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  • झारखंड में पेंशन पर सियासत तेज, भाजपा नेता ने पूछा- बुजुर्गों और दिव्यांगों का क्या कसूर?

    झारखंड में पेंशन पर सियासत तेज, भाजपा नेता ने पूछा- बुजुर्गों और दिव्यांगों का क्या कसूर?

    धनबाद
     दुर्गा पूजा से पहले झारखंड की मंइयां सम्मान योजना के लाभुकों के खातों में सितंबर महीने की राशि का भुगतान कर दिया गया है।

    वहीं, राज्य में वृद्धावस्था, विधवा और दिव्यांग पेंशन के लाभुकों को करीब छह महीने से भुगतान का इंतजार है। इससे हजारों जरूरतमंद परिवारों के सामने आर्थिक परेशानी खड़ी हो गई है।

    धनबाद, बोकारो और रांची समेत राज्य के विभिन्न जिलों में पेंशन भुगतान लंबित रहने से लाभुक परेशान हैं।

    वृद्धावस्था पेंशन पर निर्भर बुजुर्गों, विधवा महिलाओं और दिव्यांगजनों के लिए यह राशि रोजमर्रा की जरूरतों, दवा और जरूरी खर्चों का सहारा होती है। लंबे समय से भुगतान नहीं होने के कारण उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

    एक ओर मइयां सम्मान योजना की सितंबर महीने की राशि दुर्गा पूजा से पहले मिलने से महिला लाभुकों को राहत मिली है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक सुरक्षा पेंशन के लाभुक अब भी बकाया राशि मिलने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

    लाभुकों को इंतजार है कि सरकार लंबित पेंशन का भुगतान जल्द सुनिश्चित करेगी। दुर्गा पूजा के माैके पर सामाजिक सुरक्षा पेंशन के लाभुकों को सरकार से उम्मीद है कि उनपर ध्यान दिया जाएगा।

    हालांकि, बाद, बोकारो और रांची सहित पूरे राज्य में पेंशन भुगतान की वास्तविक लंबित अवधि, प्रभावित लाभुकों की संख्या और राशि जारी होने की संभावित तारीख की आधिकारिक पुष्टि जरूरी है।

    भाजपा नेता रमेश राही ने दुर्गा पूजा से पहले सामाजिक सुरक्षा पेंशन के लाभुकों के खाते में पेंशन की राशि भेजने की मांग की है। उन्होंने कहा है-दिव्यांग, विधवा और वृद्धजन को पेंशन की ज्यादा जरूरत है।

    उन्होंने कहा है-मुख्यमंत्री मंइयां सम्मान योजना का भुगतान अच्छी बात है लेकिन दिव्यांग, विधवा और वृद्धजनों का क्या कसूर है?

  • क्या सास को बहू की पेंशन में मिलता है हक? 83 साल की बुजुर्ग महिला के मामले में कोर्ट ने दिया जवाब

    क्या सास को बहू की पेंशन में मिलता है हक? 83 साल की बुजुर्ग महिला के मामले में कोर्ट ने दिया जवाब

    तिरुवनंतपुरम
    क्या सास अपनी बहू को मिल रही पेंशन में हिस्सा मांग सकती है? एक 83 साल की दादी ने न सिर्फ बहू की पेंशन में हिस्सा मांगा, बल्कि पोती से हर महीने 15,000 रुपये खर्चे के लिए भी मांगे। वह अपने दिवंगत बेटे की पत्नी को मिल रही पेंशन में भी हिस्सा मांग रही थी। मामला कोर्ट पहुंचा तो दोनों मांगों पर बड़ा फैसला आया। आखिर कोर्ट ने उनकी मांग क्यों नहीं मानी बहू को पेंशन का हिस्सा और पोती को खर्चे का पैसा देने से क्यों मना कर दिया?

    क्या है पूरा मामला?
    मामला 83 साल की एस. थैंकम्मा से जुड़ा है। वह केरल सरकार के फिशरीज डिपार्टमेंट (Fisheries Department) से रिटायर हुई हैं और खुद पेंशन लेती हैं। उनके पति भी फिशरीज डिपार्टमेंट में सीनियर अधिकारी रह चुके हैं और उन्हें भी पेंशन मिलती है। थैंकम्मा के बेटे टी राज कुमार की नौकरी के दौरान मौत हो गई थी। वह केरल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड यानी KSEB में सीनियर सुप्रीटेंडेट थे।

    पेंशन में मांगा बहू से हिस्सा
     रिपोर्ट के मुताबिक उनकी मौत के बाद उनकी पत्नी को विधवा फैमिली पेंशन मिलने लगी, जबकि उनकी बेटी यानी थैंकम्मा की पोती कॉलेज में पढ़ाई कर रही है। दादी ने पोती और बहू के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने 15,000 रुपये महीने के खर्चे के पैसे की मांग की। साथ ही बेटे की मौत के बाद उसकी पत्नी को मिल रही फैमिली पेंशन में भी अपना हिस्सा मांगा।

    दादी को पहले ही मिले थे 12 लाख रुपये
    इस मामले में कोर्ट के सामने यह भी आया कि बेटे की मौत के बाद मिलने वाले सर्विस बेनेफिट में से करीब 12.28 लाख रुपये दादी को पहले ही मिल चुके थे। यह रकम KSEB ने सीधे उन्हें दिये थे। बाकी रकम बेटे की पत्नी को मिले थे।

    पोती से खर्चे का पैसा की मांग क्यों नहीं मानी?
    कोर्ट ने कहा कि पोती अभी कॉलेज की छात्रा है। व
    ह अपनी पढ़ाई के लिए यूनियन बैंक ऑफ इंडिया से एजुकेशन लोन लेकर पढ़ रही है। ऐसे में उससे दादी का पैसे की मांग करना उचित नहीं है। दादी की ओर से दलील दी गई थी कि सीनियिर सिटीजन एक्ट के तहत पोती को उनकी देखभाल करनी चाहिए। लेकिन कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने माना कि पढ़ाई कर रही पोती पर ऐसी आर्थिक जिम्मेदारी डालना उचित नहीं होगा। खासकर, तब जब वह खुद एजुकेशन लोन के सहारे पढ़ाई कर रही है।

    पेंशन में नहीं मिल सकता हिस्सा
    दादी ने बहू को मिल रही फैमिली पेंशन में भी हिस्सा मांगा था। लेकिन कोर्ट ने कहा कि सीनियर सिटीजन एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके आधार पर दादी को बेटे की विधवा को मिल रही फैमिली पेंशन का हिस्सा दिलाया जा सके। कोर्ट ने दोनों मांगों 15,000 रुपये महीने के हिसाब से खर्च का पैसा और फैमिली पेंशन में हिस्से को खारिज कर दिया। यानी सिर्फ उम्र अधिक होने के आधार पर पोती से खर्चे का पैसा या बहू की फैमिली पेंशन में हिस्सा मांगने का अधिकार अपने आप नहीं मिल जाता। मामले में लागू कानून और संबंधित व्यक्ति की आर्थिक स्थिति भी देखी जाती है।

  • छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने साफ किया- पंचायत कर्मचारी पेंशन के हकदार नहीं

    छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने साफ किया- पंचायत कर्मचारी पेंशन के हकदार नहीं

    बिलासपुर.

    हाईकोर्ट ने पंचायत कर्मचारियों की पेंशन संबंधी याचिकाओं पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सभी याचिकाएं खारिज कर दी हैं. जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की सिंगल बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता पेंशन पाने का कोई वैधानिक अधिकार स्थापित नहीं कर सके.

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पंचायत कर्मचारी सरकारी कर्मचारी नहीं हैं और उनके सेवा संबंधी मामले अलग नियमों से संचालित होते हैं. दरअसल, मामला प्रदेश के अलग-अलग जनपद पंचायतों से सेवानिवृत्त कर्मचारियों से जुड़ा था. याचिकाकर्ताओं ने लंबे समय तक सेवा करने और कुछ अन्य जनपद पंचायतों में कर्मचारियों को पेंशन मिलने का हवाला देते हुए पेंशन देने की मांग की थी. कोर्ट ने कहा कि कुछ जनपद पंचायतों द्वारा अपने स्तर पर पेंशन दिए जाने से सभी पंचायत कर्मचारियों को वैधानिक रूप से पेंशन का अधिकार नहीं मिल जाता.

    कोर्ट ने यह भी कहा कि छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम की धारा 131 केवल पहले से मौजूद वेतन, भत्ते और सेवानिवृत्ति लाभों को संरक्षण देती है, इससे नई पेंशन का अधिकार पैदा नहीं होता. याचिका कर्ताओं की सेवा शर्तों में सेवानिवृत्ति लाभ प्रोविडेंट फंड योजना के तहत थे, और वे कंट्रीब्यूटरी प्रोविडेंट फंड का लाभ ले रहे थे. ऐसे में पेंशन देने का कोई आधार नहीं है. कोर्ट ने कहा कि दूसरे किसी प्राधिकरण द्वारा दिए गए लाभ के आधार पर वैधानिक अधिकार की मांग नहीं की जा सकती. सभी याचिकाओं में कोई मेरिट नहीं पाए जाने पर हाईकोर्ट ने उन्हें खारिज कर दिया और लागत के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया.

  • दिवंगत शिक्षक की पेंशन फाइल अटकी, 6 पर गिरी गाज

    दिवंगत शिक्षक की पेंशन फाइल अटकी, 6 पर गिरी गाज

    मुंगेली.

    लोक शिक्षण संचालनालय ने मुंगेली जिले में दिवंगत शिक्षक के पेंशन प्रकरण मामले में गंभीर लापरवाही पाए जाने के बाद बड़ी कार्रवाई करते हुए शिक्षा विभाग के 6 अधिकारियों व कर्मचारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है.

    मामला लोरमी विकासखंड का है. जहां पेंशन प्रकरण में नियम प्रक्रिया को ताक पर रखकर गड़बड़ी पाये जाने पर निलंबन की कार्रवाई की गई है जिससे हड़कंप मचा हुआ है. आने वाले दिनों में कुछ और जांच में लंबित मामले में कार्रवाई के कयास लगाये जा रहे हैं. लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा जारी आदेश में बताया किया कि हाईस्कूल लाखासार में पदस्थ विज्ञान शिक्षक अंजनी त्रिपाठी का 25 सितंबर 2022 को सेवाकाल के दौरान निधन हो गया था. जिसके बाद परिवार पेंशन, मृत्यु सह सेवानिवृत्ति उपादान के प्रकरण की प्रक्रिया में 2018 में शिक्षक एलबी के संविलियन के बाद किए गए वेतन निर्धारण की सक्षम प्राधिकारी से जांच एवं अनुमोदन नहीं कराया गया.

    विलंब से अनुमोदन के कारण अधिक भुगतान एवं वसूली की स्थिति निर्मित हुई साथ ही लंबित पेंशन के संबंध में लोक शिक्षण संचालनालय को अंधेरे में रखकर गलत और भ्रामक जानकारी भेजी गई. मामले में तत्कालीन प्राचार्य राघवेन्द्र कुमार सोनी, प्रभारी प्राचार्य रघुनंदन राजपूत, लिपिक मोतीराम यादव, त्रिवेणी ध्रुव, अशोक ध्रुव, डीईओ ऑफिस के पेशन कक्ष प्रभारी कनिष्ठ लेखा परीक्षक शत्रुहन कुलमित्र को निलंबित किया गया है. सभी छह कर्मचारियों द्वारा अपने काम में नियम विरूद्ध कार्य, गंभीर लापरवाही, शासकीय कार्य में लेट लतीफ जैसी कई गलतियां पाई गई. सभी निलंबित लोगों का बिलासपुर संयुक्त संचालक कार्यालय निलंबन अवधि में निर्धारित किया गया है.

  • बुजुर्ग को पेंशन का बकाया न देना पड़ा भारी, हाईकोर्ट ने DEO समेत बैंकर्स पर की कार्रवाई

    बुजुर्ग को पेंशन का बकाया न देना पड़ा भारी, हाईकोर्ट ने DEO समेत बैंकर्स पर की कार्रवाई

    चंडीगढ़.

    चंडीगढ़. पंजाब एवं हरियाणा कोर्ट में एक अनोखा मामला सामने आया है. जगदीश राज अरोड़ा नाम के व्यक्ति ने अपनी दिवंगत पत्नी सुदर्शन कुमारी की पेंशन के बकाया भुगतान के लिए वर्ष 2023 में हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. सुदर्शन कुमारी गुरदासपुर-द्वितीय में ब्लाक प्राथमिक शिक्षा अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुई थीं.
    याचिकाकर्ता के मुताबिक उनकी पत्नी की पेंशन का बकाया करीब वर्ष 2007 से लंबित है. करीब डेढ़ दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी भुगतान नहीं हुआ. इस दौरान अरोड़ा सरकारी कार्यालयों और बैंक के चक्कर लगाते रहे. मामले में संबंधित विभाग और बैंक एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहे, लेकिन बकाया राशि का समाधान नहीं हो सका.

    विभाग और बैंक देते रहे अलग-अलग दलील
    सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने यह स्पष्ट हुआ कि याचिकाकर्ता के पेंशन बकाये के अधिकार को लेकर कोई विवाद नहीं है. गुरदासपुर के जिला शिक्षा अधिकारी की ओर से बताया गया कि अकाउंटेंट जनरल, पंजाब के कार्यालय ने 24 सितंबर 2012 को जिला कोषाधिकारी को पत्र भेजा था. विभाग के अनुसार बैंक ऑफ इंडिया ने इस निर्देश को लागू नहीं किया. दूसरी ओर बैंक की ओर से दलील दी गई कि जिला कोषाधिकारी की ओर से आवश्यक अनुपालन नहीं किए जाने के कारण बकाया पेंशन जारी नहीं हो सकी. इस तरह भुगतान की जिम्मेदारी को लेकर दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप चलता रहा.

    हाई कोर्ट ने अधिकारियों के वेतन पर लगाई रोक
    मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति कुलदीप तिवारी ने सख्त टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि 80 वर्षीय याचिकाकर्ता अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में हैं और इसके बावजूद उन्हें अपने जायज हक के लिए लंबे समय तक भटकना पड़ा. कोर्ट ने पंजाब के स्कूल शिक्षा विभाग और वित्त विभाग के सचिवों को निर्देश दिया कि गुरदासपुर के जिला शिक्षा अधिकारी और जिला कोषाधिकारी अदालत की पूर्व अनुमति के बिना अपना वेतन नहीं निकाल सकेंगे. इसके साथ ही बैंक ऑफ इंडिया के उप महाप्रबंधक को भी निर्देश दिया गया कि संबंधित वरिष्ठ प्रबंधक और शाखा प्रबंधक कोर्ट की अनुमति के बिना अपना वेतन नहीं निकाल सकेंगे. हाई कोर्ट ने यह कदम तब तक प्रभावी रखने का निर्देश दिया है, जब तक पेंशन के बकाये से जुड़ा मामला प्रभावी तरीके से हल नहीं हो जाता.

  • पेंशन विवाद पर बड़ी बेंच की नजर, MP में कर्मचारियों की सेवा अवधि तय करेगी हाईकोर्ट

    पेंशन विवाद पर बड़ी बेंच की नजर, MP में कर्मचारियों की सेवा अवधि तय करेगी हाईकोर्ट

    भोपाल 

    एमपी में कर्मचारियों की पेंशन पर बड़ा फैसला सामने आया है। जबलपुर हाईकोर्ट ने दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों की पेंशन और अर्हक सेवा क्वालीफाइंग सर्विस से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी सवाल को लार्जर बेंच के समक्ष भेज दिया है। सिंगल बेंच ने इस मुद्दे पर हाईकोर्ट के पूर्व 4 निर्णयों में विरोधाभासी अभिमत सामने आने के बाद मामला बड़ी बेंच के विचारार्थ भेजने का निर्देश दिया। अब लार्जर बेंच तय करेगी कि नियमितीकरण अथवा नियमित पद पर संविलियन से पहले दैनिक वेतन भोगी के रूप में की गई सेवा अवधि को पेंशन के लिए अर्हक सेवा में शामिल किया जा सकता है या नहीं? फैसला प्रदेश के हजारों पूर्व दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

    मामला नरसिंहपुर लोक निर्माण विभाग से चौकीदार पद से सेवानिवृत्त कल्याण सिंह की याचिका से जुड़ा है। सुनवाई के बाद कोर्ट के चार विरोधाभासी फैसलों और अभिमतों को देखते हुए जस्टिस दीपक खोत की सिंगल बेंच ने मामले को बड़ी बेंच के सुपुर्द करने की बात कही। अब लार्जर बेंच तय करेगी कि कर्मचारियों के नियमित पद पर हुए संविलियन से पहले दी गई सेवाएं पेंशन लाभ में जुड़ेंगी या नहीं।

    1985 में बने थे दैनिक वेतन भोगी
    नरसिंहपुर के लोक निर्माण विभाग से चौकीदार के पद से रिटायर हुए कल्याण सिंह गौंड़ ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है। उनकी नियुक्ति एक जुलाई 1985 को दैनिक वेतन भोगी चौकीदार के रूप में हुई थी। 13 फरवरी 1997 को कल्याण सिंह गौंड़ का नियमित पद पर संविलियन कर दिया गया। वे 31 जनवरी 2018 को सेवानिवृत्त हुए।

    रिटायरमेंट के बाद दाखिल की याचिका
    कल्याण सिंह गौंड़ की संविलियन से पहले की सेवा अवधि को पेंशन के लिए अर्हक सेवा में शामिल नहीं किया गया। इसके खिलाफ उन्होंने 2019 में हाईकोर्ट में याचिका लगाई। कल्याण सिंह गौंड़ ने दैवेभो के रूप में दी गईं सेवाओं का लाभ पेंशन में नहीं देने पर आपत्ति जताई। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता राजेन्द्र कुमार पाण्डेय और राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता सुयश ठाकुर ने दलीलें दी।

    जस्टिस दीपक खोत ने सुनवाई के दौरान मामले में चार फैसलों में विरोधाभासी अभिमत पाए। इस पर उन्होंने रजिस्ट्री कार्यालय को एक्टिंग चीफ जस्टिस के सामने केस प्रस्तुत करने को कहा। इसके साथ ही अब मामले में लार्जर बेंच ही फैसला सुनाएगी। लार्जर बेंच के सामने मुख्य रूप से यह तय होगा कि कामचलाऊ या आकस्मिक स्थापना और नियमित स्थापना में संविलियन के लिए दैनिक वेतन भोगी की पेंशन के लिए अर्हक सेवा क्या होगी। इसी के बाद प्रदेश के हजारों पूर्व दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों के पेंशन लाभ को लेकर स्थिति स्पष्ट होगी।