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  • रेशम किसानों की बढ़ेगी कमाई, ₹12 लाख आय का लक्ष्य; MSME के लिए सब्सिडी

    रेशम किसानों की बढ़ेगी कमाई, ₹12 लाख आय का लक्ष्य; MSME के लिए सब्सिडी

    नई दिल्ली
    भारत की गारमेंट इंडस्ट्री दुनियाभर में मशहूर है। यहां के कई फैबरिक अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में काफी डिमांड में रहते हैं, जिसमें से सिल्क भी प्रमुख है। केंद्र सरकार ने देश में रेशम (Silk) का प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए खास तैयारी कर ली है। सरकार का लक्ष्य 2030-31 तक देश का रेशम उत्पादन बढ़ाकर 60,000 टन करना है। साथ ही 2028-29 तक भारत को दुनिया का सबसे बड़ा रेशम उत्पादक देश बनाने का संकल्प लिया गया है। साथ ही ग्लोबल मार्केट में डिमांड के अनुसार गुणवत्ता बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है।

    किसानों की आय ₹12 लाख करने की तैयारी
    बेंगलुरु में केंद्रीय रेशम बोर्ड (CSB) फाउंडर्स डे के दौरान केंद्रीय कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि देश में रेशम उत्पादन 2014 के 26,000 टन से बढ़कर वर्तमान में 42,000 टन तक पहुंच गया है। सरकार रेशम किसानों की आय बढ़ाने और सेरीकल्चर (रेशम पालन) क्षेत्र के विस्तार के लिए लगातार काम कर रही है।

    उन्होंने कहा  शहतूत की पत्तियों का प्रोडक्शन बढ़ाने और कोकून पालन के सायकल में बढ़ोतरी के जरिए उत्पादन बढ़ाया जाएगा। सरकार का प्रयास है कि रेशम किसानों की सालाना आय ₹10 लाख से ₹12 लाख तक पहुंचाई जाए।

    चीन का घटता प्रोडक्शन भारत के लिए मौका
    गिरिराज सिंह ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय रेशम की मांग बढ़ रही है, जबकि चीन में प्रोडक्शन घटने की खबरें हैं। ऐसे में भारत के पास ग्लोबल मार्केट में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का बड़ा अवसर है। उन्होंने वैज्ञानिकों द्वारा विकसित नई तकनीकों, उन्नत संकर (हाइब्रिड) किस्मों और आधुनिक मशीनरी को सीधे किसानों तक पहुंचाने पर जोर दिया।

    AI और मशीन लर्निंग का होगा इस्तेमाल
    टेक्सटाइ मिनिस्ट्री में ज्वाइंट सेकेट्री (सिल्क) और केंद्रीय रेशम बोर्ड की उपाध्यक्ष पद्मिनी सिंगला ने कहा कि 2030-31 तक 60,000 मीट्रिक टन रेशम उत्पादन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए उच्च उत्पादकता वाले रेशम कीटों की किस्में और आधुनिक मशीनरी लाई जा रही हैं। इसके साथ ही क्वालिटी जांच और प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), GIS और मशीन लर्निंग जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाएगा।

    MSMEs को सब्सिडी और सरकारी मदद
    सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे ने कहा कि कर्नाटक देश के कुल रेशम उत्पादन में नंबर वन राज्य है। सरकार इस क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए बुनियादी ढांचे के विकास और इंडस्ट्री के विकास पर विशेष ध्यान दे रही है।
    उन्होंने कहा कि माडर्न टेक्नोलॉजी और हाई डेंसिटी प्रोडक्शन मेथड को अपनाकर ग्लोबल एक्सपोर्ट मानकों के अनुरूप रेशम उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे घरेलू उत्पादन बढ़ेगा और आयात पर निर्भरता कम होगी। सरकार MSME के तहत रजिस्ट्रेशन कराने वाले उद्यमियों को सब्सिडी और गुणवत्ता सुधार योजनाओं के माध्यम से भी सहायता प्रदान कर रही है।

     

  • सिल्क बुनकरों से किसानों तक बाढ़ की मार, भागलपुर के वैश्विक ब्रांड बचाने को राहत पैकेज की मांग

    सिल्क बुनकरों से किसानों तक बाढ़ की मार, भागलपुर के वैश्विक ब्रांड बचाने को राहत पैकेज की मांग

    पटना
    बिहार के रेशमी शहर की आर्थिक रीढ़ बाढ़ के थपेड़ों से टूट गई है। भागलपुर में गंगा की उफनाती लहरों और बाढ़ की विभीषिका ने न केवल लाखों लोगों को बेघर किया है, बल्कि यहां की पहचान माने जाने वाले तीन वैश्विक ब्रांड (तसर सिल्क, कतरनी धान और जर्दालू आम) के वजूद पर भी गहरा संकट खड़ा कर दिया है। बता दें कि तसर सिल्क, कतरनी धान और जर्दालू आम को जीआई टैग दिया गया है। कृषि और उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार की बाढ़ से भागलपुर की अर्थव्यवस्था को ऐसा झटका लगा है, जिससे उबरने में सालों लग सकते हैं।

    नाथनगर और चंपानगर के सिल्क हब इस समय पानी में पूरी तरह डूबे हुए हैं। आर्थिक मामलों के स्थानीय जानकार अधिवक्ता राजेश सर्राफ ने बताया कि भागलपुर का सिल्क उद्योग लगभग 50 फीसदी घरेलू और 50 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भर है। पावरलूम मशीनों और कच्चे माल के पानी में डूबने से करोड़ों का नुकसान हुआ है। नाथनगर स्थित बुनकर समाज के इनायत अंसारी बताते हैं कि विदेशों से मिले ऑर्डर की समय पर डिलीवरी नहीं होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में हमारी साख खतरे में है। यदि बुनकरों का बनारस या कोलकाता पलायन शुरू हुआ, तो इस पारंपरिक क्लस्टर को भारी क्षति पहुंचेगी।

    दूसरी ओर, जिले की कृषि अर्थव्यवस्था के आधार स्तंभ कतरनी धान और जर्दालू आम के बागों को भी प्रकृति का कहर झेलना पड़ रहा है। सुल्तानगंज के आभा रतनपुर निवासी कृषक एवं निर्यातक मनीष कुमार सिंह बताते हैं, बाढ़ का पानी लंबे समय तक खेतों में जमा रहने के कारण कतरनी धान के नाजुक पौधे पूरी तरह सड़ जाएंगे। इस अनूठे सुगंधित चावल का अंतरराष्ट्रीय बाजार ठप होने के कगार पर है।

    जर्दालू आम के बगीचे में जलभराव पर चिंता जताते हुए वो कहते हैं कि बगीचों में जलभराव सबसे खतरनाक होता है। पीरपैंती के आम उत्पादक पप्पू यादव कहते हैं कि बगीचे में एक सप्ताह से अधिक दिनों तक पानी जमा रह गया तो पेड़ सूख जाएंगे। इससे आम की उत्पादकता में कमी आएगी।

    सिल्क बुनकरों को विशेष राहत पैकेज मिले : चैंबर
    भागलपुर चैंबर ऑफ कॉमर्स के पूर्व अध्यक्ष रामगोपाल पोद्दार बताते हैं कि बुनकर और किसान कर्ज के बोझ तले दबे हैं। सरकार को इस संकट से निपटने के लिए सिल्क बुनकरों के लिए विशेष राहत पैकेज और किसानों के लिए फसल बीमा का त्वरित भुगतान सुनिश्चित करना होगा, तभी इन जीआई टैग उत्पादों को बचाया जा सकता है।

    सरकारी आंकड़े में (सालाना)
    सिल्क: 100 करोड़

    कतरनी धान की पैदावार : 2000 एकड़

    कतरनी धान का कारोबार: 30 करोड़

    जर्दालू आम की प्रतिवर्ष

    पैदावार-बाजार : 10,000 मीट्रिक टन