झारखंड के नक्सल प्रभावित इलाकों में नई पहल, पुराने सुरक्षा कैंपों में मिलेंगी ग्रामीणों को सरकारी सुविधाएं

रांची
 घोर माओवाद प्रभावित रहा झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में पड़ने वाला सारंडा जंगल और गिरिडीह-बोकारो सीमा पर स्थित पारसनाथ पहाड़ी अब माओवादियों से लगभग मुक्त हो चुका है। यहां तैनात बलों व कैंपों के लोकेशन में भी फेरबदल जारी है।

ऐसे में सुरक्षा बलों के पुराने कैंपों को विकसित करने पर विचार चल रहा है। जिन कैंपों में तैनात रहकर जवानों ने माओवादियों के विरुद्ध लंबी लड़ाई लड़ी अब ये कैंप धीरे-धीरे खाली हो रहे हैं।

ऐसे सुरक्षा कैंपों का उपयोग अब विकास केंद्र के रूप में उपयोग में लाए जाने की तैयारी चल रही है। जल्द ही ऐसे कैंपों में आसपास के ग्रामीणों के लिए प्रज्ञा केंद्र, स्वास्थ्य उपकेंद्र, पंचायत भवन, स्कूल आदि संचालित होंगे, ऐसी योजना है।

मौखिक रूप से जिला पुलिस व जिला प्रशासन की इसपर विचार बनी है और उससे वरीय पदाधिकारियों को अवगत कराया गया है। इसे धरातल पर उतारने की योजना बनी है।

मिली जानकारी के अनुसार सारंडा में सुदूर जंगल क्षेत्र में माओवादियों के विरुद्ध अभियान के लिए अस्थाई तौर पर बनाए गए पांच सुरक्षा कैंप को जवानों ने खाली किया है। ये कैंप सीआरपीएफ के जवानों के हैं।

यहां प्रतिनियुक्त सीआरपीएफ के जवान दूसरे राज्य तथा दूसरे मिशन पर भेजे गए हैं। पारसनाथ व आसपास से भी कई सुरक्षा कैंप खाली किए जाने की सूचना है। खाली हो रहे सभी सुरक्षा कैंपों का उपयोग विकास केंद्र के रूप में किया जाना प्रस्तावित है।

दो दर्जन से अधिक कैंप औरहोंगे खाली
माओवादियों के सफाए के बावजूद संबंधित माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की गतिविधियां जारी रहेगी। कुछ प्रमुख सुरक्षा कैंप पूर्ववत चलते रहेंगे। वरिष्ठ अधिकारियों की मानें तो सारंडा-पारसनाथ क्षेत्र के करीब दो दर्जन से अधिक कैंप खाली होंगे, जहां विकास केंद्र संचालित किए जाने का प्रस्ताव है।

 

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