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  • चुनाव आयोग के फैसलों पर उठे सवाल, CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका

    चुनाव आयोग के फैसलों पर उठे सवाल, CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका

    नई दिल्ली
    सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर याचिका पर अगले हफ्ते सुनवाई करने पर सहमति जताई है। इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि उन्होंने अन्य दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की मंजूरी के बिना निर्वाचन आयोग (ECI) के नाम पर एकतरफा फैसले लिए।

    वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के सामने यह याचिका रखी। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने इस मामले को जल्द लिस्ट करने की मांग की। उन्होंने कहा कि कानूनी नियमों के मुताबिक कई सदस्यों वाले कमीशन के फैसले सर्वसम्मति से या बहुमत से होने चाहिए।

    क्या आरोप लगाया गया?
    विकास सिंह ने कहा, "कई सदस्यों वाले आयोग का मकसद यह था और कानून में भी यही लिखा है कि फैसला सर्वसम्मति से या बहुमत से लिया जाए। अब चुनाव आयोग ने जिस तरह से काम किया है उसे देखते हुए इस बात पर गंभीर संदेह है कि क्या एसआईआर की पूरी प्रक्रिया के लिए चुनाव आयोग ने कोई फैसला लिया भी था या नहीं। क्योंकि अगर आयोग ने सर्वसम्मति से फैसला नहीं लिया है तो… कोर्ट ने भी जो फैसला सुनाया है वह इसी आधार पर सुनाया है कि यह आयोग का फैसला है। इसलिए, यह एक गंभीर मामला है।"
    याचिका में क्या मांग की गई?
    इस याचिका में अधिकार-पृच्छा रिट की मांग की गई है। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त से यह बताने को कहा गया है कि उन्होंने किस अधिकार के तहत ऐसे काम किए हैं और कर रहे हैं मानो वे अकेले ही उस सामूहिक निर्णय लेने की शक्ति का इस्तेमाल करने के हकदार हों, जो संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत एक संस्था के तौर पर चुनाव आयोग को दी गई है।

    वहीं, राकेश कुमार सिंह की ओर से कोर्ट में दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि सत्ता का लगातार केंद्रीकरण हो रहा है, एजेंडा और मीटिंग के मिनट्स (कार्यवृत्त) में देरी या उनकी कमी है, वोटर लिस्ट की प्रक्रियाओं में बदलाव किए गए हैं और दो चुनाव आयुक्तों की जानकारी या मंजूरी के बिना अपीलें दायर की गई हैं।

    याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 के अनुसार, चुनाव आयोग का कामकाज जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से किया जाना चाहिए और अगर किसी मामले पर मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की राय अलग-अलग होती है तो उस मामले का फैसला बहुमत की राय के आधार पर किया जाएगा।

  • राजस्थान में समय पर होंगे पंचायती राज चुनाव, आयोग ने अफवाहों को नकारा

    राजस्थान में समय पर होंगे पंचायती राज चुनाव, आयोग ने अफवाहों को नकारा

    जयपुर
    राजस्थान के ग्रामीण इलाकों से लेकर राजनीतिक गलियारों तक इन दिनों एक ही सवाल सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है कि क्या राज्य में होने वाले आगामी पंचायती राज चुनाव एक बार फिर टल सकते हैं? दरअसल, सोशल मीडिया और विभिन्न अन्य माध्यमों से कुछ असामाजिक तत्वों और अफवाह फैलाने वालों द्वारा यह दावा किया जा रहा था कि आगामी महत्वपूर्ण पर्व-त्योहारों की अड़चन के चलते चुनाव की मियाद को आगे बढ़ाया जा सकता है। इस तरह की अफवाहों के कारण पंचायत चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे संभावित उम्मीदवारों, राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं और उनके समर्थकों के बीच असमंजस और ऊहापोह की स्थिति पैदा हो गई थी। ग्रामीण मतदाताओं के मन में भी संशय बनने लगा था कि क्या तय समय पर चुनाव हो पाएंगे या नहीं।

    स्थितियों को स्पष्ट करते हुए और जनता के बीच भ्रम को दूर करने के लिए खुद राज्य निर्वाचन आयुक्त राजेश्वर सिंह ने इस मामले में कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया है। राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से स्थिति को पूरी तरह साफ करते हुए एक आधिकारिक संदेश जारी किया गया है, जिसमें सभी प्रकार की अफवाहों का खंडन किया गया है।

    निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि पंचायती राज संस्थाओं के आम चुनाव अपनी निर्धारित समयावधि के भीतर ही शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराए जाएंगे। इस आधिकारिक स्पष्टीकरण के सामने आने के बाद चुनाव तैयारियों में जुटे उम्मीदवारों ने राहत की सांस ली है, वहीं प्रशासन ने भी अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं।

    अफवाहों से सावधान रहने की अपील, समय पर होगी पूरी प्रक्रिया
    राज्य निर्वाचन आयुक्त राजेश्वर सिंह ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल्स और मंचों के माध्यम से प्रदेश की जनता, पंचायती राज संस्थाओं से जुड़े प्रतिनिधियों और संभावित उम्मीदवारों से विशेष रूप से अपील की है कि वे किसी भी तरह की अफवाहों पर बिल्कुल ध्यान न दें।

    अपने संदेश में उन्होंने जनता को सचेत करते हुए लिखा कि इस तरह की भ्रामक सूचनाएं केवल माहौल खराब करने के लिए फैलाई जाती हैं, इसलिए ऐसे लोगों से पूरी तरह सावधान रहने की जरूरत है। निर्वाचन आयुक्त ने दो टूक शब्दों में कहा है कि पंचायत चुनाव की पूरी प्रक्रिया को हर हाल में 15 नवंबर 2026 से पूर्व सफलतापूर्वक पूर्ण कर लिया जाना है। चुनाव जैसे बड़े लोकतांत्रिक आयोजन की प्रशासनिक तैयारियों में थोड़ा समय लगना स्वाभाविक है, और आयोग पूरी मुस्तैदी से काम कर रहा है।

    लॉटरी प्रक्रिया और त्योहारों के बीच तालमेल बैठा रहा है निर्वाचन आयोग
    संभावित चुनाव कार्यक्रमों की रूपरेखा और प्रशासनिक अड़चनों पर प्रकाश डालते हुए राज्य निर्वाचन आयुक्त ने बताया कि पंचायती राज विभाग द्वारा हाल ही में संपन्न कराई गई आरक्षण और वार्डों की लॉटरी से जुड़ी संकलित सूचनाएं अब राज्य निर्वाचन आयोग को प्राप्त हो रही हैं।

    इन तमाम आंकड़ों के आधार पर एक व्यवस्थित और चरणबद्ध चुनावी कार्यक्रम तैयार किया जा रहा है। आयोग संबंधित प्रशासनिक विभागों और सभी जिलों के जिला निर्वाचन अधिकारियों के साथ लगातार विचार-विमर्श कर रहा है। चूंकि इस दौरान कई महत्वपूर्ण पर्व और त्योहार भी आ रहे हैं, इसलिए पर्वों की तिथियों और कानून-व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए ही मतदान की तारीखों का ऐसा खाका खींचा जा रहा है जिससे आम नागरिकों या त्योहारों को कोई असुविधा न हो।

    जल्द होगी आधिकारिक चुनाव घोषणा, उम्मीदवारों ने तेज की तैयारियां
    राज्य निर्वाचन आयोग के इस स्पष्टीकरण के बाद अब यह पूरी तरह साफ हो गया है कि राजस्थान में पंचायती राज चुनाव तय समय सीमा के भीतर ही आयोजित होंगे। निर्वाचन आयोग द्वारा बहुत जल्द औपचारिक चुनाव तिथियों और आचार संहिता की घोषणा किए जाने की संभावना है।

    इस घोषणा के बाद से ही राजस्थान के गांवों, ढाणियों और जिला मुख्यालयों की राजनीति में एक बार फिर से चुनावी सरगर्मी तेज हो गई है। संभावित उम्मीदवारों ने अपने जनसंपर्क अभियानों को गति दे दी है और राजनीतिक दलों ने भी अपने स्तर पर रणनीति बनानी शुरू कर दी है। ग्रामीण जनता अब अपने क्षेत्र के विकास के लिए नए जनप्रतिनिधियों के चुनाव को लेकर पूरी तरह उत्साहित नजर आ रही है।

     

  • SIR ड्राफ्ट में VIP वोटर्स के नाम पर EC की सफाई, जनप्रतिनिधियों के लिए क्या है खास प्रावधान?

    SIR ड्राफ्ट में VIP वोटर्स के नाम पर EC की सफाई, जनप्रतिनिधियों के लिए क्या है खास प्रावधान?

    नई दिल्ली
     कैबिनेट मंत्रियों के उनके सामान्य निवास स्थान के बजाय किसी अन्य जगह की वोटर लिस्ट में नाम दर्ज होने को लेकर उठे सवालों के बीच चुनाव आयोग ने स्थिति स्पष्ट की है।

    आयोग ने कहा है कि SIR के ड्राफ्ट रोल में पहले से फ्लैग किए गए जनप्रतिनिधियों और कुछ अन्य वर्गों के नाम शामिल किए गए हैं, ताकि क्लेम-ऑब्जेक्शन की अवधि में जरूरी डॉक्युमेंट्स जुटाए जा सकें।

    चुनाव आयोग ने आरपी एक्ट की धाराओं का दिया हवाला
    चुनाव आयोग ने रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट, 1950 की धारा 20(1बी) का भी उल्लेख किया। इसके मुताबिक, कोई सांसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य अपने कार्यकाल के दौरान केवल अपने कर्तव्यों के सिलसिले में निर्वाचन क्षेत्र से एलॉट रहने के कारण उस निर्वाचन क्षेत्र का सामान्य निवासी होना बंद नहीं माना जाएगा, जहां चुनाव के वक्त वह वोटर के रूप में रजिस्टर्ड था। वहीं, धारा 20(4) के तहत राष्ट्रपति द्वारा चुनाव आयोग से परामर्श के बाद कुछ पदों को इस प्रावधान के दायरे में घोषित किया गया है।

    कई संवैधानिक और सरकारी पद शामिल
    18 अप्रैल 1960 की अधिसूचना के तहत राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यों के राज्यपाल, कैबिनेट मंत्री, राज्यसभा और विधानसभा के कुछ पीठासीन पदों के साथ-साथ केंद्र या राज्य के मंत्री, उपमंत्री और संसदीय सचिव जैसे पद इस प्रावधान में शामिल किए गए हैं। इसमें लोकसभा और विधानसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, विधान परिषद के सभापति और उपसभापति भी शामिल हैं।

    ड्राफ्ट रोल में दस्तावेजों की जांच का मौका
    वीआईपी नामों को लेकर आयोग ने कहा कि इन प्रावधानों का मकसद ऐसे पदों पर रहने वाले लोगों के वोटर रजिस्ट्रेशन को लेकर स्थिति स्पष्ट रखना है। ड्राफ्ट रोल के दौरान ऐसे नामों पर जरूरी दस्तावेजों की जांच की प्रक्रिया भी पूरी की जा सकती है।

  • फर्जी और निष्क्रिय वोटरों पर कार्रवाई, UP में जुड़े सबसे ज्यादा नए मतदाता

    फर्जी और निष्क्रिय वोटरों पर कार्रवाई, UP में जुड़े सबसे ज्यादा नए मतदाता

    नई दिल्ली

    भारतीय चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के तहत देश के 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की वोटर लिस्ट से करीब 5.2 करोड़ अयोग्य मतदाताओं के नाम हटा दिए हैं जो कि इन राज्यों के कुल मतदाताओं का लगभग 10.2 प्रतिशत है. आयोग का कहना है कि ये अभियान वोटर लिस्ट को साफ-सुथरा और सटीक बनाने के उद्देश्य से चलाया गया, जिसमें अनुपस्थित, ट्रांसफर, मृत, डबल पंजीकृत और अन्य अयोग्य मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, ताकि फर्जी मतदान की गुंजाइश खत्म हो सके.

    आयोग ने बताया कि SIR का पहला चरण बिहार में शुरू किया गया था. इसके बाद उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात और तमिलनाडु जैसे 11 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में एसआईआर अभियान शुरू किया गया था. अभियान के दौरान कुल 51 करोड़ मतदाताओं की जांच की गई, जिसमें से 10.2% नाम अनुपस्थित, मृत या फर्जी पाए जाने पर हटाए गए. आयोग ने ये कदम मतदाता सूची को शुद्ध और सटीक बनाने के उद्देश्य से उठाया है. इस प्रक्रिया में अंदमान-निकोबार से लेकर केरल तक के चुनावी डेटा को खंगाला गया और लाखों नए नाम भी जोड़े गए.

    अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में कटे सबसे ज्याद नाम
    आंकड़ों के अनुसार, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में सबसे अधिक 16.6% नाम हटाए गए. इसके बाद उत्तर प्रदेश में 13.2% और गुजरात में 13.1% नामों की छंटनी की गई है. छत्तीसगढ़ में भी 11.3% मतदाताओं के नाम सूची से बाहर किए गए. बंगाल में ये दर 10.9% रही, जहां न्यायिक प्रक्रिया के जरिए 27 लाख से ज्यादा नाम हटाए गए. इन राज्यों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग थे जो या तो स्थायी रूप से ट्रांसफर हो चुके थे या उनकी मृत्यु हो चुकी थी.

    '6.5 करोड़ ने नहीं किया कभी मतदान'
    SIR अभियान के दौरान पाया गया कि 13 करोड़ लोग अपने पंजीकृत पतों पर अनुपस्थित थे, जबकि 3.1 करोड़ लोग दूसरे राज्यों में चले गए थे.

    इसके अलावा मतदाता सूची ने करीब 6.5 करोड़ ऐसे मतदाता थे, जिन्होंने कभी मतदान ही नहीं किया. इससे फर्जी वोटिंग की आशंका बनी रहती थी. लिहाजा उन्हें हटाने से एक शुद्ध और सटीक मतदाता सूची तैयार हुई है. अब इन 12 प्रदेशों में शुद्धिकरण के बाद कुल 45.8 करोड़ मतदाता पंजीकृत हैं. पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में क्रमशः 20.9% और 10% की शुद्ध गिरावट दर्ज की गई है, जबकि पुडुचेरी में मतदाताओं की संख्या में 1% की शुद्ध गिरावट देखी गई है. मध्य प्रदेश में 5.7, राजस्थान में 5.4, केरल में 2.5 और लक्षद्वीप में 0.3% मतदाताओं की संख्या में कमी आई है.

    UP में जोड़े गए सबसे ज्यादा नाम
    आयोग ने बताया कि नाम हटाने के साथ-साथ निर्वाचन आयोग ने 2 करोड़ नए नाम मतदाता सूची में जोड़े भी हैं. जिसमें उत्तर प्रदेश 92.4 लाख नए मतदाताओं के साथ पहले स्थान पर है. यूपी के बाद तमिलनाडु में 35 लाख, केरल में 20.4 लाख और राजस्थान में 15.4 लाख नए नाम शामिल किए गए. मध्य प्रदेश में 12.9 लाख और गुजरात में 12 लाख से अधिक मतदाताओं ने फॉर्म 6 और फॉर्म 8 के जरिए अपना पंजीकरण कराया, जिससे सूची में युवाओं की भागीदारी बढ़ी है.

  • बंगाल में 90 लाख वोटर लिस्ट से बाहर, चुनाव आयोग ने जारी किया जिलेवार आंकड़ा

    बंगाल में 90 लाख वोटर लिस्ट से बाहर, चुनाव आयोग ने जारी किया जिलेवार आंकड़ा

    कलकत्ता

    पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल के बीच वोटर लिस्ट को लेकर नया अपडेट आ गया है। चुनाव से ठीक पहले चुनाव आयोग (ECI) ने पश्चिम बंगाल में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर बड़ा और अहम डेटा जारी किया है। इस बार खास बात यह रही कि आयोग ने पहली बार जिलावार तरीके से नाम जोड़ने और हटाने की पूरी जानकारी सार्वजनिक की है। अगर आंकड़ों पर नजर डालें, तो तस्वीर काफी बड़ी और जटिल दिखती है। आयोग के मुताबिक, अब तक कुल 90.66 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। यह बड़ा डेटा माना जा रहा है।

    अबतक 90.66 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए 
    चुनाव आयोग ने पहली बार जिलेवार तरीके से नाम जोड़ने और हटाने की भी जानकारी शेयर की है. आयोग के अनुसार पश्चिम बंगाल में एसआईआर की इस प्रक्रिया में अब तक कुल 90.66 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं. पहले चरण में दिसंबर 2025 में ड्राफ्ट लिस्ट के दौरान 58.2 लाख नाम हटाए गए थे, जबकि फरवरी 2026 की अंतिम सूची तक 5.46 लाख अतिरिक्त नाम हटाए गए हैं। 

    चुनाव आयोग के मुताबिक लॉजिकल विसंगति यानी डेटा में तकनीकी गड़बड़ियों के आधार पर 60 लाख से ज्यादा वोटरों को जांच के दायरे में रखा गया था. इन मामलों को अंडर एडजुडिकेशन की कैटेगरी में रखा गया था ताकि अधिकारी गहराई से इनकी जांच कर सकें. आयोग के मुताबिक, अब तक लगभग 59.84 लाख मामलों का निपटारा किया जा चुका है. इस जांच के बाद करीब 32.68 लाख पात्र लोगों के नाम दोबारा जोड़े गए हैं, जबकि अपात्र मिले 27.16 लाख लोगों के नाम काटे गए। 

    ECI के इतिहास में पहली बार हुआ ये काम
    इलेक्शन कमीशन के इतिहास में ये पहली बार है जब पश्चिम बंगाल को लेकर एसआईआर के संबंध में जिलेवार नाम जोड़ने और हटाने का डेटा सार्वजनिक किया गया है. आयोग का मकसद पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना और चुनावी सूचियों की विश्वसनीयता को बढ़ाना है. बता दें कि ये डेटा अब सार्वजनिक तौर पर भी उपलब्ध है। 

    न्यायिक अधिकारियों के ई-हस्ताक्षर होते ही जारी होंगे आंकड़े

    जबकि पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के कार्यालय की ओर से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, न्यायिक निर्णय के लिए भेजे गए कुल 60,06,675 मामलों में से 59,84,512 मामलों की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। जिन पर न्यायिक अधिकारियों के ई-हस्ताक्षर भी हो चुके हैं। इसके अलावा, 59,84,512 मामलों में से, जिन मतदाताओं को न्यायिक अधिकारियों द्वारा हटाए जाने योग्य माना गया है। उनके नामों को हटा दिया गया है। उनकी संख्या 27,16,393 है।

    91 लाख वोटरों के कट जाएंगे नाम
    इसका मतलब यह है कि पश्चिम बंगाल में हटाए गए मतदाताओं की कुल संख्या वर्तमान में 90,83,345 है। मालूम हो कि पिछले साल नवंबर में पश्चिम बंगाल के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की अधिसूचना जारी होने से पहले, राज्य में मतदाताओं की कुल संख्या 7,66,37,529 थी। पिछले साल दिसंबर में प्रकाशित मतदाताओं की मसौदा सूची में, कुल 58,20,899 नाम हटाए गए थे। 28 फरवरी को जारी की गई अंतिम वोटर लिस्ट में, हटाए गए नामों की संख्या बढ़कर 63,66,952 हो गई।

    अब, न्यायिक अधिकारियों ने 27,16,393 मामलों को हटाने लायक पाया है। इसके बाद, पूरे SIR प्रक्रिया के बाद पश्चिम बंगाल में हटाए गए वोटरों की कुल संख्या बढ़कर 90,83,345 हो गई है। इसके अलावा CEO कार्यालय के एक अधिकारी ने बताया कि जिन वोटरों के नाम न्यायिक जांच प्रक्रिया में "हटाने लायक" पाए गए हैं। उन्हें अपनी बात रखने का और अपील करने का एक अवसर मिलेगा।

    वहीं, विपक्षी दल (खासकर तृणमूल कांग्रेस) इस बड़े पैमाने पर नाम हटाने को वोटरों को बाहर करने की साजिश बता रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं कि अल्पसंख्यक और सीमावर्ती इलाकों पर ज्यादा असर पड़ा है. वहीं, बीजेपी और चुनाव आयोग इसे मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखने का जरूरी कदम बता रहे हैं। 

    दो चरणों में मतदान
    पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 दो चरणों- 23 और 29 अप्रैल को मतदान होना है. ऐसे में इस SIR प्रक्रिया और नाम हटाने के आंकड़ों पर सियासी घमासान तेज हो गया है। 

    एक बार अपील करने का मिलेगा मौका
    CEO कार्यालय से उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, न्यायिक जांच अभ्यास के दौरान "हटाने लायक" पाए गए मामलों की सबसे अधिक संख्या अल्पसंख्यक-बहुल मुर्शिदाबाद जिले से थी। मुर्शिदाबाद से हटाए गए नामों की कुल संख्या 4,55,137 है।

    इसके बाद उत्तर 24 परगना का नंबर आता है। जहां 3,25,666 नाम हटाए गए। बता दे कि पश्चिम बंगाल में दो चरणों में होने वाले विधानसभा चुनाव 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को होंगे। पहले चरण में 152 विधानसभा सीटों के लिए मतदान होगा और दूसरे चरण में बाकी 142 सीटों पर मतदान होगा। इसके बाद चुनाव परिणाम 4 मई को घोषित किए जाएंगे।

    सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर डेटा जारी
    बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट आज मंगलवार तक हर हाल में पब्लिश करने के आदेश दिए थे. साथ ही यह भी कहा था कि अगर सभी दस्तावेजों पर डिजिटल साइन नहीं भी हुए तो भी लिस्ट निकाली जाए. इसके अलावा कलकत्ता हाईकोर्ट को 3 पूर्व जजों की एक कमेटी बनाने के आदेश दिए. वोटर लिस्ट पब्लिश करने की आखिरी तारीख सोमवार थी, लेकिन काम न पूरा होने के चलते संभव नहीं सका. लिहाजा आज मंगलवार को चुनाव आयोग ने डेटा जारी किया है।