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  • हेपेटाइटिस को हल्के में न लें, समय पर इलाज नहीं हुआ तो लिवर को हो सकता है स्थायी नुकसान

    हेपेटाइटिस को हल्के में न लें, समय पर इलाज नहीं हुआ तो लिवर को हो सकता है स्थायी नुकसान

    लिवर शरीर का ऐसा अंग है, जो खुद को काफी हद तक ठीक कर सकता है. लेकिन अगर हेपेटाइटिस का समय पर इलाज न कराया जाए, तो यह धीरे-धीरे लिवर को स्थायी नुकसान पहुंचा सकता है. भगवान महावीर मणिपाल हॉस्पिटल, रांची के कंसल्टेंट गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. अंतरिक्ष कुमार ने बताया कि हेपेटाइटिस अक्सर बिना किसी खास लक्षण के बढ़ता रहता है. ऐसे में कई लोगों को इसकी जानकारी तब मिलती है, जब लिवर काफी प्रभावित हो चुका होता है l  

    हेपेटाइटिस से लिवर को स्थायी नुकसान कैसे होता है?
    डॉ. अंतरिक्ष कुमार बताते हैं कि अगर हेपेटाइटिस बी या हेपेटाइटिस सी लंबे समय तक बना रहे, तो लिवर में लगातार सूजन रहती है. धीरे-धीरे स्वस्थ लिवर की जगह दागदार ऊतक (स्कार टिश्यू) बनने लगते हैं. इसे फाइब्रोसिस कहा जाता है. अगर यह समस्या और बढ़ जाए, तो यह सिरोसिस में बदल सकती है. इस स्थिति में लिवर ठीक से काम नहीं कर पाता और हुए नुकसान को पूरी तरह ठीक करना संभव नहीं होता. डॉक्टर के अनुसार, क्रॉनिक हेपेटाइटिस बी या सी के मरीजों में मोटापा, फैटी लिवर और नियमित शराब का सेवन लिवर को होने वाले नुकसान की रफ्तार और बढ़ा सकता है l  

    किन लोगों को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है?
    प्रभात खबर से बातचीत में डॉ. अंतरिक्ष कुमार ने बताया कि क्रॉनिक हेपेटाइटिस बी या सी से पीड़ित लोगों, नियमित शराब पीने वालों, फैटी लिवर, मोटापे या डायबिटीज के मरीजों और जिनके परिवार में लिवर की बीमारी का इतिहास रहा हो, उन्हें खास सावधानी बरतनी चाहिए. समय पर इलाज न मिलने पर इनमें गंभीर लिवर क्षति का खतरा अधिक होता है l

    इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें
        आंखों या त्वचा का पीला पड़ना (पीलिया)
        लगातार थकान या कमजोरी
        पेट या पैरों में सूजन
        भूख कम लगना और बिना किसी कारण वजन घटना
        मामूली चोट लगने पर भी आसानी से खून बहना या नीले निशान पड़ना

    क्या इससे बचाव संभव है?
    डॉ. अंतरिक्ष कुमार के मुताबिक, समय पर जांच ही सबसे बड़ा बचाव है. साधारण ब्लड टेस्ट से हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी का पता लगाया जा सकता है. इससे लिवर को स्थायी नुकसान पहुंचने से पहले इलाज शुरू किया जा सकता है l  

    उन्होंने बताया कि हेपेटाइटिस बी से वैक्सीनेशन के जरिए बचाव किया जा सकता है. वहीं, हेपेटाइटिस सी का इलाज आज उपलब्ध एंटीवायरल दवाओं से अधिकांश मरीजों में पूरी तरह संभव है. नियमित फॉलो-अप, जरूरत पड़ने पर समय पर इलाज, स्वस्थ वजन बनाए रखना और शराब से परहेज करने से सिरोसिस, लिवर फेलियर और लिवर कैंसर का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है l  

    विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनियाभर में करीब 25.4 करोड़ लोग क्रॉनिक हेपेटाइटिस बी और लगभग 5 करोड़ लोग क्रॉनिक हेपेटाइटिस सी के साथ जीवन जी रहे हैं. चूंकि ये संक्रमण कई वर्षों तक बिना किसी लक्षण के रह सकते हैं, इसलिए समय पर स्क्रीनिंग कराना बेहद जरूरी है l

    डॉक्टर की सलाह
     डॉ. अंतरिक्ष कुमार ने कहा, "अगर हेपेटाइटिस का समय रहते पता चल जाए, तो लिवर को होने वाले गंभीर नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है. लिवर में खुद को ठीक करने की क्षमता होती है, लेकिन जब फाइब्रोसिस बढ़कर सिरोसिस में बदल जाता है, तो हुए नुकसान को पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता. इसलिए पीलिया या पेट में सूजन जैसे लक्षण आने का इंतजार नहीं करना चाहिए. ये अक्सर बीमारी के गंभीर चरण के संकेत होते हैं. जोखिम वाले लोगों को नियमित स्क्रीनिंग करानी चाहिए, समय पर इलाज लेना चाहिए, डॉक्टर की सलाह के अनुसार फॉलो-अप कराना चाहिए और स्वस्थ जीवनशैली अपनानी चाहिए. इससे लिवर लंबे समय तक स्वस्थ रह सकता है और लिवर फेलियर व लिवर कैंसर जैसी गंभीर समस्याओं से बचाव संभव है."

  • मानसून में नीम खाने के फायदे, इम्यूनिटी से लेकर त्वचा तक रखेगा ध्यान

    मानसून में नीम खाने के फायदे, इम्यूनिटी से लेकर त्वचा तक रखेगा ध्यान

    बरसात का मौसम अपने साथ हरियाली तो लाता है, लेकिन यही मौसम बैक्टीरिया, वायरस और फंगस के तेजी से बढ़ने का भी समय होता है। मौसम बदलने के दौरान हमारे शरीर में दोषों (वात, कफ व पित्त) का स्तर ऊपर-नीचे होता रहता है, जिससे इम्यूनिटी कमजोर हो जाती है। आयुर्वेद के अनुसार, मानसून के मौसम में शरीर में पित्त दोष स्वाभाविक रूप से जमा होने लगता है और जठराग्नि (पाचन शक्ति) धीमी पड़ जाती है। ऐसे में डॉ. राजेश बयारी (एमडी, चित्रकूट आयुर्वेद चिकित्सालय, कुंडपुरा) बताते हैं कि आप इस मौसम में नीम का सेवन कर सकते हैं। नीम का स्वाद कड़वा होता है और इसकी तासीर ठंडी होती है; इसलिए आयुर्वेद में इसे रक्तशोधक और बढ़े हुए पित्त व कफ दोषों को संतुलित करने के लिए एक रामबाण उपाय माना जाता है।

    मौसम बदलने पर नीम खाने के बारे में आयुर्वेद क्या कहता है?
    आयुर्वेद के अनुसार ऋतु परिवर्तन के दौरान शरीर में दोषों का संतुलन बिगड़ सकता है। मानसून में विशेष रूप से पाचन शक्ति (अग्नि) कमजोर होने लगती है। साथ ही, पित्त दोष प्रभावित हो सकते हैं। इस समय नीम जैसी कड़वी औषधियों का सीमित मात्रा में सेवन शरीर को संतुलित रखने में सहायक माना जाता है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में नीम को रक्तशोधक, कृमिनाशक (पेट के कीड़े मारने वाले), त्वचा हितकारी और रोग प्रतिरोधक क्षमता को सहयोग देने वाला पौधा बताया गया है। हालांकि इसका सेवन व्यक्ति की प्रकृति और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार होना चाहिए।

    आधुनिक रिसर्च नीम के बायोएक्टिव कंपाउंड्स के बारे में क्या कहती है?
    वहीं दूसरी ओर, आधुनिक मेडिकल रिसर्च के अनुसार नीम में बायोएक्टिव कंपाउंड्स, जैसे कि निम्बिडिन, अजादिराक्टिन और निम्बिन पाए जाते हैं। इन कंपाउंड्स में बेहतरीन एंटीमाइक्रोबियल और एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं, जो शरीर को मानसून के दौरान होने वाले इन्फेक्शन से लड़ने में मदद करते हैं।

    मानसून में नीम खाने के क्या फायदे होते हैं?
    इम्यूनिटी बढ़ाए
    बारिश के मौसम में होने वाले मौसमी संक्रामक बुखार से लड़ने के लिए नीम व्हाइट ब्लड सेल्स (WBCs) को सक्रिय करता है और पूरे इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है। नीम में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और बायोएक्टिव कंपाउंड्स शरीर की प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रणाली के कार्य को सहयोग दे सकते हैं।

    त्वचा की समस्याओं से राहत
    इस मौसम में हवा में नमी ज्यादा होने के कारण मुंहासे, एलर्जी, खुजली और त्वचा की अन्य बीमारियां बढ़ जाती हैं। नीम खून को साफ करता है और त्वचा को अंदर से प्राकृतिक चमक देता है। यही वजह है कि स्किन की परेशानियों में आयुर्वेद में नीम का पाउडर लेने की सलाह दी जाती है।

    हानिकारक बैक्टीरिया और फंगस को रोके
    मानसून के दिनों में उमस के कारण फंगस और बैक्टीरिया पनपने का जोखिम अधिक होता है। लेकिन, जो लोग बरसात में नीम का सेवन करते हैं उनको सूजन और फंगल इंफेक्शन का खतरा कम होता है। साथ ही, नीम में मौजूद एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-माइक्रोबियल गुण फंगल और बैक्टीरियल संक्रमण को रोकने में भी मदद करते हैं।

    पाचन तंत्र में करें सुधार
    मानसून में दूषित भोजन और पानी के कारण पेट संबंधी परेशानियां बढ़ सकती हैं। आयुर्वेद के अनुसार नीम का सीमित सेवन पाचन शक्ति को सहयोग देने और कृमियों (आंतों के कीड़े) के जोखिम को कम करने में उपयोगी मानी गई है। यही वजह है कि पहले के समय में पेट से जुड़ी समस्या में नीम का सेवन किया जाता था।
    मानसून में नीम का सेवन किस तरह से करें?
    मानसून के दौरान, आप रोज सुबह खाली पेट नीम की तीन से चार कोमल पत्तियां चबा सकते हैं या सीमित मात्रा में इसका रस पी सकते हैं। यह आपको मौसमी बीमारियों से बचाने के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच का काम करता है।

    आयुर्वेद के अनुसार मानसून में नीम का सीमित और सही तरीके से सेवन करने से मौसम में हुए बदलाव का असर शरीर पर कम पड़ता है। आधुनिक वैज्ञानिक शोध भी इसके एंटीऑक्सीडेंट, एंटीबैक्टीरियल और एंटीफंगल गुणों की पुष्टि करते हैं, लेकिन अधिकांश साक्ष्य अभी प्रयोगशाला और प्रारंभिक अध्ययनों पर आधारित हैं। इसलिए नीम को किसी बीमारी के इलाज के रूप में नहीं, बल्कि संतुलित आहार और स्वस्थ जीवनशैली के पूरक के रूप में ही अपनाना चाहिए।

  • भारतीय थाली में क्यों नहीं पूरा होता 60 ग्राम प्रोटीन का डेली टारगेट, जानिए कारण

    भारतीय थाली में क्यों नहीं पूरा होता 60 ग्राम प्रोटीन का डेली टारगेट, जानिए कारण

    हम भारतीय अपने खाने-पीने के शौकीन मिजाज और थाली के रंगों के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं. दाल, चावल, रोटी, सब्जी, अचार और रायता हमारी पारंपरिक थाली देखने में जितनी भरपूर लगती है, उतनी ही स्वादिष्ट भी होती है. लेकिन जब बात सेहत और खासकर प्रोटीन की आती है, तो हमारी यही ट्रेडिशनल थाली रोज की जरूरतों को पूरा करने में पीछे छूट जाती है. ICMR के अनुसार, एक एडल्ट को रोजाना लगभग 60 ग्राम प्रोटीन (Daily Protein Target) की जरूरत होती है. आइए जानते हैं कि आखिर हमारी रोज की थाली इस टारगेट को हासिल करने में क्यों चूक जाती है. 

    कार्बोहाइड्रेट की बहुत ज्यादा मात्रा
    हमारी थाली का सबसे बड़ा हिस्सा रोटी, चावल, पोहा या आलू जैसी चीजों से घिरा होता है. ये सभी चीजें कार्बोहाइड्रेट्स का मुख्य स्रोत हैं, जो हमें तुरंत एनर्जी तो देती हैं, लेकिन इनमें प्रोटीन की मात्रा बहुत कम होती है. अमूमन भारतीय घरों में थाली का 70 से 80% हिस्सा सिर्फ कार्ब्स से भरा होता है, जिससे प्रोटीन के लिए जगह ही नहीं बचती.
     
    Daily Protein Target: दाल-रोटी और चावल को प्रोटीन का इकलौता जरिया मानना 
    हमारे यहां माना जाता है कि रोज दाल-चावल खा लिया, तो प्रोटीन की कमी नहीं होगी. लेकिन ऐसा नहीं है. दालों में लगभग 20% प्रोटीन होता है, और इसके साथ भारी मात्रा में कार्बोहाइड्रेट भी होता है. अगर कोई सिर्फ दाल से अपने दिनभर का 60 ग्राम प्रोटीन का टारगेट पूरा करना चाहे, तो उसे दिन में 7 से 8 कटोरी दाल पीनी पड़ेगी, जो हजम करना नामुमकिन है. इसके अलावा, हमारे प्रोटीन का 60% हिस्सा गेहूं और चावल से आता है, जिसे हमारा शरीर पूरी तरह और आसानी से सोख नहीं पाता.

    वेजिटेरियन खाने में ‘कम्पलीट प्रोटीन’ की कमी
    भारत की एक बहुत बड़ी आबादी शुद्ध शाकाहारी है. चिकन, मटन, मछली और अंडों में ‘कम्पलीट प्रोटीन’ होता है, जो शरीर आसानी से सोख लेता है. इसके विपरीत, शाकाहारी स्रोतों जैसे अनाज और बीन्स को शरीर पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं कर पाता. जब तक आप अनाज और दालों को सही रैशीओ में मिलाकर (जैसे खिचड़ी या दाल-चावल) न खाएं, तब तक शरीर को सही प्रोटीन (Daily Protein Target) नहीं मिलता. 

    पकाने का ट्रेडिशनल तरीका
    भारतीय खाना बनाने का तरीका ऐसा है जिसमें मसालों को खूब भूनना और सब्जियों व दालों को देर तक उबालना शामिल है. बहुत ज्यादा तापमान पर बार-बार खाना पकाने और गर्म करने से भोजन में मौजूद प्रोटीन और अन्य जरूरी पोषक तत्वों (Nutrients) की क्वालिटी कम हो जाती है. 

    स्नैक्स में अनहेल्दी चीजें चुनना
    हम सुबह और रात के खाने पर तो ध्यान दे देते हैं, लेकिन शाम की नाश्ते में हमारा झुकाव समोसा, कचौरी, बिस्कुट, नमकीन या चाय पर जाकर टिक जाता है. इन स्नैक्स में सिर्फ मैदा, तेल और चीनी होती है. अगर इसकी जगह मुट्ठी भर मूंगफली, मखाना, भुना चना या उबला अंडा शामिल किया जाए, तो प्रोटीन का टारगेट आसानी से पूरा हो सकता है. 

    अपनी थाली को प्रोटीन से भरपूर कैसे बनाएं?
    रोजाना 60 ग्राम प्रोटीन (Daily Protein Target) पूरा करना इतना भी मुश्किल नहीं है. बस अपनी थाली में छोटे-छोटे बदलाव करें:
        पनीर और टोफू: अपने दोपहर या रात के खाने में 50-100 ग्राम पनीर या टोफू शामिल करें. 

        सोयाबीन: सोया चंक्स प्रोटीन का पावरहाउस हैं. इनकी सब्जी या पुलाव बनाकर खाएं. 

        सत्तू और छाछ: गर्मियों में सत्तू का शरबत और खाने के साथ गाढ़ी छाछ या दही का इस्तेमाल बढ़ाएं. 

        अंडे और लीन मीट: अगर आप नॉन-वेजिटेरियन हैं, तो उबले अंडे और ग्रिल्ड चिकन को अपनी डाइट का हिस्सा बनाएं. 

     

  • उबले अंडे दोबारा गर्म करना कितना सुरक्षित? जानिए सही तरीका और सावधानियां

    उबले अंडे दोबारा गर्म करना कितना सुरक्षित? जानिए सही तरीका और सावधानियां

    अक्सर लोग सुबह हेल्दी नाश्ता करने के कारण या फिर सुबह की जल्दबाजी में अंडे खाना पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें पकाना काफी आसान है. लेकिन कई लोग बार-बार पकाने या उबालकर रखने के चक्कर में एक साथ अंडे उबाल लेते हैं और उन्हें फ्रिज में रख देते हैं. बाद में जब उन्हें खाना होता है तो वे फ्रिज से निकालकर अंडों को दोबारा गर्म या उबालने लगते हैं. वैसे तो बचे हुए खाने को दोबारा गर्म करना एक नॉर्मल बात है लेकिन अंडों के मामले में थोड़ी सावधानी बरतना बहुत जरूरी है. ऐसा करना कितना सही है? इस बारे में सभी को जानना काफी जरूरी है क्योंकि गलत तरीका आपकी सेहत के लिए भी बेहद खतरनाक साबित हो सकता है.

    क्या अंडे दोबारा गर्म करना सेफ है?
    Healthline के अनुसार, पहले से उबले या पके हुए अंडों को दोबारा गर्म करना पूरी तरह से सुरक्षित है बस उन्हें सही तरीके से स्टोर किया गया हो. उबले हुए अंडों को पकाने के बाद 2 घंटे के अंदर फ्रिज में रख देना चाहिए.

    दोबारा गर्म करते समय अंडे का तापमान कम से कम 74 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचना चाहिए ताकि उसमें मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया जैसे साल्मोनेला पूरी तरह खत्म हो सकें. यदि अंडा लंबे समय तक कमरे के तापमान पर बाहर रखा रहा हो तो उसे दोबारा गर्म करके खाने की भूल बिल्कुल न करें.

    माइक्रोवेव में भूलकर भी न करें गर्म
    उबले हुए अंडे को दोबारा गर्म करने का सबसे आसान तरीका लोगों को माइक्रोवेव लगता है जो कि सबसे बड़ी गलती है. ब्रिटिश फूड सेफ्टी एक्सपर्ट वेबसाइट Commodious के मुताबिक, साबुत उबले अंडे को माइक्रोवेव में कभी भी गर्म नहीं करना चाहिए.

    दरअसल, माइक्रोवेव की वेव्स अंडे के अंदर मौजूद पानी के मॉलिक्यूल्स को तेजी से भाप में बदल देती हैं. चूंकि अंडे का छिलका या उसका सफेद हिस्सा इस भाप को बाहर नहीं निकलने देता इसलिए अंडे के अंदर बहुत ज्यादा प्रेशर बन जाता है. जैसे ही आप इसे खाने के लिए काटते हैं या मुंह में लेते हैं, यह बम की तरह फट सकता है जिससे चेहरा जलने का गंभीर खतरा रहता है.

    अंडा दोबारा गर्म करने का सही तरीका क्या है?
    अगर आप उबले हुए अंडे को दोबारा गर्म और फ्रेश करना चाहते हैं तो इसके लिए सबसे सुरक्षित तरीका है उबलते पानी का इस्तेमाल करना. इसके लिए सबसे पहले एक गहरे बर्तन में पानी उबाल लें और गैस बंद कर दें.

    अब उबले हुए अंडों (बिना छिलका उतारे) को उस गर्म पानी में डाल दें और बर्तन को 10 मिनट के लिए ढककर छोड़ दें. इस तरीके से अंडे के अंदर की नमी बरकरार रहती है, उसका टेक्सचर रबर जैसा नहीं होता और वह बिना किसी ब्लास्ट के रिस्क के अंदर तक अच्छी तरह गर्म हो जाता है.

  • कच्चा अंडा पीना कितना सुरक्षित है? जानें साइंस और हेल्थ एक्सपर्ट्स की राय

    कच्चा अंडा पीना कितना सुरक्षित है? जानें साइंस और हेल्थ एक्सपर्ट्स की राय

    बॉडी बिल्डिंग या फिटनेस फ्रीक लोग सुबह-सुबह दूध में कच्चा अंडा मिलाकर पी जाते हैं या फिर इसे सीधे ही खा लेते हैं. जिम जाने वाले युवाओं के बीच यह काफी पॉपुलर है क्योंकि उनका मानना होता है कि पकाने से अंडे के न्यूट्रिएंट्स कम हो जाते हैं. ऐसे कई लोग हैं जो इसे खाना सही मानते हैं और कई लोग नहीं. ऐसे में साइंस इस बारे में क्या कहता है कि कच्चा अंडा खाना फायदेमंद है भी या नहीं इस बारे में जान लीजिए.

    क्या कच्चा अंडा पचाना आसान है?
    Healthline का कहना है, कई लोग मानते हैं कि कच्चे अंडे से प्रोटीन अधिक मिलता है लेकिन साइंस इसके विपरीत है. दरअसल, इंसानी शरीर पके हुए अंडे के प्रोटीन को 90 प्रतिशत तक आसानी से एब्जॉर्ब कर लेता है जबकि कच्चे अंडे का केवल 50 प्रतिशत प्रोटीन ही शरीर पचा पाता है.

    वहीं कच्चे अंडे के सफेद हिस्से में एविडिन (Avidin) नाम का प्रोटीन होता है जो शरीर में बायोटिन (विटामिन B7) के एब्जॉर्प्शन को रोक देता है जिससे इसकी कमी हो सकती है.

    साल्मोनेला इंफेक्शन का सबसे बड़ा खतरा
    कच्चा अंडा खाने का सबसे खतरनाक पहलू है उसमें मौजूद बैक्टीरिया. अमेरिकन हेल्थ आर्गेनाइजेशन CDC का कहना है, कच्चे या कम पके हुए अंडों में साल्मोनेला नाम का बैक्टीरिया होने का बहुत ज्यादा चांस रहता है.

    यह बैक्टीरिया मुर्गी के अंडे देने के दौरान या उसके अंदरूनी हिस्से में पहले से मौजूद हो सकता है. अगर यह शरीर में चला जाए तो फूड पॉइजनिंग हो सकती है जिससे पेट में तेज दर्द, डायरिया, उल्टी, बुखार और डिहाइड्रेशन जैसी गंभीर समस्याएं शुरू हो जाती हैं.

    ये लोग भूलकर भी नहीं खाएं कच्चा अंडा
    कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों के लिए कच्चा अंडा एक मेडिकल इमरजेंसी खड़ी कर सकता है. हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार, प्रेग्नेंट महिलाओं, छोटे बच्चों, बुजुर्गों और किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों को कच्चा अंडा या इससे बनी चीजें (जैसे होममेड मेयोनीज) खाने से पूरी तरह बचना चाहिए. साल्मोनेला बैक्टीरिया का असर इन पर बहुत तेजी से होता है, जो कभी-कभी जानलेवा भी साबित हो सकता है.

    सेफ रहने के लिए क्या करें?
    अगर आप अंडे के सारे न्यूट्रिएंट्स सुरक्षित तरीके से पाना चाहते हैं, तो उसे उबालकर या ऑमलेट बनाकर ही खाएं. अंडे को तब तक पकाएं जब तक कि उसका पीला और सफेद हिस्सा पूरी तरह सॉलिड न हो जाए. हीट के संपर्क में आते ही साल्मोनेला बैक्टीरिया मर जाता है और अंडे का प्रोटीन भी आपकी बॉडी के लिए आसानी से एब्जॉर्ब करने लायक बन जाता है.

  • सुबह की ये 5 गलत आदतें चुपचाप कमजोर कर रही हैं आपका दिल

    सुबह की ये 5 गलत आदतें चुपचाप कमजोर कर रही हैं आपका दिल

    आज की भागदौड़ भरी इस जिंदगी में अगर हम किसी चीज़ को सबसे ज़्यादा नजरअंदाज कर रहे हैं, तो वह है हमारी सेहत. खासकर जब बात हार्ट हेल्थ का ख्याल रखने की आती है, तो हम सबसे ज़्यादा इसे ही अनदेखा करने लगे हैं. आज का यह आर्टिकल उन सभी लोगों के लिए है, जो अपनी हार्ट हेल्थ का बेहतर तरीके से ख्याल रखना चाहते हैं. आज हम आपको सुबह की कुछ ऐसी आदतों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्हें अगर आप समय रहते सुधार नहीं लेते हैं, तो इसका आपकी हार्ट हेल्थ पर काफी बुरा असर पड़ सकता है. तो चलिए जानते हैं सुबह की ऐसी 5 गलत आदतों के बारे में, जो धीरे-धीरे आपके दिल को कमजोर करने का काम कर रही हैं और आपको इस बात का अंदाजा भी नहीं लग रहा है.

    सोकर उठते ही अचानक से बिस्तर से उठ जाना
    सुबह जैसे ही हमारी आंख खुलती है, हमारा शरीर एकदम रेस्ट मोड से जागने की स्थिति में आ रहा होता है. ऐसे में कई लोग क्या करते हैं कि अलार्म बजते ही झटके से बिस्तर से उठकर खड़े हो जाते हैं. सच मानिए, यह आदत आपके दिल के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकती है. अचानक ऐसे उठने से ब्लड प्रेशर एकदम से बढ़ जाता है, जिससे दिल पर अचानक बहुत ज्यादा प्रेशर पड़ता है. सबसे सही तरीका यह है कि जब भी सुबह आपकी आंख खुले, तो तुरंत हड़बड़ाकर न उठें. कम से कम दो मिनट आराम से बिस्तर पर ही बैठे रहें, शरीर को थोड़ा स्ट्रेच करें और उसके बाद धीरे से उठें. इससे आपके शरीर का ब्लड सर्कुलेशन एकदम नॉर्मल रहता है और दिल पर कोई फालतू का लोड नहीं पड़ता.

    खाली पेट चाय या कॉफी पीना
    भारत में ज्यादातर लोगों के दिन की शुरुआत बेड-टी यानी बिस्तर पर चाय या कॉफी पीने से होती है. लेकिन खाली पेट कैफीन का सेवन करना आपकी हार्ट हेल्थ के लिए बिल्कुल ठीक नहीं है. खाली पेट चाय या कॉफी पीने से शरीर में एसिडिटी बढ़ती है और हार्ट रेट तेज हो सकती है. इसके अलावा, आपकी यह आदत आपके ब्लड प्रेशर को भी अचानक से बढ़ा सकता है. सुबह उठकर सबसे पहले एक या दो ग्लास गुनगुना पानी पीना चाहिए ताकि शरीर हाइड्रेट हो सके, उसके बाद ही कुछ खाना या पीना चाहिए.

    हैवी और अनहेल्दी ब्रेकफास्ट करना या उसे स्किप कर देना
    ब्रेकफास्ट हमारे पूरे दिन का सबसे जरूरी डाइट होता है. कुछ लोग समय की कमी के कारण ब्रेकफास्ट स्किप कर देते हैं, तो कुछ लोग सुबह-सुबह ही बहुत ज्यादा तला-भुना, कचौड़ी, समोसा या पैक्ड चीजें खा लेते हैं. ये दोनों ही आदतें आपकी हार्ट हेल्थ के लिए काफी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकते हैं. ब्रेकफास्ट स्किप करने से शरीर का मेटाबॉलिज्म धीमा होता है जिससे मोटापा बढ़ने लगता है. इसकी वजह से दिल की बीमारी का खतरा और भी ज्यादा बढ़ जाता है. वहीं, दूसरी ओर, सुबह-सुबह ज्यादा तेल और फैट वाली चीजें खाने से शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है, जिससे दिल की नसें ब्लॉक हो सकती हैं.

    हद से ज्यादा स्ट्रेस लेना या गुस्सा करना
    सुबह उठते ही ऑफिस की टेंशन, काम का प्रेशर या किसी बात पर गुस्सा करना आपकी हार्ट हेल्थ को बुरी तरह से बिगाड़ सकता है. जब आप सुबह-सुबह स्ट्रेस लेते हैं, तो शरीर में कोर्टिसोल और एड्रेनालाईन जैसे स्ट्रेस हॉर्मोन्स रिलीज होते हैं. ये हॉर्मोन्स दिल की धड़कन और ब्लड प्रेशर को बढ़ा देते हैं. अगर यह रोज की आदत बन जाए, तो समय के साथ आपका दिल कमजोर होने लगता है. अगर आप नहीं चाहते हैं कि ऐसा हो, तो सुबह के समय खुद को शांत रखने की कोशिश करें. इसके लिए आप थोड़ी देर मेडिटेशन या डीप ब्रीदिंग की प्रैक्टिस कर सकते हैं.

    फिजिकल एक्टिविटी बिल्कुल भी न करना
    आपको शायद यह जानकर हैरानी हो लेकिन, रात भर सोने के बाद सुबह हमारे शरीर की नसें और मसल्स थोड़ी टाइट हो जाती हैं. अगर आप सुबह उठकर सीधे कुर्सी या सोफे पर बैठ जाते हैं और कोई फिजिकल मूवमेंट नहीं करते, तो यह आपके दिल के लिए बिलकुल भी अच्छा नहीं है. सुबह के समय कम से कम 20 से 30 मिनट की लाइट वॉकिंग, योगा या स्ट्रेचिंग करना बहुत जरूरी है. फिजिकल एक्टिविटी न करने से शरीर में ब्लड सर्कुलेशन स्लो हो जाता है, जिसकी वजह से दिल को काम करने में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है.

  • कॉपर बॉटल में लेमन और गर्म पानी क्यों हो सकता है खतरनाक?

    कॉपर बॉटल में लेमन और गर्म पानी क्यों हो सकता है खतरनाक?

    कॉपर बॉटल में पानी पीने का ट्रेंड पिछले कुछ सालों में बड़े स्तर पर फॉलो हो रहा है. आयुर्वेद में 'ताम्र जल' को सेहतमंद बताया गया है, लेकिन आज लोग इसे गलत तरीके से इस्तेमाल कर रहे हैं. कॉपर बॉटल में लेमन वॉटर, जीरा वॉटर या गर्म पानी पी रहे हैं. कई लोग तो इसमें ये चीजें घंटों तक भरे रखते हैं तो कुछ लोग रात भर के लिए. लेकिन ऐसा करना सेहत के लिए काफी खतरनाक हो सकता है. यदि आप भी उन लोगों में से हैं तो ये आर्टिकल जरूर पढ़ें.

    लेमन वॉटर और जीरा वॉटर क्यों खतरनाक?
    लेमन जूस और जीरा में एसिडिकेटी होती है जो कॉपर के साथ क्रिया करके टॉक्सिक कॉपर सॉल्स बनाती है. ये सॉल्स पानी में घुलकर सेहत को नुकसान पहुंचाते हैं. डॉक्टरों और न्यूट्रिशनिस्ट्स का कहना है कि कॉपर बॉटल में सिर्फ सादा पानी स्टोर करना चाहिए लेकिन कोई भी एसिडिक लिक्विड नहीं डालना चाहिए. एसिडिक लिक्विड कॉपर लेचिंग बढ़ाते हैं यानी कॉपर ज्यादा मात्रा में पानी में घुल जाता है.

    गर्म पानी भी कॉपर बॉटल में नहीं डालें
    गर्म या बूइंग पानी कॉपर बॉटल में डालने पर कॉपर लेचिंग बढ़ जाती है. इससे कॉपर टॉक्सिसिटी का रिस्क बढ़ता है. डॉक्टर्स का कहना है कि गर्म पानी कॉपर बॉटल में डालना सेहत के लिए बहुत खतरनाक हो सकता है. गर्म पानी में कॉपर तेजी से घुलता है और पानी में टॉक्सिक लेवल बढ़ जाता है.

    हरे निशानों का मतलब क्या है?
    कॉपर बॉटल में दिख रहे हरे निशान कॉपर के ऑक्सीडेशन का संकेत हैं. ये कॉपर कार्बोनेट होते हैं, जो बाहरी पतनी नहीं टॉक्सिक नहीं हैं, लेकिन अगर ये बॉटल के इनसाइड हैं तो उन्हें अच्छी तरह क्लीन करना जरूरी है. डॉक्टर्स का कहना है कि ग्रीन लेयर ऑक्सीडेशन का रिजल्ट है और बॉटल को अच्छी तरह क्लीन करना जरूरी है.

    कॉपर टॉक्सिसिटी के सिम्प्टम
    कॉपर टॉक्सिसिटी के सिम्प्टम नौजिया, वॉमिटिंग, स्टमक क्रम्प्स, डायरिया और दस्त हैं. बच्चों में यह रिस्क ज्यादा है क्योंकि उनके शरीर का साइज छोटा होता है.

    कैसे करें सही तरीके से कॉपर बॉटल इस्तेमाल

    •     बॉटल में सिर्फ सादा पानी स्टोर करें
    •     पानी को 6-12 घंटे कॉपर बॉटल में रखें
    •     लेमन, जीरा, विनेगर नहीं डालें
    •     गर्म पानी नहीं डालें
    •     बॉटल को अच्छी तरह क्लीन करें

     

  • प्याज की बदबू से पाएं छुटकारा, सेब से लेकर नींबू तक ये तरीके आएंगे काम

    प्याज की बदबू से पाएं छुटकारा, सेब से लेकर नींबू तक ये तरीके आएंगे काम

     खाने में प्याज का इस्तेमाल स्वाद को दोगुना कर देता है. दूसरे मौसमों की अपेक्षा गर्मी के मौसम में प्याज की खपत अधिक होती है क्योंकि ये नेचुरल तरीके से शरीर को अंदर से ठंडा करने में मदद करती है. लेकिन प्याज खाने या काटने की सबसे बड़ी समस्या ये है कि उसमें काफी तेज बदबू आती है. दरअसल, प्याज काटने और खाने के बाद उसमें मौजूद सल्फर कंपाउंड्स मुंह के जरिए फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं, जिससे सांसों से लंबे समय तक स्मेल आती रहती है. हाथों से प्याज काटते वक्त यह स्मेल स्किन में समा जाती है जो साधारण साबुन से नहीं जाती. इसे दूर करने के लिए कुछ साइंटिफिक और घरेलू तरीके बेहद कारगर हैं.  

    सेब का कमाल
    हेल्थलाइन के मुताबिक, प्याज खाने के बाद अगर आप एक सेब खाते हैं तो यह काफी मददगार होता है. सेब में मौजूद नेचुरल एंजाइम्स प्याज के सल्फर कंपाउंड्स को ब्रेक करने का काम करते हैं. यदि आप प्याज खाने की थोड़ी देर बाद सेब जैसे फल का सेवन करते हैं तो सांसों की दुर्गंध को कम करने में मदद मिल सकती है.

    नींबू और साइट्रस फ्रूट्स
    केयर फ्री डेंटल के मुताबिक, हाथों की बदबू दूर करने के लिए नींबू का रस एक बेहतरीन ऑपशन है. नींबू में मौजूद सिट्रिक एसिड न केवल बैक्टीरिया को मारता है बल्कि प्याज की स्मेल को भी खत्म करता है. नींबू पानी से कुल्ला करना या हाथों पर इसे रगड़ना बदबू को तुरंत कम कर सकता है.

    ग्रीन टी का सेवन
    Vinmec Health की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रीन टी में पॉलीफेनोल्स नाम के पावरफुल एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं. ये कंपाउंड प्याज में मिलने वाले गंध पैदा करने वाले कंपाउंड्स को खत्म करने में मदद करते हैं. इसलिए खाने के बाद 1 कप गर्म ग्रीन टी पीने से मुंह की ताजगी बनी रहती है और बैक्टीरिया का असर कम होता है.

    स्टेनलेस स्टील और नमक
    क्या आप जानते हैं कि हाथों को स्टेनलेस स्टील पर रगड़ने से प्याज की गंध गायब हो जाती है. इसका कारण है कि स्टील के मॉलिक्यूल्स प्याज के सल्फर के साथ बाइंड होकर उसे स्किन से हटा देते हैं. साथ ही हाथों पर थोड़ा नमक रगड़कर धोने से भी स्मेल काफी हद तक कम हो जाती है.

    बेकिंग सोडा और विनेगर
    मुंह की स्मेल के लिए एप्पल साइडर विनेगर या बेकिंग सोडा का पानी से कुल्ला करना एक अच्छा उपाय है. यह मुंह के pH लेवल को बैलेंस करता है जिससे बैक्टीरिया नहीं पनपते. WebMD के मुताबिक, बेकिंग सोडा ओरल हाइजीन बनाए रखने और बदबू को कंट्रोल करने में काफी प्रभावी हो सकते हैं.

  • नई स्टडी में खुलास,6–7 घंटे से कम या ज्यादा नींद लेने से बढ़ती है शरीर की उम्र तेजी से

    नई स्टडी में खुलास,6–7 घंटे से कम या ज्यादा नींद लेने से बढ़ती है शरीर की उम्र तेजी से

     रात में बहुत कम या जरूरत से ज्यादा सोना सिर्फ थकान ही नहीं बढ़ाता, बल्कि ये बॉडी के कई जरूरी अंगों की उम्र भी तेजी से बढ़ा सकता है. नेचर जर्नल में 13 मई को पब्लिश हुई एक नई स्टडी में दावा किया गया है कि कम और ज्यादा दोनों तरह की नींद ब्रेन, हार्ट, फेफड़ों और इम्यून सिस्टम पर बुरा असर डाल सकती है. रिसर्च के मुताबिक सबसे कम खतरा उन लोगों में देखा गया जो रोज करीब 6.4 से 7.8 घंटे की नींद लेते हैं.

    नींद क्यों है हमारे लिए जरूरी?
    इस स्टडी को कोलंबिया यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर ऑफ रेडियोलॉजी जुनहाओ वेन ने लीड किया. उन्होंने कहा कि हमारी रिसर्च दिखाती है कि बहुत कम और बहुत ज्यादा दोनों तरह की नींद शरीर के लगभग हर अंग की उम्र बढ़ने की रफ्तार तेज कर सकती है. इससे ये साफ होता है कि अच्छी नींद ब्रेन और पूरी बॉडी को हेल्दी रखने में बेहद जरूरी है.

    रिसर्च में क्या पता लगाया गया?
    रिसर्चर्स ने एजिंग को मापने के लिए मशीन लर्निंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया. टीम ने 17 अलग-अलग ऑर्गन सिस्टम्स के लिए 23 बायोलॉजिकल क्लॉक्स तैयार किए. इन क्लॉक्स में मेडिकल स्कैन, ब्लड टेस्ट और बॉडी प्रोटीन से जुड़ी जानकारी शामिल की गई, जिससे पता लगाया गया कि किसी इंसान के अंग उसकी असली उम्र के मुकाबले कितनी तेजी से बूढ़े हो रहे हैं.

    किन लोगों की उम्र तेजी से बढ़ती है?
    इस स्टडी में यूके बायोबैंक के करीब पांच लाख लोगों के हेल्थ डेटा का एनालिसिस किया गया. रिसर्च में एक यू-शेप पैटर्न सामने आया. यानी जो लोग रोज 6 घंटे से कम सोते थे और जो 8 घंटे से ज्यादा सोते थे, दोनों में एजिंग की स्पीड ज्यादा पाई गई. सबसे हेल्दी स्लीप रेंज करीब 7 घंटे मानी गई. कम नींद लेने वाले लोगों में डिप्रेशन, एंग्जायटी, मोटापा, टाइप 2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हार्ट डिजीज का खतरा ज्यादा देखा गया. वहीं कम और ज्यादा दोनों तरह की नींद फेफड़ों की बीमारियों जैसे क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज और अस्थमा से भी जुड़ी मिली. इसके अलावा एसिड रिफ्लक्स जैसी पेट की समस्याओं का रिस्क भी बढ़ता पाया गया.

    कम नींद लेने के क्या होते हैं नुकसान?
    जुनहाओ वेन के मुताबिक नींद सिर्फ दिमाग से जुड़ी चीज नहीं है, बल्कि इसका असर पूरी बॉडी पर पड़ता है. उन्होंने कहा कि स्लीप ड्यूरेशन हमारी पूरी फिजियोलॉजी से जुड़ी होती है और इसका असर शरीर के लगभग हर हिस्से पर दिखाई देता है. रिसर्च टीम ने बुजुर्ग लोगों में डिप्रेशन पर भी असर देखा. एनालिसिस में सामने आया कि कम नींद सीधे तौर पर डिप्रेशन को बढ़ा सकती है, जबकि ज्यादा नींद ब्रेन और बॉडी फैट में होने वाले बदलावों के जरिए इसका असर डाल सकती है. रिसर्चर्स का मानना है कि कम और ज्यादा सोने वाले लोगों के लिए अलग-अलग तरह की हेल्थ केयर की जरूरत पड़ सकती है.

    हालांकि स्टडी ये साबित नहीं करती कि सिर्फ नींद ही तेजी से बूढ़ा होने की वजह है, लेकिन रिसर्चर्स का कहना है कि सही स्लीप हैबिट्स बढ़ती उम्र में हेल्थ को बेहतर बनाए रखने का अहम हिस्सा हो सकती हैं.

  • बाजार में मिलने वाले घी की शुद्धता पर बढ़ी चिंता, मिलावट से सेहत को खतरा

    बाजार में मिलने वाले घी की शुद्धता पर बढ़ी चिंता, मिलावट से सेहत को खतरा

     भारत में घी सिर्फ एक खाद्य पदार्थ नहीं बल्कि रोजमर्रा की डाइट का अहम हिस्सा है. लेकिन हाल में आई कुछ रिपोर्ट्स में कुछ देसी घी ब्रांड्स में मिलावट सामने आने के बाद लोगों की चिंता बढ़ गई है. ऐसे में अक्सर मन में सवाल आता है कि बाजार में मिलने वाला घी कितना शुद्ध है और इसे पहचानने का सही तरीका क्या है? एक्सपर्ट्स के अनुसार, कुछ ऐसे घरेलू तरीके भी हैं जिससे आप असली और नकली घी में फर्क कर सकते हैं. तो आइए उन तरीकों के बारे में जान लीजिए.

    शुद्ध घी की पहचान क्यों जरूरी?
    हेल्थलाइन के मुताबिक, मिलावटी या नकली घी में अक्सर वेजिटेबल ऑयल या सस्ते फैट मिलाए जाते हैं जो शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं. लंबे समय तक ऐसे घी का सेवन दिल और पाचन से जुड़ी समस्याएं बढ़ा सकता है. इसके अलावा शुद्ध घी में हेल्दी फैट के साथ-साथ जरूरी विटामिन भी होते हैं लेकिन मिलावट कर देने पर इनके फायदे कम हो जाते हैं और नुकसान बढ़ जाते हैं.

    स्मेल और स्वाद (Smell and Taste)
    असली घी की खुशबू हल्की और प्राकृतिक होती है जबकि मिलावटी घी में तेज या अजीब सी गंध आ सकती है. स्वाद भी शुद्ध घी का हल्का मीठा और स्मूद होता है. अगर घी का स्वाद कड़वा या अटपटा लगे तो उसमें मिलावट की संभावना हो सकती है.

    हाथ पर पिघल जाता है (It melts on the hand)
    एक्सपर्ट्स के मुताबिक, असली घी की कुछ बूंदें हथेली पर रखकर रगड़ें. शुद्ध घी शरीर की गर्मी से तुरंत पिघल जाता है जबकि मिलावटी घी को पिघलने में समय लगता है या फिर वह चिपचिपा महसूस होता है.

    आयोडीन टेस्ट (Iodine Test)
    अगर घी में स्टाच या अन्य मिलावट का शक हो तो आयोडीन टेस्ट किया जा सकता है. घी में थोड़ा आयोडीन डालने पर अगर रंग नीला पड़ता है तो उसमें मिलावट मौजूद हो सकती है. यह तरीका घर पर भी आसानी से किया जा सकता है.

    जमने के तरीके से भी पहचान (Freezing method)
    घी को फ्रिज में रखकर देखें. शुद्ध घी समान रूप से जमता है, जबकि मिलावटी घी अलग-अलग लेयर में या दानेदार तरीके से जम सकता है. यह संकेत देता है कि उसमें अन्य तेल या फैट मिलाए गए हैं.