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  • LIC Housing Finance Loan Case: 4 कंपनियों का बड़ा प्रस्ताव, सुभाष चंद्रा मामले में 10% ब्याज के साथ चुकाएंगी बकाया

    LIC Housing Finance Loan Case: 4 कंपनियों का बड़ा प्रस्ताव, सुभाष चंद्रा मामले में 10% ब्याज के साथ चुकाएंगी बकाया

     नई दिल्ली
    एस्सेल ग्रुप (Essel Group) के चेयरमैन सुभाष चंद्रा (Subhash Chandra) की पर्सनल गारंटी से जुड़े एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस लोन (LIC Housing Finance Loan) मामले में सेटलमेंट का एक नया प्रस्ताव सामने आया है. सूत्रों के मुताबिक, कर्ज लेने वाली चार कंपनियों ने एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड को 100 फीसदी बकाया मूलधन और उस पर 10 फीसदी ब्याज के साथ भुगतान करने का प्रस्ताव दिया है। 

    इस मामले में यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है, जब इससे पहले ₹22,006 करोड़ के क्लेम के मामले में एनसीएलटी से 99.97 फीसदी हेयरकट मिलने को सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर भारी-भरकम व्यक्तिगत कर्ज माफी बताए जाने को लेकर सुभाष चंद्रा ने आपत्ति जताई थी. उनका कहना था कि इस मामले को भारी-भरकम व्यक्तिगत कर्ज माफी के तौर पर पेश नहीं किया जाना चाहिए. चंद्रा के मुताबिक, उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर किसी लेंडर्स से पैसे नहीं लिए थे. उनका कहना था कि वह सिर्फ एस्सेल ग्रुप से जुड़ी कर्ज लेने वाली कंपनियों के लिए पर्सनल गारंटर थे। 

    किन कंपनियों ने लिया था कर्ज?

    यह मामला उन कंपनियों के कर्ज से जुड़ा है, जिनके लिए सुभाष चंद्रा पर्सनल गारंटर थे. वसंत सागर प्रॉपर्टीज लिमिटेड और पैन इंडिया इन्फ्राप्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड ने एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड से कुल ₹500 करोड़ का कर्ज लिया था. वहीं, डिजिटल सब्सक्राइबर मैनेजमेंट एंड कंसल्टेंसी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड और स्प्रिट इन्फ्रापावर प्रोजेक्ट ने ₹480 करोड़ का लोन लिया था। 

    क्या है नया सेटलमेंट प्रस्ताव?
    सूत्रों के मुताबिक, इन चारों कंपनियों ने एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस को सेटलमेंट प्रस्ताव सौंपे हैं. प्रस्ताव में 100 फीसदी मूलधन 10 फीसदी ब्याज के साथ भुगतान करने की बात कही गई है. ये वही कंपनियां हैं, जिनके कर्ज के संबंध में सुभाष चंद्रा ने पर्सनल गारंटर की भूमिका निभाई थी. एनसीएलटी से 99.97 फीसदी हेयरकट मिलने के मामले में सुभाष चंद्रा ने यह भी कहा था कि ₹22,006 करोड़ का आंकड़ा कार्यवाही में दाखिल किए गए क्लेम को दर्शाता है। 

    उनके मुताबिक, इस राशि को उनका व्यक्तिगत बकाया कर्ज नहीं माना जाना चाहिए. सुभाष चंद्रा ने कहा था कि ₹21,696 करोड़ के क्लेम मंजूर किए गए थे, जबकि सेटलमेंट प्लान का विरोध करने वाले लेंडर्स के कुल क्लेम करीब 3,992 करोड़ रुपये थे. इसमें से 620 करोड़ रुपये के क्लेम पहले ही निपटाए जा चुके थे, जिससे लगभग 3,372 करोड़ रुपये की राशि बची थी। 

    लेंडर्स से बातचीत भी जारी
    सुभाष चंद्रा ने आगे कहा था कि कर्ज लेने वाली कंपनियों ने आपत्ति जताने वाले कई लेंडर्स को करीब ₹1,113 करोड़ का भुगतान करने की पेशकश की थी. उन्होंने यह भी कहा था कि इन लेंडर्स के साथ बातचीत जारी है. फिलहाल एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस के सामने रखे गए नए सेटलमेंट प्रस्ताव में चारों कंपनियों की ओर से 100 फीसदी मूलधन और 10 फीसदी ब्याज के साथ भुगतान की पेशकश की गई है. अब आगे की तस्वीर इन सेटलमेंट प्रस्तावों पर होने वाली प्रगति और आपत्ति जताने वाले लेंडर्स के साथ चल रही बातचीत के नतीजों से साफ होगी। 

  • NCLT का नया फैसला, सुभाष चंद्रा की राहत पर ब्रेक; पुराने आदेश को किया स्थगित

    NCLT का नया फैसला, सुभाष चंद्रा की राहत पर ब्रेक; पुराने आदेश को किया स्थगित

    नई दिल्ली

    जी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा की निजी दिवालिया प्रक्रिया से जुड़े मामले में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने 25 अगस्त को दिए गए फैसले पर रोक लगा दी है। NCLT की पांच सदस्यीय पीठ ने कहा कि पिछले फैसले को लेकर स्पष्ट बहुमत नहीं बन पाया था। अब मामले की नए सिरे से सुनवाई होगी।पीठ ने इस मामले से जुड़े सभी पक्षों को नोटिस जारी किया है। साथ ही सुभाष चंद्रा को किसी भी संपत्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दूसरे के नाम करने या उससे अलग करने से भी रोक दिया गया है।

    NCLT की 5 सदस्यीय बेंच का फैसला
    राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) ने एस्सेल समूह के चेयरमैन सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवाला मामले में पुनर्भुगतान योजना पर फैसला करने के लिए पांच सदस्यीय पीठ का गठन किया। यह मामला 22,000 करोड़ रुपये से अधिक के दावों से जुड़ा है।

    दो सदस्यीय पीठ के बहुमत के फैसले पर नहीं पहुंच पाने के बाद यह कदम उठाया गया। दो सदस्यीय पीठ ने तीसरे न्यायाधीश को मामला भेजे जाने के बावजूद प्रस्तावित 6.5 करोड़ रुपये की पुनर्भुगतान योजना पर बहुमत से सहमति नहीं बन पाने के बाद एस्सेल समूह के चेयरमैन के खिलाफ व्यक्तिगत दिवाला मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए न्यायाधिकरण के अध्यक्ष के पास भेज दिया था।

    बता दें कि चार साल से चल रहे मामले को मूल पीठ के दोनों सदस्यों के बीच मतभेद के बाद इसे तीसरे सदस्य नीलेश शर्मा के पास भेजा गया था। शर्मा ने 25 अगस्त को 144 पन्नों के अपने आदेश में करीब 22,006.57 करोड़ रुपये के ऋणदाताओं के दावों के मुकाबले चंद्रा की व्यक्तिगत दिवाला समाधान योजना के तहत 6.5 करोड़ रुपये के भुगतान को मंजूरी दी थी।

    तीन सदस्यीय पीठ के फैसले में मतभेद
    मामले की सुनवाई कर रही तीन सदस्यीय पीठ के सदस्यों के बीच आदेश को लेकर मतभेद सामने आए। इसके बाद मामले को NCLT की पांच सदस्यीय विशेष पीठ के सामने भेजा गया। मंगलवार को स्पेशल बेंच ने मामले की सुनवाई शुरू की। पीठ ने कहा कि पहले दिए गए आदेशों में मतभेद थे और किसी स्पष्ट बहुमत की राय सामने नहीं आई थी, जिसे लागू किया जा सके।

    इसी आधार पर स्पेशल बेंच ने पुराने आदेश पर रोक लगा दी। NCLT ने मामले से जुड़े सभी पक्षों को नोटिस भी जारी किया है। साथ ही सुभाष चंद्रा को अपनी संपत्तियों को किसी भी तरह से ट्रांसफर करने से रोकने का निर्देश दिया गया है। यह रोक सीधे तौर पर किए जाने वाले ट्रांसफर के साथ-साथ अप्रत्यक्ष तरीके से संपत्ति ट्रांसफर करने पर भी लागू है।

    ₹22,006 करोड़ के लोन को ₹6.25 करोड़ में निपटाने पर उठे सवाल
    25 अगस्त के पुराने आदेश में NCLT ने चंद्रा के ₹22,006 करोड़ से ज्यादा के लोन को करीब ₹6.25 करोड़ में चुकाने का आदेश दिया था। हालांकि, ये लोन सुभाष चंद्रा के व्यक्तिगत लोन नहीं थे। चंद्रा इन लोन के गारंटर थे। गारंटर होने की वजह से ही उनके खिलाफ दिवालियापन से जुड़ी कार्रवाई में यह मामला सामने आया था।

    पुराने आदेश के तहत सिर्फ ₹6.25 करोड़ के भुगतान के जरिए इतने बड़े लोन का निपटारा करने का रास्ता खुल गया था और दिवालियापन की कार्रवाई को खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ने की स्थिति बन गई थी। लेकिन इस फैसले के बाद कई सवाल उठे। सबसे बड़ा सवाल यही था कि ₹22,006 करोड़ से ज्यादा के इतने बड़े लोन का निपटारा करीब ₹6.25 करोड़ के भुगतान से कैसे किया जा सकता है।

    विवाद बढ़ा तो स्पेशल बेंच ने संभाली सुनवाई
    पुराने फैसले को लेकर विवाद बढ़ने के बाद मामला NCLT की पांच सदस्यीय विशेष पीठ के सामने पहुंचा। मंगलवार को सुनवाई के दौरान स्पेशल बेंच ने पहले के आदेशों में मौजूद मतभेद और स्पष्ट बहुमत की कमी को आधार बनाया और उस आदेश पर रोक लगा दी।

    अब इस मामले में सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया गया है। साथ ही सुभाष चंद्रा की संपत्तियों के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ट्रांसफर पर रोक लगा दी गई है। ऐसे में 25 अगस्त को सामने आए उस आदेश का असर फिलहाल रुक गया है, जिसमें ₹22,006 करोड़ से ज्यादा के लोन को करीब ₹6.25 करोड़ में निपटाने का रास्ता साफ हुआ था।

     

  • सुभाष चंद्रा के कर्ज सैटलमेंट पर विजय माल्या का तंज, जानिए क्या है बैंकिंग का ‘हेयरकट’ खेल

    सुभाष चंद्रा के कर्ज सैटलमेंट पर विजय माल्या का तंज, जानिए क्या है बैंकिंग का ‘हेयरकट’ खेल

     नई दिल्ली

    अगर आप किसी बैंक से 100 रुपये का लोन लें और बाद में बैंक के पास जाकर कहें कि भाई मेरे पास पैसे नहीं हैं, आप सिर्फ 30 पैसे रखकर मेरा पूरा कर्ज माफ कर दो… तो सोचिए बैंक मैनेजर का क्या रिएक्शन होगा? आम इंसान के लिए तो यह किसी हसीन सपने जैसा लगता है, लेकिन भारत के बड़े उद्योगपतियों और कॉर्पोरेट वर्ल्ड में ऐसा सचमुच हो रहा है. देश के इंसॉल्वेंसी ट्रिब्यूनल (NCLT) ने मीडिया दिग्गज और ज़ी ग्रुप के चेयरमैन रहे सुभाष चंद्रा को लेकर एक ऐसा ही फैसला सुनाया है, जिसने पूरे देश के बैंकिंग सिस्टम और आर्थिक हलकों में हंगामा मचा दिया है. इस मामले में विजय माल्या और कांग्रेस का रिएक्शन और भी दिलचस्प है। 

    इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इंसॉल्वेंसी ट्रिब्यूनल ने सुभाष चंद्रा को 22,006.57 करोड़ रुपये के भारीभरकम कर्ज से मुक्त होने की हरी झंडी दे दी है. इसके बदले उन्हें चुकाने होंगे महज 6.5 करोड़ रुपये. अगर इसका हिसाब लगाएं तो यह कर्ज की कुल राशि का लगभग 99.97 प्रतिशत हिस्सा माफ कर देने जैसा है. सरल शब्दों में कहें तो 100 रुपये के भारी-भरकम कर्ज के बदले महज 30 पैसे देकर पूरे कर्ज से आजादी मिल गई। 

    विजय माल्या की बधाई में छुपा दर्द और तंज
    जैसे ही यह खबर बाहर आई, ब्रिटेन में रह रहे भगोड़े शराब कारोबारी विजय माल्या खुद को रोक नहीं पाए. उन्होंने सोशल मीडिया (X) पर अपनी भड़ास निकालते हुए सुभाष चंद्रा को खास अंदाज में बधाई दी और साथ ही देश के इंसॉल्वेंसी ट्रिब्यूनल पर करारा तंज कसा। 

    माल्या ने चुटकी लेते हुए लिखा कि “मुझसे सरकारी तौर पर घोषित 6,203 करोड़ रुपये के कर्ज के बदले अब तक 14,100 करोड़ रुपये वसूले जा चुके हैं. यानी जितने का कर्ज था, उससे डबल से ज्यादा पैसा वसूला गया, फिर भी मुझे कोई राहत नहीं मिल रही है. और दूसरी तरफ 22,000 करोड़ का कर्ज महज 6.5 करोड़ देकर खत्म हो रहा है. शायद यही भारत का कर्ज सैटल करने वाला असली 'जस्टिस' है… और कमाल की बात देखिए, इस पर कोई सवाल भी नहीं पूछ रहा है!

    विजय माल्या का यह तंज भले ही खुद को पीड़ित दिखाने का एक तरीका हो, लेकिन उनके इस बयान ने भारतीय फाइनेंशियल सिस्टम की एक बड़ी और कड़वी सच्चाई को सरेआम उजागर कर दिया है. माल्या खुद बैंकों का पैसा डकार कर विदेश भाग गए थे और उन्होंने भी कभी बैंकों की दरियादिली का जमकर फायदा उठाया था. लेकिन आज जब वे दूसरों को इतनी आसानी से छूट मिलते देख रहे हैं, तो उनका दर्द छलकना स्वाभाविक ही है। 

    'हेयरकट' या फिर सीधा 'मुंडन'? कांग्रेस का तीखा हमला
    इंसॉल्वेंसी ट्रिब्यूनल दरअसल देश में दिवालिया हो रही कंपनियों, बैंकों और सरकारी देनदारियों का तालमेल बैठाकर फैसला सुनाती है. फाइनेंशियल जर्नलिज्म की भाषा में इसे 'हेयरकट' कहा जाता है. यानी कर्जदार के सिर से कर्ज का बोझ थोड़ा हल्का कर देना. लेकिन जब सिर से 99.97% बाल ही साफ कर दिए जाएं, तो उसे हेयरकट कौन कहेगा?

    इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने केंद्र सरकार और ट्रिब्यूनल पर जोरदार हमला बोला. जयराम रमेश ने तंज कसते हुए कहा कि इंसॉल्वेंसी के नाम पर दी गई यह राहत दरअसल 'हेयरकट' नहीं, बल्कि बैंकों का सरेआम 'मुंडन' है. उन्होंने कहा कि इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC 2016) को इसलिए लाया गया था ताकि बैंकों का फंसा हुआ पैसा जल्दी वापस आ सके, लेकिन इस तरह 99.9% से ज्यादा का डिस्काउंट देना इस कानून का सीधा-साधा मखौल उड़ाना है। 

    किसकी जेब से जा रहा है यह पैसा?
    IBC कानून 2016 ने बेशक कई डिफाल्टरों से वसूली को आसान और तेज बनाया है, लेकिन इसने देश के बैंकिंग ढांचे की सबसे बड़ी कमजोरी की पोल खोलकर रख दी है. सवाल यह उठता है कि जब 22 हजार करोड़ का कर्ज सिर्फ 6.5 करोड़ में सैटल हो जाता है, तो बाकी के 21,999 करोड़ रुपये का नुकसान कौन उठाता है?

    जवाब साफ है कि यह पैसा देश के आम करदाताओं (Taxpayers) और बैंकों में अपनी मेहनत की कमाई जमा करने वाले आम नागरिकों का है. जब बड़े उद्योगपतियों को बिना किसी कड़े रिपेमेंट प्लान के हजारों करोड़ के लोन बांट दिए जाते हैं, और बाद में उन्हें 'इंसॉल्वेंसी' के नाम पर कौड़ियों के भाव राहत दे दी जाती है, तो बैंकों का बैलेंस शीट बिगड़ता है. इस घाटे की भरपाई अंततः आम जनता की जेब से ही होती है। 

    विजय माल्या भले आज नैतिकता का पाठ पढ़ा रहे हों और सुभाष चंद्रा के बहाने व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हों, लेकिन सच यह है कि हमारे देश में सरकारों और बैंकों द्वारा बिना रिपेमेंट की क्षमता जांचे खुले हाथ से कर्ज बांटने की जो बीमारी रही है, उसका फायदा हर बड़े डिफाल्टर ने कर्ज लेते वक्त उठाया है. अब देखना यह होगा कि क्या संसद और नियामक संस्थाएं इस 'मुंडन संस्कृति' पर कोई लगाम लगाती हैं या फिर वही ढर्रा चलेगा कि आम आदमी तो लोन के लिए बैंक के चक्कर काटता रहे और बड़े दिग्गज मजे में हजारों करोड़ का कर्ज माफ करवाते रहें। 

    कड़वी सच्चाई : आम आदमी के लोन की हकीकत ये है कि वह 100 रुपए के लोन पर 50 रुपए सूद भर चुका होता है. लेकिन, इसके बाद यदि उसका 50 पैसा भी बाकी रह जाता है तो उसे नोटिस भेजा जाने लगता है. सिबिल स्कोर बिगाड़ दिया जाता है. कर्ज चुका न पाना बेशक अच्छी बात नहीं है. लेकिन, ये आम आदमी के लिए ‘पाप’ और बड़े कारोबारी के लिए यह मामूली बात क्यों हो जाती है?