और कहा कि वह मामले को सौहार्दपूर्ण तरीके से सुलझाने का प्रयास कर रही है। खंडपीठ ने कहा कि एकल पीठ की ओर से बकाया भुगतान के लिए दी गई तीन महीने की समय सीमा भी समाप्त हो चुकी है, लेकिन आदेश का अनुपालन नहीं हुआ।

    याचिकाकर्ताओं ने स्वतंत्रता दिवस पर प्रकाशित पूर्ण पृष्ठ के विज्ञापनों का मुद्दा भी उठाया। उनका कहना था कि कर्मचारियों और पेंशनरों का बकाया लंबित होने के बावजूद ऐसे खर्च सवाल खड़े करते हैं। अदालत पहले ही राज्य को बकाया भुगतान होने तक बड़े पैमाने पर प्रिंट और सोशल मीडिया पर अनुत्पादक विज्ञापन खर्च से बचने को कह चुकी है। अब अनुपालन शपथपत्र दाखिल नहीं किए जाने पर मुख्य सचिव को व्यक्तिगत पेशी के लिए तलब किया गया है।

    आदेश के पालन में देरी पर छह फीसदी ब्याज भी
    हाईकोर्ट ने तीन अगस्त के आदेश में लंबित डीए-डीआर की अद्यतन किस्तें केंद्रीय दर के अनुरूप जारी करने का निर्देश दिया था। इसके लिए दो सप्ताह का समय दिया गया था। अदालत ने कहा था कि देरी होने पर बकाया राशि पर छह प्रतिशत सालाना साधारण ब्याज देना होगा। इससे पहले एकल पीठ ने बकाया भुगतान के लिए तीन महीने की समय सीमा तय की थी, जो अब समाप्त हो चुकी है।
     
    पूर्व आदेश का पालन नहीं होने और अनुपालन शपथपत्र दाखिल न किए जाने पर अदालत ने पंजाब के मुख्य सचिव को पांच अक्तूबर को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया है। 

  • सेना से 7 साल में निकाले गए जवान की विधवा को बड़ी राहत, हाईकोर्ट ने 42 साल बाद पेंशन का हक माना

    सेना से 7 साल में निकाले गए जवान की विधवा को बड़ी राहत, हाईकोर्ट ने 42 साल बाद पेंशन का हक माना

    चंडीगढ़ 

    पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने सेना से महज सात साल की सेवा के बाद अमान्य होकर बाहर किए गए जवान की विधवा की पेंशन का रास्ता चार दशक से अधिक समय बाद साफ कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि सैनिक ने दस साल की न्यूनतम अर्हकारी सेवा पूरी नहीं की थी, उसे अमान्य पेंशन के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।

    मामले में सैनिक की होशियारपुर निवासी विधवा ने करीब 42 साल बाद अपने पति के पेंशन संबंधी अधिकार के लिए कानूनी लड़ाई शुरू की थी। मामला ऐसे सैनिक का है, जो 18 अगस्त 1971 को भारतीय सेना में भर्ती हुआ था। वर्ष 1978 में उसे सेना से अमान्य घोषित कर सेवा से बाहर कर दिया गया था। उसे उस समय अमान्य ग्रेच्युटी और मृत्यु-सह-सेवानिवृत्ति ग्रेच्युटी का भुगतान किया गया था। 

    बाद में उसकी विधवा ने अपने पति को मिलने वाले पेंशन लाभ का दावा किया। केंद्र सरकार ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि सैनिक ने दस साल की अर्हकारी सेवा पूरी नहीं की थी। इसके अलावा सरकार ने यह भी आपत्ति उठाई कि विधवा ने पेंशन के लिए करीब 42 साल की देरी से दावा किया।

    हाईकोर्ट ने मामले पर विचार करते हुए कहा कि कानून की स्थापित स्थिति के अनुसार अमान्य पेंशन के लिए दस साल की सेवा पूरी होना अनिवार्य बाधा नहीं है। अदालत ने मामले में पेंशन अधिकार को केवल देरी के आधार पर खत्म करने के बजाय लागू पेंशन नियमों और पहले से स्थापित न्यायिक सिद्धांतों को महत्व दिया। 

     

     

     

  • सिर्फ अधिसूचना से नहीं छिन सकती नौकरी, JPSC-JSSC CGL मामले में हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

    सिर्फ अधिसूचना से नहीं छिन सकती नौकरी, JPSC-JSSC CGL मामले में हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

    रांची
    झारखंड हाईकोर्ट के जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने जेपीएससी और जेएसएससी सीजीएल परीक्षाओं के विज्ञापन को रद्द करने के राज्य सरकार की अधिष्टा को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की मामले की सुनवाई के दौरान अदालत में प्रार्थियों व राज्य सरकार का पक्ष सुना पक्ष सुनने के बाद अदालत ने अधिसूचना पर रोक को अगले आदेश तक बरकरार रखा.

    सिर्फ अधिसूचना से नौकरी नहीं छिन सकती: हाईकोर्ट
    अदालत ने कहा कि सिर्फ एक अधिसूचना से सरकार विभिन्न विभागों में नियुक्त हो चुके अभ्यार्थियों को बिना नेचुरल जस्टिस का पालन किये सेवा से नहीं हटा सकती. अदालत ने एसआईटी जांच के मामले में नोडल अधिकारी बनाया है. वहीं नियुक्त अभ्यर्थियों की किसी तरह की परेशानियों के समाधान की मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी रिटायर जस्टिस गौतम कुमार चौधरी को दी गई है. अदालत ने कहा है कि अगर एसआईटी किसी अभ्यर्थी को अनावश्यक परेशान करती है, तो वे जस्टिस गौतम चौधरी के पास अपनी शिकायत कर सकते हैं. मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को 11:30 बजे से होगी.

    अगली सुनवाई 7 अक्टूबर
    अदालत ने सभी पक्षों की सहमति से मामले की अगली सुनवाई के लिए 7 अक्टूबर की तिथि निर्धारित की. राज्य सरकार की ओर से मामले में शपथ पत्र दायर किया गया जिस पर प्रति उत्तर दायर करने के लिए प्रार्थियों की ओर से समय देने का आग्रह किया गया, जिसे अदालत में स्वीकार कर लिया.

    दोनों पक्षों ने अदालत में रखा अपना पक्ष
    राज्य सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट की वरीय अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा व महाधिवक्ता रोहित राय ने पक्ष रखा, जबकि प्रार्थियों की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री पटवालिया, पूर्व महाधिवक्ता राजीव रंजन, अधिवक्ता इंद्रजीत सिन्हा, अधिवक्ता अमृतांश वत्स एवं अन्य ने पैरवी की. उल्लेखनीय है कि प्रार्थी आकाश गौरव एवं अन्य, निरोज खेस एवं अन्य की ओर से अलग-अलग याचिका दायर कर राज्य सरकार की योजना को चुनौती दी गई है.

  • रांची की 5.13 एकड़ जमीन का म्यूटेशन बरकरार, हाईकोर्ट ने निजी पक्षों को दी छूट

    रांची की 5.13 एकड़ जमीन का म्यूटेशन बरकरार, हाईकोर्ट ने निजी पक्षों को दी छूट

     रांची
     झारखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने रांची के नामकुम अंचल स्थित 5.13 एकड़ जमीन के म्यूटेशन से जुड़े मामले में फैसला सुनाते हुए एकल पीठ के आदेश को रद कर दिया।

    खंडपीठ ने रॉबर्ट एंथनी बारला की ओर से दायर अपील को स्वीकार करते हुए 15 अक्टूबर 2025 के फैसले को निरस्त कर दिया, जिसमें एकल पीठ ने उपायुक्त, भूमि सुधार उप-समाहर्ता और अंचल अधिकारी के म्यूटेशन के आदेशों को रद कर दिया गया था। खंडपीठ ने निजी प्रतिवादियों को संबंधित जमीन को लेकर लंबित टाइटल सूट में अपना दावा रखने की छूट दी है।

    मामला रांची के मौजा-गुंडू, थाना-हटिया की खाता संख्या 16 की जमीन से संबंधित है। कुल 26.53 एकड़ जमीन वर्ष 1944 में विरोनिका तिर्की ने रजिस्टर्ड सेल डीड के माध्यम से खरीदी थी। इसमें से 8.80 एकड़ जमीन रोमन कैथोलिक मिशन को दान कर दी गई।

    विरोनिका तिर्की की वर्ष 1983 में मृत्यु के बाद उनके चार पुत्रों ने शेष 17.73 एकड़ जमीन का पारिवारिक बंटवारा कर लिया। इसमें 5.13 एकड़ जमीन जॉन फ्रांसिस कुजूर के हिस्से में आई। जॉन फ्रांसिस कुजूर की मृत्यु के बाद वर्ष 1992 में उक्त जमीन का सक्सेशन म्यूटेशन उनकी पत्नी डॉ. लुईसा बारला कुजूर के नाम हुआ। उनके नाम म्यूटेशन को रद कराने के लिए जान के भाइयों ने जमाबंदी केस दायर किया था, जिसे वर्ष 2007 में खारिज कर दिया गया।

    डॉ. लुईसा बारला कुजूर की मृत्यु के बाद उनके कथित दत्तक पुत्र राबर्ट एंथनी बारला ने जमीन के लिए सक्सेशन म्यूटेशन का आवेदन दिया। नामकुम के अंचल अधिकारी ने 16 जनवरी 2017 को म्यूटेशन उनके नाम कर दिया। इसके खिलाफ अपील और रिवीजन भी खारिज हो गई। निजी प्रतिवादियों की ओर से दायर रिट याचिका पर एकल पीठ ने राजस्व अधिकारियों के तीनों आदेशों को रद कर दिया था।

    अदालत ने रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि एकल पीठ ने इस तथ्य को गलत समझा कि राबर्ट बारला के पक्ष में म्यूटेशन ट्रांसफर के आधार पर किया गया था। जबकि म्यूटेशन आवेदन और संबंधित दस्तावेजों से स्पष्ट था कि आवेदन सक्सेशन म्यूटेशन के लिए किया गया था।

    अदालत ने कहा कि म्यूटेशन केस में 16 जनवरी 2017 के आदेश में जमीन को बेचने और सेल डीड का उल्लेख होना टाइपिंग या अनजाने में हुई त्रुटि प्रतीत होती है। राजस्व कर्मचारी की रिपोर्ट में भी राबर्ट बारला को लुईसा बारला कुजूर का एकमात्र कानूनी उत्तराधिकारी और जमीन पर कब्जे में बताया गया था। इसी रिपोर्ट के आधार पर अंचल अधिकारी ने म्यूटेशन किया था।