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  • नांदेड़ में रफ्तार का कहर! ट्रक-टाटा मैजिक की जोरदार टक्कर, 9 लोगों की मौत

    नांदेड़ में रफ्तार का कहर! ट्रक-टाटा मैजिक की जोरदार टक्कर, 9 लोगों की मौत

    नांदेड़

    महाराष्ट्र के नांदेड़ में एक बड़ा सड़क हादसा हुआ है. एक तेज रफ्तार ट्रक और टाटा मैजिक की भिड़ंत में 9 लोगों की मौत हो गई है. इसके अलावा तीन लोग गंभीर रूप से घायल हुए है. घायलों को सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया है. कुछ घायलों की हालत नाजुक होने के कारण मृतकों का आंकड़ा बढ़ने की आशंका जताई जा रही है. जानकारी के अनुसार यह भीषण हादसा शाम करीब 6:30 बजे नांदेड़-भोकर हाईवे पर वाकद गांव के पास सीताखंडी इलाके में हुआ.  भोकर से नांदेड़ की दिशा में जा रहे एक तेज रफ्तार ट्रक ने सामने से आ रही टाटा मैजिक यात्री वैन को जोरदार टक्कर मार दी। 

    टक्कर इतनी भयानक थी कि टाटा मैजिक वैन के परखच्चे उड़ गए और वह छिटककर सड़क के किनारे जा गिरी. वैन में कुल 12 यात्री सवार थे, हादसे के वक्त दोनों वाहनों की रफ्तार काफी तेज थी. घायलों को सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया है. कुछ घायलों की हालत नाजुक होने के कारण मृतकों का आंकड़ा बढ़ने की आशंका जताई जा रही है.  मिली जानकारी के अनुसार, यह भीषण हादसा शाम करीब 6:30 बजे नांदेड़-भोकर हाईवे पर वाकद गांव के पास सीताखंडी इलाके में हुआ। 

    जोरदार टक्कर की वजह से 9 यात्रियों ने मौके पर ही दम तोड़ दिया और सड़क पर क्षत-विक्षत शव बिखर गए. हादसे की तेज आवाज सुनकर स्थानीय ग्रामीण तुरंत मौके पर दौड़े और पुलिस व एंबुलेंस को घटना की सूचना दी. इसके अलावा 3 घायलों को आनन-फानन में भोकर और नांदेड़ के सरकारी अस्पतालों में भर्ती कराया गया है. वैन को टक्कर मारने के बाद ट्रक का अगला हिस्सा भी पूरी तरह पिचक गया. इसके चलते ट्रक ड्राइवर केबिन के अंदर ही फंस गया. पुलिस और बचाव दल उसे बाहर निकालने की लंबी कोशिश चली. वैन में सफर कर रहे सभी लोग स्थानीय निवासी बताए जा रहे हैं. फिलहाल पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि इस हादसे में गलती किसकी थी। 

     

  • ‘हनुमान अंश’ फिल्म पर मुख्यमंत्री डॉ. यादव की प्रतिक्रिया, बोले- आस्था और संस्कृति से जोड़ता है संदेश

    ‘हनुमान अंश’ फिल्म पर मुख्यमंत्री डॉ. यादव की प्रतिक्रिया, बोले- आस्था और संस्कृति से जोड़ता है संदेश

    हनुमान अंश’ फिल्म आस्था, संस्कृति और भक्ति की शक्ति का देती है संदेश : मुख्यमंत्री डॉ. यादव

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने देखी हनुमान अंश फीचर फिल्म

    भोपाल

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने गुरुवार की शाम कोलार स्थित एक निजी प्लाजा में बहुचर्चित फीचर फिल्म ‘हनुमान अंश’ के प्रदर्शन में सहभागिता करते हुए फिल्म देखी। फिल्म देखने के बाद मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने इसकी विषय-वस्तु, प्रस्तुति और कलाकारों के अभिनय की सराहना की।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि नीब करौली बाबा के जीवन चरित्र पर केंद्रित ‘हनुमान अंश’ फिल्म हमारी आस्था, आध्यात्मिक परंपरा और भगवान हनुमान की भक्ति के मार्ग को समझने का एक माध्यम है। भक्ति से समाज सुधार की शक्ति पाने की पटकथा वाली इस फिल्म ने हम सबके आराध्य भगवान हनुमान की आराधना और सेवा की भावना को अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है। उन्होंने कहा कि नीब करौली बाबा के जीवन पर केंद्रित इस फिल्म से हमें एकात्म मानववाद और सर्वहारा वर्ग के कल्याण की प्रेरणा देती है।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने फिल्म में नीब करौली बाबा की भूमिका निभाने वाले कलाकार शोभिनव सत्या के अभिनय की विशेष प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि शोभिनव सत्या ने नीब करौली बाबा के चरित्र का सिर्फ़ अभिनय ही नहीं किया, बल्कि उसे खुद जीकर जीवंत कर दिया है। उनके अभिनय में बाबा के व्यक्तित्व की सहजता, भक्ति और आध्यात्मिक भावनाओं की गहरी अनुभूति दिखाई देती है। उन्होंने सचमुच कमाल ही कर दिया है।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि हमारी संस्कृति और आध्यात्मिक परम्पराओं में संतों का जीवन समाज को सदैव प्रेरणा देता रहा है। ऐसे विषयों पर बनने वाली फिल्में नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, संस्कारों और आध्यात्मिक विरासत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने प्रदेशवासियों से ‘हनुमान अंश’ फिल्म देखने का आह्वान करते हुए कहा कि अपने धर्म, संस्कृति और आध्यात्मिक परम्पराओं में आस्था रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह फिल्म अवश्य देखनी चाहिए। यह फिल्म भक्ति के साथ ही हमें अपने जीवन में सेवा, समर्पण, परोपकार और सबके प्रति सद्भावना रखने की अभिप्रेरणा देती है।

    इस अवसर पर विधायक रामेश्वर शर्मा, मप्र राज्य वेयर हाउसिंग कार्पोरेशन के अध्यक्ष संजय नगाईच, एमपी हाऊसिंग बोर्ड के चेयरमैन कोमल जैन, महापौर श्रीमती मालती राय, जिलाध्यक्ष रविन्द्र यति सहित अन्य जनप्रतिनिधि, निजी प्लाजा के आनर एवं बड़ी संख्या में दर्शकगण उपस्थित थे।

     

  • ‘हनुमान अंश’ देखने पहुंचे राज्यपाल रमेन डेका, CM साय और विधानसभा अध्यक्ष रमन सिंह, सपरिवार लिया फिल्म का आनंद

    ‘हनुमान अंश’ देखने पहुंचे राज्यपाल रमेन डेका, CM साय और विधानसभा अध्यक्ष रमन सिंह, सपरिवार लिया फिल्म का आनंद

    राज्यपाल रमेन डेका, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय  और विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने सपरिवार देखी फिल्म ‘हनुमान अंश’

    मुख्यमंत्री साय ने फिल्म ‘हनुमान अंश’ को छत्तीसगढ़ में टैक्स फ्री करने की घोषणा की

    भारत की संत परंपरा ने सदैव समाज को सत्य, सेवा, करुणा और आध्यात्मिकता का मार्ग दिखाया है : मुख्यमंत्री साय

    नीम करौली बाबा का जीवन मानव सेवा, प्रेम और भक्ति का प्रेरणादायी उदाहरण : मुख्यमंत्री

    भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत पर आधारित फिल्में नई पीढ़ी को अपने संस्कारों और मूल्यों से जोड़ने का सशक्त माध्यम

    मंत्रिपरिषद के सदस्य एवं निगम-मंडल-आयोगों के अध्यक्ष भी रहे उपस्थित

    रायपुर
     मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने आज राजधानी रायपुर स्थित जोरा मॉल के सिनेमाघर में सपरिवार फिल्म ‘हनुमान अंश’ देखी। इस अवसर पर राज्यपाल रमेन डेका और विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह भी सपरिवार उपस्थित रहे। मंत्रिपरिषद के सदस्य तथा विभिन्न निगम-मंडल-आयोगों के अध्यक्षों ने भी फिल्म देखी।

    फिल्म देखने के बाद मुख्यमंत्री साय ने ‘हनुमान अंश’ को छत्तीसगढ़ में टैक्स फ्री करने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक विरासत और संत परंपरा से समाज को परिचित कराने वाली ऐसी प्रेरणादायी फिल्में अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचनी चाहिए। फिल्म को टैक्स फ्री किए जाने से प्रदेश के अधिकाधिक दर्शकों, विशेषकर युवाओं को भारत की समृद्ध संत परंपरा और उसके जीवन मूल्यों को जानने का अवसर मिलेगा।

    मुख्यमंत्री साय ने कहा कि भारत की संत परंपरा ने सदैव समाज को सत्य, सेवा, करुणा, प्रेम और आध्यात्मिकता का मार्ग दिखाया है। संतों ने अपने जीवन और आचरण के माध्यम से समाज को मानवता और लोककल्याण का संदेश दिया है। नीम करौली बाबा का जीवन भी इसी महान परंपरा का प्रेरणादायी उदाहरण है। उनका जीवन हमें यह सीख देता है कि मानव सेवा ही ईश्वर की सच्ची सेवा है।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि नीम करौली बाबा ने अत्यंत सरल शब्दों और सहज जीवन के माध्यम से प्रेम, सेवा और भक्ति का संदेश दिया। उनके विचारों में मानवता और सभी के प्रति समान भाव सर्वोपरि रहा। उनका यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है और समाज को सकारात्मक दिशा देने की सामर्थ्य रखता है।

    मुख्यमंत्री साय ने फिल्म के निर्माताओं, निर्देशक, कलाकारों एवं पूरी टीम के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज तक विचार, संस्कार और प्रेरणा पहुंचाने का भी प्रभावी माध्यम है। भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक विरासत और संत परंपरा पर आधारित सकारात्मक फिल्में नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, परंपराओं और मानवीय मूल्यों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

    उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक शक्ति उसकी हजारों वर्षों पुरानी परंपराओं और जीवन मूल्यों में निहित है। सेवा, करुणा, सद्भाव और मानव कल्याण जैसे मूल्यों को आगे बढ़ाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। ‘हनुमान अंश’ जैसी फिल्में इन मूल्यों को सरल और प्रभावी रूप में समाज तक पहुंचाने का सराहनीय प्रयास हैं।

    उल्लेखनीय है कि फिल्म ‘हनुमान अंश’ नीम करौली बाबा के जीवन, आध्यात्मिक यात्रा और उनके सेवा एवं भक्ति के संदेश पर आधारित है। 

    इस अवसर पर मंत्रिपरिषद के सदस्य, विभिन्न निगम-मंडल-आयोगों के अध्यक्षगण सहित अन्य गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

  • MP में यात्री परिवहन का होगा विस्तार, 11 सितंबर से इंदौर में समिट; रोजगार और निवेश के खुलेंगे नए रास्ते

    MP में यात्री परिवहन का होगा विस्तार, 11 सितंबर से इंदौर में समिट; रोजगार और निवेश के खुलेंगे नए रास्ते

    इंदौर 

    मध्य प्रदेश सरकार ने वर्ष 2005 में घाटे का हवाला देकर सड़क परिवहन निगम (सपनि) को बंद कर दिया था। पत्रिका ने सड़क परिवहन निगम के बंद होने से प्रदेश में बिगड़ी परिवहन व्यवस्था को उजागर किया था। सरकार के सामने वे सभी तथ्य लेकर आए, जिसने सफर की मुश्किलें बढ़ाईं। इसके बाद मोहन सरकार ने सरकारी लोक परिवहन सेवा को शुरू करने ऐलान किया और अब क्रियान्वयन की ओर बढ़ी है। यानी अब मध्य प्रदेश में जल्द ही सरकारी बस परिवाहन सेवा शुरु होगी।

    आपको बता दें कि, राज्य सरकार प्रदेश के नागरिकों को स्मार्ट, सुरक्षित, सुगम और पर्यावरण-अनुकूल लोक परिवहन सुविधा उपलब्ध कराने की दिशा में बड़ा कदम लेने जा रही है। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा यात्री परिवहन विजन समिट-2026 आयोजित की जाएगी। प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में 11 और 12 सितंबर को आयोजित होने समिट में प्रदेश की यात्री परिवहन व्यवस्था को अधिक आधुनिक, व्यवस्थित और प्रभावी बनाने के साथ-साथ निवेश, रोजगार और उद्योग के नए अवसरों को बढ़ावा देने पर मंथन होगा।

    इसमें पूरे देश से आने वाले परिवहन विशेषज्ञ, निजी बस ऑपरेटर, उद्योग जगत के प्रतिनिधि और नीति-निर्माता प्रदेश की यात्री परिवहन व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए विचार-विमर्श करेंगे। विशेषज्ञों के सुझावों के आधार पर भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए यात्री परिवहन का रोडमैप तैयार करने में मदद मिलेगी। साथ ही प्रदेश की 75 फीसदी ग्राम पंचायतों को बस सेवा से जोड़कर ग्रामीण कनेक्टिविटी को बेहतर किया जाएगा।

    मध्य प्रदेश यात्री परिवहन एवं अधोसंरचना लिमिटेड अंतर्गत 'मोबिलिटी विज़न 2030' का लक्ष्य प्रदेश के दूरस्थ क्षेत्रों तक परिवहन नेटवर्क का विस्तार करना है। इसके अंतर्गत प्रदेश में 15,000 से अधिक आधुनिक सार्वजनिक बसें संचालित की जाएंगी। इससे रोजाना 30 लाख से ज्यादा यात्रियों को सुरक्षित आवागमन की सुविधा मिलेगी। साथ ही 180 से अधिक आधुनिक बस स्टैंड्स, टर्मिनल्स और डिपो का कायाकल्प होगा।

    इलेक्ट्रिक बसों के विस्तार पर विशेष जोर
    पर्यावरण संरक्षण और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के उद्देश्य से समिट में स्वच्छ ईंधन और इलेक्ट्रिक बसों के विस्तार पर विशेष जोर दिया जाएगा। मौजूदा समय में 96 पीएम ई-बसें और 120 इंटरसिटी बसें प्रदेश में संचालित हैं। इसके साथ आगामी 6 महीनों में 486 पीएम ई-बसें और 34 इंटरसिटी बसें जोड़ी जाएंगी, जबकि वर्ष 2027 तक यह संख्या बढ़ाकर 1,100 करने का लक्ष्य है। प्रदेश में 100 बसों की क्षमता वाले आधुनिक चार्जिंग डिपो और सोलर इंफ्रॉस्ट्रक्चर भी तैयार किए जा रहे हैं। इससे सालाना 70,000 टन से अधिक कार्बन डाईऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी आएगी।

    यात्री सुरक्षा, स्मार्ट तकनीक और 24×7 निगरानी
    मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा अंतर्गत संचालित होने वाली सभी बसों की निगरानी इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट मैनेजमेंट सिस्टम के जरिए होगी। इसके लिए मध्य प्रदेश यात्री परिवहन एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड एवं उसकी 7 सहायक कंपनियों में अत्याधुनिक कमांड-कंट्रोल सेंटर स्थापित किए जाएंगे। इन सेंटरों से बसों के संचालन, लोकेशन, टाइमिंग एवं अन्य महत्वपूर्ण गतिविधियों की रियल टाइम निगरानी सुनिश्चित की जाएगी। साथ ही, सार्वजनिक बसों में महिला और बाल सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। इससे यात्री परिवहन व्यवस्था अधिक सुरक्षित, सुगम, पारदर्शी और प्रभावी बनाने में भी मदद मिलेगी। सभी बसों को 07 सीसीटीवी कैमरों, पैनिक बटन और रियल-टाइम व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम से लैस किया जा रहा है। इसके अलावा, पैसेंजर इंफॉर्मेशन सिस्टम, ड्राइवरों की तकनीकी ट्रेनिंग और त्वरित शिकायत निवारण तंत्र के जरिए सुरक्षित एवं समयबद्ध यात्रा सुनिश्चित की जाएगी।

  • BJP के 125 विधायकों का कट सकता है टिकट? आंतरिक सर्वे से पार्टी सतर्क, जीतने वाले चेहरों पर फोकस

    BJP के 125 विधायकों का कट सकता है टिकट? आंतरिक सर्वे से पार्टी सतर्क, जीतने वाले चेहरों पर फोकस

    लखनऊ

    उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब छह महीने से भी कम वक्त बचा है. इस चुनाव में 10 साल से सत्तारूढ़ योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली भाजपा सरकार के सामने हैट्रिक लगाने की चुनौती है. भाजपा ने स्थानीय विधायकों के कामकाज और लोकप्रियता का सर्वे कराते हुए जनता का मूड भांपने की कोशिश की है. 2024 के लोकसभा चुनाव से लगे झटके से सबक लेकर भाजपा ने 403 विधानसभा सीटों पर एक गोपनीय और बहुस्तरीय आंतरिक सर्वे कराया है. इस सर्वे रिपोर्ट ने सत्ता के गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। 

    भाजपा का आंतरिक सर्वे
    सूत्रों की मानें तो इस सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, यूपी में करीब 125 से 128 मौजूदा विधायकों के खिलाफ उनके ही क्षेत्रों में जबर्दस्त एंटी इनकंबेंसी है. सीधे तौर पर कहें तो करीब भाजपा में 128 सीटों पर मौजूदा विधायकों के टिकट काटा या बदला जा  सकता है. पश्चिम यूपी से लेकर पूरब तक मंत्रियों से लेकर दिग्गज विधायकों तक के नाम इस रेड लिस्ट में शामिल हैं. भाजपा यूपी को अपने संगठन के लिहाज से 6 क्षेत्रों में बांटती है. ऐसे में कहां किस क्षेत्र से कितने टिकट कट सकते हैं, ये आंकड़ा चौंकाने वाला है. यूपी विधानसभा चुनाव 2027 को 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले सेमीफाइनल माना जा रहा है। 

        पश्चिम क्षेत्र की 71 सीटों में 23-25 टिकट कटने के आसार
        ब्रज क्षेत्र कुल 65 सीटों में 24-26 टिकट कटने की संभावना
        अवध क्षेत्र में कुल 82 सीट में 26-28 टिकट कटने का संकेत
        कानपुर क्षेत्र की कुल 52 सीट में 22-24 कटने के कयास
        काशी क्षेत्र में कुल 72 सीट में 19-21 का पत्ता कट सकता है
        गोरखपुर क्षेत्र की 62 सीटों में 18-22 टिकट कटने की संभावना

    यूपी में भाजपा की हैट्रिक की चुनौती
    भाजपा यूपी में हैट्रिक लगाने को पूरी ताकत झोंक रही है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले एक-डेढ़ महीने में ही राज्य के ज्यादातर जिलों का दौरा कर विकास परियोजनाओं की झड़ी लगा दी है.2022 की जीत की बात करें तो 1985 के बाद यूपी में यह पहला मौका था जब किसी मुख्यमंत्री और सत्तारूढ़ पार्टी ने लगातार दूसरी बार पूरे बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की थी. वहीं सपा-कांग्रेस गठबंधन 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों से उत्साहित है. अखिलेश यादव जहां पीडीए के सामाजिक समीकरणों पर ध्यान केंद्रित किए हैं, वहीं कांग्रेस दलित-मुस्लिम वोटों को एकजुट करके अपना जनाधार बढ़ाने में जुटी है। 

    2022 विधानसभा चुनाव में किसको कितनी सीटें

    भारतीय जनता पार्टी (BJP)- 255
    अपना दल (सोनेलाल)-1 2
    निषाद पार्टी (NISHAD)- 06
    एनडीए (NDA)-  273
    कुल सीटें 403: बहुमत 202

    गठबंधन में सीटों का बंटवारा भी चुनौती
    उत्तर प्रदेश में मोदी-योगी लहर को कायम रखते हुए भाजपा को अकेले 41.29% वोट मिले थे. भाजपा का पिछले चुनाव में अपना दल सोनेलाल, निषाद पार्टी जैसे दलों के साथ गठबंधन रहा है. अब एनडीए के खेमे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश से राष्ट्रीय लोकदल शामिल है. एनडीए का सपा-कांग्रेस गठबंधन से मुख्य मुकाबला होना तय है. मायावती की बहुजन समाज पार्टी, आजाद समाज पार्टी, एआईएमआईएम जैसे दल भी ताल ठोकने को तैयार हैं। 

  • लापता बच्चों के मामलों की जल्द जांच और सुनवाई पर जोर, SC में PIL; समर्पित अदालतों की मांग

    लापता बच्चों के मामलों की जल्द जांच और सुनवाई पर जोर, SC में PIL; समर्पित अदालतों की मांग

    नई दिल्ली

    बच्चों के गुम होने, अपहरण और उन्हें जबरन ले जाने के मामलों की जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई है। याचिका में पूरे देश में ऐसी घटनाओं की जांच के लिए एक जैसी व्यवस्था बनाने की मांग की गई है। इसके साथ ही जांच को तय समयसीमा में पूरा करने, विशेष जांच प्रक्रिया अपनाने और मामलों की जल्द सुनवाई के लिए समर्पित अदालतें बनाने की मांग की गई है।

    याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया?
    मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले में केंद्र और राज्यों से जवाब मांगा है। इस पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ-साथ शिक्षा मंत्रालय, कानून एवं न्याय मंत्रालय, गृह मंत्रालय और विधि आयोग को नोटिस जारी किया है।

    याचिकाकर्ता की मुख्य मांग क्या?
    यह जनहित याचिका अधिवक्ता और याचिकाकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने दाखिल की है। इसे अधिवक्ता-ऑन-रिकॉर्ड अश्वनी कुमार दुबे के जरिए सुप्रीम कोर्ट में पेश किया गया। याचिका में मांग की गई है कि बच्चों के अपहरण और उन्हें जबरन ले जाने के मामलों की जांच के लिए पूरे देश में एक समान व्यवस्था हो। इसमें खास तौर पर समयबद्ध जांच और विशेष जांच प्रक्रिया की मांग रखी गई है। 

    ​समर्पित अदालतें बनाने की पैरवी
    याचिका में केवल जांच तक ही बात सीमित नहीं रखी गई है, बल्कि त्वरित न्याय के लिए समर्पित विशेष अदालतें गठित करने का भी अनुरोध किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि जब तक बच्चों के खिलाफ होने वाले इन अपराधों के लिए अलग से विशेष अदालतें नहीं होंगी, तब तक पीड़ितों को त्वरित न्याय मिलना कठिन होगा और दोषियों में कानून का डर कायम नहीं हो सकेगा।

    ​मौजूदा व्यवस्था की खामियों पर उठाये सवाल
    सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में यह रेखांकित किया गया है कि वर्तमान समय में राज्यों के बीच जांच एजेंसियों के समन्वय और सूचना साझा करने में काफी ढिलाई देखने को मिलती है। कई मामलों में पुलिस की धीमी और असंवेदनशील कार्रवाई के कारण अपहृत बच्चों को सही समय पर सुरक्षित वापस नहीं लाया जा पाता।

    याचिका में कहा गया है कि अंतरराज्यीय नेटवर्क के जरिए बच्चों का अपहरण कर उन्हें बाल मजदूरी या मानव तस्करी में धकेल दिया जाता है, जिसके लिए एक एकीकृत राष्ट्रीय तंत्र की सख्त जरूरत है।

    ​सुप्रीम कोर्ट का रुख और आगे की कार्रवाई
    सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका में उठाए गए बिंदुओं को गंभीर मानते हुए सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर दिया है। राज्यों और केंद्र सरकार की ओर से दाखिल होने वाले जवाबों के बाद सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर आगे की सुनवाई करेगा और बच्चों की सुरक्षा के लिए दिशानिर्देश तय कर सकता है।

    याचिका में ये प्रमुख मांगें रखी गई हैं:-

        बच्चों के अपहरण और जबरन ले जाने के मामलों की जांच के लिए देशभर में एक समान व्यवस्था हो।

        जांच को तय समयसीमा में पूरा करने के लिए समयबद्ध प्रक्रिया लागू की जाए।

        ऐसे मामलों की जांच के लिए विशेष और समर्पित जांच प्रक्रिया तैयार की जाए।

        मामलों की सुनवाई तेजी से पूरी करने के लिए समर्पित अदालतों की व्यवस्था हो।

    याचिका में मौजूदा व्यवस्था को लेकर क्या कहा गया?
    याचिका में लापता, अपहृत और जबरन ले जाए गए बच्चों से जुड़े मामलों को संभालने में व्यवस्था की खामियों का हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की है, जिससे ऐसे मामलों में जांच एजेंसियां तेजी से और आपसी तालमेल के साथ कार्रवाई कर सकें। याचिका का जोर इस बात पर है कि बच्चों से जुड़े इन मामलों में जांच और कार्रवाई के लिए एक समान और समन्वित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

    याचिका में कहा गया है कि बच्चों के गुम होने, अपहरण या उन्हें जबरन ले जाने के मामलों में जांच एजेंसियों की कार्रवाई तेज और आपस में समन्वित होनी चाहिए। इसी उद्देश्य से याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से दखल देने की मांग की है। फिलहाल अदालत ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा है। केंद्र, राज्यों और अन्य संबंधित पक्षों के जवाब के बाद मामले में आगे की कार्रवाई होगी। 

  • बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, 18 साल से कम उम्र वालों को रोकने की PIL पर सरकार से जवाब तलब

    बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, 18 साल से कम उम्र वालों को रोकने की PIL पर सरकार से जवाब तलब

    नई दिल्ली
    सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को उस याचिका पर नोटिस जारी किया है, जिसमें मांग की गई है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बनाने की इजाजत नहीं होनी चाहिए. याचिका में सोशल मीडिया के इस्तेमाल करने के लिए सुरक्षा उपायों की भी मांग की गई है, जिसमें माता-पिता या लीगल गार्जियन की सहमति जरूरी होनी चाहिए.  याचिकामें कहा गया है कि मेटा और दूसरी सोशल मीडिया कंपनियों ने बच्चों के अकाउंट बनाने की आयुसीमा 13 साल तय की है, जो अमेरिकी कानून के मुताबिक है। 

    याचिका में क्या कहा गया है?
    NGO जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस की फाइल की गई याचिका में कहा गया है कि फेसबुक और स्नैपचैट (इंडिया) जैसे प्लेटफॉर्म यूजर्स को 13 साल की उम्र से अकाउंट बनाने की इजाजत देते हैं, जबकि भारतीय कानून 18 साल से कम उम्र के लोगों को नाबालिग मानता है.  याचिका में इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस और डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रूल्स, 2021 में बदलाव करने या खास गाइडलाइंस बनाने के निर्देश देने की मांग की गई है. जिससे ये सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी डिजिटल प्लेटफॉर्म माता-पिता या कानूनी अभिभावक की सहमति के बिना 18 साल से कम उम्र के बच्चे के साथ सोशल मीडिया कॉन्ट्रैक्ट न कर सके, या ये कॉन्टेक्ट माता-पिता या अभिभावक के वेरिफिकेशन/e-KYC के अधीन होनी चाहिए। 

    बच्चों को सीधे एक्सेस देने पर सवाल
    याचिका में ये भी मांग की गई है कि ऐसी गाइडलाइंस बनाई जाएं जो ये जरूरी करें कि जहां भी किसी नाबालिग को डिजिटल प्लेटफॉर्म एक्सेस करने या इस्तेमाल करने की इजाजत हो, तो ऐसा एक्सेस कानूनी तौर पर मान्यता प्राप्त तरीके से हो, जिसमें माता-पिता या कानूनी अभिभावक शामिल हों. इसमें भी माता-पिता या अभिभावक का वेरिफिकेशन/e-KYC शामिल हो, जो सर्विस के नेचर और रिस्क के हिसाब से हो। 

    याचिका में कहा गया है कि बच्चों का डिजिटल प्लेटफॉर्म तक खुद से एक्सेस उन्हें ऑनलाइन ग्रूमिंग, यौन शोषण, ट्रैफिकिंग, बिहेवियरल प्रोफाइलिंग, पर्सनल डेटा का गलत इस्तेमाल, साइबरबुलिंग और उम्र के हिसाब से गलत कंटेंट जैसे रिस्क के खतरे में डालता है। 

  • Aerospace सेक्टर में भारत-रूस की नई उड़ान, IL-114-300 और SJ-100 को लेकर बढ़ी साझेदारी की उम्मीद

    Aerospace सेक्टर में भारत-रूस की नई उड़ान, IL-114-300 और SJ-100 को लेकर बढ़ी साझेदारी की उम्मीद

     नई दिल्ली

    रूस अब भारत के साथ सिर्फ पारंपरिक रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं रहना चाहता. वह नागरिक विमानन क्षेत्र में भी अपनी उपस्थिति मजबूत करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है. रूस एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन (यूएसी) के सीईओ वादिम बाडेखा ने हाल ही में बताया कि पिछले छह महीनों में भारतीय कंपनियों के साथ बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है। 

    नई दिल्ली में चल रहे इन्नोप्रोम इंडिया प्रदर्शनी के दौरान कई महत्वपूर्ण समझौते औपचारिक रूप लेने वाले हैं. इस प्रदर्शनी में 120 से ज्यादा रूसी और भारतीय कंपनियां हिस्सा ले रही हैं. यह आयोजन ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से ठीक पहले हो रहा है, जिससे दोनों देशों के औद्योगिक सहयोग को गति मिलने की उम्मीद है। 

    सबसे ज्यादा चर्चा आईएल-114-300 क्षेत्रीय यात्री विमान को लेकर हो रही है. यह विमान छोटी और मध्यम दूरी की उड़ानों के लिए बनाया गया है. रूसी कंपनियां भारतीय एयरलाइंस और ऑपरेटरों को यह विमान बेचने के लिए सक्रिय हैं। 

    प्रस्तावित सौदों में पिनेकल एयर के लिए 50 विमान, एयर केरल के लिए 20 विमान और स्लीक एविएशन से जुड़े एमओयू के तहत 35 विमान शामिल हैं. इन आंकड़ों से साफ है कि रूस पक्ष भारत में कनेक्टिविटी को मजबूत करने वाले विमानों की बड़ी मांग देख रहा है। 

    आईएल-114-300: क्षेत्रीय उड़ानों का संभावित गेम चेंजर
    आईएल-114-300 एक टर्बोप्रॉप क्षेत्रीय यात्री विमान है जिसे रूस यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन ने विकसित किया है. यह विमान मुख्य रूप से छोटे शहरों और क्षेत्रीय मार्गों को जोड़ने के लिए उपयुक्त माना जाता है. भारत जैसे विशाल देश में जहां कई छोटे शहर अभी भी अच्छी हवाई कनेक्टिविटी का इंतजार कर रहे हैं, ऐसे विमान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। 

    जनवरी में विंग्स इंडिया एविएशन एग्जीबिशन के दौरान हैदराबाद में यूएसी ने भारतीय कंपनी फ्लेमिंगो एयरोस्पेस के साथ छह आईएल-114-300 विमानों की संभावित आपूर्ति के लिए प्रारंभिक समझौता किया था. अब इन्नोप्रोम के दौरान इससे बड़े सौदे होने की संभावना जताई जा रही है। 

    अगर ये समझौते सफल होते हैं तो यह न सिर्फ रूसी विमानों के लिए भारतीय बाजार का दरवाजा खोलेगा बल्कि भारत की क्षेत्रीय हवाई सेवाओं को भी नई दिशा देगा. भारतीय पक्ष के लिए यह आकर्षक इसलिए भी है क्योंकि कई घरेलू ऑपरेटर छोटे विमानों की तलाश में हैं जो कम यात्री क्षमता वाले मार्गों पर आर्थिक रूप से प्रैक्टिकल हों. बड़े जेट विमान इन मार्गों पर घाटे में चलते हैं, जबकि टर्बोप्रॉप विमान ईंधन की बचत और संचालन लागत कम रखने में मदद कर सकते हैं। 

    एसजे-100 का स्थानीय उत्पादन: मेक इन इंडिया की दिशा में कदम
    आईएल-114-300 के अलावा रूस पक्ष एसजे-100 क्षेत्रीय जेट के भारत में स्थानीय उत्पादन पर भी गंभीरता से काम कर रहा है. यूएसी के अनुसार इस विषय पर बातचीत लगभग 80% पूरी हो चुकी है. जल्द ही समझौता होने की उम्मीद है. इससे पहले यूएसी और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने एसजे-100 के संयुक्त लाइसेंस प्राप्त उत्पादन से संबंधित समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। 

    एसजे-100 एक आधुनिक क्षेत्रीय जेट है जिसे रूस ने विकसित किया है. भारत में इसका उत्पादन शुरू होने से न सिर्फ तकनीक का हस्तांतरण होगा बल्कि स्थानीय निर्माण क्षमता भी बढ़ेगी. भारतीय कंपनियां अगर इस विमान का बड़ा हिस्सा देश में ही बना पाती हैं तो लागत कम होगी, रोजगार बढ़ेगा और भविष्य में निर्यात की संभावनाएं भी खुलेंगी।

    स्थानीय उत्पादन की बातचीत इतनी आगे बढ़ना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे दोनों देशों के बीच सिर्फ खरीदार-विक्रेता का रिश्ता नहीं बल्कि साझा विनिर्माण साझेदारी बनेगी. रक्षा क्षेत्र में लंबे समय से चले आ रहे सहयोग के बाद नागरिक विमानन में भी ऐसा मॉडल अपनाना दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। 

    भारत-रूस सहयोग का नया अध्याय
    भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग दशकों पुराना है. लड़ाकू विमान, हेलिकॉप्टर, मिसाइल सिस्टम और अन्य प्लेटफॉर्म दोनों देशों के रिश्ते की रीढ़ रहे हैं. अब रूस नागरिक विमानन क्षेत्र में भी अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है. पश्चिमी देशों पर प्रतिबंधों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की चुनौतियों के बीच रूस नए बाजारों की तलाश में है. भारत उसकी नजर में एक बड़ा और स्थिर बाजार है। 

    इन्नोप्रोम इंडिया प्रदर्शनी इसी रणनीति का हिस्सा लगती है. यहां सिर्फ विमान सौदों की बात नहीं हो रही बल्कि औद्योगिक सहयोग के कई अन्य क्षेत्रों पर भी चर्चा हो रही है. 120 से अधिक कंपनियों की भागीदारी से साफ है कि दोनों देश सिर्फ सरकारी स्तर पर नहीं बल्कि निजी क्षेत्र से भी रिश्ते मजबूत करना चाहते हैं। 

    क्षेत्रीय कनेक्टिविटी भारत सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है. उड़ान योजना के तहत छोटे शहरों को हवाई सेवा से जोड़ने के प्रयास चल रहे हैं. रूसी क्षेत्रीय विमान अगर प्रतिस्पर्धी कीमत और विश्वसनीय सेवा के साथ आते हैं तो वे इस लक्ष्य को पूरा करने में मददगार साबित हो सकते हैं. साथ ही स्थानीय उत्पादन से भारत की विमानन विनिर्माण क्षमता भी मजबूत होगी। 

    संभावनाएं और चुनौतियां दोनों मौजूद
    ये प्रस्ताव आशाजनक जरूर हैं लेकिन कई चुनौतियां भी हैं. सबसे पहले प्रमाणन और नियामक मंजूरी का मुद्दा. किसी भी नए विमान को भारतीय आसमान में उड़ान भरने के लिए सख्त सुरक्षा और प्रमाणन प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है. दूसरी चुनौती रखरखाव और स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता है. लंबे समय तक विमानों को सुचारू रूप से चलाने के लिए मजबूत सपोर्ट सिस्टम जरूरी होता है। 

    तीसरी चुनौती कॉम्पीटिशन है. भारतीय बाजार में अन्य देशों के क्षेत्रीय विमान भी मौजूद हैं या आने की कोशिश कर रहे हैं. कीमत, फ्यूल एफिसिएंसी, यात्री सुविधा और आफ्टर सेल्स सपोर्ट जैसे मुद्दे फैसला करने वाले साबित होंगे. चौथी बात फाइनेंशियल सपोर्ट की है. बड़े सौदों के लिए आसान ऋण सुविधा या लीजिंग व्यवस्था महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। 

    इन चुनौतियों के बावजूद रूस पक्ष आशावादी नजर आ रहा है. पिछले छह महीनों में हुई प्रगति और इन्नोप्रोम में संभावित समझौते इस बात का संकेत देते हैं कि दोनों देश व्यावहारिक सहयोग की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. अगर आईएल-114-300 के बड़े ऑर्डर और एसजे-100 का स्थानीय उत्पादन दोनों सफल होते हैं तो यह भारत-रूस एयरोस्पेस संबंधों का नया अध्याय साबित हो सकता है। 

    आगे की राह और रणनीतिक महत्व

    भारत के लिए यह सहयोग कई मायनों में फायदेमंद हो सकता है. 

        पहला- क्षेत्रीय हवाई कनेक्टिविटी में सुधार. 
        दूसरा- घरेलू विनिर्माण क्षमता का विकास. 
        तीसरा- आपूर्ति स्रोतों में विविधता. 

    एक ही देश या क्षेत्र पर निर्भरता कम करने की रणनीति के तहत रूस विकल्प उपयोगी साबित हो सकता है. रूस के लिए भारत एक बड़ा बाजार है जहां वह अपने नागरिक विमानों को जगह दे सकता है. साथ ही स्थानीय उत्पादन से वह तकनीक साझा कर दीर्घकालिक साझेदारी बना सकता है। 

    ब्रिक्स जैसे मंचों पर दोनों देश पहले से सहयोग कर रहे हैं. औद्योगिक और तकनीकी सहयोग को और गहरा करने से यह रिश्ता और मजबूत होगा. कुल मिलाकर, इन्नोप्रोम इंडिया में होने वाले संभावित समझौते सिर्फ कुछ विमानों की खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं रहेंगे। 

    वे क्षेत्रीय कनेक्टिविटी, स्थानीय विनिर्माण और रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा दे सकते हैं. IL-114-300 और SJ-100 जैसे प्रस्ताव अगर धरातल पर उतरते हैं तो भारत-रूस सहयोग रक्षा से आगे बढ़कर नागरिक एयरोस्पेस क्षेत्र में भी मजबूती से स्थापित हो जाएगा. यह दोनों देशों के लिए आपसी लाभ का नया अध्याय साबित हो सकता है। 

     

  • जमीन की कमी और गैस संकट के बीच यूरोप का अनोखा प्रयोग, समुद्र में बना एनर्जी आइलैंड; ब्रिटेन-डेनमार्क से जुड़ेगा ग्रिड

    जमीन की कमी और गैस संकट के बीच यूरोप का अनोखा प्रयोग, समुद्र में बना एनर्जी आइलैंड; ब्रिटेन-डेनमार्क से जुड़ेगा ग्रिड

    ब्रसेल्स

     सौ बात की एक बात कि बिजली पैदा करने को लेकर यूरोप के देश बेल्जियम से एक ऐसी ख़बर आई जिस पर ज़्यादा लोगों का ध्यान नहीं गया लेकिन सबको ध्यान देने की ज़रूरत है. बिजली पैदा करने के लिए दुनिया में क्या-क्या किया जा रहा है, इस पर सब को नज़र रखने की ज़रूरत है. क्योंकि दुनिया में ताक़त का खेल इसी आधार पर होता जा रहा है कि किसके पास कितनी ऊर्जा बनाने की कपैसिटी है. ईरान युद्ध में सारा खेल ही तेल के व्यापार को कंट्रोल करने का है. AI की जंग जो चल रही है, उसमें दुनिया के डेटा सेंटरों पर कंट्रोल करने के लिए बड़ी भारी मात्रा में बिजली की ज़रूरत पड़ेगी, ये सब देश समझ रहे हैं. ऊधर रूस और यूक्रेन युद्ध में यूरोप ने देख लिया कि उसके हाथ इसलिए बंधे हुए हैं क्योंकि उसको सर्दियों में अपने हीटिंग सिस्टम चलाने के लिए रूस की गैस की ज़रूरत पड़ती है. और यूरोप में अब जिस हिसाब से गर्मी पड़ने लग गई है तो वो ये भी समझ रहे हैं कि अब तो वहां भी AC लगाने पड़ेंगे आगे चल कर। 

    अभी तक पंखे भी नहीं देखे थे उन्होंने. तो बिजली कहां से आएगी इतनी? कोयले से बना नहीं सकते क्योंकि कोयला जला-जला कर ही तो 100 साल में दुनिया का ये हाल हो गया है कि दुनिया भर में गर्मी बढ़ गई है. यूरोप दूसरों को नसीहत दे रहा है कि कोयला मत जलाओ तो ख़ुद कैसे जला लेगा? तेल और गैस के लिए या तो रूस के सामने झुकना पड़ता है या अरब देशों पर निर्भर रहना पड़ता है. परमाणु बिजली के लिए यूरेनियम की मारामारी है. सोलर बिजली के लिए ज़मीन भी चाहिए जो यूरोप के कई देशों में उतनी है नहीं और बड़ी बात ये कि सूरज तो वहां निकलता ही कितने दिन है साल में? तो यूरोप के कई देश बनाते हैं बिजली हवा से। 

    हवा से मतलब विंडमिल से. पवन चक्कियों से. वो देखा है ना आपने बड़ा से पंखा लगा देते हैं ऊंचाई पर और वो हवा से चलता है तो नीचे चक्की चलती है और उससे बिजली बनाते हैं. लेकिन उसके लिए क्या चाहिए? एक तो बहुत सारी पवन चक्कियां एक साथ लगाने के लिए ख़ाली मैदान चाहिएं जहां खुली हवा तेज़ी से चलती हो. इतनी ज़मीन कहां से लाएं एक साथ? और ज़मीन पर पवन चक्कियां लगा दें तो खेती नहीं कर सकते वहां फिर. वो अलग नुक़सान है. क्योंकि अगर पवन चक्कियां वहां लगाएं जहां पर भी थोड़ी-बहुत जगह मिले तो वो तो कर सकते हैं लेकिन फिर ये दूर-दूर लगे पंखों से बिजली बनाकर एक जगह लाने के लिए इतना सारी केबल लगानी पड़ेगी, नहीं तो उसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कैसे करेंगे? और यूरोप के बेल्जियम जैसे देशों के पास तो वैसे भी इतनी सारी खुली ज़मीन नहीं है एक साथ. तो जानते हैं बेल्जियम क्या कर रहा है?

    बेल्जियम ने लगाया टापू वाला दिमाग
    बेल्जियम ने देखा कि सबसे ज़्यादा खुली और तेज़ हवा बिना किसी रुकावट के कहां चलती है? दिन हो रात कौन-सी ऐसी जगह है जहां पवन चक्कियों के पंखे फ़र्र-फ़र्र चलते रहेंगे और बिजली बनाते रहेंगे? और ज़मीन भी नहीं छोड़ने पड़ेगी उनके लिए? समुद्र में. जी, बेल्जियम ने सोचा कि अगर समुद्र में पवन चक्कियां लगा दें तो? पानी में ताल बिछाकर बिजली ज़मीन तक ले आएंगे. लेकिन समुद्र में पवन चक्कियां लगाएंगे कहां? तैरते हुए प्लैटफ़ॉर्म पर तो लगा नहीं सकते क्योंकि वो तो हवा से डोल जाएंगे. तो बेल्जियम क्या कर रहा है कि समुद्र में एक पूरा टापू बना रहा है. जी, पूरा नया टापू समुद्र के अंदर. ये अपने आप में दुनिया का एक नया अजूबा बनाया जा रहा है.  वो समुद्र में एक पूरा टापू बना रहा है बिजली पैदा करने के लिए। 

    कहां बन रहा यह आइलैंड?
    नॉर्थ सी में, उत्तर सागर में, बेल्जियम अपने तट से क़रीब 45 km दूर एक आर्टिफ़िशियल एनर्जी आइलैंड बना रहा है. प्रिंसेस एलिज़ाबेथ आइलैंड के नाम से. ये दुनिया का पहला ऐसा टापू बन रहा है. और ये टापू बनाया कैसे जा रहा है वो असली समझने वाली बात है. जैसे बच्चों के खिलौने होते हैं ना जिनमें ब्लॉक जोड़-जोड़ कर कोई बिल्डिंग बनाई जाती है या कुछ भी बनाया जाता है? वैसे बना रहा है. सिमेंट के, कॉन्क्रीट के बड़े-बड़े ब्लॉक बना रहा है, बक्से बना रहा है. और इन बक्सों में समंदर में डाल दिया जाएगा और उनको जोड़कर पूरा टापू बना देंगे. द नेदरलैंड्स के फ़्लिसिंगेन बंदरगाह में 23 ऐसे बड़े-बड़े कॉन्क्रीट के डिब्बे बनाए गए हैं. बड़े-बड़े मतलब एक-एक डिब्बा क़रीब 58m लंबा है, 28m चौड़ा है और 23 से 32m ऊंचा है. 58x28x32 समझ रहे हैं आप? मतलब एक 7 मंज़िला बिल्डिंग समझ लीजिए चौड़ी वाली. दो को जोड़ दो एक फ़ुटबॉल के मैदान जितनी जगह से भी ज़्यादा घेर लें, इतने बड़े-बड़े डिब्बे हैं. और हर डिब्बे का वज़न कितना? हर एक का वज़न है क़रीब 22,000 टन। 

    कैसे बन रहा आइलैंड
    मतलब समझ लो कोई 15,000 गाड़ियों जितना वज़न एक डिब्बे का. इतना सिमेंट लगा कर बने हैं ये डिब्बे. और ये तो अभी ख़ाली डिब्बों की बात हो रही है. खोखले बनाए गए हैं. 23 ऐसे डिब्बे. और इनको उतार दिया गया है समुद्र में. इन भारी डिब्बों को जहाज़ों से खींचकर समुद्र में ले जाया गया और वहां समुद्र के तल में डुबो दिया गया. और अब इनकी दीवारों के अंदर भरी जाएगी रेत. क़रीब बीस लाख क्यूबिक मीटर रेत भरी जा रही है. और ऐसे बनाया जा रहा है समुद्र के अंदर एक 6 हेक्टेयर का ठोस टापू. 6 हेक्टेयर मतलब लगभग 15 एकड़ का टापू बनेगा. मतलब समझ लो फ़ुटबॉल के 12 मैदानों जितना. उस पर बंदरगाह बनाया जाएगा, हेलीपैड बनाया जाएगा. और एक साथ 250 से ज़्यादा पवन चक्कियां लगाई जाएंगी, उनकी टर्बआइन लगाई जाएंगीं जिससे बिजली बनेगी और तारें बिछाई जाएंगी तट तक. डिब्बे समुद्र में उतार दिये गए हैं. बाक़ी काम में 5 साल लग जाएंगे. 2031 से बिजली मिलना शुरू हो जाएगी बेल्जियम को इससे। 

    कैसे बिजली पैदा होगी?
    यानी समुद्र में लगने वाली सैकड़ों पवन च
    क्कियों की बिजली को एक जगह इकट्ठा कर लिया जाएगा और फिर केबलों से ज़मीन तक पहुंचाया जाएगा. कितननी बिजली बनेगी, 3.5 GW बिजली बनने की उम्मीद है इससे. कोई ईंधन नहीं लगेगा. कोई कोयला नहीं, तेल नहीं, गैस नहीं. सिर्फ़ हवा से इतनी बिजली एक साथ एक ही जगह से बना ले जाएगी क्योंकि समुद्र में हवा बिना रुकावट से दिन-रात चलती रहती है. बेल्जियम को पीक बिजली की डिमांड होती है लगभग 9-10 GW और सर्दियों में हीटर चलते हैं तो लगभग 12 GW डिमांड हो जाती है. इस एक टापू से 3.5 GW मिल जाएगी मतलब पूरे देश की एक तिहाई ज़रूरत यहां से पूरी हो जाएगी. एक ही जगह से और ये फ़ॉर्मुला चल निकला तो सोचिए आगे बाक़ी देश भी क्या-क्या कर सकते हैं?

    समंदर में कितनी बिजली बनेंगी
    ज़मीन पर ये करने के लिए एक तो सैकड़ों पवन चक्कियां लगाने के लिए खेती की ज़मीन ख़ाली करनी पड़ेगी तो वो तो नुक़सान है ही. ऊपर से समुद्र में हवा ज़्यादा तेज़ चलती है और ज़्यादा स्थिर तरीक़े से चलती है, इसलिए एक ही क्षमता वाली पवन चक्की समुद्र में ज़मीन से कहीं ज़्यादा बिजली देती है. अगर वहां टापू पर 250 पवन चक्कियां लगानीं पड़ेंगी तो ज़मीन पर उतनी बिजली बनाने के लिए 350 पवन चक्कियां लगानी पड़ेंगीं. बेल्जियम बहुत छोटा और घना बसा हुआ देश है, ज़मीन उतनी है नहीं. पवन चक्कियों की आवाज़ भी होती है. और क़ुदरत के नज़ारे भी छुप जाते हैं पवन चक्कियां लगाने से. ख़ूबसूरत तो है ही सारा यूरोप. तो पवन चक्कियों के बड़े फ़ार्म लगाना वहां मुमकिन ही नहीं है। 

    नॉर्थ सी बनेगा यूरोप का बिजलीघर
    नॉर्थ सी यानी उत्तर सागर में हवा लगातार चलती है और तेज़ चलती है, इसलिए ये इलाक़ा पवन ऊर्जा के लिए दुनिया के सबसे अच्छे इलाक़ों में एक माना जाता है. रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप समझ चुका है कि गैस के लिए रूस पर निर्भर रहना ख़तरनाक है. आगे चलकर ये टापू ब्रिटेन के साथ भी केबल से जुड़ सकता है. और डेनमार्क के साथ भी जुड़ सकता है, ताकि पड़ोसी देशों को ये बिजली बेच भी सके. टापू को और बड़ा किया जा सकता है. मतलब नॉर्थ सी को यूरोप का बिजलीघर बनाया जा सकता है, पावरहाउस बनाया जा सकता है. सारा खेल ही पावर का है. और दुनिया देखिए क्या-क्या प्लैन बना रही है पावर के लिए. सौ बात की एक बात। 

  • पंजाब में कांग्रेस के सामने फिर वही पुरानी चुनौती, गुटबाजी के बीच नेतृत्व बदलाव की मांग; क्या दोहराएगा इतिहास?

    पंजाब में कांग्रेस के सामने फिर वही पुरानी चुनौती, गुटबाजी के बीच नेतृत्व बदलाव की मांग; क्या दोहराएगा इतिहास?

    चंडीगढ़ 
    पंजाब की सियासत में कांग्रेस एक बार फिर उसी दोराहे पर खड़ी दिख रही है, जहां वह 2022 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले खड़ी थी. कांग्रेस ने पांच साल पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर चरणजीत सिंह चन्नी को सत्ता की कमान सौंपी थी, लेकिन नवजोत सिंह सिद्ध की नाराजगी दूर नहीं हो सकी और कांग्रेस को सत्ता गंवानी पड़ गई थी. अब कांग्रेस ने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठन में बदलाव शुरू। 

    कांग्रेस में नेतृत्व के टकराव के मुद्दे को सुलझाने के नाम पर पार्टी आलाकमान फैसले ले रहा है. भूपेश बघेल को हटाकर पार्टी ने सचिन पायलट को पंजाब का प्रभारी बना दिया है. इसके बाद भी चन्नी खेमा राजा वडिंग को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने की मांग कर रहा है। 

    पंजाब विधानसभा चुनाव की सियासी तपिश के बीच कांग्रेस के सामने सियासी संकट खड़ा हो गया है. इस समय जहां चुनाव की तैयारी में राजनीतिक दल जुटे हैं, तो कांग्रेस अभी संगठन में ही उलझी है. कांग्रेस प्रभारी के बाद प्रदेश अध्यक्ष बदलती है तो मामला सुलझने से ज्यादा कहीं उलझ न जाए और फिर से उसे कहीं 'चेकमेट' का सामना न करना पड़ जाए?

    पांच साल पहले वाली गलती दोहरा रही कांग्रेस
    पंजाब में कांग्रेस एक बार फिर उसी मुकाम पर खड़ी है, जिसने 2021 में पार्टी को गहरे राजनीतिक संकट में डाल दिया था. उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच चली लंबी खींचतान ने कांग्रेस को कमजोर कर दिया था. पार्टी नेतृत्व ने संगठन में अचानक बदलाव किए थे. मुख्यमंत्री से लेकर प्रदेश अध्यक्ष तक बदल दिए थे, लेकिन नतीजा यह हुआ कि पार्टी पूरी तरह बिखर और आम आदमी पार्टी (AAP) ने प्रचंड बहुमत हासिल कर कांग्रेस का किला ढहा दिया। 

    2022 में कांग्रेस को करारी मात खानी पड़ी थी. अब फिर कुछ वैसे ही हालत नजर आ रहे हैं. इस बार पूर्व सीएम चरणजीत सिंह चन्नी ने कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है. साल 2021 में कांग्रेस ने इसी तरह की गुटबाजी को खत्म करने के लिए बदलाव किया था. अब फिर से कांग्रेस बदलाव कर मामले को सुलझाने की कवायद शुरू की है, जिसमें भूपेश बघेल को हटाकर सचिन पायलट को प्रभारी बनाया है। 

    चुनावी माहौल में बदलाव महंगा न पड़ जाए
    कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष को लेकर भी बदलने की चर्चा है, लेकिन यह बदलाव 2021 की तरह महंगा न पड़ जाए. पंजाब विधानसभा चुनाव को अब छह महीने से भी कम समय है. कांग्रेस हाईकमान ने करीब दो महीने के सियासी मंथन के बाद और राहुल गांधी ने पंजाब के एक-एक नेता से दिल्ली में बैठक कर फीडबैक लिया. इसके बाद एक जुलाई को राजा वडिंग को प्रदेश अध्यक्ष और चरणजीत सिंह चन्नी को कैंपेन कमेटी का चेयरमैन नियुक्त किया. इसके बाद से चन्नी गुट ने वड़िंग को हटाने की मांग उठा दी, जो सियासी टेंशन का सबब बना हुआ। 

    बता दें कि पंजाब के 2022 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 18 सीटें मिली थी, जो राज्य में पार्टी का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन रहा था. आम आदमी पार्टी ने 92 सीटों के साथ शानदार जीत हासिल कर सरकार बनाई थी। 2022 के बाद कांग्रेस में कोई नेता प्रदेश अध्यक्ष की कमान लेने को तैयार नहीं था. ऐसे में राहुल गांधी ने राजा वडिंग को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया था। 

    राजा वडिंग ने पंजाब में सिर्फ संगठन की बागडोर ही नहीं संभाली बल्कि 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को राज्य की 13 में से 7 लोकसभा सीटें जिताकर अपना लोहा भी मनवाया था, जबकि चरणजीत चन्नी 2022 के चुनाव हार के बाद पंजाब छोड़कर विदेश चले गए थे और रंधावा राजस्थान का प्रभार संभाल रहे थे. ऐसे में राजा वडिंग ने काफी मशक्कत कर कांग्रेस को खड़ा किया, लेकिन 2027 चुनाव की सियासी सरगर्मी बढ़ने के साथ ही चन्नी ने प्रदेश अध्यक्ष बदलने का मोर्चा खोल दिया है। 

    चन्नी समर्थक विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने और वडिंग को हटाने की मांग को लेकर पार्टी नेतृत्व पर दबाव बना रहे हैं. ऐसे में प्रभारी रहे भूपेश बघेल गुटबाजी को दूर करने में नाकाम रहे और विवाद इतना बढ़ा कि पार्टी आलाकमान को सचिन पायलट को नया प्रभारी नियुक्त करना पड़ा. इसके बाद कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष को बदलने की चर्चा चल रही है, लेकिन चुनाव से ठीक पहले बिहार में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष को बदलकर अपना हश्र देख चुकी है. ऐसे में क्या पंजाब में जोखिम भरा कदम उठाएगी?

    पंजाब की सत्ता में वापसी पर कहीं न लग जाए ग्रहण
    पंजाब की सियासत का इतिहास गवाह है कि जब-जब कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों से ठीक पहले शीर्ष नेतृत्व और प्रदेश अध्यक्ष के चेहरे पर अनिश्चितता पैदा की है, तब-तब उसे भारी नुकसान उठाना पड़ा है. चन्नी खेमे की मांग है कि राज्य में दलित वोटों और समीकरणों को ध्यान में रखते हुए नेतृत्व में बदलाव किया जाए या चन्नी को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जाए। 

    वहीं, कांग्रेस हाईकमान के सामने जाट सिख और दलित नेतृत्व के बीच संतुलन साधने की बड़ी चुनौती बनी हुई है. पिछले 2022 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जाट सिख की जगह चन्नी को आगे कर दलित दांव खेला था, लेकिन सफल नहीं रहा. कांग्रेस का परंपरागत मतदाता जाट सिख नाराज होकर आम आदमी पार्टी के साथ चला गया. चन्नी अपने दलित समुदाय को भी साधकर नहीं रख सके। 

    पंजाब में जाट सिख और दलित केमिस्ट्री में उलझी
    पंजाब में जाट सिख का दांव हमेंशा सफल रहा है. आजादी के बाद से पंजाब में जब-जब कांग्रेस ने जाट सिख चेहरे को आगे कर चुनाव लड़ा, पार्टी को पूर्ण बहुमत के साथ बड़ी सफलता मिली. 2002 और 2017 के विधानसभा चुनावों में जाट सिख नेतृत्व ने मालवा, माझा और दोआबा के ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस का आधार मजबूत किया। 

    पंजाब की ग्रामीण आबादी, कृषि अर्थव्यवस्था और किसान-समर्थित वोट बैंक में जाट सिख समुदाय का दबदबा माना जाता है. इस वर्ग से चेहरा आगे करने पर अकाली दल और आम आदमी पार्टी के पारंपरिक ग्रामीण वोट बैंक में सेंध लगाना आसान रहता है। 

    2022 में पार्टी ने चुनावों से ठीक पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर चरणजीत सिंह चन्नी (जो रामदासिया दलित सिख समुदाय से आते हैं) को मुख्यमंत्री बनाया था, इसके बाद भी दलित समाज का वोट कांग्रेस को नहीं मिल सका। 

    पंजाब में लगभग 32 फीसदी दलित आबादी होने के बावजूद यह प्रयोग चुनावी जीत में नहीं बदल सका. कांग्रेस को 2022 में अब तक की सबसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा और पार्टी केवल 18 सीटों पर सिमट गई. ग्रामीण जाट सिख वोटों का एक बड़ा हिस्सा आम आदमी पार्टी (भगवंत मान – जाट सिख चेहरा) की तरफ शिफ्ट हो गया. ऐसे में कांग्रेस ने जाट सिख चेहरे के तौर पर अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को आगे किया। इसका नतीजा 2024 के लोकसभा चुनाव में दिखा, जब कांग्रेस 7 सीटें जीतने में सफल रही। 

    2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के अंदर जारी खींचतान के पीछे यही बहस है कि क्या कांग्रेस को अपने कोर जाट सिख फॉर्मूले पर ही कायम रहना चाहिए या दलित नेतृत्व को दोबारा बड़ी जिम्मेदारी देकर नया सामाजिक समीकरण तैयार करना चाहिए. सचिन पायलट के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे बिना कोई बड़ा नुकसान किए सभी धड़ों को एक मंच पर लाएं, वरना इतिहास खुद को दोहराने में देर नहीं लगााएगा।