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  • Punjab Flood: डी-सिल्टिंग के पक्ष में पंजाब सरकार, NGT में कहा- नदियों की क्षमता बहाल करना जरूरी

    Punjab Flood: डी-सिल्टिंग के पक्ष में पंजाब सरकार, NGT में कहा- नदियों की क्षमता बहाल करना जरूरी

    चंडीगढ़
    पंजाब सरकार ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में कहा है कि बाढ़ प्रबंधन, नदियों और ड्रेनों की जलप्रवाह क्षमता बहाल करने तथा भविष्य की आपदाओं से बचाव के लिए की जाने वाली वास्तविक डी-सिल्टिंग (गाद निकालने) और ड्रेजिंग को केवल इसलिए व्यावसायिक खनन नहीं माना जा सकता। दरअसल निकाली गई सामग्री का आर्थिक मूल्य हो सकता है। राज्य सरकार ने यह पक्ष पंजाब में डी सिल्टिंग पर पूरी तरह रोक लगाने की मांग से संबंधित आवेदन की सुनवाई के दौरान रखा।

    सरकार ने कहा कि डी-सिल्टिंग पर ब्लैंकेट रोक लगाने से उसके कई जरूरी वैधानिक कार्य प्रभावित होंगे। इनमें बाढ़ प्रबंधन, नदियों और ड्रेनों की क्षमता बहाल करना, तटबंधों की सुरक्षा तथा भविष्य में बाढ़ से होने वाली आपदाओं की रोकथाम शामिल है।

    पंजाब ने एनजीटी के समक्ष स्पष्ट किया कि रखरखाव, पुनर्बहाली और आपदा प्रबंधन के लिए की जाने वाली डी-सिल्टिंग और ड्रेजिंग को खनिजों के व्यावसायिक दोहन और बिक्री के लिए किए जाने वाले खनन से अलग रखा जाना चाहिए।

    हालांकि, राज्य सरकार ने यह भी स्वीकार किया कि पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) अधिसूचना, 2006 के परिशिष्ट-IX के आइटम-7 में मुख्य प्रबंधन के लिए ड्रेजिंग और डी-सिल्टिंग को दी गई छूट का इस्तेमाल व्यावसायिक खनन को छिपाने के लिए नहीं किया जा सकता।

    सरकार ने कहा कि उसका इरादा ऐसी किसी गतिविधि को अनुमति देने का नहीं है, जो वास्तविकता और प्रभाव में व्यावसायिक खनन हो, लेकिन उसे डी-सिल्टिंग के नाम पर कराया जाए।

    2025 की बाढ़ का दिया उदाहरण
    पंजाब सरकार ने अपने पक्ष में वर्ष 2025 में आई अभूतपूर्व बाढ़ का हवाला दिया। सरकार के अनुसार, 2025 के मानसून में पंजाब में 622.1 मिलीमीटर बारिश हुई, जो सामान्य से 41 प्रतिशत अधिक थी। इस दौरान सतलुज, ब्यास, रावी और घग्गर नदी तंत्र में भी असाधारण रूप से अधिक पानी आया। बाढ़ के कारण नदी चैनलों, ड्रेनों, तटबंधों और बाढ़ प्रबंधन से जुड़े अन्य ढांचों को नुकसान पहुंचा।

    राज्य ने यह भी बताया कि 16 सितंबर 2025 के केंद्रीय गृह मंत्रालय के पत्र में केंद्रीय अंतर-मंत्रालयी टीम द्वारा स्थिति का आकलन किए जाने का उल्लेख था। टीम ने व्यावहारिक तौर पर स्थिति को 'गंभीर प्रकृति की आपदा' माना था।

    इसके बाद जल संसाधन विभाग ने नदियों, ड्रेनों और अन्य जलमार्गों की जलप्रवाह क्षमता को बहाल करने और बनाए रखने के लिए निवारक तथा सुधारात्मक कार्य शुरू किए। साथ ही बाढ़ प्रबंधन से जुड़े ढांचों को मजबूत करने के काम भी किए गए। रा

    ज्य ने कहा कि ये कार्य उसकी वैधानिक जिम्मेदारियों का हिस्सा हैं और पंजाब कैनाल एंड ड्रेनेज एक्ट, 2023 की धारा 38 के तहत भी ऐसे कार्य किए जाते हैं।

    एनजीटी के अंतरिम निर्देश के बाद एसओपी
    पंजाब ने एनजीटी के अंतरिम निर्देश का भी उल्लेख किया, जिसमें सरकारी एजेंसियों या अन्य माध्यमों से मेंटेनेंस, अपकीप और डिजास्टर मैनेजमेंट के लिए डी-सिल्टिंग की अनुमति दी गई है।

    इसकी शर्त यह है कि इसका इस्तेमाल व्यावसायिक रेत खनन के लिए नहीं होना चाहिए। इसी निर्देश के बाद जल संसाधन विभाग ने 15 जून 2026 को आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत महत्वपूर्ण स्थानों पर नदी की जलप्रवाह क्षमता बहाल करने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी की।

    इसमें महत्वपूर्ण स्थलों की पहचान, काम शुरू करने से पहले तकनीकी आकलन और राज्य तकनीकी मूल्यांकन समिति से स्वीकृत विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) के आधार पर काम कराने का प्रावधान किया गया।

    डी-सिल्टिंग की आड़ में नहीं होने देंगे अवैध खनन
    विभाग के मुख्य अभियंता/ड्रेनेज-कम-माइनिंग ने 99 डी-सिल्टिंग साइटों की पहचान कर उनकी जिला स्तर की सूची 16 जून को उपायुक्तों को भेजी। इन स्थानों पर आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत जमीन मालिकों या एसओपी के अनुसार काम कराने की व्यवस्था की गई।

    इसके बाद 16 जुलाई को विभाग ने 37 और साइटों की सूची भेजी। इसमें वॉल्यूम-शेयर और प्राइस-बिड टेंडर मॉडल वाले स्थान शामिल थे। साथ ही उन साइटों को भी सूची में रखा गया, जिन्हें पहले जमीन मालिकों को आवंटित किया गया था, लेकिन विरोध या अन्य कारणों से वहां काम रुक गया था।

    उपायुक्तों को महत्वपूर्ण नदी स्थलों पर जरूरत का आकलन करने और जमीन मालिकों अथवा एसओपी के तहत डी-सिल्टिंग का काम कराने के निर्देश दिए गए।

    राज्य सरकार ने एनजीटी को स्पष्ट किया कि बाढ़ प्रबंधन और आपदा से बचाव के लिए ऐसे कार्यों को व्यावसायिक खनन के बराबर नहीं रखा जा सकता, लेकिन डी-सिल्टिंग की आड़ में होने वाले वास्तविक व्यावसायिक खनन की अनुमति भी नहीं दी जाएगी।

     

  • भोपाल में तालाब किनारे कब्जों पर NGT सख्त, सर्वे रिपोर्ट आज होगी पेश; कई फार्म हाउस और रेस्टोरेंट मिले

    भोपाल में तालाब किनारे कब्जों पर NGT सख्त, सर्वे रिपोर्ट आज होगी पेश; कई फार्म हाउस और रेस्टोरेंट मिले

    भोपाल 

    भोपाल की लाइफ लाइन बड़ा तालाब और कलियासोत डैम की 'हद' की रिपोर्ट मंगलवार को नेशनल ग्रीन ट्रूब्नल (NGT) में पेश की जाएगी। एनजीटी के आदेश पर विशेष टीम ने 5 दिन तक सर्वे किया था।इस दौरान ड्रोन भी उड़ाया। सर्वे में बैरसिया विधायक विष्णु खत्री के फार्म हाउस समेत कई रेस्टोरेंट और कब्जे तालाब-डैम की सीमा में मिले। सुनवाई में एनजीटी कार्रवाई के संबंध में आदेश जारी कर सकता है।

    बता दें कि 4 सितंबर को भोपाल के भदभदा डैम के गेट खोलने पर सवाल उठे थे। बड़ा तालाब के एफटीएल (फुल टैंक लेवल) पर अतिक्रमण की वास्तविक स्थिति पता करने के लिए एनजीटी ने पानी 1666.80 फीट पर बनाए रखने और गेट नहीं खोलने को कहा था, लेकिन तालाब में जब 0.10 फीट पानी कम था, तब ही डैम का गेट खोल दिया गया था।

    अगले दिन से ही सर्वे शुरू किया अगले दिन 5 सितंबर से ही एनजीटी की टीम ने सर्वे शुरू किया था। पहले दिन भदभदा डैम, सैर सपाटा समेत कई जगहों पर टीमें पहुंची। 9 सितंबर तक सर्वे कार्य जारी रहा।

    सर्वे में क्या-क्या मिला था?
        बैरसिया विधायक खत्री के फार्म हाउस तक पहुंचने के लिए तालाब के वेटलैंड क्षेत्र के अंदर सड़क का निर्माण देखने को मिला। यह सड़क तालाब के एफटीएल क्षेत्र में स्थित दो मुनारों के बीच से होकर फार्म हाउस तक जाती हुई पाई गई।

        राकेश शर्मा नामक व्यक्ति द्वारा तालाब क्षेत्र के अंदर मकान बनाए जाने की भी जानकारी सर्वे टीम को मिली।

        सीआई ऑटोमोबाइल का यार्ड भी एफटीएल क्षेत्र से लगा हुआ पाया गया। वहीं, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से जुड़े एक कर्मचारी द्वारा तालाब के नजदीक कब्जा कर रेस्टोरेंट निर्माण किए जाने की भी जानकारी सर्वे के दौरान सामने आई।

        कई स्थानों पर मुनार से पानी की सीमा लगभग 5 से 10 फीट आगे तक पहुंची हुई पाई गई।

        कई जगह रिटेनिंग वॉल के ऊपर से पानी बहता हुआ पाया गया। करबला पंप हाउस के सामने, श्रीन नदी के आसपास और अन्य स्थानों पर तालाब में जलकुंभी एवं् पानी में उगने वाली घास का फैलाव भी दिखाई दिया।

        खानूगांव क्षेत्र में कई स्थानों पर FTL एवं ग्रीन बेल्ट के मुनारे मौके पर दिखाई नहीं दिए।

        हलालपुरा के फिजा फार्म क्षेत्र में पक्का पुल बना हुआ पाया गया और उसके आगे तक पानी फैला हुआ था। वहीं, लैंडमार्क मैरिज गार्डन के पीछे सड़क के आसपास लगभग 6 फीट तक का भराव दिखाई दिया।

        वार्ड क्रमांक 26, ग्राम खुदागंज के कई स्थानों पर जलस्तर FTL सीमा से काफी आगे तक पहुंचा हुआ दिखाई दिया। सर्वे के दौरान दर्जनों रेस्टोरेंट और अन्य निर्माण पानी की सीमा से बिल्कुल सटे हुए पाए गए।

        कलियासोत तालाब के जलभराव क्षेत्र के अंदर से ही सड़क का निर्माण मिला।

        प्रभावशाली लोगों से जुड़े बड़े रेस्टोरेंट और व्यावसायिक निर्माण तालाब की सीमा के भीतर या बेहद करीब पाए गए। कई स्थानों पर प्लॉटिंग के लिए मुनारें गाड़कर पानी के प्राकृतिक बहाव और जलभराव के रास्ते को बाधित करने की बात भी सामने आई है।

    सुनवाई में केरवा डैम को लेकर फैसले की संभावना
    टीम को केरवा डैम के आसपास भी सर्वे करना था, लेकिन डैम के FTL पर वर्तमान में पानी उपलब्ध नहीं है। जिसके कारण इस क्षेत्र में ग्राउंड ट्रुथिंग और सर्वे की प्रक्रिया नहीं हुई।

    टीम सदस्यों के बीच चर्चा और विचार-विमर्श के बाद सभी पक्षों में यह सहमति बनी कि केरवा की वास्तविक स्थिति को स्पष्ट किए बिना आगे की कार्रवाई में कोई जल्दबाजी न की जाए। मंगलवार को होने वाली सुनवाई के बाद केरवा क्षेत्र में आगे की ग्राउंड ट्रुथिंग और जांच की प्रक्रिया तय की जाएगी।

    टीम ने यहां किया सर्वे
    खानूगांन के अंडर कंस्ट्रक्शन क्रूज साइट, आर्मी स्पोर्ट्स एरिया, कोहेफिजा, हलालपुरा के फिजा फार्म, लैंडमार्क मैरिज गार्डन के पीछे, चिरायु अस्पताल क्षेत्र, भौंरी, कोलूखेड़ी, खजूरी सड़क, बैरागढ़ सहित कई क्षेत्रों में मौके पर पहुंचकर ग्राउंड ट्रुथिंग की गई।

    टीम में ये रहे शामिल
    ग्राउंड ट्रुथिंग के दौरान सीपीसीबी, एमपीपीसीबी के अधिकारी, पटवारी और याचिकाकर्ता राशिद नूर खान के साथ एनजीटी द्वारा नियुक्त विशेष सदस्य डॉ. सुभाष सी. पांडेय भी मौजूद रहे।

  • बड़े तालाब किनारे बुलडोजर कार्रवाई पर हाईकोर्ट की सख्ती, कहा- मामला जीवन के अधिकार से जुड़ा है

    बड़े तालाब किनारे बुलडोजर कार्रवाई पर हाईकोर्ट की सख्ती, कहा- मामला जीवन के अधिकार से जुड़ा है

     भोपाल
    मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने राजधानी भोपाल के बड़े तालाब किनारे बेदखली और बुलडोजर कार्रवाई के मामले को गंभीरता से लिया है। कोर्ट ने कहा कि मामला लोगों के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ा है।

    न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल व न्यायमूर्ति अवनीन्द्र कुमार सिंह की युगलपीठ ने याचिकाकर्ताओं को राष्ट्रीय हरित अधिकरण, एनजीटी के समक्ष जाने की स्वतंत्रता दी है। साथ ही एनजीटी के न्यायिक व प्रशासनिक सदस्यों से आग्रह किया है कि मंगलवार को आवेदन पेश होने पर मामले की शीघ्र सुनवाई की जाए।

    दरअसल, भोपाल के भदभदा चौराहा स्थित प्रेमपुरा निवासी निसार खान, मोहसिन और एजाज खान ने याचिका दायर की थी। उनका कहना था कि जिला प्रशासन ने बड़े तालाब से 50 मीटर के दायरे में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के तहत उन्हें भी बेदखली का नोटिस जारी किया है। एनजीटी ने 117 अतिक्रमण हटाकर 31 अगस्त तक रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

    मकान तालाब की निर्धारित सीमा से बाहर
    याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे जन्म से संबंधित संपत्ति पर रह रहे हैं और उनका मकान तालाब से निर्धारित 50 मीटर की सीमा से बाहर है। इसके प्रमाण के रूप में उन्होंने गूगल मानचित्र का भी हवाला दिया। उनका दावा था कि मानचित्र के अनुसार उनकी संपत्ति निर्धारित सीमा में नहीं आती। याचिका कर्ताओं की ओर से अधिवक्ता मुकेश कुमार अग्रवाल ने कोर्ट को बताया कि उनके मुवक्किल एनजीटी के समक्ष चल रही मूल कार्यवाही में पक्षकार नहीं थे।

    मामले में जल्दी सुनवाई की जाए
    इसके बावजूद उनका पक्ष सुने बिना बेदखली की कार्रवाई की जा रही है। अधिवक्ता ने कहा कि जब संपत्ति 50 मीटर के दायरे में ही नहीं आती तो कार्रवाई पर सवाल उठता है। हाई कोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी किए बिना याचिकाकर्ताओं को एनजीटी के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी।

    कोर्ट ने एनजीटी के न्यायिक व प्रशासनिक सदस्यों से आग्रह किया कि आवेदन प्रस्तुत होते ही मामले पर शीघ्र सुनवाई की जाए। हाईकोर्ट ने जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े अधिकारों को ध्यान में रखते हुए यह आग्रह किया है।

  • नर्मदा की सुरक्षा पर हाई अलर्ट, NGT ने मध्य प्रदेश सरकार को भेजा नोटिस

    नर्मदा की सुरक्षा पर हाई अलर्ट, NGT ने मध्य प्रदेश सरकार को भेजा नोटिस

    भोपाल
    नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की भोपाल बेंच ने पर्यावरण के प्रधान सचिव को नर्मदा नदी को साफ रखने के लिए दिए गए निर्देशों पर एक अनुपालन रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है। यह रिपोर्ट विभिन्न एजेंसियों, विभागों, जिला कलेक्टरों और नगर निगम आयुक्तों से संकलित की जाएगी। NGT ने यह निर्देश एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।

    नर्मदा को जीवन रेखा बनाए रखने के लिए निर्देश
    NGT ने नर्मदा नदी के बाढ़ क्षेत्र को चिह्नित करने, उस क्षेत्र से अतिक्रमण हटाने, नदी में बिना उपचारित सीवेज और ठोस कचरा बहाने पर रोक लगाने, अवैध रेत खनन बंद करने और पूरे साल नदी के प्रवाह को स्थिर रखने जैसे कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। ये निर्देश नर्मदा नदी को मध्य प्रदेश की जीवन रेखा बनाए रखने के लिए हैं।

    रिपोर्ट के आधार पर होगी कार्रवाई
    यह अनुपालन रिपोर्ट 1 सितंबर, 2025 को NGT द्वारा जारी आदेश के अनुसार तैयार की जानी है। यह रिपोर्ट याचिकाकर्ता कीर्ति कुमार सदाशिव भट्ट की याचिका पर आधारित है। रिपोर्ट को NGT के रजिस्ट्रार को सौंपा जाएगा, जो इसे ट्रिब्यूनल के सामने पेश करेंगे। इसके बाद, रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

    निष्पादन याचिका पर सुनवाई
    NGT ने यह टिप्पणी जबलपुर की सामाजिक कार्यकर्ता पी.जी. नज्पांडे द्वारा दायर एक निष्पादन याचिका पर सुनवाई करते हुए की। NGT यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसके द्वारा जारी किए गए निर्देशों का ठीक से पालन हो रहा है या नहीं। इसी के लिए NGT ने अब मुख्य सचिव (पर्यावरण) को इस मामले में निर्देशित किया है।

     

  • कलियासोत–भोज वेटलैंड मामला: एनजीटी ने प्रशासन को किया फटकार, अवैध कब्जे पर तत्काल कदम उठाने के निर्देश

    कलियासोत–भोज वेटलैंड मामला: एनजीटी ने प्रशासन को किया फटकार, अवैध कब्जे पर तत्काल कदम उठाने के निर्देश

     भोपाल
     कलियासोत जलाशय क्षेत्र में अवैध निर्माण और अतिक्रमण के मामलों को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाया है। शुक्रवार को हुई सुनवाई में ट्रिब्यूनल ने साफ कहा कि बार-बार निर्देश देने के बावजूद जिला प्रशासन और नगर निगम द्वारा कार्रवाई नहीं की गई, जो चिंताजनक है।

    एनजीटी के समक्ष यह मामला कलियासोत जलाशय, केरवा जलाशय और आसपास के ग्रीन बेल्ट, बाटनिकल गार्डन व रीजनल गार्डन की जमीन पर हुए अतिक्रमण से जुड़ा है। ट्रिब्यूनल ने माना कि इन अवैध गतिविधियों से न सिर्फ पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है, बल्कि घड़ियाल, मगरमच्छ और कछुओं जैसे जलीय जीवों का प्राकृतिक आवास भी खतरे में है।

    97 अतिक्रमण चिह्नित किए

    बीते कुछ वर्षों में इन जीवों का रिहायशी इलाकों में दिखना मानव जीवन के लिए भी जोखिम बनता जा रहा है। एनजीटी ने अपने आदेश में खुलासा किया कि कलियासोत जलाशय क्षेत्र में कुल 97 अतिक्रमण चिह्नित किए गए हैं, जिनमें से अधिकांश सरकारी भूमि पर हैं।

    इसके अलावा लगभग 150 हेक्टेयर भूमि, जो बाटनिकल गार्डन के लिए आरक्षित है, उसकी न तो समुचित सीमांकन हुआ और न ही सुरक्षा। वहीं, बिना उपचारित सीवेज जलाशयों प्रवाह अब भी एक बड़ी समस्या बना हुआ है। कई एसटीपी वर्षों से अधूरे या ट्रायल रन की स्थिति में हैं।
    दो सप्ताह के भीतर रिपोर्ट पेश करने के आदेश

    ट्रिब्यूनल ने कलेक्टर भोपाल और नगर निगम आयुक्त को व्यक्तिगत निगरानी में अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही आदेश दिया गया है कि दो सप्ताह के भीतर शपथपत्र के साथ विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट पेश की जाए। एनजीटी ने यह भी कहा कि लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच कर जिम्मेदारी तय की जाए।
    समय सीमा बीतने के बाद भी शुरू नहीं हुए एसपीटी

    एनजीटी ने यह भी चिंता जताई कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट निर्धारित समय-सीमा बीत जाने के बाद भी पूरी तरह चालू नहीं हो पाए हैं, जिसके कारण बिना उपचारित गंदा पानी जलाशयों में छोड़ा जा रहा है । अधिकरण ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक भूमि की रक्षा करना राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है और अधिकारियों की निष्क्रियता किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।
    मामले की अगली सुनवाई 17 मार्च को

    याचिकाकर्ता डॉ. सुभाष सी. पांडेय और राशिद नूर खान की ओर से प्रस्तुत तर्कों पर सुनवाई के बाद एनजीटी ने राज्य सरकार के अधिवक्ता को निर्देश दिए कि यह आदेश मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव तक पहुंचाया जाए, ताकि तत्काल और ठोस कार्रवाई हो सके।

    अधिकरण ने स्पष्ट किया कि वह स्वामित्व विवाद तय नहीं करेगा, बल्कि उसका उद्देश्य केवल जलाशयों से अतिक्रमण हटाकर भोज वेटलैंड की रक्षा करना है। मामले की अगली सुनवाई 17 मार्च 2026 को होगी।