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  • अमेरिका में ‘गोल्डन केज’ में फंसे भारतीय कर्मचारी! TCS-Infosys समेत 8 कंपनियों के ग्रीन कार्ड आवेदन पर रोक

    अमेरिका में ‘गोल्डन केज’ में फंसे भारतीय कर्मचारी! TCS-Infosys समेत 8 कंपनियों के ग्रीन कार्ड आवेदन पर रोक

    नई दिल्ली
     अमेरिका की इमिग्रेशन पॉलिसी में बदलाव ने एक लाख से ज्यादा भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स को परेशानी में डाल दिया है. फेडरल अथॉरिटीज ने इंफोसिस और टीसीएस समेत कई प्रमुख कंपनियों को PERM एम्प्लॉयमेंट-बेस्ड ग्रीन कार्ड प्रोग्राम से सस्पेंड कर दिया है. लेबर सेक्रेटरी ने इन दिग्गज कंपनियों पर वीजा धोखाधड़ी और लेबर सर्टिफिकेशन प्रोसेस के गलत इस्तेमाल का आरोप लगाया है. इस वजह से एच-1बी वीजा पर काम कर रहे हजारों प्रोफेशनल्स के लिए परमानेंट रेजीडेंसी का रास्ता अचानक बंद हो गया है. यह फैसला मुख्य रूप से अमेरिकी वर्कर्स के अधिकारों को बचाने के लिए लिया गया है. यह बैन माइक्रोसॉफ्ट और अडोबी पर भी लागू हुआ है। 

    माइक्रोसॉफ्ट ने H-1B फ्रॉड के आरोपों को नकारा, कहा- 80% आवेदन मौजूदा कर्मचारियों के लिए

    माइक्रोसॉफ्ट ने H-1B वीजा सिस्टम के दुरुपयोग के आरोपों को खारिज किया है. कंपनी ने कहा कि पिछले वित्त वर्ष में दाखिल करीब 6,000 H-1B आवेदनों में 80% मौजूदा कर्मचारियों के स्टेटस बढ़ाने या बदलने के लिए थे। 

    कंपनी के मुताबिक इन आवेदनों का इस्तेमाल नए लोगों को नौकरी देने के लिए नहीं किया गया. बाकी आवेदन ऐसे कर्मचारियों के लिए थे जो पहले से अमेरिका में कानूनी रूप से रह रहे थे और माइक्रोसॉफ्ट से जुड़े। 

    Microsoft ने कहा कि ये कर्मचारी उसके अमेरिकी वर्कफोर्स का करीब 1% हैं. यह बयान अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के उस ऐलान के कुछ घंटे बाद आया जिसमें माइक्रोसॉफ्ट को विदेशी कर्मचारियों के लिए स्थायी निवास की प्रक्रिया वाले एक सरकारी कार्यक्रम से निलंबित करने की बात कही गई थी। 

    ‘गोल्डन केज’ में कैसे फंस गए हजारों भारतीय टेक वर्कर्स?

        सस्पेंशन के कारण कंपनियां नए पर्म एप्लिकेशन फाइल नहीं कर सकती हैं. पेंडिंग सर्टिफिकेशन भी आगे नहीं बढ़ेंगे। 

    इससे ग्रीन कार्ड की लाइन वहीं रुक गई है. एच-4 वीजा वाले जीवनसाथियों के वर्क ऑथराइजेशन पर खतरा मंडराने लगा है. उम्र पूरी कर रहे बच्चों को डिपोर्टेशन का डर सता रहा है। 

    ग्रीन कार्ड बैन से क्या पड़ेगा असर?
        इस बैन का आर्थिक असर सिर्फ कागजी कार्रवाई तक सीमित नहीं रहने वाला है. फंसी हुई ग्रीन कार्ड एप्लिकेशन वाले टेक वर्कर्स आसानी से कंपनियां नहीं बदल सकते। 
        वे नया प्रमोशन या टेक्निकल रोल भी स्वीकार नहीं कर सकते. ऐसा करने पर उनके कई सालों के फाइलिंग टाइमलाइन को रीसेट करना पड़ेगा। 
        ये इंजीनियर्स अपने मौजूदा रोल्स में लॉक हो गए हैं. परिवारों के लिए घर खरीदना या बच्चों की शिक्षा का फैसला लेना रिस्की हो गया है. उनका भविष्य अब प्रशासनिक अपीलों पर निर्भर है। 

    सबसे पहले समझिए आखिर PERM क्या है?
    बता दें कि यह अमेरिका में स्थायी निवास प्रक्रिया का एक बेहद अहम और शुरुआती चरण है। इसकी शुरुआत 2005 में हुई थी। इसके तहत अमेरिकी कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को परमानेंट रेजिडेंसी यानी ग्रीन कार्ड के लिए स्पॉंसर करती हैं।

    बात अब इसके नियम की करें तो, इस प्रक्रिया के तहत श्रम विभाग को यह प्रमाणित करना होता है कि किसी खास नौकरी के लिए पर्याप्त अमेरिकी नागरिक उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए कंपनी किसी विदेशी नागरिक को रख रही है।

    अब जानिए कंपनियों पर क्यों लगाई गई रोक?
    अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ट्रंप प्रशासन का आरोप है कि ये बड़ी कंपनियां इस प्रोग्राम का दुरुपयोग कर रही हैं। अमेरिकी स्थानीय नागरिकों को नौकरी से निकालकर उनकी जगह विदेशी कामगारों खासकर H-1B वीजाधारकों को कम वेतन पर रखा जा रहा है। प्रशासन का तर्क है कि इससे अमेरिकी युवाओं के रोजगार पर असर पड़ रहा है।

    अब जानिए भारतीयों पर इसका क्या असर होगा?
    इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि अमेरिका में रहने वाले लाखों भारतीय, जो मुख्य रूप से H-1B वीजा पर वहां नौकरी कर रहे हैं और लंबे समय से ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे हैं, उनके लिए यह एक बड़ा झटका है। इसका कारण है कि H-1B एक अस्थायी वर्क वीजा है, जिसकी एक तय समयसीमा होती है।

    इसके इतर, अमेरिका में हमेशा के लिए बसने के लिए PERM सर्टिफिकेट बेहद अहम सीढ़ी है। ऐसे में अब इस रोक के बाद, इन 8 कंपनियों में काम करने वाले भारतीय कर्मचारियों के ग्रीन कार्ड की फाइलें आगे नहीं बढ़ पाएंगी।

    नौकरी तो कर सकते हैं, लेकिन बस नहीं सकते
    अच्छा, ऐसा भी नहीं है कि इस प्रतिबंध के बाद भारतीय या फिर किसी भी देश के वैसे कर्मचारी जो कि अमेरिका में रहते हैं, उनके वहां रहने में दिक्कतें आएंगी। राहत की बात यह है कि इस बैन से कर्मचारियों का मौजूदा H-1B वीजा तुरंत रद नहीं हुआ है।

    इस बात में कोई दोराय नहीं है कि वे अभी कानूनी रूप से अमेरिका में रहकर अपनी नौकरी कर सकते हैं। लेकिन, उनकी परमानेंट रेजिडेंसी यानी ग्रीन कार्ड हासिल करने की प्रक्रिया अनिश्चितकाल के लिए अटक गई है।

    अब क्या करेंगे भारतीय पेशेवर?
    देखिए, चूंकि भारत के लाखों आईटी पेशेवर विशेषकर टाटा, इंफोसिस, विप्रो और HCL जैसे संस्थानों के कर्मचारी अमेरिका में ग्रीन कार्ड के लिए बरसों-बरस का लंबा इंतजार करते हैं, ऐसे में इस रास्ते के बंद होने से उनके भविष्य पर संशय के बादल मंडराने लगे हैं। उन्हें अब अमेरिकी वीजा नियमों के तहत अपने वर्क वीजा को बार-बार रिन्यू कराना पड़ेगा और लंबे समय तक अस्थायी स्थिति में रहना होगा।

    दूसरी तरफ मुश्किल बात यह भी है कि कंपनियों के लिए अमेरिका में विदेशी कर्मचारियों को रोकना और उन्हें स्थायी भविष्य का भरोसा देना कठिन हो जाएगा। इससे कई पेशेवर मानसिक तनाव और अनिश्चितता का सामना कर सकते हैं कि यदि स्थिति नहीं सुधरी, तो उन्हें एक दिन अमेरिका छोड़कर वापस लौटना पड़ सकता है।

    आईटी सेक्टर पर इस बड़े फैसले के बाद अब आगे क्या विकल्प बचते हैं?
    यह बैन इमिग्रेशन पॉलिसी को सख्ती से लागू करने की दिशा में बड़ा कदम है. इससे ऑफशोर कंसल्टिंग स्ट्रक्चर पर अमेरिकी सरकार की निगरानी काफी बढ़ गई है. प्रभावित आईटी कंपनियां अब इसके कानूनी उपाय तलाश रही हैं। 

    एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारतीय टेक टैलेंट अब दूसरे देशों का रुख कर सकता है. इसके साथ ही भारत के टेक इकोसिस्टम में वापसी की दिलचस्पी भी बढ़ रही है. ग्रीन कार्ड रास्तों पर निर्भर रहना अब रिस्की हो गया है। 

  • USCIS नियमों में बदलाव, ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पहले से ज्यादा सख्त हुई

    USCIS नियमों में बदलाव, ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पहले से ज्यादा सख्त हुई

    नई दिल्ली

    आज के समय में ज्यादातर लोग भारत छोड़ विदेश का रुख कर रहे हैं। इनमें से ज्यादातर लोग अमेरिका जा रहे हैं या जाना चाहते हैं। लेकिन अब अमेरिका की ट्रंप सरकार (Trump Government) ने ग्रीन कार्ड को लेकर नई नीति की घोषणा की है। पहले लोग अमेरिका में अस्थाई वीजा पर रहते हुए ही ग्रीन कार्ड मिलने तक वहीं रुक सकते थे, लेकिन अब ऐसा करना नहीं होगा।

    ग्रीन कार्ड के लिए छोड़ना होगा अमेरिका
    अब तक लोग अमेरिका में रहते हुए ही “एडजस्टमेंट ऑफ स्टेटस” प्रक्रिया के तहत ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन कर सकते थे लेकिन अब से ये मुमकिन नहीं होगा। यूएस सिटीजनशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज (USCIS ) ने जानकारी दी कि जो लोग अपने स्टेटस में बदलाव चाहते हैं, उन्हें पहले अपने गृह देश वापिस लौटना होगा फिर अमेरिकी दूतावास या कॉन्सुलर प्रोसेसिंग के जरिए ही आवेदन करना होगा। ये प्रक्रिया पहले से अधिक जटिल हो गई है।

    12 लाख भारतीयों की बढ़ी मुश्किलें
    मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका में इमिग्रेशन एडवोकेट अजय भुटोरिया ने PTI को बताया कि नई ग्रीन कार्ड नीति भारतीयों के लिए झटका है। उन्होंने कहा, कि "कानून का पालन करने वाले 12 लाख से अधिक भारतीय-अमेरिकी अब मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। अमेरिका के नए नियम के तहत ग्रीन कार्ड आवेदकों को अमेरिका छोड़कर इमिग्रेंट वीजा पर दोबारा एंट्री करना जरूरी हो गया है।"

    उन्होंने कहा, "पिछले दो सालों में पढ़ाई के लिए अमेरिका आने वाले छात्रों की संख्या में 35 से 40 फीसदी की कमी देखी गई है। पिछले दिसंबर से जो लोग वीजा स्टैंपिंग के लिए भारत गए वे अभी भी अटके हुए हैं। उन्हें जो डेट मिली है वो अगस्त, अक्टूबर तक की मिली है।"

    क्या होता है ग्रीन कार्ड?
    ग्रीन कार्ड को आधिकारिक तौर पर स्थायी निवासी कार्ड (Permanent Resident Card) कहा जाता है। जो किसी विदेशी नागरिक को अमेरिका में स्थायी रूप से रहने का अधिकार देता है। ग्रीन कार्ड धारक अमेरिका में कहीं भी रह सकता है। ये कार्ड लोगों को ज्यादातर कंपनियों में नौकरी करने, पढ़ाई करने और नियमों के तहत अमेरिका से बाहर आने-जाने का अधिकार देता है। इस कार्ड के मिलने के बाद वह व्यक्ति अमेरिकी नागरिकता के लिए भी अप्लाई कर सकता है।