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  • पंजाब में कांग्रेस प्रदर्शन पर पुलिस एक्शन, वॉटर कैनन से खदेड़ा

    पंजाब में कांग्रेस प्रदर्शन पर पुलिस एक्शन, वॉटर कैनन से खदेड़ा

    चंडीगढ़.

    पंजाब कांग्रेस के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ शुक्रवार को चंडीगढ़ के सेक्टर-17 में किए जा रहे प्रदर्शन के दौरान स्थिति तनावपूर्ण हो गई। चुनाव आयोग कार्यालय की ओर बढ़ रहे कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं को रोकने के लिए पुलिस ने कई स्तरों पर बैरिकेडिंग की।

    प्रदर्शनकारियों ने आगे बढ़ने का प्रयास किया तो पुलिस ने वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। इसके बाद पुलिस ने पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग समेत कई वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं को हिरासत में लेना शुरू कर दिया। पंजाब कांग्रेस के प्रभारी सचिन पायलट के नेतृत्व में निकले इस विरोध मार्च में पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा शामिल नहीं हुए जबकि डॉ राजकुमार वेरका, परगट सिंह समेत कुछ नेता और बड़ी संख्या में कार्यकर्ता शामिल हुए।

    वाटर कैनन का किया प्रयोग
    पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को चुनाव आयोग कार्यालय तक पहुंचने से रोकने के लिए सेक्टर-17 में सुरक्षा का कड़ा घेरा बनाया था। जैसे ही कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने बैरिकेड पार करने की कोशिश की, पुलिस ने उन्हें पीछे धकेलना शुरू किया। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए वाटर कैनन का भी इस्तेमाल किया गया। इसके बाद कई नेताओं को पुलिस वाहनों में बैठाकर थाने ले जाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। प्रदर्शन को देखते हुए चंडीगढ़ पुलिस और अतिरिक्त सुरक्षा बलों की भारी तैनाती की गई थी। कई स्तरों पर पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था। कांग्रेस की मांग है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाया जाए, उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हो और कार्रवाई की जाए। पार्टी मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) को लेकर भी लगातार सवाल उठा रही है।

    मतदाता सूची पुनरीक्षण पर भी सवाल
    पंजाब कांग्रेस विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर भी लगातार सवाल उठा रही है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने विधानसभा चुनाव तक विशेष गहन पुनरीक्षण रोकने और पिछली मतदाता सूचियों के आधार पर चुनाव कराने की मांग की है। कांग्रेस की ओर से यह प्रदर्शन ऐसे समय किया जा रहा है, जब चुनाव आयोग के भीतर विशेष गहन पुनरीक्षण समेत कुछ प्रक्रियाओं को लेकर आयुक्तों की आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आई है। चुनाव आयोग ने कहा है कि तकनीकी टिप्पणियां और सवाल बहुसदस्यीय संस्था की सामान्य कार्यप्रणाली का हिस्सा हैं तथा विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े अंतिम निर्णय तीनों आयुक्तों की सहमति से लिए गए हैं।

  • कांग्रेस प्रभारी भगत का CG दौरा 27 से, संगठन पदाधिकारियों संग करेंगे बैठक

    कांग्रेस प्रभारी भगत का CG दौरा 27 से, संगठन पदाधिकारियों संग करेंगे बैठक

    रायपुर.

    लोकसभा सांसद सुखदेव भगत छत्तीसगढ़ कांग्रेस प्रभारी नियुक्त किए जाने के बाद पहली बार 27 सितंबर को प्रदेश आ रहे हैं. तीन दिवसीय प्रवास के दौरान छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पदाधिकारियों के साथ मैराथन बैठक करेंगे.

    जारी किए गए शेड्यूल के अनुसार, तीन दिवसीय प्रवास के दौरान पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी, ज़िला कांग्रेस कमेटी अध्यक्षों, संगठनों एवं विभागों प्रमुखों के अलावा कनेक्ट सेंटर टीम के साथ बैठक करेंगे. इसके अलावा वरिष्ठ नेताओं के साथ वन-टू-वन भी बैठक करेंगे. सुखदेव भगत के आगमन को देखते हुए पार्टी पदाधिकारियों ने भव्य स्वागत की तैयारी शुरू कर दी है.

    धरसीवा ब्लॉक कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष आशीष वर्मा ने बताया कि पार्टी के प्रदेश प्रभारी भगत के प्रथम छत्तीसगढ़ आगमन पर उनके ऐतिहासिक एवं भव्य स्वागत की तैयारी की जा रही हैं.

  • चीमा की बर्खास्तगी और गिरफ्तारी की मांग, सचिन पायलट के नेतृत्व में कांग्रेस का मार्च आज

    चीमा की बर्खास्तगी और गिरफ्तारी की मांग, सचिन पायलट के नेतृत्व में कांग्रेस का मार्च आज

    चंडीगढ़
     पंजाब कांग्रेस के नए प्रभारी सचिन पायलट मंगलवार को पहली बार पंजाब पहुंच रहे हैं और उनके आगमन के साथ ही कांग्रेस ने सरकार के खिलाफ बड़ा विरोध प्रदर्शन करने की तैयारी की है।

    पंजाब कांग्रेस भवन सेक्टर-15 से वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा के आवास की ओर प्रस्तावित मार्च को देखते हुए चंडीगढ़ में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। प्रदर्शन में प्रदेशभर से बड़ी संख्या में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया है।

    पुलिस ने प्रदर्शन स्थल और मार्च के संभावित मार्ग पर चार से पांच स्तर की सुरक्षा व्यवस्था की है। पंजाब कांग्रेस भवन से करीब एक किलोमीटर पहले ही भारी संख्या में पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।

    बड़ी संख्या में कार्यकर्ता मौजूद
    सुरक्षा व्यवस्था में चंडीगढ़ पुलिस के साथ अर्धसैनिक बलों की टुकड़ियां भी लगाई गई हैं। प्रशासन की ओर से किसी भी स्थिति से निपटने के लिए वाटर कैनन समेत अन्य इंतजाम भी किए गए हैं।
    बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के पहुंचने के कारण सेक्टर-15 और आसपास के इलाकों में यातायात प्रभावित होना शुरू हो गया है।

    करीब 11:30 बजे सचिन पायलट के पंजाब कांग्रेस भवन पहुंचने की उम्मीद है। उनके साथ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, सुखजिंदर सिंह रंधावा, प्रताप सिंह बाजवा समेत पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के प्रदर्शन में शामिल होने की संभावना है।

    कांग्रेस गुलजार सिंह मामले में वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा को मंत्रिमंडल से बर्खास्त करने, उनकी गिरफ्तारी और मामले की स्वतंत्र जांच की मांग को लेकर यह प्रदर्शन कर रही है। पार्टी इसे कानून-व्यवस्था और सरकार के खिलाफ अपने अभियान को तेज करने के तौर पर भी देख रही है।

    8 सितंबर को भी हुआ था प्रदर्शन
    इससे पहले आठ सितंबर को भी कांग्रेस ने चंडीगढ़ में सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया था। उस दौरान राजा वड़िंग समेत 150 से अधिक कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया था।

    हालांकि, मंगलवार का प्रदर्शन राजनीतिक रूप से ज्यादा अहम माना जा रहा है, क्योंकि नए प्रभारी सचिन पायलट की मौजूदगी में पंजाब कांग्रेस के लगभग सभी बड़े नेताओं के एक मंच पर आने की संभावना है।

    यह प्रदर्शन आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के लिहाज से कांग्रेस का शक्ति प्रदर्शन भी माना जा रहा है। इससे पार्टी के भीतर नेताओं की सक्रियता, गुटों की ताकत और चुनावी रणनीति की दिशा का संकेत मिलने की उम्मीद है।

     

  • पंजाब में कांग्रेस के सामने फिर वही पुरानी चुनौती, गुटबाजी के बीच नेतृत्व बदलाव की मांग; क्या दोहराएगा इतिहास?

    पंजाब में कांग्रेस के सामने फिर वही पुरानी चुनौती, गुटबाजी के बीच नेतृत्व बदलाव की मांग; क्या दोहराएगा इतिहास?

    चंडीगढ़ 
    पंजाब की सियासत में कांग्रेस एक बार फिर उसी दोराहे पर खड़ी दिख रही है, जहां वह 2022 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले खड़ी थी. कांग्रेस ने पांच साल पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर चरणजीत सिंह चन्नी को सत्ता की कमान सौंपी थी, लेकिन नवजोत सिंह सिद्ध की नाराजगी दूर नहीं हो सकी और कांग्रेस को सत्ता गंवानी पड़ गई थी. अब कांग्रेस ने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठन में बदलाव शुरू। 

    कांग्रेस में नेतृत्व के टकराव के मुद्दे को सुलझाने के नाम पर पार्टी आलाकमान फैसले ले रहा है. भूपेश बघेल को हटाकर पार्टी ने सचिन पायलट को पंजाब का प्रभारी बना दिया है. इसके बाद भी चन्नी खेमा राजा वडिंग को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने की मांग कर रहा है। 

    पंजाब विधानसभा चुनाव की सियासी तपिश के बीच कांग्रेस के सामने सियासी संकट खड़ा हो गया है. इस समय जहां चुनाव की तैयारी में राजनीतिक दल जुटे हैं, तो कांग्रेस अभी संगठन में ही उलझी है. कांग्रेस प्रभारी के बाद प्रदेश अध्यक्ष बदलती है तो मामला सुलझने से ज्यादा कहीं उलझ न जाए और फिर से उसे कहीं 'चेकमेट' का सामना न करना पड़ जाए?

    पांच साल पहले वाली गलती दोहरा रही कांग्रेस
    पंजाब में कांग्रेस एक बार फिर उसी मुकाम पर खड़ी है, जिसने 2021 में पार्टी को गहरे राजनीतिक संकट में डाल दिया था. उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच चली लंबी खींचतान ने कांग्रेस को कमजोर कर दिया था. पार्टी नेतृत्व ने संगठन में अचानक बदलाव किए थे. मुख्यमंत्री से लेकर प्रदेश अध्यक्ष तक बदल दिए थे, लेकिन नतीजा यह हुआ कि पार्टी पूरी तरह बिखर और आम आदमी पार्टी (AAP) ने प्रचंड बहुमत हासिल कर कांग्रेस का किला ढहा दिया। 

    2022 में कांग्रेस को करारी मात खानी पड़ी थी. अब फिर कुछ वैसे ही हालत नजर आ रहे हैं. इस बार पूर्व सीएम चरणजीत सिंह चन्नी ने कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है. साल 2021 में कांग्रेस ने इसी तरह की गुटबाजी को खत्म करने के लिए बदलाव किया था. अब फिर से कांग्रेस बदलाव कर मामले को सुलझाने की कवायद शुरू की है, जिसमें भूपेश बघेल को हटाकर सचिन पायलट को प्रभारी बनाया है। 

    चुनावी माहौल में बदलाव महंगा न पड़ जाए
    कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष को लेकर भी बदलने की चर्चा है, लेकिन यह बदलाव 2021 की तरह महंगा न पड़ जाए. पंजाब विधानसभा चुनाव को अब छह महीने से भी कम समय है. कांग्रेस हाईकमान ने करीब दो महीने के सियासी मंथन के बाद और राहुल गांधी ने पंजाब के एक-एक नेता से दिल्ली में बैठक कर फीडबैक लिया. इसके बाद एक जुलाई को राजा वडिंग को प्रदेश अध्यक्ष और चरणजीत सिंह चन्नी को कैंपेन कमेटी का चेयरमैन नियुक्त किया. इसके बाद से चन्नी गुट ने वड़िंग को हटाने की मांग उठा दी, जो सियासी टेंशन का सबब बना हुआ। 

    बता दें कि पंजाब के 2022 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 18 सीटें मिली थी, जो राज्य में पार्टी का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन रहा था. आम आदमी पार्टी ने 92 सीटों के साथ शानदार जीत हासिल कर सरकार बनाई थी। 2022 के बाद कांग्रेस में कोई नेता प्रदेश अध्यक्ष की कमान लेने को तैयार नहीं था. ऐसे में राहुल गांधी ने राजा वडिंग को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया था। 

    राजा वडिंग ने पंजाब में सिर्फ संगठन की बागडोर ही नहीं संभाली बल्कि 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को राज्य की 13 में से 7 लोकसभा सीटें जिताकर अपना लोहा भी मनवाया था, जबकि चरणजीत चन्नी 2022 के चुनाव हार के बाद पंजाब छोड़कर विदेश चले गए थे और रंधावा राजस्थान का प्रभार संभाल रहे थे. ऐसे में राजा वडिंग ने काफी मशक्कत कर कांग्रेस को खड़ा किया, लेकिन 2027 चुनाव की सियासी सरगर्मी बढ़ने के साथ ही चन्नी ने प्रदेश अध्यक्ष बदलने का मोर्चा खोल दिया है। 

    चन्नी समर्थक विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने और वडिंग को हटाने की मांग को लेकर पार्टी नेतृत्व पर दबाव बना रहे हैं. ऐसे में प्रभारी रहे भूपेश बघेल गुटबाजी को दूर करने में नाकाम रहे और विवाद इतना बढ़ा कि पार्टी आलाकमान को सचिन पायलट को नया प्रभारी नियुक्त करना पड़ा. इसके बाद कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष को बदलने की चर्चा चल रही है, लेकिन चुनाव से ठीक पहले बिहार में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष को बदलकर अपना हश्र देख चुकी है. ऐसे में क्या पंजाब में जोखिम भरा कदम उठाएगी?

    पंजाब की सत्ता में वापसी पर कहीं न लग जाए ग्रहण
    पंजाब की सियासत का इतिहास गवाह है कि जब-जब कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों से ठीक पहले शीर्ष नेतृत्व और प्रदेश अध्यक्ष के चेहरे पर अनिश्चितता पैदा की है, तब-तब उसे भारी नुकसान उठाना पड़ा है. चन्नी खेमे की मांग है कि राज्य में दलित वोटों और समीकरणों को ध्यान में रखते हुए नेतृत्व में बदलाव किया जाए या चन्नी को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जाए। 

    वहीं, कांग्रेस हाईकमान के सामने जाट सिख और दलित नेतृत्व के बीच संतुलन साधने की बड़ी चुनौती बनी हुई है. पिछले 2022 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जाट सिख की जगह चन्नी को आगे कर दलित दांव खेला था, लेकिन सफल नहीं रहा. कांग्रेस का परंपरागत मतदाता जाट सिख नाराज होकर आम आदमी पार्टी के साथ चला गया. चन्नी अपने दलित समुदाय को भी साधकर नहीं रख सके। 

    पंजाब में जाट सिख और दलित केमिस्ट्री में उलझी
    पंजाब में जाट सिख का दांव हमेंशा सफल रहा है. आजादी के बाद से पंजाब में जब-जब कांग्रेस ने जाट सिख चेहरे को आगे कर चुनाव लड़ा, पार्टी को पूर्ण बहुमत के साथ बड़ी सफलता मिली. 2002 और 2017 के विधानसभा चुनावों में जाट सिख नेतृत्व ने मालवा, माझा और दोआबा के ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस का आधार मजबूत किया। 

    पंजाब की ग्रामीण आबादी, कृषि अर्थव्यवस्था और किसान-समर्थित वोट बैंक में जाट सिख समुदाय का दबदबा माना जाता है. इस वर्ग से चेहरा आगे करने पर अकाली दल और आम आदमी पार्टी के पारंपरिक ग्रामीण वोट बैंक में सेंध लगाना आसान रहता है। 

    2022 में पार्टी ने चुनावों से ठीक पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर चरणजीत सिंह चन्नी (जो रामदासिया दलित सिख समुदाय से आते हैं) को मुख्यमंत्री बनाया था, इसके बाद भी दलित समाज का वोट कांग्रेस को नहीं मिल सका। 

    पंजाब में लगभग 32 फीसदी दलित आबादी होने के बावजूद यह प्रयोग चुनावी जीत में नहीं बदल सका. कांग्रेस को 2022 में अब तक की सबसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा और पार्टी केवल 18 सीटों पर सिमट गई. ग्रामीण जाट सिख वोटों का एक बड़ा हिस्सा आम आदमी पार्टी (भगवंत मान – जाट सिख चेहरा) की तरफ शिफ्ट हो गया. ऐसे में कांग्रेस ने जाट सिख चेहरे के तौर पर अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को आगे किया। इसका नतीजा 2024 के लोकसभा चुनाव में दिखा, जब कांग्रेस 7 सीटें जीतने में सफल रही। 

    2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के अंदर जारी खींचतान के पीछे यही बहस है कि क्या कांग्रेस को अपने कोर जाट सिख फॉर्मूले पर ही कायम रहना चाहिए या दलित नेतृत्व को दोबारा बड़ी जिम्मेदारी देकर नया सामाजिक समीकरण तैयार करना चाहिए. सचिन पायलट के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे बिना कोई बड़ा नुकसान किए सभी धड़ों को एक मंच पर लाएं, वरना इतिहास खुद को दोहराने में देर नहीं लगााएगा। 

  • MP विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी कांग्रेस, 70 कमजोर सीटें चिन्हित; BJP के सामने 35 सीटों की चुनौती

    MP विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी कांग्रेस, 70 कमजोर सीटें चिन्हित; BJP के सामने 35 सीटों की चुनौती

     भोपाल
     मध्य प्रदेश में वर्ष 2028 के विधानसभा चुनाव के लिए अब लगभग दो वर्ष ही बचे हैं। ऐसे में पिछले चुनाव में करारी हार झेल चुकी कांग्रेस ने उन सीटों पर अभी से जोर लगाना शुरू कर दिया है, जिन पर वह कभी नहीं जीती या एक-दो बार ही जीती है। ऐसी 70 सीटों की पहचान की गई है। पार्टी सबसे पहले इन विधानसभा क्षेत्रों में घर-घर मतदाता सूची का सत्यापन करेगी।

    इंदौर में 19 सितंबर को प्रस्तावित राहुल गांधी के दौरे के बाद पार्टी इन सीटों पर फोकस करेगी। मतदाताओं के नाम, फोन नंबर सहित उनकी जानकारी संकलित की जाएगी, जिससे उनसे संपर्क किया जा सके।

    बता दें कि वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में कुल 230 सीटों में से 66 ही कांग्रेस को मिली थीं। कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती हैं ये विधानसभा सीटें भोपाल की गोविंदपुरा विधानसभा सीट पर 1980 से भाजपा का कब्जा है। यहां पहले बाबूलाल गौर और पिछले दो बार से उनकी बहू कृष्णा गौर विधायक हैं। सागर की रहली विधानसभा सीट से भाजपा के गोपाल भार्गव 1985 से लगातार जीत रहे हैं। इंदौर-2 विधानसभा सीट 1993 से भाजपा के पास है।

    घर-घर जाकर मतदाता सूची का सत्यापन करेंगे पार्टी कार्यकर्ता
    महामंत्री एवं संगठन प्रभारी, प्रदेश कांग्रेस, डॉ. संजय कामले ने कहा कि पार्टी ने ऐसी 70 विधानसभा सीटें चिह्नित की हैं, जिनमें प्रदर्शन कमजोर रहा है। पार्टी इन सीटों पर कभी नहीं जीती या अभी तक में एक-दो बार ही जीती हैं। इन सीटों पर सबसे पहले मतदाता सूची के सत्यापन के लिए अभियान चलाया जाएगा जो लगभग छह माह चलेगा।

    भाजपा के लिए 35 सीटों पर चुनौती
    भाजपा ने भी जनसंघ के समय से नहीं जीती या बहुत कम बार जीती 35 सीटों की पहचान की है। इन सीटों की जिम्मेदारी बड़े नेताओं को दी जाएगी। चार-चार गांवों का क्लस्टर गठित कर एक प्रभारी बनाया जाएगा जो कमजोरियों की पहचान कर दूर करने का प्रयास करेगा।

    दरअसल, भाजपा ने वर्ष 2028 के विधानसभा चुनाव में खुद को मजबूत बनाने के लिए माइक्रो-प्लानिंग रणनीति बनाई है। पार्टी का लक्ष्य प्रत्येक बूथ पर 51 प्रतिशत वोट शेयर हासिल करना है। इसके लिए "पन्ना प्रमुखों" को सक्रिय कर घर-घर संपर्क अभियान चलाया जा रहा है। अल्पसंख्यक और जातिगत समीकरण को देखते हुए इन सीटों पर प्रभावी जाति समूहों एससी-एसटी व अन्य को साधने के लिए नजदीकी विधायकों को सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे पहुंचाने का निर्देश दिया गया है।

    मंत्रियों की तैनाती भी इन "कठिन" सीटों पर की गई है। संगठन के दिग्गज मंत्रियों और कोर ग्रुप के सदस्यों को प्रभारी बनाया गया है ताकि वे जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का भरोसा जीत सकें।

    सीटें जो भाजपा के लिए हैं चुनौती
    गुना जिले की राघौगढ़ विधानसभा सीट पर 1977 से कांग्रेस का कब्जा है। सीधी जिले की चुरहट विधानसभा सीट से भाजपा सिर्फ दो बार जीत पाई है। भोपाल की उत्तर विधानसभा सीट वर्ष 1998 से कांग्रेस के पास है। कसरावद भीकनगांव में 2013 से लगातार कांग्रेस जीती है। बड़वानी के राजपुर से बाला बच्चन भी लगातार तीन बार से जीते हैं।

     

  • ‘एक डिप्टी सीएम’ वाले बयान ने बढ़ाई हलचल, कर्नाटक कांग्रेस में नए समीकरणों की चर्चा

    ‘एक डिप्टी सीएम’ वाले बयान ने बढ़ाई हलचल, कर्नाटक कांग्रेस में नए समीकरणों की चर्चा

    बेंगलुरु
    पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य सिद्दारमैया के डिप्टी सीएम के केवल एक पद बनाए जाने संबंधी बयान ने राजनीतिक गलियारों में चर्चा छेड़ दी है। कई लोग इसे सिद्दारमैया के कांग्रेस में फिर से अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने के संकेत के रूप में देख रहे हैं। बुधवार को सिद्दारमैया के बयान का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। मंगलवार को आंतरिक आरक्षण पर आयोजित एक सेमिनार में बोलते हुए सिद्दारमैया ने जी. परमेश्वर को एकमात्र डिप्टी मुख्यमंत्री बनाए जाने के फैसले का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पहले चार से पांच डिप्टी सीएम पद बनाने का प्रस्ताव था।

    अनुसूचित जाति के नेता के मुख्यमंत्री न बनने का मुद्दा उठा
    कार्यक्रम में जब सिद्दारमैया आंतरिक आरक्षण के माध्यम से वंचित वर्गों के लिए किए गए अपने योगदान पर बोल रहे थे, तभी एक श्रोता ने कर्नाटक में अब तक किसी अनुसूचित जाति के नेता के मुख्यमंत्री न बनने का मुद्दा उठाया और उनसे इस विषय पर आंदोलन शुरू करने की मांग की। इस पर सिद्दारमैया ने पूछा कि क्या वे इस मुद्दे से परिचित हैं और सुझाव दिया कि उन्हें खुद आंदोलन शुरू करना चाहिए। जब मौजूद लोगों ने उन्हें आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए कहा तो उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह यह काम अकेले नहीं कर सकते।

    सुझाव को किया खारिज
    जब एक श्रोता ने कहा कि पार्टी में सिद्दारमैया की स्थिति हाईकमान जैसी है और इसलिए वे पहल कर सकते हैं, तो उन्होंने इस सुझाव को खारिज करते हुए कहा कि लोग सिर्फ बातें कर रहे हैं। इसी दौरान सिद्दारमैया ने एक अहम सवाल पूछा कि जी परमेश्वर को डिप्टी मुख्यमंत्री का पद किसने दिलाया? गौरतलब है कि परमेश्वर राज्य के प्रमुख दलित नेताओं में से एक हैं। मुख्यमंत्री पद के लिए अपना नाम न चुने जाने पर उन्होंने नाराजगी जताई थी, लेकिन साथ ही यह भी कहा था कि वह पार्टी हाईकमान के फैसले का सम्मान करेंगे।

    डिप्टी सीएम बनवाने में सिद्दारमैया की भूमिका
    इस सवाल पर श्रोताओं ने जवाब दिया कि परमेश्वर को डिप्टी सीएम बनवाने में सिद्दारमैया की भूमिका थी। इसके बाद सिद्दारमैया ने याद दिलाया कि चार से पांच डिप्टी मुख्यमंत्री पद बनाने की योजना थी। उन्होंने पूछा कि केवल परमेश्वर को ही डिप्टी मुख्यमंत्री बनाने पर जोर किसने दिया था। श्रोताओं ने फिर जवाब दिया कि यह फैसला भी सिद्दारमैया ने ही लिया था। इस बातचीत पर मौजूद लोगों ने तालियां बजाईं और तब से यह राजनीतिक चर्चाओं का विषय बन गया है। सिद्दारमैया की टिप्पणियों को कांग्रेस में उनके मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद हुए राजनीतिक घटनाक्रमों के संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि, पद छोड़ने के बाद वह काफी हद तक लो-प्रोफाइल रहे हैं, लेकिन सेमिनार में उनके इस बयान ने अटकलें तेज कर दी हैं कि क्या वह पार्टी में फिर से अधिक सक्रिय भूमिका निभाने जा रहे हैं।

    बेटे यतींद्र सिद्दारमैया को मंत्रिमंडल में शहरी विकास विभाग सौंपा
    यह भी उल्लेखनीय है कि सिद्दारमैया के बेटे यतींद्र सिद्दारमैया को मंत्रिमंडल में शहरी विकास विभाग सौंपा गया है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि आने वाले दिनों में सिद्दारमैया विशेष रूप से अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित समुदायों का सामाजिक-राजनीतिक मंच के माध्यम से अपनी राजनीतिक सक्रियता और प्रभाव को और मजबूत कर सकते हैं। माना जा रहा है कि यह मुख्यमंत्री शिवकुमार के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है।

     

  • MP Congress: प्रदेश कार्यकारिणी भंग करने की तैयारी, 5 घंटे की बैठक में Gen-Z रणनीति पर हुआ लंबा मंथन

    MP Congress: प्रदेश कार्यकारिणी भंग करने की तैयारी, 5 घंटे की बैठक में Gen-Z रणनीति पर हुआ लंबा मंथन

    भोपाल
     कांग्रेस के प्रकोष्ठ और विभागों को पांच अगस्त को भंग किए जाने के बाद अब इसी सप्ताह पार्टी की प्रदेश कार्यकारिणी (पीसीसी) को भी भंग किया जाएगा। इसमें उपाध्यक्ष, महासचिव, सचिव सहित अन्य पदाधिकारी शामिल हैं। एक से दो माह में नई कार्यकारिणी बनेगी। इसके बाद प्रकोष्ठ और विभागों का पुनर्गठन किया जाएगा।

    इसमें कार्यकर्ताओं की भी राय ली जाएगी। प्रमुख पदाधिकारियों के चयन के लिए तीन-तीन नामों का पैनल बनेगा, जिसमें एक के नाम को केंद्रीय नेतृत्व हरी झंडी देगा। यह निर्णय मंगलवार को पीसीसी में कांग्रेस की राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) की बैठक में लिया गया है। बैठक में समिति के कुछ सदस्यों ने यह भी कहा कि नाम लिए जाते हैं, पर जब चयन होता है तो कोई और चेहरा आ जाता है। ऐसा नहीं होना चाहिए।

    जेन-जी पर फोकस
    पांच घंटे तक चली बैठक में लगभग ढाई घंटे की चर्चा जेन-जी यानी युवाओं पर पर केंद्रित रही। तय किया गया है जबलपुर या इंदौर में जेन-जी से संवाद के लिए 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा, जिसमें लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को भी बुलाने की तैयारी है। युवाओं के जिलेवार सम्मेलन भी होंगे। बैठक में कमल नाथ, दिग्विजय सिंह, अरुण यादव व्यक्तिगत कारणों से सम्मिलित नहीं हुए।

    अनुशासन तोड़ने वालों पर होगी कड़ी कार्रवाई
    बैठक में जन आंदोलन के मुद्दे और नगरीय निकाय चु
    नाव की तैयारियों पर भी चर्चा की गई। इसमें तय किया गया है कि अनुशासन तोड़ने वाले कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाए। इंटरनेट मीडिया पर विवादित पोस्ट डालने वालों को चिह्नित किया जाएगा। इस पर भी सहमति बनी है कि अन्य विभागों की तरह एससी विभाग की भी कमेटी बनेगी। संभागीय स्तर पर चल रहे प्रशिक्षण शिविरों में रीवा में राहुल गांधी को बुलाने पर चर्चा हुई।

    बैठक में किसने क्या कहा
    प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी ने संगठन सृजन अभियान की समीक्षा की। विभाग का प्रकोष्ठों के पुनर्गठन में साफ छवि वालों के नाम तय करने के लिए कहा। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा दतिया उपचुनाव प्रदेश में बदलाव के संकेत हैं। इससे कार्यकर्ताओं में उत्साह है। इसका लाभ आगामी नगरीय निकाय चुनाव में मिलेगा।

    नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि केन-बेतवा परियोजना में विस्थापित परिवारों के लिए पार्टी लड़ेगी। राज्य सभा सदस्य विवेक तन्खा ने युवा आंदोलन चलाने और सोनम वांगचुक को शामिल करने का सुझाव दिया। महिला कांग्रेस की अध्यक्ष रीना बौरासी ने जिला कार्यकारिणी के गठन की प्रगति बताई।

    बैठक में कांतिलाल भूरिया, कमलेश्वर पटेल, सज्जन सिंह वर्मा, संगठन प्रभारी संजय कामले, एनएसयूआइ के प्रदेश अध्यक्ष आशुतोष चौकसे सहित प्रमुख पदाधिकारी शामिल हुए।

    संभावित तीन-तीन उम्मीदवारों के नाम तय होंगे
    बैठक में अगले वर्ष होने वाले नगरीय निकाय चुनाव की तैयारियों को लेकर भी लंबी चर्चा हुई। इसमें तय किया गया है कि जिलाध्यक्ष अभी से एससी, एसटी, ओबीसी और अनारक्षित श्रेणी के तीन-तीन नाम चिह्नित कर लें, जिससे आरक्षण निर्धारित होने के बाद प्रत्याशी चयन में जल्दबाजी नहीं हो। दतिया उपचुनाव की तरह ही नगरीय निकाय चुनावों में क्लस्टर और बूथ प्रबंधन का माडल अपनाया जाएगा।

    जनआंदोलनों की बनी रूपरेखा, उज्जैन में होगा बड़ा आंदोलन
    बैठक में पार्टी ने जनआंदोलन के लिए मुद्दे भी निर्धारित किए हैं। पत्रकारों से बातचीत में पार्टी के प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी ने आरोप लगाया कि उज्जैन में मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव के विरूद्ध पार्टी उज्जैन में बड़ा प्रदर्शन करेगी। राम मंदिर में चंदा घोटाला, केन-बेतवा लिंक परियोजना में विस्थापित परिवारों की समस्याएं, किसानों को खाद-बीज की उपलब्धता कम होने, कथित पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर बेवजह 62 लाख पुलिस प्रकरण भाजपा सरकार के समय दर्ज किए जाने, छात्र संघ चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से कराए जाने, युवाओं की समस्याओं की लेकर अलग-अलग तरह से आंदोलन की रणनीति बनी है।

     

  • दतिया में कांग्रेस का बड़ा फैसला, पूर्व विधायक राजेंद्र भारती सस्पेंड; आज आएंगे उपचुनाव के नतीजे

    दतिया में कांग्रेस का बड़ा फैसला, पूर्व विधायक राजेंद्र भारती सस्पेंड; आज आएंगे उपचुनाव के नतीजे

    दतिया 

     दतिया विधानसभा उपचुनाव के नतीजे आने से ठीक एक दिन पहले कांग्रेस पार्टी के भीतर चल रही अंदरूनी कलह खुलकर सामने आ गई है। कांग्रेस ने यहां के पूर्व विधायक राजेंद्र भारती को पार्टी ने निलंबित कर दिया है। राजेंद्र भारती ने कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी और वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ सार्वजनिक टिप्पणी की थी।

    पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित
    अनुशासनहीनता और पार्टी उम्मीदवार के खिलाफ सार्वजनिक रूप से बयानबाजी करने के गंभीर आरोपों के चलते कांग्रेस आलाकमान ने कड़ा कदम उठाते हुए पूर्व विधायक राजेंद्र भारती को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया है। निलंबन का यह आदेश कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव एवं मध्य प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी की ओर से जारी किया गया है।

    क्या है पूरा मामला?
    दतिया विधानसभा उपचुनाव के लिए 30 जुलाई को मतदान संपन्न हुआ था और 3 अगस्त को मतों की गिनती होनी है। मतदान प्रक्रिया पूरी होने के तुरंत बाद कांग्रेस प्रत्याशी कुंवर घनश्याम सिंह ने पार्टी हाईकमान को एक लिखित शिकायत भेजी थी।  शिकायत में कांग्रेस प्रत्याशी ने पूर्व विधायक राजेंद्र भारती पर गंभीर भितरघात और पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया था। कुंवर घनश्याम सिंह का आरोप था कि राजेंद्र भारती ने पार्टी को हरवाने के लिए बीजेपी से फंडिंग ली और सोची-समझी साजिश के तहत कांग्रेस के खिलाफ काम किया। प्रत्याशी ने उन्हें पार्टी से पूरी तरह निष्कासित करने की मांग की थी, जिसके बाद संगठन ने यह कार्रवाई की है।

    राजेंद्र भारती का पलटवार
    दूसरी ओर राजेंद्र भारती ने निलंबन और आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा था कि घनश्याम सिंह संभावित हार के डर से इस तरह की अनर्गल बयानबाजी कर रहे हैं। उन्होंने उल्टा आरोप मढ़ते हुए कहा कि घनश्याम सिंह ने स्वयं पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा की सहमति से चुनाव लड़ा है और उनके पूरे चुनावी फंड मैनेजमेंट में भी बीजेपी से जुड़े लोगों की ही मुख्य भूमिका रही है।

    ​परिणामों से ठीक पहले हुए इस बड़े राजनीतिक घटनाक्रम और गुटबाज़ी ने दतिया के सियासी पारे को और बढ़ा दिया है। अब सभी की निगाहें 3 अगस्त को आने वाले नतीजों पर टिक गई हैं।

  • दिल्ली में गठबंधन, बंगाल में मुकाबला; कांग्रेस-टीएमसी की राजनीति पर विपक्ष में बहस तेज

    दिल्ली में गठबंधन, बंगाल में मुकाबला; कांग्रेस-टीएमसी की राजनीति पर विपक्ष में बहस तेज

     नई दिल्ली

    INDIA ब्लॉक की बैठक से एक तस्वीर आई है, जिसमें ममता बनर्जी और सोनिया गांधी गले मिल रही हैं. ममता बनर्जी का चेहरा सामने होने के कारण भाव का पता चल रहा है, लेकिन सोनिया गांधी के मन में क्या चल रहा है, कैमरे के सामने नहीं होने के कारण नहीं मालूम। 

    मीटिंग में ममता बनर्जी को सोनिया गांधी की ठीक बगल में सीट दी गई थी. सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ बैठी हैं. मल्लिकार्जुन खड़गे के पास राहुल गांधी और अखिलेश यादव को सीट मिली थी. ममता बनर्जी के लिए मुस्कुराने का मौका सिर्फ उस हाल के अंदर था, जहां मीटिंग हो रही थी. बाहर तो जैसे बर्बादी की सुनामी आई हुई थी. पश्चिम बंगाल में राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय के इस्तीफे के बीच दिल्ली में तृणमूल कांग्रेस के सांसद बीजेपी नेता भूपेंद्र यादव से मिलने पहुंचे थे – और गौर करने वाली बात यह थी कि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी मौजूद थे। 

    ममता बनर्जी के चेहरे पर थोड़े सुकून के जो भाव थे, उसकी वजह कांग्रेस से मिल रहा सपोर्ट समझा जा सकता है. मुश्किल यह है कि ममता बनर्जी को कांग्रेस से सपोर्ट सिर्फ दिल्ली में ही मिल रहा है, पश्चिम बंगाल में नहीं. ऐसा क्यों?

    दिल्ली में दोस्ती, कोलकाता में दुश्मनी
    2024 के आम चुनाव से पहले राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा पर निकले थे. पश्चिम बंगाल में राहुल गांधी के दाखिल होने से ठीक पहले ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के अकेले दम पर लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी थी. मतलब, कांग्रेस के साथ कोई चुनावी गठबंधन नहीं. लेकिन, इंडिया ब्लॉक छोड़ने जैसी कोई बात नहीं कही गई थी. नीतीश कुमार की तरह. तब राहुल गांधी के बिहार पहुंचने से पहले नीतीश कुमार महागठबंधन छोड़कर एनडीए में शामिल हो गए थे. चुनावों के दौरान ममता बनर्जी का व्यवहार भी नीतीश कुमार जैसा ही था. ममता बनर्जी का स्टैंड अघोषित था। 

    ममता बनर्जी ने अपने जानी सियासी दुश्मन कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी के खिलाफ गुजरात से लाकर पूर्व क्रिकेटर इरफान पठान को मैदान में उतार दिया. अधीर रंजन चौधरी चुनाव हार गए, और कांग्रेस ने एक सीट गंवा दी. कांग्रेस ने बंगाल में एक सीट भले खो दी, लेकिन बाकी राज्यों में 2014 और 2019 के मुकाबले बेहतरीन प्रदर्शन किया. हां, अधीर रंजन चौधरी चुनाव जीत गए होते तो कांग्रेस का शतक पूरा हो गया होता. चुनावी गठबंधन की उम्मीद न होने के बावजूद कांग्रेस नेता ममता बनर्जी के मामले में हमलावर होने से परहेज करते देखे गए. ममता बनर्जी के व्यवहार में तो कोई तब्दीली नहीं आई, लेकिन राहुल गांधी को पूरा संयम बरतते देखा गया। 

    तृणमूल कांग्रेस ने भी 2019 के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन करते हुए बीजेपी को पांच साल बाद कम ही सीटों पर समेट दिया. कांग्रेस की हार के लिए खुद को जिम्मेदार मानते हुए कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने वाले राहुल गांधी लोकसभा में विपक्ष के नेता भी बन गए. लेकिन, स्पीकर के चुनाव में कांग्रेस के विपक्ष की तरफ से अपना उम्मीदवार उतार देने पर ममता बनर्जी खफा हो गई। 

    तब ममता बनर्जी की नाराजगी दूर करने के लिए राहुल गांधी ने खुद फोन किया, और फिर वो मान भी गईं. बाद के दिनों में ममता बनर्जी अपनी जरूरत के हिसाब से इंडिया ब्लॉक से कभी बाहर तो कभी भीतर होने का एहसास दिलाती रहीं. और, पश्चिम बंगाल चुनाव आते आते कांग्रेस के लिए नो-एंट्री की फिर से घोषणा कर दी. लेकिन, उस स्थिति में भी ममता बनर्जी चाहती थीं कि कांग्रेस मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग लाने की पहल करे. हां, महिला आरक्षण संशोधन और परिसीमन बिल के खिलाफ ममता बनर्जी कांग्रेस के साथ डटकर खड़ी रहीं, और बीजेपी की केंद्र सरकार का बिल गिर गया। 

    ममता बनर्जी को भी अब ये तो समझ में आ गया है कि फिलहाल कांग्रेस के साथ मिलकर चलने में ही भलाई है, वरना पश्चिम बंगाल में तो जो हो रहा है, देश देख ही रहा है. कांग्रेस के साथ जो होना था, वह तो 2014 में ही हो गया था. जो कुछ बचा था, वह 2019 में हो गया. राहुल गांधी अमेठी से चुनाव हार गए. अगर वायनाड से चुनाव नहीं लड़े होते तो लोकसभा से दूर ही रहना पड़ा होता. कुछ दिनों के लिए तो संसद की सदस्यता भी गंवानी पड़ी थी। 

    दिल्ली में तो नहीं, लेकिन पश्चिम बंगाल चुनाव कैंपेन के दौरान राहुल गांधी ने कुछ दिन के लिए अपनी सदस्यता चले जाने के साथ साथ अपने खिलाफ चल रहे मुकदमों का जोर देकर जिक्र किया, और पूछा – क्या ममता बनर्जी के साथ ये सब होता है?

    इंडिया ब्लॉक की मीटिंग से पहले दिल्ली पहुंचते ही ममता बनर्जी ने आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल से मुलाकात की. ममता बनर्जी हमेशा ही अरविंद केजरीवाल को विपक्षी खेमे में साथ रखने की पक्षधर रही हैं. विपक्ष की बैठकों में भी ममता बनर्जी को अरविंद केजरीवाल की पैरवी करते देखा गया है. लेकिन, राहुल गांधी का व्यवहार ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल से एक जैसा ही देखने को मिला है. 2025 का दिल्ली विधानसभा चुनाव और हालिया पश्चिम बंगाल चुनाव मिसाल हैं – राहुल गांधी ममता बनर्जी के खिलाफ उन्हीं मुद्दों के साथ हमलावर दिखे, जिन मुद्दों के साथ दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के खिलाफ थे। 

    बंगाल में कांग्रेस बनाम तृणमूल कांग्रेस
    जैसे दिल्ली चुनाव में राहुल गांधी ने अरविंद केजरीवाल पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों और शीशमहल के बहाने हमला बोला था, पश्चिम बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी ही उनके निशाने पर देखी गईं. पश्चिम बंगाल में राहुल गांधी ने ममता बनर्जी पर भ्रष्टाचार और बीजेपी की मददगार होने का भी इल्जाम लगाया था। 

    2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले तो राहुल गांधी ने अधीर रंजन चौधरी को भेजा ही खास मकसद से था. तब अधीर रंजन चौधरी लोकसभा में कांग्रेस और विपक्ष के नेता हुआ करते थे. लेकिन, चुनाव से पहले उनको पश्चिम बंगाल कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया था. और, इस बार के चुनाव में भी बंगाल यूनिट को खुली छूट दी गई थी. अधीर रंजन को तो पश्चिम बंगाल अध्यक्ष पद से पहले ही हटा दिया गया था, लेकिन मोर्चे पर वो भी डटे हुए थे – और अब भी वैसे ही आक्रामक बने हुए हैं। 

    राहुल गांधी ने बाकी राज्यों की तरह पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार तो नहीं किया, लेकिन जमकर बरसे जरूर. एक रैली में राहुल गांधी कह रहे थे, केवल कांग्रेस पार्टी बीजेपी से लड़ती है… मैं बेल पर हूं… मेरा घर छीन लिया. लोकसभा की सांसदी छीन ली, मेरे ऊपर 36 मुकदमे हैं. हर 10 से 15 दिन में कहीं न कहीं मुकदमा लड़ने जाना पड़ता है… मैं आपसे पूछना चाहता हूं… ममता जी के खिलाफ नरेंद्र मोदी ने कितने मुकदमे कराए हैं?

    हालांकि, चुनाव नतीजे आ जाने के बाद राहुल गांधी का भी रुख बदल गया था. सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में राहुल गांधी ने कुछ कांग्रेस नेताओं के खुश होने पर नाखुशी जताई थी. और, ममता बनर्जी के निष्पक्ष मतदान पर सवाल उठाने का समर्थन भी किया था. और, अब इंडिया ब्लॉक का नजारा तो देखा ही जा रहा है। 

    राहुल गांधी यह भी नहीं भूले होंगे कि कैसे हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव हार जाने के बाद ममता बनर्जी ने इंडिया ब्लॉक में उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाए थे, और कांग्रेस को चैलेंज करते हुए खुद लीड करने की पेशकश कर डाली थी. और, तब लालू यादव जैसे नेताओं ने बनर्जी का सपोर्ट भी किया था. लेकिन, दिल्ली चुनाव हार जाने के बाद अरविंद केजरीवाल, बिहार की हार के बाद तेजस्वी यादव और बंगाल की हार के बाद ममता बनर्जी सभी एक ही मोड़ पर पहुंच गए हैं. कांग्रेस अपनी जगह पर बनी हुई है. बल्कि, विधानसभा चुनावों के बाद केरल में सरकार भी बना चुकी है. विपक्षी खेमे में सिर्फ कांग्रेस के पास चार राज्यों में सरकार है, और झारखंड में हेमंत सोरेन हैं। 

    राहुल गांधी ने ममता बनर्जी की हार पर खुश होने के लिए भले ही कांग्रेस नेताओं को फटकार लगाई हो, लेकिन अधीर रंजन बंगाल की धरती से ममता बनर्जी को फिर से कांग्रेस में शामिल होकर तृणमूल कांग्रेस का विलय कर लेने की सलाह दे डाली है. ममता बनर्जी को भी समझ में आ ही रहा होगा कि कांग्रेस नेतृत्व बंगाल में अलग और दिल्ली में अलग व्यवहार कर रहा है, जबकि बीजेपी इस मामले में एक जैसा सलूक कर रही है। 

  • राज्यसभा चुनाव से पहले राजनीतिक हलचल, कांग्रेस की बढ़त मामूली; BJP ने तेज की जोड़तोड़ राजनीति

    राज्यसभा चुनाव से पहले राजनीतिक हलचल, कांग्रेस की बढ़त मामूली; BJP ने तेज की जोड़तोड़ राजनीति

    भोपाल
    कांग्रेस मध्यप्रदेश से राज्यसभा की अपनी एक सीट बचाने की जद्दोजहद में लगी हुई है। वर्तमान सांसद दिग्विजय सिंह के दोबारा राज्यसभा जाने से इंकार करने के बाद से उम्मीदवार पर सहमति बनाने की प्रक्रिया चल रही है। कांग्रेस में दो स्तरों पर जद्दोजहद जारी है, पहला उम्मीदवार के नाम पर आम सहमति बनाना और दूसरा क्रॉस वोटिंग को रोकना। प्रदेशाध्यक्ष जीतू पटवारी ने पहले प्रदेश के दिग्गज नेताओं से रायशुमारी की, इसके बाद 5 मई को दिल्ली में हुई बैठक में उम्मीदवार का फैसला हो गया है। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार पार्टी में राज्यसभा उम्मीदवार तय हो गया है। पार्टी, मध्यप्रदेश के ही सर्वस्वीकार्य और व्यापक जनाधार वाले नेता को आगे करेगी।

    राज्यसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद प्रदेश कांग्रेस में सक्रियता बढ़ी है। संभावित उम्मीदवार के लिए जल्द बैठक आयोजित की जाएगी। इसमें उम्मीदवारों नामों पर चर्चा कर प्रस्ताव एआइसीसी को भेजे जाएंगे।

    कांग्रेस में सर्वसम्मति बनाने और क्रॉस वोटिंग रोकने पर पूरा जोर

    कांग्रेस खेमे में अभी भी उम्मीदवार के नामों को लेकर ऊहापोह की स्थिति है। इतना ही नहीं, बीजेपी भी उनका खेल बिगाड़ने की कवायद में जुटी हुई है। चर्चा यहां तक है कि कांग्रेस की सीट हासिल करने के लिए बीजेपी डमी प्रत्याशी उतार सकती है।

    सिर्फ 4 विधायक ज्यादा, बीना से विधायक निर्मला सप्रे के दलबदल और मुकेश मल्होत्रा के वोटिंग अधिकार निलंबन व राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त होने के बाद कांग्रेस के विधायक घट गए

    दरअसल कांग्रेस के पास अपनी राज्यसभा सीट बचाए रखने के लिए पर्याप्त संख्या बल तो है पर वरिष्ठ नेताओं को इसमें सेंधमारी का डर सता रहा है। मध्यप्रदेश में कुल 230 विधानसभा सीटें हैं। एक सदस्य को राज्यसभा भेजने के लिए 58 विधायक जरूरी हैं। बीना से विधायक निर्मला सप्रे के दलबदल और मुकेश मल्होत्रा के वोटिंग अधिकार निलंबन व राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त होने के बाद कांग्रेस के विधायक घट गए हैं। पार्टी के पास वोट डालने वाले अब 62 विधायक ही बचे हैं जोकि एक सदस्य को जिताने की जरूरी संख्या से चार ही अधिक हैं।

    क्रॉस वोटिंग के कारण कांग्रेस अपनी सीट गंवा सकती है, इसलिए पार्टी नेता अतिरिक्त सतर्कता बरत रहे

    हरियाणा-उड़ीसा में क्रॉस वोटिंग और बिहार में विधायकों की अनुपस्थिति के कारण कांग्रेस को झटका लग चुका है। अब मप्र में भी पार्टी को इसका डर सता रहा है। क्रॉस वोटिंग के कारण कांग्रेस अपनी सीट गंवा सकती है, इसलिए पार्टी नेता अतिरिक्त सतर्कता बरत रहे हैं।