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  • लखनऊ में सिर्फ 6% भवनों के पास वैध नक्शा, 30 हजार अवैध निर्माण पर कार्रवाई का इंतजार

    लखनऊ में सिर्फ 6% भवनों के पास वैध नक्शा, 30 हजार अवैध निर्माण पर कार्रवाई का इंतजार

    लखनऊ
    सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी पार्डीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने सोमवार को लोकेश कुमार की याचिका की सुनवाई करते हुए मेरठ में बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण पर चिंता जताने साथ ही अथॉरिटी को फटकार भी लगाई है।

    यह खबर राजधानी में लखनऊ विकास प्राधिकरण व आवास विकास परिषद की आंखें खोलने वाली है। साथ ही ताबड़तोड़ अवैध निर्माण करने वालों को डराने वाली भी है, क्योंकि भविष्य में यदि ऐसा आदेश लखनऊ के लिए हुआ तो क्या होगा? जवाब है 30 हजार से अधिक इमारतें और 241 आवासीय कॉलोनियां अवैध बनी हैं।

    अवैध आवासीय व व्यावसायिक निर्माण रोकने के लिए मेरठ का प्रकरण सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया, जबकि लखनऊ में ही ऐसा ही कदम उठाया जा चुका है। दिसंबर 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के तत्कालीन मुख्य न्यायमूर्ति राजेश बिंदल व न्यायमूर्ति रजनीश कुमार की खंडपीठ ने रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल अशोक कुमार की याचिका समेत चार अन्य याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए बहुमंजिला इमारतों के अवैध निर्माण के मामले में एलडीए से जवाब तलब किया था।

    हाई कोर्ट में दाखिल याचिका में पूरे शहर की बदतर स्थिति विस्तार से बताई गई थी। राजधानी की तमाम बहुमंजिला इमारतें अवैध तरीके से बनाई गई हैं। इनमें से कुछ में स्वीकृति से ज्यादा मंजिलें बना दी गईं तो कई में अवैध निर्माण किया गया।

    एलडीए ने कुछ की पहचान तो की है, लेकिन बड़े भवनों को ध्वस्त नहीं किया गया। अवैध निर्माण में अधिकारियों की मिलीभगत है, लेकिन इनके खिलाफ अभी तक कोई संतोषजनक कार्रवाई नहीं हुई। उस समय शहर में करीब 12500 अवैध निर्माण होने का दावा किया गया था, इनमें अपार्टमेंट, कांप्लेक्स, रो हाउसेस, प्लाटिंग सोसाइटी शामिल हैं।

    241 अवैध आवासीय कॉलोनियां चिन्हित
    शासन-प्रशासन ने इन पर अंकुश लगाने के लिए आदेश दिए, मगर हुआ कुछ नहीं। होटल लेवाना सुइट्स अग्निकांड के बाद इनकी रफ्तार और बढ़ गई। इसके लिए प्रवर्तन के इंजीनियर व अफसर जिम्मेदार हैं। आवासीय भूखंडों पर सबसे ज्यादा होटल गोमती नगर, शहीद पथ के किनारे व गोमतीनगर विस्तार में बने हैं। एलडीए की सीलिंग के बावजूद ये इमारतें गुपचुप तरीके से बनकर तन गईं। इन पर कभी एलडीए का बुलडोजर नहीं चल सका। इस पर प्रभावी आदेश नहीं हो सका।

    इधर चार साल में अवैध भवन बनने की रफ्तार बढ़ गई यही वजह है कि अवैध भवनों का ग्राफ करीब 30 हजार तक पहुंच चुका है। लगभग ढाई हजार से अधिक नोटिस अवैध निर्माण करने वालों को दिए गए हैं। ऐसे ही 241 अवैध आवासीय कॉलोनियां चिन्हित हैं।

    राजधानी में अवैध निर्माण का ताजा प्रकरण अलीगंज के अवैध व्यावसायिक कांप्लेक्स में आग लगने के बाद सामने आई है। घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट ने गूगल स्ट्रीट व्यू तकनीक का उपयोग करके सिर्फ अलीगंज क्षेत्र में 51 अवैध निर्माण खोजा था।

    उसी समय एलडीए ने शहर में 101 अवैध भवनों को गिराने की कार्यवाही जल्द शुरू करने का दावा किया लेकिन, अब तक यह शुरू नहीं हो सकी है। वहीं, एलडीए उपाध्यक्ष प्रथमेश कुमार स्वीकार कर चुके हैं कि राजधानी में सिर्फ छह प्रतिशत के पास ही वैध नक्शे हैं।

  • बैंक कॉलोनी में अनुमति के विपरीत निर्माण करने पर 18 दुकानों पर निगम का चला बुल्डोजर  

    बैंक कॉलोनी में अनुमति के विपरीत निर्माण करने पर 18 दुकानों पर निगम का चला बुल्डोजर  

    ग्वालियर
    भवन अधिकारी यशवंत मैकले ने बताया कि नगर निगम आयुक्त अभिषेक चौधरी के निर्देशानुसार सिटी प्लानर सुरेश अहिरवार के निर्देशन में अवैध रूप से किए गए निर्माण कार्यों को हटाने की कार्यवाही निरंतर की जा रही हैं। जिसके तहत आज वार्ड क्रमांक 21 न्यू बैंक कॉलोनी में मोहन वादिल एवं ऋषभ जैन द्वारा नगर निगम से प्राप्त अनुमति, खिलाफ पार्किंग के स्थान पर 18 दुकानों का निर्माण किया जा रहा था। जिसके लिए निगम द्वारा अवैध निर्माण हटाने हेतु निगम द्वारा विधिवत नोटिस दिए गए थे। किन्तु भवन स्वामी द्वारा अनुमति निर्माण नही हटाया गया। जिस पर निगम द्वारा कार्यवाही करते हुए अनुमति के विपरीत बनाई गई 18 दुकानों को हटाया गया।
    इसके साथ ही पूर्व विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत माधव प्लाजा के सामने थौराट की गोठ में रोड़ पर बनी दीवाल की तुड़ाई कर गेट फावड़ा जप्त कर कार्यवाही की गई। इसके पश्चात मुरार बारादरी से सदर बाजार अग्रसेन चौराहा गणेश मंदिर गर्म सड़क गर्ल्स कॉलेज तक यातायात में अवरुद्ध हाथ ठेले फुटपाथियों दुकानदारों के सामान को हटवाया और जप्त सामान को मदाखलत कार्यालय पर जमा किया। कार्यवाही के दौरान मदाखलत अधिकारी शैलेन्द्र चौहान, जोनल ऑफिसर सौरव चौधरी, मदाखलत निरीक्षक सुघर सिंह सिसोदिया सहित मदाखलत अमला मौजूद रहा।

     

  • अवैध निर्माणों के रेगुलराइजेशन पर SC ने राज्यों पर छोड़ा फैसला, कहा- हालात के मुताबिक बनाएं नीति

    अवैध निर्माणों के रेगुलराइजेशन पर SC ने राज्यों पर छोड़ा फैसला, कहा- हालात के मुताबिक बनाएं नीति

    नई दिल्ली
    सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को देशभर में लंबे समय से मौजूद अनधिकृत और अवैध निर्माणों के रेगुलराइजेशन और डिमोलशन के लिए एक समान नीति बनाने की मांग पर सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को अपने स्तर पर विचार करने को कहा। हालांकि, अदालत ने जनहित याचिका पर कोई निर्देश जारी करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह मुख्य रूप से राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों के नीतिगत अधिकार क्षेत्र का विषय है।

    • चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि अलग-अलग राज्यों की परिस्थितियां और जमीनी वास्तविकताएं काफी अलग हैं।
    • ऐसे में पूरे देश के लिए एक समान नीति तय करना न तो व्यावहारिक होगा और न ही उचित।
    • पीठ ने उम्मीद जताई कि राज्य और केंद्रशासित प्रदेश नई नीतियां बनाते समय या मौजूदा नीतियों की समीक्षा करते समय याचिका में उठाए मुद्दों पर उचित विचार करेंगे।
    • यह याचिका सेंटर फॉर लॉ एंड गुड गवर्नेंस ने दाखिल की थी।
    • इसमें खासकर गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लंबे समय से बने अनधिकृत आवासों को अचानक ध्वस्त किए जाने से बचाने के लिए नीति बनाने की मांग की गई थी।
    • याचिकाकर्ता ने कहा कि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और दिल्ली जैसे राज्यों में अनधिकृत बस्तियों और निर्माणों के नियमितीकरण की योजनाएं हैं, लेकिन कई जगह बिना पर्याप्त नोटिस के ध्वस्तीकरण कर दिया जाता है।
    • प्रभावित परिवारों के पुनर्वास या वैकल्पिक आवास की व्यवस्था भी कई मामलों में नहीं होती। ध्वस्तीकरण कठोर कदम है।

    ध्वस्तीकरण से पहले 15 दिन का नोटिस
    चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, सुप्रीम कोर्ट पहले ही अवैध और अनधिकृत ध्वस्तीकरण के खिलाफ सुरक्षा उपाय तय कर चुका है। अनधिकृत कब्जाधारी को भी ध्वस्तीकरण से पहले 15 दिन का नोटिस दिया जाना चाहिए। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा, याचिका में उठाए मुद्दों का समाधान हर मामले की परिस्थितियों के आधार पर किया जाना होगा। कोई समिति राज्य सरकारों और नगर निकायों को कानून लागू करने के अधिकारों का स्थान नहीं ले सकती।

    प्रभावित परिवारों की चिंता भी समझनी होगी
    कोर्ट ने कहा, नीति बनाने का अधिकार राज्यों के पास है। हालांकि, किसी राज्य की नीति मनमानी हो या प्रक्रिया का पालन न किया गया हो तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। प्रभावित परिवारों के आवास के अधिकार की चिंता को भी समझना होगा, लेकिन परिस्थितियां राज्य-दर-राज्य अलग हो सकती हैं। अदालत ने याचिकाकर्ता को केंद्र, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के समक्ष याचिका रखकर नई नीति बनाने या मौजूदा नीतियों की समीक्षा का आग्रह करने की स्वतंत्रता दी।