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  • यूपीकॉस के जरिए आउटसोर्स कर्मियों को नई उम्मीद, भरोसे और सुशासन की मजबूत नींव तैयार

    यूपीकॉस के जरिए आउटसोर्स कर्मियों को नई उम्मीद, भरोसे और सुशासन की मजबूत नींव तैयार

    यूपीकॉस: भरोसे की नींव पर खड़ी नई व्यवस्था

    लखनऊ  
    किसी भी सरकार की संवेदनशीलता परखने के लिए यह देखने की जरूरत नहीं कि वह अपने राज्य के ताकतवर तबके के लिए क्या करती है, यह देखना जरूरी है कि वह अपने सबसे कमजोर, सबसे अनदेखे और सबसे मौन नागरिक के लिए क्या सोचती है। आउटसोर्सिंग व्यवस्था में काम करने वाला कर्मचारी दफ्तर में सबसे पहले आता है और सबसे बाद में जाता है, लेकिन व्यवस्था में उसका स्थान हमेशा सबसे अंतिम पायदान पर रहा है। न उसे स्थायी कर्मचारी जैसा सम्मान मिलता, न सामाजिक सुरक्षा की गारंटी, न भविष्य निधि की निश्चितता। वह विभाग, एजेंसी और खुद अपने बीच बंटा हुआ एक ऐसा व्यक्ति था, जिसकी पीड़ा सुनने वाला कोई संस्थागत तंत्र नहीं था। यही वह शून्य था, जिसे भरने का प्रयास मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राज्य सरकार ने उत्तर प्रदेश आउटसोर्स सेवा निगम (यूपीकॉस) गठित करके किया है। 

    एक लंबे इंतज़ार का अंत
    आउटसोर्स कर्मचारी बरसों तक शासन-प्रशासन की भूल-भुलैया में अपनी पहचान तलाशता रहा। हर महीने वेतन कब आएगा, यह सवाल उसके लिए स्थायी बना रहा। उसे इस बात का भी यकीन नहीं था कि उसकी तकलीफ कभी किसी दहलीज़ तक पहुंचेगी भी या नहीं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा बुधवार को उत्तर प्रदेश आउटसोर्स सेवा निगम का उद्घाटन इसी लंबी प्रतीक्षा को विराम देने वाला क्षण है। यह केवल एक नए निगम की स्थापना भर नहीं, बल्कि उस अदृश्य कर्मचारी वर्ग को औपचारिक पहचान और संस्थागत सहारा देने की पहल है, जो अब तक व्यवस्था के हाशिए पर खड़ा रहकर काम करता आया।

    पुरानी व्यवस्था की टूटी कड़ियां
    2017 से पहले के दौर को देखें तो एक असहज तस्वीर उभरती है। तब आउटसोर्स कर्मचारी को संसाधन समझा ही नहीं जाता था। ठेके देने का काम अक्सर उन्हीं एजेंसियों को मिलता, जिनके तार सत्ता के गलियारों से जुड़े रिश्तेदारों और करीबियों तक जाते थे। भर्ती के नाम पर, वर्दी के नाम पर, और अन्य छोटी-छोटी सुविधाओं के नाम पर शोषण की कहानियां आम बात थीं। पूरा ढांचा तीन हिस्सों में टूटा हुआ था- कार्मिक, एजेंसी और विभाग। किसी समस्या के साथ कर्मचारी जब एक दरवाज़े पर पहुंचता, तो उसे दूसरे दरवाज़े की ओर मोड़ दिया जाता। न वेतन समय पर मिलने की गारंटी, न ईपीएफ-ईएसआई को लेकर कोई स्पष्टता, न सेवा अधिकारों की कोई ठोस रूपरेखा। इस प्रशासनिक ढिलाई ने लाखों परिवारों को स्थायी अनिश्चितता में जीने पर मजबूर कर दिया था।

    बोझ से संपत्ति तक का वैचारिक सफर
    समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्तियों तक शासन की नीतियों, योजनाओं व कार्यक्रमों का लाभ पहुंचाने को अपना विजन बनाने वाली योगी सरकार ने इस सोच को जड़ से बदलने का मानवीय दृष्टिकोण अपनाया। योगी सरकार में आउटसोर्स कर्मी अब बोझ नहीं, राज्य की मानव पूंजी के रूप में देखा जा रहा है। यही वैचारिक बदलाव यूपीकॉस की बुनियाद है। इसके दायरे और गहराई को आंकड़ों से इसे और गहराई से समझा जा सकता है। साढ़े तीन लाख से ज़्यादा आउटसोर्स कर्मचारी सीधे इसके दायरे में आएंगे, और जब उनके परिवारजनों को जोड़ें तो यह संख्या 17 से 20 लाख के बीच पहुंच जाती है। यह अकेले किसी वर्ग विशेष की बात नहीं, बल्कि प्रदेश की सामाजिक बुनावट के एक बड़े हिस्से की तक़दीर बदलने वाला निर्णय है। हर महीने की पांचवीं तारीख तक पारिश्रमिक सीधे बैंक खाते में स्थानांतरित होगा, जिससे पूरी व्यवस्था में किसी पड़ाव पर भी बिचौलियों के लिए कोई स्थान नहीं होगा और भुगतान संबंधित तमाम विसंगतियों पर लगाम लगेगी।

    सुरक्षा कवच जो जीवन बदल देगा
    इससे भी आगे बढ़कर बनाई गई व्यवस्था इस फैसले को असल मायनों में इंसानी बनाती है। किसी दुर्घटना, हादसे या आपदा की स्थिति में परिवार को 20 से 40 लाख रुपये तक का बीमा संरक्षण मिलेगा। यह प्रावधान उस डर को खत्म करता है, जो हर आउटसोर्स कर्मचारी के भीतर हमेशा से बना रहा कि किसी अनहोनी की सूरत में उसका परिवार बेसहारा हो जाएगा। ईपीएफ और ईएसआई का योगदान अब निश्चित रूप से जमा होगा। सरकार खुद एजेंसी को सर्विस चार्ज देगी, ताकि कर्मचारी की जेब पर कोई अतिरिक्त बोझ न पड़े। यह व्यवस्था उस आर्थिक दबाव को सीधे कम करती है, जो अब तक कर्मचारी अकेले उठाता आया था। नौकरी को लेकर छाई असुरक्षा भी अब समाप्त होने जा रही है। कोई भी एजेंसी अब किसी कर्मी को अपनी मर्ज़ी से बर्खास्त नहीं कर सकेगी। ऐसा कोई भी कदम उठाने से पहले सरकार को जानकारी देनी होगी, और उचित जांच के बाद ही निर्णय लिया जाएगा। 

    परिवार तक फैला भरोसे का दायरा
    असली सामाजिक सुरक्षा वही है, जिसमें कोई भी कर्मचारी अपने पूरे परिवार को संरक्षण के दायरे में पाता है। बेटे की पढ़ाई के लिए आठ लाख रुपये तक और बेटी की पढ़ाई के लिए दस लाख रुपये तक की मदद, दो बेटियों की शादी के लिए आठ से दस लाख रुपये तक का सहयोग, और कर्मचारी के आकस्मिक निधन जैसी अप्रिय स्थिति में अंतिम संस्कार के लिए पचास हजार रुपये तक की व्यवस्था- ये सभी प्रावधान मिलकर एक पारिवारिक सुरक्षा कवच का निर्माण करते हैं। मातृत्व अवकाश जैसे वैधानिक लाभ भी अब सुनिश्चित किए गए हैं। यूपीकॉस पोर्टल और वेबसाइट का शुभारंभ इस पूरी संरचना को डिजिटल पारदर्शिता से जोड़ता है, जहां हर कर्मचारी की समस्या को सुनने और सुलझाने के लिए एक स्थायी संस्थागत तंत्र मौजूद रहेगा।

    मुख्यमंत्री की सोच श्रम के प्रति गहरे सम्मान को दर्शाती है। यूपीकॉस इसी सम्मान भावना का प्रतिबिंब है, ठीक वैसे ही जैसे योगी सरकार के वे तमाम फैसले हैं, जिन्होंने किसानों, नौजवानों, महिलाओं व कर्मचारियों के साथ ही समाज के हर तबके के वंचित लोगों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा है। 2017 में जो वृद्धावस्था, निराश्रित महिला और दिव्यांगजन पेंशन मात्र तीन सौ रुपये थी, वह आज बढ़कर पंद्रह सौ रुपये हो चुकी है। रसोइयों के मानदेय में भी इज़ाफा किया गया है। ये सभी निर्णय मिलकर उस नीति की तस्वीर पेश करते हैं, जिसमें समाज के सबसे उपेक्षित वर्गों तक सम्मान और सुरक्षा पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।

    भरोसे की जीत
    यूपीकॉस केवल एक प्रशासनिक इकाई नहीं है, यह एक सामाजिक वादा है। यह इस विश्वास की पुनर्स्थापना है कि सरकार और कर्मचारी का नाता केवल वेतन और काम तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसकी नींव भरोसे और उत्तरदायित्व पर टिकी होती है। जब कोई कर्मचारी यह महसूस करता है कि उसकी मेहनत सुरक्षित है, उसका परिवार सुरक्षित है और उसकी आवाज़ को सुना जाएगा, तभी वह सच्चे मायनों में गरिमा के साथ अपना जीवन जी पाता है। यूपीकॉस इसी गरिमा को स्थायी रूप देने को दिशा में उठाया गया एक निर्णायक कदम है।

    जगदीश त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार

     

  • UPCOS से आउटसोर्स कर्मचारियों को सुरक्षा कवच, पूरा वेतन समय पर देने की व्यवस्था; सामाजिक सुरक्षा भी सुनिश्चित

    UPCOS से आउटसोर्स कर्मचारियों को सुरक्षा कवच, पूरा वेतन समय पर देने की व्यवस्था; सामाजिक सुरक्षा भी सुनिश्चित

    यूपी में आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए ऐतिहासिक शुरुआत : समय पर मिलेगा पूरा वेतन, सामाजिक सुरक्षा की भी गारंटी

    – आउटसोर्स कर्मियों के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 'यूपीकोस' का किया विधिवत शुभारंभ, पोर्टल और वेबसाइट लॉन्च

    – आउटसोर्सिंग व्यवस्था में बिचौलियों का खेल खत्म, अब हर महीने की 5 तारीख तक सीधे खाते में आएगा वेतन

    – एजेंसियां अब मनमाने ढंग से नहीं कर सकेंगी छंटनी, नई एजेंसी आने पर भी बरकरार रहेगी पुराने कर्मियों की नौकरी

    – आउटसोर्स पद चार श्रेणियों में बंटे, डॉक्टरों से लेकर चतुर्थ श्रेणी कर्मियों तक का मानदेय हुआ निर्धारित

    – एमबीबीएस डॉक्टर, इंजीनियर को न्यूनतम 40 हजार और चतुर्थ श्रेणी कर्मियों को 20 हजार रुपये मानदेय मिलेगा

    – सभी आउटसोर्स कर्मियों को मिलेगा ईपीएफ और ईएसआई का पक्का कानूनी सुरक्षा कवच

    – ईएसआई के तहत मुफ्त इलाज, दवाएं और महिला कर्मियों को मिलेगा पूरा सवेतन मातृत्व अवकाश

    – दुर्घटना में मृत्यु या दिव्यांगता पर बिना किसी प्रीमियम के बैंक खाते से मिलेगा 40 लाख रुपये तक का कवर

    – चतुर्थ श्रेणी कर्मियों के बच्चों का उच्च शिक्षा या सिविल सेवा मुख्य परीक्षा में चयन होने पर 1 लाख रुपये की मदद

    – आउटसोर्स भर्तियों में लागू होगा संवैधानिक आरक्षण, जेम पोर्टल के जरिए पारदर्शी ढंग से चुनी जाएंगी एजेंसियां

    लखनऊ, 
     उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी दफ्तरों में काम करने वाले आउटसोर्स कर्मचारियों के जीवन में बड़ा बदलाव लाने की दिशा में ठोस कदम उठाया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बुधवार को राजधानी लखनऊ स्थित लोक भवन में उत्तर प्रदेश आउटसोर्सिंग सेवा निगम यानी ‘यूपीकोस’ का विधिवत शुभारंभ किया। इस खास मौके पर मुख्यमंत्री ने निगम का आधिकारिक लोगो, वेबसाइट और पोर्टल जनता को समर्पित किया। कार्यक्रम के दौरान आउटसोर्स कर्मियों को पारिश्रमिक के चेक भी वितरित किए गए। प्रदेश के सरकारी दफ्तरों, अस्पतालों, नगर निकायों और शिक्षण संस्थानों में करीब 3.5 लाख युवा वर्षों से सेवा दे रहे हैं। काम पूरी तरह सरकारी था लेकिन उनकी आजीविका की सुरक्षा निजी एजेंसियों के भरोसे छोड़ दी गई थी। यूपीकोस का गठन इसी बड़ी खाई को पाटने का एक ऐतिहासिक प्रयास बनकर उभरा है।

    बिचौलियों के चंगुल में फंसी थी पुरानी व्यवस्था
    पुरानी व्यवस्था में आउटसोर्स कर्मचारी हमेशा खुद को असहाय महसूस करता था। कर्मचारी काम तो सरकारी विभाग का करता था, लेकिन उसका वेतन निजी एजेंसी के माध्यम से आता था। सरकार इस पूरे लेन-देन से एकदम अलग-थलग दिखाई पड़ती थी। किसी भी समस्या के समाधान के लिए कर्मचारी को तीन दरवाजों के चक्कर काटने पड़ते थे। विभाग उसे एजेंसी के पास भेजता था और एजेंसी उसे टरका देती थी। कागज पर दर्ज वेतन और हाथ में आने वाली रकम में जमीन-आसमान का अंतर होता था। बिना किसी जवाबदेही के काम कर रहीं ये एजेंसियां कर्मचारियों की गाढ़ी कमाई में से भी हिस्सा काट लेती थीं। इसके अलावा कई जगह महीनों तक वेतन न मिलना एक सामान्य बात बन चुकी थी।

    शोषण, कटौती और भय के अंतहीन दौर का अंत
    पहले के दौर में आउटसोर्सिंग का दायरा मनमानी और शोषण का पर्याय बन चुका था। एजेंसियां कर्मचारियों के पारिश्रमिक से मनमाने ढंग से अवैध कटौती करती थीं। नौकरी पर रखने और अनुबंध के नवीनीकरण के नाम पर गरीब अभ्यर्थियों से धन उगाही की शिकायतें आम थीं। चयन की कोई पारदर्शी और निष्पक्ष व्यवस्था न होने से मेधावी युवा पिछड़ जाते थे। ईपीएफ और ईएसआई की सुविधाएं सिर्फ कागजों पर सिमट कर रह गई थीं। कई कर्मचारियों के खाते तक नहीं खोले जाते थे। यदि खाते खुल भी गए तो उनमें पैसा समय पर जमा नहीं होता था। एजेंसी बदलते ही पुराना जमा पैसा फंस जाता था। नतीजतन बीमारी या दुर्घटना की स्थिति में कर्मचारियों को कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं मिल पाती थी।

    त्रिपक्षीय व्यवस्था से पारदर्शी समाधान की व्यवस्था
    इस गंभीर और पुरानी समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए सरकार ने एक मजबूत निगम की नींव रखी है। यूपीकोस के माध्यम से अब शोषण के सारे रास्ते बंद किए जा रहे हैं। नई नीति के तहत विभाग, यूपीकोस निगम और सेवा प्रदाता एजेंसी एक कानूनी त्रिपक्षीय समझौते से बंधेंगे। संबंधित सरकारी विभाग अपनी आवश्यकता सीधे निगम को भेजेगा। निगम तय नियमों के तहत एजेंसी के जरिए कुशल कर्मचारी उपलब्ध कराएगा। इस व्यवस्था से कर्मचारी अब अकेला नहीं रहेगा और सरकार उसकी सुरक्षा की सीधी गारंटर बनेगी। व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए एजेंसियों का चयन जेम पोर्टल के जरिए होगा। सभी कर्मचारियों की भर्ती, उपस्थिति और भुगतान का पूरा ब्योरा एक ही पोर्टल पर दर्ज रहेगा। नियम तोड़ने वाली एजेंसियों को तुरंत ब्लैकलिस्ट कर उन पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा।

    हर महीने की पांच तारीख पर आ जाएगी तनख्वाह
    नई व्यवस्था का सबसे क्रांतिकारी और राहत देने वाला पहलू समय पर पूरा भुगतान सुनिश्चित करना है। अब हर महीने की पांच तारीख को कर्मचारी के बैंक खाते में पूरा पारिश्रमिक सीधे पहुंचेगा। काम का आकलन हर महीने की इक्कीस तारीख से लेकर अगले महीने की बीस तारीख तक किया जाएगा। व्यवस्था ऐसी बनाई गई है कि एजेंसी को पहले कर्मचारी के खाते में पूरा वेतन जमा करना होगा। जब कर्मचारी का वेतन सुरक्षित हो जाएगा, उसके बाद ही निगम एजेंसी को उसका तय कमीशन जारी करेगा। यदि किसी विभाग में समय पर बजट उपलब्ध नहीं होगा, तो भी कर्मचारी का वेतन नहीं रुकेगा। ऐसे हालात में वित्त विभाग से अग्रिम बजट लेकर कर्मचारियों को समय पर पैसा दिया जाएगा और विभाग बाद में यह राशि लौटाएगा।

    छंटनी की मनमानी पर लगेगी पूरी तरह से रोक
    आउटसोर्स कर्मचारियों के मन में हर वक्त छंटनी की तलवार लटकती रहती थी। एजेंसियां अपनी मर्जी से किसी को भी बाहर का रास्ता दिखा देती थीं। यूपीकोस ने इस डर को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया है। अब कोई भी एजेंसी अपनी मर्जी से किसी कर्मचारी को हटा नहीं सकेगी। अनुशासनहीनता या गंभीर शिकायत की स्थिति में भी विभाग और निगम दोनों की लिखित मंजूरी अनिवार्य होगी। सबसे बड़ी बात यह है कि तीन या चार साल बाद जब पुरानी एजेंसी की जगह नई एजेंसी आएगी, तब भी कार्यरत कर्मचारियों को हटाया नहीं जाएगा। नई एजेंसी को अनिवार्य रूप से वर्तमान में कार्यरत कर्मचारियों को ही अपने साथ बनाए रखना होगा। एजेंसी का कार्यकाल अधिकतम चार वर्ष तक सीमित रहेगा और उसका सर्विस चार्ज भी सरकार द्वारा पहले से तय होगा।

    विशेषज्ञों और डॉक्टरों को श्रेणी एक में मिलेगा सम्मान
    निगम ने सभी पदों और योग्यताओं को पारदर्शी बनाते हुए चार प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया है। पहली श्रेणी में उच्च शैक्षणिक योग्यता और तकनीकी दक्षता वाले पेशेवरों को रखा गया है। इसमें एमबीबीएस डिग्री धारक चिकित्सक, सहायक अभियंता, प्रोजेक्ट अधिकारी और वरिष्ठ लेखा अधिकारी जैसे पद शामिल हैं। इस श्रेणी के कर्मियों का मासिक मानदेय न्यूनतम 40 हजार रुपये निर्धारित किया गया है। सरकारी अस्पतालों में संविदा पर सेवा देने वाले डॉक्टरों को अब न सिर्फ सम्मानजनक मानदेय मिलेगा, बल्कि उन्हें पहली बार ईपीएफ, ईएसआई और बीमा का पक्का कानूनी संरक्षण भी हासिल होगा।

    तकनीकी और प्रशासनिक पदों के लिए श्रेणी दो की व्यवस्था
    दूसरी श्रेणी में स्नातक स्तर की डिग्री और विशेष तकनीकी डिप्लोमा रखने वाले कर्मियों को शामिल किया गया है। इसमें अस्पतालों में दिन-रात सेवा देने वाली स्टाफ नर्स, जूनियर इंजीनियर, सीनियर असिस्टेंट और लीगल असिस्टेंट जैसे महत्वपूर्ण पद आते हैं। इन पदों के लिए न्यूनतम 25 हजार रुपये का मासिक मानदेय तय किया गया है। अस्पताल की समर्पित नर्स हो या दफ्तर का तकनीकी सहायक, सरकार ने दोनों को एक मजबूत और सुरक्षित सामाजिक ढांचे से जोड़ा है। इस व्यवस्था से सेवा के स्तर में सुधार होगा और कर्मियों में अपने दायित्व के प्रति आत्मसम्मान का भाव मजबूत होगा।

    इंटर पास कर्मियों के लिए श्रेणी तीन में मिली सुरक्षा
    तीसरी श्रेणी में उन कर्मचारियों को रखा गया है जो इंटरमीडिएट उत्तीर्ण हैं और कार्यालयों के संचालन में रीढ़ की तरह काम करते हैं। इसमें डाटा एंट्री ऑपरेटर, कंप्यूटर टाइपिस्ट, स्टोरकीपर, इलेक्ट्रीशियन, पैरामेडिकल स्टाफ, ड्राइवर, मैकेनिक और लैब असिस्टेंट शामिल हैं। इनका मानदेय न्यूनतम 22 हजार रुपये तय किया गया है। जूनियर हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी कर सरकारी तंत्र में काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या सबसे अधिक है। पूर्व में सबसे अधिक वेतन कटौती और देरी की मार इसी वर्ग पर पड़ती थी। अब इन्हें तय समय पर सम्मानजनक पारिश्रमिक की पक्की गारंटी दे दी गई है।

    बुनियादी कर्मियों को श्रेणी चार में मिला बड़ा सहारा
    चौथी श्रेणी में कक्षा आठ और दस पास अत्यंत परिश्रमी कर्मियों को शामिल किया गया है। इनमें सफाई कर्मी, स्वीपर, सुरक्षा चौकीदार, माली, रसोइया, वार्ड ब्वॉय और अनुसेवक जैसे आवश्यक पद आते हैं। इन पदों के लिए न्यूनतम 20 हजार रुपये का मानदेय तय किया गया है। ये वे हाथ हैं जिनके बिना अस्पताल, कार्यालय और नगर निकाय एक दिन भी नहीं चल सकते। पिछली व्यवस्था में सबसे कम मानदेय और सबसे अधिक शोषण इन्हीं बुनियादी कर्मियों का होता था। योगी सरकार ने इन्हें न्यूनतम वेतन, ईपीएफ, स्वास्थ्य बीमा और कानूनी संरक्षण देकर सबसे बड़ा सामाजिक संबल प्रदान किया है।

    परिवारों के लिए कल्याण और शिक्षा का संबल बनेगी सरकार
    यह नई नीति सिर्फ कर्मचारी तक सीमित नहीं है बल्कि उसके पूरे परिवार की खुशहाली का ध्यान रखती है। सेवा के दौरान किसी कर्मचारी की असामयिक मृत्यु होने पर तत्काल राहत के रूप में अंतिम संस्कार के लिए पंद्रह हजार रुपये दिए जाएंगे। श्रेणी चार के गरीब कर्मचारियों के होनहार बच्चों के लिए विशेष कल्याण कोष बनाया गया है। यदि किसी चतुर्थ श्रेणी कर्मी का बेटा या बेटी आईआईटी, आईआईएम, एमटेक, मेडिकल या संघ अथवा राज्य लोक सेवा की मुख्य परीक्षा में चयनित होता है, तो उसे एक लाख रुपये की विशेष प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। एक परिवार में एक बच्चे को यह सहायता मिलेगी ताकि आर्थिक तंगी किसी होनहार के सपनों के आड़े न आए।

    इलाज, मातृत्व सुख और बुढ़ापे में पेंशन की सुविधा
    सामाजिक सुरक्षा के मोर्चे पर निगम ने सभी कर्मियों के लिए ईएसआई और ईपीएफ का लाभ अनिवार्य कर दिया है। ईएसआई के दायरे में आने से महिला कर्मचारियों को पूर्ण सवेतन मातृत्व अवकाश मिलेगा। बीमारी की स्थिति में अवकाश और इलाज की पूरी सुविधा दी जाएगी। कर्मचारी और उसके परिजनों को ईएसआई अस्पतालों और सूचीबद्ध निजी अस्पतालों में मुफ्त ओपीडी, जांच, दवाएं और गंभीर सर्जरी की सुविधा मिलेगी। ईपीएफ के जरिए साठ वर्ष की आयु पूरी होने पर सेवाकाल के आधार पर साढ़े सात हजार रुपये तक की मासिक पेंशन सुनिश्चित की गई है। कर्मी की मृत्यु की दशा में आश्रित पत्नी को आजीवन पेंशन मिलेगी और अविवाहित कर्मी के माता-पिता को भी पेंशन की सुविधा दी जाएगी। बैंक सैलरी खाते से दुर्घटना बीमा के रूप में बिना कोई प्रीमियम दिए 40 लाख रुपये तक का सुरक्षा कवर भी जोड़ा गया है।

    संवैधानिक आरक्षण और उच्च स्तरीय निगरानी की व्यवस्था
    योगी सरकार ने इस पूरी व्यवस्था को सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के अनुकूल तैयार किया है। भविष्य में आउटसोर्सिंग के जरिए होने वाली सभी भर्तियों में एससी, एसटी, ओबीसी, ईडब्ल्यूएस, दिव्यांगजन और महिलाओं को पूरा संवैधानिक आरक्षण दिया जाएगा। कर्मियों की कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए समय-समय पर विशेष कौशल प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। निगम के संचालन और पारदर्शिता की निगरानी के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय बोर्ड बनाया गया है। इसमें वित्त, कार्मिक, न्याय और श्रम विभाग के प्रमुख अधिकारी शामिल हैं। हर जिले और मंडल में शिकायतों की जांच के लिए अलग समितियां होंगी। योगी सरकार के इस क्रांतिकारी कदम से अब शोषण का पुराना तंत्र खत्म हो गया है और लाखों आउटसोर्स कर्मियों को उनके श्रम का पूरा सम्मान और अधिकार मिलना तय हुआ है।