Category: विदेश

  • मिडिल ईस्ट में बढ़ा तनाव, ‘नो रिटर्न’ पॉलिसी के बाद ईरान संग नए युद्ध की आशंका?

    मिडिल ईस्ट में बढ़ा तनाव, ‘नो रिटर्न’ पॉलिसी के बाद ईरान संग नए युद्ध की आशंका?

    यरुशलम
    पश्चिम एशिया में एक बार फिर तनाव बढ़ता दिखाई दे रहा है. इजरायल ने साफ कर दिया है कि उसकी सेना अब गाजा, दक्षिणी लेबनान और सीरिया से पीछे नहीं हटेगी. इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज ने ऐलान किया है कि IDF इन तीनों इलाकों में बनाए गए सुरक्षा क्षेत्रों में अनिश्चित समय तक तैनात रहेगी. यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका स्थायी युद्धविराम की कोशिशों में जुटा है और कई देश तनाव कम करने की अपील कर रहे हैं। 

    लेकिन इजरायल का जवाब साफ है. पहले सुरक्षा, फिर कूटनीति. इजरायल काट्ज ने कहा कि जब तक इजरायल को अपने नागरिकों की सुरक्षा की पूरी गारंटी नहीं मिलती, तब तक सेना की वापसी का सवाल ही नहीं उठता. उन्होंने ईरान को भी सीधी चेतावनी दी. अगर ईरान या उसके सहयोगी इन सुरक्षा क्षेत्रों पर हमला करते हैं, तो इजरायल "पूरी ताकत" से जवाब देगा। 

    इजरायली शासन की तरफ से इस तरह के विवादित बयान नए नहीं. चाहे वो प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू हों, रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज हों या नेतन्याहू सरकार के अन्य मंत्री, सभी की एक भाषाएं सुनने को मिल जाती हैं. वो इजरायल काट्ज हैं जिन्होंने पूरे लेबनान को जलाने की चेतावनी दी, वो पीएम नेतन्याहू ही हैं जिन्होंने पूरे फिलिस्तीन और ईरान को मिटा देने तक की बात की. तो आइए समझतें हैं कि आखिर लेबनान, गाजा और सीरिया से इजरायली सेना वापसी क्यों नहीं करेगी और नेतन्याहू शासन का प्लान क्या है। 

    गाजा में शुरू जंग लेबनान-ईरान तक फैली
    गाजा में जंग अक्टूबर 2023 में हमास के हमले के बाद शुरू हुई थी. लेकिन यह बहुत पहले ही साफ हो चुका है कि यह आतंकवाद विरोधी अभियान नहीं रह गया है. इजरायल के ऊर्जा मंत्री एली कोहेन के मुताबिक, गाजा के करीब 70 फीसदी हिस्से पर इजरायली सेना का नियंत्रण है. सरकार का अगला लक्ष्य 100 फीसदी नियंत्रण हासिल करना बताया जा रहा है। 

    इजरायल की रणनीति तीन हिस्सों में बंटी हुई है.
    पहला, हमास की सैन्य ताकत पूरी तरह खत्म करना. दूसरा, बंधकों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करना. तीसरा, सीमा पर स्थायी सुरक्षा बफर बनाना ताकि भविष्य में 7 अक्टूबर जैसा हमला दोबारा न हो. हालांकि इसकी कीमत बहुत भारी रही है. गाजा में हजारों लोगों की मौत हो चुकी है. बड़ी आबादी विस्थापित हो चुकी है. भोजन, दवाइयों और ईंधन की भारी कमी बनी हुई है. इजरायल का कहना है कि यह दबाव हमास को कमजोर करने के लिए जरूरी है। 

    लेबनान में अब पीछे हटने को तैयार नहीं इजरायल
    दूसरा बड़ा मोर्चा दक्षिणी लेबनान है. मार्च महीने में हिजबुल्लाह और इजरायल के बीच संघर्ष फिर तेज हो गया. इसके बाद इजरायल ने जमीनी सैन्य अभियान शुरू किया. अब रक्षा मंत्री काट्ज का कहना है कि जब तक पूरे लेबनान में हिजबुल्लाह पूरी तरह हथियार नहीं रख देता, तब तक सेना वापस नहीं जाएगी. यानी सिर्फ सीमा से हटना अब इजरायल का लक्ष्य नहीं है. वह चाहता है कि हिजबुल्लाह की सैन्य क्षमता पूरी तरह खत्म हो। 

    इस युद्ध में लेबनान को भारी नुकसान हुआ है. लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक करीब 4,300 लोगों की मौत हो चुकी है. वहीं इजरायल के भी 38 सैनिक और एक नागरिक ठेकेदार मारे गए हैं. इसके बावजूद तेल अवीव अपने फैसले पर अड़ा हुआ है। 

    सीरिया में 'लो-नॉइज ऑक्यूपेशन'
    तीसरा मोर्चा सीरिया है. यहां इजरायल की रणनीति थोड़ी अलग है. दिसंबर 2024 में बशर अल-असद सरकार के कमजोर पड़ने के बाद इजरायल ने सीमा से लगे बफर जोन में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है.रिपोर्ट्स के मुताबिक, इजरायल अब करीब 235 वर्ग किलोमीटर इलाके में प्रभावी नियंत्रण बनाए हुए है. इसमें माउंट हर्मोन से लेकर यरमूक नदी तक का क्षेत्र शामिल बताया जाता है। 

    विशेषज्ञ इसे "लो-नॉइज ऑक्यूपेशन" कहते हैं. यानी इजरायल सीरिया में बिना बड़े युद्ध के धीरे-धीरे जमीन पर पकड़ मजबूत कर रहा है. बताया जाता है कि दिसंबर 2024 से जनवरी 2026 के बीच इजरायल ने सीरिया के भीतर 800 से ज्यादा सैन्य अभियान चलाए. कुछ अभियान सीमा से 60 किलोमीटर से ज्यादा अंदर तक पहुंचे. इजरायल का कहना है कि यह कदम "जिहादी संगठनों" को सीमा से दूर रखने के लिए उठाया गया है। 

    लेबनान-गाजा की जंग में ईरान का क्या रोल?
    गाजा में हमास. लेबनान में हिजबुल्लाह और सीरिया में ईरान समर्थित कई सशस्त्र गुट. इजरायल इन तीनों को ईरान के "एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस" का हिस्सा मानता है. यही वजह है कि तेल नेतन्याहू शासन इन तीनों मोर्चों को एक साथ देख रहा है. काट्ज ने साफ कहा कि अगर ईरान ने सीधे हमला किया, तो जवाब भी सीधे ईरान को मिलेगा। 

    दूसरी तरफ ईरान ने भी कड़ा रुख दिखाया है. ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि अगर ईरान के लोगों या नेतृत्व को निशाना बनाया गया, तो जवाब तुरंत और पूरी ताकत से दिया जाएगा. यानी दोनों देशों की भाषा लगातार आक्रामक होती जा रही है. यही सबसे बड़ी चिंता है। 

    क्या अमेरिका की बात अब नहीं सुन रहा इजरायल?
    अमेरिका लगातार युद्धविराम की कोशिश कर रहा है. संयुक्त राष्ट्र भी सैन्य वापसी की मांग कर चुका है. लेकिन इजरायल फिलहाल किसी दबाव में झुकता नहीं दिख रहा. काट्ज ने साफ कहा कि इजरायल ने कभी अमेरिका से अपने युद्ध लड़ने को नहीं कहा. इसलिए सुरक्षा से जुड़े फैसले भी वही खुद करेगा. यानी अब इजरायल अपनी स्वतंत्र सुरक्षा नीति पर आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। 

    इजरायल की नई "नो-एग्जिट डॉक्ट्रिन" पूरे मध्य पूर्व की राजनीति बदल सकती है. अगर सेना लंबे समय तक गाजा, लेबनान और सीरिया में बनी रहती है, तो इन इलाकों का सुरक्षा संतुलन पूरी तरह बदल जाएगा. लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है. जितना लंबा सैन्य कब्जा रहेगा, उतना ही ईरान और उसके सहयोगी संगठनों के साथ टकराव का खतरा बढ़ेगा. यही वजह है कि अब पूरी दुनिया की नजर एक सवाल पर टिकी है कि क्या यह रणनीति इजरायल को सुरक्षा देगी, या फिर पश्चिम एशिया को एक और बड़े युद्ध की तरफ धकेल रही है?

     

  • Pakistan-Afghanistan Tension: पाक हमलों के जवाब में तालिबान का एक्शन, ड्रोन से ISIS ठिकानों पर एयरस्ट्राइक

    Pakistan-Afghanistan Tension: पाक हमलों के जवाब में तालिबान का एक्शन, ड्रोन से ISIS ठिकानों पर एयरस्ट्राइक

    काबुल 

    पड़ोसी देश पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच जारी सैन्य टकराव के कारण अब हालात काफी तनावपूर्ण हैं. अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने दावा किया है कि उसने पाकिस्तानी सीमा के भीतर घुसकर आतंकी संगठन ISIS-K के ठिकानों पर बड़ी एयरस्ट्राइक की है. तालिबान के मुताबिक,  इन ठिकानों से अफगानिस्तान में नागरिकों पर हमलों की साजिश रची जा रही थी. यह दावा पाकिस्तान के हालिया हवाई हमलों के दो दिन बाद सामने आया है, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ सकता है। 

    तालिबान का कहना है कि यह बड़ी सैन्य कार्रवाई पाकिस्तान के बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा प्रांतों में की गई है. अफगानिस्तान के न्यूज चैनल 'टोलो न्यूज' ने भी इस दावे की पुष्टि की है. रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान के ड्रोन विमानों ने सीधे उन ठिकानों को हिट किया जहां ISIS-K के आतंकी छिपे थे. खैबर पख्तूनख्वा के सरान इलाके में तो एक स्कूल को मलबे में तब्दील कर दिया गया, क्योंकि आतंकी उसे अपना गुप्त ठिकाना बनाकर रह रहे थे. तालिबान ने साफ किया कि इस हमले में कई आतंकी ढेर हुए हैं, जबकि किसी भी आम नागरिक को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है। 

    पाकिस्तान के हमले का करारा पलटवार

    तालिबान का यह बड़ा एक्शन रविवार को पाकिस्तान द्वारा की गई बमबारी का नतीजा माना जा रहा है. दरअसल, दो दिन पहले पाकिस्तान ने अफगानिस्तान की सीमा में घुसकर ताबड़तोड़ हवाई हमले किए थे. संयुक्त राष्ट्र (UNAMA) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान की उस कार्रवाई में कम से कम 28 बेकसूर लोग मारे गए थे और कई घायल हुए थे. वहीं, अफगानिस्तान के सरकारी प्रवक्ता हमदुल्लाह फितरत ने मरने वाले नागरिकों की संख्या 38 बताई थी, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे. तालिबान के इस ताजा एक्शन को उसी पाकिस्तानी हमले का सीधा और करारा जवाब माना जा रहा है। 

    सोमवार को भारत ने भी इस मामले पर कड़ी प्रतिक्रिया दी. भारतीय विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर अफगानिस्तान पर हुए पाकिस्तानी हमलों की निंदा की. भारत का कहना है कि किसी दूसरे देश की सीमा में घुसकर हमला करना उसकी संप्रभुता का सीधा उल्लंघन है, जिससे पूरे इलाके की शांति खतरे में पड़ती है. भारत ने साफ शब्दों में कहा कि पाकिस्तान अपनी घरेलू नाकामियों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए पड़ोसियों पर ऐसे हमले करता रहा है। 

    फिलहाल, पाकिस्तान हमेशा की तरह आरोप लगा रहा है कि अफगानिस्तान आतंकियों को पनाह दे रहा है, जबकि तालिबान का कहना है कि आतंकवाद पाकिस्तान की खुद की पैदा की हुई अंदरूनी समस्या है. अब इस ताजा एयरस्ट्राइक के बाद दोनों देशों के बीच जंग का खतरा और ज्यादा बढ़ गया है। 

  • America Weather Alert: 115°F जैसी महसूस हो रही गर्मी, भीषण हीटवेव से 6 करोड़ लोगों पर संकट

    America Weather Alert: 115°F जैसी महसूस हो रही गर्मी, भीषण हीटवेव से 6 करोड़ लोगों पर संकट

    वाशिंगटन 
    अमेरिका इस समय साल की सबसे खतरनाक हीटवेव का सामना कर रहा है. देश के पूर्वी और मध्य हिस्सों में भीषण गर्मी ने जनजीवन को प्रभावित कर दिया है. मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि कई इलाकों में तापमान से ज्यादा खतरनाक गर्मी का एहसास होगा, जहां ह्यूमिडिटी की वजह से लोगों को 115 डिग्री फारेनहाइट यानी करीब 46 डिग्री सेल्सियस जैसी गर्मी महसूस होगी। 

    अमेरिका की नेशनल वेदर सर्विस (NWS) ने चेतावनी दी है कि आने वाले दिनों में 18 राज्यों में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ सकती है. हालात इतने गंभीर हैं कि 6 करोड़ से ज्यादा लोगों के लिए हीट अलर्ट जारी किया गया है। 

    मौसम विभाग के मुताबिक, कई इलाकों में तापमान 38 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाएगा. लेकिन असली चिंता तापमान नहीं, बल्कि हीट इंडेक्स को लेकर है. ज्यादा नमी यानी ह्यूमिडिटी की वजह से लोगों को गर्मी 115 डिग्री फारेनहाइट यानी करीब 46 डिग्री सेल्सियस जैसी महसूस होगी। 

    अमेरिका की नेशनल वेदर सर्विस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी चेतावनी में कहा है कि देश के पूर्वी दो-तिहाई हिस्से में खतरनाक और कई जगह रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ने वाली है. एजेंसी के मुताबिक, यह हीटवेव 4 जुलाई यानी अमेरिका के स्वतंत्रता दिवस वाले लंबे वीकेंड तक जारी रह सकती है। 

    दिन तो दिन, रात में भी नहीं मिलेगी राहत
    मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि दिन ही नहीं, रातों में भी राहत नहीं मिलेंगी. कई शहरों में रात का तापमान भी 80 डिग्री फारेनहाइट यानी करीब 27 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहेगा. इसका मतलब है कि लोगों को रात के समय भी गर्मी से राहत नहीं मिलेगी, जिससे हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन का खतरा काफी बढ़ जाएगा। 

    NWS के मुताबिक, हीट इंडेक्स वह पैमाना है जिसमें एक्चुअल तापमान के साथ हवा में मौजूद नमी को भी शामिल किया जाता है. इसलिए कई बार थर्मामीटर पर तापमान कम दिखाई देता है, लेकिन शरीर को उससे कहीं ज्यादा गर्मी महसूस होती है. यही वजह है कि इस बार हीट इंडेक्स 100 से 110 डिग्री फारेनहाइट तक रहने का अनुमान है, जबकि कुछ इलाकों में यह 115 डिग्री तक पहुंच सकता है। 

    हीट एग्जॉशन और जानलेवा हीट स्ट्रोक का खतरा
    स्वास्थ्य एजेंसियों ने लोगों से अपील की है कि वे धूप में निकलने से बचें, खूब पानी पिएं, एयर कंडीशनर या ठंडी जगहों पर रहें और बुजुर्गों, बच्चों और बीमार लोगों का खास ध्यान रखें. डॉक्टरों का कहना है कि लंबे समय तक तेज धूप में रहने से हीट क्रैम्प्स, हीट एग्जॉशन और जानलेवा हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। 

    दिलचस्प बात यह है कि जहां अमेरिका का पूर्वी हिस्सा आग उगलती गर्मी से जूझ रहा है, वहीं पश्चिमी हिस्से में मौसम बिल्कुल उल्टा है. मौसम विभाग के मुताबिक, पश्चिमी राज्यों में तापमान सामान्य से 20 से 35 डिग्री फारेनहाइट तक कम रहने का अनुमान है. हालांकि देश के बड़े हिस्से में फिलहाल सबसे बड़ी चिंता यही खतरनाक हीटवेव बनी हुई है, जिसने करोड़ों लोगों की दिनचर्या प्रभावित कर दी है और आने वाले कई दिनों तक राहत मिलने के आसार भी कम नजर आ रहे हैं। 

  • क्या डॉलर के बुरे दिन शुरू? दुनिया के कई केंद्रीय बैंक घटा सकते हैं डॉलर पर निर्भरता

    क्या डॉलर के बुरे दिन शुरू? दुनिया के कई केंद्रीय बैंक घटा सकते हैं डॉलर पर निर्भरता

    न्यूयॉर्क

    क्‍या डॉलर के बुरे दिन शुरू होने वाले हैं, अब डॉलर दुनिया में दबदबे वाली करेंसी नहीं रहेगी या क्‍या दुनिया को डॉलर का विकल्‍प मिल गया है? एक रिपोर्ट में ऐसा खुलासा किया गया है, जिसके बाद आपके भी मन में ये सभी सवाल घूमने लगेंगे. रॉयटर्स की रिपोर्ट में एक सर्वे के हवाले से कहा गया है कि दुनिया अब डॉलर रिजर्व को कम करने की तैयारी कर रही है. दुनिया में ऐसा पहली बार होने जा रहा है। 

    यह सर्वे ऑफिशियल मॉनिटरी एंड फाइनेंशियल इंस्टिट्यूशंस फोरम (OMFIF) की ओर से की गई है. इस सर्वे में कहा गया है कि पहली बार दुनिया के केंद्रीय बैंक आने वाले 10 सालों में अपने विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) में अमेरिकी डॉलर की हिस्‍सेदारी बढ़ाने के बजाय घटाने की योजना बना रहे हैं, जो यह संकेत देता है कि फॉरेक्‍स रिजर्व पोर्टफोलियो को दुनिया डाइवर्सिफाइड रखना चाहती है। 

    पहले क्‍यों होती थी सिर्फ डॉलर बढ़ाने की बात? 
    दरअसल, दुनिया में सबसे स्थिर करेंसी डॉलर मानी जाती रही है और पूरी दुनिया डॉलर में ही एक दूसरे देश से कारोबार कर रहे हैं. चाहे तेल का आयात हो या किसी फूड आइटम्‍स का निर्यात डॉलर में ही लेनदेन होता रहा है, लेकिन अब स्थिति‍ धीरे-धीरे बदल रही है. कई देश लोकल करेंसी में आयात-निर्यात करना शुरू कर चुके हैं और अमेरिका के दबाव वाली राजनीति से नाराज भी दिख रहे हैं. सर्वे में खुलासा हुआ है कि ऐसा पहली बार है कि ज्‍यादातर देश डॉलर होल्डिंग्‍स को अगले 10 साल में कम करने जा रहे हैं। 

    क्‍यों हो रही डॉलर घटाने की बात? 
    सर्वे के अनुसार, केंद्रीय बैंकों को तीन बड़े रि
    स्‍क दिखाई दे रहे हैं, जो डॉलर को लेकर पैदा हुए हैं. इसमें सबसे बड़ा अमेरिकी राजनीतिक अनिश्‍चतता, जिससे डॉलर की स्थिर रहने पर सवाल खड़ा हुआ है. दुसरा कई देशों के साथ अमेरिका का जियो-पॉलिटिकल टेंशन, जिस कारण डॉलर में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. खासकर ईरान जंग के दौरान डॉलर में अस्थिरता काफी दिखाई दी है. तीसरी सबसे बड़ी वजह ग्‍लोबल फाइनेंशियल सिस्‍टम का मल्‍टीपोलर होना यानी ज्‍यादातर देश अब सिर्फ डॉलर नहीं, बल्कि अलग-अलग करेंसी में एक दूसरे के साथ ट्रेड कर रहे हैं. इसका सीधा मतलब है कि दुनियाभर के देश अब सिर्फ डॉलर पर निर्भर नहीं रहना चाहते हैं। 

    डॉलर की जगह कौन-कौन सी करेंसी ज्‍यादा पसंद हैं 
    अभी डॉलर का विकल्‍प स्‍पष्‍ट तौर पर दिखाई नहीं देता है, लेकिन अगर ऐसा ही रहा तो बहुत जल्‍द दुनिया डॉलर को पीछे छोड़कर किसी दूसरे करेंसी की ओर बढ़ेगी. सर्वे में कहा गया है कि डॉलर की जगह सबसे ज्‍यादा पसंद किए जाने वाली चीजों में सोना, यूरो, ब्रिटिश पाउंड, चीनी युआन, नॉर्वे की क्रोन और न्‍यूजीलैंड डॉलर है. हालांकि, सर्वे का यह भी कहना है कि यूरो और युआन की अपनी लिमिटेशन हैं, यही कारण है कि वे डॉलर का पूर्ण विकल्‍प नहीं बन पाए हैं। 

    सोने का बढ़ रहा रिजर्व
    रॉयटर्स की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस सर्वे से पहले एक अन्‍य सर्वे में कहा गया है कि रिकॉर्ड संख्या में केंद्रीय बैंक अपने गोल्ड रिजर्व बढ़ाने की योजना बना रहे हैं. कई देशों के लिए सोना अब जियो-पॉलिटिकल रिस्‍क के खिलाफ सुरक्षा और रिजर्व को डाइवर्सिफाई रखने का प्रमुख साधन बनता जा रहा है। 

    डॉलर का वजूद मिट जाएगा?
    रिपोर्ट में कहा गया है कि अभी तक ऐसा नहीं दिखाई देता है कि डॉलर का प्रभुत्‍व दुनिया से खत्‍म हो जाएगा, क्‍यों डॉलर अभी दुनिया की सबसे बड़ी रिजर्व करेंसी है. अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निवेश और सुरक्षित निवेश के रूप में उसकी भूमिका बहुत मजबूत बनी हुई है. बदलाव अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे हो रहा है। 

    भारत पर क्‍या असर होगा? 
    अगर डॉलर से निर्भरता कम होती है तो भारत जैसे देश अपनी करेंसी को बढ़ावा दे सकते हैं और दुनिया के साथ रुपये में कारोबार बढ़ सकता है. साथ ही अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने और अन्य मुद्राओं का हिस्सा बढ़ा सकते हैं. हालांकि, ये अचानक नहीं होगा, बल्कि डॉलर का दबदबा धीरे-धीरे कम हो सकता है। 

  • सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ट्रंप और मजबूत, राष्ट्रपति की शक्तियों को लेकर बड़ा बदलाव

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ट्रंप और मजबूत, राष्ट्रपति की शक्तियों को लेकर बड़ा बदलाव

    वाशिंगटन

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी ताकत दी है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले की मानें तो अब वह किसी भी एजेंसी चीफ को कभी भी बटा सकते हैं. जी हां, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति की शक्तियों का दायरा काफी बढ़ा दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा स्वतंत्र फेडरल एजेंसियो के प्रमुखों को हटाए जाने के फैसले को सही ठहराया है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में  कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब स्वतंत्र संघीय एजेंसियों के प्रमुखों को अपनी इच्छा से पद से हटा सकते हैं. हालांकि, इस फैसले में फेडरल रिजर्व यानी अमेरिकी केंद्रीय बैंक को इससे अलग रखा गया है। 

    सुप्रीम कोर्ट ने क्या अपवाद रखा?
    अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के जजों अपने फैसले में यह भी कहा कि फेडरल रिजर्व की गवर्नर लिसा कुक (Lisa Cook) फिलहाल अपने पद पर बनी रहेंगी. वह ट्रंप प्रशासन की ओर से उन्हें हटाने की कोशिश के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं. डोनाल्ड ट्रंप ने उन पर मॉर्गेज फ्रॉड के आरोप लगाए हैं. हालांकि, कुक ने इन आरोपों से इनकार किया है। 

    अब ट्रंप को वजह बताने की जरूरत नहीं
    सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक, फेडरल रिजर्व को छोड़कर बाकी स्वतंत्र एजेंसियों के प्रमुखों को हटाने के लिए अब राष्ट्रपति को किसी खास वजह अथवा कारण की जरूरत नहीं होगी. इससे पहले संघीय कानूनों के तहत ऐसे अधिकारियों को हटाने के लिए ठोस कारण बताना जरूरी था. यानी देश के सेंट्रल बैंक को छोड़कर कोर्ट ने माना कि राष्ट्रपति अपनी मर्जी से एजंसियों के प्रमुखों को हटा सकते हैं। 

    सुप्रीम कोर्ट ने पलटा 91 साल पुराना फैसला
    सुप्रीम कोर्ट ने 91 साल पुराने अपने ही ऐतिहासिक फैसले Humphrey’s Executor v. United States को भी पलट दिया. उस फैसले में राष्ट्रपति के अधिकार सीमित किए गए थे ताकि स्वतंत्र एजेंसियां राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर काम कर सकें. सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कोर्ट के 6 कंजर्वेटिव जजों के बहुमत से आया, जिसे ट्रंप प्रशासन की शक्तियों में बड़ी बढ़ोतरी के तौर पर देखा जा रहा है. इस बेंच में 9 जज शामिल थे। 

    चीफ जस्टिस ने क्या कहा
    अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स ने अपने फैसले में कहा कि राष्ट्रपति को अधिकारियों को हटाने से रोकने वाली व्यवस्था संविधान में तय शक्तियों के बंटवारे के खिलाफ है. जजों ने फेडरल ट्रेड कमीशन की पूर्व सदस्य रेबेका स्लॉटर के मामले में फैसला सुनाया, जिन्हें ट्रंप ने बिना किसी कारण के निकाल दिया था, जबकि फेडरल कानून के एक नियम के अनुसार कारण बताना जरूरी है। 

    इस फैसले का लॉजिक दूसरी एजेंसियों पर भी लागू होता है, जिनमें नेशनल लेबर रिलेशंस बोर्ड, मेरिट सिस्टम्स प्रोटेक्शन बोर्ड और कंज्यूमर प्रोडक्ट सेफ्टी कमीशन शामिल हैं, जहां ट्रंप ने बोर्ड के सदस्यों को भी निकाल दिया है. इस फैसले के बाद डोनाल्ड ट्रंप काफी खुश हैं। 

    डोनाल्ड ट्रंप हुए खुश
    डोनाल्ड ट्रंप ने एक ट्रुथ सोशल पोस्ट में इस फैसले पर अपनी खुशी और सहमति जताई. उन्होंने लिखा, ‘यह बहुत सम्मान की बात है कि मौजूदा प्रेसिडेंट होने के नाते यह ऐतिहासिक और अभूतपूर्व फैसला मिला, जो प्रेसिडेंशियल शक्तियों के संबंध में अब तक दिए गए सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में से एक है। 

  • पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर फिर भड़की हिंसा, आधी रात के हमले में 35 लोगों की मौत, बढ़ा तनाव

    पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर फिर भड़की हिंसा, आधी रात के हमले में 35 लोगों की मौत, बढ़ा तनाव

    काबुल 
     पाकिस्तान ने एक बार फिर अफगानिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन किया है. पाकिस्तान ने अफगान सीमा से सटे इलाकों में मिलिट्री ऑपरेशन चलाने का दावा किया है. पाकिस्तान सरकार के मुताबिक सुरक्षा बलों ने पहले खुफिया सूचना के आधार पर जमीनी अभियान चलाया और उसके बाद अफगानिस्तान सीमा के पास आतंकियों के ठिकानों पर सटीक हवाई हमले (कैलिब्रेटेड स्ट्राइक) किए. इस कार्रवाई में कुल 35 लोगों के मारे जाने का दावा किया गया है. यह ऑपरेशन ऐसे समय हुआ है जब एक दिन पहले कराची में पाकिस्तान रेंजर्स के मुख्यालय पर बड़ा आतंकी हमला हुआ था. रिपोर्ट् के मुताबिक पाकिस्तान की ओर से यह एक महीने में चौथा हमला है. इससे पहले 10 जून को पाकिस्तान के हमले में 26 लोग मारे गए थे। 

    पाकिस्तान के सूचना मंत्री अत्ताउल्लाह तरार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बताया कि हाल के दिनों में देशभर में सुरक्षा बलों पर बढ़ते आतंकी हमलों के जवाब में यह अभियान शुरू किया गया. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अपनी सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा और आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी। 

    कराची हमले के बाद हुई कार्रवाई
    शनिवार को कराची स्थित पाकिस्तान रेंजर्स
    के क्षेत्रीय मुख्यालय पर हथियारों और विस्फोटकों से लैस आतंकियों ने हमला किया था. इस हमले में तीन पाकिस्तानी सैनिकों की मौत हो गई थी. जवाबी कार्रवाई में सुरक्षा बलों ने तीन हमलावरों को मार गिराया, जबकि एक हमलावर घायल अवस्था में गिरफ्तार किया गया. पाकिस्तानी सेना के अनुसार गिरफ्तार आरोपी अफगान नागरिक है. इस हमले की जिम्मेदारी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान से जुड़े संगठन जमात-उल-अहरार ने ली थी। 

    किन ठिकानों को बनाया निशाना?
    पाकिस्तान के मुताबिक सबसे पहले खैबर पख्तूनख्वा के बाजौर जिले में खुफिया सूचना के आधार पर जमीनी अभियान चलाया गया. इस दौरान पाकिस्तान ने दावा किया कि ‘खान फरोश’ नाम का एक प्रमुख कमांडर समेत चार आतंकवादी मारे गए. इसके बाद अफगानिस्तान सीमा से लगे इलाकों में मौजूद जमात-उल-अहरार और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) से जुड़े ठिकानों पर सटीक हमले किए गए. पाकिस्तान का दावा है कि अफगानिस्तान के पक्तिया, पक्तिका और कुनार प्रांतों में स्थित तीन ठिकाने नष्ट कर दिए गए, जहां 25 आतंकवादी मारे गए. इसके अलावा बड़ी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद भी नष्ट करने की बात कही गई है। 

    पाकिस्तान और अफगानिस्तान में क्यों बढ़ रहा तनाव?
    पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान में सुरक्षा बलों और पुलिस पर हमले लगातार बढ़े हैं. पाकिस्तान का आरोप है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और उससे जुड़े संगठन अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल कर पाकिस्तान में हमले करते हैं. हालांकि अफगानिस्तान की तालिबान सरकार इन आरोपों को लगातार खारिज करती रही है. पाकिस्तान इससे पहले भी कई बार सीमा पार कर हवाई हमला करता रहा है। 

  • “डरने वाली नहीं हूं”शेख हसीना ने मौत की सजा और देश वापसी को लेकर रखी अपनी बात

    “डरने वाली नहीं हूं”शेख हसीना ने मौत की सजा और देश वापसी को लेकर रखी अपनी बात

    नई दिल्ली
    बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और दो साल पहले हुए सत्ता परिवर्तन की वजह से अपना देश छोड़कर भारत आने वाली शेख हसीना ने वापसी को लेकर बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने कहा है कि वह इसी साल बांग्लादेश वापस लौट जाएंगी। उन्होंने अवामी लीग को सिर्फ एक दल नहीं, बल्कि अपनी ताकत बताया। बांग्लादेश में साल 2024 के मध्य में बड़े पैमाने पर विरोध और हिंसा हुई थी, जिसके बाद प्रधानमंत्री आवास तक भीड़ पहुंच गई। इसके चलते उन्हें अपने देश को छोड़कर भागना पड़ा और भारत से अच्छे संबंध होने की वजह से वे नई दिल्ली में तब से रह रही हैं। हसीना ने साफ कर दिया है कि इस साल के आखिरी में वह बांग्लादेश लौट जाएंगी। हसीना को बांग्लादेश में फांसी की सजा मिली हुई है।

    शेख हसीना के भारत आने के बाद उन्हें प्रधानमंत्री पद से भी हटा दिया गया था। उनके खिलाफ स्थानीय स्तर पर काफी गुस्सा था। हालांकि, बाद में पूरी दुनिया को पता चल गया कि वह आंदोलन कोई बांग्लादेश के भलाई के लिए नहीं, बल्कि उसे और कट्टरता की ओर ले जाने के लिए ही था। हसीना के बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार चली, जिसमें जमकर दंगे हुए। हिंदुओं को जमकर प्रताड़ित किया गया। कई को तो जिंदा ही मार डाला गया और ज्यादातर के मंदिरों, घरों को भी नुकसान पहुंचाया गया। इस साल फरवरी में हुए आम चुनाव में बांग्लादेश में यूनुस से बांग्लादेश का पीछा छूटा और तारिक रहमान प्रधानमंत्री बने। इसके बाद, भारत और बांग्लादेश के संबंध बेहतर होने लगे हैं।

    ‘मैं इसी साल बांग्लादेश वापस लौट जाऊंगी’
    एनडीटीवी को दिए इंटरव्यू में जब शेख हसीना से पूछा गया कि आपने कई बार संकेत दिया है कि आप जल्द ही बांग्लादेश लौट सकती हैं, तो इस पर उन्होंने जवाब दिया, ''मेरी वापसी कोई पर्सनल एम्बिशन का सवाल नहीं है। यह एक बहुत बड़े सवाल से जुड़ा है। बांग्लादेश के लोगों के पॉलिटिकल राइट्स, लोकतंत्र की बहाली, कानून का राज स्थापित करना बहुत जरूरी है। मैं सत्ता के लिए राजनीति नहीं करती हूं और बांग्लादेश के लोगों की भलाई के लिए राजनीति करती हूं। मैं बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान के सोनार बांग्ला बनाने के सपने को पूरा करने के लिए राजनीति में आई और उसे पूरा करने के लिए काम करती हूं। मैं साफ-साफ कह देना चाहती हूं कि हर रुकावट और साजिश को पार करते हुए मैं इस साल अपने देश वापस लौट जाऊंगी।''

    मौत की सजा को बताया गैर-कानूनी
    शेख हसीना ने बांग्लादेश में मिली मौत की सजा पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यह फैसला मेरे लिए न्याय नहीं है। यह गैर-कानूनी, गैर-संवैधानिक और राजनीति से प्रेरित है। ज्यूडिशियरी को अवामी लीग की लीडरशिप से बदला लेने के लिए एक जरिया बना दिया गया। इस तरह की कोशिशें पहले भी हुईं, तब भी फेल रहीं, अब भी फेल रहेंगी। उन्होंने आगे कहा कि मैं मौत से नहीं डरती हूं। 1975 में मैंने अपने पिता, अपने भाइयों और लगभग अपने पूरे परिवार को खो दिया। 21 अगस्त को मुझे ग्रेनेड से मारने की कोशिश हुई थी। मेरे खिलाफ कई बार साजिशें रची गईं, लेकिन हर बार उससे बाहर आई।

    उन्होंने आगे कहा कि मैं बांग्लादेश के लोगों के लिए हमेशा खड़ी रही हूं। पांच बार जनता के वोटों से प्रधानमंत्री चुनी गई और देश के विकास के लिए लगातार काम किया। शेख हसीना ने आगे बताया कि अवामी लीग कोई कागज का संगठन नहीं है। यह एक ऐसी ताकत है, जोकि बंगाल की मिट्टी, बंगाल के लोगों, बंगाल के इतिहास और बंगाली राष्ट्र की पहचान में बसी हुई है। 77 साल के इतिहास में अवामी लीग पर कई बार हमले हुए हैं, कई बार खून भी बहा है और उस पर बैन भी लगाया गया, लेकिन हर बार यह लोगों की ताकत से वापस उठ खड़ी हुई है।

  • वेनेजुएला में विनाशकारी भूकंप के बाद अंतरराष्ट्रीय मदद शुरू, राहत अभियान तेज

    वेनेजुएला में विनाशकारी भूकंप के बाद अंतरराष्ट्रीय मदद शुरू, राहत अभियान तेज

    नई दिल्ली
    दक्षिण अमेरिका के वेनेजुएला में 25 जून को भूकंप के दो झटके हजारों लोगों की जिंदगियां निगल गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अब तक इस भूकंप में 1430 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हुई है। हालांकि आंकड़ा बहुत बड़ा हो सकता है। अधिकारियों के अनुसार, परिवारों ने आज सुबह कम से कम 68,900 लोगों के लापता होने की जानकारी दी है। अब भी मलबे से लाशों पर लाशें निकल रही हैं। वहीं देश के उत्तरी तट के बाद अब भी लगातार भूकंप के झटके महसूस किए जा रहे हैं। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक राजधानी कराकास और माराके में भी 4.9 तीव्रता के भूकंप के झटके महसूस किए गए हैं।

    वेनेज़ुएला के सबसे बुरी तरह प्रभावित राज्यों में से एक, ला ग्वायरा में, अपने प्रियजनों और पड़ोसियों की तलाश कर रहे लोग फावड़ों, भारी मशीनों, रस्सियों और अपने हाथों का इस्तेमाल करके कंक्रीट के ढेर को हटाने की कोशिश करते दिखे। भूकंप में 3360 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। अधिकारियों ने बताया कि शनिवार को 250 के करीब लोगों को जिंदा निकाला गया है।

    खुद ही परिजनों को तलाश रहे लोग
    वेनेजुएला में राहत टीमों की कमी की वजह से लोगों को खुद ही मलबा हटाकर परिजनों की तलाश करनी पड़ रही है। वेनेजुएला के कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज ने कहा है कि लोग ला गुआइरा राज्य की यात्रा से बचें। उन्होंने कहा कि यह समय बेहद संवेदनशील है। ज्यादा से ज्यादा लोगों को बचाना है। उन्होंने कहा कि तेजी से पुलिस, सिविल प्रोटेक्शन, दमकल की टीमें भेजने के लिए रास्ते खाली रखना जरूरी है।

    जमींदोज हो गईं 1000 इमारतें
    बीबीसी रिपोर्ट के अनुसार, वेनेजुएला के उत्तरी तटीय क्षेत्र और राजधानी काराकास में भूकंप के कारण सैकड़ों इमारतें, कई अस्पताल और शॉपिंग सेंटर पूरी तरह जमींदोज हो गये हैं। इसके अलावा करीब 1,000 अन्य बुनियादी ढांचागत स्थलों को भारी नुकसान पहुंचा है। सबसे ज्यादा तबाही काराकास के उत्तर में स्थित ला गुएरा क्षेत्र में हुई है, जहां देश का मुख्य बंदरगाह और सिमोन बोलिवर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा स्थित है। ला गुएरा में अब तक मलबे से 243 लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है।

    इस आपदा के बाद वेनेजुएला में अंतरराष्ट्रीय राहत और बचाव दल पहुंचना शुरू हो गए हैं। संयुक्त राष्ट्र (यूएन) मानवीय मामलों के प्रमुख टॉम फ्लेचर ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े पैमाने पर वैश्विक सहायता अभियान चलाने की घोषणा की है। ब्रिटेन, अमेरिका, नीदरलैंड, मैक्सिको और स्विट्जरलैंड ने अपनी खोजी और बचाव टीमें, प्रशिक्षित श्वान दल और ड्रोन भेजे हैं। अमेरिका ने इसके साथ ही युद्धपोत, परिवहन विमान और 15 करोड़ डॉलर (लगभग 1,415 करोड़ 40 लाख रुपये) की वित्तीय सहायता देने का भी एलान किया है। आंतरिक मामलों के मंत्री डियोसडाडो काबेलो के अनुसार, भूकंप का सबसे ज्यादा असर काराकास के लॉस पालोस ग्रांडेस और अल्तामिरा इलाकों के अलावा ला गुएरा, अरागुआ, काराबोबो और फाल्कन जैसे उत्तरी तटीय राज्यों पर पड़ा है।

  • ट्रंप की भारत यात्रा के संकेत, रक्षा और रणनीतिक साझेदारी को मिलेगा नया बल

    ट्रंप की भारत यात्रा के संकेत, रक्षा और रणनीतिक साझेदारी को मिलेगा नया बल

    नई दिल्ली
    अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की खुलकर सराहना की है। साथ ही, उन्होंने भारत को तेजी से उभरती वैश्विक शक्ति बताया है। व्हाइट हाउस में समाचार एजेंसी IANS को दिए इंटरव्यू में रुबियो ने कहा कि अमेरिका भारत को अपना करीबी साझेदार और सहयोगी मानता है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने आर्थिक क्षेत्र में अच्छी प्रगति की है और अब वैश्विक स्तर पर लिए जाने वाले अहम फैसलों में उसकी भूमिका लगातार मजबूत हो रही है। रुबियो ने कहा, "हम प्रधानमंत्री मोदी और उनके काम के बड़े प्रशंसक हैं।"

    मार्को रुबियो ने भारत-अमेरिका संबंधों को पहले से कहीं अधिक मजबूत बताते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच बेहद घनिष्ठ संबंध हैं, जो दोनों देशों के रणनीतिक रिश्तों को नई दिशा दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि हाल ही में जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों नेताओं की मुलाकात बेहद सकारात्मक रही। दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की दिशा में तेजी से काम चल रहा है। उनके अनुसार, यह समझौता अब अंतिम चरण में पहुंच चुका है और जल्द ही इसकी घोषणा हो सकती है।

    डोनाल्ड ट्रंप कब करेंगे भारत की यात्रा
    अमेरिकी विदेश मंत्री ने यह भी संकेत दिया कि राष्ट्रपति ट्रंप अगले वर्ष की शुरुआत में भारत की यात्रा कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि इस यात्रा की तैयारियां जारी हैं और इससे दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को और मजबूती मिलेगी। रुबियो ने बताया कि भारत और अमेरिका रक्षा, ऊर्जा, खनिज, आपूर्ति श्रृंखला, समुद्री सुरक्षा तथा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग जैसे कई अहम क्षेत्रों में मिलकर काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में भी बड़ी भूमिका निभाना चाहता है और दोनों देशों के बीच क्वाड सहयोग भी आगे बढ़ेगा।

    मार्को रुबियो ने भारतीय-अमेरिकी समुदाय की भी सराहना करते हुए कहा कि इस समुदाय ने अमेरिका के विकास में अहम योगदान दिया है और दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत बनाने में सेतु का काम किया है। उन्होंने कहा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत और सबसे पुराने लोकतंत्र अमेरिका के बीच कई साझा मूल्य और हित हैं, जिनके आधार पर भविष्य में और व्यापक सहयोग संभव है। रुबियो के ये बयान ऐसे समय आए हैं जब भारत-अमेरिका व्यापार, प्रौद्योगिकी, रक्षा और रणनीतिक सहयोग लगातार नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहे हैं।

  • इवानोव की संदिग्ध मौत से मचा हड़कंप, पुतिन के करीबी माने जाने वाले अधिकारी को लेकर रहस्य गहराया

    इवानोव की संदिग्ध मौत से मचा हड़कंप, पुतिन के करीबी माने जाने वाले अधिकारी को लेकर रहस्य गहराया

    मॉस्को

     कभी रूस के राष्ट्रपति पुतिन के उत्तराधिकारी समझे जाने वाले सर्गेई इवानोव की मृत्यु हो गई है. सर्गेई इवानोव रूस के रक्षा मंत्री रह चुके थे. उन्हें कभी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के संभावित उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जाता था. वे 73 साल के थे। 

    खास बात यह है कि क्रेमलिन ने बताया कि इवानोव की मौत शुक्रवार को हुई, लेकिन मौत की वजह या अन्य कोई जानकारी नहीं दी. लेकिन क्रेमलिन इसके बारे में कोई डिटेल नहीं दे रहा है. हालांकि पुतिन ने इवानोव के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की. रूस समेत सोशल मीडिया में इस बारे में चर्चा हो रही है। 

    पुतिन ने 2001 में इवानोव को अपना रक्षा मंत्री नियुक्त किया था. इवानोव भी रूस की खुफिया एजेंसी KGB के अधिकारी थे. इवानोव वे 2007 तक इस पद पर रहे और चेचन्या में दूसरे युद्ध के दौरान कामकाज संभाला, जिसमें उस इलाके की अलगाववादी कोशिशों को कुचल दिया गया था। 

    द सोवियत जेम्स बॉन्ड
    लेनिनग्राद में जन्मे इवानोव ने KGB में नौकरी की. यहीं पर पुतिन के साथ उनकी दोस्ती हुई. दोनों KGB के लेनिनग्राद डायरेक्टोरेट में साथ काम करते थे. 1998 में जब पुतिन FSB के प्रमुख बने, तो इवानोव उनके डिप्टी बने. पुतिन के राष्ट्रपति बनने के बाद इवानोव ने अहम पद संभाले। 

    इन पदों में सुरक्षा परिषद सचिव, रक्षा मंत्री, प्रथम उप प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति प्रशासन के प्रमुख शामिल हैं. वे ‘सिलोविकी’ के प्रमुख चेहरे थे. सिलोविकी सुरक्षा एजेंसियों से आए अफसरों के शक्तिशाली समूह को कहा जाता है. एक समय उन्हें पुतिन का संभावित उत्तराधिकारी भी माना जाता था. पुतिन के साथ उनका रिश्ता KGB के दिनों से गहरा और विश्वास-आधारित था. पुतिन उन्हें अपने सबसे करीबी और भरोसेमंद साथियों में गिनते थे. लेकिन जैसा कि राजनीति में होता है जिससे नजदीकी होती है उसी से अविश्वास भी होता है।  

    इवानोव को रूस के सर्कल में सोवियत जेम्स बॉन्ड कहा जाता था. इवानोव के करियर में हुई तरक्की का काफी हद तक श्रेय पुतिन के साथ उनकी पुरानी दोस्ती को जाता है. दोनों दोस्त पहली बार 1970 के दशक के आखिर में KGB अफसरों के तौर पर मिले थे. दोनों ने सोवियत जासूसी केंद्रों में काम किया. पुतिन पूर्वी जर्मनी में थे और इवानोव की तैनाती फिनलैंड और केन्या में थी। 

    पत्रकार मिखाइल ज़ीगर ने अपनी किताब 'ऑल द क्रेमलिन मेन्स' में लिखा, "वह एक आदर्श सोवियत जासूस हैं. आप उन्हें भीड़ में अलग से नहीं पहचान सकते, वह 'द मैट्रिक्स' के एजेंट स्मिथ जैसे हैं, नाम में भी और शक्ल में भी. "1990 के दशक में रूस की दो मुख्य खुफिया एजेंसियां FSB (फ़ेडरल सिक्योरिटी सर्विस) और SVR (फ़ॉरेन इंटेलिजेंस सर्विस) उन्हें पाने के लिए होड़ कर रही थीं। 

    SVR में इवानोव को यूरोपीय विभाग का पहला डिप्टी डायरेक्टर बनाया गया और 40 साल की उम्र के शुरुआती दौर में ही वह सबसे कम उम्र के जनरलों में से एक बन गए. लेकिन इस एजेंट को पाने की होड़ में जीत FSB की हुई, जब पुतिन उसके प्रमुख बने. 1998 में उन्होंने इवानोव को अपना डिप्टी नियुक्त किया. जिससे एजेंसी का एनालिटिकल काम मज़बूत हुआ. जब पुतिन प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने इवानोव को रूसी सुरक्षा परिषद का प्रमुख नियुक्त किया। 

    इवानोव पुतिन के उत्तराधिकारियों में से थे
    जब 2008 में पुतिन ने कार्यकाल की सीमा के कारण पद छोड़ने और प्रधानमंत्री बनने का फ़ैसला किया, तो इवानोव को उनका सबसे संभावित उत्तराधिकारी माना जा रहा था.  लेकिन पुतिन ने अपने एक और पुराने सहयोगी दिमित्री मेदवेदेव को अपनी जगह काम करने के लिए चुना ताकि 2012 में राष्ट्रपति पद पर वापसी कर सकें। 

    इवानोव की महात्वाकांक्षा और पुतिन का डर
    कुछ जानकारों का मानना ​​था कि पुतिन ने इवानोव की उम्मीदवारी को इसलिए खारिज कर दिया क्योंकि उन्हें लगा कि इवानोव बहुत ज़्यादा महत्वाकांक्षी हैं और उन्हें डर था कि वे राष्ट्रपति पद पर बने रहने की कोशिश कर सकते हैं। 

    इवानोव 2007 से 2011 तक उप-प्रधानमंत्री के तौर पर पुतिन के साथ रहे और फिर 2011 से 2016 तक क्रेमलिन के चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ के तौर पर काम किया। 

    2016 में इवानोव को पर्यावरण संरक्षण और परिवहन के लिए राष्ट्रपति का विशेष दूत नियुक्त किया गया; इस पद का कोई राजनीतिक महत्व नहीं था और इसे ज़्यादातर लोग सम्मानजनक रिटायरमेंट के तौर पर देख रहे थे. उन्होंने इस साल की शुरुआत में यह पद छोड़ दिया। 

    यूक्रेन में मॉस्को की सैन्य कार्रवाई के जवाब में रूस के अन्य शीर्ष अधिकारियों के साथ-साथ इवानोव पर भी अमेरिका और यूरोपीय संघ ने प्रतिबंध लगाए हैं।