Author: NewseDay

  • मानदेय के साथ परिवार की सेहत और आर्थिक सुरक्षा पर जोर, योगी सरकार ने बढ़ाया स्वास्थ्य सुरक्षा कवच

    मानदेय के साथ परिवार की सेहत और आर्थिक सुरक्षा पर जोर, योगी सरकार ने बढ़ाया स्वास्थ्य सुरक्षा कवच

    जो प्रदेश की सेवा में जुटे, योगी सरकार ने उनके परिवारों को दिया स्वास्थ्य सुरक्षा का कवच

    31 हजार से अधिक पीआरडी जवानों को परिवार सहित पांच लाख तक का इलाज

    रसोइयों के मानदेय में बढ़ोतरी के साथ स्वास्थ्य सुरक्षा

    आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं-सहायिकाओं को भी मिला दोहरा लाभ

    मानदेय से साथ परिवार की सेहत और आर्थिक सुरक्षा पर जोर

    लखनऊ
     उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने समाज के लिए जमीनी स्तर पर काम करने वाले पीआरडी स्वयंसेवकों, विद्यालयों की रसोइयों और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं-सहायिकाओं के कल्याण को लेकर बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने इन सेवा वर्गों के मानदेय में बढ़ोतरी के साथ उनके और उनके परिवारों के लिए पांच लाख रुपये तक की सालाना कैशलेस चिकित्सा सुविधा देने का फैसला किया है। इससे बीमारी की स्थिति में इलाज का खर्च परिवार की आर्थिक स्थिति पर भारी पड़ने से रोकने में मदद मिलेगी। खास बात यह है कि सरकार ने कर्मचारी के साथ उसके आश्रित परिवार को भी स्वास्थ्य सुरक्षा के दायरे में रखा है।

    31 हजार से अधिक पीआरडी जवानों को परिवार सहित पांच लाख तक का इलाज

    प्रदेश की सुरक्षा, यातायात, आपदा और प्रशासनिक कार्यों में सहयोग करने वाले 31 हजार से अधिक पीआरडी स्वयंसेवकों और उनके परिवारों को प्रतिवर्ष पांच लाख रुपये तक के कैशलेस इलाज की सुविधा देने की घोषणा की गई है। सरकारी और सूचीबद्ध अस्पतालों में उपचार का लाभ मिलेगा। इससे पीआरडी स्वयंसेवकों के परिवारों को गंभीर बीमारी की स्थिति में बड़ी रकम जुटाने की चिंता से राहत मिलेगी।

    रसोइयों के मानदेय में बढ़ोतरी के साथ स्वास्थ्य सुरक्षा

    परिषदीय विद्यालयों में बच्चों के लिए भोजन तैयार करने वाली रसोइयों के लिए भी सरकार ने आर्थिक और स्वास्थ्य सुरक्षा को एक साथ जोड़ा है। उनके मानदेय में प्रतिमाह एक हजार रुपये की वृद्धि के साथ परिवार सहित पांच लाख रुपये तक की कैशलेस चिकित्सा सुविधा देने का निर्णय लिया गया है। सीमित आय वाले परिवारों के लिए यह सुविधा बीमारी के समय बड़ा आर्थिक सहारा साबित हो सकती है।

    आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं-सहायिकाओं को भी मिला दोहरा लाभ

    बाल विकास, पोषण और मातृ-शिशु स्वास्थ्य से जुड़ी योजनाओं को जमीनी स्तर तक पहुंचाने वाली आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के लिए भी सरकार ने मानदेय बढ़ाया है। कार्यकर्ताओं का मानदेय आठ हजार से बढ़ाकर 12 हजार और सहायिकाओं का चार हजार से बढ़ाकर छह हजार रुपये किया गया है। साथ ही दोनों के परिवारों को पांच लाख रुपये तक की सालाना कैशलेस चिकित्सा सुविधा देने का फैसला किया गया है।

    मानदेय से साथ परिवार की सेहत और आर्थिक सुरक्षा पर जोर

    इन फैसलों में योगी सरकार की नीति का एक स्पष्ट पक्ष दिखाई देता है, सेवा करने वाले व्यक्ति के साथ उसके परिवार की भी चिंता। बीमारी में इलाज के लिए बड़ी रकम की व्यवस्था करना निम्न और मध्यम आय वाले परिवारों के लिए बड़ी चुनौती होती है। ऐसे में कैशलेस स्वास्थ्य सुविधा सीधे परिवार की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ती है। पीआरडी जवानों से लेकर रसोइयों और आंगनवाड़ी कर्मियों तक, सरकार ने मानदेय बढ़ोतरी के साथ स्वास्थ्य सुरक्षा जोड़कर इन सेवा वर्गों के लिए आर्थिक और स्वास्थ्य सुरक्षा का दोहरा कवच तैयार किया है।

  • तेलीबांधा मरीन ड्राइव पर मीरा के पसरे पहुंचे CM साय, योजनाओं का पूछा हाल और खरीदा ‘आशीर्वाद का दीया’

    तेलीबांधा मरीन ड्राइव पर मीरा के पसरे पहुंचे CM साय, योजनाओं का पूछा हाल और खरीदा ‘आशीर्वाद का दीया’

    सड़क किनारे पसरे पर अचानक पहुंचे मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, मीरा के पसरे से खरीदा ‘आशीर्वाद का दीया’

    तेलीबांधा मरीन ड्राइव में मिट्टी के दीये बेच रही मीरा  से मुख्यमंत्री ने की आत्मीय बातचीत, एक हजार रुपए देकर किया उसके श्रम और स्वावलंबन का सम्मान

    मुख्यमंत्री ने पूछा – सरकार की योजनाओं का लाभ मिल रहा है? मीरा ने बताया – जनधन खाता खुला है, महतारी वंदन योजना की राशि भी मिल रही

    ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम के लिए मुख्यमंत्री ने स्वयं खरीदा मिट्टी का दीया, सेवा और जनभागीदारी के संकल्प से जुड़ने का किया आह्वान

    स्थानीय श्रम और स्वावलंबन के सम्मान का संदेश दे गया मुख्यमंत्री का सहज अंदाज

    रायपुर 
    राजधानी रायपुर के तेलीबांधा मरीन ड्राइव में सड़क किनारे पसरा लगाकर मिट्टी के दीये बेच रही मीरा के लिए आज का दिन अचानक बेहद खास बन गया। रोज की तरह वह अपने छोटे से पसरे पर दीये सजाकर ग्राहकों की प्रतीक्षा कर रही थी। इसी बीच मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का काफिला अचानक उसके पसरे के पास जाकर रुक गया। 

    मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने मीरा के पसरे पर रखे मिट्टी के दीयों को देखा और ‘सेवा संकल्प अभियान’ के अंतर्गत आयोजित होने वाले ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम के लिए वहीं से एक दीया खरीदा। मुख्यमंत्री ने महिला को एक हजार रुपए प्रदान किए। मुख्यमंत्री का यह सहज भाव स्थानीय स्तर पर छोटे व्यवसाय के माध्यम से आजीविका अर्जित करने वाली मीरा के श्रम, स्वाभिमान और स्वावलंबन के सम्मान का सुंदर संदेश भी दे गया।

    मुख्यमंत्री का सड़क किनारे लगे छोटे से पसरे पर अचानक पहुंचना आसपास मौजूद लोगों के लिए भी सुखद आश्चर्य का अवसर बन गया। बिना किसी औपचारिकता के मुख्यमंत्री ने मीरा से उसके कामकाज और परिवार का हालचाल पूछा। 

    बातचीत के दौरान मुख्यमंत्री साय ने मीरा से पूछा कि उसे केंद्र और राज्य सरकार द्वारा संचालित जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिल रहा है या नहीं। मुख्यमंत्री के सवाल पर मीरा ने बताया कि प्रधानमंत्री जनधन योजना के अंतर्गत उसका बैंक खाता खुल चुका है। उसने मुख्यमंत्री को यह भी बताया कि राज्य सरकार की महतारी वंदन योजना के अंतर्गत उसे हर महीने एक हजार रुपए की राशि प्राप्त हो रही है।

    महिला के मुंह से योजनाओं का लाभ मिलने की बात सुनकर मुख्यमंत्री साय ने प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि सरकार की योजनाएं तभी सार्थक होती हैं, जब उनका लाभ जरूरतमंद व्यक्ति तक सीधे पहुंचे, उसे संबल दे और उसके जीवन को बेहतर बनाने में सहायक बने। शासन की प्राथमिकता यही है कि जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ पात्र हितग्राहियों तक पूरी सहजता और पारदर्शिता के साथ पहुंचे।

    मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में प्रधानमंत्री जनधन योजना ने गरीब, वंचित और जरूरतमंद परिवारों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़कर आर्थिक समावेशन का मजबूत आधार तैयार किया है। बैंकिंग व्यवस्था से जुड़ने के कारण आज विभिन्न योजनाओं की राशि सीधे हितग्राहियों के खातों तक पहुंच रही है।

    उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में महतारी वंदन योजना के माध्यम से प्रदेश की माताओं-बहनों को प्रतिमाह एक हजार रुपए की आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है। यह राशि उनके छोटे-बड़े दैनिक खर्चों में सहयोग देने के साथ उनमें आर्थिक आत्मविश्वास भी बढ़ा रही है। 

    मुख्यमंत्री साय ने कहा कि सड़क किनारे पसरा लगाने वाले छोटे विक्रेता हों, कुम्हार हों, शिल्पकार हों अथवा स्थानीय उत्पाद तैयार करने वाली हमारी माताएं और बहनें – इन सभी के परिश्रम में आत्मनिर्भर छत्तीसगढ़ की शक्ति निहित है। अपने हुनर और मेहनत से आजीविका अर्जित करने वाले ऐसे लोगों को प्रोत्साहित करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

    उन्होंने कहा कि स्थानीय उत्पादों को अपनाना केवल किसी वस्तु की खरीद नहीं है। उसके पीछे किसी परिवार का श्रम, किसी कारीगर का हुनर और किसी छोटे व्यवसायी के आत्मसम्मान से जुड़ी आजीविका होती है। जब हम स्थानीय विक्रेताओं और कारीगरों से सामान खरीदते हैं तो हमारे इस छोटे से प्रयास से उनके परिवार और उनकी आजीविका को संबल मिलता है।

    सेवा और जनभागीदारी का प्रतीक बनेगा ‘आशीर्वाद का दीया’

    मुख्यमंत्री साय द्वारा मीरा से खरीदा गया मिट्टी का यह दीया ‘सेवा संकल्प अभियान’ के अंतर्गत आयोजित होने वाले ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम का हिस्सा बनेगा। इस कार्यक्रम के माध्यम से सेवा, जनकल्याण और विकास के प्रति सामूहिक संकल्प को जनभागीदारी से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

    मुख्यमंत्री साय ने कहा कि हमारी संस्कृति में दीया केवल प्रकाश का माध्यम नहीं, बल्कि आशा और सकारात्मक संकल्प का प्रतीक है। मिट्टी का एक छोटा-सा दीया जब जलता है तो अपने आसपास के अंधकार को दूर करता है। इसी तरह समाज का प्रत्येक व्यक्ति जब सेवा का एक छोटा-सा संकल्प लेकर आगे बढ़ता है तो सामूहिक प्रयास से बड़े और सकारात्मक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त होता है।

    उन्होंने कहा कि ‘आशीर्वाद का दीया’ इसी भावना को अभिव्यक्त करता है। यह सेवा और विकास के प्रति हमारे संकल्प तथा जनभागीदारी के सामर्थ्य का प्रतीक है। प्रदेश के नागरिक जब इस भावना से जुड़ेंगे तो सेवा का यह संकल्प घर-घर और जन-जन तक पहुंचेगा।

    सेवा को जन-जन का संकल्प बनाने का अभियान

    मुख्यमंत्री साय ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अपने सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष राष्ट्र और जनसेवा को समर्पित किए हैं। प्रधानमंत्री जी के जन्मदिवस 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक ‘सेवा संकल्प अभियान’ आयोजित किया जा रहा है। यह अभियान सेवा, सुशासन, गरीब कल्याण और विकास के प्रति प्रतिबद्धता को जनभागीदारी के माध्यम से और मजबूत करने का अवसर है।

    मुख्यमंत्री ने प्रदेशवासियों से आह्वान किया कि वे सेवा संकल्प अभियान से पूरे उत्साह और आत्मीयता के साथ जुड़ें। अपने गांव, शहर और आसपास स्वच्छता के कार्यों में सहभागी बनें, पर्यावरण संरक्षण के लिए आगे आएं, जरूरतमंदों की सहायता करें और अपनी क्षमता के अनुरूप जनसेवा का कोई न कोई संकल्प अवश्य लें।

    उन्होंने कहा कि सेवा का कोई कार्य छोटा नहीं होता। किसी जरूरतमंद की सहायता, अपने आसपास स्वच्छता, एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल करना, स्थानीय कारीगर से कोई वस्तु खरीदना अथवा समाज के हित में किया गया छोटा-सा प्रयास भी जनसेवा का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।

    एक छोटे से दीये में समाया बड़ा संदेश

    तेलीबांधा मरीन ड्राइव के सड़क किनारे लगे एक छोटे से पसरे से मुख्यमंत्री विष्णु देव साय द्वारा खरीदा गया मिट्टी का यह दीया कई मायनों में खास बन गया। इसमें एक ओर मेहनत से आजीविका अर्जित कर रही महिला के श्रम और स्वावलंबन का सम्मान जुड़ा, तो दूसरी ओर सहज बातचीत में जनधन और महतारी वंदन जैसी जनकल्याणकारी योजनाओं की जमीनी पहुंच भी सामने आई। इसके साथ ही यही दीया अब ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम के माध्यम से सेवा, जनभागीदारी और विकास के संकल्प का प्रतीक बनेगा।

    इस अवसर पर विधायक पुरंदर मिश्रा उपस्थित थे।

  • सेवा संकल्प अभियान को लेकर प्रदेश में उत्साह, जगह-जगह होंगे जनसेवा के आयोजन

    सेवा संकल्प अभियान को लेकर प्रदेश में उत्साह, जगह-जगह होंगे जनसेवा के आयोजन

    विशेष लेख 
    सेवा संकल्प अभियान

    प्रदेशभर में होंगे जनसेवा के कार्यक्रम

    रायपुर                       

    ‘सेवा संकल्प अभियान’ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 साल पूरे होने के मौके पर आयोजित एक महीने का देशव्यापी अभियान है। इसका मकसद मोदी के सेवा और विकास से जुड़े कामों को लोगों तक पहुंचाने के साथ जनसेवा के कार्यक्रमों को बढ़ाना है। इन कार्यक्रमों में रक्तदान शिविर, सफाई अभियान, स्कूलों में प्रतियोगिताएं आदि शामिल हैं।

                 इस अभियान का उद्देश्य जनसेवा के प्रति आभार व्यक्त करना, विकसित भारत 2047 का सामूहिक संकल्प लेना, केन्द्र एवं राज्य शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी प्रत्येक नागरिक तक पहुँचाना तथा प्रत्येक परिवार की सहभागिता के साथ व्यापक जनभागीदारी सुनिश्चित करना है।

               ‘सेवा संकल्प अभियान’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 25 वर्षों के (मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में) निरंतर जनसेवा और राष्ट्र निर्माण के कार्यकाल के सम्मान में 17 सितंबर से 17 अक्टूबर 2026 तक चलने वाला एक राष्ट्रव्यापी अभियान है।  सेवा गतिविधियां में नागरिकों को रक्तदान, वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान, स्वास्थ्य परीक्षण, जल संरक्षण और डिजिटल साक्षरता जैसी 25 सेवा गतिविधियों से जोड़ा जाएगा। श्रमदान के रूप में नागरिकों से कम से कम 25 मिनट श्रमदान करने की अपील की गई है, जिसकी फोटो या वीडियो माई भारत पोर्टल पर अपलोड करने पर डिजिटल प्रमाण-पत्र मिलेगा। 

                    विशेष कार्यक्रम के रूप में 17 सितम्बर 2026 को आशीर्वाद का दीया, नमो सेवा गाथा के तहत  संभागीय मुख्यालय रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, अंबिकापुर (सरगुजा), और जगदलपुर (बस्तर), के आडिटोरियम में संस्कृति विभाग द्वारा जिला प्रशासन से समन्वय कर प्रस्तावित तिथि अनुसार कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। नमो सेवा गाथा अंतर्गत नुक्कड नाटक, नृत्य नाटिका जिले केस्थानीय कलाकार के माध्यम से सांस्कृतिक आयोजन किया जाएगा। सेवा सेतु अभियान (विकासखंडों में बहुउद्देशीय शिविर) और सेवा फर्स्ट इनोवेशन चैलेंज जैसी अभिनव गतिविधियां आयोजित होंगी।

              इन गतिविधियों का संचालन शासकीय विभागों के साथ-साथ नागरिकों तथा सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से भी किया जाएगा। इन कार्यक्रमों में सभी आयु वर्ग की महिलायें, सामाजिक कार्यकर्ता, प्रतिष्ठित व्यक्तियों, जनप्रतिनिधियों, स्वैच्छिक संगठन, शैक्षणिक संस्थाएँ, स्वयं-सहायता समूहों, युवाओं, महिलाओं एवं आम नागरिकों को सक्रिय रूप से जोड़ा जाएगा।

    कब से कब तक चलेगा अभियान

          यह अभियान 17 सितंबर से 17 अक्टूबर 2026 तक चलेगा। 17 सितंबर को पीएम मोदी का जन्मदिन है, जबकि 7 अक्टूबर को उनके सार्वजनिक पद पर 25 साल पूरे होंगे। 17 अक्टूबर 2026 को अभियान का समापन बड़े कार्यक्रम के साथ किया जाएगा। 

    प्रदेशभर में होंगे सेवा कार्यक्रम

         अभियान के तहत 17 सितंबर से 7 अक्टूबर के बीच स्कूल और कॉलेजों में ड्राइंग और भाषण प्रतियोगिता सभी सरकारी एवं प्राइवेट स्कूलों में आयोजित  किए जाएंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा किये गए सेवा कार्यो और विकसित भारत की संकल्पना पर जानकारी दी जाएगी और ड्राइंग और भाषण प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी। इसके अलावा रक्तदान शिविर, सफाई अभियान, प्रदर्शनियां, सेमिनार और सरकारी योजनाओं से जुड़ी जागरूकता गतिविधियां होंगी। ब्लॉक स्तर पर ‘सेवा सेतु’ शिविर लगाए जाएंगे, जहां लोगों को कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने में मदद दी जाएगी।

    आंगन का उत्सव’ में पोषण और महिला-बाल कल्याण पर जोर

                 25 सितंबर से 7 अक्टूबर तक आंगनवाड़ी केंद्रों में ‘आंगन का उत्सव’ आयोजन किया जाएगा। इस दौरान पोषण, मातृ सहायता, टीकाकरण तथा महिला एवं बाल कल्याण से जुड़ी विभिन्न योजनाओं की जानकारी हितग्राहियों को दी जाएगी। कार्यक्रमों में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते हुए उनका सम्मान भी किया जाएगा। इस पहल के माध्यम से महिलाओं, बच्चों और परिवारों को स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधी जागरूकता से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा।

    कहानी बदलाव की’में सामने आएंगी सफलता की वास्तविक कहानियां

               अभियान के दौरान ‘कहानी बदलाव की’ पहल के तहत शासकीय योजनाओं से लाभान्वित हितग्राहियों की वास्तविक सफलता की कहानियों का संकलन किया जाएगा। इन कहानियों के माध्यम से यह बताया जाएगा कि सरकारी योजनाओं का प्रभाव किस तरह आम नागरिकों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रहा है। हितग्राहियों की सफलता की कहानियां अन्य पात्र नागरिकों को भी योजनाओं का लाभ लेने और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेंगी।

    ‘विकसित भारत’ पर रहेगा जोर

            स्कूलों में विकसित भारत 2047 विषय पर चित्रकला और भाषण प्रतियोगिताएं होंगी। ‘नमो सेवा’ के तहत नुक्कड़ नाटक और आंगनवाड़ी केंद्रों पर ‘आंगन मिलन सेवा’ जैसे कार्यक्रम भी रखे गए हैं। पिछले 25 वर्षों के सेवा कार्यो में, प्रमुख जनकल्याणकारी योजनाएं और देश में आए बदलावों की कहानी को एक सरल, भावनात्मक और संगीतपूर्ण नाट्य प्रस्तुति के माध्यम से गाँव – गाँव तक पहुंचाया जाएगा। यह कार्य प्रदेशभर के स्कूलों, कॉलेजों, पंचायत, सामुदायिक केंद्र एवं अन्य सार्वजानिक स्थलों पर आयोजित किया जाएगा ।

    50 बदलाव वाले स्थानों का दौरा

           ‘विकसित भारत संकल्प यात्रा’ के तहत करीब 50 ऐसे स्थान चुने जाएंगे, जिन्हें बीजेपी मोदी सरकार के दौर में हुए बदलाव का उदाहरण मानती है। इनमें गुजरात की GIFT City और बस्तर जैसे स्थान शामिल हैं। सोशल मीडिया क्रिएटर्स को भी इन जगहों पर ले जाने की योजना है।

    17 अक्टूबर को बड़ा समापन

         अभियान के अंतिम दिन ‘जनसेवक महाकुंभ’ में पंचायत से संसद तक के करीब 1.25 लाख जनप्रतिनिधियों के शामिल होने की योजना है। इस दौरान सामूहिक रूप से ‘वंदे मातरम’ की सभी छह कड़ियां गाने का कार्यक्रम प्रस्तावित है।

    धनंजय राठौर
    संयुक्त संचालक, (जनसंपर्क) रायपुर

                               

  • यमुना में पानी की उपलब्धता बढ़ने से प्रदेश की वर्तमान और भविष्य की जरूरतें होंगी पूरी

    यमुना में पानी की उपलब्धता बढ़ने से प्रदेश की वर्तमान और भविष्य की जरूरतें होंगी पूरी

    पंचकूला
     हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने जानकारी देते हुए कहा कि किसाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना को लेकर हरियाणा सहित छह राज्यों के बीच आज ऐतिहासिक समझौता हुआ है।

    परियोजना पूरी होने के बाद इससे तथा अन्य माध्यम से हरियाणा को करीब 1280 क्यूसेक पानी मिलेगा। इस पानी से सिंचाई तथा पेयजल योजनाओं को सिरे चढ़ाने की योजना हरियाणा सरकार ने बनानी शुरू कर दी है।

    मुख्यमंत्री नई दिल्ली स्थित कर्तव्य भवन में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की अध्यक्षता तथा जलशक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में हुई बैठक में शामिल होने के बाद हरियाणा भवन में मीडिया से बात कर रहे थे।

    उन्होंने कहा कई दशक से परियोजना लटकी थी लेकिन, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयास से आगे बढ़ने जा रही है। सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास इस नारे के साथ प्रधानमंत्री देश को विकसित करने में लगे हुए हैं।

    मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी का बयान
    मुख्यमंत्री सैनी ने कहा कि आज किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना पर समझौता हरियाणा के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। वर्षों से लंबित इस परियोजना को संवाद, सहयोग और सहमति के माध्यम से आगे बढ़ाया गया।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह का विशेष रूप से धन्यवाद और उनकी पहल और सक्रिय प्रयासों से वर्षों से लंबित इस विषय पर राज्यों के बीच सहमति बनाने का रास्ता साफ हुआ है।

    उन्होंने केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल जी का आभार जताया जिन्होंने लगातार राज्यों और संबंधित विभागों के साथ समन्वय करते हुए इस परियोजना को गति दी।

    बोले- यमुना में हरियाणा के पानी का हिस्सा 48 प्रतिशत है, इसलिए यमुना में पानी की उपलब्धता बढ़ाने पर हमें फ़ायदा होगा। साथ ही दो परियोजना रेणुका जी और लखवार की परियोजना पहले से ही निर्माणाधीन है, जल्द ही किसाऊ परियोजना पर भी काम शुरू होगा

    इन परियोजनाओं से बढ़ेगी पानी की उपलब्धता
    इन तीनों परियोजनाओं से कुल 2676 क्युसिक पानी की उपलब्धता बढ़ेगी, जिसमें हरियाणा का हिस्सा 1280 क्युसिक होगा। यह पानी हमारे प्रदेश की वर्तमान जरूरतों के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों की जल आवश्यकताओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

    नई दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन में राष्ट्र प्रमुखों के लिए दिए गए गाला डिनर में इंडी गठबंधन राज्यों के मुख्यमंत्री के नहीं आने के सवाल पर सीएम ने कहा कि यह दुखदायी है कि भाजपा का विरोध करते-करते विपक्षी नेता देश का विरोध करने लगे हैं।

    कार्यक्रम में सभी राज्य के मुख्यमंत्री को बुलाया गया था, जो नहीं आए वही बता पाएंगे कि क्यों नहीं आए।

  • उत्सव में दिखे सामाजिक सरोकार, DJ के शोर और अव्यवस्था से बचने की अपील

    उत्सव में दिखे सामाजिक सरोकार, DJ के शोर और अव्यवस्था से बचने की अपील

    डी जे के शोर और अव्यवस्था से मुक्त हों त्यौहार. डॉ दिनेश मिश्र
     
    उत्सव का महत्व डी जे से नहीं सामाजिक उपयोगिता से तय हो

    बिलासपुर/रायपुर
    पिछले वर्ष  महाराष्ट्र के सोलापुर और इस वर्ष पूना में आम नागरिकों के गणेशोत्सव में डी जे, कोलाहल, से मुक्त करने के लिए पहल की , जिसमें से सोलापुर तो पिछले वर्ष से ही डीजे मुक्त हो चुका है और इस वर्ष पूना में यह आवाज उठी  है. जबकि गणेशोत्सव की परंपरा करीब  125 वर्ष पहले लोकमान्य तिलक के नेतृत्व में महाराष्ट्र से ही आरंभ हुई थी ताकि लोगों में एकता बने, एक दूसरे के साथ मिलकर दुख सुख बाँटे.  अंध श्रद्धा उन्मूलन समिति के अध्यक्ष डॉ दिनेश मिश्रा ने उक्त अपील जारी करते हुए कहा कि 
    सांस्कृतिक कार्यक्रम,  साहित्यिक प्रतियोगिताएं, कवि सम्मेलन, जैसे कार्यक्रम के बदले  अब उत्सव का स्वरूप प्रति वर्ष बदलता हुआ नजर आ रहा है , जिसमें आस्था के नाम परशोरशराबे, फिल्मी गानों, मनमानी पूर्ण रोकटोक, हावी होने लगी है. क्या रायपुर बल्कि कहा जाए पूरे देश के नागरिकों को अपने इन उत्सवों की गरिमा, महत्व के सम्बन्ध में सोचने की आवश्यकता है. प्रशासन, नगरनिगम, पुलिस व्यवस्था बनाने  का प्रयास करते है ,पर जनसमर्थन के बिना वे भी सफल नहीं हो पाते.
    हमारे त्योहार , की पहचान ,शोर, शराबे और दिखावे से नहीं,  आस्था व संस्कारों से है. गणेशोत्सव हमारी धार्मिक आस्था, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक परंपराओं का महत्वपूर्ण पर्व है। गणेश जी बुद्धि, विवेक, ज्ञान और शुभारंभ के प्रतीक माने जाते हैं। इसलिए गणेशोत्सव केवल पूजा और मनोरंजन का अवसर नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने और सकारात्मक संदेश देने का माध्यम भी होना चाहिए।

    लेकिन आज सार्वजनिक उत्सवों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। भक्ति और सामाजिक सहभागिता के स्थान पर कई बार तेज आवाज में डीजे, अत्यधिक शोर, चकाचौंध, दिखावा और अनावश्यक प्रतिस्पर्धा उत्सव का प्रमुख हिस्सा बन जाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि जिस त्योहार से आनंद और शांति मिलनी चाहिए, वही आसपास रहने वाले लोगों के लिए परेशानी का कारण बन जाता है।

    गणेशोत्सव का अर्थ तेज आवाज में डीजे बजाना नहीं है।हमें यह विचार करना होगा कि क्या हमारी आस्था इतनी कमजोर है कि उसे व्यक्त करने के लिए अत्यधिक शोर आवश्यक हो? क्या भक्ति की गहराई डीजे की आवाज से निर्धारित होगी?निश्चित रूप से नहीं।

    डीजे का बढ़ता शोर और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है .आज सार्वजनिक आयोजनों में देर रात तक तेज आवाज में डीजे बजाना आम होता जा रहा है। इसका सबसे अधिक असर बुजुर्गों, छोटे बच्चों, विद्यार्थियों, बीमार व्यक्तियों और उन लोगों पर पड़ता है जिन्हें सुबह जल्दी अपने काम पर जाना होता है।

    अत्यधिक ध्वनि वातावरण में बेचैनी, चिड़चिड़ापन, तनाव, नींद में बाधा और एकाग्रता में कमी जैसी परेशानियां बढ़ा सकती है। लंबे समय तक अत्यधिक शोर स्वास्थ्य के लिए भी उचित नहीं माना जाता।
    एक चिकित्सक के रूप में मेरा मानना है कि सार्वजनिक उत्सवों में स्वास्थ्य और नागरिक सुविधा का ध्यान रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।जिस उत्सव के  कोलाहल से किसी बीमार व्यक्ति की परेशानी बढ़े, किसी विद्यार्थी की पढ़ाई प्रभावित हो या किसी बुजुर्ग की नींद खराब हो, उसके स्वरूप पर हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए।

    न्यायालय के निर्देशों का सम्मान जरूरी

    ध्वनि प्रदूषण और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े मामलों में उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर ध्वनि की सीमा, समय और नागरिकों के अधिकारों के संबंध में महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं।

    त्योहार मनाने की स्वतंत्रता सभी को है, लेकिन किसी की स्वतंत्रता दूसरे व्यक्ति के शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार को प्रभावित नहीं कर सकती।

    इसलिए धार्मिक आयोजनों में भी निर्धारित नियमों का पालन होना चाहिए।कानून का पालन करना आस्था के विरुद्ध नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक होने का प्रमाण है।

    सड़कें जाम नहीं, व्यवस्था चाहिए .सार्वजनिक गणेशोत्सव के दौरान एक और गंभीर समस्या सड़कों पर पंडाल और अन्य व्यवस्थाओं के कारण होने वाला अतिक्रमण तथा यातायात अव्यवस्था है।

    कई स्थानों पर सड़क का बड़ा हिस्सा घिर जाने से यातायात बाधित होता है और जाम की स्थिति बन जाती है। ऐसी स्थिति में एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड और अन्य आवश्यक सेवाओं के वाहनों को भी परेशानी हो सकती है।

    उत्सव सार्वजनिक स्थान पर हो तो सार्वजनिक जिम्मेदारी भी साथ होनी चाहिए।पंडाल लगाने से पहले यातायात, पैदल यात्रियों और आपातकालीन सेवाओं के लिए पर्याप्त स्थान सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

    लेजर की तेज रोशनी भी परेशानी का कारण है.आज सजावट के नाम पर अत्यधिक तेज और चमकदार लाइटों का उपयोग बढ़ गया है। आकर्षक सजावट अच्छी बात है, लेकिन वह सुरक्षित और मर्यादित भी होनी चाहिए।अत्यधिक चमकदार रोशनी से आसपास के लोगों को असुविधा हो सकती है और वाहन चालकों का ध्यान भी प्रभावित हो सकता है। 
    पिछले ही वर्ष मेरे पास एक मरीज आया था जिसकी आँखों में लेसर लाइट के प्रभाव से रक्तस्राव हो गया था, इसके पहले भी अलग अलग स्थानों से हार्ट फेल होने , साँस रुकने के अनेक मामले आए हैं .उत्सव की सुंदरता ऐसी हो जो आंखों को सुख दे, परेशानी नहीं।

    हमारी पुरानी परंपराओं में सामाजिकता थीछत्तीसगढ़ की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं में सामूहिकता और आपसी संवाद का विशेष महत्व रहा है। पहले सार्वजनिक अवसरों पर लोग एक-दूसरे के घर और कार्यक्रमों में बैठते थे, बातचीत करते थे और सामाजिक संबंध मजबूत करते थे।

    रायपुर के अनेक गणेशोत्सव के पंडालों में पान-सुपारी खिलाने का कार्यकम की परंपरा केवल खान-पान से जुड़ी नहीं थी, बल्कि उसमें अपनापन और संवाद का भाव भी था। लोग बैठते थे, बातचीत करते थे और एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनते थे।

    आज जब समाज में संवाद का समय कम होता जा रहा है, तब सार्वजनिक उत्सवों को लोगों को जोड़ने का माध्यम बनाया जाना चाहिए।

    साहित्य और संस्कृति को मिले मंच.गणेशोत्सव में साहित्यिक प्रतियोगिताएं आयोजित की जा सकती हैं।

    निबंध लेखन, भाषण, कविता पाठ, वाद-विवाद, चित्रकला, प्रश्नोत्तरी और सामान्य ज्ञान प्रतियोगिताओं के माध्यम से बच्चों और युवाओं को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर दिया जा सकता है।

    गणेश जी बुद्धि और ज्ञान के प्रतीक हैं। इसलिए गणेशोत्सव में ज्ञान आधारित कार्यक्रमों को विशेष स्थान मिलना चाहिए।

    खेलकूद से स्वस्थ समाजगणेशोत्सव के दौरान कबड्डी, खो-खो, दौड़, शतरंज, कैरम, बैडमिंटन तथा अन्य खेल प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जा सकती हैं।.इससे बच्चों और युवाओं को मोबाइल और स्क्रीन से कुछ समय दूर रहकर मैदान से जुड़ने का अवसर मिलेगा।

    डीजे कुछ घंटों का मनोरंजन देता है, लेकिन खेल जीवनभर के लिए अनुशासन, स्वास्थ्य और टीम भावना सिखा सकता है।

    फिल्मी फूहड़ता नहीं, संस्कृति की प्रस्तुति होधार्मिक उत्सवों में मनोरंजन का स्थान अवश्य है, लेकिन उसकी अपनी मर्यादा होनी चाहिए।
    फिल्मी गानों पर आधारित फूहड़ या अशोभनीय प्रस्तुतियों के बजाय भजन, लोकगीत, लोकनृत्य, नाटक, देशभक्ति कार्यक्रम और सामाजिक संदेश देने वाली प्रस्तुतियों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

    छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोककला और लोकसंस्कृति नाचा , पंडवानी को मंच मिलना चाहिए।हमारे त्योहार हमारी संस्कृति को मजबूत करने का अवसर हैं—उन्हें केवल मनोरंजन का साधन नहीं बनाया जाना चाहिए।

    गणेशोत्सव सामाजिक जागरूकता का अभियान बनेगणेशोत्सव के मंच से भी समाज के लिए महत्वपूर्ण संदेश भी दिए जा सकते हैं 

    – नशामुक्ति,सड़क सुरक्षा,स्वच्छतापर्यावरण संरक्षण,वृक्षारोपण,जल संरक्षण,रक्तदा- नेत्रदान,शिक्षा,बालिका शिक्ष,स्वास्थ्य जागरूकता,अंधविश्वास के विरुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिकोण

    यदि प्रत्येक गणेश पंडाल प्रतिदिन समाज के लिए एक सकारात्मक संदेश दे, तो हजारों लोगों तक जागरूकता पहुंच सकती है।

    आस्था रहे, लेकिन दूसरों की शांति भी रहे यह उत्सव की गरिमा और धार्मिक भावना को बनाए रखने का प्रयास बनाया जाए.

     धार्मिक उत्सव में पूजा  अर्चना करें, आरती करें, भजन गाएं, प्रसाद बांटें, सांस्कृतिक कार्यक्रम करें और लोगों को जोड़ें—लेकिन साथ ही यह भी ध्यान रखें कि हमारे उत्सव से किसी अन्य व्यक्ति को अनावश्यक परेशानी न हो।
     सोचने की बात यह है कि मेरी आस्था मेरे लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन दूसरे व्यक्ति की शांति और स्वास्थ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

  • माउंट एवरेस्ट के बाद डॉ. आशा ने महज छह दिन में माउंट एल्ब्रुस और किलिमंजारो को सफलतापूर्वक किया फतह

    माउंट एवरेस्ट के बाद डॉ. आशा ने महज छह दिन में माउंट एल्ब्रुस और किलिमंजारो को सफलतापूर्वक किया फतह

     रेवाड़ी
     भारत की गौरवशाली बेटी 48 वर्षीय डॉ. आशा रेवाड़ी के पुलिस लाइन में रहती हैं l डॉ. आशा के पति अजय सिंह रेवाड़ी में हरियाणा पुलिस में सब इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत हैं। आशा के दो बच्चे हैं एक बेटी (डॉक्टर)और एक बेटा (इंजीनियर) ने एक बार फिर देश का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन करते हुए एक उल्लेखनीय पर्वतारोहण उपलब्धि हासिल की है।

    उन्होंने 21 अगस्त 2026 को यूरोप की सर्वोच्च चोटी माउंट एल्ब्रुस का सफल आरोहण किया और इसके बाद अपने अभियान को लगातार जारी रखते हुए 29 अगस्त 2026 को अफ्रीका की सर्वोच्च चोटी माउंट किलिमंजारो को सफलतापूर्वक फतह किया।

    दोनों चोटियों को प्रभावी अभियान अवधि के केवल छह दिनों में फतह किया गया, जबकि दोनों समिट डेट के बीच कैलेंडर के अनुसार आठ दिन का अंतर है, जिसमें यात्रा एवं ट्रांजिट समय शामिल है। यह उपलब्धि उनकी असाधारण सहनशक्ति, दृढ़ संकल्प, शारीरिक फिटनेस, मानसिक मजबूती और अनुशासन का प्रमाण है।

    माउंट एल्ब्रुस यूरोप की सर्वोच्च चोटी पर की फतेह
    21 अगस्त 2026 को सुबह 09:07 बजे, डॉ. आशा ने 5,642 मीटर (18,510 फीट) ऊंची माउंट एल्ब्रुस की चोटी पर सफलतापूर्वक पहुंचकर यूरोप की सर्वोच्च चोटी को फतह किया।

    वह अपने साथ भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लेकर शिखर तक पहुंचीं। इसके साथ ही उन्होंने “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” और “महिला सशक्तिकरण” के संदेश एवं लोगो भी शिखर तक पहुंचाए।

    उनका यह आरोहण केवल पर्वतारोहण की उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय भावना और महिलाओं की शिक्षा, सशक्तिकरण एवं प्रगति का संदेश दुनिया की ऊंची चोटियों तक पहुंचाने का प्रतीक भी बना।

    माउंट किलिमंजारो को भी किया फतेह
    माउंट एल्ब्रुस की सफल चढ़ाई के बाद डॉ. आशा ने अपने महत्वाकांक्षी अभियान को जारी रखा और तंजानिया स्थित माउंट किलिमंजारो की ओर प्रस्थान किया।

    29 अगस्त 2026 को सुबह 05:31 बजे, उन्होंने 5,895 मीटर (19,341 फीट) ऊंची उहुरू पीक पर सफलतापूर्वक पहुंचकर अफ्रीका की सर्वोच्च चोटी को फतह किया।

    इस प्रकार डॉ. आशा ने यूरोप और अफ्रीका की सर्वोच्च चोटियों को लगातार एक ही अभियान-यात्रा में सफलतापूर्वक फतह किया। जिसमें अंतरराष्ट्रीय यात्रा और अभियान संबंधी व्यवस्थाएं शामिल थीं, जबकि प्रभावी अभियान अवधि छह दिन रही।

    माउंट एल्ब्रुस और माउंट किलिमंजारो की लगातार सफल चढ़ाई उनकी असाधारण सहनशक्ति, दृढ़ इच्छाशक्ति, अनुशासन, शारीरिक क्षमता और प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

    माउंट एवरेस्ट से यूरोप और अफ्रीका की चोटियों तक
    डॉ. आशा ने वर्ष 2017 में 39 वर्ष की आयु में अपने पहले ही प्रयास में चीन/तिब्बत की ओर से माउंट एवरेस्ट का सफल आरोहण किया था। उन्होंने भारत और विश्व की पहली नर्सिंग ऑफिसर के रूप में माउंट एवरेस्ट फतह करने की पहचान का दावा किया है और उनकी इस उपलब्धि से जुड़े रिकॉर्ड दावे भी किए गए हैं।

    एक सरकारी नर्सिंग ऑफिसर के रूप में मरीजों की सेवा करने से लेकर माउंट एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचने और उसके बाद माउंट एल्ब्रुस तथा माउंट किलिमंजारो को फतह करने तक की उनकी यात्रा जनसेवा, साहस, अनुशासन और पर्वतारोहण उत्कृष्टता का अद्भुत उदाहरण है।

    27 वर्षों की सरकारी सेवा
    डॉ. आशा पिछले 27 वर्षों से राजस्थान सरकार में नर्सिंग ऑफिसर के रूप में अपनी सेवाएं दे रही हैं। स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के साथ-साथ उन्होंने पर्वतारोहण और साहसिक अभियानों के अपने जुनून को भी निरंतर आगे बढ़ाया।

    उनकी यात्रा यह शक्तिशाली संदेश देती है कि अनुशासन, समर्पण और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ पेशेवर जिम्मेदारियों के साथ अपने सपनों को भी पूरा किया जा सकता है।

    सेवन समिट्स मिशन 2026–27 की ओर
    माउंट एवरेस्ट, माउंट एल्ब्रुस और माउंट किलिमंजारो को सफलतापूर्वक फतह करने के बाद डॉ. आशा अब अपने महत्वाकांक्षी “सेवन समिट्स मिशन 2026–27” की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।

    उनका अंतिम लक्ष्य सातों महाद्वीपों की सर्वोच्च चोटियों पर सफलतापूर्वक पहुंचना और एक भारतीय महिला पर्वतारोही एवं स्वास्थ्य सेवा कर्मी के रूप में एक प्रेरणादायक अंतरराष्ट्रीय उदाहरण स्थापित करना है।

    एयर पिस्टल शूटिंग में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन
    पर्वतारोहण के साथ-साथ डॉ. आशा एक उत्कृष्ट एयर पिस्टल शूटर भी हैं। वह 10 मीटर, 25 मीटर और 50 मीटर की स्पर्धाओं में भाग लेती हैं।

    वर्ष 2025 में उन्होंने मास्टर्स महिला वर्ग में 4 स्वर्ण और 3 कांस्य पदक जीते। यह उपलब्धि उनकी फिटनेस, एकाग्रता, सटीकता, अनुशासन और प्रतिस्पर्धात्मक उत्कृष्टता को दर्शाती है।

    शिखर से भी आगे — एक प्रेरणादायक संदेश
    डॉ. आशा की यात्रा राजस्थान के एक छोटे से गांव से शुरू होकर दुनिया की सर्वोच्च चोटियों तक पहुंची है। यह केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि भारत की महिलाओं और युवाओं के लिए एक प्रेरणादायक संदेश है कि साहस, दृढ़ संकल्प, अनुशासन और निरंतर प्रयास से बड़े से बड़ा सपना भी साकार किया जा सकता है।

    भारतीय तिरंगा, महिला सशक्तिकरण तथा “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” का संदेश पर्वतों की चोटियों तक पहुंचाकर डॉ. आशा ने पर्वतारोहण को समाज में जागरूकता और प्रेरणा का माध्यम बनाया है।

  • झारखंड हाईकोर्ट में जेपीएससी और जेएसएससी सीजीएल भर्ती मामले की अगली सुनवाई 18 सितंबर को होगी

    झारखंड हाईकोर्ट में जेपीएससी और जेएसएससी सीजीएल भर्ती मामले की अगली सुनवाई 18 सितंबर को होगी

     रांची
    झारखंड हाईकोर्ट ने JPSC, JSSC CGL-2023, CDPO और फूड सेफ्टी ऑफिसर भर्ती परीक्षाओं के विज्ञापन रद्द करने से जुड़े मामले में राज्य सरकार को दो दिन का समय दिया है. अदालत ने फिलहाल अपने अंतरिम आदेश को बरकरार रखा है. अब मामले की अगली सुनवाई 18 सितंबर (शुक्रवार) सुबह 10:30 बजे होगी.
    क्या हुआ कोर्ट में?

    मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने पक्ष रखा. सरकार ने अदालत से चार सप्ताह का समय मांगा था ताकि वह विस्तृत जवाब दाखिल कर सके. हालांकि, हाईकोर्ट ने लंबी मोहलत देने से इनकार करते हुए केवल दो दिन का समय दिया. राज्य सरकार आज ही अपनी स्टेटस रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करे.

    अंतरिम आदेश फिलहाल जारी
    हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले में पहले से पारित अंतरिम आदेश यथावत रहेगा. यानी JPSC और JSSC CGL समेत चारों भर्ती परीक्षाओं के विज्ञापन रद्द करने के फैसले पर अंतिम निर्णय अगली सुनवाई के बाद ही होगा.

    हजारों अभ्यर्थियों की नजरें टिकी
    इस मामले पर राज्यभर के हजारों अभ्यर्थियों की नजरें टिकी हुई हैं. JPSC संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा, JSSC CGL-2023, CDPO और फूड सेफ्टी ऑफिसर भर्ती परीक्षाओं के विज्ञापन रद्द किए जाने के बाद उम्मीदवार लंबे समय से न्यायिक फैसले का इंतजार कर रहे हैं.

  • शेयर बाजार में भारी गिरावट से निवेशकों के उड़े होश, सेंसेक्स-निफ्टी की तेजी पलटी; जानें 3 बड़े कारण

    शेयर बाजार में भारी गिरावट से निवेशकों के उड़े होश, सेंसेक्स-निफ्टी की तेजी पलटी; जानें 3 बड़े कारण

    मुंबई 
    मंगलवार का दिन शेयर बाजार में पैसे लगाने वालों के लिए अमंगलकारी साबित हो रहा है. सबसे बड़ी बात ये है कि सेंसेक्स-निफ्टी ने तूफानी शुरुआत की थी, लेकिन देखते ही देखते बाजार में ऐसा भूचाल आया कि दोनों इंडेक्स क्रैश हो गए. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का 30 शेयरों वाला सेंसेक्स दिन के हाई लेवल से एक झटके में 1400 अंक से ज्यादा टूटकर बंद हुआ. वहीं दूसरी ओर नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के निफ्टी इंडेक्स ने भी डे-हाई से 474 अंकों का गोता लगा गया. शेयर मार्केट में अचानक आई इस बड़ी गिरावट के पीछे एक नहीं, बल्कि कई बड़े कारण हैं।   

    तूफानी तेजी, फिर तगड़ी गिरावट
    शेयर मार्केट में मंगलवार को कारोबार की शुरुआत धुआंधार तेजी के साथ हुई और निवेशकों को लगा कि बीते सप्ताह की गिरावट पर ब्रेक लग गया, लेकिन उनकी खुशी महज घंटेभर बाद ही टेंशन में तब्दील हो गई. सेंसेक्स-निफ्टी में गिरावट का जो सिलसिला शुरू हुआ वो कारोबार आगे बढ़ने के साथ तेज होता चला गया. शेयर बाजार में कारोबार खत्म होने पर BSE Sensex 777 अंक की गिरावट लेकर 74,003 के लेवल पर क्लोज हुआ, जो दिन के हाई लेवल से 1433 अंक की गिरावट है। 

    सिर्फ सेंसेक्स ही नहीं, बल्कि NSE Nifty ने भी निवेशकों को बुरी तरह चौंकाया है. ये 50 शेयरों वाला इंडेक्स अपने पिछले बंद 23,398 की तुलना में तेज रफ्तार के साथ 23,576 पर कारोबार की शुरुआत की थी और 23,592 तक उछला था, लेकिन फिर सेंसेक्स के कदम से कदम मिलाकर चलते हुए ये भी टूटता चला गया और खबर लिखे जाने तक अपने दिन के हाई लेवल से 474 अंक फिसलकर 23,118 पर आकर बंद हुआ। 

    शेयर मार्केट क्रैश के कारण
    Share Market Crash के पीछे के कारणों की बात करें, तो एक नहीं बल्कि कई हैं. इनमें कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल से लेकर US बॉन्ड यील्ड तक का रोल है। 

    पहला कारण: वेस्ट एशिया में अमेरिका-ईरान टेंशन और मध्य पूर्व में फैलते संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को खतरे में डाल दिया है. इसके असर तेल की कीमतों पर देखने को मिल रहा है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत तेज उछाल के साथ 107 डॉलर प्रति बैरल के पार कारोबार कर रही है. इसने महंगाई के जोखिम को बढ़ाते हुए शेयर बाजारों का सेंटीमेंट खराब किया है। 

    दूसरा कारण: शेयर मार्केट में बड़ी गिरावट के पीछे दूसरा कारण अमेरिका से जुड़ा हुआ है. दरअसल, सोमवार को बेंचमार्क 10-वर्षीय अमेरिकी बॉन्ड यील्ड 5 फीसदी पर जा पहुंची, जो अक्टूबर 2023 के बाद पहली बार है. गौरतलब है कि 10 साल की बॉन्ड यील्ड को ग्लोबल बेंचमार्क माना जाता है और ये सीधे अमेरिकी अर्थव्यवस्था की स्थिति को दर्शाता है. वहीं बीते कारोबारी दिन अमेरिकी शेयर बाजार में बड़ी गिरावट आई थी, जिसका असर मंगलवार को भारतीय बाजार पर भी नजर आया है। 

    तीसरा कारण: शेयर बाजार में मंगलवार को IT इंडेक्स के अलावा ज्यादातर कैटेगरी में तेज गिरावट दर्ज की गई. मार्केट टूटने का तीसरा बड़ा कारण तमाम ग्लोबल टेंशन और तेल की कीमतों में इजाफे के बीच शेयर बाजार के लिए डर का पैमाना माने जाने वाले India VIX में अचानक उछाल भी है. ये 6 फीसदी के आसपास बढ़कर 13 के पार निकल गया, जो आने वाले दिनों में शेयर मार्केट में बिकवाली का इंडिकेशन देता है। 

    ये शेयर ताश के पत्तों की तरह बिखरे
    Stock Market Crash के बीच सबसे ज्यादा टूटने वाले शेयरों की लिस्ट देखें, तो बीएसई की लार्जकैप कैटेगरी में शामिल BEL Share (5%), IndiGo Share (3.56%), Bajaj Finserv Share (2.96%), Adani Ports Share (2.50%), SBI Share (2.42%), Titan Share (2.35%), Bajaj Finance Share (2.34%), Asian Paints Share (2.31%), M&M Share (2.19%), Trent Share (2%) फिसलकर ट्रेड कर रहे थे. 

  • सुरक्षित पुनर्वास की रफ्तार सुस्त, आपदा का इंतजार! धनबाद में लगातार धंस रही जमीन, 15 हजार चिन्हित परिवारों में से मात्र 4% का ही हो सका विस्थापन

    सुरक्षित पुनर्वास की रफ्तार सुस्त, आपदा का इंतजार! धनबाद में लगातार धंस रही जमीन, 15 हजार चिन्हित परिवारों में से मात्र 4% का ही हो सका विस्थापन

    धनबाद
    धनबाद कोयलांचल में भू-धंसान अब छिटपुट घटनाओं की कहानी नहीं रह गयी है. बंद खदानों, भूमिगत खाली जगहों, कमजोर पिलरों, पुराने गोफ और भूमिगत आग की दशकों पुरानी विरासत का असर अब आबादी के बीच दिखाई दे रहा है. 13 सितंबर को बंद रामकनाली प्रोजेक्ट में अवैध खनन के दौरान खदान धंसने से तीन लोगों की मौत हुई.

    इससे पहले आठ सितंबर को सिजुआ की तीनपटिया बस्ती में जमीन धंसने से एक बच्चे की मौत हो गयी और कई लोग मलबे में दबकर घायल हुए. जुलाई-अगस्त में छाताबाद में मकानों के आसपास जमीन धंसने की घटनाएं सामने आयीं. केंदुआडीह में गैस रिसाव ने भी खतरे का संकेत दिया.

    आबादी के बीच बढ़ता भू-धंसान का खतरा

    इन घटनाओं ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर धनबाद में अगली बार जमीन कहां धंसेगी और खतरे वाले इलाकों में रहने वाले लोगों को बचाने की तैयारी कितनी है.
    100 वर्ग किमी से अधिक इलाका संवेदनशील होने का अनुमानधनबाद कोयलांचल में 100 वर्ग किमी से अधिक क्षेत्र को किसी न किसी स्तर पर भू-धंसान की संवेदनशीलता से जोड़कर देखा जा रहा है. क्षेत्रवार अनुमान के अनुसार धनबाद शहर से सटे इलाकों में करीब 10 वर्ग किमी, झरिया में 25 वर्ग किमी, कतरास में 40 वर्ग किमी और निरसा में करीब 40 वर्ग किमी क्षेत्र संवेदनशील माना जा रहा है.हालांकि ये क्षेत्रवार अनुमान हैं. इन्हें सरकारी रूप से चिह्नित प्रभावित क्षेत्र का अंतिम आंकड़ा नहीं माना जा सकता.धनबाद नगर निगम का क्षेत्रफल करीब 355.77 वर्ग किमी बताया जाता है. शहर से सटे हिस्से, झरिया और कतरास के उपलब्ध अनुमानों को जोड़ने पर करीब 75 वर्ग किमी क्षेत्र भू-धंसान की संवेदनशीलता से जुड़ता है. यह नगर निगम के कुल क्षेत्रफल का करीब 21 फीसदी बैठता है. वहीं निरसा का अनुमानित संवेदनशील क्षेत्र अलग है.
    2.3 से 2.75 लाख लोग संभावित खतरे की जद में

    सबसे बड़ी चिंता यह है कि संवेदनशील जमीन के ऊपर सिर्फ खाली क्षेत्र नहीं हैं. यहां घर, सड़क, स्कूल, बाजार और पूरी बस्तियां बसी हुई हैं.

    अनुमानों के मुताबिक धनबाद शहर से सटे संवेदनशील इलाकों में 10 से 15 हजार, झरिया में 50 से 60 हजार, कतरास में 70 हजार से एक लाख और निरसा में करीब एक लाख की आबादी संभावित खतरे वाले क्षेत्रों में रह रही है.

    खनन क्षेत्र में जमीन की बदली तस्वीर

    क्षेत्रवार अनुमानों को जोड़ने पर करीब 2.3 से 2.75 लाख लोगों के संभावित रूप से भू-धंसान प्रभावित क्षेत्रों में रहने का अनुमान सामने आता है. यह आंकड़ा भी अनुमान आधारित है, इसलिए इसे प्रभावित आबादी का अंतिम सरकारी आंकड़ा नहीं माना जा सकता.
    खतरा सिर्फ झरिया तक सीमित नहींधनबाद में भू-धंसान की चर्चा अक्सर झरिया और भूमिगत आग से जोड़कर की जाती है, लेकिन हाल की घटनाओं ने तस्वीर बदल दी है. कतरास और निरसा में भी संवेदनशील क्षेत्र का दायरा बड़ा बताया जा रहा है.टंडाबाड़ी, छाताबाद और सिजुआ की हालिया घटनाओं ने दिखाया है कि खतरा आबादी के बीच अचानक सामने आ सकता है. ऐसे में सिर्फ पुराने चिन्हित इलाकों पर नजर रखना पर्याप्त नहीं होगा.

    दशकों पुराने खनन की विरासत

    धनबाद की जमीन के नीचे खनन का इतिहास काफी पुराना है. राष्ट्रीयकरण से पहले हुए अवैज्ञानिक खनन, भूमिगत खाली जगहों और पुराने खनन क्षेत्रों में समय के साथ होने वाले बदलाव का असर आज भी जमीन की स्थिरता पर पड़ रहा है.

    भूमिगत खनन के बाद छोड़ी गयी खाली जगहें और कमजोर पिलर समय के साथ प्रभावित हो सकते हैं. कई इलाकों में पुराने गोफ और भूमिगत आग इस जोखिम को और बढ़ाते हैं. वहीं कमजोर हिस्सों में अवैध और अनियंत्रित कोयला खनन जमीन की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है.

    2023 से लगातार सामने आ रही भू-धंसान की घटनाएं

    भू-धंसान की घटनाएं पिछले कुछ वर्षों में लगातार सामने आती रही हैं. जनवरी 2023 में गड़ेरिया, ईस्ट बसुरिया में जमीन धंसने से दहशत फैल गयी थी. सितंबर में गोंदूडीह कोलियरी में तीन महिलाएं गोफ में समा गयी थीं. इसी वर्ष कापासारा में अवैध खनन के दौरान खदान धंसने से दो लोगों की मौत हुई.
    मकानों के आसपास दिखते खतरे के निशान

    2024 में लकड़का नंबर-9 और बांसजोड़ा में जमीन धंसने की घटनाएं सामने आयीं. 2025 में जोगता, केशलपुर और बांसजोड़ा में जमीन में दरार और धंसान ने चिंता बढ़ायी.

    सितंबर 2025 में रामकनाली में ओबी डंप धंसने से सर्विस वैन खाई में गिर गयी थी, जिसमें सात लोगों की मौत हुई. इसके बाद 31 मार्च 2026 को टंडाबाड़ी में मकान के नीचे जमीन धंसने से तीन लोगों की जान चली गयी. उसी इलाके में बाद में भी दरार और धंसान की घटनाएं सामने आयीं.

    जुलाई-अगस्त में छाताबाद में कई मकान प्रभावित हुए. आठ सितंबर को सिजुआ की तीनपटिया बस्ती में भू-धंसान में एक बच्चे की मौत हो गयी. 13 सितंबर को रामकनाली में बंद प्रोजेक्ट में अवैध खनन के दौरान खदान धंसने से तीन लोगों की मौत ने एक बार फिर खतरे की गंभीरता सामने ला दी.

    मार्च के बाद 17 घटनाएं, 11 अकेले कतरास में

    उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस साल मार्च के बाद धनबाद में भू-धंसान की 17 घटनाएं सामने आ चुकी हैं. इनमें 11 घटनाएं अकेले कतरास कोयलांचल में बतायी जा रही हैं.

    टंडाबाड़ी, छाताबाद और सिजुआ की घटनाओं ने साफ कर दिया है कि भू-धंसान का खतरा अब सिर्फ पुराने चर्चित क्षेत्रों तक सीमित नहीं है. आबादी वाले नये इलाकों में भी जमीन की स्थिरता पर सवाल उठ रहे हैं.

    खतरे के बीच कई परिवार खुद कर रहे पलायन

    भू-धंसान और आग से प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थान पर बसाना स्थायी समाधान माना जाता है. बेलगड़िया और करमाटांड़ में झरिया पुनर्वास योजना के तहत परिवारों को बसाने की प्रक्रिया चल रही है.

    दूसरी ओर खतरे के बीच झरिया के कई परिवार खुद भी सुरक्षित इलाकों की ओर जा रहे हैं. गोविंदपुर तथा धनबाद से सटे वनस्थली कॉलोनी, कोलाकुसमा और सीएमपीएफ को-ऑपरेटिव कॉलोनी जैसे गैर-कोयला बीयरिंग क्षेत्रों में लोग जमीन और मकान लेकर बस रहे हैं.
    भू-धंसान प्रभावित क्षेत्र में जमीन और मकानों की फोटो

    इससे संवेदनशील क्षेत्रों में आबादी का दबाव कम हो सकता है, लेकिन बिना समुचित योजना नयी बस्तियों के विस्तार से सड़क, पानी, सीवरेज और शहरी नियोजन की चुनौती बढ़ सकती है. बड़ा सवाल यह है कि खतरे वाली जमीन छोड़ने वाले परिवारों के लिए सुरक्षित और नियोजित पुनर्वास की व्यवस्था कितनी पर्याप्त है.
    आग का दायरा घटा, लेकिन खतरा खत्म नहीं

    धनबाद में भू-धंसान के पीछे भूमिगत आग भी महत्वपूर्ण कारक है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार करीब 1.4 वर्ग किमी क्षेत्र अब भी अग्नि प्रभावित है. लंबे समय तक जलने वाली भूमिगत आग कोयले और आसपास की चट्टानों को प्रभावित कर जमीन की संरचना और स्थिरता पर असर डाल सकती है.

    एनआरएससी के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2017-18 में सतही कोयला आग का क्षेत्र 3.26 वर्ग किमी था. 2020-21 में यह घटकर 1.80 वर्ग किमी और 2024-25 में 1.53 वर्ग किमी रह गया. जनवरी 2026 में 27 फायर लोकेशन पर सक्रिय आग का क्षेत्र 1.03 वर्ग किमी दर्ज किया गया.

    यानी आग का दायरा कम हुआ है, लेकिन भूमिगत आग से जुड़ा खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. ऐसे क्षेत्रों में दरार, गैस और जमीन की स्थिरता से जुड़ी समस्या लंबे समय तक बनी रह सकती है.

    आखिर क्यों धंसती है धनबाद की जमीन?

    पुराने गोफ: भूमिगत खनन के बाद बनी खाली जगह समय के साथ कमजोर हो सकती है और ऊपर की जमीन को प्रभावित कर सकती है.

    कमजोर पिलर: पुराने भूमिगत खनन में छोड़े गये पिलर कमजोर होने पर जमीन की स्थिरता प्रभावित हो सकती है.

    भूमिगत आग: लंबे समय तक जलने से कोयले और आसपास की चट्टानों की संरचना प्रभावित हो सकती है.

    अवैध खनन: कमजोर हिस्सों से अनियंत्रित कोयला निकासी भूमिगत संरचना को प्रभावित कर सकती है.

    ओबी डंप: भारी ओवरबर्डन डंप के खिसकने या धंसने से सड़क, वाहन और आसपास की आबादी प्रभावित हो सकती है.

    आबादी का दबाव: खनन प्रभावित जमीन पर बसी बस्तियां हादसे की स्थिति में सीधे जोखिम में आ जाती हैं.
    81 संवेदनशील साइट, पुनर्वास सिर्फ 4.3 फीसदी

    झरिया में आग और भू-धंसान प्रभावित लोगों के पुनर्वास के लिए वर्ष 2004 में जेआरडीए का गठन किया गया था. जून 2025 में केंद्र सरकार ने संशोधित झरिया मास्टर प्लान को 5,940.47 करोड़ रुपये की लागत से मंजूरी दी.

    100 वर्ग किमी से अधिक इलाका संवेदनशील

    इस योजना में 81 संवेदनशील जगहों की पहचान की गयी है, जहां करीब 15,080 परिवार रहते हैं. इनमें 27 फायर लोकेशन भी शामिल हैं. मास्टर प्लान की समयसीमा दिसंबर 2028 है.

    लेकिन पुनर्वास की गति सवाल खड़े करती है. 2022-23 से 2024-25 के बीच 649 परिवारों का पुनर्वास किया गया और करीब 740.17 करोड़ रुपये खर्च हुए. यानी तीन वित्तीय वर्षों में चिह्नित 15,080 परिवारों में सिर्फ 649 परिवारों का पुनर्वास हो सका. यह कुल संख्या का करीब 4.3 फीसदी है.
    अब सबसे बड़ा सवाल बचाव और पुनर्वास का

    लगातार हो रही घटनाओं के बीच सबसे अहम सवाल सिर्फ यह नहीं है कि जमीन कहां धंसेगी. सवाल यह भी है कि संवेदनशील इलाकों की पहचान, निगरानी और वहां रहने वाले लोगों को समय पर सुरक्षित निकालने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है.

    पुराने गोफ की मैपिंग कितनी पूरी हुई है? कौन-सी बस्तियों को तत्काल हटाने की जरूरत है? भू-धंसान की वैज्ञानिक निगरानी कितनी प्रभावी है? संवेदनशील आबादी के लिए समयबद्ध पुनर्वास योजना क्या है?

    धनबाद की जमीन के नीचे दशकों पुराने खनन की विरासत मौजूद है. ऐसे में हर नयी घटना सिर्फ एक स्थानीय हादसा नहीं, बल्कि जमीन के नीचे मौजूद जोखिम की चेतावनी भी है. अब चुनौती यह है कि अगली घटना का इंतजार करने के बजाय संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, निगरानी और पुनर्वास की तैयारी पहले से कितनी मजबूत की जाती है.
    कहां कितना संभावित खतरा
    क्षेत्र    अनुमानित संवेदनशील क्षेत्र    संभावित आबादी
    धनबाद शहर से सटे इलाके    10 वर्ग किमी    10-15 हजार
    झरिया    25 वर्ग किमी    50-60 हजार
    कतरास    40 वर्ग किमी    70 हजार-1 लाख
    निरसा    करीब 40 वर्ग किमी    करीब 1 लाख
    कुल अनुमान    100 वर्ग किमी से अधिक    करीब 2.3-2.75 लाख

     

  • रूट बदलने से बढ़ी 50 किलोमीटर की दूरी, लखनऊ-कानपुर बस का किराया बढ़ सकता है

    रूट बदलने से बढ़ी 50 किलोमीटर की दूरी, लखनऊ-कानपुर बस का किराया बढ़ सकता है

    लखनऊ
    राजधानी से कानपुर का बस से सफर महंगा हो सकता है। वजह जाजमऊ पुल की मरम्मत के चलते तीन माह तक परिवहन निगम की बसों का रूट बदला रहेगा नए रूट के मुताबिक आलमबाग से रवाना होने वाली रोडवेज बसें उन्नाव के आगे गदन खेड़ा, उन्नाव शहर से लालगंज, फतेहपुर होकर कानपुर पहुंचेंगी।

    नए रूट से बसों की दूरी 50 किलोमीटर बढ़ने की संभावना है। रोडवेज प्रशासन बदले रूट का सर्वे कराएगा। इसमें जितने किलोमीटर ज्यादा बस संचालन होगा, उसी आधार पर बस का किराया बढ़ेगा। 50 किलोमीटर की दूरी अधिक होती है तो 60 रुपये किराया ज्यादा पड़ सकता है। फिलहाल अभी किराया ज्यों का त्यों है।

    कानपुर के जाजमऊ गंगा पुल की मरम्मत कार्य 13 सितंबर से 13 दिसंबर तक भारी वाहनों के साथ रोडवेज बसों का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया गया है। रोडवेज बसें बदले रूट से आवागमन करेंगी, इससे बसों को अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ेगी।

    बदले रूट से दूरी करीब 140 किमी होगी
    लखनऊ से कानपुर जाने वाली बसें गदन खेड़ा चौराहा से रायबरेली रोड से बक्सर पुल के रास्ते फतेहपुर होकर कानपुर की ओर जा सकेंगी। क्षेत्रीय प्रबंधक विमल राजन ने बताया, आलमबाग से कानपुर जाने वाली बसों के रूट तीन माह तक बदले रहेंगे।

    इस दौरान बसों को अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ेगी। डायवर्जन रूट पर जल्द सर्वे कराकर बसों के किराये पर असर पड़ेगा।
    लखनऊ और कानपुर बस डिपो की 80 से ज्यादा साधारण और ई बसों का संचालन हो रहा है। इन बसों से रोजाना 15 से 20 हजार यात्री सफर करते हैं।

    गंगा पुल की मरम्मत का कार्य तीन माह तक चलेगा। इस दौरान यात्रियों को लंबी दूरी तय करके जेब हल्की करनी पड़ेगी। वर्तमान में लखनऊ से कानपुर की दूरी 90 किलोमीटर है। बदले रूट पर दूरी करीब 140 किमी. होगी।