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  • महिला आरक्षण बिल गिरने पर BJP का आक्रोश: संसद के बाद अब सड़क पर जोरदार प्रदर्शन

    महिला आरक्षण बिल गिरने पर BJP का आक्रोश: संसद के बाद अब सड़क पर जोरदार प्रदर्शन

    नई दिल्ली

    लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन बिल पास नहीं हो सका, जिससे केंद्र सरकार को बड़ा झटका लगा। बिल को पारित करने के लिए जरूरी बहुमत से यह 54 वोट पीछे रह गया। कुल 352 सदस्यों की मौजूदगी में 230 वोट इसके खिलाफ पड़े, जिसके चलते विधेयक गिर गया। सरकार ने इस पर विपक्ष को जिम्मेदार ठहराया। अमित शाह ने विपक्ष पर महिलाओं के साथ विश्वासघात का आरोप लगाया, जबकि भाजपा नेताओं ने इसे “महिला विरोधी रुख” करार दिया।

    नारी शक्ति वंदन अधिनियम के लिए संविधान संशोधन बिल पारित नहीं हो सका. ऐसे में बीजेपी की महिला सांसदों ने विपक्ष के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया. अब नारी शक्ति वंदन अधिनियम के लिए संविधान संशोधन बिल की हार के विरोध में बाद बीजेपी बड़े स्तर पर प्रदर्शन की तैयारी में है। 

    बीजेपी महिला सांसदों ने शुक्रवार को मकर द्वार पर 'कांग्रेस पार्टी हाय-हाय के नारे' लगाए. वहीं, अब बीजेपी शनिवार 18 अप्रैल से देशभर में कई प्रदर्शन आयोजित करेगी. इन प्रदर्शनों में एनडीए के सहयोगी दल भी हिस्सा लेंगे। 

    बता दें कि महिला आरक्षण से जुड़ा 131वां संविधान संशोधन बिल पारित कराने के लिए लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत थी. इस बिल पर कुल 528 वोट पड़े. बिल पारित कराने के लिए सरकार को 352 वोट की जरूरत थी, लेकिन इसके पक्ष में 298 वोट ही पड़े। 

    संसद के निचले सदन में महिला आरक्षण बिल (Women Reservation Bill) पास नहीं हो पाया। बिल पारित कराने के लिए जरूरी आंकड़ा, 352 से 54 वोट पीछे रह गई। कुल मौजूद सदस्य 352 में बिल के खिलाफ 230 वोट पड़े। पिछले 12 सालों में यह पहला मौका है जब मोदी सरकार का कोई संविधान संशोधन बिल सदन में गिरा है। विपक्षी दल इसे मोदी सरकार की हार के तौर पर देख रही है।

    वहीं, इस बिल के सदन में पारित न होने के बाद केंद्रीय गृह मंत्री ने विपक्ष पर निशाना साधा। उन्होंने सोशल मीडिया हैंडल एक्स पर लिखा,"देश की आधी आबादी, 70 करोड़ महिलाओं को धोखा देने और उनका विश्वास खोने के बाद कोई कैसे विजय का जश्न मना सकता है?"

    उन्होंने आगे लिखा,"विपक्ष का यह जश्न हर उस महिला का अपमान है, जो दशकों से अपने अधिकार का इंतजार कर रही है। कांग्रेस और उसके सहयोगी कितनी बार महिलाओं के साथ विश्वासघात करेंगे? कई बार विजय जैसी प्रतीत होने वाली अहंकार की खुशी, असलियत में छिपी हुई एक बड़ी पराजय होती है, जिसे कुछ लोग समझ नहीं पाते।"

    सोशल मीडिया से भड़के जेपी नड्डा
    पूर्व बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने इस बिल के पारित न होने पर निराशा जाहिर की है. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, 'लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक-2026 का पारित नहीं होना कांग्रेस, TMC, DMK, समाजवादी पार्टी और इंडिया गठबंधन की महिला विरोधी मानसिकता को दिखाता है। 

    जेपी नड्डा ने दावा किया कि नारी शक्ति का अपमान विपक्ष को बहुत भारी पड़ेगा. उन्होंने कहा, 'ये आक्रोश अब रुकने वाला नहीं है. 2029 के लोकसभा चुनाव से लेकर हर छोटे-बड़े चुनाव तक, देश की बहनें अपने सपनों को रौंदने वालों को कड़ा सबक सिखाएंगी. याद रखिए, शक्ति का ये क्रोध आपके राजनीतिक अंत की शुरुआत है। 

    अमिता शाह ने विपक्ष को चेताया
    वहीं, गृह मंत्री अमित शाह ने भी कहा कि शुक्रवार को लोकसभा में बहुत अजीब मंजर दिखा. नारी शक्ति वंदन अधिनियम के लिए जरूरी संविधान संशोधन बिल को कांग्रेस, TMC, DMK और समाजवादी पार्टी ने पारित नहीं होने दिया. महिलाओं को 33% आरक्षण देने के बिल को गिरा देना, उसका उत्साह मनाना और जयनाद करना सचमुच निंदनीय और कल्पना से परे है। 

    अमित शाह ने लिखा, 'मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि नारी शक्ति के अपमान की ये बात यहां नहीं रुकेगी, दूर तक जाएगी. विपक्ष को महिलाओं का आक्रोश न सिर्फ 2029 लोकसभा चुनाव में, बल्कि हर स्तर, हर चुनाव और हर स्थान पर झेलना पड़ेगा। 

    देवेंद्र फडणवीस ने भी पोस्ट में लिखा, 'पूरे देश ने विपक्ष का पाखंड देखा. उनके पास हमारी ना रीशक्ति के साथ खड़े होने का ऐतिहासिक अवसर था, लेकिन वो इसमें असफल रहे. उनके लिए महिला सशक्तिकरण केवल भाषणों और नारों तक ही सीमित है. उन्होंने प्रगति की जगह राजनीति को चुना. नारी शक्ति वंदन विधेयक के प्रति उनके विरोध ने ये उजागर कर दिया है कि वो वाकई में किसके हितों की सेवा करते हैं. भारत की महिलाएं देख रही हैं और वो इसे नहीं भूलेंगी। 

    नितिन नवीन ने क्या कहा?
    वहीं, इस बिल के पारित न होने पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने कांग्रेस तथा उसके सहयोगी दलों की कड़ी आलोचना करते हुए शुक्रवार को कहा कि इन दलों ने ’’महिला विरोधी रुख’’ अपनाया और देश की महिलाओं के साथ विश्वासघात किया है।

    संसद भवन परिसर में मीडिया से बातचीत में नवीन ने कहा कि यह दिन ’’सुनहरे अक्षरों में लिखा जा सकता था’’ लेकिन कांग्रेस और उसके सहयोगियों के ’’घोर विश्वासघात’’ ने सब बेकार कर दिया। उन्होंने कहा,"कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी तथा उनकी टीम के नेतृत्व वाले उसके महिला विरोधी गठबंधन ने देश की आधी आबादी के साथ घोर विश्वासघात किया है।"

    नवीन ने कहा कि यह विधेयक महिलाओं की अधिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम हो सकता था, लेकिन समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) सहित विपक्षी दलों ने महिलाओं को उनके ’’उचित अधिकारों एवं हिस्सेदारी’’ से वंचित कर दिया।

    उन्होंने कहा, ’’इस पूरे घटनाक्रम से कांग्रेस गठबंधन का महिला विरोधी चरित्र पूरी तरह से उजागर हो गया है।’’ भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि सत्ताधारी पार्टी और प्रधानमंत्री ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह ’’श्रेय की लड़ाई नहीं’’ बल्कि महिलाओं के अधिकारों को सुरक्षित करने की लड़ाई है।

    लोकतंत्र के लिए 'काला दिन’: शिवराज सिंह चौहान
    वहीं, केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस (इंडिया) पर हमला करते हुए 17 अप्रैल को देश की महिलाओं और लोकतंत्र के लिए ’’काला दिन’’ करार दिया।

    इस बीच, केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने शुक्रवार को कहा कि महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की गारंटी देने से संबंधित इस विधेयक को न सिर्फ खारिज किया गया, बल्कि चौंकाने वाली बात यह है कि इस पर जीत के नारे लगाकर जश्न मनाया गया। उन्होंने कहा कि इस ’’विश्वासघात’’ की राजनीतिक कीमत न सिर्फ 2029 के लोकसभा चुनाव में, बल्कि पूरे भारत में हर चुनाव में चुकानी पड़ेगी।

     

  • महिला आरक्षण कानून 2023 लागू, संसद में महा-बहस के बाद आधी रात को जारी हुआ नोटिफिकेशन

    महिला आरक्षण कानून 2023 लागू, संसद में महा-बहस के बाद आधी रात को जारी हुआ नोटिफिकेशन

    नई दिल्ली

    सरकार ने गुरुवार से 2023 का नारी शक्ति अभिनंदन अधिनियम देशभर में लागू कर दिया।  सरकार ने यह फैसला ऐसे वक्त में लिया है, जब इस पर संसद में बहस जारी है इस अधिनियम में बदलाव के लिए कल यानी गुरुवार को ही लोकसभा में बिल आया और देर रात करीब 1.20 बजे तक चर्चा चली। आज भी इस पर दिनभर चर्चा होगी और शाम में करीब 4 बजे इस पर वोटिंग होगी। वहीं कहा गया है कि केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल द्वारा 16 अप्रैल को पेश किए गए प्रस्ताव पर आगे विचार करते हुए, निम्नलिखित विधेयक लोकसभा में पारित करने के लिए पेश किए जाएंगे।

        संविधान (एक सौ इकतीसवां संशोधन) विधेयक
         2026 और परिसीमन विधेयक, 2026।

    गुरुवार की देर रात तक बहस चली
    महिला आरक्षण विधेयक को लेकर गुरुवार की देर रात तक संसद में बहस चली। नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर लोकसभा में बहस जारी है और इस बीच केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था करने वाला महिला आरक्षण अधिनियम 2023 को 16 अप्रैल बृहस्पतिवार से लागू कर दिया है।  

    केंद्रीय विधि मंत्रालय द्वारा जारी एक नोटिफिकेशन यानी अधिसूचना में यह जानकारी दी गई है। हालांकि, यह तुरंत पता नहीं चल पाया है कि संसद में इस महिला आरक्षण कानून में संशोधन करने और इसे 2029 में लागू करने पर जारी चर्चा के बीच 2023 के अधिनियम को 16 अप्रैल से प्रभावी क्यों अधिसूचित किया गया है? 

    मौजूदा लोकसभा में नहीं होगा लागू
    एक सरकारी अधिकारी ने इसे ‘तकनीकी कारणों' से जुड़ा मामला बताया, लेकिन इस पर विस्तृत जानकारी नहीं दी. अधिकारी ने स्पष्ट किया कि कानून के लागू हो जाने के बावजूद मौजूदा लोकसभा में महिला आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता. अधिकारी के अनुसार, महिलाओं के लिए आरक्षण केवल जनगणना के बाद होने वाली परिसीमन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही लागू किया जा सकेगा। 

    'सरकार श्रेय लेना नहीं चाहती'
    इससे पहले केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि महिला आरक्षण विधेयक पर शुक्रवार शाम 4 बजे सदन में वोटिंग होगी. संसद में महिला आरक्षण और डिलिमिटेशन पर चल रही चर्चा को लेकर रिजिजू ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने सभी से इसका समर्थन करने की अपील की है. इसके बाद किसी तरह के भ्रम की गुंजाइश नहीं है। 

    गृह मंत्री अमित शाह ने भी दक्षिण भारत में फैल रही आशंकाओं को आंकड़ों के जरिए दूर किया है. इसके बावजूद अगर कोई विरोध करता है तो वह इस मुद्दे पर राजनीति कर रहा है. संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करना सभी की जिम्मेदारी है और सरकार इसका श्रेय लेना नहीं चाहती। 

    विपक्ष के दावों पर सवाल उठाते हुए रिजिजू ने कहा कि सरकार ने सभी दलों के नेताओं से बातचीत की है. कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे को तीन बार पत्र लिखे गए, जबकि टीएमसी, डीएमके और सपा के नेताओं से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात कर समर्थन की अपील की गई। 

    महिला आरक्षण पर ये बोले पीएम मोदी 
    संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक पर जोरदार बहस हुई थी. पीएम मोदी ने अपनी स्पीच में विपक्ष को आइना दिखाते हुए कहा, 'चुनाव में महिलाओं को मिलने वाले इस अधिकार का जिस जिसने विरोध किया, उसका हाल बुरा हुआ है. मैं अपील करने आया हूं कि इसको राजनीतिक तराजू से मत तौलिए. आज का यह अवसर एक साथ बैठकर एक दिशा में सोचकर विकसित भारत बनाने में खुले मन से स्वीकार करने का अवसर है. पूरा देश विशेषकर नारी शक्ति हमारे निर्णय तो देखेगी, लेकिन उससे ज्यादा हमारी नीयत को देखेगी, इसलिए हमारी नीयत की खोट देश की नारी शक्ति कभी माफ नहीं करेगी। 

    प्रियंका गांधी ने सरकार को घेरा
    वहीं, कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने केंद्र सरकार को घेरते हुए कहा, महिला आरक्षण पर मैंने इसका प्रारूप पढ़ा है. सबसे पहले इसमें लिखा है कि महिला आरक्षण 2029 तक लागू हो, हम सहमत हैं. दूसरा है कि सीटों की संख्या 850 तक बढ़ाई जाएगी. इसके लिए परिसीमन आयोग बनाया जाएगा जो 2011 की जनगणना को आधार बनाएगा. इसकी गहराई में जाएं तो इसमें राजनीति की बू आती है. 2023 के बिल में दो चीजें थी जो इसमें नहीं है. उसमें लिखा था कि नई जनगणना कराई जाएगी। 

    प्रियंका ने कहा कि वे कह रहे हैं कि उन्हें इसका श्रेय नहीं चाहिए. बार-बार बहकाने वाले पुरुषों को महिलाएं पहचान लेती हैं. सावधान हो जाइए नहीं तो पकड़े जाएंगे. 2023 में मोदी सरकार ने जब यह बिल पास किया तो हमने उसका समर्थन किया. आज भी उसमें कोई शक नहीं होना चाहिए कि कांग्रेस इसका समर्थन नहीं करेगी. हम डटकर खड़े हैं। 

    क्या कहता है सरकार का नोटिफिकेशन
    कानून मंत्रालय की अधिसूचना में कहा गया है, 'संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम, 2023 की धारा 1 की उपधारा (2) के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, केंद्र सरकार 16 अप्रैल, 2026 को वह तिथि नियुक्त करती है, जिस दिन उक्त अधिनियम के प्रावधान लागू होंगे। 

    गौरतलब है कि सितंबर 2023 में संसद ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम' पारित किया था, जिसे महिला आरक्षण कानून के नाम से जाना जाता है. यह कानून लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान करता है। 

    हालांकि, 2023 के कानून के अनुसार यह आरक्षण 2027 की जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन से जुड़ा होने के कारण 2034 से पहले लागू नहीं हो सकता था. लोकसभा में वर्तमान में जिन तीन विधेयकों पर चर्चा हो रही है, उन्हें सरकार ने इसी उद्देश्य से पेश किया है कि महिला आरक्षण को 2029 से लागू किया जा सके। 

    क्या है महिला आरक्षण कानून
    अधिसूचना के अनुसार, संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम, 2023 की धारा 1 की उपधारा (2) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए केंद्र सरकार  16 अप्रैल, 2026 को वह तिथि घोषित करती है जिस दिन से उक्त अधिनियम के प्रावधान लागू होंगे। इस अधिनियम में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीट आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है। 2023 के कानून के तहत आरक्षण 2034 से पहले लागू नहीं हो पाता, क्योंकि यह 2027 की जनगणना के बाद परिसीमन प्रक्रिया के पूरा होने से जुड़ा हुआ है।

  • विधानसभा चुनावों से पहले नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर सक्रियता, यूपी और गुजरात में सियासी लाभ की तैयारी

    विधानसभा चुनावों से पहले नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर सक्रियता, यूपी और गुजरात में सियासी लाभ की तैयारी

     नई दिल्ली
     पिछले सप्ताह केंद्र सरकार ने अचानक नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण) के तहत संसद और विधानसभाओं में 33 फीसदी महिला आरक्षण के लिए संविधान संशोधन से संबंधित तैयारी शुरू की. उसने इसके लिए विपक्ष से सहयोग मांगा है. बताया यह जा रहा है कि विधानसभा चुनाव संपन्न हो जाने के बाद संसद का विशेष सत्र बुलाकर संविधान संशोधन विधेयक पारित किया जायेगा. इसमें कई सारे कदम उठाये जाने की बात कही गयी है. जैसे-संविधान संशोधन से लोकसभा की सीटें 543 से बढ़कर 816 हो जाने वाली हैं, जिनमें से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जायेंगी.

    इसके अलावा, सरकार ने परिसीमन को 2026-27 के बजाय 2011 की जनगणना के आधार पर कराने का फैसला किया है. इसके पीछे तर्क यह है कि नयी जनगणना होने और उसका आंकड़ा आने में इतना समय लग जायेगा कि 2029 के लोकसभा चुनाव तक परिसीमन नहीं हो पायेगा. एक और प्रस्ताव यह है कि संशोधन से राज्यों में सीटों की वृद्धि का अनुपात नहीं बदलेगा. जबकि पहले ऐसा माना जा रहा था कि कम जनसंख्या होने के कारण दक्षिण भारत के राज्यों को खामियाजा भुगतना पड़ेगा.

    इस कारण दक्षिण के नेता क्षुब्ध थे. लेकिन नये प्रस्ताव के मुताबिक, परिसीमन से उत्तर प्रदेश की लोकसभा सीटें 80 से बढ़कर अगर 120 हो जायेंगी, तो तमिलनाडु में भी लोकसभा सीटों में वृद्धि इसी अनुपात में होगी. परिसीमन के मुद्दे पर लंबे समय से उत्तर बनाम दक्षिण का न सिर्फ द्वंद्व छिड़ा हुआ था, बल्कि दक्षिण के राज्यों को लगता था कि जनसंख्या को नियंत्रित रखने का उन्हें दंड दिया जा रहा है, जबकि ज्यादा आबादी वाले उत्तर भारत के राज्यों को परिसीमन के जरिये बड़ा राजनीतिक लाभ मिलेगा. लेकिन नये प्रस्ताव में यह आशंका दूर हो गयी है.

    2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन कराकर दक्षिण की आशंकाओं को दूर करने की कोशिश
    दरअसल, परिसीमन मुद्दे पर एनडीए में भाजपा के सहयोगी चंद्रबाबू नायडू तक का रवैया नाराजगी भरा था, और वैसे में, दक्षिण भारत में भाजपा के लिए अपना विस्तार कर पाना कठिन होता, इसलिए 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन कराकर दक्षिण की आशंकाओं को दूर करने की कोशिश है. दरअसल, 19 सितंबर, 2023 को जब नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण) संसद से पारित हुआ था, तब इसे जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन और 2029 के लोकसभा चुनाव से लागू करने की घोषणा की गयी थी. लेकिन अब सरकार ये दोनों कार्य संविधान संशोधन के जरिये करना चाहती है. संविधान संशोधन के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत चाहिए, जो सरकार के पास नहीं है. इसके अलावा, आधे राज्यों को इसे पारित कराना होगा. बेशक मौजूदा राजनीतिक माहौल में इसे पारित कराना आसान नहीं है. लेकिन विपक्षी दल महिला आरक्षण का विरोध भी नहीं कर पायेंगे.
    अगर संसद के विशेष सत्र में इस पर मुहर लग जाती है, तो फिर परिसीमन आयोग बैठेगा, और उम्मीद की जानी चाहिए कि अगले वर्ष तक महिला आरक्षण लागू हो जायेगा. हालांकि यह सवाल उठाया जा रहा है कि महिला आरक्षण को अगर 2011 की जनगणना और परिसीमन के आंकड़ों पर ही लागू करना था, तो इसे पहले भी लाया जा सकता था. लेकिन सरकार अब अचानक यह कदम उठाने जा रही है, तो कुछ सोच-समझकर ही उठा रही होगी. दरअसल, अगले साल तीन राज्यों-उत्तर प्रदेश, गुजरात और पंजाब में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. ये चुनाव, जाहिर है कि भाजपा और एनडीए के लिए बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं.

    अगर अगले साल तक महिला आरक्षण लागू हो जाता है, तो इन तीनों राज्यों में भाजपा को चुनावी लाभ मिलना तय है. फिर 2029 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को इसका लाभ मिलेगा. हालांकि फिलहाल यह प्रस्ताव है, और काफी जटिल भी है. कई प्रश्नों के जवाब अभी तक नहीं मिले हैं. जैसे परिसीमन के बाद लोकसभा में महिलाओं के लिए 273 सीटें आरक्षित हो जायेंगी. लेकिन ये सीटें किस तरह आरक्षित होंगी, इस बारे में अभी कुछ तय नहीं है. सवाल यह भी है कि परिसीमन जब 2011 की जनगणना के आधार पर ही होना है, तो फिर 2026-27 की जनगणना के आधार पर नये सिरे से परिसीमन कराने का क्या औचित्य होगा. फिलहाल लगता है कि पश्चिम एशिया संकट को देखते हुए सरकार ने यह दांव चला है.

    दरअसल युद्ध का लंबा असर रहने वाला है, और हमारी अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव भी लंबे समय तक रहेगा. इस कारण आय से लेकर रोजगार तक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. ऐसे में, महिला आरक्षण लागू कर सरकार महिलाओं का एकमुश्त वोट अपने साथ होने की उम्मीद कर सकती है. इस मामले में दो बातों पर ध्यान देना चाहिए. एक यह कि चुनावों में महिला वोटरों की भूमिका अब पुरुष वोटरों के बराबर या उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण होने लगी है. इसके अलावा, महिलाओं का बड़ा वर्ग पहले से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के साथ है. ऐसे में, अगर मान लें कि युद्ध के असर से युवा वर्ग सरकार से नाराज हो जाये, तो उसका चुनावी नतीजे पर बड़ा असर पड़ने की आशंका नहीं है. इसके अलावा, परिसीमन चूंकि 2011 के आंकड़े पर ही होना है, ऐसे में, दक्षिण भारत के नेता खुश हैं, और वहां भाजपा को नाराजगी का सामना भी नहीं करना पड़ेगा.

    लेकिन इस कदम को सिर्फ चुनावी राजनीति के चश्मे से देखना सही नहीं होगा. लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में बहुप्रतीक्षित महिला आरक्षण लागू हो जाता है, तो यह भारतीय राजनीति की एक बड़ी उपलब्धि होगा. हालांकि कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि महिला आरक्षण के कारण जिन पुरुष राजनेताओं को अपनी सीटें गंवानी पड़ेंगी, वे आरक्षित सीटों पर अपनी महिला रिश्तेदारों को बिठा सकते हैं. और बहुत संभव है कि इसे राजनीतिक बुराई के तौर पर ही देखा जाये.

    महिला आरक्षण के कारण बड़ी संख्या में स्त्रियों में जागृति और आत्मविश्वास की भावना आयी है
    लेकिन पंचायतों और नगरपालिकाओं में महिला आरक्षण लागू होने के बाद हमने देखा है कि भले ही अनेक जगहों पर वास्तविक ताकत अब भी महिला प्रमुखों के पतियों के पास ही हो, लेकिन महिला आरक्षण के कारण बड़ी संख्या में स्त्रियों में जागृति और आत्मविश्वास की भावना आयी है. और अब वे राज्य विधानसभाओं और लोकसभा में अपनी जगह लेने के लिए तैयार हैं. इस लिहाज से महिला आरक्षण भारतीय राजनीति को बदलने के साथ-साथ उसमें नयी ऊर्जा भर सकता है. संसद और विधानमंडलों में महिलाओं की संख्या बढ़ने पर वे शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और आजीविका जैसे मुद्दों पर नीति निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेंगी, जिसका समाज पर निश्चित रूप से सकारात्मक असर पड़ेगा.