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  • शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट से पूरे मेरठ तक पहुंचा मामला, अवैध व्यावसायिक गतिविधियों पर होगी कार्रवाई

    शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट से पूरे मेरठ तक पहुंचा मामला, अवैध व्यावसायिक गतिविधियों पर होगी कार्रवाई

     मेरठ
    शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट में अवैध निर्माण और आवासीय संपत्तियों में व्यावसायिक गतिविधियों के मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद अब कार्रवाई पूरे शहर की तरफ बढ़ रही है।

    हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में सर्वे रिपोर्ट प्रस्तुत करने के बाद शासन ने मेरठ विकास प्राधिकरण (मेडा) के सचिव अर्पित गुप्ता को पद से हटाकर लखनऊ से संबद्ध कर दिया है।

    सचिव का कार्यकाल करीब तीन महीने ही रहा। सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को हुई सुनवाई में मेरठ में अवैध निर्माण के मामले में जिस तरह सख्त निर्देश दिए गए, उसी दिन शासन स्तर पर हुई इस कार्रवाई से एमडीए में भी खलबली मच गई है।

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को जोन-ए में एमडीए द्वारा चिन्हित 16,726 ऐसी संपत्तियों को सील करने के आदेश दिए, जिनमें अवैध रूप से व्यावसायिक गतिविधियां संचालित होने की बात सामने आई है। कोर्ट ने जोन-बी, सी और डी में भी इसी तरह की संपत्तियों को चिन्हित करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई नौ दिसंबर को होगी।

    न्यायमूर्ति जेबी पाडीवाला और न्यायमूर्ति के. विश्वनाथन की पीठ के समक्ष हुई सुनवाई में मेरठ में अवैध निर्माण और अवैध कालोनियों को लेकर अधिकारियों से जवाब मांगा गया। हालांकि, सोमवार की सुनवाई का विस्तृत आदेश अभी अपलोड नहीं हुआ है।

    सेंट्रल मार्केट से शुरू हुआ मामला अब हजारों संपत्तियों तक
    शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट में आवासीय संपत्तियों के व्यावसायिक इस्तेमाल और स्वीकृत मानचित्र के विपरीत निर्माण का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा है। अदालत के निर्देश पर पहले 44 संपत्तियों में कार्रवाई की गई थी।

    आवास एवं विकास परिषद की ओर से पेश अनुपालन रिपोर्ट में बताया गया कि 44 में से 20 संपत्तियों में पूरी तरह अवैध निर्माण हटाया जा चुका है। शेष 24 संपत्तियों में भी अवैध निर्माण हटाने के निर्देश दिए गए हैं। इसके बाद सोमवार की सुनवाई में मामला और व्यापक हो गया। एमडीए के अंतर्गत आने वाले शहर का आधे से अधिक हिस्सा अब चपेट में आयेगा।

    जोन-ए में चिन्हित 16,726 संपत्तियों में व्यावसायिक गतिविधियों के मामले में सीलिंग के निर्देश दिए गए। अदालत ने दूसरे जोन में भी ऐसी संपत्तियों की पहचान करने को कहा है। इससे एमडीए के सामने अब बड़े पैमाने पर सर्वे, चिन्हांकन और कार्रवाई की चुनौती खड़ी हो गई है। हजारों संपत्तियों से जुड़े इस मामले में कार्रवाई का असर भवन स्वामियों और व्यापारियों पर भी पड़ना तय माना जा रहा है।

  • अरावली की चोटियों पर कंक्रीट का कब्जा, रिसर्च में सामने आई बिल्डरों की मनमानी

    अरावली की चोटियों पर कंक्रीट का कब्जा, रिसर्च में सामने आई बिल्डरों की मनमानी

    उदयपुर
    अरावली पहाड़ियों के संरक्षण का जायजा लेने और स्थानीय लोगों से बातचीत करने के लिए 9 व 10 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट की विशेष समिति उदयपुर के दौरे पर आ रही है। इस अहम दौरे से ठीक पहले एक वैज्ञानिक शोध ने झीलों की नगरी में अरावली की चोटियों पर चल रहे कंक्रीट के अवैध निर्माणों की पोल खोल दी है। सैटेलाइट इमेजरी आधारित इस अध्ययन ने साबित किया कि यूडीए क्षेत्र के नो-कंस्ट्रक्शन जोन यानी अरावली की चोटियों और संवेदनशील ढलानों पर धड़ल्ले से सैकड़ों निजी होटल, रिसॉर्ट और कमर्शियल प्रोजेक्ट्स खड़े कर दिए गए हैं।

    मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय की डॉ. सीमा जालान और इसरो (एनआरएससी) के वरिष्ठ वैज्ञानिक दंडबाथुला गिरिबाबू के इस शोध ने न केवल बिल्डर्स और प्रशासनिक तंत्र की मिलीभगत को उजागर किया है, बल्कि यह भी दिखाया कि कैसे नीतिगत खामियों का फायदा उठाकर झीलों को कैचमेंट देने वाली पहाड़ियों का क्षरण किया गया। राजस्थान हाईकोर्ट के कड़े रुख और सुप्रीम कोर्ट समिति के आगमन के बीच यह रिपोर्ट प्रशासन के लिए आईना साबित हो रही है।

    पर्यटन और आबादी के दबाव ने ली पहाड़ियों की बलि
    साल 2010 में उदयपुर में पर्यटकों की संख्या लगभग 7.5 लाख थी, जो 2024 में उछलकर 18.5 लाख तक पहुंच गई। शहर में अब पर्यटकों के लिए करीब 850 संपत्तियां मौजूद हैं, जिनमें 30 फाइव स्टार होटल और 80 रिसॉर्ट शामिल हैं। दूसरी ओर, यूडीए का क्षेत्रफल जो 1999-2012 तक 350.9 वर्ग किमी था, वह 30% बढ़कर 2024 में 457 वर्ग किमी हो गया है। आबादी भी 4.7 लाख से बढ़कर 7 लाख तक पहुंच गई। इसी दबाव की आड़ में पहाड़ियों पर अतिक्रमण हुआ।

    साल 1972 से 2024: ऐसे बदला अरावली का भूगोल
    शोधकर्ताओं ने साल 1972 के 'कोरोना सैटेलाइट' के ऐतिहासिक डेटा की तुलना 2024 की आधुनिक सैटेलाइट तस्वीरों से की, जिसके निष्कर्ष बेहद चौंकाने वाले हैं। अरावली की पहाड़ियों का सबसे तेज और विनाशकारी क्षरण साल 2014 के बाद हुआ है। कुल संवेदनशील निर्माणों में से 50 प्रतिशत का निर्माण साल 2017 के बाद हुआ। साल 2023-24 के दौरान पहाड़ियों पर 40 बड़े नए प्रोजेक्ट्स खड़े हो गए।

    160 में से 144 निर्माण निजी
    रिसर्च के दौरान यूडीए क्षेत्र की पहाड़ियों और तलहटी में 160 निर्माणों का अध्ययन किया गया। सरकारी और ऐतिहासिक धरोहर को हटा दें तो इनमें से 144 विशुद्ध रूप से निजी निर्माण हैं।

        होटल और रिसॉर्ट्स: 64 (लगभग 50%)
        शैक्षणिक संस्थान / फार्म हाउस / रिहायशीः 33
        कमर्शियल/इंडस्ट्रियल इकाइयां: 10%

    30 डिग्री ढलान तक पहुंचे निर्माण
        पहाड़ियों पर निर्माण के लिए ढलान और ऊंचाई के सख्त नियम हैं, लेकिन यहां सब दरकिनार हैं।
        37 बड़े व्यावसायिक/निजी प्रतिष्ठान और फार्महाउस ऐसी ढलानों पर हैं, जो 11.33 डिग्री से अधिक तीखे हैं और 600 मीटर से अधिक ऊंचाई पर हैं।
        कई होटल और रिसॉर्ट 20 डिग्री से अधिक की तीव्र ढलान और 700 मीटर से ज्यादा ऊंचाई पर बना दिए गए हैं।
        हालात ऐसे हैं कि 30 डिग्री से अधिक ढलान वाली अत्यंत संवेदनशील पहाड़ियों पर भी अवैध निर्माण जारी है।

    इसरो का अचूक समाधान: एक क्लिक में खत्म होगा बिल्डर्स का खेल
    नासा के लेजर सैटेलाइट डेटा का उपयोग करके वैज्ञानिकों ने खुले तौर पर उपलब्ध डिजिटल एलिवेशन मॉडल्स का परीक्षण किया। इसके अध्ययन में एसआरटीएम जिसका एरर 9.54 मीटर है और एलोस पलसार जिसका एरर 10.78 मीटर की कमियों को उजागर किया। इन्हीं का इस्तेमाल प्रशासन ने किया, जिसकी वजह से गलत जगहों पर भी निर्माण हुआ। पहाड़ी क्षेत्रों के लिए फेबडेम तकनीक सबसे सटीक है, जिसका एरर मात्र 7.72 मीटर है। यह तकनीक पेड़ों और इमारतों को हटाकर जमीन की सटीक ऊंचाई दिखाती है।

    यदि प्रशासन इस तकनीक से तैयार थ्री डी मैप पर अपने राजस्व (खसरा) मैप की लेयर चढ़ा दे, तो एक क्लिक में पता चल सकता था कि किस खसरा नंबर पर निर्माण की अनुमति दी जा सकती है और कौन सा हिस्सा पूरी तरह नो-कंस्ट्रक्शन जोन में आता है।

    मनभावन नजारों की कीमत चुका रहे पहाड़
    सबसे ज्यादा 60% (86 निर्माण) उदयपुर की झीलों के पश्चिम, उत्तर-पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम में केंद्रित हैं। नाई, बूझड़ा, गोरैला और सज्जनगढ़ की पहाड़ियों पर झीलों और जंगलों के सुरम्य दृश्यों को भुनाने के लिए आतिथ्य उद्योग ने नियमों को ताक पर रख दिया।

    सड़क के केंद्र से ढलान मापने का खेल
    बिल्डर्स को ये अनुमतियां कैसे मिली, जवाब है नीतिगत खामी। प्रदेश सरकार के कंजरवेशन ऑफ हिल इन अर्बन एरियाज रेगुलेशन 2018 और 2024-25 के नए ड्राफ्ट में ढलान नापने का आधार सबसे पास के कनेक्टिंग रोड का सेंटरलाइन तय किया था। इससे बेसलाइन बढ़ जाती है, जिससे पहाड़ का ढलान कागजों में कम दिखता है। इसी अस्पष्टता का फायदा उठाकर बिल्डर्स ने धड़ाधड़ अनुमतियां लीं और प्रशासन ने इसकी प्रमाणिकता जांची ही नहीं।

    राजस्थान हाईकोर्ट का कड़ा रुख
    राजस्थान उच्च न्यायालय (जोधपुर पीठ) ने 9 मई 2024 को झील संरक्षण समिति बनाम राजस्थान सरकार मामले में आदेश दिया था कि पहाड़ियों के सटीक सीमांकन के लिए तकनीक आधारित विकल्पों का उपयोग किया जाए। सुप्रीम कोर्ट कमेटी भी इसी तकनीकी सुदृढ़ता की पड़ताल करेगी।

  • अवैध निर्माण पर सख्ती: पानीपत में 29 गलियां और 18 नींव ध्वस्त, प्रशासन का बड़ा एक्शन

    अवैध निर्माण पर सख्ती: पानीपत में 29 गलियां और 18 नींव ध्वस्त, प्रशासन का बड़ा एक्शन

    पानीपत.

    नगर निगम की डीटीपी ब्रांच की टीम ने शुक्रवार को शहर में 3 जगहों पर काटी जा रही अवैध कालोनियों में 29 कच्ची व पक्की गलियां और 18 प्लॉट में बनाई जा रही नींव को उखाड़ा। नगर निगम अधिकारियों ने बताया कि संबंधित अवैध कॉलोनियां काटने वालों को नगर निगम अधिनियम 1994 के तहत 3 बार नोटिस जारी किए गए थे। जिसके बाद भी इन अवैध कालोनियों में न तो कोई निर्माण कार्य हुए और न ही कॉलोनियां काटने वालों ने प्लॉट बेचने का काम बंद कराया।

    कच्ची सड़कों को अब पक्का बनाने का काम भी चल रहा था। जबकि नोटिस के माध्यम से कालोनाइजरों को बोला जा रहा था कि वे निर्माण कार्य बंद करवाकर इस भूमि को कृषि योग्य बनाए। ऐसा नहीं करने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। इसके बाद भी आदेशों की अनुपालना नहीं की गई।

    अब केस भी दर्ज होंगे
    हरियाणा नगर निगम अधिनियम 1994 की धारा 350-सी के तहत अवैध कॉलोनी काटने वाले मालिकों व डीलरों पर पुलिस केस दर्ज होंगे। साथ ही उचित कानूनी कार्यवाही करते हुए गिरफ्तार करने के निर्देश जारी किए गए हैं। अब इन अवैध कालोनियों को तोड़ने के लिए जिलाधीश पानीपत द्वारा नियुक्त डयूटी मैजिस्ट्रेट भी लगाया गया। साथ ही जिला नगर योजनाकार जितेंद्र, रिंकू व राजेश के अलावा पुलिस बल भी तैनात किया गया।

    कॉलोनियों में की गई कार्रवाई

    • पावर हाउस के पास कुटानी रोड के नजदीक काटी जा रही अवैध कॉलोनी में 15 सड़कें व 8 नींव उखाड़ी गई।
    • जगदीश कॉलोनी के सामने वर्मा चौक के पास काटी जा रही अवैध कॉलोनी में 6 गलियां और 3 नींव को उखाड़ा गया।
    • कुटानी रोड पर ही पवन नाम के व्यक्ति द्वारा काटी जा रही अवैध कॉलोनी में 8 नींव और 5 नींव को उखाड़ा गया।
  • 32 हजार अवैध निर्माणों पर कार्रवाई: Chandigarh Housing Board का सख्त कदम

    32 हजार अवैध निर्माणों पर कार्रवाई: Chandigarh Housing Board का सख्त कदम

    चंडीगढ़.

    चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड (सीएचबी) ने शहरवासियों से अपील की है कि वे अवैध निर्माण और अतिक्रमण स्वयं हटाकर दंडात्मक कार्रवाई से बचें। बोर्ड अब तक करीब 32,000 नोटिस जारी कर चुका है, जिनमें भवन नियमों के उल्लंघन और सरकारी जमीन पर कब्जे के मामलों को चिन्हित किया गया है।

    पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के निर्देशों के तहत इस महीने की शुरुआत में सीएचबी ने अवैध निर्माण के खिलाफ अभियान शुरू किया है। अधिकारियों के अनुसार, नोटिस उन मकान मालिकों को दिए गए हैं जिन्होंने स्वीकृत नक्शे से हटकर अतिरिक्त कमरे, स्टोर, छतों पर बालकनी या अन्य निर्माण किए हैं। कई मामलों में अतिरिक्त खंभे खड़े कर मूल संरचना में बदलाव किया गया है, जो सुरक्षा के लिहाज से भी खतरा बताया गया है।

    यूटी प्रशासन का कहना है कि यह अभियान भवन नियमों के पालन को सुनिश्चित करने और अवैध निर्माण पर रोक लगाने के लिए चलाया जा रहा है। सेक्टर-41 और सेक्टर-45 में कुछ अवैध ढांचे पहले ही गिराए जा चुके हैं। इसके बाद सेक्टर 29 और 30 के मकानों को भी नोटिस जारी किया गया है जिसको लेकर इस समय यहां के निवासियों में हाहाकार मचा हुआ है।
    सीएचबी ने अलाटियों को सलाह दी है कि वे जल्द से जल्द उल्लंघन हटाएं और भवन की मूल संरचना—जैसे खंभे, दीवारें और नींव—को अपने खर्च पर बहाल करें, साथ ही स्ट्रक्चरल सेफ्टी सर्टिफिकेट जमा कराएं।

    उच्च न्यायालय ने 28 नवंबर 2019 के आदेश में असुरक्षित इमारतों की जांच के लिए समिति बनाने के निर्देश दिए थे। इसके बाद 21 अप्रैल 2022 के फैसले में अदालत ने एक महीने के भीतर जरूरी संरचनात्मक सुधार करने और इसकी लागत संबंधित अलॉटियों से वसूलने को कहा था। इस बीच, 8 अप्रैल को सेक्टर-45 में तोड़फोड़ अभियान के दौरान स्थानीय लोगों और पुलिस के बीच झड़प हुई। मेयर सौरभ जोशी समेत कई पार्षद मौके पर पहुंचे और विरोध जताया, जिसके बाद अभियान अस्थायी रूप से रोक दिया गया।

    वहीं, सांसद मनीष तिवारी ने इस मुद्दे पर कहा है कि लोगों के घर तोड़ना समाधान नहीं है। उन्होंने जरूरत के मुताबिक किए गए बदलावों को नियमित करने के लिए व्यावहारिक नीति बनाने की मांग की है। वही हाउसिंग बोर्ड में रहने वाले लोग भी वन टाइम रहता की मांग कर रहे हैं। कब रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष निर्मल दत्त का कहना है कि जब दूसरे राज्यों में वन टाइम राहत मिल सकती है तो चंडीगढ़ में क्यों नहीं। इस साल के अंत में नगर निगम चुनाव भी होने हैं ऐसे में जहां लोगों के मकान पर कार्रवाई की तलवार लटक रही है वहीं राजनीति भी गरमाई हुई है।