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  • 20 साल की ‘जीविका’ ने बदली गांवों की तस्वीर, महिलाओं को मिला रोजगार और आत्मनिर्भरता का रास्ता

    20 साल की ‘जीविका’ ने बदली गांवों की तस्वीर, महिलाओं को मिला रोजगार और आत्मनिर्भरता का रास्ता

    पटना
    वर्ष 2006 में गांधी जयंती पर शुरू हुई ‘जीविका’-बिहार ग्रामीण आजीविका संवर्धन सोसाइटी (बीआरएलपीएस) की पहल शुक्रवार को 20 साल पूरे कर रही है। इस दौरान ग्रामीण महिलाओं ने जीविका समूह से जुड़कर स्वावलंबन की नई कहानी लिखी। दो दशक की इस निरंतर यात्रा ने बिहार के गांवों की तस्वीर बदल दी है।

    घर की चहारदीवारी एवं चूल्हे-चौके तक जो महिलाएं सीमित थीं, वे आज न सिर्फ वित्तीय रूप से सक्षम हुई हैं, बल्कि सामाजिक बदलाव एवं स्थानीय नेतृत्व की धुरी भी बन चुकी हैं

    राज्य में लगभग 11.85 लाख स्वयं सहायता समूह
    विश्व बैंक की सहायता से कुछ जिलों में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू हुआ यह अभियान आज पूरे राज्य में वटवृक्ष बन चुका है। वर्तमान में राज्य में लगभग 11.85 लाख स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) संचालित हैं, जिनसे करीब 1.81 करोड़ परिवार जुड़े हैं।

    इसमें भी अनुसूचित जाति व जनजाति के 72 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों को सम्मिलित किया गया है। सबसे खास बात यह है कि इन समूहों में 35 प्रतिशत महिलाएं नेतृत्व की भूमिका निभा रही हैं।

    साप्ताहिक बचत आज करीब 2,693 करोड़ रुपये
    महिलाओं की आर्थिक मजबूती के आंकड़े बेहद प्रभावकारी हैं। जीविका दीदियों की साप्ताहिक बचत आज करीब 2,693 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है। बैंकों से 69,000 करोड़ रुपये से अधिक का संस्थागत ऋण समूहों को उपलब्ध कराया गया है, जिसकी वापसी दर 99 प्रतिशत के आसपास है। इस संस्थागत व्यवस्था ने ग्रामीण इलाकों में साहूकारों और महाजनों के शोषणकारी चक्र को ध्वस्त कर दिया है।

    जीविका ने महिलाओं को कृषि और उद्यमिता के नये आयामों से जोड़ा है। लगभग 42 लाख महिला किसान आधुनिक खेती से जुड़ी हैं और 61 महिला किसान उत्पादक कंपनियां (एफपीसी) करोड़ों का कारोबार कर रही हैं। लखपति दीदी अभियान के तहत लाखों महिलाएं सालाना एक लाख से अधिक कमा रही हैं। इतना ही नहीं, महिलाएं पारंपरिक बंधनों को तोड़कर राज मिस्त्री की तर्ज पर रानी मिस्त्री की प्रसिद्धि बटोर रहीं हैं।

  • गांव-गांव ज्ञान की रोशनी जला रहीं जीविका दीदियां, लाइब्रेरी में पढ़ रहे 1 लाख से ज्यादा युवा

    गांव-गांव ज्ञान की रोशनी जला रहीं जीविका दीदियां, लाइब्रेरी में पढ़ रहे 1 लाख से ज्यादा युवा

    पटना
    कल तक जो महिलाएं घर की चारदीवारी, चूल्हे-चौके और सामाजिक बंदिशों में कैद थीं, जिन्हें आर्थिक तंगी और रूढ़िवादी सोच के कारण कभी पढ़ाई का अवसर नहीं मिला।

    आज वही महिलाएं ग्रामीण बिहार में बदलाव की नई इबारत लिख रही हैं। बिहार सरकार के ग्रामीण विकास विभाग की जीविका योजना के तहत संचालित जीविका-दीदी की लाइब्रेरी सशक्त माध्यम बन चुकी है।

    राज्य में संकुल स्तरीय संघ (सीएलएफ) के माध्यम से 118 जीविका-दीदी की लाइब्रेरी(सामुदायिक पुस्तकालय सह करियर विकास केंद्र) का सफल संचालन हो रहा है।

    1 लाख से अधिक युवा एवं क‍िशोर जुड़े
    इनसे अब तक 1 लाख से अधिक किशोर एवं युवा जुड़ चुके हैं। ग्रामीण विकास विभाग के अनुसार, ये लाइब्रेरी सप्ताह के सातों दिन सुबह 9.30 से शाम 5.00 बजे तक खुलते हैं।

    प्रत्येक केंद्र पर प्रतिदिन औसतन 50 से 70 शिक्षार्थी पहुंचते हैं। इन शिक्षार्थियों में 61 फीसदी लड़कियां हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो राज्यभर में रोजाना करीब 5,000 से 7,000 बच्चे लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ते हैं।

    इसमें एक बड़ी संख्या दीदियों की बच्चों की भी है जो आज इस सुविधा के बदौलत खुद का भविष्य संवार रहे हैं।
    पुस्तकालयों में शांत वातावरण के साथ कंप्यूटर, टैबलेट, हाई-स्पीड इंटरनेट, किताबें, समाचार पत्र और आनलाइन पठन-पाठन की आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं

    विभागीय अधिकारियों ने बताया कि लाइब्रेरी में बढ़ने के लिए आने वाले बच्चों में कई ऐसे हैं जिन्होंने पूर्व में अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी।

    आज उन्हें एनआईओएस, बीबीओएसइ और इग्नू जैसे संस्थानों में नामांकन कराकर मुख्यधारा में लाया जा रहा है। साथ ही, प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मार्गदर्शन, ऑनलाइन आवेदन में सहायता और विशेषज्ञों द्वारा करियर काउंसिलिंग व मेंटरिंग दी जा रही है।

    दहलीज लांघकर विद्या-दीदी बनीं डिजिटल एडुप्रेन्योर
    ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक समस्याओं और संसाधनों के अभाव में जो महिलाएं कभी घर से निकलने में भी झिझकती थीं, आज वे इन सेंटरों का पूर्ण स्वामित्व, संचालन और प्रबंधन खुद संभाल रही हैं।

    प्रत्येक केंद्र पर एक प्रशिक्षित सामुदायिक पेशेवर विद्या-दीदी (डिजिटल एडुप्रेन्योर) के रूप में तैनात हैं। वे दैनिक संचालन से लेकर बच्चों को डिजिटल सेवाएं देने तक की कमान संभाल रही हैं।

    आर्थिक तंगी से मुक्ति और बढ़ता सामाजिक मान-सम्मान
    विद्या-दीदी और लाइब्रेरी मैनेजर के रूप में काम करके हजारों महिलाएं अब नियमित आय अर्जित कर रही हैं।
    इससे न केवल उनके परिवार का जीवन स्तर सुधरा है, बल्कि घर और समाज के फैसलों में भी उनकी बात को सम्मान मिल रहा है।

    पढ़ाई और डिजिटल हुनर से जुड़कर दीदियों ने साबित किया है कि दिया है कि अगर सही अवसर मिले तो ग्रामीण भारत की तस्वीर पूरी तरह बदली जा सकती है।

        जीविका-दीदी की लाइब्रेरी केवल किताबों का केंद्र नहीं, बल्कि हमारी उन बहनों के आत्मसम्मान और सफलता की कहानी है जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों को हराकर नया इतिहास रचा है। राज्य में संचालित 118 पुस्तकालयों के माध्यम से आज 1 लाख से अधिक युवाओं और 61 फीसदी बेटियों को अपने ही गांव में डिजिटल शिक्षा और करियर मार्गदर्शन मिल रहा है। हमारी विद्या-दीदियां आज गांव-गांव में ज्ञान का दीप जलाकर ग्रामीण बिहार को आत्मनिर्भर बना रही हैं।
        श्रवण कुमार, मंत्री, ग्रामीण विकास विभाग और सूचना एवं जन सम्पर्क विभाग।

     

  • बिहार की ‘स्वच्छता दूत’ बनीं जीविका दीदियां, पूर्वी भारत का सबसे साफ राज्य बनने का गौरव मिला

    बिहार की ‘स्वच्छता दूत’ बनीं जीविका दीदियां, पूर्वी भारत का सबसे साफ राज्य बनने का गौरव मिला

    पटना.

    भारत सरकार की ओर से जारी “स्वच्छ सर्वेक्षण ग्रामीण-2025” की रिपोर्ट में बिहार को पूर्वी भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाला राज्य घोषित किया गया है। यह उपलब्धि ग्रामीण विकास विभाग अंतर्गत संचालित लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत जनजागरूकता अभियान, अपशिष्ट प्रबंधन के लिए संचालित विविध योजनाओं के संचालन में जीविका दीदियों तथा ग्रामीण समुदाय की सक्रिय सहभागिता का परिणाम मानी जा रही है।

    सर्वेक्षण में यह पाया गया कि राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय निर्माण एवं उसके नियमित उपयोग को सुनिश्चित करने, घर-घर कचरा संग्रहण व्यवस्था विकसित करने तथा कचरे के समुचित निपटान की दिशा में जीविका दीदियों ने प्रभावी कार्य किए हैं। जीविका दीदियों एवं समुदाय की सक्रिय भागीदारी ने स्वच्छता अभियान को व्यापक जन समर्थन प्रदान किया है। विदित हो कि पेयजल एवं स्वच्छता विभाग एवं जल शक्ति मंत्रालय, भारत सरकार की ओर से जारी रिपोर्ट में बिहार को पूर्वी भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाला राज्य घोषित किया गया है। पूर्वी क्षेत्र के राज्यों में बिहार प्रथम, ओडिशा द्वितीय, झारखंड तृतीय तथा पश्चिम बंगाल चौथे स्थान पर रहा। राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में घर-घर से कचरा उठाव, इसके निष्पादन एवं साफ-सफाई के लिए राज्य भर में वार्ड स्तर पर रखे गए एक लाख 30 हजार अधिक स्वच्छता कर्मियों, ग्राम पंचायत स्तर पर योगदान दे रहे आठ हजार से अधिक स्वच्छता पर्यवेक्षकों का योगदान भी महत्वपूर्ण रहा है।

    स्वच्छ सर्वेक्षण ग्रामीण-2025 के अंतर्गत देशभर के 33 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के 744 जिलों तथा 20,659 गांवों का विस्तृत सर्वेक्षण किया गया। इस दौरान 3.22 लाख से अधिक ग्रामीण परिवारों तथा 1.03 लाख से अधिक सार्वजनिक संस्थानों एवं सामुदायिक परिसरों का आकलन किया गया। ग्रामीण विकास विभाग अंतर्गत संचालित लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत प्रथम चरण शुभारंभ वर्ष 2014 से अब तक 1 करोड़ 50 लाख 54 हजार व्यक्तिगत शौचालायों एवं भूमिहीन परिवारों के लिए 9,431 सामुदायिक स्वच्छता परिसर का निर्माण हुआ है।

    लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान – द्वितीय चरण (2020- 21 से 2026-27) अंतर्गत राज्य के सभी वार्डों से घर-घर से ठोस अपशिष्ट का संग्रह किया जा रहा है। इसके लिए ग्रामीण क्षेत्र के सभी वार्डों में प्रति वार्ड एक पैडल रिक्शा एवं ग्राम पंचायत स्तर पर एक ई-रिक्शा की व्यवस्था की गई है। ठोस अपशिष्ट के समुचित निष्पादन के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर 7221 अपशिष्ट प्रसंस्करण इकाई (डब्लूपीआई) का निर्माण किया गया है। प्लास्टिक अपशिष्टों के उचित निष्पादन के लिए प्रखंड / अनुमंडल स्तर पर 171 प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन इकाई स्थापित किए गए हैं।

    तरल अपशिष्ट प्रबंधन के लिए 2,13,452 सामुदायिक सोक पिट, 83 344 जंक्शन चैंबर एवं 24,664 नाली निकासी बिंदु इत्यादि का निर्माण किया गया है। राज्य के सभी जिलों में 38 गोबरधन बायोगैस इकाई का निर्माण किया गया है।