Tag: Moon

  • शाम के आसमान में चमका शुक्र ग्रह और अर्द्धचंद्र का अद्भुत नजारा, वैज्ञानिकों ने बताई इसकी सच्चाई

    शाम के आसमान में चमका शुक्र ग्रह और अर्द्धचंद्र का अद्भुत नजारा, वैज्ञानिकों ने बताई इसकी सच्चाई

    रांची
    सोमवार की रात भारत के कई शहरों, विशेषकर रांची के आसमान में एक बेहद शानदार और अद्भुत खगोलीय नजारा देखने को मिला।

    सूर्यास्त के बाद पश्चिमी आसमान की ओर एक पतला अर्द्धचंद्र दिखाई दिया, जिसके ठीक पास तेज चमकता हुआ शुक्र ग्रह नजर आ रहा था।

    चांद और शुक्र की इस दुर्लभ नजदीकी ने शहरवासियों और खगोल विज्ञान में रुचि रखने वाले लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

    यह नजारा सूर्यास्त के तुरंत बाद कुछ सीमित समय के लिए ही दिखा, क्योंकि थोड़ी देर बाद दोनों क्षितिज के नीचे ओझल हो गए।

    क्या है 'अर्थशाइन' और 'आकल्टेशन'?
    इस खूबसूरत घटनाक्रम के दौरान चंद्रमा को ध्यान से देखने पर उसके अंधेरे हिस्से पर हल्की चमक भी दिखाई दे रही थी, जिसे खगोल विज्ञान की भाषा में 'अर्थशाइन' कहा जाता है।

    यह चमक वास्तव में पृथ्वी से परावर्तित होकर चंद्रमा तक पहुंचने वाली सूर्य की रोशनी है, जो चंद्रमा के अंधेरे हिस्से को हल्का रोशन करती है। साफ आसमान होने के कारण यह नजारा बिना दूरबीन के भी स्पष्ट देखा गया।

    इस खगोलीय घटनाक्रम के अगले चरण में कुछ क्षेत्रों से चंद्रमा शुक्र ग्रह को कुछ समय के लिए ढकता हुआ भी दिखाई दिया। इस प्रक्रिया को आकल्टेशन (Occultation) कहा जाता है।

    हालांकि, यह घटना हर स्थान से समान रूप से दिखाई नहीं देती, लेकिन सूर्यास्त के तुरंत बाद पश्चिमी क्षितिज की ओर नजर डालने वालों ने इस अद्भुत दृश्य का आनंद लिया।

    शहरवासियों में दिखा उत्साह
    इस खगोलीय घटना को लेकर रांची के लोगों में भारी उत्सुकता देखने को मिली। कई लोगों ने इस दुर्लभ दृश्य की खूबसूरत तस्वीरें अपने मोबाइल और कैमरे में कैद कीं और उन्हें इंटरनेट व सोशल मीडिया अकाउंट्स पर साझा किया।

    यह केवल दृष्टि-रेखा (Line of Sight) का प्रभाव है
    पर्यावरणविद नीतीश प्रियदर्शी ने बताया कि आसमान में चांद और शुक्र भले ही एक-दूसरे के बेहद करीब दिखाई दिए, लेकिन वास्तविकता में दोनों के बीच की दूरी बहुत विशाल है

    चंद्रमा पृथ्वी से लगभग 3.8 लाख किलोमीटर दूर है, जबकि शुक्र ग्रह करोड़ों किलोमीटर दूर है। इसे खगोल विज्ञान में 'मून-वीनस कंजंक्शन' कहा जाता है।

    संयोगवश यह नजारा सोमवार को स्पष्ट रूप से दिखाई दिया, जिसे कई लोग एक आध्यात्मिक घटना भी मानते हैं, हालांकि यह पूरी तरह से एक खगोलीय घटनाक्रम है।

    किसी ज्योतिषीय प्रभाव का संकेत नहीं
    डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय (DSPMU), रांची के प्राध्यापक डॉ. अभय कृष्ण सिंह ने कहा कि 14 सितंबर का यह आकाशीय संयोजन खगोलीय दृष्टि से बेहद विशेष है।

    इसे 'चंद्र-शुक्र युति' कहा जाता है। कुछ क्षेत्रों में चंद्रमा ने शुक्र को ढक लिया, जिसे चंद्र-अवच्छादन (आकल्टेशन) कहते हैं। इसका महत्व किसी ग्रह के पृथ्वी पर प्रभाव में नहीं, बल्कि कक्षीय गति और सापेक्ष स्थिति में है।

    डॉ. सिंह ने स्पष्ट किया कि यह घटना किसी ज्योतिषीय प्रभाव का संकेत नहीं है, बल्कि सूर्य, पृथ्वी, चंद्रमा और शुक्र की नियमित कक्षीय गतियों का एक स्वाभाविक परिणाम है।

    आने वाले दिनों में भी शुक्र ग्रह शाम के आसमान का प्रमुख आकर्षण बना रहेगा। 18 सितंबर को शुक्र इस दर्शन-चक्र में अपनी अधिकतम चमक के बेहद करीब पहुंचेगा।

     

  • Moon पर माइक्रोब्स की सर्वाइवल क्षमता ने चौंकाया, NASA की स्टडी में सामने आया बड़ा खुलासा

    Moon पर माइक्रोब्स की सर्वाइवल क्षमता ने चौंकाया, NASA की स्टडी में सामने आया बड़ा खुलासा

    नई दिल्ली
    चांद पर इंसानों के लिए रहना आसान नहीं है. वहां सांस लेने के लिए हवा नहीं है, तापमान बहुत ज्यादा बदलता है. सूरज से आने वाली तेज किरणों और रेडिएशन का सामना करना पड़ता है. लेकिन नासा की एक नई स्टडी में पता चला है कि धरती के कुछ छोटे माइक्रोब्स चंद्रमा की सतह पर भी कुछ समय तक जिंदा रह सकते हैं. कुछ जगहों पर ये जीव हफ्तों से लेकर महीनों तक टिक सकते हैं। 

    यह स्टडी नासा के वैज्ञानिकों ने की है. इसमें चांद के साउथ पोल के तीन इलाकों- नोबिल रिम, कनेक्टिंग रिज और डे गर्लेश रिम को देखा गया. वैज्ञानिकों ने नासा के लूनर रीकॉन्सेंस ऑर्बिटर से मिले आंकड़ों और चांद पर रेडिएशन की जानकारी का इस्तेमाल किया. उन्होंने पांच तरह के माइक्रोब्स पर कंप्यूटर मॉडल के जरिए जांच की. इनमें दो फंगस और तीन बैक्टीरिया शामिल थे। 

    कौन से जीव ज्यादा मजबूत निकले?
    स्टडी में शामिल दोनों फंगस ने बैक्टीरिया के मुकाबले ज्यादा मजबूती दिखाई. इनमें एस्परजिलस नाइगर सबसे ज्यादा मजबूत रहा. इसे आम तौर पर ब्लैक मोल्ड कहा जाता है. यह गर्म और नमी वाली जगहों पर पाया जाता है. इसे अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के अंदर भी पाया जा चुका है। 

    दूसरा फंगस फ्यूजेरियम था. यह आमतौर पर मिट्टी में पाया जाता है. इसने भी मुश्किल हालात में टिकने की क्षमता दिखाई, लेकिन एस्परजिलस से कम. तीन बैक्टीरिया में डाइनोकोकस रेडियोडूरान्स, स्टेफाइलोकोकस ऑरेयस और बैसिलस सबटिलिस शामिल थे. इनमें डाइनोकोकस सबसे मजबूत रहा. बाकी दो बैक्टीरिया पर चांद की UV किरणों का ज्यादा असर पड़ा। 

    चांद पर कहां बच सकते हैं ये माइक्रोब्स?
    चंद्रमा पर माइक्रोब्स के लिए सबसे बड़ी परेशानी तेज UV किरणें, रेडिएशन और बहुत ज्यादा गर्मी है. चांद पर दिन के समय तापमान करीब 127 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है. लेकिन चांद की हर जगह एक जैसी नहीं है. दक्षिणी ध्रुव के कुछ गड्ढों में सूरज की रोशनी सीधे नहीं पहुंचती। 

    इन जगहों पर माइक्रोब्स के कुछ समय तक बचने की संभावना ज्यादा है. कंप्यूटर मॉडल के मुताबिक कुछ इलाकों में ये जीव हफ्तों से महीनों तक जिंदा रह सकते हैं। 

    जिंदा रहना और बढ़ना अलग बात है
    वैज्ञानिकों ने बताया कि इस स्टडी में सिर्फ यह देखा गया कि माइक्रोब्स कितने समय तक जिंदा रह सकते हैं. यह नहीं देखा गया कि वे चांद पर बढ़ सकते हैं या अपनी संख्या बढ़ा सकते हैं. अगर कोई माइक्रोब चांद की मिट्टी के नीचे दब जाए तो उसे तेज रेडिएशन से कुछ बचाव मिल सकता है। 

    चांद के कुछ इलाकों में पानी बर्फ के रूप में भी मौजूद है. इसलिए वैज्ञानिकों के लिए यह समझना जरूरी है कि धरती से पहुंचे माइक्रोब्स भविष्य में चांद की मिट्टी और पानी से जुड़े रिसर्च को प्रभावित तो नहीं करेंगे। 

    भविष्य के चंद्र मिशनों के लिए क्यों जरूरी है यह स्टडी?
    नासा के अर्टिमिस मिशनों के तहत इंसानों को चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास भेजने की तैयारी है. इंसानों के साथ धरती के माइक्रोब्स भी अनजाने में चांद तक पहुंच सकते हैं. ये स्पेससूट, उपकरणों या मशीनों के जरिए वहां पहुंच सकते हैं। 

    इससे भविष्य के वैज्ञानिकों के सामने एक बड़ी समस्या आ सकती है. अगर चांद की मिट्टी या बर्फ में कोई माइक्रोब मिलता है, तो यह पता लगाना जरूरी होगा कि वह चांद पर पहले से था या धरती से वहां पहुंचा.इसलिए वैज्ञानिकों का कहना है कि चंद्र मिशनों में धरती से ले जाए गए माइक्रोब्स का पूरा रिकॉर्ड रखना जरूरी होगा। 

    इससे बाद में चांद से मिले सैंपल की सही जांच करने में मदद मिलेगी. इस स्टडी का मतलब यह नहीं है कि ये माइक्रोब्स चांद पर आराम से रह सकते हैं. इसका मतलब सिर्फ इतना है कि चांद की कुछ खास जगहों पर धरती के कुछ छोटे जीव उम्मीद से ज्यादा समय तक जिंदा रह सकते हैं। 

  • 96% चंद्रमा पर पड़ेगी ग्रहण की छाया! रक्षाबंधन पर जानें भारत में कब और कहां दिखेगा नजारा

    96% चंद्रमा पर पड़ेगी ग्रहण की छाया! रक्षाबंधन पर जानें भारत में कब और कहां दिखेगा नजारा

    इंदौर 
    रक्षाबंधन पर साल का आख‍िरी चंद्र ग्रहण लगने जा रहा है. यानी 28 अगस्‍त को राखी के त्‍योहार के साथ ही ग्रहण शुरू होगा. पंचांग के मुताबिक इस ग्रहण की शुरुआत 28 अगस्त की सुबह 8 बजकर 04 मिनट से हो जाएगी और यह सुबह 11 बजकर 21 मिनट पर समाप्‍त होगा. वैसे यह आंशिक चंद्र ग्रहण होगा. इसी के साथ यह साल का आखिरी ग्रहण भी रहेगा. इसके बाद 2026 में कोई और ग्रहण नहीं लगेगा. इस ग्रहण की परम अवस्था के समय चंद्रमा का अधिकांश भाग पृथ्वी की प्रच्छाया से पूरी तरह छिप जाएगा. इसमें चांद कटा हुआ दिखाई देगा. चल‍िए आपको बताते हैं क‍ि  ग्रहण कहां-कहां दिखाई देगा और इसका कहां पर प्रभाव पड़ेगा। 

    यह चंद्र ग्रहण उत्तर अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, प्रशांत महासागर के पूर्वी भागों और अटलांटिक महासागर में नजर आएगा. वियना, पेरिस, रोम, बर्लिन, प्राग, ब्रुसेल्स, मैड्रिड, लंदन, रियो डी जेनेरियो, न्यूयॉर्क, जोहान्सबर्ग और ब्यूनस आयर्स इन शहरों में द‍िखेंगे.  जहां यह चंद्र ग्रहण पूरी तरह नजर आएगा। 

    28 अगस्त 2026 का चंद्र ग्रहण भारत, बांग्लादेश, चीन, जापान, नेपाल, श्रीलंका और एशिया के अधिकांश भागों से द‍िखाई नहीं देगा. इसके साथ ही ऑस्ट्रेलिया के अधिकांश भागों और पश्चिमी प्रशांत महासागर से भी यह ग्रहण द‍िखाई नहीं देगा। 

    यह चंद्र ग्रहण में सूतक काल नहीं लगेगा, क्योंकि यह ग्रहण भारत में दिखाई नहीं दे रहा है. बता दें वैसे चंद्र ग्रहण का सूतक ग्रहण लगने से 9 घंटे पहले शुरू हो जाता है. वहीं सूर्य ग्रहण का सूतक 12 घंटे शुरू हो जाता है। 

    चंद्र ग्रहण के समय भोजन खाने और पकाने से पूरी तरह मनाही है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस दौरान भोजन दूषित हो जाता है. वहीं गर्भवती स्त्रियों को इस दौरान विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है. जैसे उन्हें घर से बाहर निकलने से मनाही है. इसके अलावा ग्रहण काल में गर्भवती स्त्रियों को वस्त्र वगैरह काटने या सिलने से भी मना किया जाता है. मान्यता है कि राहु और केतु के दुष्प्रभाव के कारण बच्‍चे शारीरिक रूप से अक्षम हो सकते हैं, ऐसी मान्‍यता है इसलिए ग्रहण काल में गर्भवती महिलाओं को ये सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।